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दिल्ली

पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा का ये दूसरा “श्राप” अब किसे तबाह करेगा? देखें वीडियो

लोकतंत्र की लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन क्या सवाल पूछने वाले पत्रकारों को अपमानित करना पुलिस का नया तरीका बनता जा रहा है? दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा के साथ कथित दुर्व्यवहार का मामला अब तीखे आरोपों और व्यंग्य तक पहुंच गया है। प्रज्ञा ने सोशल मीडिया पर एक पुलिसकर्मी को निशाने पर लेते हुए उसे ‘खाकी वर्दी वाला दुर्योधन’ कहा और श्राप तक दे डाला।

प्रज्ञा मिश्रा ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी के इशारे पर उन्हें टांगों से पकड़कर अपमानजनक तरीके से बस में डाला गया। उनका कहना है कि पुलिसकर्मी यह जानते हुए भी इस कार्रवाई में शामिल था कि वह पत्रकार हैं, उनके हाथ में माइक है और गले में प्रेस कार्ड है। प्रज्ञा ने संबंधित पुलिसकर्मी की तस्वीर साझा करते हुए दावा किया कि उन्हें इस तरह बस में डालने का सुझाव उसी ने दिया था।

Group of police officers in khaki uniforms in a crowded street, appearing to restrain or confront people during a tense moment in a video frame from a news clip.

अपने पोस्ट में प्रज्ञा ने लिखा, “ब्राह्मण घर की बेटी हूं… लोकतंत्र की लड़ाई अपनी जगह है… श्राप देती हूं।” उन्होंने आगे लिखा कि असहाय व्यक्ति की हाय लोहे को भी भस्म कर देती है। अपने आरोपों को व्यंग्यात्मक और आक्रामक अंदाज में रखते हुए उन्होंने पुलिसकर्मी की तुलना महाभारत के दुर्योधन से की और कहा कि इस कथित दुर्व्यवहार का हिसाब ऊपर वाला जरूर करेगा।

प्रज्ञा ने अपने पोस्ट में वर्ष 2022 में दिए गए एक पुराने श्राप का भी जिक्र किया। उनके बयान का लहजा बताता है कि वह कथित कार्रवाई से कितनी नाराज हैं। हालांकि, उनके आरोपों पर संबंधित पुलिसकर्मी या दिल्ली पुलिस का पक्ष सामने आना बाकी है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है।

प्रेस कार्ड गले में था, माइक हाथ में था, फिर भी कथित अपमान!

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कोई पत्रकार रिपोर्टिंग के दौरान हिरासत में लिया जाता है, तो क्या उसके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है? कानून लागू करने वाली खाकी वर्दी को अपनी ताकत दिखाने के लिए किसी को अपमानित करने की जरूरत क्यों पड़े? और यदि प्रज्ञा मिश्रा के आरोप सही हैं, तो क्या दिल्ली पुलिस इस कथित व्यवहार की जांच कर संबंधित पुलिसकर्मी की जवाबदेही तय करेगी?

लोकतंत्र में पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार किसी को अपमानित करने का लाइसेंस नहीं है। वर्दी की असली ताकत उसके अनुशासन और कानून के पालन में होती है, न कि किसी नागरिक को उसकी टांगों से पकड़कर बस में डालने जैसे कथित व्यवहार में।

फिलहाल प्रज्ञा मिश्रा का गुस्सा सोशल मीडिया पर उनके तीखे शब्दों के रूप में सामने आया है। अब देखना यह है कि दिल्ली पुलिस इन आरोपों पर कोई जवाब देती है या मामला भी सोशल मीडिया की दूसरी बहसों की तरह शोर में दबकर रह जाता है।


ब्राह्मण घर की बेटी हूं…लोकतंत्र की लड़ाई अपनी जगह है..श्राप देती हूं..उस पुलिसवाले को जिसके इशारे पर मुझे बेवजह..टांगों से पकड़कर अपमानजनक तारीके से बस में डाला गया…एक श्राप मैंने 2022 में दिया था..एक आज देती हूं…असहाय व्यक्ति की हाय लोहे को भस्म कर देती है..ये तो फिर भी ज्ञानेश की मशीन से निकली सरकार के इशारे पर खाकी वर्दी वाला दुर्योधन है…
ये है वो दुर्योधन…इस व्यक्ति के आदेश पर मुझे टांगो से उठाकर अपमान जनक तरीके से बस में फेंका गया..इसी ने ये सुझाव दिया कि मुझे टांगों से पकड़कर बस में फेंका जाए…ये जानते हुए कि मैं पत्रकार हूं..ये देखते हुए कि मेरे हाथ में माइक है..ये देखते हुए कि मेरे गले में प्रेस कार्ड है.. इस नीचता और उद्दंडता का हिसाब ऊपर वाला जरूर करेगा..
-प्रज्ञा मिश्रा, पत्रकार यूट्यूबर

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