स्टीवन हॉकिंग के बहाने ‘विकलांग’ बनाम ‘दिव्यांग’ पर ओम थानवी की चर्चा, जानिए सही क्या है….

Om Thanvi : स्टीवन हॉकिंग चले गए। आइंस्टाइन के बाद सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिक थे। उनके अंग विकल थे। लेकिन उन्हें मीडिया विकलांग नहीं, दिव्यांग कहेगा। क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री ने यह शब्द दिया है। क्या प्रधानमंत्री भाषाविज्ञानी हैं? बिलकुल नहीं। न वे मीडिया के भाषा सलाहकार हैं। फिर भी जैसे सरकार में उनका हुक्म चलता है (जो स्वाभाविक है), वैसे ही आजकल मीडिया में भी चल जाता है (जो नितांत अस्वाभाविक है)।

विकलांग कहीं से आपत्तिजनक शब्द नहीं है। अंगरेज़ी का डिसेबल (अक्षम या ग़ैर-क़ाबिल) ज़रूर ग़लत रहा होगा। पर वह अंगरेज़ी की समस्या थी, हिंदी की नहीं। जिसके अंग या अंगों में विकार हो, उसे हिंदी में अक्षम कभी नहीं कहा या समझा गया। लेकिन अंगरेज़ी वालों ने disable की जगह differently/specially able/challenged आदि कर अपनी भूल क्या सुधारी, अंगरेज़ीदाँ नौकरशाहों ने हिंदी में भी ‘विकलांग’ प्रयोग को बदलने की क़वायद कर डाली। फिर मोदीजी ने भी वही कोशिश की।

दिव्यांग प्रयोग किसी विकलांग व्यक्ति का मज़ाक़ उड़ाने से कम नहीं है। दिव्यता का दर्शन और दिव्य-पुरुष, दिव्य-चक्षु, दिव्य-दृष्टि या दिव्य-मूर्ति जैसे प्रयोग एक धर्मसंस्कृति का बोध देते हैं। जबकि विकलांगता का किसी धर्म या समुदाय से कोई लेना-देना नहीं है।फिर उन्हें उन लोगों पर क्यों थोपा जाय, जो अपनी आंगिक चुनौतियों के बावजूद संघर्षरत हैं, सक्रिय हैं?

दिव्यांग कहकर उन्हें सहानुभूति का पात्र बनाया जाता है। जैसे उनमें बेचारगी हो जिसे नाम-परिवर्तन से दूर कर दिया जाएगा। एक अर्थ में यह उस समुदाय का मज़ाक़ उड़ाना भी है। जैसे ग़रीब को सहानुभूति (!) में सम्पन्न लोग करोड़ीमल या अम्बानी कहने लगें! यह हक़ उन्हें न भाषाशास्त्र देता है, न राजनीति, न शासन। इसलिए न कहें कि हॉकिंग दिव्यांग थे। उनके अंग-प्रत्यंग विकल ज़रूर थे, इसके बावजूद उन्होंने अपने तप और ज्ञान से उन लोगों के दिमाग़ के जाले साफ़ किए जो संसार की वास्तविकता को कभी सही परिप्रेक्ष्य में समझ ही नहीं पाए।

वरिष्ठ पत्रकार और राजस्थान पत्रिका के संपादकीय सलाहकार ओम थानवी की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Devendra Surjan पूरे चार साल लगा दिए आपने विकलांग दिव्यांग का भेद करने में . काश कि यह भेद तभी सामने आ जाता जब एक चाय वाले ने अपनी हैसियत का फायदा उठाते अर्थ का अनर्थ कर डाला था . भला हो स्टीवन हॉकिंग का जिनके दिवंगत होने से आप इन दो शब्दों का सही सही भावार्थ व्यक्त कर पाये . इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक समय में विकलांग शब्द के शब्दशः जीवंत उदाहरण स्टीवन हॉकिंग ही थे.

Ravishanker Acharya क्षमा चाहुंगा सर, आपके तथ्य पूर्णतः उचित ही है, परन्तु मैंने अनेक विकलांगों को अद्भुत और असाधारण विशेष योग्यताओं के साथ देखा है।साधारण मनुष्य चाहकर भी वो योग्यता हासिल नहीं कर पाता।ऐसे व्यक्तित्व वाले लोगों के लिए दिव्यांग शब्द भी उचित ही लगता है। दिव्य अगर विशेष धर्म का बोध कराता लगता है तो divine को कैसे महसूस करे।

Anurag Dubey असाधारण योग्यता होने का शारीरिक विकलांगता होने अथवा न होने से कोई समवाय संबंध नहीं है। मायने ये कि प्रत्येक विकलाँग के पास असाधारण योग्यता हो यह ज़रूरी नहीं। हाँ लेकिन प्रत्येक विकलाँग के पास एक अंग विशेष (जो विकल हो) का होना अवश्य ही ज़रूरी है और जब आप दिव्यांग कह रहे होते हैं तो असल में आप उस अंग विशेष को दिव्य अंग की उपमा देकर खिल्ली उड़ाने का काम कर रहे होते हैं। यह सब ठीक वैसा ही हो रहा है जैसे अतिरिक्त अंग वाले नंदी को बैलगाड़ी टैंपो में सजाधजाकर पुजवाते हुए धन इकट्ठा किया जाता है!

Musafir Baitha जिस विकलांग हिन्दू धार्मिक मानसिक समझ का नमूना ‘दिव्यांग’ है उसी का उदाहरण गांधी का ‘हरिजन’ भी है।

Om Thanvi कालखंड में देखना होगा। गांधी और मोदी में ईमानदार सरोकार का फ़ासला एक सदी का है।

Musafir Baitha शब्द को समझने की तमीज़ दोनों की एक ही है सर, बाकी गांधी और मोदी में कोई तुलना नहीं।

Mukesh Kumar जाने-अनजाने में गांधी जी ने कभी अछूतों को हरिजन कहकर भी यही ग़लती की थी।

Om Thanvi नीयत ठीक थी, इसलिए अपने दौर में चल गया था। जिन संबोधनों के काट के लिए इसे सोचा होगा, वे समुदाय को गाली की तरह प्रयोग होते थे।

Bhagwan Singh अंधे को प्रज्ञाचक्षु या सूरचक्षु (सूर/सूरा/ सूरदास) कहने के पीछे जो भाव था वह एक विकलांगता तक सिमट कर रह गया. व्यापक आशय वाले एक शब्द की जरूरत थी. नया है इसलिए खटकता मुझे भी है पर प्रयोग अच्छा है.

Om Thanvi पहले सूरदास का प्रयोग भी अनुकंपा में गढ़ा गया होगा जो मज़ाक़-सा साबित हुआ। ग़नीमत है किसी प्रधानमंत्री ने उसकी अनुशंसा नहीं की, वरना सरकारी कामकाज में जैसे दिव्यांगों लिखा जाता है, वैसे ही बाबू लोग ‘सूरदासों के लिए योजना’ लिखते और वंचित समुदाय का मज़ाक़ बनाते।

Urmilesh Urmil दिव्यांग शब्द सर्वथा अनुपयुक्त है! मैं इसका कभी प्रयोग नहीं करता।

Mohan Lal Mishra पूर्णतः सहमत. दिव्यांग कहना एक प्रकार से चिढ़ाना ही होता है विकलांग को.  एक तो बेचारा विकलांग होता है विशेष अंग कमजोर होता है ऊपर से उन अंगों को दिव्य कहना. ये दिव्यांग शब्द मतिहीन मोदीजी का दिया हुआ है.

Ramprakash Kushwaha अनन्यांग या अन्यांग कैसा रहेगा !

Om Thanvi ‘प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो’ …

Anurag Dubey नौकर होने के चलते मैं चाहकर भी इस पोस्ट को शेयर नहीं कर पा रहा हूँ… इससे बड़ी भी विकलांगता कोई होगी भला!

Narendra Tomar विकलांग को दिव्यांग कह कर असल मैं उसे भगवान जैसी चीज से जोड़ा जाता है जिसका अर्थ है की उसे ऐसा उपरवाले ने बनाया है उसके ‘पापों’ की सजा देने के लिए.

Jai Singh Lochab ईश्वर को भी हॉकिंग ने यह कहकर नकार दिया था कि यह यह ब्रह्माण्ड किसी अद्रश्य शक्ति के कारण नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के कारण हुआ जिसे “big bang” ( a blast) हुआ ब्लेक होल में और ये धरती और लाखों गृह बने!

Mohan Lodwal Kunjela थानवी जी, स्टीफन हॉकिंग या स्टीवन हॉकिंग (Stephen Hawking), कृपया सही शब्द उच्चारण का उल्लेख करें।

Mahendra Kumar Misra Stephen का सही उच्चारण स्टीवेन ही है। स्टीवेन या स्टीवन दोनों ही प्रचलित हैं।

Mohan Lodwal Kunjela हमारा शक इसलिए गहरा गया है कि आज सभी राष्ट्रीय स्तर के अखबारों में ‘स्टीफन’ ही लिखा है।

Mahendra Kumar Misra हिन्दीभाषी स्टीफन या स्टीफेन ही बोलते और लिखते हैं अधिकतर। उसमें कुछ बुराई नहीं है।

Adarsh Prakash बहुत महत्वपूर्ण चिंतन थानवी जी। राजनीति के बहाव में बह रहा है मीडिया, वह भी वर्तमान सत्ता के। मुझे तो हँसी आती है जब इन राजनेताओं को चित्र प्रदर्शनी या साहित्यिक समारोहों में बुलाकर हम गौर्वान्वित महसूस करते हैं जिन्हें इन विषयों का क ख ग तक नहीं मालूम। लेकिन विचार प्रकट करने से यह चूकते नहीं, मानों विश्व का सारा ज्ञान इन्हीं के भेजे में आ सिमटा है। फिर मोदी जी तो मोदी जी ठहरे।

Khursheed Ansari सच मे सर कल जावेद आबिदी और स्टीफ़ेन हाकिंग से जुड़ी हुई कुछ यादों को लिखने की कोशिश कर रहा था और एक अनजान से भय विकलांग लिखने और न लिखने के बीच मुझे परेशान कर गया कि कहीं विकलांग लिख देना क्या किसी कानूनी दांव पेंच में तो नही फंसा देगा और या कि मीडिया बहादुर…

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पत्रिका समूह में सलाहकार संपादक बने ओम थानवी बोले- ‘मेरी घर वापसी हुई है’

Om Thanvi : आज औपचारिक रूप से मैंने राजस्थान पत्रिका समूह के सलाहकार सम्पादक का ज़िम्मा संभाल लिया। ‘औपचारिक रूप से’ इसलिए कि अनौपचारिक विमर्श हफ़्ते भर पहले शुरू हो गया था! पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत मैंने पत्रिका से ही की थी। 1980 में, संस्थापक कर्पूरचंद कुलिश के बुलावे पर। तीस वर्ष पहले पत्रिका से आकर ही चंडीगढ़ में जनसत्ता का सम्पादक हुआ। वहाँ से दिल्ली आया। आप कह सकते हैं, आज घर वापसी हुई।

इस बीच पत्रिका समूह बहुत व्यापक हो गया है। अख़बार, टीवी, रेडियो, डिज़िटल आदि विभिन्न मीडिया क्षेत्रों में उसकी अपनी जगह है। दैनिक पत्रिका का प्रकाशन अब राजस्थान के अलावा दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और तमिलनाडु से भी होता है। 33 संस्करण छपते हैं। कोई 1 करोड़ 29 लाख पाठक इसे पढ़ते हैं। बीबीसी-रायटर के एक सर्वे में देश के सर्वाधिक विश्वसनीय तीन अख़बारों में पत्रिका एक था।

मेरे लिए पत्रिका का प्रस्ताव स्वीकार करने की एक बड़ी वजह रहा समूह का जुझारू अन्दाज़। संघर्ष की ललक और सत्ता के समक्ष न झुकने का तेवर। इसकी एक वजह शायद यह है कि मीडिया ही इस समूह का मुख्य व्यवसाय है। इससे समझौते की जगह लिखना अहम हो जाता है। हाल में राजस्थान सरकार ने मीडिया को क़ाबू करने के लिए जिस काले क़ानून को थोपने की कोशिश की, वह पत्रिका के मोर्चा लेने के कारण ही आंदोलन बना और अंततः सरकार झुकी। क़ानून का इरादा हवा हुआ।

पत्रिका के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी केंद्र सरकार के कामकाज पर तीखे संपादकीय नाम से लिखते आए हैं। उनके सम्पादक भी स्वतंत्र भाव से लिखते हैं। जब पत्रकारों-संपादकों में बिछने की चाह बलवती हो, पत्रिका की इस भूमिका ने भी मुझे उससे जोड़ा है। समूह के अनेक पत्रकारों के साथ मैंने पहले भी काम किया है।

तो उम्मीद है काम का मज़ा रहेगा। पत्रिका की सार्थक पत्रकारिता में कुछ योगदान कर सका तो उसका संतोष भी। मेरा मुख्यालय दिल्ली (कहिए एनसीआर) रहेगा।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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राजस्थान पत्रिका समूह से ओम थानवी के जुड़ने की चर्चा

जनसत्ता के प्रधान संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के बारे में चर्चा है कि वे राजस्थान पत्रिका अखबार समूह के हिस्से हो गए हैं. बताया जाता है कि उन्होंने सलाहकार संपादक के रूप में ज्वाइन किया है. उन्होंने दिल्ली में आईएनएस बिल्डिंग के दफ्तर में पत्रिका ग्रुप के वरिष्ठ मीडियाकर्मियों की एक बैठक की जिसमें संपादक भुवनेश जैन भी थे. वेपत्रिका ग्रुप की वेबसाइट कैच न्यूज के आफिस भी गए. राजस्थान पत्रिका में ओम थानवी पहले भी एक बार काम कर चुके हैं.

