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चुनाव आयोग के प्रेस नोट ने इंडियन एक्सप्रेस की स्टोरी को गलत नहीं कहा, हर जगह हो रही रितिका चोपड़ा की सराहना!

Official Election Commission of India press note (No. ECI/PN/119/2026, dated 23.09.2026) outlining procedures and statements, with a signature area at the bottom.
Headline reads: '14 times in 10 months, two Election Commissioners objected on record to poll panel steps' with a secondary line about keeping them in the dark and unsigned moves, followed by a cropped image of three politicians from Indian Express Investigation at the bottom.

वरिष्ठ पत्रकार और टाइम्स नाउ नवभारत के सुमित अवस्थी ने बुधवार को इंडियन एक्सप्रेस की रितिका चोपड़ा की जांच रिपोर्ट पर चुनाव आयोग के आधिकारिक प्रेस नोट का जिक्र करते हुए लिखा कि आयोग कहानी को खारिज नहीं कर पाया।

अवस्थी ने रितिका चोपड़ा को बधाई देते हुए कहा कि चुनाव आयोग की आधिकारिक सफाई में कहीं यह नहीं लिखा गया कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट गलत है, या आयोग अखबार या पत्रकार के खिलाफ मुकदमा करेगा। उन्होंने लिखा कि प्रेस नोट उन 14 तारीखों को भी बेबुनियाद नहीं बताता, जिनका जिक्र रिपोर्ट में है। उलटा, नोट में यह माना गया है कि कई मुद्दों पर आयोग के सदस्यों के बीच सहमति नहीं होती थी।

अवस्थी के शब्दों में, “यही सही और सटीक खबर की ताकत है।”

Woman in a green sleeveless top leaning on a blue-trimmed balcony railing of a white building with arches and a red-tiled roof.
रितिका चोपड़ा

क्या है वह रिपोर्ट?

इंडियन एक्सप्रेस की रितिका चोपड़ा और दामिनी नाथ की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। ये आपत्तियां विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए वोटर जोड़ने, नाम काटने, फॉर्म-6 में बदलाव और वोटर सूची के सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट के केंद्रीकरण से जुड़ी थीं।

रिपोर्ट के मुताबिक:

• जनवरी 2026 में लॉन्च ईसीआईनेट के बाद जमीनी अधिकारियों (ईआरओ) की वोटर लिस्ट में बदलाव की कानूनी शक्ति सीमित हो गई। नियंत्रण दिल्ली के आईटी डिवीजन के पास चला गया।

• गोवा में 97 वोटर दस्तावेज देकर पात्र साबित हुए, ईआरओ सहमत भी हुए, लेकिन दिल्ली से नियंत्रित सॉफ्टवेयर ने फैसला दर्ज नहीं होने दिया। वे अंतिम सूची से बाहर रहे।

• फॉर्म-6 में माता-पिता/पुरानी SIR लिस्ट से जुड़ा सवाल बिना नियम संशोधन के जोड़ दिया गया। दोनों आयुक्तों ने इसे अनधिकृत और अवैध बताया।

• मई से अगस्त तक तीनों आयुक्तों की पूर्ण बैठक नहीं हुई। जुलाई में दोनों आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर आईटी नियंत्रण के फेरबदल पर आपत्ति जताई।

SIR के दौरान 30 राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूचियों से 13 करोड़ से ज्यादा नाम बाहर हुए। यही प्रक्रिया राजनीतिक विवाद का केंद्र बनी हुई है।

आयोग ने क्या कहा, क्या नहीं कहा

चुनाव आयोग ने 23 सितंबर को पी. पवन के हस्ताक्षर वाला प्रेस नोट जारी किया। इसमें कहा गया कि आयोग बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है, आंतरिक नोट्स-सुझाव-टिप्पणियां सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं, और पिछले एक साल के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। मतभेद “किसी भी संस्था में सामान्य” बताए गए। ईसीआईनेट पर सुरक्षा प्रोटोकॉल का हवाला दिया गया।

लेकिन नोट में ये बातें नहीं हैं:

• रिपोर्ट को गलत या झूठा नहीं कहा गया।

• 14 आपत्तियों की तारीखों या उनके अस्तित्व से इनकार नहीं किया गया।

• फॉर्म-6 में बदलाव, गोवा के 97 वोटर, बंगाल में अपीलें, या मई-अगस्त की बैठकों के अभाव पर सीधा जवाब नहीं दिया गया।

• पत्रकारों या अखबार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का कोई संकेत नहीं है।

यही अंतर अवस्थी ने रेखांकित किया। आयोग सफाई दे रहा है, लेकिन मूल तथ्यों को खारिज नहीं कर रहा।

विपक्ष ने रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधा है। कांग्रेस, तृणमूल और समाजवादी पार्टी ने आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। भाजपा ने आंतरिक पत्राचार को स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा बताया।

अवस्थी का पोस्ट उसी बहस को एक और मोड़ देता है: जब संस्था की आधिकारिक प्रतिक्रिया रिपोर्ट के मुख्य दावों को झूठा नहीं ठहराती, तो वह रिपोर्ट अपने आप मजबूत हो जाती है। हिंदी मीडिया में लंबे समय से काम कर चुके अवस्थी का यह नोट ठीक उसी जगह पड़ता है जहां पत्रकारिता और संस्थागत जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है।

‘केचुआ ‘ ने अपने प्रेस नोट में एक्सप्रेस के खुलासे का कोई जवाब नहीं दिया . दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर कोई जवाब नहीं दिया . फॉर्म 6 पर चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों पर कोई जवाब नहीं दिया . ECI Net पर चुनाव आयुक्तों की आपत्ति पर कोई जवाब नहीं दिया. कहें तो किसी पॉइंट का कोई जवाब नहीं दिया लेकिन बीजेपी के प्रवक्ता चैनलों पर चुनाव आयोग के प्रवक्ता की तरह कुछ भी बोले जा रहे हैं . ज्ञानेश कुमार से BJP की रिश्तेदारी का और क्या सबूत चाहिए.

-अजीत अंजुम (वरिष्ठ पत्रकार)

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