कुरुक्षेत्र पुलिस की कहानी लिखने की कला को सलाम! अगर एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम की यही पटकथा है, तो फिल्मी दुनिया में भी जगह मिल सकती है। लेकिन भले मानुषों, कहानी लिखने से पहले तारीखों का हिसाब तो ठीक कर लेते!
पत्रकार अतुल अग्रवाल से जुड़े इस मामले की एफआईआर की उपलब्ध कॉपी में दर्ज विवरण कई सवाल खड़े करता है। शिकायतकर्ता नवीन सैनी की शिकायत का हवाला देते हुए दर्ज विवरण में तारीखों का ऐसा उल्लेख है, जिस पर गौर करना जरूरी है।
दस्तावेज के मुताबिक, शिकायतकर्ता नवीन सैनी ने बताया कि वह कुरुक्षेत्र के सेक्टर-7 में अपने चाचा सुभाष के साथ कार सेल-परचेज का काम करता है। शिकायत में गौरव रत्ताल नाम के व्यक्ति का भी जिक्र है। आरोप है कि गौरव ने उसे बताया कि वह पिछले काफी समय से कापड़ी समय से मुंद्रे वाले रैप का काम करता है और इसके बदले पैसे भी मिलेंगे। शिकायतकर्ता ने दोस्तों के साथ नशेड़ी होने का नाटक दिखाने के लिए अप्रैल-मई में वीडियो बनाने की बात कही है।
अब तारीखों का खेल देखिए!
एफआईआर की कॉपी में शिकायतकर्ता के हवाले से कहा गया है कि उसने 4 अक्टूबर 2026 को दोपहर के समय 16 अप्रैल 2026 और 16 मई 2026 को बनाई गई वीडियो अपने व्हाट्सऐप नंबर से गौरव के मोबाइल नंबर पर भेजी थीं। शिकायत में आगे बताया गया है कि कुछ दिनों बाद गौरव ने ये वीडियो अपने दोस्तों को दिखाईं।

यहां सवाल उठता है कि अप्रैल और मई में बनाई गई वीडियो अक्टूबर में भेजे जाने का दावा अपने आप में गलत तो नहीं है, लेकिन इस घटनाक्रम की पुष्टि और दूसरे विवरणों की जांच जरूरी है। आखिर वीडियो किस उद्देश्य से बनाई गई थीं? उन्हें किसे भेजा गया? और शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए पुलिस के पास क्या साक्ष्य हैं?
सिर्फ एफआईआर में किसी बात का दर्ज होना उसे अपने आप सच साबित नहीं कर देता। शिकायतकर्ता के आरोपों, डिजिटल साक्ष्यों और पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच के बाद ही तस्वीर साफ हो सकती है।
सवाल कुरुक्षेत्र पुलिस से भी है। क्या शिकायत में दर्ज घटनाक्रम और तारीखों की जांच की गई है? क्या वीडियो और व्हाट्सऐप संदेशों की तकनीकी पुष्टि हुई है? और क्या एफआईआर में दर्ज कहानी के सभी हिस्सों का स्वतंत्र सत्यापन किया गया है?
फिलहाल उपलब्ध कॉपी के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि दस्तावेज में दर्ज विवरणों की बारीकी से जांच होनी चाहिए।