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नेताओं के जहाजों के कारण 13 आम उड़ानें दिल्ली में उतरने नहीं दी गईं!

Om Thanvi : आख़िर एएनआइ ने ख़बर दे दी है… शनिवार की शाम ख़ास नेताओं की उड़ानों के लिए जगह बनाने की ग़रज़ से जनता को ला रही तेरह आम उड़ानें दिल्ली में उतरने नहीं दी गईं, उन्हें अन्यत्र मोड़ दिया गया। आपको याद होगा, शुक्रवार को बीकानेर से दिल्ली की उड़ान को दिल्ली से लौटा देने और जयपुर में जा खड़ा करने पर मैंने संशय ज़ाहिर किया था कि दिल्ली हवाई अड्डे पर लगता है नेताओं के विमानों की भीड़ है?

“चुनाव प्रचार कर गुजरात-हिमाचल से लौटते ख़ासमख़ास नेताओं की?”

कितनी शर्म की बात है कि जनता को तकलीफ़ डाल, उनके सफ़र में विलम्ब कर, आगे की उड़ानों और टिकट पर लगे धन को लात मारते हुए नेता (ज़ाहिर है मुख्यतः सत्ताधारी) नैतिकता और व्यावहारिकता दोनों को तिलांजलि दे रहे हैं। अपनी चुनावी उड़ानों को लाइन से हटकर, पहले उतारने के फेर में। शायद हमारे देश में ही ऐसा सम्भव है। यही है न्यू इंडिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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ओम थानवी बोले- सौ करोड़ मांगने वाले सुधीर चौधरी को सरकारी सुरक्षा और फर्जी आरोपों में विनोद वर्मा को जेल! (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया में विनोद वर्मा गिरफ्तारी प्रकरण पर हुई सभा में वरिष्ठ पत्रकार ने जो कुछ कहा, उसे इस वीडियो में देख-सुन सकते हैं :

ओम थानवी से ठीक पहले वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने क्या कुछ कहा, उसे भी सुनें :

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द वायर के खिलाफ स्टे लेने में जय शाह कामयाब, अब कोई कुछ न लिखे-बोले!

Om Thanvi : वायर, दायर और कायर… जय अमित शाह ने अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के अनेक अतिरिक्त सिविल जजों में एक चौथे जज की अदालत में द वायर के ख़िलाफ़ दायर सिविल मुक़दमे में स्टे प्राप्त कर लिया है। कि वे रोहिणी सिंह वाली ख़बर के आधार पर आगे और कुछ किसी भी रूप में (प्रिंट, डिज़िटल, इलेक्ट्रोनिक, ब्रॉडकास्ट, टेलिकास्ट या किसी अन्य मीडिया में ख़बर, इंटरव्यू, बहस, टीवी परिचर्चा की शक्ल में, किसी भी भाषा में, न प्रत्यक्ष न अप्रत्यक्ष) मुक़दमे के अंतिम निपटारे तक कुछ भी नहीं लिखेंगे-बताएँगे।

बताइए, लोकतंत्र का कैसा दौर है। न्यायपालिका ही अन्याय कर रही है? बग़ैर मीडिया (लेखक, प्रकाशक/प्रसारक) को नोटिस पहुँचाए, बग़ैर मीडिया का पक्ष सुने स्टे का इकतरफ़ा (एक्स-पार्टी) फ़ैसला दे दिया। यह आदेश भी अदालत ने बचाव पक्ष को नहीं भेजा। जय शाह के वकीलों ने भेजा है। न्याय तब मुकम्मल होता है जब दूसरे पक्ष को सुने बग़ैर उसके ख़िलाफ़ कोई स्टे आदि न दिया जाय। यहाँ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी का मौलिक अधिकार ताक पर था।

मेरे वक़ील मित्रों का कहना है कि उन्हें इसमें ज़रा शक़ नहीं कि उच्च अदालत में यह इकतरफ़ा स्टे ख़ारिज हो जाएगा। मुझे भी न्यायपालिका से उच्च स्तर पर बड़ी उम्मीदें हैं। हालाँकि निचले स्तर पर भी न्यायप्रिय जज हैं। मगर ऊपरी अदालतों में अपीलों की तादाद बढ़ती ही है, घटती नहीं।

मज़ा देखिए छोटे शाह ने वायर पर फ़ौजदारी मुक़दमा मेट्रो कोर्ट में दायर किया है और सिविल मुक़दमा डिस्ट्रिक्ट (रूरल) कोर्ट में। जबकि जिन पत्रकारों के ख़िलाफ़ दावा किया है, उन सबका पता दिल्ली का है। बहरहाल, द वायर को (सिर्फ़ वायर को!) आगे कुछ न लिखने-दिखाने से रोकने की इस दूरस्थ कोशिश को मीडिया का, दूसरे शब्दों में लोकतंत्र का गला मसोसने के सिवा और क्या कहा जा सकता है?

वरिष्ठ पत्रकार और चर्चित संपादक रहे ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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जय शाह मामले में अख़बारों का हाल देखें, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, मुकदमे की धमकी आगे!

Om Thanvi : अख़बारों का हाल देखिए… ”छोटे शाह 100 करोड़ का मुक़दमा दायर कर देंगे” यह है सुर्खी। भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, धमकी आगे! कल्पना कीजिए यही आरोप केजरीवाल, चिदम्बरम, वीरभद्र सिंह या किसी अन्य दुश्मन पार्टी के साहबजादे पर लगा होता?  तब मुक़दमे की धमकी की बात ख़बर की पूँछ में दुबकी होती। टीवी चैनल सिर्फ़ एक वर्ष में 16000 गुणा बढ़ोतरी को शून्य के अंक जगमगाते हुए दुहराते। दिनभर रिपोर्टर आरोपी का पीछा करते, घर-दफ़्तर पर ओबी वैन तैनात रहतीं, शाम को सरकार, संघ, वीएचपी के आदि के साथ बैठकर सरकार समर्थक पत्रकार या बुद्धिजीवी नैतिक पतन की धज्जियाँ उड़ा रहे होते।

सुना है प्रधानमंत्री से कांग्रेस और आप पार्टी की जाँच की माँग को उचित तवज्जो सिर्फ़ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ने दी। इतने चैनल, इतने पत्रकार – सब चुप? सबको तो अंबानियों-अडानियों ने नहीं ख़रीदा होगा! हमारे मीडिया को क्या हो गया है? क्या कहें कि लकवा मार गया है या ज़मीर मर चुका है? इमरजेंसी में भी अख़बार वाले इतने कायर नहीं थे, गो कि उस वक़्त तो क़ानून लागू कर उनके हाथ और मुँह बाँध दिए गए थे।

अमित शाह के बेटे ने सही तरीक़े से धन कमाया या ग़लत तरीक़े से, इसकी जाँच की ज़रूरत ख़ुद अमित शाह को ही नहीं, समूची भाजपा को महसूस करनी चाहिए। आख़िर पार्टी के अध्यक्ष की नैतिक शक्ति (जैसी भी हो) के टिके रहने का सवाल है। इस मामले में कांग्रेस की आड़ लेना हास्यास्पद है। आप “माँ-बेटे-दामाद” की सरकार कब से हो गए? आप तो कांग्रेस के भ्रष्टाचार, परिवारवाद, नारी पर वार आदि से अलग सरकार देने का भरोसा देकर सत्ता में आए थे न?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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91 वर्ष के नामवरजी ने त्रिलोचन की चुनिंदा कविताएं अपनी मजेदार टिप्पणियों के साथ सुनाईं

Om Thanvi : लीलाधार मंडलोई ने ज्ञानपीठ की गतिविधियों को गति दी है, उन्हें विविध बनाया है। कल शाम ‘वाक्’ शृंखला के तहत इंडिया हैबिटाट सेंटर में नामवर सिंह को बुलवा कर उन्होंने वहाँ मौजूद हर शख़्स की ज़िंदगी बड़ी कर दी। हिंदी की दुनिया में ऐसी भावुक घड़ियाँ कम आई होंगी।

नामवरजी 91 वर्ष के हो गए हैं। स्वास्थ्य भी अस्थिर रहता है। लेकिन पूरी शाम वे प्रसन्न मुद्रा में रहे। उन्हें सुनने-मिलने बड़ी संख्या में हिंदी-प्रेमी आए थे। विश्वनाथ त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, रेखा अवस्थी, विष्णु नागर आदि से लेकर अनेक युवा लेखक-पत्रकार दिखाई दिए। पुणे के टीकम शेखावत तक (नीचे दी जा रही तसवीर उन्हीं के सौजन्य से)।

आयोजन का विषय था “नामवर के त्रिलोचन”, पर – जैसा कि अंदाज़ा था – नामवरजी कम बोले। अपना वक्तव्य हाल के दौर में वे लिखकर लाते रहे हैं। वक्तव्य के बाद जब वे त्रिलोचन की चुनिंदा कविताएँ सुनाने लगे, तो साथ में मज़ेदार टिप्पणियाँ भी उनसे फूटने लगीं।

उनकी बड़ी स्थापना यह थी कि वासुदेव सिंह उर्फ़ त्रिलोचन शास्त्री की कविता की सादगी हिंदी में दुर्लभ है। अवधी का यह ठाठ उनके अलावा जायसी और तुलसी में ही मिलता है। उन्होंने कहा, संयोग नहीं है कि त्रिलोचन रोज़ सुबह तुलसी के ‘मानस’ का पाठ करते थे; मैं भी करता था। मीर की शायरी में जो सादगी है, वह ग़ालिब में नहीं है। ग़ालिब में पुरकारी (इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ क्या होगा? बाँकपन?) ज़्यादा है। मगर त्रिलोचन में मीर की सादगी भी है और ग़ालिब की पुरकारी भी।

त्रिलोचन के सॉनेट-प्रेम की बात करते हुए उन्होंने बताया कि नागार्जुन इससे उचट कर कहा करते थे क्या सॉनेटबाज़ी करते रहते हो। पर सॉनेटबाज़ी कोई लौंडेबाज़ी तो नहीं थी। … यहाँ नामवरजी तुरंत सम्भले और कहा, क्षमा कीजिए कुछ अशिष्ट प्रयोग हो गया। पर तब तक हॉल में हँसी की लम्बी फुहार बह चली थी। सारा उद्बोधन और श्रवण इसी अन्दाज़ में सहज और आत्मीय बना रहा।

इससे पहले त्रिलोचन पर एक फ़िल्म देखने को मिली। मेरे मित्र अनवर जमाल ने इसे बाईस साल पहले बनाया था। अच्छी फ़िल्म थी। फक्कड़ और विनम्र त्रिलोचन। शब्दों के साथ अहम के विलय को भी जीते हुए। बस, अनवर जाने क्यों आगे और पीछे लम्बे-लम्बे दो वक्तव्य पिला गए। काश उन्होंने शमशेर की कविता पर ग़ौर किया होता, जिसकी ओर नामवरजी ने भी ध्यान खींचा – “बात बोलेगी, हम नहीं। भेद खोलेगी बात ही।” फ़िल्म ही ख़ूब बोलती है!

जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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अपने कसबे फलोदी पहुंचे ओम थानवी ने अखबारों की बदलती तासीर पर की यह टिप्पणी

अपने क़सबे फलोदी (राजस्थान) आया हुआ हूँ। 47 डिग्री की रेगिस्तान की गरमी मुझे यहाँ उतना नहीं झुलसाती जितना अख़बारों की बदलती तासीर। अजीबोग़रीब हिंदूकरण हो रहा है। जैसे देश में बाक़ी समाज हों ही नहीं। एक बड़े इलाक़े की ख़बरों के लिए तय पन्ने पर (आजकल पन्ने इसी तरह बँटे होते हैं) आज एक अख़बार में हर एक “ख़बर” किसी-न-किसी हिंदू मंदिर की गतिविधि – मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा, कलश की स्थापना, दान-पुण्य – या संतों के प्रवचनों से  लकदक है। वह पूरा का पूरा पन्ना (पृष्ठ नौ) एक ही धर्म की श्रद्धा में/से अँटा पड़ा है।

देश का ‘पाकिस्तानीकरण’ (अख़बार के आज के ही अंक में मित्रवर जयप्रकाश चौकसे की टिप्पणी में प्रयुक्त आशंका) किए जाने में मीडिया की यह नई ‘ग्रासरूट’ सक्रियता भी क्या कम भूमिका निभा रही है? धर्म (और उनके लिए धर्म का मतलब हिंदू धर्म है या कथित ‘राष्ट्रधर्म’) को जगह देना हिंदी अख़बारों जाने कैसी मजबूरी बन गया है। पहले भी देते थे। अब तो बाढ़ आ जाती है। अठारह साल पहले जब दिल्ली में जनसत्ता का काम सम्भाला, सबसे पहले “धर्म-संस्कृति” पन्ना बंद किया था। मुट्ठीभर पन्नों में संस्कृति के नाम पर सिर्फ़ हिंदू धर्म का पन्ना किस काम का। पर आज दुनिया के इतना आगे निकल आने पर भी हमारे यहाँ, जहाँ/तहाँ, अख़बारों में अलग-अलग पन्नों पर संस्कृति की कुछ वैसी ही संकीर्ण समझ फैली है – फैलाई जा रही है।

लेखक ओम थानवी देश के जाने माने पत्रकार हैं और जनसत्ता अखबार के संपादक रहे हैं.

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साहसपूर्ण सामग्री छापने वाला सिद्धार्थ वरदराजन का ‘वायर’ अब हिंदी में भी शुरू हो गया है

Om Thanvi : ‘वायर’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में जितनी साहसपूर्ण सामग्री छपती है, मीडिया में अन्यत्र कम मिलेगी। ‘वायर’ अब हिंदी में भी शुरू हो गया है और बहुत थोड़े वक्फ़े में उसके लेख-टिप्पणियाँ चर्चा में आने लगे। विनोद दुआ का ‘जन की बात’ एक पहचान बन गया है। बताऊँ कि ‘वायर’ एक और ख़ास बात मुझे क्या अनुभव होती है: हिंदी की अहमियत को समझना। इसकी एक वजह शायद यह हो कि उसके संस्थापक-सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन अच्छी हिंदी जानते हैं। यों हिंदी की उनकी बुनियाद पड़ी शायद उर्दू के सहारे। (बोलचाल की उर्दू, हम जानते हैं, कमोबेश हिंदी ही है। उर्दू के महान शायर फ़िराक़ गोरखपुरी तो कहते थे कि हिंदी के व्याकरण और क्रियापद लेकर बनी उर्दू हिंदी की ही एक शैली है; हालाँकि स्वाभाविक ही उर्दू के ‘विद्वान’ फ़िराक़ साहब की इस बात को पसंद नहीं करेंगे।)

बहरहाल, सिद्धार्थ भाग्यशाली थे कि उनका साबका पहले मिली-जुली हिंदी से पड़ा। एक बार इटली में – जहाँ हम कुछ रोज़ के लिए एक पहाड़ी गाँव बेलाज्जो में साथ थे – उन्होंने बताया था कि जब अमेरिका में पढ़ते थे, पाकिस्तानी मूल के छात्रों और दुकानदारों के साथ उर्दू में और भारतीय प्रवासियों के साथ हिंदी में बतियाते हुए वे सहज हिंदी से रूबरू हुए।

शायद यही वजह रही हो कि ‘वायर’ की स्थापना के डेढ़ साल बाद ही ‘हिंदी वायर’ भी शुरू हो गया।

‘वायर’ के काम में सबसे अनूठी बात यह है कि हिंदी लेख वहाँ अंगरेज़ी में अनुवाद होकर छपते हैं। यह बात मैं अपनी टिप्पणियों का अनुवाद देख नहीं कह रहा हूँ। कल ही मनोज सिंह – जो गोरखपुर फ़िल्म समारोह के आयोजन से मशहूर हैं – का लेख नाथ सम्प्रदाय के बारे में छपा था। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी आदि के शोध को उद्धृत करते हुए उन्होंने स्थापित किया कि कट्टरपंथी हिंदुत्व के उभार से पहले गोरखपंथ में मुसलिम जोगी भी बहुत होते थे। आदित्यनाथ उसी मठ के महंत या जोगी हैं और मठ के मुसलिम झुकाव को थोड़ा-बहुत भुनाने की कोशिश भी कर रहे हैं।

जो हो, मैंने यह प्रसंग इसलिए आपको बताया क्योंकि कोई चालीस साल हिंदी पत्रकारिता करते हुए मैंने हमेशा अंगरेज़ी की सामग्री – ख़बरें ही नहीं, लेख और स्तम्भ आदि – को हिंदी में छपते देखा है। (जनसत्ता अपवाद था, जहाँ हम अंगरेज़ी के लेख/स्तम्भ अनुवाद कर अमूमन नहीं छापते थे।) अंगरेज़ी की झूठन से ही हिंदी पत्रकारिता की अपनी भाषा ख़राब हुई है। अंगरेज़ी में कई पत्रकार हिंदी से गए हैं। पर उन्होंने भी कभी इस उलटी धारा को वापस मोड़ने की कोशिश नहीं की। अपवादस्वरूप, या किसी मजबूरी के चलते, हिंदी का कोई लेख या ख़बर आदि भले अंगरेज़ी में अनुवाद करवा लिया हो।

शेखर गुप्ता हरियाणा से ही आते हैं। उन्होंने हिंदी पत्रकारों के वेतन-भत्ते बढ़ाने, पदोन्नति देने का अहम काम किया। पर इंडिया टुडे और एक्सप्रेस में रहते हिंदी लेखकों/स्तंभकारों को इतना महत्त्वपूर्ण नहीं समझा कि उनके लिखे को अंगरेज़ी में अनुवाद करवाया जा सकता। उलटे जनसत्ता में मुझे – हालाँकि सिर्फ़ एक बार – उनके कहने पर तवलीन सिंह और पी चिदम्बरम के स्तम्भ हमारी नीति से हटकर छापने पड़े। भले उन्हें इधर-उधर किसी भी पन्ने पर छाप देता था। यों सिनेमा पर कोई बेहतर लेखक न मिलने पर हमने फ़िल्मकार के. बिक्रमसिंह के लेख भी कुछ समय के लिए अनुवाद करवाए थे, लेकिन बाद में वे हिंदी में ही लिखकर भेजने लगे। लीजिए, इतनी भूमिका मैंने ऐसे ही बाँध दी! साझा करना था ‘वायर’ में शाया हुआ मनोज सिंह का लेख। उसी का अंगरेज़ी अनुवाद देखकर तो कई बातें याद आईं। बताईं।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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न्यायमूर्ति मजीठिया ने पत्रकारों की सेवानिवृत्ति उम्र 58 से बढ़ाकर 65 कर दी थी!

Om Thanvi : दाद देनी चाहिए शरद यादव की कि संसद में पत्रकारों के हक़ में बोले, मजीठिया वेतन आयोग की बात की, मीडिया मालिकों को हड़काया। यह साहस – और सरोकार – अब कौन रखता और ज़ाहिर करता है? उनका पूरा भाषण ‘वायर‘ पर मिल गया, जो साझा करता हूँ। प्रसंगवश, बता दूँ कि मालिकों और सरकार का भी अजब साथ रहता है जो पत्रकारों के ख़िलाफ़ काम करता है। देश में ज़्यादातर पत्रकार आज अनुबंध पर हैं, जो कभी भी ख़त्म हो/किया जा सकता है। ऐसे में मजीठिया-सिफ़ारिशें मुट्ठी भर पत्रकारों के काम की ही रह जाती हैं। क़लम और उसकी ताक़त मालिकों और शासन की मिलीभगत में तेल लेने चले गए हैं। क़ानून ठेकेदारी प्रथा के हक़ में खड़ा है। 

राजस्थान पत्रिका और जनसत्ता में अनुबंध प्रथा बहुत देर से आई। मैंने दोनों जगह कभी अनुबंध पर संपादकी नहीं की। वेतन आयोग के नियमों के अनुसार सेवानिवृत्त भी हुआ। आयोग के क़ायदों से एक सुरक्षा मिलती है, जिससे काम करने की आज़ादी रहती है – वह अनुभव भी होती है। एक दिलचस्प तथ्य: न्यायमूर्ति मजीठिया ने अपनी मूल रिपोर्ट में पत्रकार की सेवानिवृत्ति की उम्र 58 से बढ़ाकर 65 तजवीज़ की थी। इस बिंदु को मालिकों ने शासन की मदद से सचिव स्तर पर ही रिपोर्ट से निकलवा दिया, यह कहते हुए कि आयोग को वेतन तय करना था, काम की अवधि नहीं। क्या न्यायमूर्ति मजीठिया नादान थे?  

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ने गोवा-मणिपुर के राज्यपालों और सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस का आज दो टूक सम्पादकीय…. गोवा और मणिपुर में राज्यपालों को पहले सबसे बड़ी पार्टी के नाते कांग्रेस को सरकार बनाने को आमंत्रित करना चाहिए था। गोवा की राज्यपाल का आचरण प्रश्नाकुल है। उन्होंने समर्थन के जिन पत्रों के आधार पर पर्रिकर को मुख्यमंत्री पद की शपथ का न्योता दे दिया, वे भाजपा के साथ किसी गठबंधन में शरीक़ नहीं थे। बल्कि उनमें एक पार्टी गोवा फ़ॉर्वर्ड पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था।

जस्टिस पुंछी आयोग ने इस बारे में जो दिशा-निर्देश सुझाए उनमें एक यह भी था कि राज्यपाल को चाहिए कि किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में पहले सबसे पड़ी पार्टी या चुनाव से पहले हुए गठबंधन की सबसे बड़ी संख्या को देखकर सरकार बनाने का न्योता देना चाहिए। सरकारिया आयोग ने भी केंद्र-राज्य संबंधों की पड़ताल करते हुए यही राय रखी थी।

इंडियन एक्सप्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय की भी आलोचना की है: “भले अदालत ने राज्यपाल द्वारा दी गई 15 दिन की मोहलत को घटाकर 48 घंटे कर दिया, पर यह आधा उपचार है। सर्वोच्च न्यायालय का सबसे बड़ी पार्टी को पहले आमंत्रित करने के सिद्धांत की रक्षा करने में हिचकिचाना विवादास्पद है।”

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गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है। वह सरकार बना पाए न बना पाए, उसे इसका अवसर मिलना चाहिए था। पर मिलेगा नहीं। क्योंकि मोदी भले दावा रिवायतें बदलने का करें, भाजपा को वे और उनके पार्टी अध्यक्ष कांग्रेस के रास्ते ही हाँक रहे हैं। यानी येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने की लिप्सा कांग्रेस में भी कम न थी। पर भाजपा में उतावली और ज़्यादा दिखाई देती है। उनके राज्यपाल और उतावले हैं। … जिसकी लाठी, उसकी भैंस। लोकतंत्र गया तेल लेने।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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दिल्ली में ‘आप’ सरकार को न कुचला गया तो बीस वर्षों तक भाजपा यहां सत्ता में न आ पाएगी!

Om Thanvi : दिल्ली में आप सरकार के दो वर्षों के कामकाज पर हिंदुस्तान टाइम्स में छपा वृहद सर्वे बताता है कि लोग मानते हैं राजधानी में भ्रष्टाचार घटा है और शिक्षा, चिकित्सा, जल-आपूर्ति और बिजली-प्रबंध के क्षेत्रों में बेहतर काम हुआ है। और, दिल्ली सरकार की यह छवि दो वर्षों तक नजीब जंग की अजीब हरकतों के बावजूद बनी है, जिन्होंने केंद्र सरकार की गोद में बैठकर निर्वाचित शासन के काम में भरसक रोड़े अपनाए।

आप सरकार की सबसे बड़ी सफलता मैं यह मानता हूँ कि उसने यह भरोसा अर्जित किया है कि देश की राजनीति में विकल्प सम्भव हैं। भ्रष्टाचार, वीआइपी ‘संस्कृति’ की ग़लाज़त, वंशवाद, लफ़्फ़ाज़ी आदि को अपेक्षया सादगी, साफ़गोई और काम से पलटा जा सकता है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का शिक्षा के क्षेत्र में काम इसका श्रेष्ठ उदाहरण होगा।

अकारण नहीं है कि पार्टी दिल्ली से बाहर भी पाँव पसार रही है। मुझे एक दफ़ा एक टीवी बहस के बाद अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के एक नेता ने कहा था कि दिल्ली में आप पार्टी को हमने (ग़ैर-वाजिब कोशिशों से) न कुचला तो ये लोग हमें आगे बीस वर्ष और यहाँ सत्ता में नहीं आने देंगे।

मेरा ख़याल है भाजपा की इस कुटिल नीति ने आप को सहानुभूति ही दिलवाई है। बाक़ी उनका काम बोलता है। तीन साल अभी उनके हाथ में हैं। अगर पंजाब में आप पार्टी की सरकार बनी तो दिल्ली में केंद्र का दमन कम होगा और, नतीजतन, यहाँ और बेहतर काम की उम्मीद बांधी जा सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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जागरण का मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने पेड न्यूज करने के धंधे को कुबूल कर लिया

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में जागरण के सम्पादक-मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने कहा है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के मतदान से पहले जागरण द्वारा शाया किया गया एग्ज़िट पोल उनके विज्ञापन विभाग का काम था, जो वेबसाइट पर शाया हुआ। (“Carried by the advertising department on our website”) माने साफ़-साफ़ पेड सर्वे!

