नई दिल्ली- विरोध प्रदर्शनों की कवरेज करने गईं महिला पत्रकारों से बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को तलब कर आरोपों पर जवाब देने को कहा है। सवाल सिर्फ महिला पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार का नहीं, बल्कि यह भी है कि जब प्रेस की पहचान बताने के बावजूद पत्रकारों को कथित तौर पर प्रताड़ना झेलनी पड़े, तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकारों के साथ कथित बदसलूकी और यौन उत्पीड़न का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को अदालत में मौजूद रहने और आरोपों पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।
यह मामला ऐसे समय में अदालत के सामने आया है, जब विरोध प्रदर्शनों की कवरेज करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा और उनके काम में पुलिस के कथित हस्तक्षेप को लेकर सवाल उठ रहे हैं। नेटवर्क ऑफ विमेन इन मीडिया, इंडिया (NWMI) और फ्रीडम ऑफ स्पीच कलेक्टिव की ओर से दायर याचिकाओं में पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कथित दुर्व्यवहार के मामलों में जवाबदेही तय करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने यह आरोप भी लगाया है कि विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के 10 अक्टूबर के आदेश का पालन नहीं किया गया।
महिला पत्रकारों के साथ कथित उत्पीड़न पर अदालत में सवाल
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने महिला पत्रकारों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि याचिका उन महिला पत्रकारों से जुड़ी है, जिन्होंने विरोध प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान कथित यौन उत्पीड़न का सामना किया।
इंदिरा जयसिंह ने अनुरोध किया कि इस याचिका पर भी विरोध प्रदर्शनों से संबंधित दूसरे मामलों के साथ सुनवाई की जाए। उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि याचिका के बारे में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पहले ही सूचना दी जा चुकी है।
दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मामले में सहायता करने और आरोपों पर पुलिस का पक्ष स्पष्ट करने के लिए दिल्ली पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी को अदालत में मौजूद रहना चाहिए।
पीठ ने याचिका को 15 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
प्रेस की पहचान बताने के बावजूद कथित बदसलूकी क्यों?
NWMI की याचिका में आरोप लगाया गया है कि विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को कथित मारपीट, धमकी, हिरासत और उनके पेशेवर काम में बाधा जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा। महिला पत्रकारों ने भी आरोप लगाया है कि प्रेस का सदस्य होने की पहचान बताने के बावजूद उनके साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया।
याचिका में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाने की मांग की गई है। इसमें पुलिस और पत्रकारों के बीच संवाद की व्यवस्था तय करने, विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों के साथ व्यवहार के स्पष्ट नियम बनाने और संबंधित घटनाओं की स्वतंत्र जांच कराने की मांग भी शामिल है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर पत्रकारों को अपना काम करने के दौरान ही कथित उत्पीड़न और मनमानी का सामना करना पड़े, तो स्वतंत्र पत्रकारिता और प्रेस की सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े होते हैं। ऐसे मामलों में केवल शिकायत दर्ज होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि निष्पक्ष जांच और जवाबदेही भी जरूरी है।
जंतर-मंतर के पास तीन महिला पत्रकारों से कथित यौन उत्पीड़न का आरोप
याचिका में 3 अक्टूबर की एक घटना का भी जिक्र किया गया है। आरोप है कि जंतर-मंतर के पास विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में ली गईं तीन महिला पत्रकारों के साथ दिल्ली पुलिस के कुछ कर्मियों ने यौन उत्पीड़न किया।
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने शिकायतों को निष्पक्ष जांच के लिए अपनी क्राइम ब्रांच को सौंपने की बात कही थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी मीडिया में सामने आई खबरों का स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
अब सवाल यह है कि इन गंभीर आरोपों की जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या जांच के नतीजों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जाएगी? महिला पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़े इस मामले में पुलिस का जवाब और जांच की निष्पक्षता दोनों महत्वपूर्ण होंगे।
पत्रकारों को काम करने से रोकने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान कह चुका है कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपना काम करने से नहीं रोका जाना चाहिए। अदालत ने यह बात आवाजाही पर पाबंदियों और कथित गैरकानूनी हिरासत से जुड़ी शिकायतों पर विचार करते हुए कही थी।
इसके बावजूद महिला पत्रकारों के साथ कथित बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के आरोपों का अदालत तक पहुंचना कई सवाल खड़े करता है। यदि पत्रकारों को विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान सुरक्षा नहीं मिलती, तो उनके काम करने की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित होगी? और यदि आरोप पुलिसकर्मियों पर ही हों, तो निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की गारंटी कौन देगा?
सुप्रीम कोर्ट में 15 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी की मौजूदगी महत्वपूर्ण होगी। अदालत के सामने पुलिस का पक्ष आने के बाद मामले की आगे की दिशा स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल, महिला पत्रकारों की ओर से लगाए गए आरोपों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया जारी है। आरोपों की पुष्टि और जिम्मेदारी तय होना जांच तथा अदालत के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा। लेकिन यह मामला एक बुनियादी सवाल जरूर सामने रखता है—पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली व्यवस्था पर ही जब उत्पीड़न के आरोप लगें, तो जवाबदेही सुनिश्चित करने का रास्ता क्या होगा?
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