तो इस कारण RSS वाले आदिवासियों को वनवासी कहते हैं!

आरएसएस का आदिवासियों को वनवासी कहने का षड्यंत्र… यह सर्वविदित है कि आरएसएस हमेशा से आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी कहती है। इसके पीछे बहुत बड़ी चाल है जिसे समझने की ज़रूरत है। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश मे विभिन्न विभिन्न समुदाय रहते हैं जिनके अपने अपने धर्म तथा अलग अलग पहचान है। अदिवासी जिन्हें संविधान में अनुसूचित जनजाति कहा जाता है भी एक अलग समुदाय है जिसका अपना धर्म,अपने देवीदेवता तथा एक विशिष्ट संस्कृति है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन्हें इंडिजीनियस पीपुल अर्थात मूलनिवासी भी कहा जाता है। इनके अलग भूगौलिक क्षेत्र हैं और इनकी अलग पहचान है। Continue reading

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दलित आदिवासी वोटों के बिखराव की यह पटकथा कौन लिख रहा है?

जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उन राज्यों में अचानक कई दलित,आदिवासी, बहुजन, मूलनिवासी संज्ञाओं वाली राजनीतिक पार्टियों का प्रवेश-उद्भव हो गया है। उनके नवनियुक्त नेतागण सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा इस तरह कर रहे हैं जैसे कि वे हेलिकॉप्टर में भर कर आसमान से जमीन पर उम्मीदवारों का छिड़काव कर देंगे। Continue reading

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अश्लील वीडियो बना वायरल करने से आहत दलित लड़की ने दी जान, देखें वीडियो

यूपी के मैनपुरी से एक बड़ी खबर है. यहां बेखौफ मनचलों ने एक दलित लड़के से छेड़छाड़ कर पहले उसका वीडियो बनाया और फिर वायरल कर दिया. इससे परेशान लड़की ने जान दे दी. बताया जाता है कि शौच को गयी एक दलित किशोरी के साथ कुछ मनचलों ने छेड़छाड कर वीडियो बना लिया और उसे वायरल करने की धमकी दे उसके साथ मनमानी करनी चाही. इससे आहत हो लड़की ने जहर खाकर जान दे दी. पुलिस ने शव कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है. Continue reading

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दलित-मुस्लिम मीडियाकर्मियों के उत्पीड़न की एक सच्ची कहानी…सुनेंगे तो रोंगेट खड़े हो जाएंगे…

…अंततः फर्जी केस से बरी हुये पत्रकार योगेंद्र सिंह और अब्दुल हमीद बागवान !

सत्य प्रताड़ित हुआ पर पराजित नहीं! 10 मार्च 2007 वह मनहूस दिन था , जब मेरे दो पत्रकार साथियों अब्दुल हमीद बागवान और योगेंद्र सिंह पंवार को भीलवाड़ा पुलिस द्वारा कईं गंभीर धाराओं में दर्ज कराए गए एक मुकदमे में गिरफ्तार कर लिया। मुझे सुबह सुबह तत्कालीन जिला कलेक्टर से यह जानकारी मिली, यह हैरत करने वाली जानकारी थी, क्योंकि उस शाम तक मैं अपने दोनों साथियों के साथ ही था, मेरे निकलने के 1 घण्टे बाद ही यह घटनाक्रम घटित हो गया।
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हिंदू धर्म में सम्मान नहीं मिला तो बन गए बौद्ध… देखें वीडियो….

कपिल वस्तु घूम आया. वहां बौद्ध स्तूप के सामने बैठे भिक्छुओं ने साफ-साफ कहा कि वे हिंदू धर्म इसलिए छोड़ दिए क्योंकि वहां उन्हें सम्मान नहीं मिल रहा था. इनकी बातें आंखें खोलने वाली हैं.  देखें वीडियो….

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दलित नेता चंद्रशेखर पर रासुका अवधि बढ़ाना दलित दमन का प्रतीक : दारापुरी

लखनऊ 30 जनवरी, 2018 : “चंद्रशेखर पर रासुका अवधि बढ़ाना दलित दमन का प्रतीक है.” यह बात आज एस.आर. दारापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने आगे कहा है कि एक तरफ जोगी सरकार अपनी पार्टी से जुड़े लोगों के आपराधिक मामले वापस ले रही है वहीं दूसरी ओर शब्बीरपुर में दलितों पर सामंतों के हमले में न्याय मांगने वाले भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर पर हाई कोर्ट से जमानत मिलने पर भी रासुका लगाती है जिसे अब तीन महीने के लिए आगे बढ़ा दिया गया है.

योगी सरकार की यह कार्रवाही घोर दलित दमन की प्रतीक है. इसे तथा उत्तर प्रदेश में दलितों पर निरंतर हो रहे अत्याचार को लेकर दलितों में आक्रोश पनप रहा है.  इस सम्बन्ध में 18 फरवरी को सहारनपुर में बड़े विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया जा रहा है. श्री दारापुरी ने आगे कहा है कि यदि चंद्रशेखर की रिहाई तुरंत नहीं की जाती तो इसके विरुद्ध पूरे उत्तर प्रदेश में दलित संगठनों की तरफ से एक व्यापक जन आन्दोलन शुरू किया जायेगा.

एस.आर. दारापुरी
पूर्व पुलिस महानिरीक्षक
संयोजक, जनमंच उत्तर प्रदेश
srdarapuri@gmail.com

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यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए…

Surendra Kishore : बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि आपको अपने बारे में एक खास बात बताऊं। यह भी कि वह खास बात किस तरह मेरे जीवन में बड़े काम की साबित हुई। मैंने 1977 में एक बजुर्ग पत्रकार की नेक सलाह मान कर अपने जीवन में एक खास दिशा तय की। उसका मुझे अपार लाभ मिला। मैंने फरवरी 1977 में अंशकालीन संवाददाता के रूप में दैनिक ‘आज’ का पटना आफिस ज्वाइन किया था। हमारे ब्यूरो चीफ थे पारस नाथ सिंह। उससे पहले वे ‘आज’ के कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक थे। वे ‘आज’ के नई दिल्ली ब्यूरो में भी वर्षों तक काम कर चुके थे। पटना जिले के तारण पुर गांव के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बाबूराव विष्णु पराड़कर की यशस्वी धारा के पत्रकार थे। विद्वता और शालीनता से भरपूर।

इधर मैं लोहियावादी समाजवादी पृष्ठभूमि से निकला था। पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रबल समर्थक। सक्रिय राजनीति से निराश होकर पत्रकारिता की तरफ बढ़ा ही था कि देश में आपातकाल लग गया। पहले छोटी-मोटी पत्रिकाओं में काम शुरू किया था। उन पत्रिकाओं में नई दिल्ली से प्रकाशित चर्चित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ भी था। उसके प्रधान संपादक जार्ज फर्नांडिस और संपादक कमलेश थे। गिरधर राठी और मंगलेश डबराल भी प्रतिपक्ष में थे। भोपाल के आज के मशहूर पत्रकार एन.के.सिंह भी कुछ दिनों के लिए ‘प्रतिपक्ष’ में थे।  पर वह जार्ज के दल का मुखपत्र नहीं था। वह ब्लिट्ज और दिनमान का मिश्रण था। आपातकाल में मैं फरार था। बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई.मुझे बेचैनी से खोज रही थी कि मैं मेघालय भाग गया।

जब आपातकाल की सख्ती कम हुई तो में पटना लौट आया और ‘आज’ ज्वाइन कर लिया। मैंने अपनी पृष्ठभूमि इसलिए बताई ताकि आगे की बात समझने में सुविधा हो। आज ज्वाइन करते ही मैंने देखा के ‘आज’ में हर जगह ब्राह्मण भरे हुए हैं। मैंने पारस बाबू से इस संबंध में पूछा और सामाजिक न्याय की चर्चा की। उन्होंने जो कुछ कहा, उसका मेरे जीवन पर भारी असर पड़ा। ऋषितुल्य पारस बाबू ने कहा कि आप जिस पृष्ठभूमि से आए हैं, उसमें यह सवाल स्वाभाविक है। पर यह कोई लोहियावादी पार्टी का दफ्तर नहीं है। यदि यहां ब्राह्मण भरे पड़े हैं तो यह अकारण नहीं हैं। ब्राह्मण विनयी और विद्या व्यसनी होते हैं। ये बातें पत्रकारिता के पेशे के अनुकूल हैं। यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए। अन्यथा, पहले आप जो करते थे, फिर वही करिए।

मैंने पारस बाबू की बातों की गांठ बांध ली। उसके अनुसार चलने की आज भी कोशिश करता रहता हूं। उसमें मेहनत, लगन और ध्यान केंद्रण अपनी ओर से जोड़ा। यदि 1977 के बाद के शुरूआती वर्षों में पत्रकारिता के बीच के अनेक ब्राह्मणों ने मुझे शंका की दृष्टि से देखा,वह स्वाभाविक ही था।उन्हें लगा कि पता नहीं मैं अपने काम में सफल हो पाऊंगा या नहीं। पर पारस बाबू की शिक्षा मेरे जीवन में रंग दिखा चुकी थी। नतीजतन मेरे पत्रकारीय जीवन में एक समय ऐसा आया जबकि देश के करीब आध दर्जन जिन प्रधान संपादकों ने मुझे स्थानीय संपादक बनाने की दिल से कोशिश की, उनमें पांच ब्राह्मण ही थे।उनमें से एक -दो तो अब भी हमारे बीच हैं। मैं इसलिए नहीं बना क्योंकि मैं खुद को उस जिम्मेदारी के योग्य नहीं पाता। पर, आज भी मेरे पास लिखने-पढ़ने के जितने काम हैं ,वे मेरी क्षमता से अधिक हैं। पैसे के मामले में भी संतुष्टि है। नौकरी में रहते हुए जितने पैसे मुझे मिलते थे, उससे अधिक अब भी मिल जाते हैं। मूल्य वृद्धि को ध्यान में रखने के बावजूद। यह सब पारस बाबू के गुरू मंत्र का कमाल है। मैंने तो अपने जीवन में ‘आरक्षण’ का विकल्प ढूंढ लिया। वैसे यह बता दूं कि मैं अनारक्षित श्रेणी वाले समाज से आता हूं।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की एफबी वॉल से.

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सहारनपुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार!

-एस.आर.दारापुरी-

संयोजक जन मंच उत्तर प्रदेश एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति उत्तर प्रदेश

सभी भलीभांति अवगत हैं कि 5 मई, 2017 को सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव के दलितों के घरों पर उस क्षेत्र के ठाकुरों ने हमला किया था. इसमें लगभग दो दर्जन दलित बुरी तरह से घायल हुए थे और 50 से अधिक घर बुरी तरह से जला दिए गये थे. उक्त हमले में रविदास मंदिर की मूर्ती तोड़ी गयी थी और मंदिर को बुरी तरह से जलाया तथा क्षतिग्रस्त किया गया था. उक्त हमले में एक ठाकुर लड़का जिसने रविदास मंदिर में घुस कर कोई ज्वलनशील पदार्थ छिड़क कर रविदास मंदिर को जलाया था तथा मूर्ती तोड़ी थी दम घुटने के कारण मंदिर से बाहर निकलते ही बेहोश हो गया था और बाद में मर गया था. इस पर हजारों की संख्या में ठाकुरों ने दलित बस्ती पर हमला किया था. हमले में दो दर्जन के करीब दलित बुरी तरह से घायल हुए थे, एक औरत की छाती काटने की कोशिश की गयी थी, दलित औरतों की इज्ज़त लूटने की कोशिश की गयी, ज्वलनशील पदार्थ छिडक कर घरों को जलाया गया और गाय/ भैसों तक को घायल किया गया.

जिस समय ठाकुर लोगों ने दलित बस्ती पर हमला किया उस समय पुलिस मौके पर मौजूद थी परन्तु उसने भी रोकने की बजाये हमलावरों को तांडव करने का खुला मौका दिया. जांच के दौरान औरतों ने हमें बताया था कि पुलिस वाले दंगाईयों को कह रहे थे कि आपको दो-तीन घंटे का समय दिया जाता है, जो कुछ करना है कर लो. इस प्रकार पुलिस ने बचाने की बजाये दलितों के घरों को जलाने, उन्हें घायल करने तथा लूटने में पूरा सहयोग दिया. पुलिस की यह भूमिका दलितों के प्रति दुर्भावनापूरण रवैइये का प्रतीक है.

इतना ही नहीं पुलिस ने दलितों के विरुद्ध ठाकुरों की तरफ से 5 मुक़दमे दर्ज किये जिन में 9 दलितों को नामज़द किया गया परन्तु दलितों की तरफ से ठाकुरों के विरुद्ध केवल एक मुकदमा दर्ज किया गया जिसमे 9 ठाकुर नामज़द तथा काफी अन्य को आरोपी बनाया गया था. इस पर पुलिस ने 8 दलितों को तो उसी दिन गिरफ्तार कर लिया और केवल 9 ठाकुरों को गिरफ्तार किया गया. इसके बाद में एक अन्य दलित को भी गिरफ्तार किया गया परन्तु ठाकुरों की तरफ से कोई भी अन्य गिरफ्तारी नहीं की गयी जबकि तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने हमारी जांच टीम को बताया था कि उन्होंने लगभग 40 ठाकुर हमलवरों को चिन्हित कर लिया है और उनकी गिरतारी जल्दी ही की जाएगी परन्तु आज तक कोई भी गिरफ्तारी नहीं की गयी.  इसके लगभग तीन हफ्ते बाद जब मायावती शब्बीरपुर गयी तो उस दिन जिला प्रशासन की लापरवाही के कारण शब्बीरपुर से लौट रहे एक दलित लड़के की हत्या कर दी गयी जिसमे केवल दो ठाकुर लड़कों की गिरफ्तारी की गयी.

पुलिस के पक्षपाती रवैये का इससे बड़ा क्या सुबूत हो सकता है है कि पुलिस ने पिटने वाले दलित और पीटने वाले ठाकुरों के साथ एक जैसा बर्ताव किया है. बराबर की गिरफ्तारियां की गयी है. दो दलितों तथा दो ठाकुरों पर एनएसए लगा दिया गया है और सभी लोग जेल में हैं. परिस्थितियों से पूरी तरह स्पष्ट है कि दलितों ने अपने बचाव में जो भी पथराव किया वह आत्मरक्षा में ही किया था. परन्तु दलितों द्वारा आत्मरक्षा में की गयी कारवाही को भी हमलावर ठाकुरों पर हमले के रूप में लिया गया और उनकी गिरफ्तारियां की गयीं जबकि आईपीसी की धारा 100 में प्रत्येक नागरिक को आत्मरक्षा में कार्रवाही करने का अधिकार है. इस प्रकार एक तो दलितों पर ठाकुरों द्वारा अत्याचार किया गया और दूसरे पुलिस ने उन्हें आत्मरक्षा के अधिकार का लाभ न देकर गिरफतार किया गया. इस प्रकार दलित दोहरे अत्याचारका शिकार हुए हैं.

हमारी टीम द्वारा जांच के दौरान औरतों ने यह बताया था कि हमलावरों के पास गुब्बारे थे जिसको फेंक कर आग लगाई गयी थी. इससे स्पष्ट है कि दलितों पर हमला पूर्व नियोजित था. औरतों का कहना था कि हमलावरों की मोटर साईकलों की डिग्गियों में किसी ज्वलनशील पदार्थ से भरे हुए गुबारे थे और सृन्ज आदि भी थी जिस से वे कुछ छिडक कर आग लगा रहे थे. हम लोगों ने इस बात का उल्लेख अपनी जांच रिपोर्ट में भी किया था परन्तु पुलिस ने इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर दिया. प्रशासन द्वारा दलितों के घरों तथा सामान के नुक्सान का आंकलन कराया गया था परन्तु अब तक जो मुयाव्ज़ा दिया गया है वह ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही है. जो दलित ठाकरों द्वारा लिखाये गये मुकदमों में नामज़द हैं और जेल में हैं उन्हें न तो सरकार की तरफ से नुक्सान की भरपाई हेतु कोई मुवावजा मिला है और न ही एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत मिलने वाली अनुग्रहराशी ही मिली है. इसके इलावा गिरफ्तार हुए दलितों को निजी वकील रखने पर भी खर्चा करना पड़ रहा है.

यह भी उल्लेखनीय है कि दलितों को घटना से एक दिन पहले ही आभास हो गया था कि 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती पर दलितों पर हमला हो सकता है. इसी लिए ग्राम प्रधान ने उसकी सूचना पुलिस अधिकारियों तथा एसडीएम को दे दी थी परन्तु इसके बावजूद भी उस दिन दलितों की सुरक्षा के लिए पुलिस का कोई उचित प्रबंध नहीं किया गया. इसके साथ ही जब 9 मई को भीम आर्मी ने प्रशासन द्वारा शब्बीरपुर में हुए हमले के सम्बन्ध में वांछित कारवाही न करने पर विरोध जिताने की कोशिश की तो पुलिस द्वारा बलप्रयोग किया गया. इस पर भीम आर्मी के सदस्यों तथा पुलिस के बीच मुठभेड़ होने पर भीम आर्मी के संयोजक चन्द्र शेखर तथा उसके साथियों के विरुद्ध 21 मुक़दमे दर्ज कर लिए गए. इसके बाद चन्द्र शेखर सहित 40 लोगों को गिरफतार करके जेल में डाल दिया गया. जिनमे से दो लोग अभी तक जेल में हैं. चन्द्र शेखर और वालिया को छोड़ कर भीम आर्मी के अन्य गिरफ्तार सदस्यों की जमानत हो चुकी है. इन दोनों की जमानत जिला स्तर से रद्द हो चुकी है और अब यह इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित है. जेल में चन्द्र शेखर की सेहत बराबर गिर रही है और 28 अक्तूबर को उसे जिला अस्पताल में आईसीयू में भर्ती करवाना पड़ा था.

भीम आर्मी के दमन की ताज़ा उदहारण यह है कि कुछ दिन पहले जब भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर को इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिली तो उसके जेल से छूटने के पहले ही उस पर रासुका लगा दिया गया. दरअसल योगी सरकार नहीं चाहती की चंद्र्शेखर किसी भी हालत में जेल से बाहर आये क्योंकि उसके बाहर आने पर दलितों के लामबंद होने का खतरा है. सरकार की यह कार्रवाही रासुका जैसे काले कानून का खुला दुरूपयोग है. इस कानून के अंतर्गत आरोपी को बिना किसी कारण के एक साल तक जेल में रखा जा सकता है. यह नागरिकों के लोकतान्त्रिक अधिकारों का खुला उलंघन है..

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि सहारनपुर में शब्बीरपुर के दलित आत्मरक्षा में कार्रवाही करने पर भी गिरफ्तार किये गये और उनकी गिरफ्तारियां हम्ला करने वाले ठाकुरों के समतुल्य ही की गयीं. रासुका के मामले में भी उन्हें हमलावरों के समतुल्य रखा गया है. पीड़ित दलितों को बहुत कम मुयाव्ज़ा दिया गया है  और जो दलित मुकदमों में नामज़द हैं उन्हें कोई भी मुयाव्ज़ा नहीं मिला है. इस प्रकार शब्बीरपुर के दलित एक तरफ जहाँ ठाकुरों के हमले का शिकार हुए हैं वहीँ दूसरी ओर वे प्रशासन के पक्षपाती रवैइये का भी शिकार हो रहे हैं. इसके इलावा भीम आर्मी के दो सदस्य अभी भी जेल में हैं और तीन दर्जन से अधिक नवयुवक पुलिस से मजामत के मुकदमे झेल रहे हैं. पुलिस ने भीम आर्मी के एक पदाधिकारी की गिरफ्तारी के लिए 12000 का इनाम घोषित कर रखा है. सरकार द्वारा हमलावरों के विरुद्ध सखत कार्रवाही न करने के कारण उनके हौसले बुलंद हैं और वे अभी भी दलितों को  धमका रहे है. इस प्रकार सहारन पुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार हो रहे हैं. इस उत्पीडन के विरुद्ध सभी दलित संगठनों और प्रगतिशील जनवादी ताकतों को एकजुट हो कर संघर्ष करने की ज़रुरत है. स्वराज अभियान और स्वराज इंडिया सहारन पुर के दलितों के संघर्ष में पूरी तरह से सहयोग दे रहा है.