दूसरे शब्दों में जागरण ने पैसा लिया (अगर लिया; किससे, यह बस समझने की बात है) और कथित मत-संग्रह किसी अज्ञातकुलशील संस्था से करवा कर शाया कर दिया कि चुनाव में भाजपा की हवा चल रही है। जैसा कि स्वाभाविक था, इस फ़र्ज़ी एग्ज़िट पोल को भाजपा समर्थकों-प्रचारकों ने सोशल मीडिया पर हाथों-हाथ लिया और अगले चरण के चुनाव क्षेत्रों में दूर-दूर तक पहुँचा दिया। सोशल मीडिया पर ही इसकी निंदा और चुनाव आयोग की हेठी न हुई होती तो कौन जाने कल के मतदान से पहले यह बनावटी हवा का हल्ला अख़बार में भी छपा मिलता!

उस सम्पादक से सहानुभूति होती है, जिसे बलि का बकरा बनाया गया है। व्यवहार में विज्ञापन विभाग मालिक/प्रबंधन के मातहत काम करता है। वैसे भी ऐसे सर्वे, एग्ज़िट पोल आदि पर बहुत धन व्यय होता है, “कमाई” भी होती है – इस सबसे सम्पादकीय विभाग का क्या वास्ता? यह वास्तव मालिकों-प्रबंधकों का गोरखधंधा है, जो बचे ही नहीं रहेंगे संसद में भी पहुँच जाएँगे (क्योंकि सच्चरित्र लोगों को संसद में भरने का मोदीजी का वादा है!)। वैसे भी जागरण के प्रधान सम्पादक संजय गुप्ता ख़ुद हैं। उनके पिता मेरे परिचित थे और पड़ोसी भी। उन्हें भाजपा ने राज्यसभा में भेजा था। पर असल सवाल यह है कि इस पोल की पोल खुल जाने के बाद भाजपा की “हवा” का क्या होगा? रही-सही हवा भी निकल नहीं जाएगी?

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे जाने माने पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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आजतक, अमर उजाला, जनसत्ता, न्यूज़ एक्स आदि ने जो ब्लंडर किया, उसे बता रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी

Om Thanvi : नोटबंदी से ये कमाल का भ्रष्टाचार उन्मूलन हुआ। लोग क़तारों में खड़े हैं, कुछ जान पर खेल रहे हैं और देश भर में जगह-जगह से नए नोटों की लाखों-करोड़ों में बरामदगी की ख़बरें आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि नए नोटों की बरामदगी की किसी भी रक़म पर लोगों को अविश्वास नहीं होता। कल जयपुर में 1.57 करोड़ के नोट (1.38 करोड़ के नए) पकड़े गए, दशमलव जाने कहाँ उड़ गया और आजतक, अमर उजाला, जनसत्ता, न्यूज़ एक्स आदि में 157 और 138 करोड़ की ख़बर शाया हो गई।

कहा जा सकता है कि टीवी-अख़बारों को तथ्य जाँचने चाहिए, पर इसका दूसरा पहलू यह है कि नोटों की तस्करी नोटबंदी में बहुत आम चीज़ हो गई है। पता नहीं कितने बैंक कर्मचारी इसमें पतित, कितने मालामाल हो गए। कमोबेश सारा काला धन सफ़ेद हो गया। इस गोलमाल में जो पकड़े गए, उनसे उनकी तादाद बहुत ज़्यादा होगी जो नहीं पकड़े जा सके। अब बैंकों के सीसीटीवी खंगाले जा रहे हैं (पीएम का कथित “स्टिंग”!)। और तो और, जनता तक पहुँचें न पहुँचें नए नोट आतंकवादियों तक पहुँच चुके हैं। जब नोटों की कालाबाज़ारी हो रही है तो क़ीमत देकर कोई भी ख़रीद, बदलवा सकता है। कहना न होगा, कांग्रेस के वक़्त भी ख़ूब घोटाले हुए, मगर यह नोटबंदी भी भ्रष्टाचार का मामूली हादसा नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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ओम थानवी ने पूछा- ‘ऑपरेशन जिंजर’ की विस्फोटक खबर को हमारा मीडिया इतना दबकर क्यों दिखा रहा?

Om Thanvi : भाषणबाज़ी, नारों और पोस्टरबाज़ी में कुछ ऐसा संदेश देने की कोशिश हुई मानो सैनिक कार्रवाई देश ने नहीं, भाजपा ने की हो! लेकिन ‘पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘पहली बार पाकिस्तान को घर में घुस कर मारा’ वाले बड़बोलेपन की पोल “ऑपरेशन जिंजर” के दस्तावेज़ी सबूतों ने खोलकर रख दी है। मनमोहन सिंह शासन में सेना ने 2011 में बदले की वह सनसनीखेज़ कार्रवाई अंजाम दी थी। हाँ, उस पर शासन का बड़बोलापन नहीं दिखा; न सबूत माँगे गए न दिए गए। जबकि हाल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का इतना हल्ला ख़ुद सरकार ने मचा दिया कि लोग (देश में भी, विदेश में भी) दावों की पुष्टि की माँग करने लगे।

“ऑपरेशन जिंजर” की सर्जिकल स्ट्राइक (उसे नाम कुछ भी दिया गया हो) की विस्फोटक ख़बर को हमारा मीडिया इतना दबकर क्यों दिखा रहा है? ज़्यादातर अख़बारों में उसका फ़ालोअप भी नहीं है। कल रात को बस वीर सांघवी ‘पैनल’ चर्चा करते नज़र आए। बाक़ी दहाड़ने वाले एंकर शायद इतवार की छुट्टी मना रहे थे। जो हो, इस स-सबूत ख़ुलासे ने सैनिक कार्रवाई के चुनाव प्रचार में इस्तेमाल के भाजपाई मंसूबे पर पानी फेर दिया है। “ऑपरेशन जिंजर” पर ‘हिंदू’ ख़बर का ब्योरा आज हिंदी में ‘भास्कर’ ने इस तरह प्रकाशित किया है:

नई दिल्ली. इंडियन आर्मी ने 2011 में पाकिस्तानी आर्मी के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन चलाया था। यह दावा ‘द हिंदू’ अखबार ने अपनी रिपोर्ट में किया है। इसमें कहा गया कि इंडियन कमांडोज ने एलओसी पार करके 6 जवानों की शहादत का बदला लिया था। इसे ‘ऑपरेशन जिंजर’ नाम दिया गया था। इसमें 8 पाकिस्तानी जवानों को मार गिराया गया था। हमारे जवान तीन के सिर काटकर भारत लाए थे।

अखबार ने 2011 के इस ऑपरेशन के ऑफिशियल डॉक्युमेंट्स, वीडियो और फोटोग्राफ्स के आधार पर पुख्ता सबूत होने का दावा किया है। इसमें एम्बुश, ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने, सर्जिकल स्ट्राइक और निगरानी के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई थीं। जिंजर ऑपरेशन के लिए पाकिस्तान की तीन पोस्ट को चुना गया था।

बता दें कि 18 सितंबर को उड़ी के आर्मी ब्रिगेड हेडक्वार्टर पर आतंकियों ने हमला किया था। इसमें 19 जवान शहीद हो गए थे। चारों आतंकियों को मार गिराया गया। इसकी जवाबी कार्रवाई में 28-29 सितंबर की रात भारत ने एलओसी पार कर पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक किया। 38 आतंकी मारे गए। तब से ऐसी कार्रवाई के दावे हो रहे हैं। एनसीपी चीफ शरद पवार ने कहा था कि यूपीए के दौरान चार बार सर्जिकल स्ट्राइक हुआ था। कुछ कांग्रेसी नेताओं ने भी ऐसे ही दावे किए।

क्यों किया गया था यह ऑपरेशन?

– अखबार के मुताबिक, 30 जुलाई, 2011 को कुपवाड़ा की गूगलधर चोटी पर स्थित इंडियन आर्मी पोस्ट पर पाकिस्तानी बॉर्डर एक्शन टीम (बीएटी) ने हमला किया था। इस हमले में 5 भारतीय जवान मौके पर शहीद हो गए थे। बीएटी दो भारतीय जवान हवलदार जयपाल सिंह अधिकारी और लांस नायक देवेंंद्र सिंह के सिर काटकर ले गई थी। इसकी जानकारी 19 राजपूत बटालियन के जख्मी जवान ने दी थी। ये जवान भी हॉस्पिटल में शहीद हो गया था।

आर्मी के किस अफसर ने बनाई थी स्ट्रैटजी

– अखबार के मुताबिक, कुपवाड़ा बेस 28 डिवीजन के चीफ रहे रिटायर्ड मेजर जनरल एसके चक्रवर्ती ने भारत की सर्जिकल स्ट्राइक की प्लानिंग की थी। चक्रवर्ती ने कार्रवाई की पुष्टि की है, लेकिन ज्यादा जानकारी देने से इनकार कर दिया।

मंगलवार का दिन चुना था?

– अखबार ने ऑपरेशन जिंजर को अंजाम देने वाले आर्मी अफसर के हवाले से लिखा- “हमने इसके लिए 30 अगस्त को मंगलवार का दिन चुना था, क्योंकि पहले हमने इस दिन कारगिल वॉर समेत हमेशा जीत हासिल की थी। यह ऑपरेशन ईद से एक दिन पहले किया गया, क्योंकि पाकिस्तान को इस वक्त हमले की उम्मीद ना के बराबर थी।”

कैसे दिया इस ऑपरेशन को अंजाम

– अखबार के मुताबिक, इस कार्रवाई को 25 पैरा कमांडो ने अंजाम दिया था। ये लोग उनके लॉन्च पैड पर सुबह 29 अगस्त को 3 बजे पहुंच गए थे और दूसरे दिन 30 अगस्त सुबह तक रहे। यहां इन्होंने लैंड माइंस बिछाईंं और 30 अगस्त को सुबह 7 बजे तक इंतजार किया। जब इन्हें तीन पाकिस्तानी जवान दिखे और सुनिश्चित किया कि एम्बुश वाली जगह की तरफ आ रहे हैं। तब तक कमांडो इंतजार करते रहे। लैंडमाइंस धमाके में वह चारों जख्मी हो गए। उसके बाद ग्रेनेड और गोलियां दागी गईं।

– रिपोर्ट के मुताबिक, एक पाकिस्तानी जवान भागने में सफल रहा। इंडियन कमांडो ने दौड़कर बचे तीन जवानों के सिर काट लिए। ये अपने साथ उनके हथियार और पर्सनल चीजें भी ले आए। इसके बाद जवानों की बॉडी के नीचे आईईडी बिछा दी। यह ऑपरेशन करीब 45 मिनट चला।

– रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद इंडियन आर्मी की पहली टुकड़ी सुबह 7.45 तक लौट आई। इसके बाद दूसरी टीम दोपहर 12 बजे और तीसरी टुकड़ी 2.30 बजे तक लौटी। इस हमले में कुल 8 पाकिस्तानी जवान मारे गए थे, जबकि दो या तीन गंभीर रूप से जख्मी हुए।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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कारगिल जीतने वाले रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने तो कभी अपना अभिनंदन नहीं कराया

Arvind K Singh :  पिछले तीन दशक में कारगिल से बड़ी जंग तो कोई और हुई नहीं..उसमें बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई। मैने भी उसे कवर किया था। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि उस दौर के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने इस मुद्दे पर अपना अभिनंदन समारोह कराया हो….अगर गलत हूं तो बताइएगा। फिर रक्षामंत्री जी आपने ऐसा क्या कर दिया। न फैसला आपका, न उसे लागू कराने गए आप…जो काम जिसने किया है उसको देश की जनता दिल से शुक्रिया कर रही है। आप तो इसे राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं वह भी उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हो रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक के मसलेपर कड़ा फैसला लेने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री मोदी को ही मिलेगा किसी और को नहीं।

Om Thanvi : उत्तर प्रदेश के चुनाव माहौल में सर्जिकल कार्रवाई को भुनाने की भाजपा की कोशिश अप्रत्याशित नहीं है, पर अफ़सोसनाक ज़रूर है। भाजपा नेताओं द्वारा लखनऊ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर आदि शहरों में टाँगे गए बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर सर्जिकल कार्रवाई के विशुद्ध राजनीति इस्तेमाल के जीते-जागते प्रमाण हैं। इन पोस्टरों के हीरो सैनिक नहीं हैं, प्रधानमंत्री मोदी केंद्र में हैं जो राम के रूप में चित्रित हैं, नवाज़ शरीफ़ रावण हैं और केजरीवाल विभीषण।

