नई दिल्ली। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर पुलिस की कार्रवाई के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। 10 अक्टूबर को डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘द क्विंट’ के कई पत्रकारों और वीडियो पत्रकारों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया, उनसे पूछताछ की और घंटों तक रोके रखा। पत्रकारों का आरोप है कि उनके वैध प्रेस पहचान पत्र दिखाने के बावजूद पुलिस ने उनकी पहचान और मीडिया संस्थान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
द क्विंट की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों से यहां तक कहा, ‘ये क्विंट क्या है? हमने तो कभी नहीं सुना। आप अंदर नहीं जा सकते।’ कुछ पत्रकारों को यह कहकर भी रोका गया कि उनके पास प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) का कार्ड नहीं है।
यह कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब दिल्ली पुलिस पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि पत्रकार अपने संस्थान की ओर से जारी वैध पहचान पत्र के साथ भी रिपोर्टिंग कर सकते हैं। इसके बावजूद पत्रकारों को रोकने और हिरासत में लेने की घटनाओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।
पांच घंटे तक रोके रखने का आरोप
द क्विंट के रिपोर्टर सार्थक को दिल्ली के सम्राट चौक के बाहर हिरासत में लिया गया। उनके साथ एक अन्य मीडिया संस्थान ‘क्वीयरबीट’ के पत्रकार को भी चाणक्यपुरी पुलिस स्टेशन ले जाया गया।
सार्थक के मुताबिक, वे उस निर्धारित क्षेत्र में दाखिल नहीं हुए थे, जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू किए गए थे। उनका दावा है कि उन्होंने बैरिकेड भी पार नहीं किया था।
सार्थक ने बताया कि पुलिस ने उनके प्रेस पहचान पत्र की जांच की और कहा कि यह पीआईबी कार्ड नहीं है। पुलिसकर्मियों ने यह भी कहा कि वे उनके संस्थान को नहीं जानते और पहचान का सत्यापन करना जरूरी है, क्योंकि आजकल लोग फर्जी पहचान पत्र लेकर घूमते हैं।
सार्थक के अनुसार, सत्यापन के नाम पर उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाया गया और करीब पांच घंटे तक इंतजार कराया गया। इस दौरान उन्हें यह स्पष्ट नहीं बताया गया कि वे हिरासत में हैं या केवल सत्यापन के लिए रोके गए हैं। उनसे यह सवाल भी किया गया कि वे प्रदर्शन की कवरेज क्यों करना चाहते हैं, जबकि वहां कोई प्रदर्शन नहीं हो रहा है।
वीडियो पत्रकार को भी हिरासत में लेने की कोशिश
द क्विंट के वरिष्ठ वीडियो पत्रकार शिव कुमार मौर्य ने बताया कि कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल में कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं के एक समूह को रिकॉर्ड करते समय पुलिसकर्मियों ने उन्हें भी हिरासत में लेने की कोशिश की।
मौर्य के मुताबिक, दो पुलिसकर्मी उनके पीछे आए और उनमें से एक ने दूसरे से कहा, ‘इसको भी डाल।’ जब उन्होंने बताया कि वे प्रेस से हैं, तो पुलिसकर्मियों ने जवाब दिया कि वहां हजारों पत्रकार मौजूद हैं।
मौर्य का आरोप है कि उस समय पुलिस कई पत्रकारों को खींचकर ले जा रही थी और हिरासत में ले रही थी। ऐसे में घटनास्थल पर मौजूद पत्रकारों के लिए अपनी पहचान बताने के बावजूद रिपोर्टिंग जारी रखना मुश्किल हो गया था।
ईश्वर, उजैर और अनय को भी रोका गया
द क्विंट के वरिष्ठ एसोसिएट एडिटर ईश्वर और रिपोर्टर उजैर तथा अनय को भी कनॉट प्लेस पहुंचने की कोशिश के दौरान पुलिस ने रोक लिया। रिपोर्ट के अनुसार, तीनों को दिल्ली हाट-आईएनए से पैदल घटनास्थल की ओर जाना पड़ा।
