कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है, भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या का कार्यालय खोल रखा है। मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग और उन्हें हटाने के लिए 24 अप्रैल 2026 के नोटिस की याद दिलाई। इंडियन एक्सप्रेस को तो अपनी खबर का ‘फॉलोअप’ करना ही था लेकिन असली खबर टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्म की लीड है। मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का मामला अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ को भेजा जाएगा। इस बीच कितने चुनाव हो गए, कितनी मनमानियां हो गई। कितने लोग जनप्रतिनिधि बन गए, कितने नहीं बन पाए और करोड़ों लोग वोट नहीं दे पाए सो अलग…..। आप चुनाव हार जाएं, मुकदमा भी कर पाएं तो जरूरी नहीं है कि पांच साल के अंदर फैसला मिल जाए। लेकिन मेधा रुपम को स्टे मिल गया।
संजय कुमार सिंह
भारतीय मीडिया ने खबरों का फॉलोअप करना लगभग बंद कर रखा है। आज दि इंडियन एक्सप्रेस की कल की खबर का फॉलोअप तो खूब है लेकिन मूल खबर, कि ज्ञानेश कुमार ने जो किया सुप्रीम कोर्ट की सहमति से और उनका चयन भारत सरकार ने अपनी मर्जी से किया है, लगभग नहीं है। पहले पक्षपाती (या सरकार की पसंद के) चुनाव आयुक्त की नियुक्ति होने दी गई फिर उन्हें संवैधानिक दायित्व निभाने के नाम पर SIR जैसा गैर जरूरी काम करने दिया गया। करोड़ों फूंक कर भी देश हित में कुछ नहीं हुआ, देश भर में करोड़ों नागरिक मताधिकार से वंचित रह गए, पश्चिम बंगाल में सरकार बदल गई – सब कुछ खुल्लम खुल्ला हुआ, सुप्रीम कोर्ट में शिकायत भी हुई पर कार्रवाई नहीं हुई।
दि इंडियन एक्सप्रेस ने जब यह साबित कर दिया कि चुनाव आयोग ने जो किया वह असल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने किया है तो आज अखबारों में चुनाव आयोग का अधकचरा पक्ष है, लीपने-पोतने की कोशिश है, विपक्ष की मांग है पर यह नहीं है कि सीईसी को उनके किए का लाभ मिल रहा है। उनकी बेटी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई। हिन्दुस्तान टाइम्स (HT) और टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की लीड बताती है कि सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त/चुनाव आयुक्त (CEC/EC) की नियुक्ति से जुड़े कानून की वैधता के मामले को संविधान पीठ के पास भेजने या न भेजने पर बंटा हुआ फ़ैसला सुनाया। संयोग से यह फैसला उसी दिन आया जब चुनाव आयोग पर सवाल उठ रहे थे। बाद में, इस विवादित मामले पर जल्द फ़ैसला लेने के लिए कोर्ट इस केस को बड़ी बेंच के पास भेजने पर सहमत हो गया।
मुझे लगता है कि आज की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण खबर यही है। एक पाठक के रूप में मैं कल इसी मामले का इंतजार कर रहा था। हालांकि एक और मामले में सुप्रीम कोर्ट के कल के फैसले ने निराश किया है। आप जानते हैं कि मुख्य चुनाव की नियुक्ति से संबंधित नियम या कानून का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से लटका हुआ है और सरकार ने अपनी पसंद के चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कर ली है। कल जब इंडियन एक्सप्रेस की खबर से उनके कारनामे जो स्पष्टतः सरकार के पक्ष में मनमानी के हैं तो यह फैसला आया। इससे पहले भारत के सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता भरी अदालत में सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं, “कानून का निर्माण नक्सलियों के विचारों के हिसाब से नहीं हो सकता।” अब कानून से संबंधित एक महत्वपूर्ण मामला सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ के पास है।
