कुमार कृष्णन-
तीसरे प्रेस आयोग की बात और पत्रकार की घटती आजादी
जमालपुर में अंतरराष्ट्रीय पत्रकार सम्मेलन के मंच से पत्रकार की कलम को लोकतंत्र की आवाज और व्यवस्था को जवाबदेह बनाने वाला माध्यम बताया गया। उसी मंच से राज्यसभा सदस्य डॉ. भीम सिंह चंद्रवंशी ने तीसरे प्रेस आयोग के गठन की जरूरत भी उठाई। तालियां बजीं, पत्रकारों ने हाथ उठाकर समर्थन जताया। लेकिन मंच से उतरते ही एक सवाल सामने खड़ा था—जिस पत्रकार को लोकतंत्र का प्रहरी बताया जा रहा है, क्या उसकी अपनी आजादी बची हुई है? पास है, पर कार्यक्रम स्थल तक पहुंच नहीं; खबर करने की जिम्मेदारी है, पर यात्रा की सुविधा घट रही है; सवाल पूछने की अपेक्षा है, पर नौकरी और पारिश्रमिक की सुरक्षा अनिश्चित है। तब तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत का सवाल केवल प्रेस व्यवस्था का सवाल नहीं रह जाता, वह सीधे उस पत्रकार की जिंदगी से टकराता है, जिसके कंधे पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का भार रखा गया है।

मारवाड़ी धर्मशाला रोड स्थित सिद्धि विनायक मैरिज हॉल में ऑल इंडिया जर्नलिस्ट यूनियन भारत की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में भारत के अलावा बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और भूटान के पत्रकारों ने हिस्सा लिया। पत्रकारिता की विश्वसनीयता, डिजिटल माध्यमों की चुनौतियों, जनसरोकार और पत्रकारों की सामाजिक जिम्मेदारी पर चर्चा हुई। लेकिन इन चर्चाओं के बीच पत्रकार की अपनी कार्य-स्थितियों का सवाल भी उतना ही जरूरी है।
भारत में अब तक दो प्रेस आयोग बने हैं। पहला प्रेस आयोग 1952 में गठित हुआ और उसने 1954 में अपनी रिपोर्ट दी। उसके कार्यादेश में समाचारपत्रों के नियंत्रण, प्रबंधन, स्वामित्व और आर्थिक ढांचे के साथ पत्रकारों की भर्ती, प्रशिक्षण, पारिश्रमिक, सुविधाओं और सेवा-शर्तों तथा प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल भी शामिल थे।
पहले प्रेस आयोग ने अखिल भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना की सिफारिश की। बाद में संसद ने इसके लिए कानून बनाया और 1966 में प्रेस परिषद ने काम करना शुरू किया। कामकाजी पत्रकारों की सेवा-शर्तों को कानूनी आधार देने के लिए 1955 में कामकाजी पत्रकार तथा अन्य समाचारपत्र कर्मचारी अधिनियम बनाया गया। यानी उस दौर में प्रेस की स्वतंत्रता की चर्चा पत्रकार की पेशेवर स्थिति से अलग नहीं थी।
दूसरा प्रेस आयोग 29 मई 1978 को न्यायमूर्ति पी. सी. गोस्वामी की अध्यक्षता में गठित हुआ। 1980 में आयोग का पुनर्गठन हुआ और न्यायमूर्ति के. के. मैथ्यू को अध्यक्ष बनाया गया। आयोग ने 1982 में अपनी रिपोर्ट दी। उसका समय भी महत्वपूर्ण था। देश आपातकाल के अनुभव से निकल चुका था और प्रेस की स्वतंत्रता, सरकार और प्रेस के संबंध, समाचारपत्रों के स्वामित्व तथा आर्थिक संरचना जैसे सवाल बहस के केंद्र में थे।
आज दूसरे प्रेस आयोग की रिपोर्ट को भी लगभग आधी सदी हो चुकी है। इस दौरान पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया। तब अखबार समाचार का प्रमुख माध्यम था। आज समाचार मोबाइल की स्क्रीन पर है। तब खबर अगले दिन पाठक तक पहुंचती थी, आज कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। सामाजिक माध्यमों ने सूचना के प्रसार को लोकतांत्रिक विस्तार दिया है, लेकिन खबर, राय, प्रचार और अफवाह के बीच फर्क बनाए रखना भी कठिन हुआ है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस चुनौती को और जटिल कर रही है।
इस बदली हुई दुनिया में तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत पर बहस स्वाभाविक है। लेकिन उसका दायरा केवल तकनीक और मीडिया स्वामित्व तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे पत्रकार की बदलती स्थिति को भी देखना होगा।
जमालपुर सम्मेलन में रेल किराए में पत्रकारों को रियायत देने की बात उठी। यह सुनने में अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि जिन सुविधाओं की चर्चा मंच पर होती है, वे जमीन पर कितनी उपलब्ध हैं। कोविड के बाद पत्रकारों को मिलने वाली रेल रियायत के सवाल पर जो स्थिति बनी, उसे देखते हुए बहाली की मांग को उपलब्धि से अलग रखना जरूरी है।