उनका आरोप है कि एक पुलिसकर्मी मोटरसाइकिल से उनका पीछा करता रहा और बाद में उन्हें दूसरे पुलिस अधिकारियों के पास ले गया। वहां उन्हें हिरासत में लेने की कोशिश की गई। पत्रकारों के मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने उनसे कहा, ‘इस बस में बैठ जाइए, हम आपको छोड़ देंगे।’
एक पुलिस अधिकारी ने प्रेस पहचान पत्र पर सवाल उठाते हुए कथित तौर पर कहा, ‘यह पीआईबी कार्ड नहीं है। मैं खान मार्केट में 100 रुपये में ऐसा कार्ड बनवा सकता हूं।’
दिल्ली पुलिस के अपने निर्देशों पर सवाल
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल दिल्ली पुलिस के अपने ही निर्देशों को लेकर है। द क्विंट की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने 5 अक्टूबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा था कि मीडियाकर्मी पीआईबी कार्ड या अपने मीडिया संस्थान की ओर से जारी वैध पहचान पत्र के साथ रिपोर्टिंग कर सकते हैं।
द क्विंट के पत्रकारों का कहना है कि उनके पास उनके संस्थान की ओर से जारी पहचान पत्र मौजूद थे। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने उनके कार्ड को मान्यता देने पर सवाल उठाए और उन्हें रिपोर्टिंग से रोका।
द क्विंट से बातचीत में दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त दिनेश कुमार गुप्ता ने भी स्पष्ट किया था कि पत्रकारों के लिए पीआईबी कार्ड अनिवार्य नहीं है। उन्होंने कहा था, ‘हम किसी को नहीं रोक रहे हैं।’
ऐसे में सवाल उठता है कि जब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी संस्थान की ओर से जारी वैध पहचान पत्र को स्वीकार करने की बात कह चुके थे, तो मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों ने पत्रकारों से पीआईबी कार्ड की मांग क्यों की? क्या पुलिसकर्मियों को अपने ही विभाग के निर्देशों की जानकारी नहीं थी, या फिर मौके पर उन्हें अलग निर्देश दिए गए थे?
कई मीडिया संस्थानों के पत्रकार हिरासत में
पत्रकारों के साथ हुई ये घटनाएं कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के उस प्रदर्शन के दौरान सामने आईं, जिसमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही थी।
द क्विंट के अलावा स्क्रॉल, न्यूज़लॉन्ड्री, नवभारत टाइम्स और अन्य मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को भी पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने या रोके जाने की खबरें सामने आईं। कुछ मामलों में पत्रकारों का कहना था कि उन्होंने अपने प्रेस पहचान पत्र दिखाए और अपनी पहचान स्पष्ट की, फिर भी पुलिस ने उन्हें जाने नहीं दिया।
रिपोर्टिंग रोकने का अधिकार किस आधार पर?
किसी भी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश रोकने या नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई करने का अधिकार भी कानून के दायरे में है। लेकिन पत्रकारों को उनके वैध पहचान पत्र के बावजूद रोकना, उन्हें घंटों तक बैठाए रखना या बिना स्पष्ट कारण के हिरासत में लेना गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस मामले में दिल्ली पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि द क्विंट के पत्रकारों को किस कानूनी आधार पर रोका गया, पहचान सत्यापन की प्रक्रिया में करीब पांच घंटे क्यों लगे और क्या संबंधित पुलिसकर्मियों को अपने विभाग के मीडिया संबंधी निर्देशों की जानकारी थी।
सवाल सिर्फ द क्विंट के पत्रकारों का नहीं है। सवाल यह है कि जब पत्रकार अपना पहचान पत्र दिखाकर रिपोर्टिंग करने पहुंचते हैं, तो क्या उन्हें अपनी पहचान साबित करने में ही घंटों बिताने पड़ेंगे? अगर पुलिस के घोषित नियम और मौके पर उसका व्यवहार अलग-अलग हैं, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?