I.P.S.(Retd) S.R.Darapuri से संपर्क Mob 919415164845 के जरिए किया जा सकता है.

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एक दलित नौजवान चंद्रशेखर से राष्ट्र को क्या खतरा है कि उस पर रासुका लगाना पड़ा?

Nadim S. Akhter : एक दलित नौजवान चंद्रशेखर ने ऐसा क्या किया कि उसे हाई कोर्ट से जमानत मिलते ही राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका लगाकर फिर अंदर कर दिया!! जेल वो अपने पैरों पे चलकर गया था, बाहर व्हील चेयर पे निकला। अंदर उसके साथ इस तंत्र ने क्या किया, ये अंदाजा लगा लीजिए।

सवाल यही है कि चंद्रशेखर से राष्ट्र को क्या खतरा है कि उसपर रासुका लगाना पड़ा? ये तो इंदिरा की इमरजेंसी के भी बाप हो गए। इंदिरा ने तो बाकायदा इमरजेंसी घोषित की थी, ये तो अघोषित इमरजेंसी वाली स्थिति है।

कहाँ हैं दलितों के मसीहा मायावती, रामविलास पासवान, उदितराज एंड कंपनी? किसी के मुंह से बकार क्यों नहीं निकल रही है??

क्या सरकारें इस मामले पे स्पष्टीकरण देंगी?! इतना भी मत गिरिए सर! वाजपई जी वाला POTA याद है ना? जनता ने इस कानून को खत्म कर दिया था। अपना लोकतंत्र मुर्गी का चूज़ा नहीं कि झपट्टा मारके जेब में डाल लिया। ये अजगर है, पार्टी और नेता को एक साथ निगल जाता है और डकार भी नहीं लेता। ऐसे निशान मिटाता है कि पता भी नहीं चलता के आप कभी थे भी!

चाहें तो बिहार के जीतन राम मांझी की गवाही ले लीजिए!!

वरिष्ठ पत्रकार नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर पर रासुका दलित दमन का प्रतीक : दारापुरी

लखनऊ : “भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर पर रासुका दलित दमन का प्रतीक”- यह बात आज एस.आर. दरापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति, उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने आगे कहा है कि यह उल्लेखनीय है कि चंद्रशेखर को एक दिन पहले ही इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिली थी जिसमे न्यायालय ने माना था कि उसके ऊपर लगाये गये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं.

इस कार्रवाही से स्पष्ट है कि योगी सरकार किसी भी हालत में चन्द्रशेखर को जेल से बाहर नहीं आने देना चाहती क्योंकि उसे डर है कि उसके बाहर आने से दलित वर्ग के लामबंद हो जाने की सम्भावना है. इसे रोकने तथा भीम आर्मी को ख़त्म करने के इरादे से सरकार ने चन्द्रशेखर पर रासुका लगा कर तानाशाही का परिचय दिया है. इसी ध्येय से सरकार ने भीम आर्मी के लगभग 40 सदस्यों पर मुक़दमे लाद दिए हैं जिनमे अधिकतर छात्र हैं जिनका भविष्य अधर में लटक गया है.

दरअसल सहारनपुर के शब्बिरपुर के दलित अब तक दोहरे दलित उत्पीडन का शिकार हो रहे हैं. एक तो ठाकुरों द्वारा उनके घर जलाये गये और  चोटें पहुंचाई गयीं,  दूसरे उन्हें ही ठाकुरों पर हमले के आरोपी बना कर जेल में डाला गया. वर्तमान में शब्बीरपुर के 9 दलित जेल में है और उनमे से 2 पर रासुका भी लगाया गया है. दलितों को अब तक मिला मुयाव्ज़ा नुक्सान के मुकाबले बहुत कम है. दलितों द्वारा ठाकुरों के हमले से बचने के लिए की गयी आत्मरक्षा की कार्रवाही को भी ठाकुरों पर हमला मान कर केस दर्ज कर गिरफ्तारियां की गयी हैं. इस प्रकार सहारनपुर के दलित दोहरे उत्पीडन का शिकार हुए हैं. शब्बीरपुर के दलितों पर ठाकुरों द्वारे हमले तथा पुलिस द्वारा भीम आर्मी का दमन एवं चन्द्र शेखर पर रासुका योगी सरकार के दलित दमन का प्रतीक है जिसका सभी दलित संगठनों एवं जनवादी ताकतों द्वारा मज़बूती से विरोध किया जाना चाहिए.

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चंद्रशेखर पर रासुका लगाकर प्रदेश सरकार ने अपना सवर्ण-सामंती चेहरा उजागर किया

लखनऊ : रिहाई मंच ने भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर पर योगी सरकार द्वारा रासुका लगाने को लोकतान्त्रिक आवाज़ों का गला घोटना करार दिया है. मंच ने कहा है कि पूरे देश में भाजपा के शासन काल में दलितों पर उत्पीडन बढ़ा है और अब तो सरकार अपने शासन-प्रशासन के जरिये खुद दलितों की आवाज़ उठाने वालों के खिलाफ खुलकर सामने आ गयी है. मंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सवर्ण- सामंती सरकार का दलित विरोधी चेहरा अब खुलकर सामने आ गया है.

रिहाई मंच नेता और भीम आर्मी डिफेन्स कमेटी सदस्य अनिल यादव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में लगातार सांप्रदायिक तनाव और हिंसा हो रही है जिसमे भाजपा और संघ परिवार के लोग शामिल है, उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश की पुलिस एफआईआर तक दर्ज नही कर रही है. वहीँ दूसरी तरफ दलितों के लिए इन्साफ की आवाज़ उठाने वाले चंद्रशेखर पर रासुका लगाकर प्रदेश की सवर्ण-सामंती सरकार इंसाफ का गला घोटने का काम किया है. उन्होंने कहा कि शब्बिरपुर में मुख्यमंत्री की जाति से ताल्लुक रखने वाले दलितों का घर जलाने वालों पर उत्तर प्रदेश की पुलिस ने कोई कड़ी कार्यवाही तक नही की और दूसरी तरफ दलित जाति के लोगों की जाति पूछ –पूछकर मुकदमा किया गया और अब भीम आर्मी के नेता पर रासुका लगाया जा रहा है जिससे साफ़ हो गया है कि प्रदेश की सवर्ण सामन्ती सरकार चंद्रशेखर को लम्बे समय तक जेल में फर्जी ढंग से फंसाकर रखना चाहती है. जिसको प्रदेश की अमन और इंसाफ पसंद आवाम बर्दाश्त नही करेगी.

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यूपी से सपा का साफ रहना पिछड़े वर्ग के हित में है! वजह बता रहे वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र

Satyendra PS : यूपी से सपा का सफाया जारी रहना पिछड़े वर्ग के हित में है। पिछड़े वर्ग की एकता के लिए जरूरी है कि अहीरों में 30 साल के सपा के शासन ने जो ठकुरैती भर दी है वो निकल जाए, वो अपने को पिछड़ा वर्ग का समझने लगें। मुलायम सिंह ने जब संघर्ष किया तो उसमें बेनी प्रसाद, आजम खां, मोहन सिंह, जनेश्वर मिश्र जैसे लोग उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। धीरे धीरे करके एक एक नेता को ठिकाने लगाया गया। उसके बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और ब्लाक अध्यक्ष तक यादव यादव हो गया। इतना ही नहीं, हेलीकाप्टर, जहाज, कार से लेकर साइकिल तक यादव हो गया।

ठहरिए जरा, इतना ही नहीं हुआ। 2 साल पहले मेरे एक वरिष्ठ मित्र ने पूछा कि सपा क्यो हारेगी ? तो उन्हें मैंने कहा था कि हर थाना यादव हो गया है और किसी यादव के खिलाफ एफ आई आर नहीं लिखा जाता। यह मैंने Akhilesh Yadav के ट्विटर हैंडल पर भी कहा था कि आपके समर्थन में प्रतिक्रिया देने वाले सिर्फ यादव क्यो हैं, पता नहीं वह फेसबुक ट्विटर पढ़ते हैं या नहीं, लेकिन इस उम्मीद में लिख दिया था कि शायद किला बचा लें। चलिए यह भी ठीक। लेकिन गांव मोहल्ले तक के दूधिये भी यदुवंशी क्षत्रिय हो गए हैं और वो अन्य पिछड़े वर्ग, दलितों पर हमले बोल रहे हैं ( क्षत्रिय ब्राह्मण के समानांतर खड़े होने की औकात तो हुई नहीं है)। ऐसे में यह जरूरी है कि सपा सत्ता से बाहर रहकर संघर्ष करे और अपने पतन की समीक्षा करे। 

यह एक विचार है, जिसके पक्ष या विपक्ष में प्रतिक्रिया दी जा सकती है।

बिजनेस स्टैंडर्ड दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र पी सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

CB Singh सपा ने नव सामंतवाद का नया इतिहास लिखा। हमारा समर्थन इसलिए था कि जो आगे बढ़ रहें है उनका नेतृत्व स्वीकार कर उनका साथ देना चाहिए क्योंकि सामंतवाद के खिलाफ लड़ने में ये कारगर होगा। लेकिन सत्ता मिलते ही नवसामंतवाद का नया इतिहास लिखना शुरु कर दिये।

Satyendra PS यादव सबसे मजबूत कड़ी है ओबीसी की जंजीर का। वो ठाकुर हो गया और उसने खुद को पिछड़े वर्ग से अलग कर लिया।

Piyush Ranjan Yadav अभी सैफई राजवंश के कुँवर साहब के बोल सुनिए वे 2022 में सत्ता पाने का ही दावा ठोंक रहे है और वो भी तब जब सिवाय यादवों के पिछड़ों में कोई जनाधार नहीं बचा रह गया है। उन कामों के उदाहरण देकर बो और उनके चपरकनाती अपनी पीठ ठोंकते है जिन्हें जनता चुनाव में सिरे से खारिज कर चुकी है। हार की हताशा बर्दाश्त नहीं हो रहीं है।

Kanwal Kishor Prajapati आपके विचार से अक्षरसः सहमत।

Dharmendra Rawat Very well explained sir

Vikas Yadav गैर यादवों की बोलती बन्द हो गयी, अब क्यों नही सवाल कर रहे हैं।

Satyendra PS गैर यादव ओबीसी bjp के साथ खुश हैं। उनकी बोलती खुली हुई है। सपा शासन में बोलती बंद थी। कम से कम सपा के रणनीतिकारों को यह समझना चाहिए।

Piyush Ranjan Yadav पिछड़ों और दलित में क्रमशः यादव व जाटव को छोड़कर शेष वर्ग क्रमशः स पा और ब स पा को 2014 में ही छोड़ गया था। 2017 के यूपी विधानसभा के चुनावों ने उसी trend को जारी रखा।

Satyendra PS अभी भी जारी है वो ट्रेंड।

डॉ सुनील पटेल शास्त्री पिछडो को चाहे जितने सूरज दिखाओ, उन्हें अमावस ही पसंद आती है।

Vikas Yadav हारेगी या जीतेगी वो बात अलग है। सचाई आपको भी अच्छी तरह से पता है।

Satyendra PS सच्चाई तो यही है कि ओबीसी बीजेपी के साथ फ़िलहाल खुश हैं।

Vikas Yadav सुनील जी हर व्यक्ति एक जैसे नहीं हैं। कौन खुद को क्या समझता है उसका व्यक्तिगत मामला है। क्या हिन्दू कुर्मी समाज नहीं बना क्या चुनाव में।

डॉ सुनील पटेल शास्त्री पहली बात जाति व्यक्तिगत मामला नही है।दूसरी बात मैने सब पिछडो पर टिप्पणी की। कुछ सच्चाई आप भी जानते हैं, पर स्वीकार नही कर पा रहे हैं।

Satyendra PS कुर्मी तो लम्बे समय से सपा से खार खाए हैं। उसके अलावा भी जो ओबीसी हैं, सपा से कटे हुए हैं।

Vikas Yadav कटना भी जरूरी है।।सब हिस्सा यादव खा जा रहे है और दलित पिछडो का उत्पीड़न कर तो कटेगा ही ना।।

Satyendra PS लेकिन 10 साल बाद बड़े दुख में रहेंगे। तब तक सपा और ओबीसी के नेतृत्वकर्ता यादव की भी अच्छे से तबीयत हरी हो जाएगी। फिर शायद पिछड़ा वर्ग बने 1989 और 1991 वाला।

Vikas Yadav अब कौन सा समय आएगा वो तो वक्त ही बताएगा फिलहाल रामराज्य मजा लीजिये।।

Piyush Ranjan Yadav एकदम सहमत। यादवी वर्चस्व से पिछड़ों को इकठ्ठा होने की मुहीम को धक्का लगा और वह सब बिखर गए। यादवों में भी कवरियाँ घोषी बाद दवा कर चलाया गया। यादव भी जिंदाबाद करने के लिए था सत्ता कुर्सी सब सैफई राजवंश के पास या उनके पालतुओं के पास बनी रही जो सवाल न पूछ सकें।

Vikas Yadav 1989 और 1991 का पिछड़ा वर्ग का सपना छोड़ दीजिये।।जो है उसी को बचा ले वही बहुत है।।

Satyendra PS Piyush Ranjan Yadav ji हमको तो कांग्रेस का चांस लग रहा है कि वो अगर बढ़िया से ओबीसी खेल गई तो अच्छा रिकवर करेगी। राजस्थान मध्य प्रदेश में तो गुज्जर कुर्मी खेल ही रही है। यूपी में भी बाबा लोग योगी जी से भरे बैठे हैं, ओबीसी को भी अगर ठीक रणनीति बनाई तो खींच लेगी।

Piyush Ranjan Yadav सर गुजरात के चुनाव परिणाम के बाद कुछ कह पाना सम्भव हो पायेगा।

Satyendra PS हां, गुजरात अहम है। उसका असर राजस्थान एम पी पर भी पड़ सकता है। यूपी में तो अभी जमीन में धंसे हैं।

Surendra Pratap Singh कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जिसका बुरा दौर न आया हो आज अगर सपा और बसपा जैसे दल बुरे दौर में दिख रहे हैं तो उन्हें इसे आत्म चिंतन के लिए प्रयोग में लेना चाहिए | इन दलों में जरूर ऐसा कुछ बुरा हो रहा है जिसे रोका जाना अत्यंत आवश्यक है |

Pradeep Yadav बहुत सटीक…इन्हें sc bc और अल्पसंख्यक की लड़ाई लड़नी थी या खुद क्षत्रिय बनने चल पड़े

Dhananjai Yadav Gair yadav..ke naam par ..sarkar bani….aur bante hi..aukat bata di bjp..ne sabki…..ab koi nahi pucha ki thane me kitne ..thakur ..jile me kitne ..thakur ..sp dm hai……puchne ki himmat hai.kya….mansik ghulamo ki…

Satyendra PS हाँ। यह वैसे ओपन सेक्रेट है। यूपी के चुनाव के बारे में मेरा अंदाजा यही था कि सपा 2 नम्बर पर रहेगी बसपा और बीजेपी में मुकाबला है कि कौन पहले और कौन तीसरे पर रहेगा। ओबीसी वोट छोड़कर मायवती मुसलमान वोट की ओर भागीं और गच्चा खा गईं। ऐसा कि दलित भी उनके हाथ से निकल गया।

Raghubir Singh Apka vishlezhan sabi hai yadav kaise kdhstriya ho jayrnge jab vizhvamitta kdhsttiiya she Brahman nAhin ho paya

Satyendra PS अभी तो 5 साल यही जश्न चलेगा कि अहीर साफ हुए। उसके बाद अहीर भी औकात में आएंगे कि वो ओबीसी हैं।
फिर सत्ता में आ सकते हैं।

Dhananjai Yadav Ahir satta me rahe ..na rahe..lekin koi saaf nahi kar..payega…Satyendra PS ..sir..

Deepak Pandey सपा के लिए मुझे व्यक्तिगत तौर पर अखिलेश की बजाय शिवपाल ज्यादा उपयुक्त लगते हैं।

Alok Mall समसामायिक विश्लेषण

Satyendra PS यह गफलत निकलनी जरूरी है धनन्जय भाई, तभी लोगों को औकात समझ मै आएगा कि 30 साल में मुलायम ने क्या दिया है। 30 साल पहले जो अंडा थे और अब राष्ट्रवादी बच्चा बनकर उभरे हैं उन्हें दुनिया देखना जरूरी है।

Dhananjai Yadav Aapki baat bahut hud tak sahi..hai…tabhi bhugat bhi ..rahe..hai…..sapa ko…agar ..badhana hai..satta me aana hai…to..obc ko apne sath ..jodna hi hoga……warna result samne hai….

Satyendra PS Deepak Pandey यही तो प्राब्लम है। मुलायम तक ठीक था। जैसे जैसे सपा शिवपाल, रामगोपाल, अखिलेश , धर्मेंद्र, और पता नही कौन कौन होती गई, उसकी दिक्कत बढ़ गई। मुलायम के बाद शिवपाल ही क्यों ? आजम खां या बेनी प्रसाद या गायत्री प्रजापति क्यो नहीं?

Pradeep Yadav नेता सपा को यादवमय होने से बचाये रहे….समस्त obc जातियां 2012 में नेता के आश्वासन पर साथ आने को तैयार हुईं….नेताजी के किनारे लगते ही सपा को यादवमय कर दिया गया और इसका प्रोपगेंडा वास्तविकता से भी अधिक हुआ लिहाजा मंडल राजनीति पूरे देश में चारो खाने चित हुयी

Deepak Pandey बहुत सही सवाल किया है आपने। अन्य परिवार के लोगों और मौजूदा नामों को छोड़ दूं तो शिवपाल उनमें सबसे बेहतर हैं। उन्हें केवल परिवार की वजह से तौला नहीं जा सकता। ग्राउंड पर उनकी दूसरो की अपेक्षा बेहतर पकड़ है।

Veer Bhadra Pratap Singh मुझे ऐसा लगता हैं कि यादव हमेशा गलत के खिलाफ खडा़ हो जाता है इसलिए ज्यादा बदनाम हैं….

Satyendra PS Pradeep Yadav भाई विपक्ष तो लाभ उठाने के लिए बैठा ही रहता है। खासकर ऐसी स्थिति में, जब मानसिक, राजनीतिक, बौद्धिक रूप से कमजोर वर्ग वोटर हो। कम से कम नेतृत्व के लेवल पर अगर ओबीसी की एकता होती तो नीचे भी कुछ असर पड़ता।…See more

Pradeep Yadav ठीक कह रहे हैं भैया

Kamal Sharma यादव कुल की ठकुराई निकलने पर ही अक्‍ल आएगी क्‍योंकि इस समय अक्‍ल नहीं भैंस बड़ी है इनके लिए।

Satyendra PS भैंस तो हमेशा बड़ी रहेगी। चाहे जो सत्ता में आए

Sunil Rawat ठीक कह रहे हैं सर सपा और बसपा की सोच हो गई थी कि बाकी सब कहां जायेगा ।

Nikesh Singh वो भी समाजवादी पार्टी करने लगे थे जिन्हें समाजवाद तक का मतलब मालूम नहीं

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धमकियों के कारण दलित चिंतक प्रो. कांचा इलैया ने खुद को हफ्ते भर से अपने घर में कैद कर रखा है!

