ओम थानवी का केजरीवाल से मोहभंग, अब सिसोदिया से ही आशा!

Om Thanvi : केजरीवाल को क्या होने लगा? कभी जम्मू-कश्मीर पर केंद्र के क़ब्ज़े का समर्थन, कभी आर्थिक मन्दी में राग दरबारी। राष्ट्रवाद की भावना भरने के लिए देशभक्ति को पाठ्य-पुस्तकों में ला रहे हैं। जबकि दोनों दो अलग चीज़ें हैं। क्या वे अगले चुनाव से भय खा रहे हैं? Share on:

‘इंडिया टीवी’ कार्यकाल में अभिषेक उपाध्याय क्यों न कह सके- रजत शर्मा के लिए ‘पद्मभूषण’ रिश्वत!

ओम थानवी हरिदेव जोशी विवि के कुलपति बन रहे हैं। इस विश्वविद्यालय को राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने बंद कर दिया था। गहलोत लौटे और अब फिर से खुले विश्वविद्यालय की बागडोर ओम थानवी को सौंप दी गई। कई लोगों को इस एलान के बाद उदरशूल हो गया। उनके दर्द को समझ पाना मुश्किल नहीं …

ओम थानवी बने हरिदेव जोशी पत्रकारिता विवि के कुलपति

जनसत्ता के पूर्व संपादक ओमथानवी को हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर का पहला कुलपति नियुक्त किया गया है। इस संबंध में आदेश राज्यपाल और प्रदेश के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति श्री कल्याण सिंह ने जारी किये हैं। राज्यपाल ने राज्य सरकार के परामर्श पर ओम थानवी को कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से तीन …

ओम थानवी ने राजस्थान पत्रिका समूह को गुडबॉय कहा

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने राजस्थान पत्रिका समूह के सलाहकार संपादक पद से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने इस बात का ऐलान फेसबुक के जरिए किया है. ओम थानवी का कहना है कि पत्रिका समूह से उनका निजी नाता है पर पठन-पाठन व लेखन के मकसद के लिए पत्रिका समूह से इजाजत ले ली है. …

ज़्यादातर हिंदी पत्रकार, ख़ासकर सम्पादक, साहित्य के मामले में लगभग अनपढ़ हैं : ओम थानवी

अंगरेज़ी के अख़बार ट्रिब्यून ने हिंदी साहित्यकार कृष्णा सोबती पर पूरा पेज दिया। इससे पहले, मृत्यु के अगले रोज़, ट्रिब्यून ने कृष्णाजी पर अपूर्वानंद का लिखा स्मृतिलेख भी प्रकाशित किया था। अगर आपने ग़ौर किया हो, अंगरेज़ी अख़बारों और इंटरनेट पत्रिकाओं ने कृष्णाजी बहुत सामग्री दी। हिंदी के लेखकों से भी उन पर लिखवाया। इंडियन …

स्टीवन हॉकिंग के बहाने ‘विकलांग’ बनाम ‘दिव्यांग’ पर ओम थानवी की चर्चा, जानिए सही क्या है….

Om Thanvi : स्टीवन हॉकिंग चले गए। आइंस्टाइन के बाद सबसे लोकप्रिय वैज्ञानिक थे। उनके अंग विकल थे। लेकिन उन्हें मीडिया विकलांग नहीं, दिव्यांग कहेगा। क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री ने यह शब्द दिया है। क्या प्रधानमंत्री भाषाविज्ञानी हैं? बिलकुल नहीं। न वे मीडिया के भाषा सलाहकार हैं। फिर भी जैसे सरकार में उनका हुक्म चलता है (जो स्वाभाविक है), वैसे ही आजकल मीडिया में भी चल जाता है (जो नितांत अस्वाभाविक है)।

पत्रिका समूह में सलाहकार संपादक बने ओम थानवी बोले- ‘मेरी घर वापसी हुई है’

Om Thanvi : आज औपचारिक रूप से मैंने राजस्थान पत्रिका समूह के सलाहकार सम्पादक का ज़िम्मा संभाल लिया। ‘औपचारिक रूप से’ इसलिए कि अनौपचारिक विमर्श हफ़्ते भर पहले शुरू हो गया था! पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत मैंने पत्रिका से ही की थी। 1980 में, संस्थापक कर्पूरचंद कुलिश के बुलावे पर। तीस वर्ष पहले पत्रिका से आकर ही चंडीगढ़ में जनसत्ता का सम्पादक हुआ। वहाँ से दिल्ली आया। आप कह सकते हैं, आज घर वापसी हुई।

राजस्थान पत्रिका समूह से ओम थानवी के जुड़ने की चर्चा

जनसत्ता के प्रधान संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के बारे में चर्चा है कि वे राजस्थान पत्रिका अखबार समूह के हिस्से हो गए हैं. बताया जाता है कि उन्होंने सलाहकार संपादक के रूप में ज्वाइन किया है. उन्होंने दिल्ली में आईएनएस बिल्डिंग के दफ्तर में पत्रिका ग्रुप के वरिष्ठ मीडियाकर्मियों की एक बैठक की जिसमें संपादक भुवनेश जैन भी थे. वेपत्रिका ग्रुप की वेबसाइट कैच न्यूज के आफिस भी गए. राजस्थान पत्रिका में ओम थानवी पहले भी एक बार काम कर चुके हैं.

नेताओं के जहाजों के कारण 13 आम उड़ानें दिल्ली में उतरने नहीं दी गईं!

Om Thanvi : आख़िर एएनआइ ने ख़बर दे दी है… शनिवार की शाम ख़ास नेताओं की उड़ानों के लिए जगह बनाने की ग़रज़ से जनता को ला रही तेरह आम उड़ानें दिल्ली में उतरने नहीं दी गईं, उन्हें अन्यत्र मोड़ दिया गया। आपको याद होगा, शुक्रवार को बीकानेर से दिल्ली की उड़ान को दिल्ली से लौटा देने और जयपुर में जा खड़ा करने पर मैंने संशय ज़ाहिर किया था कि दिल्ली हवाई अड्डे पर लगता है नेताओं के विमानों की भीड़ है?

ओम थानवी बोले- सौ करोड़ मांगने वाले सुधीर चौधरी को सरकारी सुरक्षा और फर्जी आरोपों में विनोद वर्मा को जेल! (देखें वीडियो)

प्रेस क्लब आफ इंडिया में विनोद वर्मा गिरफ्तारी प्रकरण पर हुई सभा में वरिष्ठ पत्रकार ने जो कुछ कहा, उसे इस वीडियो में देख-सुन सकते हैं : ओम थानवी से ठीक पहले वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने क्या कुछ कहा, उसे भी सुनें : Share on:

द वायर के खिलाफ स्टे लेने में जय शाह कामयाब, अब कोई कुछ न लिखे-बोले!

Om Thanvi : वायर, दायर और कायर… जय अमित शाह ने अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के अनेक अतिरिक्त सिविल जजों में एक चौथे जज की अदालत में द वायर के ख़िलाफ़ दायर सिविल मुक़दमे में स्टे प्राप्त कर लिया है। कि वे रोहिणी सिंह वाली ख़बर के आधार पर आगे और कुछ किसी भी रूप में (प्रिंट, डिज़िटल, इलेक्ट्रोनिक, ब्रॉडकास्ट, टेलिकास्ट या किसी अन्य मीडिया में ख़बर, इंटरव्यू, बहस, टीवी परिचर्चा की शक्ल में, किसी भी भाषा में, न प्रत्यक्ष न अप्रत्यक्ष) मुक़दमे के अंतिम निपटारे तक कुछ भी नहीं लिखेंगे-बताएँगे।

जय शाह मामले में अख़बारों का हाल देखें, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, मुकदमे की धमकी आगे!