जहां तक सुप्रीम कोर्ट की पीठ की सुनवाई की बात है, कल भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी मेधा रूपम जो नोएडा की जिलाधिकारी भी हैं, से संबंधित एक मामले में फैसला होना था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले/पैरा पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें डीएम की सैलरी से ₹5 लाख काटने का निर्देश था। सुनवाई के दौरान कोर्ट के निर्देश पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का ऑडियो म्यूट कर दिया गया था। इस मामले की लिस्टिंग को लेकर भी सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रोस्टर के अनुसार ‘हेबियस कॉर्पस’ और ‘निवारक हिरासत’ से जुड़े मामले वरिष्ठता वाली अन्य पीठों के पास लंबित थे, जहाँ इस आंदोलन से जुड़ी अन्य याचिकाएं पहले से विचाराधीन हैं।
दूसरी पीठ के पास जाना मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) द्वारा मास्टर ऑफ रोस्टर के अधिकार के तहत किया गया विशेष आवंटन माना जा रहा है। जाहिर है कि खबर के रूप में यह एक गंभीर मसला है और आज फॉलोअप (जो असल में लीपा-पोती है) की जगह इस मामले को प्राथमिकता दी जा सकती थी। जो भी हो, आज टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर में और भी कुछ खास बातें हैं जो उल्लेखनीय हैं। लीड के साथ छपी एक खबर का शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा, कानून ने एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) को बहुत ज़्यादा ताकत दी है, विपक्ष के नेता की भूमिका सिर्फ़ दिखावे की रह गई है। इस खबर के अनुसार, जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया की आज़ादी पर सवाल उठते हैं क्योंकि, “पिछले सात दशकों में, सत्ता में आने वाली हर सरकार को उन संस्थाओं को अपने कंट्रोल में रखना सुविधाजनक लगा, जिन्हें संविधान ने आज़ाद रखने की कल्पना की थी।
आर्टिकल 324(2) के तहत कानून बनाने का मतलब होता चुनाव आयोग को एग्जीक्यूटिव के कंट्रोल से पूरी तरह आज़ाद करना और सत्ताधारी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करना।” उन्होंने कहा कि अगर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हैं, तो यह ज़रूरी है कि चुनाव आयोग न सिर्फ़ एक आज़ाद संस्था हो, बल्कि आज़ाद होकर काम करता हुआ भी दिखे। एक और खबर है – सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की भूमिका कार्यपालिका के मुकाबले गौण। इस खबर के अनुसार, यह बताते हुए कि जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका की ही मुख्य भूमिका होती है, जस्टिस दत्ता ने कहा, “न्यायपालिका हमेशा ही दूसरे दर्जे पर नहीं रह सकती”। उन्होंने कहा कि जिस तरह से सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों को मंज़ूरी देती है, उसके कारण नियुक्तियों में न्यायपालिका की भूमिका गौण हो गई है।”
आप समझ सकते हैं कि देश, सरकार और सुप्रीम कोर्ट की क्या हालत है। ऐसे में जो खबरें छपती हैं और नहीं छपती हैं उसका मामला है ही। दिलचस्प यह है कि जो फॉलो अप लगभग छूट गया था वह आज है लेकिन जो टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड है वह दूसरे अखबारों में नहीं के बराबर है। ऐसे तो नहीं ही है जैसे TOI और HT में है। हालांकि, कुछ खबरें और कुछ ऐसी जो टाइम्स ऑफ इंडिया में नहीं हैं वे भी अलग-अलग अखबारों में है। उस पर आता हूं। हालांकि आज इंडियन एक्सप्रेस की कल की खबर पर चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण भी है। मैं उससे बिल्कुल सहमत नहीं हूं और यहां उसकी चर्चा नहीं कर रहा हूं।