प्रो. कांचा इलैया शेफर्ड के पक्ष में उतरे ढेर सारे साहित्यकार और कई संगठन…. दलित चिंतक प्रो. कांचा इलैया शेफर्ड ने पिछले एक हफ्ते से अपने को हैदराबाद के अपने घर में बंद कर रखा है। कारण है, उनकी किताब ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ के एक अध्याय पर आर्य वैश्य समुदाय की आहत भावनाएं। 9 सितम्बर से उन्हें इस आहत समुदाय द्वारा जान की धमकियां मिल रही हैं। तेलुगु देशम पार्टी के एक सांसद टी जी वेंकटेश ने प्रेस कांफ्रेंस करके उन्हें चौराहे पर फांसी देने की बात कही। कुछ दिन पहले उनकी कार पर हमला भी किया गया, जिससे वे बाल-बाल बचकर निकले। तेलंगाना सरकार ने इन तमाम घटनाओं के बावजूद उन्हें अभी तक कोई सरकारी सुरक्षा प्रदान नहीं की है।

यह पूरा प्रकरण और इसे लेकर तेलंगाना सरकार का रवैया घोर आपत्तिजनक और निंदनीय है। जनवादी लेखक संघ कांचा इलैया की अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में खड़ा है और यह मांग करता है कि सरकारी एजेंसियां कांचा इलैया की सुरक्षा, उनकी लिखने बोलने की आज़ादी की सुरक्षा और धमकियां देने वालों पर उचित कार्रवाई सुनिश्चित करे।
2 अक्टूबर, गांधी जयन्ती के मौक़े पर लेखक और संस्कृतिकर्मी दिल्ली के जंतर मंतर पर कांचा इलैया के समर्थन में इकट्ठा हुए. इसमें जो जो संगठन शामिल रहे, उनके नाम इस प्रकार हैं- दलित लेखक संघ, सेंटर फॉर दलित लिटरेचर एंड आर्ट, समता साहित्य समिति, प्रगतिशील लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और जनवादी लेखक संघ। हम सभी लेखकों का आह्वान करते हैं कि अपनी एकजुटता दिखाकर प्रो. कांचा इलैया के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करें।

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)
जनवादी लेखक संघ

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हरिशंकर तिवारी के यहां दबिश पर विधानसभा से वाकआउट करने वाली मायावती सहारनपुर के दलित कांड पर चुप क्यों हैं?

लखनऊ : “मायावती की सहारनपुर के दलित काण्ड पर चुप्पी क्यों?” यह बात आज एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व आई.जी. व प्रवक्ता उत्तर प्रदेश जनमंच एवं सस्यद, स्वराज अभियान ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि एक तरफ जहाँ मायावती हरीशंकर तिवारी के घर पर दबिश को लेकर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष को गोरखपुर भेजती है और विधान सभा से वाक-आऊट कराती है वहीं मायावती सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलितों पर जाति-सामंतों द्वारा किये गए हमले जिस में दलितों के 60 घर बुरी तरह से जला दिए गए, 14 दलित औरतें, बच्चे तथा बूढ़े लोग घायल हुए में न तो स्वयम जाती है और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को ही भेजती है. वह केवल एक सामान्य ब्यान देकर रसम अदायगी करके बैठ जाती है.

इसके इलावा शब्बीरपुर के दलितों पर हमले के दोषी व्यक्तियों की गिरफ्तारियां तथा दलितों को मुयाव्ज़ा तथा न्याय दिलाने के लिए आवाज़ उठाने वाली भीम सेना से बिलकुल पल्ला झाड़ लेती है. वर्तमान में पुलिस भीम सेना के लगभग तीन दर्जन सदस्यों की गिरफ्तारियां करके उनका उत्पीड़न कर रही है और मायावती बिलकुल खामोश है. क्या मायावती का यह कृत्य उसकी सर्वजन की राजनीति का ही हिस्सा नहीं है जिस में दलितों की अपेक्षा सवर्णों के हित अधिक हावी हैं? मायावती को इस मामले में अपनी चुपी का जवाब ज़रूर देना पड़ेगा.

श्री दारापुरी ने आगे कहा है कि जबसे उत्तर प्रदेश में जोगीजी की सरकार बनी है तब से जाति-सामंतों के  हौसले बहुत बुलंद हो गए हैं और वे खुल कर अल्पसंख्यकों और अब दलितों पर हमले कर रहे हैं. सरकार द्वारा निष्पक्ष कार्रवाही न करके उन दबंगों को ही संरक्षण देने की सबसे बड़ी उदाहरण सहारनपुर के सांसद राघव लखनपाल शर्मा द्वारा 20 अप्रैल को पहले बिना अनुमति आंबेडकर जुलूस निकाल कर दलित और मुस्लिम संघर्ष कराने का प्रयास करने तथा बाद में पुलिस अधीक्षक के घर पर तोड़फोड़ करने पर भी उसके खिलाफ कोई भी कार्रवाही न किया जाना है. यदि उक्त मामले में लखनपाल शर्मा के विरुद्ध कानूनी कार्रवाही हो गयी होती तो जाति-सामंतों के हौसले इतने बुलंद नहीं होते और शायद शब्बीर पुर में दलितों पर हमले का काण्ड भी नहीं होता. इससे पूरे प्रदेश में अल्पसंख्यकों और दलितों में असुरक्षा की भावना व्याप्त हो गयी है. 

एस.आर.दारापुरी
प्रवक्ता, उत्तर प्रदेश जन मंच
सदस्य स्वराज अभियान
मोब: 9415164845   

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दलित प्रोफेसर वाघमारे के जातीय उत्पीड़न की अंतहीन दास्तान

प्रोफेसर सुनील वाघमारे 34 साल के नौजवान हैं, जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के खोपोली कस्बे के एमसी कॉलेज में कॉमर्स डिपार्टमेंट के हेड रहे हैं और इसी महाविद्यालय के वाईस प्रिंसीपल भी रहे हैं. उत्साही, ईमानदार और अपने काम के प्रति निष्ठावान वाघमारे मूलतः नांदेड के रहने वाले हैं. वाणिज्य परास्नातक और बीएड करने के बाद वाघमारे ने वर्ष 2009 में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर इस कॉलेज को ज्वाइन किया था. वर्ष 2012 तक तो सब कुछ ठीक चला. मगर जैसे ही वर्तमान प्राचार्य डॉ एनबी पवार ने प्रिंसिपल का दायित्व संभाला, प्रोफेसर वाघमारे के लिये मुश्किलों का दौर शुरू हो गया.

प्राचार्य पवार प्रोफेसर वाघमारे को अपमानित करने का कोई न कोई मौका ढूंढ लेते. बिना बात कारण बताओ नोटिस देना तो प्रिंसिपल का शगल ही बन गया. वाघमारे को औसतन हर दूसरे महीने मेमो पकड़ा दिया जाता. उनके सहकर्मियों को उनके विरुद्ध करने की भी कोशिश डॉ पवार की तरफ से होती रहती. इस अघोषित उत्पीडन का एक संभावित कारण प्रोफेसर वाघमारे का अम्बेडकरी मूवमेंट से जुड़े हुए होना तथा अपने स्वतंत्र व अलग विचार रखना था. संभवतः प्राचार्य डॉ पवार को यह भी गंवारा नहीं था कि एक दलित प्रोफेसर उप प्राचार्य की हैसियत से उनके बराबर बैठे. इसका रास्ता यह निकाला गया कि वाघमारे को वायस प्रिंसिपल की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया तथा अपने वाणिज्य विभाग तक ही सीमित कर दिया गया.

प्रोफेसर सुनील वाघमारे महाराष्ट्र के दलित समुदाय मातंग से आते हैं. वे अपने कॉलेज में फुले, अम्बेडकर और अन्ना भाऊ साठे के विचारों को प्रमुखता से रखते तथा बहुजन महापुरुषों की जयंतियों का आयोजन करते. इससे प्राचार्य खुश नहीं थे. देखा जाये तो वाघमारे और पवार के मध्य विचारधारा का मतभेद तो प्रारम्भ से ही रहा है. धीरे धीरे इस मतभेद ने उच्च शिक्षण संस्थाओं में व्याप्त जातिगत भेदभाव और उत्पीडन का स्वरुप धारण कर लिया और यह बढ़ता ही रहा.

प्रोफेसर वाघमारे ने अपने साथ हो रहे उत्पीड़न की शिकायत अनुसूचित जाति आयोग से करनी चाही तो कॉलेज की प्रबंधन समिति ने उनको रोक लिया तथा उन्हें उनकी शिकायतों का निवारण करने हेतु आश्वस्त भी किया. लेकिन शिकायत निवारण नहीं हुई. उल्टे प्रिंसिपल ने इसे अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और मौके की तलाश में रहे ताकि दलित प्रोफेसर वाघमारे को सबक सिखाया जा सके. मन में ग्रंथि पाले हुए, खार खाए प्रिंसिपल पवार को यह मौका इस साल 15 मार्च को प्रोफेसर वाघमारे के एक व्हाट्सएप मैसेज फोरवर्ड से मिल गया.

दरअसल 15 मार्च 2017 की रात तक़रीबन पौने बारह बजे के एमसी कॉलेज के एक क्लोज्ड ग्रुप पर प्रोफेसर वाघमारे ने एक मैसेज फोरवर्ड किया, जिसका सन्देश था कि  “हम उन बातों को सिर्फ इसलिए क्यों मान लें कि वे किसी ने कही है.” साथ ही यह भी कि “तुम्हारे पिता की दो-दो जयन्तियां क्यों मनाई जाती है”. कहा जाता है कि इसका संदर्भ शिवाजी महाराज की अलग अलग दो तिथियों पर जयंती समारोह मनाने को लेकर था. इस सन्देश पर ग्रुप में थोड़ी बहुत कहा सुनी हुई, जो कि आम तौर पर हरेक ग्रुप में होती ही है. बाद में ग्रुप एडमिन प्रो अमोल नागरगोजे ने इस ग्रुप को ही डिलीट कर दिया.

बात आई गई हो गई क्योंकि यह कॉलेज फेकल्टी का एक भीतरी समूह था जिसमे सिर्फ प्रोफेसर्स इत्यादि ही मेम्बर थे. लेकिन इसी दौरान प्राचार्य महोदय ने अपनी जातीय घृणा का इस्तेमाल कर लिया.  उन्होंने उस वक़्त इस सन्देश का स्क्रीन शॉट ले लिया जब ग्रुप में नागरगोजे तथा वाघमारे एवं प्रिंसिपल तीनों ही बचे थे.  प्राचार्य ने इस स्क्रीन शॉट को योजनाबद्ध तरीके से प्रचारित किया. जन भावनाओं को भड़काने का कुत्सित कृत्य करते हुए प्रोफेसर वाघमारे के खिलाफ अपराधिक षड्यंत्र रचते हुये उनके विरुद्ध भीड़ को तैयार किया. इस सामान्य से व्हाट्सएप फोरवर्ड को शिवाजी का अपमान कहते हुए एक प्रिंसिपल ने अपने ही कॉलेज के एक प्रोफेसर के खिलाफ जन उन्माद भड़काया तथा उन्मादी भीड़ को कॉलेज परिसर में आ कर प्रोफेसर वाघमारे पर हिंसक कार्यवाही करने का भी मौका दे दिया. इतना ही नहीं बल्कि भीड़ के कॉलेज में घुसने से पूर्व ही प्रिंसिपल बाहर चले गये और आश्चर्यजनक रूप से सारे सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गये.

17 मार्च 2017 की दोपहर दर्जनों लोगों ने कॉलेज परिसर में प्रवेश किया तथा कॉलेज मेनेजमेंट के समक्ष प्रोफेसर वाघमारे की निर्मम पिटाई की. उनको कुर्सी से उठा कर लोगों के कदमों के पास जमीन पर बैठने को मजबूर किया गया. भद्दी गालियाँ दी गईं.  मारते हुए जमीन पर पटक दिया और अधमरा करके जोशीले नारे चिल्लाने लगे. इस अप्रत्याशित हमले से वाघमारे बेहोश हो गये और उनके कानों से खून बहने लगा. बाद में पुलिस पहुंची जिसने लगभग घसीटते हुए वाघमारे को अपनी जीप में डाला और थाने ले गयी. थाने में ले जा कर पुलिस सुरक्षा देने के बजाय आनन फानन में वाघमारे पर ही प्रकरण दर्ज करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और पुलिस अभिरक्षा में धकेल दिया गया.

दलित प्रोफेसर सुनिल वाघमारे के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ( ए ) अधिरोपित की गई. उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने शिवाजी का अपमान करते हुए लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काया. ग्रुप एडमिन प्रोफेसर नागरगोजे की शिकायत पर केस दर्ज करवा कर वाघमारे को तुरंत गिरफ्तार कर हवालात में भेज दिया गया. बिना किसी प्रक्रिया को अपनाये कॉलेज प्रबन्धन समिति ने एक आपात बैठक बुला कर प्रोफेसर वाघमारे को उसी शाम तुरंत प्रभाव से निलम्बित करने का आदेश भी दे दिया. इससे भी जयादा शर्मनाक तथ्य यह है कि प्रोफसर वाघमारे को खोपोली छोड़ कर अपने परिवार सहित वापस नांदेड जाने को विवश किया गया. अब वे अपनी पत्नी ज्योत्स्ना और दो जुड़वा बेटियों के साथ लगभग गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

कॉलेज प्रबंधन और प्राचार्य ने महाविद्यालय परिसर में घुस कर अपने ही एक प्रोफेसर पर किये गये हमले के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई शिकायत अब तक दर्ज नहीं करवाई है, जबकि संवाद मराठी नामक एक वेब चैनल पर हमले के फुटेज साफ देखे जा सकते हैं. एक एक हमलावर साफ दिख रहा है. मगर प्राचार्य मौन हैं. वे हमलावरों के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाय वाघमारे के करियर और जीवन दोनों को नष्ट करने में अधिक उत्सुक नज़र आते हैं.

अगर व्हाट्सएप फोरवर्ड शिवाजी महाराज का अपमान था तो उस मैसेज का स्क्रीन शॉट ले कर पब्लिक में फैलाना क्या कानून सम्मत कहा जा सकता है ? कायदे से तो कार्यवाही ग्रुप एडमिन नागरगोजे और स्क्रीन शॉट लेकर उसे आम जन के बीच फ़ैलाने वाले प्राचार्य पवार के विरुद्ध  भी होनी चाहिए. मगर सिर्फ एक दलित प्रोफेसर को बलि का बकरा बनाया गया और उनके करियर, सुरक्षा और गरिमा सब कुछ एक साज़िश के तहत खत्म कर दी गई है.

इस सुनियोजित षड्यंत्र के शिकार प्रोफेसर वाघमारे ने अपनी ओर से खोपोली पुलिस स्टेशन में 1 मई 2017 को प्राचार्य डॉ पवार के विरुद दलित अत्याचार अधिनियम सहित भादस की अन्य धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करवाया है, जिसके लिए भी उन्हें बहुत जोर लगाना पड़ा और अब कार्यवाही के नाम पर कुछ भी होता नज़र नहीं आ रहा है.

उच्च शिक्षा के इदारे में जातिगत भेदभाव और आपराधिक षड्यंत्र करते हुए एक दलित प्रोफेसर के जीवन और करियर को नष्ट करने के इतने भयंकर मामले को लेकर प्रतिरोध की जो आवाजें दलित बहुजन मूलनिवासी आन्दोलन की तरफ से उठनी चाहिए थी, उनका नहीं उठना निहायत ही शर्मनाक बात है. पूरे देश के लोग महाराष्ट्र के फुले अम्बेडकरवादी संस्था, संगठनों, नेताओं से प्रेरणा लेते हैं और उन पर गर्व करते हैं, मगर आज प्रोफेसर वाघमारे के साथ जो जुल्म हो रहा है, उस पर महाराष्ट्र सहित देश भर के भीम मिशनरियों की चुप्पी अखरने वाली है.

आखिर वाघमारे के साथ हुए अन्याय को कैसे बर्दाश्त कर लिया गया? छोटी छोटी बातों के लिए मोर्चे निकालने वाले लोग सड़कों पर क्यों नहीं आये? सड़क तो छोड़िये प्रोफेसर वाघमारे से मिलने की भी जहमत नहीं उठाई गई. देश भर में कई नामचीन दलित संगठन सक्रिय हैं, उनमें से एक आध को छोड़ कर बाकी को तो मालूम भी नहीं होगा कि एक दलित प्रोफसर की जिंदगी कैसे बर्बाद की जा रही है.

जुल्म का सिलसिला अभी भी रुका नहीं है. शारीरिक हिंसा और मानसिक प्रताड़ना के बाद अब प्रोफेसर वाघमारे की आर्थिक नाकाबंदी की जा रही है. नियमानुसार उन्हें निलम्बित रहने के दौरान आधी तनख्वाह मिलनी चाहिए, मगर वह भी रोक ली गई है, ताकि हर तरफ से टूट कर प्रोफेसर वाघमारे जैसा होनहार व्यक्ति एक दिन पंखे से लटक कर जान दे दें… और तब हम हाथों में मोमबत्तियां ले कर उदास चेहरों के साथ संघर्ष का आगाज करेंगे. कितनी विडम्बना की बात है कि एक इन्सान अपनी पूरी क्षमता के साथ अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ अकेला युद्धरत है, तब साथ देने को हम तैयार नहीं है. शायद शर्मनाक हद तक हम सिर्फ सहानुभूति और शोक जताने में माहिर हो चुके हैं.

आज जरूरत है प्रोफेसर सुनिल वाघमारे के साथ खड़े होने की, उनके साथ जो साज़िश की गई, उसका पर्दाफाश करने की, लम्बे समय से जातिगत प्रताड़ना के विरुद्ध उनके द्वारा लड़ी जा रही लडाई को पहचानने तथा केएमसी कॉलेज के प्रिंसिपल की कारगुजारियों को सबके सामने ला कर उसे कानूनन सजा दिलाने की.

यह तटस्थ रहने का वक्त नहीं है. यह महाराष्ट्र में जारी मराठा मूक मोर्चों से डरने का समय नहीं है. यह देश पर हावी हो रही जातिवादी मनुवादी ताकतों के सामने घुटने टेकने का समय नहीं है. यह समय जंग का है. न्याय के लिए संघर्ष का समय है. सिर्फ भाषणवीर बन कर फर्जी अम्बेडकरवादी बनने के बजाय सडक पर उतर कर हर जुल्म ज्यादती का मुकाबला करने की आज सर्वाधिक जरुरत  है. बाद में मोमबतियां जलाने से बेहतर है कि हम जीते जी प्रोफेसर वाघमारे के साथ संघर्ष में शामिल हो जायें. मुझे पक्का भरोसा है वाघमारे ना डरेंगे और ना ही पीछे हटेंगे, उनकी आँखों में न्याय के लिए लड़ने की चमक साफ देखी जा सकती है. बस इस वक़्त उन्हें हमारी थोड़ी सी मदद की जरूरत है.