Om Thanvi : अख़बारों का हाल देखिए… ”छोटे शाह 100 करोड़ का मुक़दमा दायर कर देंगे” यह है सुर्खी। भ्रष्टाचार का संगीन आरोप पीछे हो गया, धमकी आगे! कल्पना कीजिए यही आरोप केजरीवाल, चिदम्बरम, वीरभद्र सिंह या किसी अन्य दुश्मन पार्टी के साहबजादे पर लगा होता?  तब मुक़दमे की धमकी की बात ख़बर की पूँछ में दुबकी होती। टीवी चैनल सिर्फ़ एक वर्ष में 16000 गुणा बढ़ोतरी को शून्य के अंक जगमगाते हुए दुहराते। दिनभर रिपोर्टर आरोपी का पीछा करते, घर-दफ़्तर पर ओबी वैन तैनात रहतीं, शाम को सरकार, संघ, वीएचपी के आदि के साथ बैठकर सरकार समर्थक पत्रकार या बुद्धिजीवी नैतिक पतन की धज्जियाँ उड़ा रहे होते।

91 वर्ष के नामवरजी ने त्रिलोचन की चुनिंदा कविताएं अपनी मजेदार टिप्पणियों के साथ सुनाईं

Om Thanvi : लीलाधार मंडलोई ने ज्ञानपीठ की गतिविधियों को गति दी है, उन्हें विविध बनाया है। कल शाम ‘वाक्’ शृंखला के तहत इंडिया हैबिटाट सेंटर में नामवर सिंह को बुलवा कर उन्होंने वहाँ मौजूद हर शख़्स की ज़िंदगी बड़ी कर दी। हिंदी की दुनिया में ऐसी भावुक घड़ियाँ कम आई होंगी।

अपने कसबे फलोदी पहुंचे ओम थानवी ने अखबारों की बदलती तासीर पर की यह टिप्पणी

अपने क़सबे फलोदी (राजस्थान) आया हुआ हूँ। 47 डिग्री की रेगिस्तान की गरमी मुझे यहाँ उतना नहीं झुलसाती जितना अख़बारों की बदलती तासीर। अजीबोग़रीब हिंदूकरण हो रहा है। जैसे देश में बाक़ी समाज हों ही नहीं। एक बड़े इलाक़े की ख़बरों के लिए तय पन्ने पर (आजकल पन्ने इसी तरह बँटे होते हैं) आज एक अख़बार में हर एक “ख़बर” किसी-न-किसी हिंदू मंदिर की गतिविधि – मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा, कलश की स्थापना, दान-पुण्य – या संतों के प्रवचनों से  लकदक है। वह पूरा का पूरा पन्ना (पृष्ठ नौ) एक ही धर्म की श्रद्धा में/से अँटा पड़ा है।

साहसपूर्ण सामग्री छापने वाला सिद्धार्थ वरदराजन का ‘वायर’ अब हिंदी में भी शुरू हो गया है

Om Thanvi : ‘वायर’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में जितनी साहसपूर्ण सामग्री छपती है, मीडिया में अन्यत्र कम मिलेगी। ‘वायर’ अब हिंदी में भी शुरू हो गया है और बहुत थोड़े वक्फ़े में उसके लेख-टिप्पणियाँ चर्चा में आने लगे। विनोद दुआ का ‘जन की बात’ एक पहचान बन गया है। बताऊँ कि ‘वायर’ एक और ख़ास बात मुझे क्या अनुभव होती है: हिंदी की अहमियत को समझना। इसकी एक वजह शायद यह हो कि उसके संस्थापक-सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन अच्छी हिंदी जानते हैं। यों हिंदी की उनकी बुनियाद पड़ी शायद उर्दू के सहारे। (बोलचाल की उर्दू, हम जानते हैं, कमोबेश हिंदी ही है। उर्दू के महान शायर फ़िराक़ गोरखपुरी तो कहते थे कि हिंदी के व्याकरण और क्रियापद लेकर बनी उर्दू हिंदी की ही एक शैली है; हालाँकि स्वाभाविक ही उर्दू के ‘विद्वान’ फ़िराक़ साहब की इस बात को पसंद नहीं करेंगे।)

न्यायमूर्ति मजीठिया ने पत्रकारों की सेवानिवृत्ति उम्र 58 से बढ़ाकर 65 कर दी थी!

Om Thanvi : दाद देनी चाहिए शरद यादव की कि संसद में पत्रकारों के हक़ में बोले, मजीठिया वेतन आयोग की बात की, मीडिया मालिकों को हड़काया। यह साहस – और सरोकार – अब कौन रखता और ज़ाहिर करता है? उनका पूरा भाषण ‘वायर‘ पर मिल गया, जो साझा करता हूँ। प्रसंगवश, बता दूँ कि मालिकों और सरकार का भी अजब साथ रहता है जो पत्रकारों के ख़िलाफ़ काम करता है। देश में ज़्यादातर पत्रकार आज अनुबंध पर हैं, जो कभी भी ख़त्म हो/किया जा सकता है। ऐसे में मजीठिया-सिफ़ारिशें मुट्ठी भर पत्रकारों के काम की ही रह जाती हैं। क़लम और उसकी ताक़त मालिकों और शासन की मिलीभगत में तेल लेने चले गए हैं। क़ानून ठेकेदारी प्रथा के हक़ में खड़ा है। 

‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ने गोवा-मणिपुर के राज्यपालों और सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस का आज दो टूक सम्पादकीय…. गोवा और मणिपुर में राज्यपालों को पहले सबसे बड़ी पार्टी के नाते कांग्रेस को सरकार बनाने को आमंत्रित करना चाहिए था। गोवा की राज्यपाल का आचरण प्रश्नाकुल है। उन्होंने समर्थन के जिन पत्रों के आधार पर पर्रिकर को मुख्यमंत्री पद की शपथ का न्योता दे दिया, वे भाजपा के साथ किसी गठबंधन में शरीक़ नहीं थे। बल्कि उनमें एक पार्टी गोवा फ़ॉर्वर्ड पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था।

दिल्ली में ‘आप’ सरकार को न कुचला गया तो बीस वर्षों तक भाजपा यहां सत्ता में न आ पाएगी!

Om Thanvi : दिल्ली में आप सरकार के दो वर्षों के कामकाज पर हिंदुस्तान टाइम्स में छपा वृहद सर्वे बताता है कि लोग मानते हैं राजधानी में भ्रष्टाचार घटा है और शिक्षा, चिकित्सा, जल-आपूर्ति और बिजली-प्रबंध के क्षेत्रों में बेहतर काम हुआ है। और, दिल्ली सरकार की यह छवि दो वर्षों तक नजीब जंग की अजीब हरकतों के बावजूद बनी है, जिन्होंने केंद्र सरकार की गोद में बैठकर निर्वाचित शासन के काम में भरसक रोड़े अपनाए।

जागरण का मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने पेड न्यूज करने के धंधे को कुबूल कर लिया

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में जागरण के सम्पादक-मालिक और सीईओ संजय गुप्ता ने कहा है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में दूसरे चरण के मतदान से पहले जागरण द्वारा शाया किया गया एग्ज़िट पोल उनके विज्ञापन विभाग का काम था, जो वेबसाइट पर शाया हुआ। (“Carried by the advertising department on our website”) माने साफ़-साफ़ पेड सर्वे!

आजतक, अमर उजाला, जनसत्ता, न्यूज़ एक्स आदि ने जो ब्लंडर किया, उसे बता रहे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी

Om Thanvi : नोटबंदी से ये कमाल का भ्रष्टाचार उन्मूलन हुआ। लोग क़तारों में खड़े हैं, कुछ जान पर खेल रहे हैं और देश भर में जगह-जगह से नए नोटों की लाखों-करोड़ों में बरामदगी की ख़बरें आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि नए नोटों की बरामदगी की किसी भी रक़म पर लोगों को अविश्वास नहीं होता। कल जयपुर में 1.57 करोड़ के नोट (1.38 करोड़ के नए) पकड़े गए, दशमलव जाने कहाँ उड़ गया और आजतक, अमर उजाला, जनसत्ता, न्यूज़ एक्स आदि में 157 और 138 करोड़ की ख़बर शाया हो गई।

ओम थानवी ने पूछा- ‘ऑपरेशन जिंजर’ की विस्फोटक खबर को हमारा मीडिया इतना दबकर क्यों दिखा रहा?

