कुमार पंकज–
“सम्भोग के वक्त मैं तुम्हारे नीचे नहीं रहूँगी क्योंकि परमेश्वर ने हम दोनों को बराबर बनाया है।” यहूदी लोककथाओं में एक दुर्लभ किताब है ”बेन सिरा की वर्णमाला” जिसमें दुनिया की सबसे पहली स्त्री ”लिलिथ” अपने पति ‘आदम’ से समानता के अधिकार पर झगडती है।
लगभग बारह सौ साल पुरानी ये किताब बताती है कि हव्वा, आदम की दूसरी पत्नी थी। सहवास की प्राकृतिक मुद्रा को ‘स्त्री अधिकारों का दमन’ बताकर लिलिथ ने आदम को त्याग दिया। उसे समझाने के लिए तीन देवदूत धरती पर भेजे गए लेकिन लिलिथ ने समझने से इंकार कर दिया। परिणास्वरूप ईश्वर ने दण्ड दिया कि ”तुम्हारे सौ बच्चे प्रतिदिन मरेंगे और तुम नवजात शिशुओं को मारने वाली दुष्ट आत्मा में बदल जाओगी।”
कहानी छोटी है मगर गहरा अर्थ और रूपक अपने भीतर सहेजे हुए है। यानि लिलिथ ने ऐसा किया तो वो अपनी ही संतानों के विनाश का कारण बनेगी। यदि लिलिथ के तर्क से देखें तो वो सभी चिड़िया, हाथी, शेर, बन्दर, अनेक स्तनपायी और नभचर, थलचर प्रजातियाँ….. जिनमें नर सहवास के वक्त ऊपर है, वो स्त्री अधिकारों का दमन कर रहा है।
कुछ दिन पहले एक वीडिओ वायरल हुआ था। अमेरिका, कैलीफोर्निया की एरोहेड झील में मेटिंग कर रहे बत्तखों के एक जोड़े को एक ‘फेमिनिस्ट स्त्री’ ने देखा और नर बत्तख पर चिल्लाई ”दूर हटो उस से, दूर हटो!’ उसने वहाँ मौजूद लोगों को भी दुत्कारा कि उनके सामने एक बलात्कारी नर, मादा बत्तख को परेशान कर रहा है और उन्हें शर्म तक नहीं आ रही।
सदियाँ गुजरीं और यहाँ से चलते हुए ये यात्रा “एक कचौरी, दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा” तक आ गई। इतिहास उन घटनाओं से पटा पड़ा है, जब युद्धों, प्राकृतिक आपदाओं और संकट के समय….पुरुषों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए लेकिन अपनी स्त्रियों की प्राणरक्षा की। मनुष्य तो छोडो, भारत तो वो भूमि है जहाँ संकटग्रस्त स्त्री की रक्षा के लिए पक्षीराज जटायु तक प्राणोत्सर्ग कर देते हैं। इस भूमि ने सदियों तक हजारों युद्ध झेले हैं जिनमें प्राणरक्षा का प्रथम अवसर और अधिकार, सदैव स्त्रियों और बच्चों का रहा है।
पूरी दुनिया उन उदाहरणों से भरी पड़ी है जब स्त्रियों की प्राणरक्षा के लिए पुरुषों ने स्वयं एक धीमी और निश्चित मृत्यु चुन ली। लगभग दो सदी होने को हैं। दक्षिण अफ्रीका के तट पर ‘एच.एम.एस. बिर्कनहेड’ जहाज चट्टान से टकराकर डूबने लगा। जहाज पर मौजूद पुरुषों ने डेक पर मौजूद छब्बीस स्त्रियों को लाइफ बोट में बैठाकर समुद्र में उतार दिया। कप्तान ने सैनिकों को तैरकर जान बचाने के लिए कहा लेकिन आर्मी अफसर ने ”वहीँ खड़े रहो” का आदेश दिया क्योंकि वो जानता था इतने सैनिक एक साथ पानी में कूदे तो लाइफ बोट पलट जाएगी और स्त्रियाँ डूब जाएँगी। नतीजा 612 अनुशासित पुरुषों ने वहीँ खड़े होकर एक धीमी मौत का इंतज़ार किया। परिणाम छब्बीस की छब्बीस स्त्रियाँ सुरक्षित बच गईं……445 पुरुष डूबकर मर गए।
टायटेनिक का उदाहरण तो अभी बस एक सदी पुराना है। डूबते जहाज से स्त्रियों और बच्चों को लाइफबोट में बैठाकर समंदर में उतार दिया गया अधिकांश पुरुषों ने डूबते जहाज पर रहना चुना। टायटेनिक के बचाव आंकड़े बेहद उदास लेकिन गर्व करने वाले हैं।
कुल 1662 पुरुषों में 1347 डूब गए केवल 315 बच सके
लेकिन 439 महिलाओं में 336 बचा ली गईं।
ये केवल दो उदाहरण हैं लेकिन ऐसे हजारों-लाखों मौजूद हैं। आपसी भरोसा ही स्त्री-पुरुष के रिश्ते की कीली है। सन 1870 में मथुरा के पंडित रंगीलाल शर्मा की एक किताब ”किस्सा तोता-मैना” आई जो बाद में श्यामकाशी प्रेस से प्रकशित हुई। फिर इसका सस्ता वर्जन सब छापने लगे। हमारे गाँव में लगने वाले वार्षिक मेले में ये 35 साल पहले पचास पैसे में मिल जाती थी। तूफानी रात में एक नर तोता उड़कर एक ऐसे पेड़ पर शरण लेता है जहाँ मैना पहले से बैठी है। मैना उसे पुरुषों की बेवफ़ाई के किस्से सुनाती है और तोता, स्त्रियों के धोखे की कथाएँ कहता है। ये कहानियाँ निरन्तर चलती हैं लेकिन निष्कर्ष अन्त तक कुछ नहीं निकलता।
हालाँकि इस कहानी का मूल लगभग दो हजार साल पुरानी ‘शुकसप्तति’ है। छह सौ साल पहले ये फारसी में ”तूतीनामा” शीर्षक से आई और फिर डेढ़ सौ साल पहले ‘किस्सा तोता-मैना” अर्थात हजारों साल से स्त्रियाँ, पुरुषों पर भरोसा न करने का आरोप लगा रही हैं और पुरुष, स्त्रियों पर। तो इस आरोप-प्रत्यारोप का कोई समापन-दिवस नहीं लेकिन सत्य ये है आपसी विश्वास और भरोसा ही परिवार और समाज की अखंडता का बन्धपत्र है…..इसे बनाये रखिये। जहाँ तक बेवफाई का प्रश्न है, इसमें न स्त्री किसी से कम है न पुरुष….
इसलिए …..बेबी!
थोड़ी इडली, थोडा डोसा।
इक-दूजे पर करो भरोसा।