लेखक भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं. इनसे bhanwarmeghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

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बसपा की तेज़ी से घटती हैसियत से उपजी ‘असुरक्षा’ ने एक अति-अक्रोशित दबंग दलित संगठन को जन्म दे दिया

Surya Pratap Singh : आज के उत्तर प्रदेश में ‘सुगबुगाहट’ से ‘सुलगाहट’ तक की नयी दास्ताँ….पश्चिमी उ.प्र. में जातीय संघर्ष से उपजा दलित ‘उग्रवाद’ …65,000 युवाओं की हथियार धारी अति-उग्र, उपद्रवी ‘भीम-सेना’ का जन्म ……’भीम आर्मी भारत एकता मिशन (BABA Mission)!!! मुज़फ़्फ़रनगर दंग़ो के बाद से धार्मिक उन्माद व जातीय हिंसा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है ….इसमें वोटों की राजनीति हमेशा आग में घी का काम करती रही है…

आज सहारनपुर, जातीय (ठाकुर-दलित) हिंसा से जल रहा है … उन्मादी ‘भीम सेना’ के सैनिक पुलिस को दौड़ा-२ कर पीट रहे है.. ठाकुर जाति भी संगठित हो भीम सेना के उपद्रव का विरोध कर रही है ….. ‘भीम सेना’ द्वारा एक ठाकुर युवा की हत्या व ‘महाराणा प्रताप भवन’ पर हमले/तोड़फोड़ से ठाकुरों में बदले की भावना उद्वेलित हो रही है। दलितों की अति-उग्र ‘भीम सेना’ बसपा समर्थित व ‘असंगठित’ ठाकुर वर्ग अधिकांश भाजपा समर्थित है…..अतः इस जातीय हिंसा में कहीं-न-कहीं राजनीति तो है…

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूर्व सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति ने हिंदूवर्ग में आक्रोश व असुरक्षा का भाव पैदा हुआ और यही मुज़फ़्फ़रनगर दंग़ो का कारण भी बना ………और पिछले कुछ वर्षों से पश्चिमी उ.प्र. में बसपा की तेज़ी से घटती हैसियत से उपजीं ‘असुरक्षा’ ने एक अति-अक्रोशित दबंग दलित संगठन को जन्म दे दिया, जिसका नाम है ‘भीम सेना’….. दलित बाहुल्य गाँवों में इस संगठन ने गहरी पैंठ बनायी है ….65,000 दलित उग्र-युवा इस सेना में भर्ती हैं ….हथियार/डंडों/बर्छों से लेस…इस सेना की बढ़ती शक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके सैनिकों ने हाल के सहारनपुर जातीय संघर्ष में पुलिस को दौड़ा-२ कर पीटा है….. दलित बाहुल्य गाँवों में पुलिस का घुसना मुश्किल हो गया है…..

भाजपा संसाद राघव लखनपाल ने आंबेडकर शोभा यात्रा को लीड किया जिसपर 20अप्रैल को सड़क दुधली गांव में बवाल हुआ और फिर SSP बंगले पर तोड़फोड़ हुई। तब दलित-मुस्लिम संघर्ष बनकर सामने आया था। आज महाराणा प्रताप जयंती के विरोध में ठाकुर-दलित संघर्ष सामने है। शायद राजनीतिक मनसा तो हिंदू-मुस्लिम कराने की थी परंतु दाँव उलटा पड़ा और हो गया ठाकुर-दलित संघर्ष …. अब स्थानीय ‘राजनीतिज्ञों’ को तो निगलते बन रहा है और न उगलते…..

वैसे भी राजनीतिक उद्देश्य का चोला ओढ़े जातीय व धार्मिक सेनाओं/वाहिनियों/स्वंभु रक्षक़ों का युग चल रहा है… पुलिस/प्रशासन के लिए एक अलग चुनौती बन गयी हैं ये सब …. जातीय संघर्ष हिंदू धर्म के लिए भी चुनौती बन गया है…कैसे सभी जातियों को सद्भाव बना हिंदू धर्म एक छतरी के नीचे रहे,यह बड़ी चुनौती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल 6.3 करोड़ की आबादी में 73.47% हिंदू व 24.98% मुस्लिम हैं। वर्तमान जातीय संघर्ष के क्रम में 40 लाख राजपूत 1 करोड़ जाट व 12 लाख दलित जनसंख्या है। जाट व राजपूतों दोनों का ही दलितों से वैमनस्य रहता है। इस क्षेत्र में जाट-दलित संघर्ष की कहानी बहुत पुरानी है….पूरे देश में सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण का भी पुराना इतिहास तो है ही। यह बात अलग है कि ‘आरक्षण’ नामक तथाकथित व्याधि ने इस शोषण की आर्थिक दिशा ही बदल दी है……

मायावती काल में ‘SC/ST Act’ के अंतर्गत बड़े पैमाने पर जाट/ठाकुर/यादवों/पंडितों पर मुक़दमे दर्ज हुए और सवर्ण युवा/वृद्ध ज़ैल गए …. महिलाओं तक भी गिरफ़्तार हुईं, यह सब भी सवर्ण-दलित द्वेष का कारण बना।

ज्ञात हो कि नक्सली हिंसा भी ग़रीबी से उपजीं अंतरजातिय/जनजातीय संघर्ष से ही आरम्भ हुआ था , जो आज एक अपने तरह का आतंकवाद बन चुका है। डर है कि कहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी वर्तमान जातीय संघर्ष नव-आतंकवाद यानी ‘जातीय आतंकवाद’ को जन्म न दे दे ….. पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्या बढ़ते ‘धार्मिक-उन्माद’ व ‘जातीय-हिंसा’ से ‘उपद्रवी क्षेत्र’ तो नहीं बनता जा रहा है ? संभालो…. जल्दी करो, कही देर न हो जाए !!!

जय हिंद-जय भारत!

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की एफबी वॉल से.

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भाजपा नेता ने हड़पी एक दलित की माईन्स, कोर्ट ने दिए जांच के आदेश

भीलवाड़ा, 1 मई 2017 : राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया के कृपापात्र और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी के खासमखास माने जाते हैं भीलवाड़ा नगर विकास न्यास के अध्यक्ष गोपाल खंडेलवाल। इसीलिए उनको यूआईटी की बागडोर दी गई। जिले के उभरते हुए ब्राह्मण नेता हैं। दशकों से भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय हैं। पूर्व में पंचायत राज संस्थाओं में चुने जा चुके हैं। खनन क्षेत्र में बड़ा नाम है। भाजपा की राजनीती के साथ साथ खनन व्यवसायी के रूप में भी उनका बड़ा नाम है।

भीलवाड़ा जिले के ही शिवपुर गांव के निवासी एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति कन्हैया लाल बलाई ने भाजपा नेता गोपाल खंडेलवाल पर अपनी खान (माईन्स) हड़प जाने का आरोप लगाया है। अजा जजा एक्ट के विशिष्ठ न्यायाधीश, भीलवाड़ा के समक्ष दायर एक वाद में कन्हैया लाल ने आरोप लगाया है कि होडा निवासी गोपाल खंडेलवाल ने नया नगर के ब्लॉक 1 में स्थित उसकी 60×30 मीटर क्षेत्रफल की एक माईन्स जो कि कन्हैया लाल बलाई की है, उस पर जबरन कब्ज़ा कर लिया है।

दरअसल भाजपा नेता की भी एक खान दलित कन्हैया की खान से सटी हुई है, इसलिए उसकी खान पर बीजेपी नेता की शुरू से नजर रही है। दलित कन्हैया के मुताबिक पहले तो गोपाल खंडेलवाल ने सिर्फ पत्थर खरीदने की बात कही, फिर कहा कि पत्थर भी हम खोद लेंगे, आपको भुगतान करते रहेंगे। इस तरह उन्होंने बिना किसी अनुबंध के काम शुरू कर दिया और सैंड स्टोन निकाल कर ले जाने लगे। कोई पैसा नहीं दिया। मांगने पर धमकाने लगे तथा अंततः पूरी खान पर ही कब्ज़ा कर लिया।

पीड़ित दलित कन्हैया इसकी शिकायत करने भीलवाड़ा स्थित यूआईटी के ऑफिस गोपाल खंडेलवाल से मिलने अपने दो साथियों के साथ 16 मार्च 2017 को पहुंचा तथा अपनी खान पर कब्ज़ा करने को लेकर शिकायत की। इस पर यूआईटी चैयरमेन गुस्सा हो गए और उन्होंने यह कहते हुए धक्के मार कर बाहर निकाल दिया कि- “मुझे तो तेरी खान के पत्थर चाहिए थे, वो निकाल लिये, अब जो भी तुझे करना है कर लेना। नीच जात बलाटे तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुयी मेरे दफ्तर आ कर हिसाब पूछने की। मैं यूआईटी का चेयरमैन हूँ, बहुत बड़ा नेता, तेरे जैसों को तो अपनी जूतियों के नीचे रखता हूँ। नीच कमीन इंसान दुबारा मत आना खान की बात करने को. मैं तुझे अपने पास वहाँ खनन नहीं करने दूंगा. आज के बाद यूआईटी या खान की तरफ आया तो जान से खत्म करवा दूंगा।”

भाजपा नेता ने दलित खान मालिक को किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं करने की भी चेतावनी दी। इसके बाद पीड़ित कन्हैया लाल ने बिजोलिया और सुभाषनगर थाने में मुकदमा दर्ज करवाने की कोशिश की मगर कोई भी थानेदार बीजेपी नेता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को तैयार नहीं हुआ,यहाँ तक कि पुलिस अधीक्षक के यहाँ भी कन्हैया लाल की कोई सुनवाई नहीं हुई।

सुनवाई होती भी कैसे? एसपी, कलेक्टर, भीलवाड़ा विधायक और यूआईटी चैयरमेन सभी एक ही समुदाय से होने के चलते कन्हैया लाल की आवाज़ को सुना ही नहीं गया। ब्राह्मणवादी वर्चस्व ने एक दलित की आवाज़ का दमन कर दिया। मजबूरन कन्हैया ने कोर्ट की शरण ली जहाँ से आज एस सी एस टी प्रकरणों के विशिष्ठ न्यायाधीश एस पी सिंह ने पुलिस को प्रकरण की जाँच कर दर्ज करने के आदेश प्रदान कर दिए हैं। अब देखना यह है कि सर्वव्यापी भाजपा राज में एक दलित खान मालिक को न्याय मिल पाता है या नहीं?

लेखक भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवम सामाजिक कार्यकर्ता हैं. उनसे संपर्क bhanwarmeghwanshi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मायावती का दलित वोट बैंक क्यों खिसका?

हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी की बुरी तरह से हार हुयी है। इस चुनाव में उसके बहुमत से सरकार बनाने के दावे के विपरीत उसे कुल 19 सीटें मिली हैं जिनमें शायद केवल एक ही आरक्षित सीट है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है। एनडीटीवी के विश्लेषण के अनुसार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को दलित वोटों का केवल 25% वोट ही मिला है जबकि इसके मुकाबले में सपा को 26% और भाजपा को 41% मिला है। दरअसल 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 22% पर पहुँच गया है। इसी अनुपात में बसपा के दलित वोटबैंक में भी कमी आयी है। अभी तो बसपा के वोटबैंक में लगातार आ रही गिरावट की गति रुकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। मायावती ने वर्तमान हार की कोई ईमानदार समीक्षा करने की जगह ईवीएम में गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ा है। क्या इससे मायावती इस हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच पायेगी या बसपा को बचा पायेगी?

यद्यपि कुछ बसपा समर्थकों ने इन आंकड़ों के सही होने के बारे में प्रश्न उठाया है परंतु उत्तर प्रदेश में दलित जातियों की संख्या के विश्लेषण से यह आंकड़ा सही प्रतीत होता है। आइये सब से पहले उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी देखी जाये और फिर उसमें मायावती को मिले वोटों का आंकलन किया जाये. उत्तर प्रदेश में दलितों की आबादी कुल आबादी का 21% है और उनमे लगभग 66 उपजातियां हैं जो सामाजिक तौर पर बटी हुयी हैं. इन उप जातियों में जाटव /चमार – 56%, पासी – 16%, धोबी, कोरी और बाल्मीकि – 15%, गोंड, धानुक और खटीक – 5% हैं. 9 अति- दलित उप जातियां – रावत, बहेलिया खरवार और कोल 5% हैं. शेष 49 उप जातियां लगभग 3% हैं.

चमार/ जाटव आजमगढ़, आगरा, बिजनौर , सहारनपुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, गाजीपुर, सोनभद्र में हैं. पासी सीतापुर, राय बरेली, हरदोई, और इलाहाबाद जिलों में हैं. शेष समूह जैसे धोबी, कोरी, और बाल्मीकि लोगों की अधिकतर आबादी बरेली, सुल्तानपुर, और गाज़ियाबाद जनपदों में है. आबादी के उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर मायावती की बसपा पार्टी को अब तक बिभिन्न चुनावों में मिले दलित वोटों और सीटों का विश्लेषण करना उचित होगा. अब अगर वर्ष 2007 में हुए विधान सभा चुनाव का विश्लेष्ण किया जाये तो यह पाया जाता है कि इस चुनाव में बसपा को 87 अरक्षित सीटों में से 62 तथा समाजवादी (सपा) पार्टी को 13, कांग्रेस को 5 तथा बीजेपी को 7 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा को लगभग 30% वोट मिला था. इस से पहले 2002 में बसपा को 24 और सपा को 35 आरक्षित सीटों में विजय प्राप्त हुई थी. वर्ष 2004 में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को कुल आरक्षित 17 सीटों में से 5 और सपा को 8 सीटें मिली थी और बसपा का वोट बैंक 30% के करीब था.

वर्ष 2009 में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को आरक्षित 17 सीटों में से 2, सपा को 10 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा का वोट बैंक 2007 में मिले 30% से गिर कर 27% पर आ गया था. इसका मुख्य कारण दलित वोट बैंक में आई गिरावट थी क्योंकि तब तक मायावती के बहुजन के फार्मूले को छोड़ कर सर्वजन फार्मूले को अपनाने से दलित वर्ग का काफी हिस्सा नाराज़ हो कर अलग हो गया था. यह मायावती के लिए खतरे की पहली घंटी थी परन्तु मायावती ने इस पर ध्यान देने की कोई ज़रुरत नहीं समझी.
अब अगर 2012 के विधान सभा चुनाव को देखा जाये तो इसमें मायावती की हार का मुख्य कारण अन्य के साथ साथ दलित वोट बैंक में आई भारी गिरावट भी थी. इस बार मायावती 89 आरक्षित सीटों में से केवल 15 ही जीत पायी थीं जबकि सपा 55 सीटें जीतने में सफल रही थी. इन 89 आरक्षित सीटों में 35 जाटव/चमार और 25 पासी जीते थे इस में सपा के 21पासी और मायावती के 2 पासी ही जीते थे।मायावती की 16 आरक्षित सीटों में 2 पासी और 13 जाटव/चमार जीते थे. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस बार मायावती की आरक्षित सीटों पर हार का मुख्य कारण दलित वोटों में आई गिरावट भी थी. इस बार मायावती का कुल वोट प्रतिशत 26% रहा था जो कि 2007 के मुकाबले में लगभग 4% घटा था.
मायावती द्वारा 2012 में जीती गयी 15 आरक्षित सीटों का विश्लेषण करने से पाता चलता है कि उन्हें यह सीटें अधिकतर पच्छिमी उत्तर प्रदेश में ही मिली थीं जहाँ पर उसकी जाटव उपजाति अधिक है. मायावती को पासी बाहुल्य क्षेत्र में सब से कम और कोरी बाहुल्य क्षेत्र में भी बहुत कम सीटें मिली थीं. पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में यहाँ प़र चमार उपजाति का बाहुल्य है वहां पर भी मायावती को बहुत कम सीटें मिली थीं। मायावती को पशिचमी उत्तर प्रदेश से 7 और बाकी उत्तर प्रदेश से कुल 8 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में यह भी उभर कर आया था कि जहाँ एक ओर मायावती का पासी, कोरी, खटीक, धोबी और बाल्मीकि वोट खिसका था वहीँ दूसरी ओर चमार/जाटव वोट बैंक जिस में लगभग 70% चमार (रैदास) और 30% जाटव हैं में से अधिकतर चमार वोट भी खिसक गया था। इसी कारण से मायावती को केवल पच्छिमी उत्तर परदेश जो कि जाटव बाहुल्य क्षेत्र है में ही अधिकतर सीटें मिली थीं। एक सर्वेक्षण के अनुसार मायावती का लगभग 8% दलित वोट बैंक टूट गया था.

2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती को एक भी सीट नहीं मिली थी। इस चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 19.6% रह गया था। इस चुनाव में भी चमार/जाटव वोट का बड़ा हिस्सा मायावती से अलग हो गया था परंतु मायावती ने इससे कोई सबक नहीं लिया जिसका खामियाजा इस चुनाव में भुगतना पड़ा है। मायावती के दलित वोट बैंक खिसकने का मुख्य कारण मायावती का भ्रष्टाचार, विकासहीनता, दलित उत्पीड़न की उपेक्षा और तानाशाही रवैय्या रहा है . मायावती द्वारा दलित समस्याओं को नज़र अंदाज़ कर अंधाधुंध मूर्तिकर्ण को भी अधिकतर दलितों ने पसंद नहीं किया है. सर्वजन को खुश रखने के चक्कर में मायावती द्वारा दलित उत्पीड़न को नज़र अंदाज़ करना भी दलितों के लिए बहुत दुखदायी सिद्ध हुआ है. दलितों में एक यह धारणा भी पनपी है कि मायावती सरकार का सारा लाभ केवल मायावती की उपजाति खास करके चमारों/जाटवों को ही मिला है जो कि वास्तव में पूरी तरह सही नहीं है. इस से दलितों की गैर चमार/जाटव उपजातियां प्रतिक्रिया में मायावती से दूर हो गयी हैं. अगर गौर से देखा जाये तो यह उभर कर आता है कि मायावती सरकार का लाभ केवल उन दलितों को ही मिला है जिन्होंने मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार में सहयोग दिया है. इस दौरान यह भी देखने को मिला है कि जो दलित मायावायी के साथ नहीं थे बसपा वालों ने उन को भी प्रताड़ित किया था. उनके उत्पीडन सम्बन्धी मामले थाने पर दर्ज नहीं होने दिए गए. कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि मायावती ने अपने काडर के एक बड़े हिस्से को शोषक, भ्रष्ट और लम्पट बना दिया है जिसने दलितों का भी शोषण किया था. यही वर्ग मायावती के भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और दलित विरोधी कार्यों को हर तरीके से उचित ठहराने में लगा रहता है. दलित काडर का भ्रष्टिकरण दलित आन्दोलन की सब से बड़ी हानि है.

इस के अतिरिक्त बसपा की हार का एक कारण यह भी है कि मायावती हमेशा यह शेखी बघारती रही है कि मेरा वोट बैंक हस्तान्तरणीय है. इसी कारण से मायावती असेम्बली और पार्लियामेंट के टिकटों को धड़ल्ले से ऊँचे दामों में बेचती रही है और दलित उत्पीड़क, माफिया और अपराधियों एवं धनबलियों को टिकट देकर दलितों को उन्हें वोट देने के लिए आदेशित करती रही है। दरअसल मायावती ने दलित राजनीति को उन्हीं गुंडों, माफियाओं, दलित उत्पीड़कों एवं पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया है जिनसे उनकी लड़ाई है। इस चुनाव में भी मायावती ने आधा दर्जन ऐसे सवर्णों को टिकट दिया था जो दलित हत्या, दलित बलात्कार और दलित उत्पीड़न के आरोपी हैं । इसी लिए इस बार दलितों ने मायावती के इस आदेश को नकार दिया है और बसपा को वोट नहीं दिया. दूसरे दलितों में बसपा के पुराने मंत्रियों और विधायकों के विरुद्ध अपने लिए ही कमाने और आम लोगों के लिए कुछ भी न करने के कारण प्रबल आक्रोश भी था और इस बार वे उन्हें हर हालत में हराने के लिए कटिबद्ध थे. तीसरे मायावती ने सारी सत्ता अपने हाथों में केन्द्रित करके तानाशाही रवैय्या अपना रखा था जिस कारण कुछ लोगों को छोड़ कर कोई भी व्यक्ति मायावती से नहीं मिल सकता था। मायावती केवल मीटिंगों में भाषण देने के लिए ही आती थीं । इसके इलावा उसका दलितों से कोई संपर्क नहीं रहा है जिसने दलितों की मायावती से दूरी को बढ़ाया है। इसके इलावा मायावती ने जिन छोटी दलित उपजातियों को नज़रअन्दाज़ किया था भाजपा ने उन तक पहुँच बना कर उन्हें चुनाव में टिकट देकर अपने साथ कर लिया।

मायावती की अवसरवादी और भ्रष्ट राजनीति का दुष्प्रभाव यह है कि आज दलितों को यह नहीं पता है कि उन का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है. उनकी मनुवाद और जातिवाद के विरुद्ध लड़ाई भी कमज़ोर पड़ गयी है क्योंकि बसपा के इस तजुर्बे ने दलितों में भी एक भ्रष्ट और लम्पट वर्ग पैदा कर दिया है जो कि जाति लेबल का प्रयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही करता है. उसे दलितों के व्यापक मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है. एक विश्लेषण के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित आज भी विकास की दृष्टि से बिहार, उड़ीसा राजस्थान और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर भारत के शेष सभी राज्यों के दलितों से पिछड़े हुए हैं. उतर प्रदेश के लगभग 60% दलित गरीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं. लगभग 60% दलित महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार 70% दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. अधिकतर दलित बेरोजगार हैं और उत्पादन के साधनों से वंचित हैं. मायावती ने सर्वजन के चक्कर में भूमि सुधारों को जान बूझ कर नज़र अंदाज़ किया जो कि दलितों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार हो सकता था. मायावती के सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के कारण आम लोगों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण व्यवस्था , इंदिरा आवास, आंगनवाडी केंद्र और वृद्धा, विकलांग और विधवा पेंशन आदि भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं और दलित एवं अन्य गरीब लोग इन के लाभ से वंचित रह गए. मायावती ने अपने आप को सब लोगों से अलग कर लिया और लोगों के पास अपना दुःख/कष्ट रोने का कोई भी अवसर न बचा. इन कारणों से दलितों ने इस चुनाव में मायावती को बड़ी हद तक नकार दिया जो कि चुनाव नतीजों से परिलक्षित है.