Om Thanvi : भाषणबाज़ी, नारों और पोस्टरबाज़ी में कुछ ऐसा संदेश देने की कोशिश हुई मानो सैनिक कार्रवाई देश ने नहीं, भाजपा ने की हो! लेकिन ‘पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘पहली बार पाकिस्तान को घर में घुस कर मारा’ वाले बड़बोलेपन की पोल “ऑपरेशन जिंजर” के दस्तावेज़ी सबूतों ने खोलकर रख दी है। मनमोहन सिंह शासन में सेना ने 2011 में बदले की वह सनसनीखेज़ कार्रवाई अंजाम दी थी। हाँ, उस पर शासन का बड़बोलापन नहीं दिखा; न सबूत माँगे गए न दिए गए। जबकि हाल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का इतना हल्ला ख़ुद सरकार ने मचा दिया कि लोग (देश में भी, विदेश में भी) दावों की पुष्टि की माँग करने लगे।

कारगिल जीतने वाले रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने तो कभी अपना अभिनंदन नहीं कराया

Arvind K Singh :  पिछले तीन दशक में कारगिल से बड़ी जंग तो कोई और हुई नहीं..उसमें बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई। मैने भी उसे कवर किया था। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि उस दौर के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने इस मुद्दे पर अपना अभिनंदन समारोह कराया हो….अगर गलत हूं तो बताइएगा। फिर रक्षामंत्री जी आपने ऐसा क्या कर दिया। न फैसला आपका, न उसे लागू कराने गए आप…जो काम जिसने किया है उसको देश की जनता दिल से शुक्रिया कर रही है। आप तो इसे राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं वह भी उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हो रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक के मसलेपर कड़ा फैसला लेने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री मोदी को ही मिलेगा किसी और को नहीं।

ओम थानवी की मनमोहन-मोदी संबंधी यह पोस्ट फेसबुक पर हुई वायरल

Om Thanvi : क्यों चुप रहे मनमोहन, क्यों बोलें मोदी? (एक प्रशासक की डायरी का पन्ना: पढ़ने को मिला था, नाम न देने की शर्त पर यहाँ साझा करता हूँ!)

1. जब देश जान चुका है कि भारत पाकिस्तान से डरता नहीं है। सर्जिकल स्ट्राइक से अभी मुँहतोड़ जवाब दिया गया है और पहले भी। जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब भी अकधिक बार ऐसे ही धावा बोला गया था। लेकिन सवाल मन में यह आता है कि तब मनमोहन सिंह आख़िर चुप क्यों रहे?

युद्ध के लिए आतुर एबीपी न्यूज और इसके एडिटर मिलिंद खांडेकर की ओम थानवी ने कुछ यूं ली खबर

Om Thanvi : भारत का कथित वार रूम। तीनों सेनाध्यक्ष और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार। मोदी को बताया जा रहा है कि पाकिस्तान पर हम किस तरह हमला बोलेंगे। ख़बर कहती है “रेत के मॉडल” बनाकर समझाया गया है! रेत के मॉडल? हमले की इतनी सुविचारित योजना? वह भी रक्षामंत्री की अनुपस्थिति में? और योजना की या उसकी बैठक की ख़बर हमले से पहले टीवी को? … ख़बरों के नाम पर क्या-क्या नहीं हो रहा है!

ओम थानवी ने टाइम्स नाऊ वालों के बुलाने पर भी डिबेट में न जाने के कारणों का किया खुलासा

Om Thanvi : पिछले कुछ हफ़्तों से टाइम्ज़ नाउ से फ़ोन आता है कि अर्णब गोस्वामी के ‘न्यूज़ आवर’ में शिरकत करूँ। पर मेरा मन नहीं करता। एक दफ़ा समन्वयक ने कहा कि आप हिंदी में बोल सकते हैं, अर्णब हिंदी भी अच्छी जानते हैं आपको पता है। मुझे कहना पड़ा कि उनकी हिंदी से मेरी अंगरेज़ी बेहतर है। फिर क्यों नहीं जाता? आज इसकी वजह बताता हूँ। दरअसल, मुझे लगता है अर्णब ने सम्वाद को, सम्वाद में मानवीय गरिमा, शिष्टता और पारस्परिक सम्मान को चौपट करने में भारी योगदान किया है।

‘आप’ सिद्धू को सीएम का चेहरा बना रही तो इससे उसकी दरिद्रता ज़ाहिर होती है : ओम थानवी

Om Thanvi : क्या आप पार्टी सचमुच नवजोत सिद्धू को पंजाब में मुख्यमंत्री का चेहरा बना रही है? अगर ऐसा है तो इससे आप पार्टी की दरिद्रता ही ज़ाहिर होती है। जैसा कि सुनते हैं, पंजाब में पार्टी की ज़बरदस्त साख पहले ही क़ायम हो चुकी है। फिर सिद्धू उसे क्या भोगने आ रहे हैं? ‘आप’ भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा से दूर रहते हुए पनपी पार्टी है। जबकि सिद्धू हिंसा के ऐसे मामले में शामिल रहे हैं, जिसमें उनके ही शहर के एक नागरिक को जान से हाथ धोना पड़ा था।

मेरे बारे में सोशल मीडिया पर अफवाह उड़ाकर चरित्र हनन का काम सुधीर चौधरी ने किया था : ओम थानवी

Om Thanvi : जो लोग पत्रकारिता के पतन पर शोध करते हों, वे ज़ी न्यूज़ के प्रधान संपादक के कृत्यों में एक प्रसंग और जोड़ कर रख सकते हैं। इसका भुक्तभोगी मैं स्वयं हूँ। कुछ महीने पहले मेरे बारे में सोशल मीडिया में एक अफवाह उड़ी की महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी के कारण मुझ पर हमला हुआ या मेरे साथ मारपीट हुई। सचाई यह है कि किसी के साथ आज तक हाथापाई तक नहीं हुई है। वह दरअसल डॉ नामवर सिंह के जन्मदिन समारोह की घटना थी, जहाँ साहित्य और पत्रकारिता पर ही बात हो रही थी। किसी ने जाने क्यों (दुश्मन कम तो नहीं!) वह अफवाह उड़ाई। उस सरासर अफवाह को सच्ची घटना मानकर अपने सोशल मीडिया खाते (ट्विटर) पर किसी और पत्रकार ने नहीं, श्रीमान सुधीर चौधरी ने चलाया। यह चरित्र-हनन का प्रयास नहीं था तो क्या था?

ज़ी न्यूज़ के खिलाफ एक्शन लेने के लिए जाने-माने लोगों ने की अपील

Om Thanvi : देश के नागरिकों को देशद्रोही ठहराने वाले ज़ी न्यूज़ के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने के बाबत नसीरुद्दीन शाह, शुभा मुद्गल, प्रशांत भूषण, शर्मिला टैगोर, जॉन दयाल, शबनम हाशमी आदि की अपील। भोले लोग हैं जो इस सरकार से ऐसी उम्मीद लगा बैठते हैं। सरकार ने ज़ी संपादक की सरकारी सुरक्षा की प्रत्यक्ष व्यवस्था कर रखी है; अप्रत्यक्ष क्या है किसे मालूम? पढ़ें द हिंदू में प्रकाशित खबर….