आज लखनऊ और आगरा में रक्षामंत्री पर्रिकर के अभिनंदन में जो समारोह हुए, वहाँ भी हर होर्डिंग पर रक्षामंत्री के साथ गृहमंत्री राजनाथ सिंह (लखनऊ सांसद) और अन्य छोटे-बड़े भाजपा नेताओं के चेहरे और नाम सुशोभित थे। आगरा की गलियों तक में मोदी और पर्रिकर के ‘शौर्य प्रदर्शन’ के लिए “वंदन-अभिनंदन और शत्-शत् नमन” वाले पोस्टर सजे।  इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुज़फ़्फ़रनगर में “हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे” वाले होर्डिंग लगे हैं जिनमें मोदी के साथ अमित शाह को भी शामिल किया गया है। स्थानीय भाजपा नेता तो मौजूद हैं ही। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में यह सिलसिला दो रोज़ पहले शुरू हुआ है, मुंबई की एक भाजपा नेता ने तो सर्जिकल कार्रवाई की ख़बर के रोज़ ही पंजाब के मतदाताओं से समर्थन की अपील कर दी थी।

बेचारे राहुल गांधी अपनी भाषा में फँस गए, वरना उड़ी में बड़ी संख्या में हमारे सैनिक मारे गए, जवाब में सर्जिकल कार्रवाई हमने की और अब हफ़्ते भर के भीतर उसका चुनावी फ़ायदा उठाने की कार्रवाई भाजपा ने कर डाली। दलाली अच्छा शब्द नहीं, पर बेहतर भाषा में भी इसे आख़िर क्या कहा जाना चाहिए? फ़ौज़ी कार्रवाई की चुनावी ब्रांडिंग और मार्केटिंग! नहीं क्या?  हर राजनीतिक दल को भाजपा की इस मार्केटिंग को मुद्दा बना कर बेनक़ाब करना चाहिए। फ़ौज़ी कार्रवाई का राजनीतिक लाभ इंदिरा गांधी को मिला होगा और अटल बिहारी वाजपेयी को भी – लेकिन चुनाव में सैनिकों के शौर्य को अपना शौर्य बताकर वोट खींचने का काम पहली बार हो रहा है। सरेआम।

Sheetal P Singh : सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सेना के जिन वीरों ने अपने कंधे पर मोर्टार लादकर तीन किलोमीटर तक पाकिसतान की सीमा में पैदल मार्च किया, शत्रुओं के कैम्पों पर गोले दागकर उनका सफ़ाया किया, देसभगत पारटी ने देस के कोने कोने में उनके पोस्टर चपकाने का काम किया है। पहले चरण में यू पी उततराखंड पंजाब और गोवा में ये पोस्टर लगाये जा रहे हैं! आप भी आइये और वीरों के चित्र पर पुष्पगुच्छ चढ़ाइये।

Nadim S. Akhter : “खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा वाली कहावत भूल जाइए. अब बोलिए खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी. मतलब जान दे हमारे सैनिक और चुनावी फसल काटे मोदी जी. इसी की तो आशंका थी, यही तो हो रहा है. सैनिकों की जान के साथ भी राजनीति ! धिक्कार है ऐसी ओछी राजनीति पे. क्या मोदी जी के हनुमान इस पोस्टर पर ये नहीं लिख सकते थे कि —देश के लिए जान देने वाले सैनिकों को नमन —- गौर से देखिए. सैनिकों की जगह वे मोदी जी और पर्रिकर जी को शत-शत नमन कर रहे हैं. तभी तो कह रहा हूं-  खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी.”

पत्रकार द्अरविंद कुमार सिंह, ओम थानवी, शीतल पी. सिंह और नदीम एस अख्तर की एफबी वॉल से.

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ओम थानवी की मनमोहन-मोदी संबंधी यह पोस्ट फेसबुक पर हुई वायरल

Om Thanvi : क्यों चुप रहे मनमोहन, क्यों बोलें मोदी? (एक प्रशासक की डायरी का पन्ना: पढ़ने को मिला था, नाम न देने की शर्त पर यहाँ साझा करता हूँ!)

1. जब देश जान चुका है कि भारत पाकिस्तान से डरता नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक से अभी मुँहतोड़ जवाब दिया गया है और पहले भी। जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब भी अकधिक बार ऐसे ही धावा बोला गया था। लेकिन सवाल मन में यह आता है कि तब मनमोहन सिंह आख़िर चुप क्यों रहे?

2. उस वक़्त भी जब-जब ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक हुई, तत्कालीन विपक्ष यानी भाजपा से सरकार ने जानकारी साझा की थी। इस जानकारी के बावजूद भाजपा नेता मनमोहन सिंह पर लगातार वार करते रहे, उन्हें कायर तक कहा।

3. सवाल फिर वही है – कि पाकिस्तान को सबक़ सिखाने के बावजूद मनमोहन सिंह चुपचाप भाजपा के हाथों अपमान क्यों सहते रहे?

4. क्या यह सिर्फ़ संचार कौशल न होने का मामला था या जनता से संवाद स्थापित करने की नाकामी थी? या फिर सोच-विचार कर चुप रहने का सायास फ़ैसला था?

5. हम लोग, जो उस वक़्त की सरकार की अंदरूनी जानकारी रखते हैं, जानते हैं कि ये मनमोहन सिंह का दो-टूक फ़ैसला था कि देशहित में हमें चुप रहना चाहिए।

6. दरअसल, देशभक्ति चिल्लाने, ललकारने और सफलता मिलने पर अपनी पीठ ख़ुद ठोकने का नाम नहीं होती।

7. देश की ख़ातिर अक्सर चुपचाप क़ुरबानी देनी पड़ती है और उफ़्फ़ तक न करते हुए बहुत कुछ सह जाना पड़ता है।

8. ऐसे बहुत लोग हैं जो ज़िम्मेदारी के पदों पर रहे हैं, ज़ाहिर है वे वे बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन देशहित में चुप हैं, चुप रहेंगे।

9. मनमोहन सिंह की समझ यह थी कि युद्धोन्माद पैदा होने से भारत विकास के रास्ते से भटक जाएगा, हमारी तरक़्क़ी रुक जाएगी ।

10. इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइक कर सबक़ दिया, लेकिन इसकी चर्चा नहीं की ।

11. इस नीति के चलते पाकिस्तान को यक़ीनन सबक़ मिला। 2010 के बाद कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं हुई। कश्मीर में माहौल इस तरह सामान्य हुआ कि घाटी में पर्यटकों की बहार आ गयी । लेकिन ढोल न पीटकर युद्धोन्माद से बचा गया, आपसी तनाव भी नहीं बढ़ा और विकास की यात्रा में कोई रुकावट नहीं आने पाई। ख़ुद कुछ नुक़सान उठाया, लेकिन देश को बचाते रहे।

12. भारतीय लोकज्ञान में नीलकंठ की परम्परा सभी जानते हैं, जब शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए विष अपने गले उतार लिया था।

13. नीलकंठ की ज़रूरत हमें आज भी है, आगे भी रहेगी।

14. मोदीजी को इसे समझना होगा। वे इस देश का नेतृत्व हैं। पाकिस्तान को एक सबक़ वे सिखा चुके। ज़रूरत हुई तो और भी सिखाएँ। लेकिन भारत की प्रगति को बरक़रार रखना भी उनकी ही ज़िम्मेदारी है।

15. जुनून भी कभी ज़रूरी हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान को यह सुकून नहीं मिलना चाहिए कि उसने भारत के विकास-रथ को रोक दिया। ऐसा हुआ तो अंततः वह अपने मक़सद में कामयाब माना जाएगा ।

16. यह हमेशा याद रखें की भारत पिछले सत्तर साल में न टूटा है, न डरा है, न विफल हुआ है। 17. भय की भाषा बोलना और भय जगाना कमज़ोरी की निशानी है। मज़बूत राष्ट्र चुपचाप जवाब देते हैं और अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हैं।

‘मजाज़’ का शे’र है –
दफ़्न कर सकता हूँ सीने में राज़ को
और चाहूँ तो अफ़साना बना सकता हूँ।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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युद्ध के लिए आतुर एबीपी न्यूज और इसके एडिटर मिलिंद खांडेकर की ओम थानवी ने कुछ यूं ली खबर

Om Thanvi : भारत का कथित वार रूम। तीनों सेनाध्यक्ष और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार। मोदी को बताया जा रहा है कि पाकिस्तान पर हम किस तरह हमला बोलेंगे। ख़बर कहती है “रेत के मॉडल” बनाकर समझाया गया है! रेत के मॉडल? हमले की इतनी सुविचारित योजना? वह भी रक्षामंत्री की अनुपस्थिति में? और योजना की या उसकी बैठक की ख़बर हमले से पहले टीवी को? … ख़बरों के नाम पर क्या-क्या नहीं हो रहा है!

Mohd Javed : सर Om Thanvi, आपको पढ़-लिखकर बहुत सीखते हैं लेकिन इसमें ग़लत क्या है? रिपोर्टर अपने सोर्स के हवाले से ख़बर चलाता है, जो उसकी बुनियादी ड्यूटी है. जो रिपोर्टर को पता चलता है उसे वो रिपोर्ट करता ही है. ये ख़बर इसकी तस्दीक़ बिलकुल नहीं करती कि हमला हो ही जाएगा.. Milind Khandekar सर ने भी ‘युद्ध के हालात’ में ऐसा होगा, ये लिखा ना कि ये कि युद्ध हो ही रहा है.. 17 जवान मार दिए गए.. इतने बड़े हमले के बाद PM इस तरह की बैठक ले सकते हैं.. इस पोस्ट में ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि ये पत्रकारिता के उसूलों के ख़िलाफ़ हो!

Om Thanvi : मिलिंद ने किसी ख़बर का हवाला दिया है, ख़बर लिखी नहीं है। दूसरे, अगर मान भी लें कि वार का मंज़र है, वार रूम स्थापित हो चुका है, पर रक्षामंत्री की मौजूदगी के बग़ैर? कम्प्यूटर और जीपीएस के ज़माने में रेत के मॉडल?

सौजन्य : फेसबुक

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ओम थानवी ने टाइम्स नाऊ वालों के बुलाने पर भी डिबेट में न जाने के कारणों का किया खुलासा

Om Thanvi : पिछले कुछ हफ़्तों से टाइम्ज़ नाउ से फ़ोन आता है कि अर्णब गोस्वामी के ‘न्यूज़ आवर’ में शिरकत करूँ। पर मेरा मन नहीं करता। एक दफ़ा समन्वयक ने कहा कि आप हिंदी में बोल सकते हैं, अर्णब हिंदी भी अच्छी जानते हैं आपको पता है। मुझे कहना पड़ा कि उनकी हिंदी से मेरी अंगरेज़ी बेहतर है। फिर क्यों नहीं जाता? आज इसकी वजह बताता हूँ। दरअसल, मुझे लगता है अर्णब ने सम्वाद को, सम्वाद में मानवीय गरिमा, शिष्टता और पारस्परिक सम्मान को चौपट करने में भारी योगदान किया है।

हम बोलने के अधिकार की बहुत बात करते हैं, पर उसका वध देखना हो तो ‘न्यूज़ आवर’ शायद सर्वश्रेष्ठ जगह होगी। मैं अर्णब के आग्रहों-दुराग्रहों की बात नहीं करता (किस पत्रकार के नहीं होते?), लेकिन एक शोर पैदा करने की हवस में वे किसी ‘मेहमान’ को चुन कर थानेदार की तरह हड़काएँगे, किसी को बोलने न देंगे, बाक़ी को कहेंगे कि जब चाहें बिना बारी बहस में कूदते रहें। कोई भी समझ सकता है कि इससे एक हंगामे का दृश्य तैयार होता है, जो स्वाभाविक ही भीड़ को खींचता है (भगवतीचरण वर्मा की कहानी ‘दो बाँके’ याद नहीं आपको?)। माना कि यह व्यापार है, पर व्यापार और चैनल भी करते हैं। देखना चाहिए कि किसकी मर्यादा कहाँ है।

इसके अलावा मेरा स्पष्ट सोचना यह है कि सांप्रदायिकता, छद्म राष्ट्रवाद, कश्मीर और पाकिस्तान आदि अत्यंत नाज़ुक मसलों पर निहायत ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैया आग भले न लगाए (जिसकी लपटें परदे पर अर्णब को बहुत प्रिय हैं), लोगों में दुविधा, द्वेष, अलगाव, रंजिश और घृणा ज़रूर पैदा कर सकता है। क्या इसे हम सार्थक पत्रकारिता कहेंगे?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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‘आप’ सिद्धू को सीएम का चेहरा बना रही तो इससे उसकी दरिद्रता ज़ाहिर होती है : ओम थानवी

Om Thanvi : क्या आप पार्टी सचमुच नवजोत सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री का चेहरा बना रही है? अगर ऐसा है तो इससे आप पार्टी की दरिद्रता ही ज़ाहिर होती है। जैसा कि सुनते हैं, पंजाब में पार्टी की ज़बरदस्त साख पहले ही क़ायम हो चुकी है। फिर सिद्धू उसे क्या भोगने आ रहे हैं? ‘आप’ भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा से दूर रहते हुए पनपी पार्टी है। जबकि सिद्धू हिंसा के ऐसे मामले में शामिल रहे हैं, जिसमें उनके ही शहर के एक नागरिक को जान से हाथ धोना पड़ा था।

उच्च न्यायालय ने सिद्धू को उस ग़ैरइरादतन हत्या का अपराधी ठहराया। ज़िल्लत के साथ उन्हें लोकसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। फिर सिद्धू भरोसे के राजनेता भी नहीं। उनकी अमृतसर की सीट अरुण जेटली को दे दी गई तो कहते हैं उन्होंने अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार की जड़ें काटीं। हाल में पहले उन्हें राज्यसभा में लाया गया, शायद इसलिए कि पंजाब चुनाव में नुक़सान न पहुँचाएँ। तीन महीने के भीतर उन्होंने अपनी ‘माई-बाप’ पार्टी को फिर पीठ दिखा दी। ऐसा व्यक्ति ‘आप’ के लिए कैसे भरोसे का साबित होगा?