कुछ लोग मायावती को ही दलित आन्दोलन और दलित राजनीति का पर्याय मान कर यह प्रश्न उठाते हैं कि मायावती के हारने से दलित आन्दोलन और दलित राजनीति पर बुरा असर पड़ेगा. इस संबंध में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि मायावती पूरे दलित आन्दोलन का प्रतिनधित्व नहीं करती है. मायावती केवल एक राजनेता है जो कि दलित राजनीति कर रही है वह भी एक सीमित क्षेत्र : उत्तर प्रदेश और उतराखंड में ही. इस के बाहर दलित अपने ढंग से राजनीति कर रहे हैं. वहां पर बसपा का कोई अस्तित्व नहीं है. दूसरे दलित आन्दोलन के अन्य पहलू सामाजिक और धार्मिक हैं जिन पर दलित अपने आप आगे बढ़ रहे हैं. धार्मिक आन्दोलन के अंतर्गत दलित प्रत्येक वर्ष बौद्ध धम्म अपना रहे हैं और सामाजिक स्तर पर भी उनमें काफी नजदीकी आई है. यह कार्य अपने आप हो रहा है और होता रहेगा. इस में मायावती का न कोई योगदान रहा है और न ही उसकी कोई ज़रुरत भी है. यह डॉ. आंबेडकर द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन है जो कि स्वतस्फूर्त है. हाँ इतना ज़रूर है कि इधर मायावती ने एक आध बौद्ध विहार बना कर बौद्ध धम्म के प्रतीकों का राजनीतिक इस्तेमाल ज़रूर किया है. यह उल्लेखनीय है मायावती ने न तो स्वयं बौद्ध धम्म अपनाया है और न ही कांशी राम ने अपनाया था. उन्हें दर असल बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के जाति उन्मूलन में महत्व में कोई विश्वास ही नहीं है. वे तो राजनीति में जाति के प्रयोग के पक्षधर रहे हैं न कि उसे तोड़ने के. उन्हें बाबा साहेब के जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य में कोई दिलचस्पी नहीं है. वह दलितों का राजनीति में जातिवोट बैंक के रूप में ही प्रयोग करके जाति की राजनीति को कायम रख कर अपने लिए लाभ उठाना चाहती है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का दलित वोट बैंक बहुत हद तक खिसक गया है। शायद मायावती अभी भी दलितों को अपना गुलाम समझ कर उस से ही जुड़े रहने की खुशफहमी पाल रही है. मायावती की यह नीति कोंग्रेस की दलितों और मुसलामानों के प्रति लम्बे समय तक अपनाई गयी नीति का ही अनुसरण है. मायावती दलितों को यह जिताती रही है कि केवल मैं ही आप को बचा सकती हूँ कोई दूसरा नहीं. इस लिए मुझ से अलग होने की बात कभी मत सोचिये. दूसरे दलितों के उस से किसी भी हालत में अलग न होने के दावे से वह दूसरी पार्टियों से दलितों से दूरी बनाये रखने की चाल भी चल रही है ताकि दलित अलगाव में पड़ कर उस के ही गुलाम बने रहें. पर अब दलित मायावती के छलावे से काफी हद तक मुक्त हो गए हैं. अब यह पूरी सम्भावना है कि उत्तर प्रदेश के दलित मायावती के बसपा प्रयोग से सबक लेकर एक मूल परिवर्तनकारी, अम्बेडकरवादी राजनीतिक विकल्प की तलाश करेंगे और जातिवादी राजनीति से बाहर निकल कर मुद्दा आधारित जनवादी राजनीति में प्रवेश करेंगे. केवल इसी से उनका राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकर्ण हो सकता है।

एस.आर. दारापुरी
आई.पी.एस. (से.नि.)
राष्ट्रीय प्रवक्ता
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
srdarapuri@gmail.com

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दलित राजनीति की दरिद्रता

क्या यह दलित राजनीति की दरिद्रता नहीं है कि यह केवल आरक्षण तक ही सीमित
हो कर रह जाती है या इसे जानबूझ कर सीमित कर दिया जाता है? क्या दलितों
की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, तथा सामाजिक एवं आर्थिक शोषण
एवं पिछड़ापन दलित राजनीति के लिए कोई मुद्दा नहीं है? भाजपा भी आरएसएस के
माध्यम से चुनाव में आरक्षण के मुद्दे को जानबूझ कर उठवाती है ताकि
दलितों का कोई दूसरा मुद्दा चुनावी मुद्दा न बन सके। इसके माध्यम से वह
हिन्दू मुस्लिम की तरह आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधियों का ध्रुवीकरण
करने का प्रयास करती है जैसा कि पिछले बिहार चुनाव से पहले किया गया था.
ऐसा करके वह दलित नेताओं का काम भी आसान कर देती है क्योंकि इससे उन्हें
दलितों के किसी दूसरे मुद्दे पर चर्चा करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। इसी
लिए तो दलित पार्टियां को चुनावी घोषणा पत्र  बनाने और जारी करने की
ज़रूरत नहीं पड़ती। परिणाम यह होता है कि दलित मुद्दे चुनाव के केंद्र
बिंदु नहीं बन पाते.

इसके मुकाबले में ज़रा डॉ. आंबेडकर की राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र
पढ़िए जो कि बहुत व्यापक और रैडिकल होते थे। कृपया इस संबंध में
www.dalitmukti.blogspot.com पर ” डॉ. आंबेडकर और जाति की राजनीति” आलेख
पढ़िए और उसकी तुलना वर्तमान दलित राजनीति से कीजिये। इसके विवेचन से एक
बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि डॉ. आंबेडकर जाति की राजनीति के कतई
पक्षधर नहीं थे क्योंकि इस से जाति मजबूत होती है. इस से हिंदुत्व मजबूत
होता है जो कि जाति व्यवस्था की उपज है. डॉ. आंबेडकर का लक्ष्य तो जाति
का विनाश करके भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना करना था.
डॉ. आंबेडकर ने जो भी राजनैतिक पार्टियाँ बनायीं वे जातिगत पार्टियाँ
नहीं थीं क्योंकि उन के लक्ष्य और उद्देश्य व्यापक थे. यह बात सही है कि
उनके केंद्र में दलित थे परन्तु उन के कार्यक्रम व्यापक और जाति निरपेक्ष
थे. वे सभी कमज़ोर वर्गों के उत्थान के लिए थे. इसी लिए जब तक उन द्वारा
स्थापित की गयी पार्टी आरपीआई उन के सिद्धांतों और एजंडा पर चलती रही तब
तक वह दलितों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों को एकजुट करने में सफल रही. जब तक
उन में आन्तरिक लोकतंत्र रहा और वे जन मुद्दों को लेकर संघर्ष करती रही
तब तक वह फलती फूलती रही. जैसे ही वह व्यक्तिवादी और जातिवादी राजनीति के
चंगुल में पड़ी उसका पतन हो गया. यह अति खेद की बात है कि वर्तमान दलित
राजनीति व्यक्तिवाद, जातिवाद, अवसरवाद, भ्रष्टाचार और मुद्दाविहिनता का
बुरी तरह से शिकार हो गयी है. इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि दलित वर्ग जो
कि सामाजिक तौर पर उपजातियों में विभाजित है, अब राजनितिक तौर पर भी बुरी
तरह से विभाजित हो गया है जिसका लाभ सबसे अधिक हिंदुत्व की पक्षधर पार्टी
भाजपा ने उठाया है. पिछले लिक्सभा चुनाव से यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गयी
है और वर्तमान विधानसभा चुनाव में भी इसकी महत्वपूरण भूमिका रहेगी.

यह दलित राजनीति की त्रासदी ही है कि गैरदलित पार्टियों को तो छोडिये,
दलित राजनीतिक पार्टियाँ भी दलितों के ठोस मुद्दों पर कोई संघर्ष करने की
बजाये चुनाव में जाति के नाम पर उनका भावनात्मक शोषण करके वोट बटोर लेती
हैं और दलित जैसे थे वैसे ही बने रहते हैं. अतः मेरा यह निश्चित मत है कि
जब तक दलित राजनीति जाति की राजनीति के मक्कड़जाल से निकल कर व्यापक दलित
मुद्दों पर नहीं आएगी तब तक दलितों का उद्धार नहीं हो सकेगा। इसके लिए
दलित राजनीति को एक रेडिकल  एजंडा अपनाना होगा. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट
ने इस दिशा में एक बड़ी पहल की है.

S.R.Darapuri I.P.S.(Retd)
National Spokesman,
All India Peoples Front
www.dalitliberation.blogspot.com
www.dalitmukti.blogspot.com
Mob919415164845

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मनु स्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद के विरुद्ध जन आन्दोलन का ऐलान

मनुवाद विरोधी सम्मलेन संपन्न

जयपुर : सावित्री बा फुले की जयंती के मौके पर राजस्थान भर से आये प्रतिनिधियों की मौजूदगी में मनुवाद विरोधी सम्मलेन का आयोजन किया गया. इसमें सर्वसम्मति से तय हुआ कि राजस्थान उच्च न्यायालय के परिसर में लगी मनु की मूर्ति के हटने तक देश व्यापी आन्दोलन किया जायेगा जो विभिन्न राज्यों तथा राजस्थान के जिला मुख्यालयों तक भी जायेगा. यह भी निर्णय लिया गया कि मनुवाद विरोधी अभियान का एक शिष्टमंडल शीघ्र ही राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर मांग करेगा कि हाई कोर्ट परिसर में लगी अन्याय के प्रतीक मनु की मूर्ति को हटाने के लिए शीघ्र सुनवाई की जाये.

जयपुर के स्वामी कुमारानंद भवन में आयोजित इस मनुवाद विरोधी सम्मलेन में यह भी तय किया गया कि सावित्री बा फुले की जयंती से लेकर महात्मा ज्योतिराव फुले के जन्मदिन 11 अप्रैल 2017 तक मनु, मनुस्मृति, मनु प्रतिमा और मनुवाद के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जायेगा तथा अंत में जयपुर पंहुच कर मनु प्रतिमा के खिलाफ जन आक्रोश का प्रदर्शन किया जायेगा. सम्मलेन ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव भी पारित किया कि कानून तथा राजनीती विज्ञान के पाठ्यक्रमों से मनु को हटाया जाये तथा उनके स्थान पर मानवतावाद को पढाया जाये.

मनुवाद विरोधी इस सम्मलेन की अध्यक्षता राजस्थान की संघर्षशील महिला नेताओं के एक अध्यक्ष मंडल ने की, जिसमें भंवरी बाई, ग्यारसी बाई, नौरती बाई, रेणुका पामेचा, ममता जेटली, ललिता पंवार, मोहिनी देवी, कविता श्रीवास्तव, निशा सिद्दू, सुमित्रा चौपड़ा, शिवा देवी, डॉ रईसा, द्रोपदी वर्मा, सुमन देवठिया, ग्रीष्मा और कुसुम साईंवाल तथा राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष लाडकुमारी जैन ने की.

सम्मलेन को संबोधित करते हुए अधिवक्ता प्रेमकृष्ण शर्मा ने मनुस्मृति में लिखे गए शुद्र एवं स्त्री विरोधी श्लोकों की जानकारी देते हुए कहा कि ऐसे ग्रंथों के होते हुए समाज से गैर-बराबरी की मानसिकता ख़त्म नहीं हो सकती है. मनु मूर्ति के विरुद्ध दलित पक्ष की और से लड़ रहे वकील अजय कुमार जैन ने अब तक की कानूनी लडाई की जानकारी दी तथा न्यायिक उदासीनता का जिक्र किया. दलित अधिकार केंद्र के संरक्षक पी एल मिमरोठ ने मनुमुर्ति प्रकरण के क़ानूनी पहलुओं सहित समय समय पर हुए जन आन्दोलनों से वाकिफ करवाया. सम्मलेन को संबोधित करते हुए मजदूर किसान शक्ति संगठन के निखिल डे ने कहा कि न्याय मूर्ति के होते हुए अन्याय की प्रतीक मनु की मूर्ति का होना हमारी पूरी न्यायिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है.

मनुवाद विरोधी अभियान की ओर से भंवर मेघवंशी ने बताया कि आज के सम्मलेन में यह संकल्प लिया गया कि न्यायपालिका तथा अन्य क्षेत्रों में व्याप्त मनुवाद को उजागर करने के लिए जनजागरण अभियान प्रारम्भ किया जायेगा जो मनु की मूर्ति के हटने तक जारी रहेगा. सम्मलेन में यह मांग भी उठी कि प्रधानमंत्री अगर अम्बेडकर के प्रति इतना ही सकारात्मक भाव रखते है तो उन्हें राजस्थान उच्च न्यायालय के अन्दर लगी मनु की मूर्ति को हटवा कर वहां पर अम्बेडकर की मूर्ति स्थापित करवानी चाहिए, जो आज के भारत के कानून निर्माता हैं.

आज के मनुवाद विरोधी सम्मलेन को उदाराम मेघवाल { बाड़मेर } कैलाश मीना {नीम का थाना} डॉ रमेश बैरवा {अलवर} दलित शोषण मुक्ति मंच के प्रदेश संयोजक किशन मेघवाल ,सफाई कर्मचारी यूनियन के नयन ज्योति, एसएफआई के किशन खुडीवाल ने भी संबोधित किया. किशन मेघवाल ने दलितों के भीतर मौजूद मनुवादी ताकतों की तरफ भी ईशारा करते हुए उनसे भी लड़ने का आह्वान किया.

सम्मलेन में सर्वसम्मति से मनु प्रतिमा के विरूद्ध तहसील स्तर तक आन्दोलन चलाने के फैसले पर भी सहमती बनी .आज के सम्मलेन में प्रदेश भर से बड़ी संख्या में युवाओं की उत्साहवर्धक भागीदारी रही. सम्मेलन को सफल बनाने में गोपाल वर्मा, राकेश शर्मा, ताराचंद वर्मा, हंसराज कबीर, देबी लाल मेघवंशी, डालचंद रेगर, सरपंच कैलाश चन्द्र बलाई, महावीर रेगर, कालू बंजारा, जोगराज सिंह, कमलेश मेघवाल, शैलेष मोसलपुरिया, पप्पु कुमावत, नवीन भाई खेमराज चारोटिया, महादेव रेगर, नीलम मेघवाल आदि साथियों की अहम भूमिका रही.

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झूठ की फैक्ट्री तो आप चला रहे हैं राकेश सिन्हा जी!

आरएसएस विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा जी ने बीबीसी हिन्दी सेवा को दिये साक्षात्कार में यह दावा किया है कि -“संघ में कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता भी जातिवादी व्यवहार नहीं करता है.” सिन्हा ने यह दावा मेरे इस आरोप के जवाब में किया है, जिसमें मैने आरएसएस के लोगो द्वारा मेरे साथ किये गये जातिगत भेदभाव की कहानी सार्वजनिक की. मैं फिर से दौहरा रहा हूं कि- “आरएसएस एक सवर्ण मानसिकता का पूर्णत: जातिवादी चरित्र का अलोकतांत्रिक संगठन है, जो इस देश के संविधान को खत्म करके मनुस्मृति पर आधारित धार्मिक हिन्दुराष्ट्र बनाना चाहता है.”

मैं अपने साथ संघियों द्वारा किये गये अस्पृश्यतापूर्ण भेदभाव की कहानी के एक एक शब्द पर आज भी कायम हूं. मैं फिर से बताना चाहता हूं कि मैं महज 13 वर्ष की अल्पायु में खेल खेलने के लालच में आरएसएस के झांसे में आया. अपने गांव की शाखा का मुख्य शिक्षक रहा ,पहली बार कारसेवा में गया.टुण्डला में गिरफ्तार हुआ.दस दिन आगरा के बहुद्देशीय स्टेडियम की अस्थाई जेल में रहा. संघ का प्रथम वर्ष किया. एक वर्ष तक जिला कार्यालय प्रमुख रहा. भीलवाड़ा में 12 मार्च 1992 को हुई गोलीबारी का दृकसाक्षी रहा, पुलिस की लाठियां खाई और कर्फ्यू की तकलीफों को सहा.

मैं पूर्णकालिक प्रचारक बनना चाहता था, मगर मुझे कहा गया कि संघ को आप जैसे विचारक नहीं विचारधारा को बिना विचारे फैलाने वाले प्रचारक चाहिये. इतना ही नहीं. बल्कि यह कहकर भी मुझे संतुष्टि दी गई कि बंधु अभी हमारा हिन्दु समाज बहुत विषम है, कल प्रचारक बनने के बाद आपको जाति आधारित कटु अनुभव होने पर आप संघ के प्रति गलत धारणाएं बना लेंगे, इसलिये उत्तम यह होगा कि आप कुछ समय विस्तारक बन कर निकलो. फिर देखेंगे कि आप प्रचारक बनने की स्थिति में होते हो या नहीं .

बाद में मैं ना प्रचारक बना और ना ही विस्तारक बन पाया, क्योंकि अस्थिकलश यात्रा के साथ चल रहे संघियों ने मेरे घर पर खाना खाने से साफ मना कर दिया. भोजन पैक करवा कर ले गये और अगले गांव भगवानपुरा के मोड़ पर फेंक गये. इसका जब मुझे पता चला तो मैं स्पष्टीकरण मांगने पहुंचा. जवाब दिया गया हाथ से छूटकर गिर गया. अब गिरा हुआ खाना तो कैसे खाते? सच्चाई इसके विपरीत थी. मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे फेंका गया और देर रात एक पण्डित के घर खाना बनवा कर खाया गया.
 
मैने इस घटना को लेकर जिला प्रचारक से लेकर सरसंघ चालक तक पत्र लिखे, जिनका कोई जवाब नहीं मिला. तब मैंने पहली बार जनवरी 1993 में इस पूरी घटना पर आर्टिकल लिखा जो उस वक्त भीलवाड़ा से प्रकाशित साप्ताहिक दहकते अंगारे नामक समाचार पत्र में विस्तारपूर्वक छपा. बाद में यह कहानी कई नामचीन समाचार पत्र पत्रिकाओं में कई बार प्रकाशित हुई. हजारों सभा सम्मेलनों में इसे मैंने सार्वजनिक रूप से खुलेआम माईक पर साझा किया. यूट्यूब तक पर कई वर्षों से यह मौजूद है. कभी कोई प्रतिक्रिया संघ की ओर से नहीं की गई.