विश्वदीपक का त्यागपत्र हमारी पत्रकारिता की खतरनाक फिसलन उजागर करने वाला एक दस्तावेज है

Om Thanvi : ज़ी न्यूज़ के पत्रकार विश्वदीपक को मैं अच्छी तरह जानता हूँ। उन्होंने जनसत्ता के लिए कश्मीर जाकर वह रिपोर्टिंग की, जिसे करने साहस तब लोग नहीं कर पाते थे। उन्होंने बीबीसी लंदन, जर्मनी के डॉयचे वेले और आजतक जैसे प्रतिष्ठानों में काम किया। ज़ी न्यूज़ में उनका जाना हैरान कर गया था, पर वहां से जिस साहस और प्रतिरोध साथ वे निकले हैं उससे पत्रकारिता में नैतिक स्वर के कहीं बने रहने की उम्मीद बनती है।

मारुति-सुज़ुकी वाले अक्षरधाम Nexa Showroom का नाम Unfair Deal ज़रूर कर लें

Om Thanvi : मारुति-सुज़ुकी जैसी नामी कंपनी, बड़ा हाइ-फाइ Nexa Showroom, डीलर का नाम – Fair Deal Cars; दिल्ली में अक्षरधाम मेट्रो स्टेशन के ठीक नीचे। अच्छा होता कि नाम रखते – Unfair Deal Cars! हुआ यह कि अक्तूबर 2015 में हमने उक्त शोरूम जाकर ग्यारह हजार रुपये दे एक बलेनो कार बेटे के लिए बुक करवाई। पर चंद रोज बाद और खरीदारों की राय जान बेटे को लगा कि आजमाई हुई श्कोडा ही बेहतर होगी।

ओम थानवी जेएनयू के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में गेस्ट फेकल्टी बने

Om Thanvi : चलिए, आपको कुछ खबर दें! जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर आज मैंने विश्वविद्यालय का सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज जॉइन किया है, गेस्ट फेकल्टी (विजिटिंग स्कॉलर) में। मेरे दादा शिक्षक रहे, मेरे पिताजी, चाचाजी, मामाजी … घर-परिवार में पुराना सिलसिला है। सोचा, जेएनयू जैसे शिक्षालय के परिवेश का थोड़ा अनुभव मुझे भी …

सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए

Om Thanvi : मुझे बहुत खुशी होगी, अगर सम-विषम प्रयोग सफल होता है। लेकिन सरकार को भी चाहिए कि आवागमन के वैकल्पिक, प्रदूषण रहित, साधनों की उपलब्धि में जी-जान लगा दे। दिल्ली की छाती पर एनसीआर हलकों में धुँआ उगलते वाहनों पर नियंत्रण के लिए पड़ोसी राज्यों की सरकारों से सहयोग की गुजारिश करनी चाहिए। एक और समस्या, जिसे तुरंत हल किया जाना चाहिए। रेडियो टैक्सी एक बेहतर सुविधा के रूप में विकसित हो रही है। लेकिन अपनी सफलता पर इतरा कर कंपनियां बेजा फायदा भी उठाने लगी हैं। मसलन ऊबर (Uber) को लें। “पीक आवर” अर्थात ज्यादा भीड़ के घंटों में चार-छः गुणा किराया झटकने लगे हैं। यह किसी की मजबूरी का फायदा उठाना है, सरासर ब्लैकमेलिंग है। दूसरी कंपनियां – जैसे मेरु (Meru) – तो ऐसा नहीं करतीं। कुछ टैक्सी संचालकों को लूट की यह आजादी क्यों?

ओम थानवी पर भी मानहानि का मुकदमा कर चुके हैं जेटली

Om Thanvi : अखबारी काम-काज में मुझ पर दर्जनों मुकदमे हुए। सब मानहानि के। एक तो अरुण जेटलीजी ने ही किया था, जो रजामंदी में वापस हो गया। फिर भी संपादक के नाते मैंने कोई पच्चीस-तीस मुकदमों में तो जमानत करवाई होगी। तीन-चार बार गैर-जमानती वारंट भी जारी हुए, क्योंकि तय तारीखों पर अदालत न …

…सुलह होगी पंकजजी, यहां नहीं तो वहां : ओम थानवी

Om Thanvi : परसों की ही बात है। आइआइसी मेन के लाउंज में सुपरवाइजर की मेज के गिर्द हम दोनों अगल-बगल आ खड़े हुए थे। करीब, मगर अबोले। बगल वाले शख्स पंकज सिंह थे। नामवर सिंहजी के सालगिरह समारोह के दिन से हमारी तकरार थी। बहरहाल, परसों हम आमने-सामने होकर भी अपने-अपने घरों को चले गए। पर मुझे वहाँ से निकलते ही लगा कि यहीं अगली दफा हम लोग शायद गले मिल रहे होंगे। क्षणिक तकरार कोई जीवन भर का झगड़ा होती है? आज मैं इलाहाबाद आया। वे पीछे दुनिया छोड़ गए। लगता है अब वहीं मिलेंगे। आज नहीं तो कल।

लो, लो, सेल्फी लो… लेते रहो, तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा! : ओम थानवी

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक कुछ पत्रकारों ने प्रधानमंत्री के साथ अपनी स्व-छवि एकाधिक बार ली। एंगल जंचा नहीं तो घूम कर दुबारा आ गए। इस पर भीड़ घटाने की गरज से सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि जो एक बार सेल्फी ले चुके हों, कृपया दुबारा न लें। तब, अनुराग के अनुसार, मोदीजी ने उन्हें टोका – अरे, लेने दो। किसी को न रोको। दुबारा चाहते हैं, दुबारा लो। लो, लो, लो … लेते रहो। तुम्हें अब कोई प्रेस्टीट्यूट नहीं कहेगा!

पीएम के साथ सेल्फियाने वाले पत्रकारों को दाद मिलनी चाहिए। बेशरमी में परदा तो नहीं करते। उनसे बेहतर हैं जो साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।

ओम थानवी को दस करोड़ रुपये मिलने की अफवाह किस वामपंथी कवि ने फैलाई?

Om Thanvi : बड़ी आनंद दायक खबर है। मुझे दस करोड़ रूपया मिला है। एक सांसद के जरिए, पहली नवम्बर को मावलंकर हॉल में प्रतिरोध के आयोजन के लिए। यानी मेरी तंगहाली तो रातोंरात दूर हो गई। अशोक वाजपेयी और एमके रैना को ज्यादा मिला होगा, क्योंकि वे बड़े नाम हैं। हालाँकि उन्हें मुझ सरीखी जरूरत शायद न हो!

पांडिचेरी घूमकर लौटे वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने साझा किया यात्रा वृत्तांत

Om Thanvi : पुदुचेरी (तमिल में पुदु=नया, चेरी=नगर) भले ही पांडिचेरी का बदला हुआ नाम हो, पर यहाँ आपको दोनों नाम चलन में मिलेंगे। बस अड्डे पर कंडक्टर अब भी “पौंडी-पौंडी” की पुकार लगाते हैं। जबकि देश में और जगहों पर पुराने नाम अब उपेक्षा – बल्कि घृणा – के घेरे में चले गए हैं। प्रसंगवश, ध्वनिप्रेम में मुझे पांडिचेरी नाम ज्यादा भाता है। मैंने वहां इसे ही अपनाया। शायद ही किसी ने इस पर उंगली उठाई होगी।

व्यापमं में उलझे शिवराज का मकसद था मोदी को खुश करना : थानवी

भोपाल। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने विश्व हिंदी सम्मेलन को वैभवशाली बनाए जाने पर कहा है कि इस सम्मेलन को वैभव देकर और पूरे शहर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से रंगकर व्यापम घोटाले में फंसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मोदी को खुश करने की कोशिश की है। प्रदेश की राजधानी भोपाल में चल रहे 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिस्सा लेने आए पत्रकार ओम थानवी ने कहा, “इस सम्मेलन की मुश्किल यह हो गई कि शुरुआत से ही इसका मकसद यह हो गया कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज प्रधानमंत्री मोदी को प्रभावित करेंगे, क्योंकि वे खुद व्यापम घोटाले में फंसे हैं और अगर अपने माई-बाप को प्रभावित करते हैं तो थोड़ा सा तो बचाव है।”

हिंदी सम्मेलन और भोपाल के अखबारों का मोदीकरण शर्मनाक है : ओम थानवी

Om Thanvi : भोपाल पहुँच कर देखा – हवाई अड्डे से शहर तक चप्पे-चप्पे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तसवीरों वाले विशाल पोस्टर लगे हैं, खम्भों पर भी मोदीजी के पोस्टर हैं। इनकी तादाद सैकड़ों में होगी। यह विश्व हिंदी सम्मलेन हो रहा है या भाजपा का कोई अधिवेशन? अधिकांश पोस्टर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से हैं – शहर में मोदीजी के स्वागत वाले। अनेक में चौहान की अपनी छवि भी अंकित है।