पत्रकार के लिए यात्रा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं। वह उसके काम का हिस्सा है। बाढ़ग्रस्त गांव, खेत, अस्पताल, सड़क या किसी दूरदराज इलाके में खबर करने के लिए उसे वहां पहुंचना ही होता है। इसलिए यात्रा सुविधा का सवाल सीधे पत्रकारिता की पहुंच से जुड़ता है।
मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों में पत्रकारों की पहुंच की स्थिति भी इसी विडंबना को सामने लाती है। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की भूमिका कई जगह अब मुख्यतः पास निर्गत करने तक सीमित दिखाई देती है। पास मिलने के बाद भी पत्रकारों के लिए कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना हमेशा संभव नहीं होता। जबकि पहले जनसंपर्क विभाग पत्रकारों को कार्यक्रम स्थल तक ले जाने और वापस लाने की व्यवस्था करता था।
अब कई बार पत्रकार को पास तो मिल जाता है, लेकिन वहां तक पहुंचने की व्यवस्था उसे खुद करनी पड़ती है। दूरी, सुरक्षा व्यवस्था या अन्य प्रशासनिक कारणों से पास होने के बावजूद कवरेज संभव नहीं हो पाता। सवाल सीधा है—यदि पास है, लेकिन खबर तक पहुंच नहीं, तो उस पास का पत्रकारिता में वास्तविक अर्थ क्या है?
यहां मुद्दा सुविधा का नहीं, सूचना तक पहुंच का है। लोकतंत्र में सरकारी कार्यक्रम जनता के लिए सार्वजनिक महत्व रखते हैं। वहां पत्रकार की उपस्थिति केवल उसकी व्यक्तिगत सुविधा नहीं, जनता के सूचना के अधिकार से जुड़ी है। इसलिए किसी भी व्यवस्था को यह देखना होगा कि पत्रकार को अनुमति देने के साथ उसकी वास्तविक पहुंच भी सुनिश्चित हो।
वेतन बोर्ड का सवाल भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। भारतीय पत्रकारिता में वेतन बोर्ड ने पत्रकारों की सेवा-शर्तों और पारिश्रमिक को संस्थागत आधार देने में भूमिका निभाई। लेकिन आज रोजगार का स्वरूप बदल गया है। स्थायी नियुक्तियों के बजाय अनुबंध बढ़े हैं। छोटे शहरों के पत्रकार, डिजिटल पत्रकार और स्वतंत्र पत्रकार अलग-अलग तरह की असुरक्षा से गुजर रहे हैं।
इसलिए तीसरे प्रेस आयोग के सामने सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि पुराना वेतन बोर्ड वापस आए या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि आज के पत्रकार को सम्मानजनक और सुरक्षित पेशेवर जीवन देने का आधुनिक ढांचा क्या हो? न्यूनतम पारिश्रमिक, अनुबंध की पारदर्शिता, सामाजिक सुरक्षा, बीमा और नौकरी की सुरक्षा जैसे सवालों पर नए सिरे से विचार करना होगा।
सम्मेलन में प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ राणा गौरी शंकर ने पत्रकारों की सुविधाओं में विस्तार के बजाय कटौती की ओर ध्यान दिलाया। यह टिप्पणी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने लायक है। पत्रकार से निर्भीकता की अपेक्षा तभी सार्थक होगी जब उसके पेशे में न्यूनतम सुरक्षा भी हो। आर्थिक असुरक्षा और संपादकीय स्वतंत्रता का संबंध सीधा भले न हो, लेकिन पत्रकार के रोजमर्रा के काम की परिस्थितियों को उससे अलग भी नहीं किया जा सकता।
आज पत्रकारिता के सामने मीडिया स्वामित्व, विज्ञापन पर निर्भरता, कारोबारी हितों और संपादकीय निर्णयों के संबंध जैसे पुराने सवाल नए रूप में मौजूद हैं। इनके साथ डिजिटल मंचों की अस्थिर आय, अनुबंध आधारित रोजगार और स्वतंत्र पत्रकारिता की चुनौतियां जुड़ गई हैं।
तीसरा प्रेस आयोग यदि बनता है तो उसे यह भी तय करना होगा कि आज पत्रकार कौन है। स्वतंत्र पत्रकार और डिजिटल पत्रकार की पेशेवर पहचान क्या होगी? छोटे समाचार संस्थानों में काम करने वालों के लिए न्यूनतम सुरक्षा क्या होगी? पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा का ढांचा कैसा होगा? दूरदराज क्षेत्रों में काम करने वालों की सुरक्षा और सूचना तक उनकी पहुंच कैसे सुनिश्चित होगी? मीडिया स्वामित्व और संपादकीय स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा?