हां, वर्ष 2012 में मुझ पर भाजपा में शामिल होने के लिये डोरे डाले गये. तब संघ के उच्चस्तरीय पांच वरिष्ठ प्रचारकों ने जरूर इस घटना पर यह कहकर मौखिक खेद जताया कि आपके साथ हुआ यह दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार संघ का अधिकृत व्यवहार नहीं था, बल्कि कुछ स्वयंसेवकों की व्यक्तिगत त्रुटि थी. लेकिन घटना के लगभग 25 साल बाद अब संघ के एकमात्र विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा कह रहे हैं कि – अगर कोई व्यक्ति ऐसा (संघ पर जातिवादी है) कहता है तो उसका निजी स्वार्थ होगा या फिर वह झूठ बोल रहा है.

प्रोफेसर सिन्हा मुझे व्यक्तिगत रूप से बिल्कुल भी नहीं जानते. हम कभी कहीं भी नहीं मिले. जिन दिनों मैं आरएसएस में रहा, तब तक मैंने ऐसे किसी विचारक का नाम तक नहीं सुना और ना ही उनके विचारों से लाभान्वित हुआ. तीन चार साल से उनका चेहरा टीवी चैनल्स की पैनल चर्चाओं में दिखने से पता चला कि वे आरएसएस के घोषित विचारक है तथा भारत नीति प्रतिष्ठान के मानद निदेशक होकर दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसियेट प्रोफेसर है. साथ ही मैने यह भी जाना कि वे संघ संस्थापक के बी हेडगेवार और गुरूजी गोलवलकर के अधिकृत जीवनीकार है. पता चला है कि उन्होंने और भी कई किताबें लिखी है. अच्छा लगा कि आरएसएस आजकल सिन्हा साहब जैसे प्रचारक किस्म के विचारकों की कद्र करने लगा है.

मुझे उनके आरएसएस विचारक होने पर कुछ भी नहीं कहना है,पर मेरी आपत्ति इस बात को लेकर जरूर है कि उन्होंने बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय न्यूज नेटवर्क पर मुझे झूठ बोलने वाला कहा है. राकेश सिन्हा बिना मुझे जाने, बिना मुझसे बात किये, बिना मेरी कहानी सुने, बिना मेरा पक्ष जाने झट से बोल दिया कि संघ पर जातिवाद का आरोप लगाने वाला झूठा है. मुझे घोर आश्चर्य है कि उन्होंने तथ्य व सत्य जाने बगैर ऐसा कैसे कहा होगा? मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा मगर यह जरूर समझ पाया कि यह उनके झूठ बोलने के संघ प्रदत्त सहज संस्कारों और गोयबल्स सैद्धांतिकी की वजह से ही संभव हुआ होगा.

सिन्हा जी यह जानते है कि संघ अपने आप में आज के दौर में झूठ बोलना सिखाने की विश्व की सबसे बड़ी फैक्ट्री है,इसलिये उन्हे पक्का भरोसा है कि जो व्यक्ति पांच साल संघी रहा है ,वह झूठ बोलना तो अच्छे से सीख ही गया होगा.दूसरा उन्हें यह भी यकीन है कि हर संघी, चाहे हो वर्तमान हो या निवृतमान हो ,वह आवश्यक रूप से अनिवार्य तौर पर झूठा होगा ही. दरअसल उन्होंने अपने अनुभव और आरएसएस के चरित्र के आलोक में ही मुझे झूठा ठहराने की कोशिस की होगी, ऐसा मेरा मानना है.

खैर, मैं संघ विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा जी को बेहद आदर के साथ कहना चाहता हूं कि आप एक बार व्यक्तिगत रूप से कभी मिलकर मुझसे मेरा पक्ष जरूर जान लीजियेगा अथवा किसी भी जांच एजेन्सी है जांच करवा लीजिये. मैं अपने आरोप पर कायम हूं .रही बात झूठ बोलने की तो मैं तो झूठ की फैक्ट्री कभी की छोड़ आया.आप उसे अभी तक चला रहे है सिन्हा साहब.आपका यह दावा बेहद हास्यास्पद है कि आरएसएस का कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता भी जातिवादी व्यवहार नहीं करता ! आप साधारण स्वयंसेवक की बात कर रहे है और मेरा दावा है कि “संघ के पपू” (परम् पूज्य) सरसंघचालक श्रीमान मोहन भागवत तक घनघोर जातिवादी है. दलित, आदिवासी, पिछड़ा, अल्पसंख्यक और महिला विरोधी हैं. आरक्षण के तो घोर निन्दक हैं ही, पक्के मनुवादी भी हैं. इतना ही नहीं अभी भी आपके संघ की अखिल भारतीय कार्यसमिति में आज तक 90 वर्ष बाद भी एक भी दलित या आदिवासी नहीं है. सारे महत्वपूर्ण फैसले आपकी आरएसएस नामक ब्राह्मण महासभा करती है, उन्हें धरातल पर लागू करने वाले हरावल दस्तों में जरूर कई दलित आदिवासी अपवाद रूप में मौजूद है, पर वे अभी भी शूद्रों की भांति सेवक ही बनकर प्रसन्न दिखाई पड़ते है. नेतृत्व तो उच्चवर्णीय हिन्दुओं के पास ही है.

सिन्हा साहब आपका संघ आज भी गाय सरीखे चौपाया को दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक इंसान से ज्यादा पवित्र मानता है और उसकी रक्षा के नाम पर इनकी जान लेने से भी नहीं चूकता है.आप लोगों ने एक पशु को इतना उपर उठा रखा है कि मानव की गरिमा गिर कर भूलुंठित हो चुकी है. आपके लाखों साधारण और असाधारण स्वयंसेवक आज भी दलितों का हाथ का छुंआ पानी पीने में हिचकते है पर गाय का पेशाब बड़ी शान से पी जाते है और बचा खुचा इत्र की तरह खुद पर छिड़क लेते हैं. आपका एक भी पपू सरसंघचालक अजा, जजा और पिछड़े वर्ग से नहीं आया .क्या यह जातिवाद नहीं है? सच तो यह है सिन्हा जी कि आपने गणवेश से सिर्फ हाफपैंट ही छोड़ी है, जातिजन्य वैचारिक नग्नता तो आज भी जस की तस है.

अंत में संघ विचारक जी मैं आपसे जानना चाहता हूं कि आज तक संघ ने जाति विनाश के लिये कोई आन्दोलन क्यों नहीं चलाया ? आपके कितने प्रतिशत स्वयंसेवकों नें जाति तोड़कर अन्तर्जातिय विवाह किये? आपके संगठन में कितने प्रतिशत प्रचारक दलित व आदिवासी वर्ग के है ? संघ ने आज तक दलितों के समानता के लिये किये गये कितने आन्दोलनों में शिरकत की? सच्चाई तो यह है सिन्हा साहब कि आज भी आरएसएस के लिये दलित, पिछड़े और आदिवासी सिर्फ उपयोग की सामग्री मात्र है और हर वो व्यक्ति आपकी नजर में झूठा और स्वार्थी है जो आपसे इस्तेमाल होने से इंकार कर देता है.

वैसे भी एक दोगले, पाखण्डी, संकीर्ण, जातिवादी और संविधानविरोधी तथा मनु समर्थक सवर्ण पितृसत्तात्मक अलोकतांत्रिक फासिस्ट संगठन से जुड़े शख्स से सत्यवादी होने का सर्टीफिकेट चाहिये किसको? हमें अच्छे से पता है कि आपकी फैक्टरी से  “झूठ बोलो, झट से बोलो और जोर जोर से बोलो” वाले उत्पाद तेजी से उत्सर्जित हो रहे हैं. कोई यूं ही आपको ‘रूमर्स स्प्रेडिंग सोसायटी’ (आरएसएस) थोड़े ही कहता है!

भंवर मेघवंशी
स्वतंत्र पत्रकार
bhanwarmeghwanshi@gmail.com

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Dalit Atrocities taking place at IIMC, New Delhi.

Rampant Dalit atrocities (including Sexual Harassment of a Dalit woman)  in open are taking place at the premier government media institution, the Indian Institute of Mass Communication (IIMC), New Delhi. Request you to kindly investigate and do the necessary for a justice-seeking Dalit woman. Given below is the detail…

This is to bring to your kind attention that at the Indian Institute of Mass Communication (IIMC), New Delhi, a premier government institution of media and journalism studies of the country, run by the Ministry of Information and Broadcasting, Government of India, rampant Dalit atrocities (including sexual harassment of a Dalit woman) have been taking place with full backing of the administrators helming the affairs including the Chairperson and the Director General of IIMC.

As recently as 30th of September 2016, in abject violation of Indian Law and Constitution, IIMC has arbitrarily and illegally decided to terminate the services of more than 25 Dalit manual laborers / safai karamcharis who had dedicatedly been working at IIMC for more than the past ten years (some more than fifteen years) under dismal contractual working conditions with a meager salary of 6000/- to 8000/- Indian rupees per month. On the eve of 30th of September, 2016 without any prior intimation or notice, the above mentioned Dalit laborers were verbally ordered by the Additional Director General with the approval of the competent authority i.e. Director General to stop coming to job permanently from next day onwards i.e. 1st of October, 2016. Ironically such a grave injustice was meted out to them just a day before the Swachh Bharat Abhiyan drive and Gandhi Jayanti.

Clearly, the termination of the services of the above mentioned Dalit laborers was a motivated move which in actuality was designed to ‘punish’ and ‘teach a lesson’ to a Dalit contractual laborer, Ms. Minaxi who for the past one year has relentlessly been fighting for justice against a rape committed upon her by a highly influential permanent employee of IIMC, Mr. Sagar Rana who happens to be the son of the Official Driver of the Secretary, Ministry of Information and Broadcasting. This is kindly also to be noted that the complainant Ms. Minaxi and her family in the past have consistently been intimidated, harassed and humiliated by the various influential officials and babus of  IIMC and Ministry of Information and Broadcasting which a few months back was reported by the section of the national media. Similarly, this time again after sacking her from the job, she has been publically humiliated, threatened and stopped from even entering in the campus by the IIMC administration.

As per the Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013, any  workplace by no means can terminate the services of the woman complainant until the final verdict is delivered by the Court of Law. This entire ploy of terminating the services of all contractual Dalit laborers in the name of ‘routine change’ of contractor (which has happened previously as well for many times but each time the new contractor retained the existing laborers as per the contract-understanding with IIMC administration) is essentially and evidently a clever maneuvering designed by the castiest-patriarchal forces operating at the highest echelons of IIMC to harass and ‘punish’ a Dalit woman, who ‘dared’ to file a rape case against an upper caste influential permanent employee of IIMC, to such an extent that she feels threatened, alienated and ultimately compelled to withdraw the case.

This matter is not just confined to the grave injustice being meted out with the justice-seeking innocent Dalit rape victim but also about the livelihood of the scores of fellow-Dalit laborers toiling for years at IIMC.

Whistleblowers
(Concerned People, IIMC) 
iimcwhistleblower@rediffmail.com

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भारत का एक ऐसा गाँव जहाँ भीमराव का संविधान नहीं, मनुस्मृति का विधान चलता है!

किसी नरक से कम नहीं है बरजांगसर जहाँ अभी तक दलितों से जबरन मृत पशु डलवाये जा रहे हैं…. राजस्थान के बीकानेर जिले की डूंगरगढ़ तहसील का गाँव है बरजांगसर. यूँ तो देश ने काफी तरक्की कर ली है, तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है, कानून का शासन स्थापित है, दलित लोग दासता से मुक्त कर दिए गए हैं, भेदभाव ओर छुआछुत को अपराध घोषित किया जा चुका है और किसी भी दलित को जबरन किसी भी अस्वच्छ पेशे में नहीं धकेला जा सकता है, विशेषकर मृत पशु को निस्तारित करने जैसे काम में तो कतई नहीं. Continue reading

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यह ब्राह्मण समुदाय शिक्षा पर एकाधिकार रखना अपना दैविक अधिकार समझता है

रोहित वेमुला श्रृंखला का लेख…. शिक्षालयों में जरुरी है एजुकेशन डाइवर्सिटी…

-एच.एल.दुसाध

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर केन्द्रित एक पुस्तक को अंतिम रूप देने में विगत कुछ सप्ताहों से बुरी तरह व्यस्त हूँ. मेरे संपादन में तैयार हो रही ’शैक्षणिक परिसरों में पसरा भेदभाव : सवर्ण वर्चस्व का परिणाम’ नामक सवा दो सौ पृष्ठीय यह पुस्तक देश के शिक्षा जगत के 27 प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों और 13 विद्वानों के साक्षात्कार से समृद्ध है. गत 23 अप्रैल को इस किताब के दूसरे प्रूफ पर नजर दौड़ाते और लेखों को चार अध्यायों में सजाते–सजाते सुबह के पांच बज गए थे. देर रात तक काम करने के बाद रविवार 24 अप्रैल की सुबह 10 बजे के करीब नींद से जागा. आदत के अनुसार चाय की चुस्की लेते हुए अख़बारों पर नजर दौड़ाने लगा. अचानक एक बहुपठित अखबार के दूसरे पृष्ठ के एक खबर पर मेरी दृष्टि चिपक गयी. मैंने एकाधिक बार ध्यान से उस खबर को पढ़ा. ’डीयू के दलित शिक्षकों ने लगाया प्रताड़ना का आरोप’ शीर्षक से छपी निम्न खबर को मेरी ही तरह शायद और लोगों ने भी बहुत ध्यान से पढ़ा होगा-

”दिल्ली विश्वविद्यालय के दो प्रतिष्ठित कॉलेजों में कार्यरत दलित शिक्षकों ने प्रशासन द्वारा उन्हें प्रताड़ित करने और उनकी योग्यता पर सवाल खड़े करने का आरोप लगाया है. हिन्दू कॉलेज में प्रशासन की प्रताड़ना का शिकार एक शिक्षक अब दिल्ली पुलिस आयुक्त से जान का खतरा बताते हुए मामला दर्ज करने की मांग कर रहा है. हिन्दू कॉलेज में इतिहास विभाग में एसोसियेट प्रोफ़ेसर डॉ.रतनलाल का आरोप है कि वो कॉलेज परिसर में ही रहते हैं लेकिन पिछले छः माह से उन्हें आवंटित घर को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है. डॉ.रतनलाल ने बताया कि कॉलेज प्रबंधन की ज्यादती का आलम ये है कि उनकी बात न मानने के चलते 33 एकड़ में फैले कॉलेज परिसर में उनके घर के ठीक बगल में कम्पोस्ट प्लांट के नाम पर 20 फीट लम्बा-20 फीट चौंड़ा और 10 फीट से 12 फीट गहरा गड्ढा तैयार कर उसमें सूखी पत्तियां एकत्र की जा रही हैं जिसमें कभी भी आग लग सकती है. यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ उनका परिवार बल्कि बगल में ही स्थित कैमेस्ट्री लैब और स्टोर रुम भी इसकी चपेट में आ सकता है. इस सम्बन्ध में हिन्दू कॉलेज की कार्यवाहक प्राचार्य डॉ.अंजू श्रीवास्तव से बात करने की कोशिश की गयी तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. इसी तरह श्रद्धानंद कॉलेज में एससी, एसटी, ओबीसी फोरम फॉर टीचिंग एंड नॉन टीचिंग स्टाफ तक ने आगामी 27 अप्रैल को होने जा रही प्रबंध समिति की बैठक में पेश होने वाले उस प्रस्ताव का विरोध किया है जिसमें कोटे के शिक्षकों की योग्यता पर ही सवाल खड़े करते हुए उनकी ट्रेनिंग की बात की गयी है. कॉलेज में एसोसियेट प्रोफ़ेसर सूरज यादव का कहना है कि प्रबंध समिति में कोषाध्यक्ष की ओर से इस बाबत पेश प्रस्ताव उनकी समझ से परे है. उन्होंने कहा कि कॉलेज में नियुक्त शिक्षक चाहे सामान्य श्रेणी के हों या फिर कोटे के अंतर्गत नियुक्ति प्राप्त, सभी पीएचडी, नेट योग्यता प्राप्त हैं और नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय की प्रक्रिया को पूरा करते हैं. ऐसे में उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा करते हुए उनके लिए अलग से शैक्षणिक कार्यक्रम की बात करना चिंताजनक है.”

उपरोक्त खबर पढ़कर मन बोझिल हो गया. अख़बार परे रख कर जब फेसबुक खोला तो पाया कि वहां भी इस घटना से जुड़े कई पोस्ट पड़े हैं, जिनमें कॉलेज प्रशासन की भेदभावपूर्ण रवैये को लेकर ढेरों आक्रामक कमेंट्स किये गए थे. फेसबुक पर विचरण करते-करते वर्धा के महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के बेहद जनप्रिय बहुजन शिक्षक सुनील कुमार ‘सुमन’ के एक पोस्ट पर दृष्टि स्थिर हो गई. उन्होंने लिखा था- ‘अगर आप किसी वंचित समुदाय से हैं तो इस व्यवस्था में आपकी सृजनात्मकता को कैसे खत्म करने की कोशिश की जाती है और कैसे आपको बार-बार एहसास कराया जाता है कि आप अपराधी हैं, इसकी बानगी देखिये… जुलाई, 2015 में हाईकोर्ट से मिली जीत के चलते हुई मेरी ज्वाइनिंग के बाद हिंदी विश्वविद्यालय की जातिवादी लॉबी भयानक ढंग से मेरे खिलाफ सक्रिय हो गई. इस गिरोह के ‘दबाव’ या फिर नए कुलपति जी के अपने सामाजिक दुराग्रहों के चलते दिसंबर, 2015 से उसी आरोप की ‘जांच’ फिर से शुरू हो गयी, जिसको हाईकोर्ट ने झूठा बताकर ख़ारिज कर दिया था. दिलचस्प यह कि यह ‘जांच’ उसी समिति को दुबारा सौंप दी गई, जिसकी रिपोर्ट का हाईकोर्ट ने पोस्ट मार्टम किया था. मुझे विवि रजिस्ट्रार का पत्र मिला कि मैं ‘जाँच’ पूरी होने तक वर्धा छोड़कर बाहर कहीं न जाऊँ। इस बीच अपनी माँ को डॉक्टर से दिखाने के लिए मेरा घर जाना जरूरी था, पर मैं नहीं जा पाया। पिछले चार महीनों में एक दर्जन से ज्यादा कॉलेज – विश्वविद्यालयों में सेमीनार में वक्ता के तौर पर आमंत्रण के बावजूद मुझे कहीं जाने की इजाज़त नहीं थी। जाँच समिति में बुलाने के लिए पहले मुझे किसी कर्मचारी के हाथ पत्र भेजा जाता, फिर उसी पत्र को ईमेल किया जाता, फिर समिति की अध्यक्ष मुझे एसएमएस करके सूचित करतीं, फिर फोन करके बतातीं कि मुझे समिति के समक्ष ‘हाज़िर’ होना है। यह फोन कभी सुबह आता, जब मैं सोया रहता या फिर रात में या फिर तब, जब मैं स्कूटी चला रहा होता या फिर किसी मंच पर प्रबोधन भाषण दे रहा होता। समिति में उपस्थित रहने का पत्र जब मैं कक्षा में पढ़ा रहा होता तो दरवाज़ा नॉक करके रिसीव कराया जाता। हद तो तब हो गई जब रिफ्रेशर कोर्स के दौरान चल रही कक्षा के अंदर ही एक बार कर्मचारी ने समिति का पत्र लाकर मुझे थमा दिया। यह सब मेरे ऊपर मुझे अपराधी साबित करने की अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की घटिया हरकत थी। (अकारण नहीं है कि इस समय विवि के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र मनोविज्ञान के ही प्रोफेसर हैं और यह सब उनकी शह के बिना नहीं हो सकता।) इस बीच कक्षाएँ लेने, खुद का लिखने-पढ़ने, सामाजिक गतिविधियों में शिरकत करने, अपने ऊपर बन रही एक फिल्म के लिए समय देने तथा इसी में घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए मैंने जाँच समिति में ‘हाज़िर’ होकर उसके पत्रों का लगातार जवाब भी दिया। निश्चित रूप से इस अनावश्यक कार्य में मेरी ऊर्जा और मेरा समय दोनों व्यर्थ नष्ट हुआ। वह भी उस मामले में, जिसमें हाईकोर्ट से मैं दोषरहित करार दिया जा चुका हूँ…’

डॉ. सुनील के पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक व्यक्ति ने लिखा था- ‘शिक्षा और मनुष्य विरोधी लोग और क्या करेंगे? दारुण सत्य तो यह है कि पढ़े-लिखे जुझारू इंसान ख़त्म नहीं किये जा सकते. यह तो हमारी जिद है कि तब भी बचे रहेंगे. संस्थानों में मारने का यही तरीका है.’