कृष्‍णनाथ जी नहीं रहे…

‘नए जीवन दर्शन की संभावना’ एक बार पढि़ए तब समझ आएगा वे कितना पढ़ते थे, कितने मौलिक थे, कितने विराट थे…

Om Thanvi : दिल्ली में उतरते ही फोन पर रंजना कुमारी का संदेश मिला कि कृष्णनाथजी नहीं रहे। मेरे लिए सदमे से कम नहीं यह खबर। कृष्णनाथजी सुलझे हुए समाजवादी विचारक और अर्थशास्त्र के विद्वान ही नहीं थे, अनूठे यायावर और गद्यकार थे। लद्दाख में राग-विराग, स्पीति में बारिश, हिमाल यात्रा, पृथ्वी परिक्रमा आदि उनके यात्रावृत्त हिंदी साहित्य की अनमोल कृतियाँ हैं। वे राममनोहर लोहिया के सहयोगी थे। उन्होंने ‘कल्पना’ ‘जन’ और ‘मैनकाइंड’ का संपादन भी किया।

ओम थानवी के लिए एक लाख रुपये चंदा इकट्ठा करने की अपील ताकि वो फिर किसी कल्याण के हाथों एवार्ड न लें

Mohammad Anas : ओम थानवी जी की मदद की अपील —- दोस्तों, हम सबके बेहद प्रीय जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी जी अब नौकरी से रिटायर हो गए हैं. उन्होंने केके बिरला फाउंडेशन द्वारा अपनी किताब के लिए बाबरी विध्वंस के आरोपी कल्याण सिंह के हाथ से एक लाख रुपए का पुरूस्कार लिया है. कल्याण न सिर्फ बाबरी विध्वंस के आरोपी हैं बल्कि उन पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के लिए हेट स्पीच, दंगा भड़काने, घोटाले तक के आरोप लगे हुए हैं. जैसे तालिबान का मुल्ला उमर वैसे ही भाजपा के कल्याण सिंह. फेसबुक पर श्री ओम थानवी जी ने लिखा है कि पुरूस्कार लेने से मेरे दुश्मनों को दिक्कत हो गई है.

Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

Abhishek Srivastava : जिस तरह Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी, उसी तरह Uday जी को मुख्‍य अतिथि चुनने की सुविधा नहीं थी या काशीनाथ सिंह को भारत भारती लेते वक्‍त उत्‍तर प्रदेश की मनपसंद सरकार चुनने की सुविधा नहीं थी। जिस तरह ओमजी ने पुरस्‍कार कल्‍याण सिंह के हाथों नहीं बल्कि राज्‍यपाल के हाथों से लिया है, ठीक वैसे ही नरेश सक्‍सेना ने रमण सिंह से नहीं बल्कि एक जनप्रतिनिधि से हाथ मिलाया था और नामवरजी ने नरेंद्र मोदी के साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र में चुने गए एक प्रधानमंत्री के साथ ज्ञानपीठ का मंच साझा किया था।

कल्याण के हाथों पुरस्कार लेने का विरोध करने वालों को ओम थानवी ने दुश्मन करार दिया

Om Thanvi : दुश्मनों के पेट में फिर बल पड़ गए। कहते हैं, महाकवि बिहारी के नाम पर दिया जाने वाला केके बिड़ला फाउंडेशन का पुरस्कार मैंने कल्याण सिंह के हाथों क्यों ले लिया? अगर मुझे चुनाव की सुविधा होती तो आयोजकों से कहता किसी लेखक के हाथों दिलवाइए। इसके बावजूद, सच्चाई यह है कि पुरस्कार मैंने कल्याण सिंह के हाथों नहीं, राज्यपाल के हाथों लिया है; राज्यपाल जो संविधान की सत्ता का प्रतीक होता है, संविधान का प्रतिनिधि और कार्यपालक होने के नाते। राजभवन कल्याण सिंह या भाजपा की मिल्कियत नहीं है।

कल्याण सिंह के हाथों पुरस्कार लेने पर ओम थानवी सोशल मीडिया पर घिरे

Neelabh Ashk : मत छेड़ फ़साना कि ये बात दूर तलक जायेगी. ओम तो गुनहगार है ही, हिन्दी के ढेरों लोग किसी न किसी मौक़े पर और किसी न किसी मात्रा में गुनहगार हैं. इस हमाम में बहुत-से नंगे हैं. पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है. मैंने साहित्य अकादेमी का पुरस्कार लौटा दिया था. मेरी मार्क्स की पढ़ाई ने मुझे पहला सबक़ यह दिया था कि कर्म विचार से प्रेरित होते हैं. 55 साल बाद तुम चाहते हो मैं इस सीख को झुठला दूं. ओम की कथनी और करनी में इतना फ़र्क़ इसलिए है कि सभ्यता के सफ़र में इन्सान ने पर्दे जैसी चीज़ ईजाद की है. ईशोपनिषद में लिखा है कि सत्य का मुख सोने के ढक्कन के नीचे छुपा है. तुम सत्य को उघाड़ने की बजाय उस पर एक और सोने का ढक्कन रख रहे हो. ये ओम के विचार ही हैं जो उसे पुरस्कार>बिड़ला>राज्यपाल>कल्याण सिंह की तरफ़ ले गये. मैं बहुत पहले से यह जानता था. मुझे कोई अचम्भा नहीं हुआ. मैं ओम की कशकोल में छदाम भी न दूं. और अगर यह मज़ाक़ है तो उम्दा है, पर हिन्दी के पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार-सम्मान-लोभी जगत पर इसका कोई असर नहीं होगा.

ओम जी की युवा चपलता उन्‍हें रि‍टायर होने भी नहीं देगी

Rahul Pandey :  मैं कभी जनसत्‍ता में नहीं छपा। बल्‍कि शायद मैं कहीं नहीं छपा। तो अगर कोई ये सोचे कि आेम जी का मेरा परि‍चय कुछ छपने छपाने को लेकर हुआ तो उसे नि‍राशा ही हाथ लगेगी। मुरादाबाद में एक दि‍न मैने ओम जी की वॉल पर कुछ सीक्‍योरि‍टी ब्रीचेस देखे तो बेलौस उन्‍हें मैसेज कर दि‍या। तुरंत उनका जवाब भी आया, चीजें शायद ठीक की गईं या नहीं, याद नहीं, लेकि‍न हमारी डि‍जि‍टल दोस्‍ती तो ठीक ठाक शुरू हो गई।

सम्पादकजी क्या वाकई इतनी महिलाओं के साथ सोए भी होंगे या सिर्फ बहबही में झूठ बोले!

परसों पूरे देश में राष्ट्रीय शोक था। संयोग से परसों ही साहित्य के राष्ट्रीय धरोहर नामवर सिंह जी का जन्मदिन भी था। राजकमल प्रकाशन द्वारा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में डॉ नामवर सिंह के जन्मदिन को डॉ कलाम के शोक से बड़ा साबित करते हुए एक रंगीन और तरल-गरल पार्टी रख दिया गया। कई पहुंचे, क्या पत्रकार एवं क्या साहित्यकार। शायद नामवर जी नहीं पहुंचे या पहुंचे भी हों तो थोड़े समय के लिए ही पहुचे हों। 

अफवाहें उड़ाने वालो, देख लेंगे, तुम्हारे दुष्प्रचार में ताकत है या हमारे सच में : ओम थानवी

कुछ समय पहले बदमाशों ने, न सुहाने वाले एक आलोचक – जो टीवी पर भी बेबाक रहते हैं – के बारे में अफवाह उड़ाई कि उनकी पत्नी भाग गई हैं। अफवाह ऐसी कि कोई उनसे पुष्टि भी करना चाहे तो कैसे करे लेकिन कल मेरे बारे में उन लोगों ने थोड़ी रियायत बरती, सो मित्रों ने मुझे फोन कर बता भी दिया। उन कुछ के श्रीमुख से देशद्रोही, गद्दार, विदेशी एजेंट आदि जुमले तो रोज सुनते हैं; सो इसमें भी हैरानी नहीं हुई कि अब वे शराबी-कबाबी-व्यभिचारी कहें; कौन जाने कल बलात्कारी-हत्यारा या तस्कर भी कहने लगें। ऐसे गलीज तत्त्वों से कोई गिला नहीं। 

