
देवप्रिय अवस्थी-
एक और इस्तीफा
2008 शुरू ही हुआ था कि मेरे प्रति श्रवण जी व्यवहार में रूखापन अचानक बढ़ गया. एक दिन हद हो गई जब उन्होंने मेरे साथ काम कर रहे दो कार्यकारी संपादकों के नाम लेकर कहा कि अमुक-अमुक सहयोगी अमुक-अमुक संस्करण में असफल साबित हुए हैं. इन्हें आपके साथ इसलिए संबद्ध किया गया है कि आपको असफल साबित करना है. इसी दौरान आईआईएम, इंदौर में समूह के संपादकीय साथियों का एक रि-ओरियंटेशन कार्यक्रम शुरू किया गया. 10 दिन के इस कार्यक्रम में श्रवण जी ने मुझे छोड़कर केंद्रीय डेस्क के सभी सीनियर साथियों को भेजा. यह संकेत था कि अब भास्कर में मेरे दिन पूरे हो गए हैं. मुझे यहां से मुक्त हो जाना चाहिए.
इसके बाद की एक और घटना “ऊंट की पीठ पर आखिरी तिनका” साबित हुई. श्रवण जी ने भास्कर में प्रकाशनार्थ आए एक ख्यात शिक्षाविद का लेख इस आशय की टिप्पणी के साथ वापस भेजने का निर्देश दिया कि चूंकि आपके लेख अमुक प्रतिस्पर्धी अखबार में भी छपते हैं, इसलिए हम भास्कर में आपका लेख छापने में असमर्थ हैं.
मैंने श्रवण जी का निर्देश सुन तो लिया, लेकिन उस पर अमल नहीं किया. इसकी वजह मेरा इस नीति से असहमत होना था. मेरा मानना था कि किसी लेखक को इस आधार पर नहीं छापना कि वह प्रतिस्पर्धी अखबार में भी छपता है, सही नहीं है.
दो दिन बाद श्रवण जी ने अपने कक्ष में बुलाकर लेख वापस भेजने के बारे में पूछा तो मैंने कहा, अभी नहीं भेजा है. उन्होंने इसे घोर अनुशासनहीनता करार दिया और भड़ककर अनाप-शनाप बोलने लगे. मैंने उनके इस तरह भड़कने का प्रतिवाद किया. और अपनी टेबल पर लौट आया. वहां बैठकर अपने डेस्कटाप पर इस्तीफा लिखा और श्रवण जी को मेल कर दिया. मेरी सेवा शर्तों में दो माह के नोटिस का प्रावधान था. तदनुसार मैंने इस्तीफे में 31 मार्च 2008 को सेवामुक्त करने का आग्रह किया. चूंकि मेरी बहुत-सी छुट्टियां बाकी थीं, इसलिए इस्तीफा देने के बाद दफ्तर जाना बंद कर दिया.
नए काम की तलाश
54 बरस की उम्र में नया काम तलाशना आसान नहीं था. फिर भी, कोशिश तो करनी थी. याद आया कि पूर्व में अमर उजाला से दो बार प्रस्ताव मिले थे वहां क्यों न बात की जाए. एक धुंधली-सी संभावना जागरण में भी थी. नरेंद्रमोहन गुप्त ने बहुत पहले मुझे एक पत्र में लिखा था “जागरण को आपकी सेवाओं की जरूरत हमेशा थी, हमेशा रहेगी, लेकिन आपको अभी जो वेतन मिल रहा है, वह दे पाना हमारे सामर्थ्य में नहीं है.” नरेंद्रमोहन जी निधन के बाद जागरण का कामकाज संभाल रहे उनके पुत्र संजय गुप्त से मेरा कोई परिचय नहीं था, फिर भी, उनके सचिव को बायो-डाटा भेजकर उनसे मिलने का समय मांगा.
अमर उजाला के समूह संपादक शशिशेखर को भी बायो-डाटा भेजा. फरवरी 2008 के अंतिम सप्ताह में अमर उजाला और जागरण दोनों से ही एक दिन के अंतराल से इंटरव्यू का बुलावा आ गया. जागरण में संजय गुप्त से और अमर उजाला में शशिशेखर से मिलना था. संजय से मिलने पर उनकी प्रतिक्रिया उत्साहप्रद नहीं लगी. शशिशेखर का रुख सकारात्मक था. कुछ दिन पहले केंद्रीय डेस्क, भोपाल से अमर उजाला आए साथी अरुण आदित्य ने उन्हें मेरे बारे में ब्रीफ किया था जिससे वे प्रभावित थे.
मार्च 2008 के तीसरे हफ्ते में शशि जी ने फोन पर सूचित किया कि प्रबंधन ने आपकी नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. आप 1 अप्रैल से काम शुरू कर सकते हैं. आप यहीं से रिटायर भी होइएगा.
अमर उजाला में नियुक्ति से कुछ पहले भोपाल में एक कामचलाऊ व्यवस्था वैकल्पिक हो गई थी. यह व्यवस्था भास्कर के संपादक रहे अग्रज महेश श्रीवास्तव ने पीपुल्स ग्रुप के पत्रकारिता शिक्षण संस्थान में की थी. वहां वे निदेशक थे. वेतन-सुविधाएं तो पर्याप्त नहीं थी, लेकिन खाली बैठने से बेहतर किसी काम में इंगेज रहना था इसलिए मैंने हामी भर दी थी. वहां जाने की नौबत नहीं आई.
मार्च 2008 के आखिरी हफ्ते में मैंने ऩोएडा पहुंचकर अमर उजाला के दफ्तर जाना शुरू कर दिया. कार्यकारी संपादक के रूप में यह मेरी पत्रकारिता यात्रा का अंतिम पड़ाव था. यहां की यादें जल्द साझा करूंगा.
पिछला भाग…
मेरी पत्रकारिता यात्रा (17): मनमोहन सिंह के साथ विदेश यात्रा में मिली महंगी शराब की बोतल मैंने श्रवण गर्ग को दे दी, लेकिन उन्होंने…