एक अन्य व्यक्ति का कमेन्ट था, ’सर,परिस्थितियां परेशान करने वाली जरुर होती हैं लेकिन हमें धैर्य, मानसिक संतुलन ठीक रखते हुए, दुश्मन की हर चाल को असफल करना है. मैं एक सामान्य टीजीटी अध्यापक हूँ. लेकिन दो साल पहले पूरे जिले स्तर तक का शिक्षा विभाग मेरे पीछे पड़ गया था. लेकिन पूरा गाँव व समाज ने मेरा साथ दिया और जिला शिक्षा अधिकारी तक को समाज ने बहुत बेईज्ज़त किया, तब जा कर पीछा छूटा.’

एक और कमेन्ट यह था, ’मेरा अनुभव रहा है कि कार्यस्थल पर एससी/एसटी को और कुछ हद तक ओबीसी के लोगों को प्रताड़ित किया जाता है जबकि अपर कास्ट के लोगों की बड़ी-बड़ी गलतियों तक को नजरंदाज कर दिया जाता है. पता नहीं किस चक्की का आटा खाते हैं.’

खैर! उसके बाद डॉ.रतनलाल और सुनील कुमार ‘सुमन’ ने अपने-अपने दुखद अनुभव को लेकर कई पोस्ट डाले.इससे रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद सोशल मीडिया में उच्च शिक्षण संस्थाओं में भेद-भाव का मामला फिर भारी चर्चा का विषय बना. इनमें सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का यह कमेन्ट काफी महत्वपूर्ण है-‘शैक्षणिक संस्थानों में जातीय भेदभाव होना और उनके साथ जातीय स्तर पर उत्पीड़न होना निंदनीय है.’ बहरहाल रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद डॉ. रतनलाल और सुनील कुमार के मामले के जरिये देश-विदेश में यह संदेश बहुत प्रभावी तरीके से गया कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित छात्रों के साथ शिक्षकों के साथ भी घनघोर जातीय भेदभाव होता है. डॉ.रतनलाल और सुनील कुमार ‘सुमन’ के साथ श्रद्धानंद कॉलेज के आरक्षित वर्ग के शिक्षकों के मामले ने आँख में अंगुली कर दिखा दिया कि वहां सिर्फ दलित छात्र ही नहीं, सम्पूर्ण अरक्षित वर्ग (एससी-एसटी-ओबीसी) के छात्र-छात्राओं के साथ शिक्षक भी जातिगत भेदभाव के बुरी तरह शिकार हैं और इसके चलते वहां वंचित जातियों के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के लिए ऐसा उपयुक्त माहौल नहीं है, जिसमें वे अध्ययन-अध्यापन का कार्य तनाव-मुक्त हो कर कर सकें.तो यह बेहद कटु सचाई है कि एससी/एसटी के छात्र-छात्रा और शिक्षक भले ही जातिगत भेदभाव के अतिरिक्त शिकार हों, किन्तु ओबीसी वर्ग की स्थिति भी सुखद नहीं है.

अभी रोहित वेमुला पर जिस किताब को लाने की तैयारियों में जुटा हूँ, उसमें दो दर्जन के करीब विद्वानों का यही निष्कर्ष उभर कर आया है कि भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में सब कुछ ठीकठाक नहीं है.वहां बहिष्कार का माहौल बनाने वाली स्थितियां हैं, जिसे न झेल पाने के कारण वंचित वर्गों के कुछ लोग आत्महत्या कर लेते हैं तो कुछ बीच में पढने-पढ़ाने का काम छोड़ कर पलायन कर जाते हैं.यही कारण है कि रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के विरोध में जो लाखों लोग सडकों पर उतरे उनमें अधिकांश के हाथों में ऐसी तख्तियां थीं जिन पर लिखा था, ’सवर्ण शिक्षकों के वर्चस्व के कारण हमारे विश्वविद्यालय बहुजन स्टूडेंट्स के कत्लगाह बन गए हैं.’ यह अनायास नहीं है कि इस किताब में एक विद्वान ने यह टिपण्णी कर डाली है, ’उच्च शिक्षण संस्थानों में उच्च जाति के विरोध में अनवरत जारी संघर्ष का नाम है, रोहित वेमुला’.

जो हो रोहित वेमुला की मौत के बाद शैक्षणिक परिसरों में फैला भेदभाव पहली बार जरुर पर्वत समान विराट मुद्दा जरुर बना ,पर पहले भी इसे लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही और इससे पार पाने के लिए ढेरों समितियां/आयोग गठित हुए.बावजूद इसके भेदभाव पूर्ववत जारी है तो इसलिए कि समितियों / आयोगों में छाये लोगों ने भारत में जातीय पूर्वाग्रह के पृष्ठ में क्रियाशील धार्मिक और सांस्कृतिक कारकों को उतना गुरुत्व  नहीं दिया, जितना दिया जाना चाहिए.जबकि जातीय एवं धार्मिक पहचान को पूर्वाग्रह का सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्धारक मानते हुए इस पर भरपूर ध्यान दिया जाना आवश्यक था. संस्कृति विशेष की अपनी सांस्कृतिक मान्यताएं होती हैं जिनसे अधिक अलग होना व्यक्ति या समूह के लिए संभव नहीं होता. भारत में अधिकांश जनसंख्या हिन्दुओं की है जिनके धर्म,संस्कृति एवं दर्शन को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है.वस्तुतः तीन मौलिक बातों को लेकर हिन्दुओं की मनोवृत्तियां संसार के अन्य समाजों की मनोवृतियों से भिन्न है. ये हैं-1-वर्ग तथा जाति का विचार, 2-समावेशन का विचार तथा 3-आत्मा-परमात्मा तथा पुनर्जन्म का विचार. भारतीयों के लिए इन तीनों विचारों का बहुत अधिक महत्व है. अतः हिन्दू धर्म के सुनियोजित आनुभविक अध्ययनों के सहारे शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्ग,विशेषकर दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार को बेहतर तरीके से समझा एवं नियंत्रित किया जा सकता था. परन्तु भेदभाद के दूरीकरण के लिए बनी समितियों में शामिल लोगों ने पाश्चात्य शोधकर्ताओं का अन्धानुकरण करते हुए या इच्छाकृत रूप से हिन्दू धर्म-संस्कृति जनित पूर्वाग्रह व भेदभाव के कारकों की अनदेखी किया जिससे इसके नियंत्रण का कारगर उपाय न हो सका. अगर शैक्षणिक परिसरों में फैले भेदभाव के पृष्ठ हिन्दू धर्म-संस्कृति की क्रियाशीलता को समझने का उन्होंने गंभीर प्रयास किया होता तो इसके लिए प्रधान रूप से जिम्मेवार उस ब्राहमण वर्ग का चेहरा साफ़ नजर आता जिसका सदियों से लेकर आज तक शिक्षा-तंत्र पर प्रायः एकाधिकार है;जो अध्ययन-अध्यापन पर सम्पूर्ण नियंत्रण अपना दैविक –अधिकार समझता है;जो अपने सिवाय बाकि सामाजिक समूहों के अध्ययन-अध्यापन  के विरुद्ध अवरोध खड़ा करना धर्म का कार्य समझता है.  

जी हां! विश्व में यह एक मात्र ब्राह्मण समुदाय है जो शिक्षा पर एकाधिकार रखना अपना दैविक-अधिकार समझता है.हिन्दू धर्म-शास्त्रों द्वारा अध्ययन-अध्यापन के दैविक –अधिकार से पुष्ट होने के चलते शिक्षा-व्यवस्था पर सम्पूर्ण एकाधिकार की चाह इसके रग-रग में समाई हुई है.वैसे तो इस निहायत ही क्षुद्र-संख्यक समुदाय का देश के शासन-प्रशासन, मीडिया, पौरोहित्य इत्यादि सहित शक्ति के अधिकांश स्रोतों पर ही दबदबा है,पर शिक्षा के क्षेत्र में इसका एकाधिकार इसलिए ज्यादा घातक है क्योंकि यह समुदाय तमाम अ-ब्राह्मणों को ही शिक्षा का अनाधिकारी समझने के लिए अभिशप्त है.किन्तु इसने क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ इत्यादि को तो किसी तरह झेलने की मानसिकता विकसित कर ली है, पर दलित, आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यंकों एवं महिलाओं के प्रति उदार होना, अभी बाकी है. हालांकि अपवाद रूप से कुछ ब्राह्मण गुरुजन अवश्य ही धर्म-शास्त्रों से निर्मित सोच से मुक्त हो गए हैं, पर अधिकांश के लिए यह हिमालय लांघने जैसा कार्य है.भारी खेद के साथ कहना पड़ता है कि हजारों साल से द्रोणाचार्य की भूमिका में सब समय अवतरित होते रहने वाले दैविक-अधिकारी वर्ग की आज़ाद भारत के शिक्षा-तंत्र पर भयावह उपस्थिति, इस देश के हुक्मरानों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को कभी विचलित नहीं की. संभवतः इसीलिए ही शिक्षा-जगत में भेदभाव के खात्मे के लिए बनी समितियां ब्राह्मणों के बहुजन शिक्षा-विरोधी चरित्र की अनदेखी कर गयीं,जो कि नहीं करना चाहिए था. अंततः शिक्षा-सुधार के सबसे बड़े नायक जोतीराव फुले से तो उन्हें कुछ प्रेरणा लेना ही चाहिए था.कारण, गुलाम भारत में जोतीराव फुले ने ब्राह्मणों के  बहुजन शिक्षा-विरोधी चरित्र को समझने का आधार  पूरी तरह सुलभ करा  दिया था.

फुले ने हंटर आयोग सहित अन्य कई अंग्रेज अधिकारियों को प्रतिवेदन दे कर इस सत्य से अवगत कराया कि ब्राह्मण किस तरह निम्न जातियों के शिक्षा के विरुद्ध अवरोध खड़ा करने में सर्वदा तत्पर रहते हैं.इस विषय में उन्होंने ‘शिक्षा-विभाग के ब्राह्मण अध्यापक’ नामक एक खास पंवाडा लिखकर उसे जून 1869 के ‘सत्यदीपिका’के अंक में छपवाया था.उसमें उन्होंने अंग्रेजों के समय के शुद्रातिशूद्रों की शिक्षा का ह्रदय-विदारक चित्र स्पष्ट करते हुए कहा था- ‘शूद्र किसानों से सरकार प्रतिवर्ष फण्ड इकठ्ठा करती है. पैसा शूद्रों का, लेकिन उनकी शिक्षा के बहुत बुरे हाल हैं. पाठशाला में दूसरों के बच्चे पढ़ते हैं. माली, कुनबी खेतों में मेहनत करके लगान भरते हैं, लेकिन उन्हें शरीर ढकने के लिए लंगोटी भी नहीं मिलती. जिनकी पढने की उम्र है, शूद्रों के ऐसे बच्चे जानवरों की रखवाली करते हैं. उन्हें पहनने के लिए जूते-चप्पल तक नहीं मिलते.अपने बच्चों को पढ़ाने का समय ही नहीं मिलता. इसलिए उनके पिता दुखी होते हैं और ईश्वर को दोष देते हैं.अंग्रेज शिक्षा देने की बात कहकर जनता को लूटते हैं और पाठशाला में ब्राह्मण अध्यापकों को ही भेजते हैं.यह ब्राह्मण शिक्षक कुलकर्णींयों की सहायता से बच्चे भर्ती करते हैं, उनकी संख्या रिपोर्ट में लिखते हैं.महारों के बच्चों को पढ़ाने में अपमान माननेवाले ब्राह्मण शिक्षक ब्रिटिश लोगों से हाथ मिलाते हैं.

ब्राह्मण शिक्षक ब्रह्मा का महत्व विद्यार्थियों को बतलाते हैं. दूसरे धर्मों की निंदा करते करते हैं और शूद्र बच्चों को अपना झूठा धर्म पढ़ाते हैं.ऐसे कपटी लोगों को अध्यापक बनाया जाता है.अपनी जाति  के बच्चों से गलती हुई तो उन्हें प्रेम से समझाया जाता है,लेकिन दूसरी जाति के बच्चों से गलती हुई तो उन्हें छड़ी से पीटा जाता है,उनका जोर से कान मरोड़ा जाता है.शूद्र बच्चों को मार-मार कर पाठशाला छोड़ने के लिए विवश किया जाता है.ब्राह्मण अध्यापकों के पक्षपाती व्यवहार के कारण शूद्र तथा अतिशूद्र बच्चों में शिक्षा के प्रति लगाव जाग्रत नहीं हुआ.ब्राह्मण शिक्षक शूद्रों को ठीक से पढ़ाते नहीं,क्योंकि उन्हें शिक्षा का अधिकार ही नहीं है, ऐसा ब्राह्मणों का धर्म बतलाता है.वे शूद्रों से द्वेष करते हैं.अतः पाठशाला में विद्यार्थियों में अंतर न करनेवाले तथा मानवतावादी शिक्षकों की भर्ती करनी चाहिए.हम ब्राह्मणों को कबतक फण्ड देते रहेंगे.-(जोतीराव फुले का सामाजिक दर्शन,डॉ.सरोज आगलावे,पृष्ठ-135-36)’.सिर्फ फुले ही नहीं उनके ज़माने के भूरि-भूरि दस्तावेज यह गवाही देते हैं कि वंचित बहुजनों की शिक्षा के प्रति ब्राह्मणों के उग्र-विरोध को देखते हुए ही बड़े-बड़े अंग्रेज अधिकारी निम्न जातियों के शिक्षा को उचित प्रोत्साहन देने से अपने कदम पीछे खींच लिए थे.

जातिगत भेदभाव के मूल में हिन्दू धर्म-शास्त्रों  की क्रियाशीलता को देखते हुए बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर को यह लिखने कोई द्विधा नहीं हुई कि हिन्दू दलितों पर जो अत्याचार करते हैं उसकी प्रेरणा उनके धर्म शास्त्र ही देते हैं;धर्म-शास्त्रों में आस्था के कारण ही दलितों को तरह-तरह से सताने में उन्हें कोई विवेक-दंश नहीं होता.इसी आधार पर दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि शिक्षा जगत पर हावी ब्राह्मण अगर शुद्रातिशूद्रों के समक्ष तरह-तरह का अवरोध खड़ा करते हैं तो उसके मूल में वे हिन्दू धर्म-शास्त्र ही हैं,जो एक ओर ब्राह्मणों को तो अध्ययन-अध्यापन का दैविक-अधिकारी और दूसरी ओर गैर-ब्राह्मणों,विशेषकर शुद्रातिशूद्रों को दैविक-अनाधिकारी घोषित करते हैं.इस क्रूर सचाई को दृष्टिगत रखते हुए आजाद भारत में जरुरत थी शिक्षा तंत्र पर हावी दैविक- अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को ध्वस्त करने की ताकि हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत किये गए वंचित बहुजन को अध्ययन –अध्यापन का उचित माहौल मिलता.लेकिन अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि जिन काबिल लोगों पर वंचितों को पढने-पढ़ाने का वाजिब माहौल मुहैया कराने की जिम्मेवारी थी,वे खुद स्व-जाति/वर्ण-हित के हाथों विवश होकर दैविक –अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को तोड़ने लायक कोई नक्शा पेश नहीं कर सके.फलतः आज जो उच्च शिक्षण-संस्थान रोहित वेमुलाओं के लिए कत्लगाह बन चुके हैं ,वहां वीसी,विभिन्न विषयों के विभागाध्यक्ष,रजिस्ट्रार इत्यादि के रूप में दैविक-अधिकारी वर्ग ही अनाकोंडा की भांति कुंडली मारकर बैठा हुआ है.ऐसे दैविक-अधिकारी वर्ग के चलते ही शिक्षालयों में बहुजन छात्र एवं शिक्षक घुट-घुट कर समय काटने के लिए विवश हैं.ऐसे वातावरण में किसी रोहित वेमुला का कार्ल सेगन बनना ; किसी डॉ.सुनील कुमार को अपनी सृजनात्मकता को निखारना और किसी डॉ.रतनलाल को सामाजिक न्याय की लड़ाई को तुंग पर पहुचाना,हिमालय लांघने जैसा काम है.

इस विकट स्थिति में शिक्षा के दैविक-अनाधिकारियों को अध्ययन-अध्यापन का उपयुक्त माहौल सुलभ कराने और रोहित वेमुलाओं को त्रासदपूर्ण अंत से उबारने के लिए मैंने ‘शैक्षणिक परिसरों में पसरा भेदभाव..’पुस्तक में विद्वानों के समक्ष साक्षात्कार के लिए सात प्रश्न रखें,जिन पर 13 विद्वानों का मूल्यवान सुझाव मिला.उन सात प्रश्नों में आखरी सवाल दैविक-अधिकारी वर्ग के वर्चस्व को तोड़ने से संबंधित था,जिसमें मैंने कहा था- ‘ऐसे में राष्ट्र यदि शिक्षा के अनाधिकारियों को शिक्षालयों में अध्ययन-अध्यापन का उपयुक्त वातावरण सुलभ कराना चाहता है तो ब्राह्मण वर्चस्व को ध्वस्त करने के उपाय पर विचार करना होगा.मेरे ख्याल से इसके लिए शिक्षा के तमाम अनाधिकारी वर्गों को शिक्षालयों में विविधता-नीति लागू करने की मांग उठाने के साथ ही विश्व मनाबधिकार संगठन के समक्ष गुहार लगानी चाहिए.बहरहाल आप बताये शिक्षा के दैविक-अधिकार संपन्न वर्ग से शिक्षालयों को मुक्त करने का आपके पास क्या उपाय है?भारी खुशी की बात है कि दैविक-अधिकारी वर्ग के एकाधिकार से उच्च-शिक्षण संस्थाओं को मुक्त कराने के लिए एजुकेशन डाइवर्सिटी के विचार को ही अधिकांश विद्वानों का समर्थन मिला.इस विषय में डॉ.विजय कुमार त्रिशरण का सुझाव विशेष महत्वपूर्ण है.उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा है-

‘भारत में जाति एक सचाई है.सवर्णों के मानस में जातिभेद का जहर कूंट-कूंट कर भरा है.एक भीख मांगने वाले ब्राह्मण से लेकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के चेयर पर विराजमान सवर्ण भी जातिवादी सोच से पीड़ित है.ऐसी बात नहीं कि सवर्ण हिन्दू निर्दयी हैं तथा उनके दिल में प्रेम-प्रीती नहीं है,उनमें ये सारी बातें हैं,परन्तु यह सब उनकी जाति तक ही सीमित है.दूसरी तरफ समस्त शैक्षणिक संस्थानों पर ब्राह्मणी वर्चस्व है.देश के प्रायः सारे कुलपति ब्राह्मण हैं.इसका मूल कारण है कि पूर्व बुद्धकाल से ही ब्राह्मणों ने बहुजनों को शिक्षा से वंचित कर शिक्षा पर अपना दैविय अधिकार स्थापित कर लिया है.वर्तमान में शिक्षण संस्थानों पर ब्राह्मणों का एकाधिकार महज मेरिट के कारण नहीं,बल्कि विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं,अन्तर्वीक्षाओं तथा महत्वपूर्ण उच्च पदों  पर अपनी जाति के प्रति पक्षपातपूर्ण मार्किंग एवं  अपनी ही जाति के लोगों को आगे बढाने की प्रवृति के कारण है.यही करण है कि सर्वोच्च लब्धप्रतिष्ठित विद्यावाचस्पति उपाधिधारी ब्राह्मण-सवर्ण प्राध्यापक तक पिछड़े और दलित विद्यार्थियों के प्रति जातिय भेदभाव करते हैं,उन्हें संतापित करते हैं,उनको कम अंक देते हैं ,डिस्टिंक्शन नहीं देते देते हैं,उनके मनोनुकूल शोध का विषय चयन नहीं करने देते,उनके शोध में अड़ंगा पैदा करते हैं,उनको उपाधि देने में बाधा बनते हैं,उनके स्कॉलरशीप रोक देते हैं तथा उन्हें डॉ.आंबेडकर का सिद्धांत अपनाने पर समाजविरोधी करार देते हैं.तकनीकी विद्यालयों में तो सवर्ण शिक्षक दलित छात्रों को दो-दो बैच फेल कर हतोत्साहित कर देते हैं.इस प्रकार दलित विद्यार्थियों को कई प्रकार से टॉर्चर कर उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर कर देते हैं,जैसा कि रोहित वेमुला के साथ हुआ.रोहित की तरह और भी कितने दलित विद्यार्थी हैं जो शूली पर चढ़ चुके हैं.इससे निजात दिलाने का सर्वोत्तम उपाय शिक्षण संस्थानों में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करवाने की लड़ाई लड़ना है.’