चार दिनों बाद यानी 31 जुलाई से ओम थानवी जनसत्ता के संपादक पद से अवकाश ले लेंगे

इंडियन एक्सप्रेस इसलिए नहीं पढ़ा जाता रहा है कि उसमें ढूंढ़-ढूंढ़ कर स्टोरी लाई जाती थीं बल्कि उसकी प्रतिष्ठा इसलिए थी क्योंकि उसका चरित्र व्यवस्था विरोधी (एंटी इस्टैबलिशमेंट) रहा है। बाद में एक्सप्रेस ने तो खैर अपना चरित्र बदला भी मगर जनसत्ता दृढ़ रहा। प्रभाष जी के बाद भी जनसत्ता का यह चरित्र यथावत बना रहा तो यकीनन इसका श्रेय ओम थानवी को जाता है। प्रभाष जोशी बड़ा नाम था इसलिए उनके वक्त तक जनसत्ता में काम कर रहे दक्षिणपंथी पत्रकार खुलकर सामने नहीं आए थे मगर ओम थानवी के समय ऐसे तत्व खुलकर अपने दांव चलने लगे थे इसके बावजूद जनसत्ता का चरित्र नहीं बदला। ऊपर से प्रबंधन ने ओम थानवी को वह स्वायत्तता भी नहीं दी जैसी कि प्रभाष जी के वक्त तक संपादक को प्राप्त थी।

ललित मोदी के वकील की प्रेस कांफ्रेंस को लाइव दिखाने का मतलब नायाब मीडिया मैनेजमेंट!

Om Thanvi : सुषमा स्वराज की इसके लिए दाद देनी चाहिए कि उन्होंने अपनी गलती तुरंत स्वीकार की। लेकिन मोदी गुट के अमित शाह और संघ उनके हक में खड़े दिखाई दे रहे हैं तो क्या यह संदेह नहीं खड़ा होता कि काला दाल में नहीं, दाल ही काली है? क्या सुषमा स्वराज किसी षड्यंत्र का शिकार हुई हैं? क्या सुषमा स्वराज के निर्णय के पीछे सचमुच कोई पारिवारिक कारण हैं या ‘मानवीय आधार’ पर पार्टी या सरकार में वे इस्तेमाल हुई हैं; जिन्होंने उन्हें इस अनाचार इस्तेमाल किया, उन्हें भय है कि स्वराज को इस मामले में किनारे करने पर उनका भांडा फूट जाएगा? वरना मोदी दूसरे मोदी के नाम पर अपनी सरकार को बदनाम क्यों होने देंगे?

दिल्ली पुलिस की अफरातफरी और राजनीति का गंदा खेल : वक्त बताएगा किसने क्या खोया और क्या पाया…

Om Thanvi : किसी एफआइआर पर पुलिस मंत्री क्या पार्षद के खिलाफ भी इतनी अफरातफरी में हरकत में नहीं आती। तोमर पर लगे आरोप नए नहीं हैं, अदालत में मामला पहले से है। अगर उन्होंने फर्जीवाड़ा किया है तो निश्चय ही सजा मिलनी चाहिए, मंत्री पद से छुट्टी तो होनी ही चाहिए। वैसे आप सरकार भी इसकी दोषी तो है कि अब तक न भीतरी लोकपाल नियुक्त किया है न बाहरी। तोमर की ‘असली’ डिग्रियां पेश करने का वादा भी अब तक पूरा नहीं किया गया है। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली पुलिस की आज की नाटकीय गतिविधि संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल आती। सवाल यह है कि कल कोई एफआइआर शिक्षामंत्री स्मृति ईरानी पर डिग्री (यों) वाले उनके फर्जी हलफनामों के लिए दर्ज होती है तो क्या पुलिस इसी जोशोखरोश में पेश आएगी?

अभिनेत्री रह चुकीं मंत्री ने सीधे सवाल को महिला-मुद्दा बनाकर स्टूडियो में मौजूद ‘जनता’ को ‘आजतक’ के खिलाफ भड़काया

Om Thanvi : सीधे सवाल पर ड्रामा जवाब से भागती ईरानी का, उलटा आरोप पत्रकार पर! अशोक सिंघल ने आजतक पर स्मृति ईरानी से पूछा कि मोदी ने आपको क्या खूबी देख कर (केबिनेट) मंत्री बनाया। स्मृति का हुनर देखिए कि जिस सवाल पर पहले कोई हैरान नहीं हुआ था, जवाब देने की जगह अभिनेत्री रह चुकीं मंत्री ने उस सवाल को महिला-मुद्दा बनाकर स्टूडियो में मौजूद ‘जनता’ के बीच कुछ इस अंदाज से उछाला कि लोग भड़क गए, इतना कि मंच पर पत्रकार पर हमला तक करने जा पहुंचे। तब मंत्री ने उठकर पत्रकार को बचाने जाने का उपक्रम भी प्रदर्शित किया! गौर करने की बात है कि आमंत्रित की गई भीड़ ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगा रही थी।

एक साल की नाकामियों को उपलब्धियों में बदला जा सकता है!

डीएनए अखबार में प्रकाशित मंजुल का कार्टून

Om Thanvi :  महंगे और सुनियोजित प्रचार से जैसे चुनाव जीता जा सकता है, वैसे ही एक साल की नाकामियों को उपलब्धियों में क्यों नहीं बदला जा सकता? पूरे एक सप्ताह से टीवी और बाकी मीडिया में हम जो गाजे-बाजे सुन-देख रहे हैं, वे अभी एक सप्ताह और चलेंगे – तब तक जब तक जनता का दिमाग साफ (ब्रेन-वाश) न हो जाय या उसके कान पक न जाएं! मथुरा में तो रैलियों की शुरुआत भर हुई है।

ओम थानवी ने भी कह दिया- केजरीवाल अहंकारी

आशुतोष की किताब के आयोजन में केजरीवाल का अहंकार देखकर मैं दंग रह गया था। न राजदीप-शेखर गुप्ता के सवालों का जवाब उन्होंने जिम्मेदारी से दिया, न हॉल में बड़ी संख्या में मौजूद बुद्धिजीवियों का लिहाज किया। उनका कहना था – बस मैं जैसा हूँ, लोग इससे खुश हैं। भावार्थ यह निकलता था कि मैं बाकी सबको ठेंगे पर रखता हूँ। मीडिया की ओर साफ इशारा भी कर दिया था।

प्रतिबंध लगाना और थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है : ओम थानवी

Om Thanvi : प्रतिबंध लगाना, थोपना भाजपा सरकारों की फितरत बनने लगा है। कोई किस वक्त कौनसी फिल्म देखे, राज्य तय कर रहा है। क्या खाएं, यह भी। अभी सिर्फ शुरुआत है, आगे देखिए। गौमांस के निर्यात में हम, अमेरिका को भी पीछे छोड़, भारी विदेशी मुद्रा कमा रहे हैं; मगर देश में राज्य गौमांस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। वह भी सभी राज्य नहीं लगा रहे। महाराष्ट्र और गोवा दोनों जगह भाजपा का राज है, पर गोवा – जिसका हाईकोर्ट मुंबई में है – प्रतिबंध से बरी है। वजह महज इतनी है कि महाराष्ट्र में प्रतिबंध से वोट बैंक मजबूत होगा, गोवा में कमजोर!

