यशवंत सिंह-
यूपी में एक मर्डर हुआ या आत्महत्या हुआ! शिवा शर्मा का। शिवा शर्मा की माँ का एक इंटरव्यू या वीडियो नहीं दिखा मुझे। किसी की एक स्टोरी नहीं दिखी कि पुलिस इतनी लाचार क्यों है, पुलिस क्यों नहीं पकड़ पा रही है। सबका ध्येय बस एक अफसर की ट्रोलिंग है। मुझे नहीं पता वो कौन अफसर है। वो किसलिए टारगेट पर है। मैं उस अफ़सर से कभी मिला नहीं। कभी बात नहीं हुई। पर मुझे कष्ट पत्रकारिता के लेवल पर है। अरे मैं सौ अपराधियों और रंडियों को सोशल मीडिया पर लाइक फॉलो करता हूँ। तो क्या उनके गाँव में छेद होगा तो मैं अपराधी माना जाऊँगा?
यूपी में मीडिया का ग़ज़ब हाल है। इस उस अफ़सर को टारगेट कर काम चला लेने की परंपरा बहुत पुरानी है। अरे गाँव में दम हो तो लिखो न फुल नाम। क्या किसी के साथ किसी की फोटो दिख जाने भर से कोई अपराधी हो जाता है? अगर ऐसे होता तो इस देश में कोई एक नेता सत्ता में न होता।
लो जी, मेरी फोटो श्रद्धा दुबे जी के साथ वाली। लखनऊ में एक बार वो मिलीं तो मैंने दौड़कर पुष्प गुच्छ दिया। तो क्या मैं अपराधी हो गया, मुझे अब जीने का हक़ नहीं है?
दरअसल अब पत्रकारिता है ही नहीं। सब एजेंडा है। मेरी उससे नहीं पटती तो चलो उसको किसी भी तरह से बदनाम करो! कुछ भी आंय बाँय सांय लिखो। प्रेम सेक्स खाना पहनना ये सब निजी चीजें होती हैं। इसको लेकर किसी को टारगेट करने से बचना चाहिए।
श्रद्धा दुबे को पुलिस पकड़े, इन्वेस्टिगेट करे। अब तक के जो ऑडियो वीडियो आए हैं उससे लग रहा है ये पागल और अपराधी मानसिकता वाली लड़की ही हत्यारिन है। अगर शिवा ख़ुद कूदा है तो उसको इतना टार्चर किया गया कि वो मौक़ा मिलते ही कूद गया। इस ब्लैकमेलर श्रद्धा दुबे को फाँसी मिलनी चाहिए। लेकिन श्रद्धा दुबे के नाम पर किसी नेता अफ़सर को ब्लैकमेल करना बदनाम करना ग़लत है।
प्रसाद अगर बंट रहा हो तो सबको आचमन करना चाहिए। इसमें ग़लत क्या है। लेकिन प्रसाद खाने वालों को ही पापी घोषित कर देना ग़लत है। महिला उत्थान और विकास के आधुनिक दौर में श्रद्धापूर्वक प्रसाद यत्र तत्र सर्वत्र बँट रहा है। आप अगर वंचित हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि बाक़ी सभी प्रसाद पाने वालों को गरियायें!