‘आप’ में अनेक नेता ऐसे हैं जिन्हें पूरा पंजाब जानता है। कँवर संधू जैसे कार्यकर्ताओं की सामाजिक ही नहीं, बौद्धिक छवि भी बड़ी है। इस मुक़ाम पर कहाँ केजरीवाल हँसोड़-लपोड़ सिद्धू के चक्कर में पड़ गए (अगर पड़ गए)!

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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मेरे बारे में सोशल मीडिया पर अफवाह उड़ाकर चरित्र हनन का काम सुधीर चौधरी ने किया था : ओम थानवी

Om Thanvi : जो लोग पत्रकारिता के पतन पर शोध करते हों, वे ज़ी न्यूज़ के प्रधान संपादक के कृत्यों में एक प्रसंग और जोड़ कर रख सकते हैं। इसका भुक्तभोगी मैं स्वयं हूँ। कुछ महीने पहले मेरे बारे में सोशल मीडिया में एक अफवाह उड़ी की महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी के कारण मुझ पर हमला हुआ या मेरे साथ मारपीट हुई। सचाई यह है कि किसी के साथ आज तक हाथापाई तक नहीं हुई है। वह दरअसल डॉ नामवर सिंह के जन्मदिन समारोह की घटना थी, जहाँ साहित्य और पत्रकारिता पर ही बात हो रही थी। किसी ने जाने क्यों (दुश्मन कम तो नहीं!) वह अफवाह उड़ाई। उस सरासर अफवाह को सच्ची घटना मानकर अपने सोशल मीडिया खाते (ट्विटर) पर किसी और पत्रकार ने नहीं, श्रीमान सुधीर चौधरी ने चलाया। यह चरित्र-हनन का प्रयास नहीं था तो क्या था?

मुझे कोई हैरानी न हुई कि ज़ी-संपादक ने जानने की कोशिश तक नहीं की (क्यों करते!) कि उस वक्त वहां हिंदी के अजीम लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह, विष्णु नागर और पंकज बिष्ट भी मौजूद थे। अफवाह उड़ने पर नागरजी ने फेसबुक पर लिखा कि हमले या मारपीट की बात झूठ है। देर से पता चला कि पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में ‘सोशल मीडिया की असामाजिकता’ शीर्षक से टिप्पणी लिखी। बिष्टजी ने लिखा: “पिछले दिनों एक घटना सोशल मीडिया को लेकर ऐसी घटी जिसे इसके दुरुपयोग की संभावनाओं का निजी अनुभव कहा जा सकता है। यह छिपा नहीं है कि इस मीडिया का, विशेष कर पिछले दो वर्षों से, विरोधियों को आतंकित करने, चुप करने, बदनाम करने और आम जनता को भ्रमित करने के लिए अत्यंत आक्रामक तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। विशेषकर भाजपा-आरएसएस समर्थकों ने इस काम में महारत हासिल कर ली है।”

यह किस्सा भी चौधरी के खाते में जमा रहे, इसलिए लिख दिया। सनद भी रहे।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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ज़ी न्यूज़ के खिलाफ एक्शन लेने के लिए जाने-माने लोगों ने की अपील

Om Thanvi : देश के नागरिकों को देशद्रोही ठहराने वाले ज़ी न्यूज़ के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने के बाबत नसीरुद्दीन शाह, शुभा मुद्गल, प्रशांत भूषण, शर्मिला टैगोर, जॉन दयाल, शबनम हाशमी आदि की अपील। भोले लोग हैं जो इस सरकार से ऐसी उम्मीद लगा बैठते हैं। सरकार ने ज़ी संपादक की सरकारी सुरक्षा की प्रत्यक्ष व्यवस्था कर रखी है; अप्रत्यक्ष क्या है किसे मालूम? पढ़ें द हिंदू में प्रकाशित खबर….

‘Zee News flouting ethical codes of conduct’

Prominent personalities from different spheres of work on Thursday accused the Zee News of flouting ethical codes of journalistic conduct and conducting relentless tirade against Nivedita Menon and Gauhar Raza. In a joint statement, they urged the Press Council of India and the Broadcast Association to take note of and initiate necessary action against the channel. Among those who released the statement are Nasiruddin Shah, Prashant Bhushan, Sharmila Tagore, Subha Mudgal, John Dayal and Shabnam Hashmi.

“It is shocking that Zee News has targeted well-known academics who are widely respected public figures. Over the past week, Nivedita Menon, a feminist political scientist, writer, and translator, and most recently, Gauhar Raza, scientist, poet and filmmaker, have been labelled as ‘anti-national’ [desh drohi] by the channel,” the statement said.

Demanding an apology from the channel, the joint statement said Mr. Raza was portrayed as part of “Afzal-loving poets’ gang.” In both cases, decontextualised video clippings of these individuals’ appearances in public events have been aired and their names repeatedly flashed through evening bulletins, which is highly irresponsible.

“We also appeal to the Centre and the Delhi government to initiate criminal proceedings against the channel for putting a citizen’s life under threat,” the statement said. Among those who released the statement are Nasiruddin Shah, Prashant Bhushan, Sharmila Tagore, Subha Mudgal, John Dayal and Shabnam Hashmi.

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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विश्वदीपक का त्यागपत्र हमारी पत्रकारिता की खतरनाक फिसलन उजागर करने वाला एक दस्तावेज है

Om Thanvi : ज़ी न्यूज़ के पत्रकार विश्वदीपक को मैं अच्छी तरह जानता हूँ। उन्होंने जनसत्ता के लिए कश्मीर जाकर वह रिपोर्टिंग की, जिसे करने साहस तब लोग नहीं कर पाते थे। उन्होंने बीबीसी लंदन, जर्मनी के डॉयचे वेले और आजतक जैसे प्रतिष्ठानों में काम किया। ज़ी न्यूज़ में उनका जाना हैरान कर गया था, पर वहां से जिस साहस और प्रतिरोध साथ वे निकले हैं उससे पत्रकारिता में नैतिक स्वर के कहीं बने रहने की उम्मीद बनती है।

वे हताश न हों, उनकी प्रतिभा को निश्चय बेहतर अवसर मिलेंगे। बहरहाल, बुरे दिनों में बुरी पत्रकारिता की सचाई बयान कर उन्होंने अहम काम किया है। उनका त्यागपत्र यहाँ पूरा उद्धृत है, जो हमारी पत्रकारिता की खतरनाक फिसलन उजागर करने वाला एक दस्तावेज है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

ये है विश्वदीपक का इस्तीफानामा…

प्रिय ज़ी न्यूज़,

एक साल 4 महीने और 4 दिन बाद अब वक्त आ गया है कि मैं अब आपसे अलग हो जाऊं. हालांकि ऐसा पहले करना चाहिए था लेकिन अब भी नहीं किया तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगा.

आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो किसी भावावेश, गुस्से या खीझ का नतीज़ा नहीं है, बल्कि एक सुचिंतित बयान है. मैं पत्रकार होने से साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूं जिसके नाम अंध ‘राष्ट्रवाद’ का ज़हर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है. मेरा नागरिक दायित्व और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस ज़हर को फैलने से रोकूं. मैं जानता हूं कि मेरी कोशिश नाव के सहारे समुद्र पार करने जैसी है लेकिन फिर भी मैं शुरुआत करना चहता हूं. इसी सोच के तहत JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किए गए अंध राष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफा देता हूं. मैं चाहता हूं इसे बिना किसी वैयक्तिक द्वेष के स्वीकार किया जाए.

असल में बात व्यक्तिगत है भी नहीं. बात पेशेवर जिम्मेदारी की है. सामाजिक दायित्वबोध की है और आखिर में देशप्रेम की भी है. मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इन तीनों पैमानों पर एक संस्थान के तौर पर तुम तुमसे जुड़े होने के नाते एक पत्रकार के तौर पर मैं पिछले एक साल में कई बार फेल हुए.

मई 2014 के बाद से जब से श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कमोबेश देश के हर न्यूज़ रूम का सांप्रदायीकरण (Communalization) हुआ है लेकिन हमारे यहां स्थितियां और भी भयावह हैं. माफी चाहता हूं इस भारी भरकम शब्द के इस्तेमाल के लिए लेकिन इसके अलावा कोई और दूसरा शब्द नहीं है. आखिर ऐसा क्यों होता है कि ख़बरों को मोदी एंगल से जोड़कर लिखवाया जाता है ? ये सोचकर खबरें लिखवाई जाती हैं कि इससे मोदी सरकार के एजेंडे को कितना गति मिलेगी ?

हमें गहराई से संदेह होने लगा है कि हम पत्रकार हैं. ऐसा लगता है जैसे हम सरकार के प्रवक्ता हैं या सुपारी किलर हैं? मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं, मेरे भी है; लेकिन एक पत्रकार के तौर इतनी मोदी भक्ति अब हजम नहीं हो रही है ? मेरा ज़मीर मेरे खिलाफ बग़ावत करने लगा है. ऐसा लगता है जैसे मैं बीमार पड़ गया हूं.

हर खबर के पीछे एजेंडा, हर न्यूज़ शो के पीछे मोदी सरकार को महान बताने की कोशिश, हर बहस के पीछे मोदी विरोधियों को शूट करने की का प्रयास ? अटैक, युद्ध से कमतर कोई शब्द हमें मंजूर नहीं. क्या है ये सब ? कभी ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि पागल हो गया हूं.

आखिर हमें इतना दीन हीन, अनैतिक और गिरा हुआ क्यों बना दिया गया ?देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान से पढ़ाई करने और आजतक से लेकर बीबीसी और डॉयचे वेले, जर्मनी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद मेरी पत्रकारीय जमापूंजी यही है कि लोग मुझे ‘छी न्यूज़ पत्रकार’ कहने लगे हैं. हमारे ईमान (Integrity) की धज्जियां उड़ चुकी हैं. इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ?

कितनी बातें कहूं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ लगातार मुहिम चलाई गई और आज भी चलाई जा रही है . आखिर क्यों ? बिजली-पानी, शिक्षा और ऑड-इवेन जैसी जनता को राहत देने वाली बुनियादी नीतियों पर भी सवाल उठाए गए. केजरीवाल से असहमति का और उनकी आलोचना का पूरा हक है लेकिन केजरीवाल की सुपारी किलिंग का हक एक पत्रकार के तौर पर नहीं है. केजरीवाल के खिलाफ की गई निगेटिव स्टोरी की अगर लिस्ट बनाने लगूंगा तो कई पन्ने भर जाएंगे. मैं जानना चाहता हूं कि पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत ‘तटस्थता’ का और दर्शकों के प्रति ईमानदारी का कुछ तो मूल्य है, कि नहीं ?

दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर ऐसा ही हुआ. पहले हमने उसे दलित स्कॉलर लिखा फिर दलित छात्र लिखने लगे. चलो ठीक है लेकिन कम से कम खबर तो ढंग से लिखते.रोहित वेमुला को आत्महत्या तक धकेलने के पीछे ABVP नेता और बीजेपी के बंडारू दत्तात्रेय की भूमिका गंभीरतम सवालों के घेरे में है (सब कुछ स्पष्ट है) लेकिन एक मीडिया हाउस के तौर हमारा काम मुद्दे को कमजोर (dilute) करने और उन्हें बचाने वाले की भूमिका का निर्वहन करना था.

