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साहित्य

बीएचयू में संघ की शाखा और मुसलमानों के प्रति नफरत के बीज

Om Thanvi : प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा के दूसरे भाग ‘मणिकर्णिका’ की बात मैंने परसों की थी। उस किताब में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दिनों का एक प्रसंग इस तरह हैः

Om Thanvi : प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा के दूसरे भाग ‘मणिकर्णिका’ की बात मैंने परसों की थी। उस किताब में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दिनों का एक प्रसंग इस तरह हैः

 

… रानी बड़हर कोठी के अहाते में रोज शाम को करीब डेढ़ सौ लड़के शाखा लगाने आते थे। संघ चालक थे बीएचयू के ही एक छात्र विपिनबिहारी चतुर्वेदी। शाखा में परेड तथा लाठी भांजने आदि के बाद हर रोज चतुर्वेदी जी अनेक मनगढ़ंत कहानियों के माध्यम से भाषा दिया करते थे। उनके एक-एक शब्द में सांप्रदायिकता भड़काने वाला ओजस्व होता था। उनकी हर कहानी में किसी न किसी हिंदू युवती के साथ दुराचार के बाद उसके स्तन काटे जाने की घटना का जिक्र अवश्य होता था। जाहिर है ऐसे कृत्य का अपराधी किसी न किसी मुसलमान को ठहराया जाता था। शाखा में बैठे लड़कों के चेहरे ऐसी बातों को सुनकर एकदम तमतमा उठते थे।… मैंने रानी बड़हर कोठी में सांप्रदायिकता की नर्सरी का जो रूप देखा, उससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि दंगों की पृष्ठभूमि कैसे तैयार होती है।

दशकों बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाला/शाखा जैसी थी, वैसी ही नहीं है? हाल के दौर में हमने बार-बार उपर्युक्त किस्से का ही यथार्थवादी दुहराव – किंचित हेरफेर में – नहीं देखा?

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दलित चिंतक और लेखक प्रो तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ ने इतिहास रचा है। इतनी ईमानदारी से हिंदी में शायद ही कोई अन्य जीवनी अपनी कलम से लिखी गई हो। हमारे समाज की सच्चाइयों से वे बगैर किसी कटुता के दो-चार होते हैं, हमें भी उनके करीब ले जाते हैं। बड़े सहज और रोचक अंदाज में। कल उनकी आत्मकथा के दूसरे भाग ‘मणिकर्णिका’ पर चर्चा में शामिल होने का मौका मिला। डॉ नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, मैनेजर पांडेय, अशोक वाजपेयी (हालांकि वे वक्ता नहीं थे) और स्वयं तुलसीरामजी आदि की मौजूदगी में मैंने झिझक के साथ अपनी बात कही।

किताब में एक जगह तुलसीरामजी लिखते हैं कि बनारस में दलित को किराए घर नहीं मिलता था, उन्हें शर्मा बनकर रहना पड़ा, बात खुल गई तो मकान-मालकिन ने बाहर निकालते हुए कहा कि तुम्हारे चेहरे के चेचक दाग ही बताते थे कि चमार हो। मैंने चर्चा में कहा – चेचक के ये दाग दलित के चेहरे पर नहीं, कुंठित सवर्ण के मानस में गुदे हैं। चेहरे के दाग तो जाहिर होते हैं और एक शख्स पर होते हैं; मानस के दाग भीतर ही भीतर पूरे कुंठित समुदाय में दूर तक पनपते हैं। आपको याद होगा, ज्यादा समय नहीं हुआ, जब मुंबई में शबाना आज़मी और जावेद अख़्तर को घर (खरीदने को) नहीं मिला था क्योंकि वे मुसलमान हैं! इस किस्म की सवर्ण मानसिकता प्रगति भरे आधुनिक दौर के बावजूद अपनी कुंठाओं से पता नहीं कब बाहर निकल पाएगी। मौजूदा दौर में यह सवाल और जटिल होता जाता है।

जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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2 Comments

2 Comments

  1. rajkumar

    October 21, 2014 at 1:21 pm

    om thanvi ji ke man me bjp v sangh ke prati nafrat is tarah bathi hui h ki vo apne man ki kuntha samay samay par nikalte rahte h, thanvi ji ko congress ka dalal bhi kahane me sankoch hota h, jansata jaise akhbar ko miti me milane ka sraye bhi thanvi ko hi h, musilimo v dalito megalat prachar karna inki aadat me sumar h, muslim aakrantao ki bat karna samprdayik lagti h, kya bharat me islam ka felav talwar ke bal par nahi huva, secular hone ka dhong karne vale kamred v thanvi jaise logo ke karan hi islami kathmulaon ko badava milta h v sahi muslim neta bharat me ubharta nahi h.

  2. Ashish

    October 21, 2014 at 9:23 pm

    अभी हाल में जनसत्ता के एक मित्र ने बताया कि किस तरह से राहुल देव संपादक रहते हुए ओम थानवी को दफा कर रहे थे और किस तरह से प्रभाष जोशी वाया अच्युतानंद मिश्र के मार्फत नौकरी बचाई माननीय ओमथानवी ने। यह अद्भुत संपादक है, जिसके पास नीतियों की समझ नहीं है। जो किसी भी राष्ट्रीय या अंतराराष्ट्रीय चुनौती के वक्त साहस के साथ संपादकीय पेज पर नहीं आता। प्रभाष जी ने बहुत सारी गलती की थी, उसमें यह पत्रकारिता का मूर्धन्य पत्रकार का गढ़ना भी था। शुभेच्छा के साथ।

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