केजरीवाल से आज फिर निराश हुए ओम थानवी

Om Thanvi : केजरीवाल को पहली बार किसी सभा में आमने-सामने सुना। आशुतोष की किताब का लोकार्पण था। राजदीप ने वे सारे मुद्दे कुरेदे जो जरूरी थे। जो सब भुला बैठे उन्हें अंत में भूपेंद्र चौबे और शेखर गुप्ता ने पूछ लिया। लेकिन केजरीवाल सबसे दाएं-बाएं ही हुए। सिर्फ साले-कमीने की भाषा के इस्तेमाल पर इतना कहा कि उन्हें ऐसा नहीं बोलना चाहिए था। पर इसमें कोई अफसोस का भाव जाहिर न था।

भाजपा सांसद श्यामा चरण गुप्त दलाल है!

Padampati Sharma : श्यामा चरण गुप्त इलाहाबादी को कौन नहीं जानता. 250 करोड़ के कारोबारी हैं.. वे कहते हैं कि बीड़ी में औषधीय गुण हैं. वे खुद बीड़ी किंग हैं. कई जातिवादी दलों में घूम फिर कर फिर से भाजपा का दामन थामा है. उम्मीद कुछ मोदी से ही है. कांग्रेस की रेप्लिका बन चुकी भाजपा से नहीं. पता नहीं, नमों पार्टी को सुधार पाएंगे कि पार्टी उन्हें ही तार देगी.. आने वाला समय तय करेगा… लेकिन सिगरेट निर्माता कंपनी की दलाली कर रहे हैं भाजपा सांसद, यह तय है…

केजरीवाल पर संपादक ओम थानवी और नरेंद्र मोदी पर पत्रकार दयानंद पांडेय भड़के

Om Thanvi : लोकपाल को वह क्या नाम दिया था अरविन्द केजरीवाल ने? जी, जी – जोकपाल! और जोकपाल पैदा नहीं होते, अपने ही हाथों बना दिए जाते हैं। मुबारक बंधु, आपके सबसे बड़े अभियान की यह सबसे टुच्ची सफलता। अगर आपसी अविश्वास इतने भीतर मैल की तरह जम गया है तो मेल-जोल की कोई राह निकल आएगी यह सोचना मुझ जैसे सठियाते खैरख्वाहों की अब खुशफहमी भर रह गई है। ‘साले’, ‘कमीने’ और पिछवाड़े की ‘लात’ के पात्र पार्टी के संस्थापक लोग ही? प्रो आनंद कुमार तक? षड्यंत्र के आरोपों में सच्चाई कितनी है, मुझे नहीं पता – पर यह रवैया केजरीवाल को धैर्यहीन और आत्मकेंद्रित जाहिर करता है, कुछ कान का कच्चा भी।

इंडियन एक्सप्रेस में छपा रिबेरो का लेख हर पाठक को हिला गया : ओम थानवी

1989 में जब मैंने चंडीगढ़ जनसत्ता का कार्यभार संभाला, जूलियो रिबेरो आतंकवाद से जूझ रहे पंजाब में राज्यपाल के सलाहकार थे। राष्ट्रपति राज में राज्यपाल और उनके सलाहकार ही शासन चलाते थे। राजभवन के एक आयोजन में जब मैं रिबेरो से मिला, वे कहीं से ‘सुपरकॉप’ नहीं लगते थे; उनमें अत्यंत सहजता और विनम्रता थी, खीज या उत्तेजना उनसे कोसों दूर नजर आती थी। मेरी जिज्ञासा पर अपने पर हुए एक जानलेवा हमले का किस्सा उन्होंने हंसते हुए सुनाया था।

ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

Sheetal P Singh : पिछले दो दिनों में दिल्ली के सारे अख़बारों में पहले पेज पर छापे गये मोदी जी + बेदी जी के विज्ञापन का कुल बिल है क़रीब चौबीस करोड़ रुपये। आउटडोर विज्ञापन एजेंसियों को होर्डिंग / पोस्टर / पैम्फलेट / बैनर / स्टेशनरी / अन्य चुनावी सामग्री के बिल इससे अलग हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा प्रधानमंत्री और अन्य हैवीवेट सभाओं के (कुल दो सौ के क़रीब)इंतज़ाम तथा टेलिविज़न / रेडियो विज्ञापन और क़रीब दो लाख के क़रीब आयातित कार्यकर्ताओं के रख रखाव का ख़र्च श्रद्धानुसार जोड़ लें। आम आदमी पार्टी के पास कुल चुनाव चंदा क़रीब चौदह करोड़ आया। बीस करोड़ का लक्ष्य था। कुछ उधार रह गया होगा। औसतन दोनों दलों के ख़र्च में कोई दस गुने का अंतर है और नतीजे (exit poll) बता रहे हैं कि तिस पर भी “आप” दो गुने से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है! ये हार बहुत भीषण है म्हराज! ध्यान दें, ”आप” बनारस में पहले ही एक माफ़िया के समर्थन की कोशिश ठुकरा चुकी थी, आज उसने “बुख़ारी” के चालाकी भरे समर्थन को लात मार कर बीजेपी की चालबाज़ी की हवा निकाल दी।

रवीश कुमार, ओम थानवी और वीरेंद्र यादव ने फेसबुक को अलविदा कहा!

Shambhunath Shukla : नया साल सोशल मीडिया के सबसे बड़े मंच फेस बुक के लिए लगता है अच्छा नहीं रहेगा। कई हस्तियां यहाँ से विदा ले रही हैं। दक्षिणपंथी उदारवादी पत्रकारों-लेखकों से लेकर वाम मार्गी बौद्धिकों तक। यह दुखद है। सत्ता पर जब कट्टर दक्षिणपंथी ताकतों की दखल बढ़ रही हो तब उदारवादी दक्षिणपंथियों और वामपंथियों का मिलकर सत्ता की कट्टर नीतियों से लड़ना जरूरी होता है। अगर ऐसे दिग्गज अपनी निजी व्यस्तताओं के चलते फेस बुक जैसे सहज उपलब्ध सामाजिक मंच से दूरी बनाने लगें तो मानना चाहिए कि या तो ये अपने सामाजिक सरोकारों से दूर हो रहे हैं अथवा कट्टरपंथियों से लड़ने की अपनी धार ये खो चुके हैं। इस सन्दर्भ में नए साल का आगाज़ अच्छा नहीं रहा। खैर 2015 में हमें फेस बुक में खूब सक्रिय साथियों- रवीश कुमार, ओम थानवी और वीरेंद्र यादव की कमी खलेगी।

दूरदर्शन ने फिर से ओम थानवी को बुलाना शुरू कर दिया

Om Thanvi : मुद्दत बाद आज दूरदर्शन के कार्यक्रम में गया। चुनाव के नतीजों पर चर्चा थी। बीच में पहले भी कई बार बुलावा आया, पर मना करता रहा। आज तो और चैनलों पर भी जाना था। फिर भी अधिक इसरार पर हो आया। जाकर कहा तो वही जो सोचता हूँ! बहरहाल, पता चला कि कोई सरकारी निर्णय बुलाने न-बुलाने को लेकर नहीं रहा, कोई अधिकारी समाचार प्रभाग में आईं जो अपने किसी लाभ के लिए नई सरकार को इस तरह खुश करने की जुगत में थीं कि भाजपा या नरेंद्र मोदी के आलोचकों को वहां न फटकने दें!

ओम थानवी ने रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में कुछ लेखकों के जाने को डिफेंड किया!

Abhishek Srivastava : {”जो बुद्धिजीवी रायपुर में लेखकों के जाने भर को मुद्दा बना रहे हैं, क्या वे बुद्धिजगत में एक किस्म का खापवाद प्रतिपादित नहीं कर रहे?” – Om Thanvi} …आइए, ज़रा जांचते हैं कि साहित्‍य में खाप कैसे बनता है। आज ओम थानवी ने रायपुर साहित्‍य महोत्‍सव में कुछ लेखकों के जाने को डिफेंड करते हुए एक स्‍टेटस लिखा। इसे Maitreyi Pushpa और Purushottam Agrawal समेत कुछ लोगों ने साझा किया। यह मोर्चे की पहली पोजीशन है। मोर्चे की दूसरी सीमा पर डटे Vineet Kumar और Prabhat Ranjan ने महोत्‍सव की तस्‍वीर और भाषण पोस्‍ट किए। यह प्रचार मूल्‍य है। मोर्चे की तीसरी पोजीशन जनसत्‍ता में खोली गई जहां Ashok Vajpeyi ने महोत्‍सव में लेखकों को मिली आज़ादी पर एक निरपेक्ष सी दिखने वाली टिप्‍पणी ‘कभी-कभार’ में की। यह नेतृत्‍व की पोजीशन है, बिलकुल निरपेक्ष और धवलकेशी।

गैंग रेप के आरोपी निहालचंद को मोदी ने मंत्रिपद पर कायम रखकर क्या संदेश दिया है?