मुझे याद है जब असहिष्णुता के मुद्दे पर उदय प्रकाश समेत देश के सभी भाषाओं के नामचीन लेखकों ने अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरू किए तो हमने उन्हीं पर सवाल करने शुरू कर दिए. अगर सिर्फ उदय प्रकाश की ही बात करें तो लाखों लोग उन्हें पढ़ते हैं. हम जिस भाषा को बोलते हैं, जिसमें रोजगार करते हैं उसकी शान हैं वो. उनकी रचनाओं में हमारा जीवन, हमारे स्वप्न, संघर्ष झलकते हैं लेकिन हम ये सिद्ध करने में लगे रहे कि ये सब प्रायोजित था. तकलीफ हुई थी तब भी, लेकिन बर्दाश्त कर गया था.

लेकिन कब तक करूं और क्यों ??

मुझे ठीक से नींद नहीं आ रही है. बेचैन हूं मैं. शायद ये अपराध बोध का नतीजा है. किसी शख्स की जिंदगी में जो सबसे बड़ा कलंक लग सकता है वो है – देशद्रोह. लेकिन सवाल ये है कि एक पत्रकार के तौर पर हमें क्या हक है कि किसी को देशद्रोही की डिग्री बांटने का ? ये काम तो न्यायालय का है न ?

कन्हैया समेत जेएनयू के कई छात्रों को हमने ने लोगों की नजर में ‘देशद्रोही’ बना दिया. अगर कल को इनमें से किसी की हत्या हो जाती है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ? हमने सिर्फ किसी की हत्या और कुछ परिवारों को बरबाद करने की स्थिति पैदा नहीं की है बल्कि दंगा फैलाने और गृहयुद्ध की नौबत तैयार कर दी है. कौन सा देशप्रेम है ये ? आखिर कौन सी पत्रकारिता है ये ?

क्या हम बीजेपी या आरएसएस के मुखपत्र हैं कि वो जो बोलेंगे वहीं कहेंगे ? जिस वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा था ही नहीं उसे हमने बार-बार हमने उन्माद फैलाने के लिए चलाया. अंधेरे में आ रही कुछ आवाज़ों को हमने कैसे मान लिया की ये कन्हैया या उसके साथियों की ही है? ‘भारतीय कोर्ट ज़िंदाबाद’ को पूर्वाग्रहों के चलते ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ सुन लिया और सरकार की लाइन पर काम करते हुए कुछ लोगों का करियर, उनकी उम्मीदें और परिवार को तबाही की कगार तक पहुंचा दिया. अच्छा होता कि हम एजेंसीज को जांच करने देते और उनके नतीजों का इंतज़ार करते.

लोग उमर खालिद की बहन को रेप करने और उस पर एसिड अटैक की धमकी दे रहे हैं. उसे गद्दार की बहन कह रहे हैं. सोचिए ज़रा अगर ऐसा हुआ तो क्या इसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी ? कन्हैया ने एक बार नहीं हज़ार बार कहा कि वो देश विरोधी नारों का समर्थन नहीं करता लेकिन उसकी एक नहीं सुनी गई, क्योंकि हमने जो उम्माद फैलाया था वो NDA सरकार की लाइन पर था. क्या हमने कन्हैया के घर को ध्यान से देखा है ? कन्हैया का घर, ‘घर’ नहीं इस देश के किसानों और आम आदमी की विवशता का दर्दनाक प्रतीक है. उन उम्मीदों का कब्रिस्तान है जो इस देश में हर पल दफ्न हो रही हैं. लेकिन हम अंधे हो चुके हैं !

मुझे तकलीफ हो रही है इस बारे में बात करते हुए लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि मेरे इलाके में भी बहुत से घर ऐसे हैं. भारत का ग्रामीण जीवन इतना ही बदरंग है.उन टूटी हुई दीवारों और पहले से ही कमजोर हो चुकी जिंदगियों में हमने राष्ट्रवादी ज़हर का इंजेक्शन लगाया है, बिना ये सोचे हुए कि इसका अंजाम क्या हो सकता है! अगर कन्हैया के लकवाग्रस्त पिता की मौत सदमें से हो जाए तो क्या हम जिम्मेदार नहीं होंगे ? ‘The Indian Express’ ने अगर स्टोरी नहीं की होती तो इस देश को पता नहीं चलता कि वंचितों के हक में कन्हैया को बोलने की प्रेरणा कहां से मिलती है !

रामा नागा और दूसरों का हाल भी ऐसा ही है. बहुत मामूली पृष्ठभूमि और गरीबी से संघर्ष करते हुए ये लड़के जेएनयू में मिल रही सब्सिडी की वजह से पढ़ लिख पाते हैं. आगे बढ़ने का हौसला देख पाते हैं. लेकिन टीआरपी की बाज़ारू अभीप्सा और हमारे बिके हुए विवेक ने इनके करियर को लगभग तबाह ही कर दिया है.

हो सकता है कि हम इनकी राजनीति से असहमत हों या इनके विचार उग्र हों लेकिन ये देशद्रोही कैसे हो गए ? कोर्ट का काम हम कैसे कर सकते हैं ? क्या ये महज इत्तफाक है कि दिल्ली पुलिस ने अपनी FIR में ज़ी न्यूज का संदर्भ दिया है ? ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली पुलिस से हमारी सांठगांठ है ? बताइए कि हम क्या जवाब दे लोगों को ?

आखिर जेएनयू से या जेएनयू के छात्रों से क्या दुश्मनी है हमारी ? मेरा मानना है कि आधुनिक जीवन मूल्यों, लोकतंत्र, विविधता और विरोधी विचारों के सह अस्तित्व का अगर कोई सबसे खूबसूरत बगीचा है देश में तो वो जेएनयू है लेकिन इसे गैरकानूनी और देशद्रोह का अड्डा बताया जा रहा है.

मैं ये जानना चाहता हूं कि जेएनयू गैर कानूनी है या बीजेपी का वो विधायक जो कोर्ट में घुसकर लेफ्ट कार्यकर्ता को पीट रहा था ? विधायक और उसके समर्थक सड़क पर गिरे हुए CPI के कार्यकर्ता अमीक जमेई को बूटों तले रौंद रहे थे लेकिन पास में खड़ी पुलिस तमाशा देख रही थी. स्क्रीन पर पिटाई की तस्वीरें चल रही थीं और हम लिख रहे थे – ओपी शर्मा पर पिटाई का आरोप. मैंने पूछा कि आरोप क्यों ? कहा गया ‘ऊपर’ से कहा गया है ? हमारा ‘ऊपर’ इतना नीचे कैसे हो सकता है ? मोदी तक तो फिर भी समझ में आता है लेकिन अब ओपी शर्मा जैसे बीजेपी के नेताओं और ABVP के कार्यकर्ताओं को भी स्टोरी लिखते समय अब हम बचाने लगे हैं.

घिन आने लगी है मुझे अपने अस्तित्व से. अपनी पत्रकरिता से और अपनी विवशता से. क्या मैंने इसलिए दूसरे सब कामों को छोड़कर पत्रकार बनने का फैसला बनने का फैसला किया था. शायद नहीं.

अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या तो मैं पत्रकारिता छोड़ूं या फिर इन परिस्थितियों से खुद को अलग करूं. मैं दूसरा रास्ता चुन रहा हूं. मैंने कोई फैसला नहीं सुनाया है बस कुछ सवाल किए हैं जो मेरे पेशे से और मेरी पहचान से जुड़े हैं. छोटी ही सही लेकिन मेरी भी जवाबदेही है. दूसरों के लिए कम, खुद के लिए ज्यादा. मुझे पक्के तौर पर अहसास है कि अब दूसरी जगहों में भी नौकरी नहीं मिलेगी. मैं ये भी समझता हूं कि अगर मैं लगा रहूंगा तो दो साल के अंदर लाख के दायरे में पहुंच जाऊंगा. मेरी सैलरी अच्छी है लेकिन ये सुविधा बहुत सी दूसरी कुर्बानियां ले रही है, जो मैं नहीं देना चाहता. साधारण मध्यवर्गीय परिवार से आने की वजह से ये जानता हूं कि बिना तनख्वाह के दिक्कतें भी बहुत होंगी लेकिन फिर भी मैं अपनी आत्मा की आवाज (consciousness) को दबाना नहीं चाहता.

मैं एक बार फिर से कह रहा हूं कि मुझे किसी से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है. ये सांस्थानिक और संपादकीय नीति से जुडे हुए मामलों की बात है. उम्मीद है इसे इसी तरह समझा जाएगा.

यह कहना भी जरूरी समझता हूं कि अगर एक मीडिया हाउस को अपने दक्षिणपंथी रुझान और रुचि को जाहिर करने का, बखान करने का हक है तो एक व्यक्ति के तौर पर हम जैसे लोगों को भी अपनी पॉलिटिकल लाइन के बारे में बात करने का पूरा अधिकार है. पत्रकार के तौर पर तटस्थता का पालन करना मेरी पेशेवर जिम्मेदारी है लेकिन एक व्यक्ति के तौर पर और एक जागरूक नागरिक के तौर पर मेरा रास्ता उस लेफ्ट का है जो पार्टी द्फ्तर से ज्यादा हमारी ज़िंदगी में पाया जाता है. यही मेरी पहचान है.

और अंत में एक साल तक चलने वाली खींचतान के लिए शुक्रिया. इस खींचतान की वजह से ज़ी न्यूज़ मेरे कुछ अच्छे दोस्त बन सके.

सादर-सप्रेम,
विश्वदीपक

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मारुति-सुज़ुकी वाले अक्षरधाम Nexa Showroom का नाम Unfair Deal ज़रूर कर लें

Om Thanvi : मारुति-सुज़ुकी जैसी नामी कंपनी, बड़ा हाइ-फाइ Nexa Showroom, डीलर का नाम – Fair Deal Cars; दिल्ली में अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन के ठीक नीचे। अच्छा होता कि नाम रखते – Unfair Deal Cars! हुआ यह कि अक्तूबर 2015 में हमने उक्त शोरूम जाकर ग्यारह हजार रुपये दे एक बलेनो कार बेटे के लिए बुक करवाई। पर चंद रोज बाद और खरीदारों की राय जान बेटे को लगा कि आजमाई हुई श्कोडा ही बेहतर होगी।

कंपनी का वादा था कि बुकिंग रद्द करवाने पर बुकिंग राशि वापस कर दी जाएगी। जिस मैनेजर (नीरज गुप्ता) को पैसा दिया था, हमने उन्हें बुकिंग रद्द करने की सूचना दे दी। सोचा पैसा आ जाएगा। नहीं आया तो फोन किया। बुकिंग रद्द हो गई फोन क्यों उठाएंगे? उलटे स्टाफ से फोन आते रहे, जैसे कि बुकिंग अब भी कायम हो। किसी तरह डीलर का नंबर ढूंढ़ कर गुप्ता से संपर्क साधा तो जवाब मिला, बैंक खाते का ब्योरा भेज दें तब एक हफ़्ते बाद मिल सकेगा।

बेटे ने इ-मेल से बैंक-ब्योरा भेज दिया। फिर लम्बा वक्फा। पैसा नहीं मिला। फिर फोन किया। अब गुप्ताजी बोले, ऐसा करें आप रोज इधर से जाते हैं, जाते हुए रिफंड खुद ही ले लीजिएगा। पर जाने से पहले जब-जब फोन पर बात करनी चाही, एक बार भी फोन नहीं उठाया। एसएमएस का जवाब भी नहीं। कल आखिर उधर जा ही निकला। तो बन्दे ने वाउचर बनाकर कहा, क्या करें कैशियर ही नहीं है।

मैं वाउचर सहित लौट आया, भीतर का पत्रकार जागा, आज सुबह एक फोन ऊपर के एक जिम्मेदार अधिकारी को मिलाया कि क्या अदालत के जरिए होगी इस मामूली धन की धन-वापसी? … अभी पैसा घर दे गए हैं। लेकिन इस अनुभव पर मारुति-सुज़ुकी वालों को मेरा सुझाव कायम रहेगा कि कम-से-कम अक्षरधाम नेक्शा शोरूम का नाम Unfair Deal ज़रूर कर लें। लुच्चे कहीं के।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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ओम थानवी जेएनयू के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में गेस्ट फेकल्टी बने

Om Thanvi : चलिए, आपको कुछ खबर दें! जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर आज मैंने विश्वविद्यालय का सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज जॉइन किया है, गेस्ट फेकल्टी (विजिटिंग स्कॉलर) में। मेरे दादा शिक्षक रहे, मेरे पिताजी, चाचाजी, मामाजी … घर-परिवार में पुराना सिलसिला है। सोचा, जेएनयू जैसे शिक्षालय के परिवेश का थोड़ा अनुभव मुझे भी हासिल हो! विजिटिंग फेकल्टी में बंदिशें भी नहीं।

जनसत्ता अखबार के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए

Om Thanvi : मुझे बहुत खुशी होगी, अगर सम-विषम प्रयोग सफल होता है। लेकिन सरकार को भी चाहिए कि आवागमन के वैकल्पिक, प्रदूषण रहित, साधनों की उपलब्धि में जी-जान लगा दे। दिल्ली की छाती पर एनसीआर हलकों में धुँआ उगलते वाहनों पर नियंत्रण के लिए पड़ोसी राज्यों की सरकारों से सहयोग की गुजारिश करनी चाहिए। एक और समस्या, जिसे तुरंत हल किया जाना चाहिए। रेडियो टैक्सी एक बेहतर सुविधा के रूप में विकसित हो रही है। लेकिन अपनी सफलता पर इतरा कर कंपनियां बेजा फायदा भी उठाने लगी हैं। मसलन ऊबर (Uber) को लें। “पीक आवर” अर्थात ज्यादा भीड़ के घंटों में चार-छः गुणा किराया झटकने लगे हैं। यह किसी की मजबूरी का फायदा उठाना है, सरासर ब्लैकमेलिंग है। दूसरी कंपनियां – जैसे मेरु (Meru) – तो ऐसा नहीं करतीं। कुछ टैक्सी संचालकों को लूट की यह आजादी क्यों?