मुझे लगता है कि चुनाव आयोग के इस स्पष्टीकरण का कोई मतलब नहीं है कि असहमति सामान्य बात है, हमारे बीच दरार नहीं है (दैनिक भास्कर)। अगर ऐसा ही है तो कल तीनों चुनाव आयुक्तों को प्रेस कांफ्रेंस कर बताना चाहिए था कि आपत्तियों का क्या हुआ, उन्हें माना गया या नहीं और नहीं माना गया तो क्यों? इंडियन एक्सप्रेस ने 14 उदाहरण दिए हैं और अगर आपत्तियों को नहीं माना गया या जबरन मनवा लिया गया तो खबर यही है। दबाव डालकर काम कराना यही होता है और यह बिल्कुल अलग मुद्दा है। आज इंडियन एक्सप्रेस में भी इस पर खबर है। लीड का शीर्षक है – “चुनाव आयुक्त को जाना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई करनी चाहिए : ईसी के मतभेद सार्वजनिक होने पर विपक्ष ने एक सुर में कहा”। अखबार ने बताया है कि अदालत की देखरेख में जांच कराने, एसआईआर रोकने की मांग है। सीजेपी ने आंदोलन की घोषणा की है; विपक्ष ने सीईसी को आयोग से अलग माना।
मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन करने वाले पैनल में मंत्री का होना, गलत संकेत देता है। आज द हिन्दू ने अकेले इस खबर को पहले पन्ने पर लीड के बराबर में छापा है। द हिन्दू की इस खबर का शीर्षक है, मुख्य चुनाव आयुक्त का निर्णय लेने वाले पैनल में मंत्री का होना गलत संकेत देता है। अखबार ने राहुल गांधी की चेतावनी को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है। लीड का शीर्षक है, ‘अवैध आचरण’ के कारण विपक्ष ने CEC को हटाने की मांग की। उपशीर्षक है, साथी चुनाव आयुक्तों की कई आपत्तियों के खुलासे के बाद ज्ञानेश कुमार सवालों के घेरे में; कांग्रेस ने SC की निगरानी में जांच की मांग की; ममता ने कहा कि INDIA गठबंधन जल्द ही इस मुद्दे पर चर्चा के लिए बैठक करेगा। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, एसआईआर के मतभेद सामने आने पर मुख्य चुनाव आयु्क्त का भारी विरोध, विपक्ष चाहता है उन्हें हटाया जाए। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, ज्ञानेश के खिलाफ महाभियोग की मांग बढ़ी।
मल्लिकार्जुन खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग और उन्हें हटाने से जुड़े मुद्दे पर कहा कि 24 अप्रैल 2026 को विपक्ष के 73 राज्यसभा सांसदों ने (महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने) के लिए राज्यसभा महासचिव को एक नया ‘नोटीस ऑफ मोशन’ सौंपा था। उन्होंने सवाल उठाया कि चूंकि संसद का मानसून सत्र अभी अनिश्चित काल के लिए स्थगित नहीं हुआ है, इसलिए क्या राज्यसभा सभापति इस लंबित नोटिस पर निर्णय लेंगे?
अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, फैसलों पर चुनाव आयुक्तों में दरार, आयोग ने कहा – यह सामान्य; विपक्ष बोला ज्ञानेश को हटाएं। दैनिक भास्कर की लीड का शीर्षक, इंडियन एक्सप्रेस की खबर का मुख्य हिस्सा है। SIR; आयोग पर आरोप, निर्वाचन आयुक्तों ने 10 माह में 14 आपत्तियां कीं, पर सुनी नहीं गईं। नवोदय टाइम्स ने SIR पर सियासी संग्राम से ही मामले को निपटा दिया है। ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग और चुनाव आयोग का यह दावा कि फैसले कानूनी रूप से वैध उपशीर्षक है या समझिए कि दो संबंधित खबरों का शीर्षक है। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, विपक्ष ने मांगा ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा। उपशीर्षक है, सिंघवी ने कहा – भाजपा ने लोकतंत्र की हत्या का कार्यालय खोल रखा है। हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड वाली खबर द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर चार कॉलम में है। चुनाव आयोग के पूर्व प्रमुखों, एसवाई कुरैशी और अशोक लवासा ने इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे के आलोक में मांग की है कि चुनाव आयुक्तों के बीच जो हुआ उसका स्पष्टीकरण दें। यह खबर द टेलीग्राफ में है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।