इन सवालों के साथ खबर की विश्वसनीयता का प्रश्न भी जुड़ा है। सामाजिक माध्यमों पर सूचना की गति जितनी बढ़ी है, सत्यापन की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में यह जिम्मेदारी और बढ़ेगी। ऐसे समय में प्रशिक्षित, स्वतंत्र और सुरक्षित पत्रकारिता की जरूरत कम नहीं, अधिक होगी।
इसलिए तीसरे प्रेस आयोग की बहस अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, भविष्य की तैयारी होनी चाहिए। लेकिन भविष्य की पत्रकारिता केवल नई तकनीक से नहीं बनेगी। उसे वे लोग बनाएंगे जो खबर की तलाश में घर से निकलते हैं, घटनास्थल तक पहुंचते हैं, दस्तावेज देखते हैं, सवाल पूछते हैं और फिर अपनी जिम्मेदारी के साथ खबर लिखते हैं।
यहीं जमालपुर सम्मेलन की बात सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। मंच पर पत्रकार को लोकतंत्र का प्रहरी कहना आसान है। उसकी कलम को व्यवस्था को जवाबदेह बनाने वाली शक्ति कहना भी आसान है। कठिन सवाल यह है कि क्या व्यवस्था उस पत्रकार को काम करने की परिस्थितियां भी दे रही है, जिसकी कलम से जवाबदेही की उम्मीद की जाती है? क़दम क़दम पर अवरोध है। क्या अवोध ठाकुर को वेज बोर्ड का लाभ मिल रहा है।?
तीसरे प्रेस आयोग पर बहस हो तो इस सवाल को केंद्र से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता को केवल सेंसरशिप या कानून के संदर्भ में देखने से तस्वीर अधूरी रह जाएगी। सूचना तक पहुंच, पेशेवर सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, संपादकीय स्वायत्तता और निर्भीक होकर काम करने की परिस्थितियां भी उसकी बुनियाद हैं।
पत्रकार को समारोह में सम्मान देना अच्छी बात है, लेकिन सम्मान का सबसे ठोस रूप उसके काम को स्वतंत्र और गरिमापूर्ण बनाने वाली व्यवस्था है। पास से आगे पहुंच, सुविधा से आगे सुरक्षा और घोषणा से आगे अधिकार—तीसरे प्रेस आयोग की बहस को इन तीन कसौटियों तक पहुंचना होगा।
जमालपुर में तीसरे प्रेस आयोग की आवाज उठी है। अब इस आवाज की सार्थकता इस बात से तय होगी कि वह केवल प्रेस संस्थानों की संरचना तक जाती है या उस पत्रकार तक भी पहुंचती है, जो रोज लोकतंत्र के लिए सूचना जुटाता है।
क्योंकि अंततः प्रेस की स्वतंत्रता कागज पर लिखे अधिकार से बड़ी चीज है। वह उस क्षण दिखाई देती है जब कोई पत्रकार सत्ता के सामने सवाल रखता है, किसी गांव की अनसुनी आवाज दर्ज करता है और किसी असुविधाजनक सच को इसलिए नहीं छोड़ता कि उसके सामने नौकरी, सुविधा या पहुंच का डर खड़ा है।
तीसरे प्रेस आयोग की असली परीक्षा शायद यही होगी—वह प्रेस को कितना मजबूत करता है, यह बाद की बात है; पहले यह देखना होगा कि वह पत्रकार को कितना स्वतंत्र होकर काम करने देता है।