दूसरा उदहारण, जिससे रेडियो टैक्सी प्रयोग हतोत्साहित हो रहा है: टी-3 के हवाई अड्डे पर – जहाँ से अधिकांश उड़ानें संचालित होती हैं – उतर कर ऊबर या ओला टैक्सी लें तो 150 रुपये भाड़े के अतिरिक्त ठोंके जाने लगे हैं। अन्य टैक्सी संचालक – ट्रेफिक पुलिस सेवा या मेरु – यह अतिरिक्त राशि नहीं लेते। यह क्या गड़बड़झाला है? किसी ने कहा, ऊबर-ओला टैक्सी की परिभाषा में नहीं आते इसलिए उनसे एयरपोर्ट अथॉरिटी सरचार्ज वसूलने लगी है। कुछ की राय है कि मेरु आदि अन्य महँगी सेवा वाली कंपनियों ने अपना धंधा उखड़ता देख यह दबाव बनवाया है। जो कारण हो, है यह अव्वल दरजे की बेवकूफी का नियम कि मेरु पर सरचार्ज नहीं, ऊबर-ओला पर लगेगा। वह भी दस-बीस रुपये नहीं, हर भाड़े पर 150 रुपये। सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए।

Mukesh Kumar : मैं दिल्ली में प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए किए जा रहे सम-विषम फार्मूले के प्रयोग का समर्थन करता हूँ। मुझे लगता है कि ढेर सारी परेशानियों के बावजूद इस तरह के प्रयोग ज़रूरी हैं। इनकी सफलता-असफलता से सबक लेकर आगे की रणनीति बनाई जा सकती है। वैसे भी ये कोई स्थायी उपाय नहीं है। जब कभी प्रदूषण का स्तर ख़तरनाक़ सीमा तक पहुँचेगा तभी इसे हफ़्ते या पंद्रह दिनों के लिए लागू किया जाएगा। ये भी हो सकता है कि प्रयोग के बाद इसे अव्यावहारिक पाया जाए और भविष्य में लागू ही न हो। इसलिए ज़्यादा हो हल्ला मचाने के बजाय सही ढंग से इस प्रयोग को करने में सहयोग करना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार द्वय ओम थानवी और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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ओम थानवी पर भी मानहानि का मुकदमा कर चुके हैं जेटली

Om Thanvi : अखबारी काम-काज में मुझ पर दर्जनों मुकदमे हुए। सब मानहानि के। एक तो अरुण जेटलीजी ने ही किया था, जो रजामंदी में वापस हो गया। फिर भी संपादक के नाते मैंने कोई पच्चीस-तीस मुकदमों में तो जमानत करवाई होगी। तीन-चार बार गैर-जमानती वारंट भी जारी हुए, क्योंकि तय तारीखों पर अदालत न पहुँच सका। मगर न मेरा कुछ बिगड़ा, न ही कोई मुकदमा गवाही के स्तर तक पहुंचा। झंझट जरूर अनुभव होता है, जिसे पेशे का हिस्सा मान निभा जाते हैं। मुझे नहीं खयाल पड़ता कि मानहानि के हजारों मुकदमों में कितने फैसले के मुकाम तक पहुँच पाते होंगे, कितनों में मुलजिम मुजरिम साबित हुआ होगा। आपको पता हो तो बताएं।

दरअसल, मानहानि का कानून उन सड़े-गले कानूनों में है जो अंगरेजों ने अपने फायदे के लिए बनाए और जिन्हें हम ढोए चले जाते हैं। इससे न्याय नहीं मिलता। जिनके पास पैसा है, साधन हैं, वे इस कानून का इस्तेमाल विरोधी को डराने, अदालतों के चक्कर कटवाने के लिए करते हैं। इसलिए एकाध पड़ाव के बाद मुकदमा आगे नहीं बढ़ता, अक्सर वापस ले लिया जाता है क्योंकि आपराधिक मुकदमे में शिकायतकर्ता को भी हर तारीख पर हाजिर रहना पड़ता है (सिविल मुकदमे में नहीं, पर उसमें स्टाम्पड्यूटी पर पैसा बहुत खर्च होता है)।

यह बात तजुर्बे के आधार पर कह रहा हूँ, गडकरी-जेटली या किसी अन्य नेता के मुकदमों से इसका लेना-देना नहीं है। या तो यह कानून बदलना चाहिए, या इसमें मुनासिब संशोधन होना चाहिए। इसका मौजूदा स्वरूप पीड़ित को न्याय नहीं दिलाता; साधनसम्पन्न को कानून के दुरुपयोग का अवकाश जरूर सुलभ करवा देता है।

हाँ, मौजूदा विवाद के सिलसिले में यह जरूर कहना चाहता हूँ कि राजनेताओं की खाल कुछ ज्यादा मोटी होनी चाहिए। बात-बात में वे किसी लचर कानून की गोद में जा बैठें, यह शोभा नहीं देता। न इतने भर से कोई उन्हें निर्दोष मान बैठेगा। बल्कि इसमें उनकी असहिष्णुता ही प्रकट होती है। जब जांच बैठ रही है तो ईमानदारी से उसमें सहयोग क्यों न करें। इस मामले में नरेंद्र मोदी भले, जो गाली खाकर भी अदालत के पचड़े में न पड़ते हैं न दूसरों को डालते हैं!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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…सुलह होगी पंकजजी, यहां नहीं तो वहां : ओम थानवी

Om Thanvi : परसों की ही बात है। आइआइसी मेन के लाउंज में सुपरवाइजर की मेज के गिर्द हम दोनों अगल-बगल आ खड़े हुए थे। करीब, मगर अबोले। बगल वाले शख्स पंकज सिंह थे। नामवर सिंहजी के सालगिरह समारोह के दिन से हमारी तकरार थी। बहरहाल, परसों हम आमने-सामने होकर भी अपने-अपने घरों को चले गए। पर मुझे वहाँ से निकलते ही लगा कि यहीं अगली दफा हम लोग शायद गले मिल रहे होंगे। क्षणिक तकरार कोई जीवन भर का झगड़ा होती है? आज मैं इलाहाबाद आया। वे पीछे दुनिया छोड़ गए। लगता है अब वहीं मिलेंगे। आज नहीं तो कल।

पंकजजी की कविताएँ मुझे सदा अजीज रहीं। उनकी अपनी आवाज में मैंने उनकी एक रेकार्डिंग फेसबुक पर साझा की थी। उन्हें भी मेरा लिखा पसंद था। मरहूम कुबेर दत्त के कार्यक्रम में दूरदर्शन के लिए उन्होंने मेरा इंटरव्यू किया था। आइआइसी मैं अक्सर साथ ही बैठते थे। कुछ चीजों – वर्तनी, उच्चारण, शब्दस्रोत आदि – को लेकर इतने अड़ जाते थे कि सविताजी से मैं मजाक में कहता था इनके साथ आप कैसे जीती हैं, बहस में कोई इनके समक्ष गरदन भी काटकर पेश कर दे तब भी कहेंगे कि थोड़ी टेढ़ी कट गई है!

नामवरजी के जन्मदिन पर भी हम उलझे। कहा-सुनी थी, पर बात तब और बिगड़ी जब इस तकरार के किस्से में नमक-मिर्च लगाकर एक कवि (कृष्ण कल्पित/कल्बे कबीर) ने फेसबुक पर इसे मारपीट की कपोल-कल्पित कहानी बना दिया और पता नहीं क्यों पंकजजी उसका खंडन नहीं कर सके। जो हो, मैं इस किस्से के निपटारे को लेकर उम्मीदजदा था। परसों आमने-सामने हुए तो न उनमें कटुता थी, न मुझमें। महसूस हुआ कि रेत का एक पहाड़ ढहा चाहता है।शायद ढह भी गया हो। पर उससे उनकी संगत का जो लाभ मुझे मिल सकता था, अब उससे वंचित हूँ। हमेशा के लिए। एक अजब टीस के साथ। मगर यह सुलह होगी, पंकजजी। यहाँ नहीं तो वहाँ। फिलहाल उनकी स्मृति को नमन। लेखक का लिखा हमारे बीच रहता है। वह हमेशा था। रहेगा भी।

जनसत्ता अखबार के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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लो, लो, सेल्फी लो… लेते रहो, तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा! : ओम थानवी

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ अपनी स्व-छवि एकाधिक बार ली। एंगल जंचा नहीं तो घूम कर दुबारा आ गए। इस पर भीड़ घटाने की गरज से सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि जो एक बार सेल्फी ले चुके हों, कृपया दुबारा न लें। तब, अनुराग के अनुसार, मोदीजी ने उन्हें टोका – अरे, लेने दो। किसी को न रोको। दुबारा चाहते हैं, दुबारा लो। लो, लो, लो … लेते रहो। तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा!

पीएम के साथ सेल्फियाने वाले पत्रकारों को दाद मिलनी चाहिए। बेशरमी में परदा तो नहीं करते। उनसे बेहतर हैं जो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।

Sanjaya Kumar Singh : ना खाऊंगा ना खाने दूंगा… सबसे पहले पत्रकारों को औकात बताउंगा। सेल्फी में समेट दूंगा – सबको @#$%^ बनाकर घुमाउंगा। प्रेस कांफ्रेंस करूं, ना करूं, सवाल पूछने लायक नहीं छोड़ूंगा। मीडिया सलाहकार रखूं, ना रखूं, दुम हिलाने वाला बना दूंगा। मुझे दोष ना देना देशवासियों मीडिया को नंगा करके रहूंगा। (प्रधानमंत्री ने जो कहा था उसे भूल गए, जो नहीं कहा था, कर दिखाया। एक सैल्यूट तो बनता है।)

एक तरफ प्रधानमंत्री पत्रकारों के साथ सेल्फी खिंचवा रहे हैं (दरअसल पत्रकारों को धन्य होने का मौका दे रहे हैं) और दूसरी तरफ अरविन्द केजरीवाल लोगों से अपील कर रहे हैं कि दिल्ली में कहीं कूड़ा हो तो उसकी तस्वीर हमें भेजिए – हम उसे साफ करेंगे। निश्चित तारीख तक। Arvind Kejriwal जी 70 में से 67 सीटें मिल गईं तो ऐसे मगन मत रहिए। आगे के चुनाव जीतने का बंदोबस्त भी करना होता है। और काम करने से चुनाव जीते जाते तो कांग्रेस दिल्ली से साफ नहीं हो जाती। कुछ राजनीति सीखिए – भाई जान। कम से कम पत्रकारों का पटाने का कोर्स तो कर लीजिए। लाला तो आपसे पटेंगे नहीं।

Mamta Yadav : बिहार चुनावों की हार के बाद खोया नूर इस तथाकथित सेल्फी पार्टी ने वापस ला दिया। जिस बात ने मोदी के मंसूबों को आसमान तक पहुंचा दिया होगा उस शब्द का नाम है सेल्फ़ी। जिस तरह से दर्जनों पत्रकारों ने मोदी को घेर कर एक के बाद एक सेल्फ़ी खींचनी शुरू की उससे मोदी का ‘खोया हुआ नूर’ दोबारा लौट आया। लेकिन इस सबने मीडिया की गरिमा को कहां पहुंचाया तस्वीरें बताती हैं…?

Mayank Saxena : हर बार, जब सेल्फी कांड होता है, मुख्य धारा की पत्रकारिता छोड़ने पर इतना गर्व महसूस होता है कि बताया नहीं जा सकता…अगर पत्रकार के तौर पर नौकरी में होता, तो कितनी शर्मिंदगी होती, इसका अंदाज़ लगाता हूं और मुस्कुराने लगता हूं…

Vinod Sharma : I’ve known many political leaders but don’t have photos taken with any–except one with Atalji at the Minar-e-Pakistan. That I secured after it got published in several Indian newspapers in 1999. Mercifully, those weren’t the selfie days. It was to some extent the age when self-esteem mattered more than a selfie. I think newpersons scrambling for selfies with leaders and ministers must be restrained by peer groups or by their bosses at places of work. For a journalist has to be an iconoclast, not an idol worshipper.

पत्रकार ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, ममता यादव, मयंक सक्सेना और विनोद शर्मा के फेसबुक वॉल से.

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