Om Thanvi : नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल फैलाव में स्वागतयोग्य बातें हैं: पर्रीकर और सुरेश प्रभु जैसे काबिल लोग शामिल किए गए हैं। बीरेंद्र सिंह, जयप्रकाश नड्डा, राजीवप्रताप रूडी और राज्यवर्धन सिंह भी अच्छे नाम हैं। सदानंद गौड़ा से रेलगाड़ी छीनकर उचित ही सुरेश प्रभु को दे दी गई है। लेकिन स्मृति ईरानी का विभाग उनके पास कायम है। गैंग रेप के आरोपी निहालचंद भी मंत्रिपद पर काबिज हैं। अल्पसंख्यकों को लेकर प्रधानमंत्री की गाँठ कुछ खुली है, मगर मामूली; मुख़्तार अब्बास नक़वी को महज राज्यमंत्री बनाया है। वे वाजपेयी मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री रह चुके हैं, जैसे रूडी भी।

मरने के बाद कोई किसी को नहीं पूछता, सब ताकत के पुजारी हैं, यही जग की रीत है

Vimal Kumar : जब अर्जुन सिंह जिन्दा थे तो लेखक और पत्रकार उनके आगे पीछे घूमा करते थे लेकिन उनके मरने के बाद उनके नाम पर शुरू पुरस्कार समारोह में अब कोई नहीं झांकता. पिछले साल भी इस समारोह में कम लोग थे. इस बार तो और कम लोग. अज्ञेय जी के निधन के बाद में यही हुआ. अज्ञेय जी जब जीवित थे तो उनका जलवा था. लेकिन मरने के बाद सब भूल गए.

कैग का कहना है कि कांग्रेस सरकार की मदद से वाड्रा ने एक झटके में 44 करोड़ कूट लिए

Om Thanvi : देश के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) का कहना है कि कांग्रेस सरकार की मदद से रॉबर्ट वाड्रा ने एक झटके में ४४ करोड़ कूट लिए। गौर करें कि मोदी और भाजपा तो खुद वाड्रा के खिलाफ अभियान चलाते आए हैं। फिर भी कुछ होता क्यों नहीं?

बीएचयू में संघ की शाखा और मुसलमानों के प्रति नफरत के बीज

Om Thanvi : प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा के दूसरे भाग ‘मणिकर्णिका’ की बात मैंने परसों की थी। उस किताब में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दिनों का एक प्रसंग इस तरह हैः

अर्णब गोस्वामी ने रॉबर्ट वाड्रा की खाट खड़ी कर दी : ओम थानवी

Om Thanvi : अर्णब गोस्वामी ने रॉबर्ट वाड्रा की खाट खड़ी कर दी। भले ही अपने खड़काऊ अंदाज में। पहले भी खेमका के मामले को टाइम्स नाउ ने पर्याप्त अहमियत दी थी। लेकिन बाकी चैनल क्या कर रहे हैं? चलताऊ खबर की तरह चलाया और छोड़ दिया। अब तो सोनिया (के सिंह) का राज भी नहीं? और नरेंद्र मोदी को भी रॉबर्ट वाड्रा का मुद्दा उठाते हुए कुछ संकोच करना चाहिए।

मोदी की अदभुत चतुराई, ताकि जनता भूल जाए महंगाई

Om Thanvi :  छोड़िए। मैं मोदीजी पर कुछ नहीं बोल रहा। एनडीटीवी के संजीदा पत्रकार Umashankar Singh की एक अहम जानकारी वाली पोस्ट महज साझा कर रहा हूँ। इसका संपादित अंश जनसत्ता अखबार में प्रकाशित है। जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

वाशिंगटन पहुंचकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करने में जुट गए हैं भारतीय चैनल

Om Thanvi : कई दिन बाद बरबस टीवी खोला। भारतीय चैनल वाशिंगटन जा पहुंचे हैं और मजेदार ‘रिपोर्टिंग’ हो रही है। देखा कि एक प्रमुख हिंदी चैनल के संवाददाता ने भारतीय मूल के मुसलिम रईस को पकड़ रखा है। वह अंग्रेजी बोल रहा है, संवाददाता हिंदी। रईस कहता है, मि. मोदी ने यह कहकर मेरा दिल जीत लिया कि भारत के मुसलमान देश के लिए जीने-मरने को तैयार हैं।

कुछ उत्साही पत्रकार विदेश मंत्रालय के तालमेल के बगैर, अपने चैनल के खर्च पर, जापान पहुँच गए हैं

Om Thanvi : एक टीवी चैनल पर अभी लिखा पढ़ा: “मोदी बनाएंगे भारत को जापान”। अब तक तो बस वह खबर थी कि काशी को क्योतो की सीख से आधुनिक ‘स्मार्ट सिटी’ बनाया जाएगा। मोदी ने चुनाव में सौ ऐसे ‘स्मार्ट’ नगर बनाने का वादा किया था। क्योतो से सिलसिला शुरू हुआ और साथ ही हो गया पूरे भारत के जापान बनने का आगाज? इससे हास्यास्पद कल्पना क्या हो सकती है!

अलविदा बिपिन चन्द्रा, अलविदा बलराज पुरी.

Samar Anarya : अलविदा बिपिन चन्द्रा, अलविदा बलराज पुरी. अब भी याद है कि इलाहाबाद में साइकोलॉजी में एमए पूरा कर लेने के बाद सामने मौजूद दो विकल्पों में से एक चुनना कितना मुश्किल था. एक तो क्लिनिकल साइकोलॉजी जो इलाहाबाद शहर के बाद अपनी दूसरी माशूक थी तो एक तरफ वो इंकलाबी जज्बा जिसे क्रान्ति हुई ही दिखती थी.

मोदी राज आने के बाद ओम थानवी को परिचर्चा के लिए नहीं बुलाता दूरदर्शन

ओम थानवी प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जनसत्ता के संपादक हैं. बेहद तार्किक और जनपक्षधर पत्रकार माने जाते हैं. सत्ता की भाषा के खिलाफ जनता की भाषा कहने बताने लिखने के लिए जाने जाते हैं. वे अक्सर कई टीवी चैनलों पर परिचर्चाओं में दिख जाते हैं. उनके विरोधी भी उनकी तार्किकता और तथ्यपरकता के कायल हैं. पर जबसे मोदी सरकार केंद्र में आई है तभी से ओम थानवी को सरकारी टीवी चैनल दूरदर्शन ने ब्लैकलिस्टेड कर दिया है. ओम थानवी ने खुद इसका खुलासा अपने फेसबुक वॉल पर किया है. पढ़िए, वे क्या लिखते हैं…

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लालकिले से कई अच्छी बातें करने-कहने वाले नरेंद्र मोदी रोजमर्रा की महंगाई की मार क्यों भुला गए : ओम थानवी

Om Thanvi : प्रधानमंत्री ने भाषण पढ़ा नहीं, नोट्स के आधार पर सीधे बोले यह अच्छा लगा। गोली-निरोधक शीशे की आड़ भी हटा दी, बच्चों से भी जाकर मिले। बेटियों के प्रति संवेदनशील नजरिया, गाँव-किसान, गरीबी, सफाई, सुशासन की बातें भी मुझे अच्छी लगीं। यह भी अच्छा किया कि राममंदिर निर्माण की बात नहीं की, न विवादग्रस्त अनुच्छेद 370 या समान नागरिक संहिताका राग छेड़ा। पाकिस्तान को भी नहीं ललकारा।