प्रवीण दुबे-
प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण ने गुरु कृपा कुंज आश्रम के चार मंजिला इमारत से कथित तौर पर छलांग लगा दी.. सीसीटीवी में वो गिरता हुआ बेशक दिख रहा है.. गिरा या गिराया गया ये जांच के बाद पता चलेगा.. इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई..
दीपक का प्राइवेट पार्ट कटा हुआ था… पास ही खून से सना हुआ ग्राइंडर भी मिला है..आशंका है इसी से उसे काटा गया होगा.. इस घटना ने बहुतेरे सवाल पैदा किए हैं.. प्रेमानंद जी महाराज बहुत बड़े संत हैं और उनके बहुत ऊँचे आदर्श हैं, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन उनके आस-पास की जो भीड़ है क्या वो वैसी ही शुद्ध या पवित्र है.. दूसरा जैसे किसी के प्रति आकर्षण को कुछ युवा प्रेम समझ लेते हैं और कुछ दिन बाद समझ आता है कि ये सिर्फ दैहिक था.. प्रेम का कोई तत्व ही इसमें नहीं था… ऐसे ही किसी विचारधारा से प्रभावित होकर युवाओं का सन्यास के प्रति मुड़ना कोई संसार से असल विरक्ति का मापदंड हो ही नहीं सकता…और ये सहज मानवीय गुण है…..
कई धर्मों के युवा साधु और सन्यासिन बनी लड़कियों के बहक जाने की ख़बरें आती हैं…और इसमें असमान्य कुछ भी नहीं है.. माया, मोह, लोभ, काम इसे जीतना बहुत ही असाध्य है…कुछ विरले ही इसमें सफल हो पाते हैं…जितने भी मशहूर कथावाचक हैं और जिनके पास अपार धन बरस रहा है… वो भी सिर्फ सनातन के प्रचार की ही बात करते हैं, सन्यास की बात नहीं करते… ..सभी या तो गृहस्थ हैं या गृहस्थी बसाने की बात करते हैं.. किसी ने भी ये दावा नहीं किया कि वे सन्यासी या ब्रम्हचारी हैं..
ओशो के दर्शन की भले ही कुछ लोग आलोचना करें लेकिन उनकी ये लाइन बिलकुल अकाट्य सत्य है कि संन्यास का अर्थ पलायन नहीं है और मुक्ति के लिए माया का त्याग अनिवार्य नहीं है.. आप माया के बीच रहकर अनासक्त कैसे रहें ये सीखना ज़रूरी है…
खैर..युवा अपनी इच्छा को दबाकर इन्द्रियों को बलात जकड़ने का प्रयास करेंगे, तो वो दबाई जा रही स्प्रिंग की तरह रफ़्तार से पलट कर आएगी ही.. दूसरा, आश्रमों में उत्तराधिकार या सबसे प्रिय शिष्य बनने की प्रतिस्पर्धा भी पौराणिक काल से चलती आ रही है.. और इस क्रम में भी दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाने या उसके साथ षड्यंत्र होना भी बहुत सामान्य बात है… बहरहाल…इस मामले में असली तस्वीर क्या निकल आती है, इसका ज़रूर इंतज़ार रहेगा..