वास्तव में शिक्षालयों में व्याप्त भेदभाव को ख़त्म करने में एजुकेशन डाइवर्सिटी से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता.एजुकेशन डाइवर्सिटी का मतलब शिक्षण संस्थानों के प्रवेश,अध्यापन व संचालन में विभिन्न सामाजिक समूहों का संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व.एजुकेशन डाइवर्सिटी के जरिये दुनिया के  लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों में शिक्षा पर समूह विशेष के वर्चस्व को शेष कर सभी सामाजिक समूहों को अध्ययन-अध्यापन का न्यायोचित अवसर सुलभ कराया गया है.डाइवर्सिटी अर्थात विविधता नीति के जरिये ही तमाम सभ्यतर देशों में शिक्षा का प्रजातान्त्रिकरण मुमकिन हो पाया है. अमेरिका में भूरि-भूरि नोबेल विजेता देने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेकर नासा जैसे सर्वाधिक हाई प्रोफाइल संस्थान तक में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू कर वहां के तमाम वंचित समूहों और महिलाओं को अध्ययन-अध्यापन का अवसर मुहैया कराया गया है.शिक्षण जगत में लागू डाइवर्सिटी के चलते ही अमेरिका में कल्पना चावला सहित ढेरों भारतीयों  को प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर मय्यसर हुआ और आगे भी होता रहेगा.         

भारत में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करने का मतलब छोटे-बड़े सभी स्कूल,कालेजों,विश्वविद्यालयों और हाई प्रोफाइल शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश,अध्ययन और संचालन में अवसरों का बंटवारा भारत के चार प्रमुख सामाजिक समूहों-सवर्ण,ओबीसी,एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों-के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में कराना है .शैक्षणिक गतिविधियों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के वाजिब प्रतिबिम्बन से विविधतामय भारत के सभी सामाजिक समूहों को शिक्षा का पर्याप्त अवसर मिलेगा .इसके फलस्वरूप जहां एक ओर शिक्षा के दैविक अधिकारी अपने संख्यानुपात पर सिमटने के लिए बाध्य होंगे वहीँ दूसरी ओर उनके हिस्से का अतिरिक्त (सरप्लस)अवसर वंचित जातियों में बंटने का रास्ता खुल जायेगा.शिक्षालयों में विविधता अर्थात डाइवर्सिटी नीति न लागू होने के कारण ही 10-15 प्रतिशत जातिवादी सवर्णों,विशेषकर ब्राह्मणों का वीसी,विभागाध्यक्ष,रजिस्ट्रार इत्यादि के रूप में भयावह वर्चस्व स्थापित हुआ है.यह वर्चस्व ही रोहित वेमुलाओं-रतनलालों और सुनीलों को अध्यन-अध्यापन का खुशनुमा माहौल देने में एवरेस्ट बना हुआ है.रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद विरोध-प्रदर्शन की जो लहरें उठीं ,उसका लक्ष्य सवर्ण-वर्चस्व को ध्वस्त कर शिक्षा के बहिष्कृतों को अध्ययन-अध्यापन का उचित माहौल सुलभ कराना था?क्या रोहित के समर्थक उस लक्ष्य में जरा भी कामयाब हो पाए हैं ?अगर नहीं तो रोहित वेमुला को इंसाफ दिलाने के इच्छुक लोग शिक्षालयों में एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करवाने में सर्वशक्ति लगायें.

देश के हुक्मरानों के लिए भी एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करना समय की मांग बनती जा रही है.कारण, शिक्षालयों के घुटन भरे माहौल ने रोहित के लोगों में अलगाव की भावना पैदा करना शुरू कर दिया है,ऐसा मेरे द्वारा लिए गए साक्षात्कार से विदित होता है.अपने साक्षात्कार में एजुकेशन डाइवर्सिटी का सुझाव देने वाले डॉ.त्रिशरण ने लिखा है ,’यदि एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू नहीं होती है तो ‘सेपरेट बहुजन यूनिवर्सिटी’की स्थापना दलित विद्यार्थियों के शैक्षणिक शोषण-मुक्ति का स्थाई समाधान है.गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहेब ने हिन्दुओं के आतंक से अछूतों को स्थाई निजात दिलाने के लिए ‘सेपरेट सेटलमेंट’ की मांग उठाई थी.आज के सन्दर्भ में यह मांग यदि अनुपयुक्त लगती है तो ‘पृथक बहुजन यूनिवर्सिटी’की स्थापना समय की मांग है.वर्तमान में शिक्षण संस्थानों में मनुवादियों ने दलितों के विरुद्ध जैसा जातिगत द्वेषपूर्ण माहौल तैयार कर रखा  है,वैसी स्थिति में पृथक बहुजन यूनिवर्सिटी की मांग समीचीन है.इस यूनिवर्सिटी में दलित विद्यार्थियों के लिए शिक्षण, प्रशासन, प्राध्यापक, हॉस्टल, पुस्तकालय ,कॉलेज परिसर आदि सब कुछ अलग व्यवस्था हो.ऐसा करने से देश और दलित दोनों का विकास होगा .निरंतर शोषण की स्थिति व्यक्ति में कभी-कभी 1967 में अमेरिकी श्वेत-अश्वेत के बीच हुए खूनी टकराव के तर्ज पर क्रांति की जवाला पैदा कर देती है जिसमें  शोषणकर्ता की शक्ति स्वाहा हो जाती है.ऐसी स्थिति न आये ,इसके पूर्व ही कोई मुकम्मल उपाय ढूंढ लिया जाय तो देश और देशवासियों के लिए बेहतर होगा.’

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या ने बहुजन बुद्धिजीवियों को डॉ.त्रिशरण की भांति ही अलग राह अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है,इसकी झलक सुप्रसिद्ध बहुजन लेखक बुद्ध शरण हंस के साक्षात्कार में दिखी है. उन्होंने लिखा है-‘ ब्राह्मण,सवर्णों वाली सारी शिक्षण संस्थाएं बहुजन विद्यार्थियों के लिए कत्लगाह बनी हुई हैं.क्योंकि हिन्दू धर्मशास्त्र अपने आप में बहुजनों के क़त्लशास्त्र हैं..बहुजनों को विदेशागत ब्राह्मणों की शिक्षण संस्थानों में सिरे से खारिज कर देने का निर्णय लेना होगा.बहुजन समाज के आम नागरिक ,विद्यार्थी,मुखिया,सरपंच,विधायक ,सांसद सबको मिलकर यह आरोप लगाना होगा कि शिक्षण संस्थाओं में वे सब मिलकर जातिगत भेदभाव फैलाते हैं ,विद्यार्थियों की परोक्ष-अपरोक्ष हत्या करवाते हैं.इस कारण शिक्षण संस्थाओं से उन्हें स्थाई रूप से निष्काषित किया जाता है.उनकी जगह बहुजनों के काबिल लोगों को भर्ती करके एक नया किन्तु जरुरी इतिहास बनायेंगे.

ऐसा करने से न्यायालय दीवार खड़ी करेगी.न्यायालय को विधानसभा और संसद में कानून बनाकर रोकना होगा.न्यायालय में बैठे न्यायाधीश सबके सब ब्राह्मण-सवर्ण हैं.देश भर के बहुजन सांसद न्यायालयों से लिखित में पूछें कि भारतीय संविधान के किस धरा के अंतर्गत देश भर के मात्र दो ढाई सौ ब्राह्मण सवर्ण परिवार के लोग ही न्यायाधीश बनते रहे हैं.इस आरोप को सिद्ध करने में आज के सारे के सारे उच्च न्यायाधीश जेल की सजा भुगतने की स्थिति में आ जायेंगे या वे स्वतः देश की जनता से क्षमा मांगते हुए पद त्याग करेंगे.ऐसा होने पर मीडिया गृह-युद्ध होने का हल्ला मचाएगा.देश भर में बहुजन पुलिस तंत्र में भरे पड़े हैं.वे किस काम के बहुजन हैं और किस दिन के लिए बहुजन हैं.सख्ती से ब्राह्मण-सवर्ण को शांत करने का आदेश मिलते ही सारा शोर-शराबा बंद हो जायेगा.इतना और ऐसा होने पर लोकतंत्र के साथ बहुजन तंत्र इस देश में कायम हो जायेगा..शिक्षण संस्थाओं में गैर-जिम्मेवार ब्राह्मणों,सवर्णों को गेट आउट कर उनकी जगह काबिल बहुजनों की नियुक्ति का अभियान चलाकर ही हम विदेशागत ब्राह्मणों-सवर्णों के दबदबे से शिक्षालयों को मुक्त और समृद्ध कर सकते हैं.बहुजन समाज में हर स्तर पर योग्य लोग पैदा हो चुके हैं.उन्हें सिर्फ अवसर मिलना चाहिए.’

डॉ.त्रिशरण और हंस साहब से ही मिलती-जुलती राय देते हुए गाजीपुर के प्रोफ़ेसर डॉ.केके प्रियदर्शी ने कहा है-‘शिक्षालयों को शिक्षा के दैविक –अधिकारी वर्ग से निजात दिलाना है तो बहुत जरुरी ,पर कोई रास्ता नहीं दिख रहा है.उपाय एक ही नजर आता है कि वंचित जातियों के लिए अलग से शिक्षालय स्थापित किये जायें .वहां इन्ही जातियों के लोग अध्ययन और अध्यापन करें.बिना इसके हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत लोगों को पढने-पढ़ाने का सही माहौल नसीब नहीं हो सकता.’

डॉ.त्रिशरण, बुद्ध शरण हंस, डॉ.प्रियदर्शी इत्यादि का उपरोक्त साक्षात्कार निश्चय ही शिक्षा के दैविक-अधिकारियों के लिए सुखद संकेत का सूचक नहीं है.जिन्होंने हजारों साल से दलित-पिछड़ों को शिक्षा से बहिष्कृत करके रखा, उन्हें खुद वंचित –बहुजन ही अलग-थलग करने का मन बना रहा है.और यदि मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग ऐसा करने का ठान लिए तो,भारत के दैविक-अधिकारी वर्ग की स्थिति दक्षिण अफ्रीका के गोरों जैसी हो सकती है,जहां मूलनिवासी कालों ने ऐसी स्थिति पैदा कर दिया है कि वहा की शक्ति के स्रोतों पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये गोरे अब पलायन करना शुरू कर दिए हैं.दुनिया भर के वर्चस्ववादी समूहों का दुखद हस्र देखते हुए भारत के हुक्मरानों को अंततः अबिलम्ब एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करने का मन बना लेना चाहिए.

लेखक एच.एल.दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उनसे संपर्क hl.dusadh@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं, वे नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें

केरल में निर्भया जैसी दरिंदगी से उबाल, घटनास्थल से लौटी महिलाओं की टीम ने किया की खुलासा

-संदीप ठाकुर-

नई दिल्ली। दुराचार और जघन्य हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली यह
वारदात दिल्ली के निर्भया कांड से भी कहीं ज्यादा वीभत्स और दिल दहला
देने वाली है। यह केवल एक गरीब मेहनती और महत्वाकांक्षी दलित लड़की की
कहानी नहीं है बल्कि समाज के दबे कुचले उन हजारों-लाखों लड़कियों के
अरमानों की भी दास्तान है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद न सिर्फ कुछ कर
गुजरने की चाह रखतीं हैं, परंतु चाहतों के असली जामा पहनाने का हौसला
लेकर दिन रात मेहनत करतीं हैं। लेकिन समाज के दबंगों को उनकी यह तरक्की
हजम नहीं होती।

तारीख 28 अप्रैल, 2016
समय: दोपहर 1.30 से 5 बजे के बीच
जगह: केरल के एर्नाकुलम जिले के पेरुमबावूर तालुक्का का गांव रायमंगलम्

सरकारी लॉ कॉलेज की छात्रा माशा (परिवर्तित नाम) अपने एक कमरे के घर में
अकेली थी। अचानक हथियारों से लैस कुछ अज्ञात लोग घर में घुस आए और
दलित वर्ग से संबंध रखने वाली 30 साल की माशा को दबोच लिया। उसके साथ
बलात्कार किया। दुराचारियों ने उसके जननांग में धारदार हथियार डाल कर
घुमाया जिससे उसका गर्भाशय और आंतें कट गईं। उसके शरीर पर धारदार हथियार
से 30 गहरे वार किए गए। इनमें से एक वार तो 13 सेंटीमीटर गहरा था। उसके
सिर पर किसी ठोस वस्तु से प्रहार भी किया गया था। इतना ही नहीं, खून में
सनी लाश का कपड़े से गला भी घोंटा गया था। यह खुलासा युवती के
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हुआ है।

गरीब, दलित और वंचित परिवार की युवती से साथ हुई इस वारदात ने इलाके में
थोड़ी सी हलचल तो मचाई लेकिन पुलिस की कथित लापरवाहीपूर्ण भूमिका के
कारण मामला दब सा गया है। लेकिन इस मामले की गंभीरता के चर्चे जब दिल्ली
के राजनीतिक गलियारों तक पहुंचे तो यहां से मामले की सच्चाई जानने के
लिए नेताओं, समाजसेविका-सेविकाओं के दलों का जाना शुरू हुआ। इन्हीं में
महिलाओं का एक दल भी जांच के लिए गया था जिसका नाम है जिया (ग्रूप ऑफ
इंटेलेकचुअल एंड एकेडीमिशियन)। जीया की चेयरपर्सन मोनिका अरोड़ा, सदस्य
ललिता निझावन, सर्जना शर्मा और डॉ प्रेरणा मल्होत्रा ने घटनास्थल से
लौट कर मामले की जानकारी देते हुए इस वीभत्स हत्याकांड की जांच सीबीआई
को सौंपे जाने की मांग को लेकर गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने की
बात कही। उन्होंने बताया कि मीशा का एक कमरे का मकान नहर के किनारे है
जिसमें न तो शौचालय है और न ही बाथरुम। खाते पीते लोगों के बीच मीशा
अपनी परित्याक्ता मां राजेश्वरी के साथ रहती थी। राजेश्वरी दाई का काम
करती है। उसने मीशा को उंची शिक्षा दिलाई। मीशा ने कोट्टायम
विश्वविद्यालय से एम.ए किया था और सरकारी कॉलेज से लॉ कर रही थी। मीशा
की छोटी बहन 16 साल की उम्र में ही अपने प्रेमी से साथ भाग गई थी।

जांच दल के सदस्यों को आसपास के लोगों ने बताया कि जीवन की लड़ाई
अकेले लड़ते लड़ते राजेश्वरी कुछ तल्ख स्वभाव की हो गई थी। इसलिए उसके
जुबान की मिठास कहीं गुम हो गई थी। अक्सर वह छोटी छोटी बातों पर भी
लड़ झगड़ जाती थी। इतनी बड़ी घटना हो गई और किसी ने कुछ सुना ही नहीं?
सवाल के जवाब में स्थानीय लोगों ने बताया कि घटना वाले दिन दोपहर में
मीशा के घर से चीख चिल्लाहट की आवाजें आ तो रही थी लेकिन किसी ने उस पर
ध्यान नहीं दिया। इसका जवाब राजेश्वरी व दीपा ने दिया। उन्होंने बताया
कि हमलोग दलित हैं और हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं। वे
नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें। कई बार हमें धमकी भी मिल चुकी
है, इलाके से कहीं और जा कर रहने की। दीपा ने बताया कि करीब तीन माह
पूर्व मोटर सायकिल सवारों ने मेरी मां को टक्कर मारी थी जिसमें उसे
बहुत चोट आई थी। घटना की सूचना पुलिस को भी दी थी लेकिन कोई एक्शन
नहीं हुआ था। यह घटना केरल में चुनावी मुद्दा भी बना है। जिस इलाके में
मीशा रहती है, वहां विगत 25 बरस से लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट का कब्जा है।
पंचायत स्तर से लेकर सांसद तक, सभी कम्युनिस्ट हैं। ये पार्टी अभी
विपक्ष में है। दल की सदस्या प्रेरणा के मुताबिक मृतका की छोटी बहन दीपा के
कहती है कि इस घटना में उसके पड़ोस में रहने वाला कार पेंटर व आटो चालक
शामिल हो सकते हैं। पुलिस मामले की जांच गंभीरता से करे तो अभियुक्त
पकड़े जा सकते हैं। लेकिन इनदिनों केरल में चुनावी मौसम है। पुलिस
प्रशासन उसी में व्यस्त हैं। नई सरकार बनने के बाद कुछ हो तो हो।
मोनिका अरोड़ा ने कहा कि हम इस मामले को छोड़ेंगे नहीं। यह कोई आम
आपराधिक वारदात नहीं है। यह पूरे स्त्री समाज की असिमता और सम्मान से
जीने के हक का प्रश्न है। स्थानीय पुलिस मामले की जांच कर रही है लेकिन
उससे कोई भी संतुष्ट नहीं है। इंतजार है पूरे परिदृश्य में सीबीआई के
आने का। देखना है कि जीया मामले को सीबीआई तक पहुंचाने में सरकार पर
दबाव बनाने में सफल होती है या नहीं।

पत्रकार संदीप ठाकुर की रिपोर्ट. संपर्क: sandyy.thakur32@gmail.com

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देश के मुसलमानों को दलितों से सीखना चाहिए राजनीति का सबक

इमामुद्दीन अलीग

इतिहास के अनुसार देश के दलित वर्ग ने सांप्रदायिक शोषक शक्तियों के अत्याचार और दमन को लगभग 5000 वर्षों झेला है और इस इतिहासिक शोषण और भीषण हिंसा को झेलने के बाद अनपढ़, गरीब और दबे कुचले दलितों को यह बात समझ में आ गई कि अत्याचार, शोषण,सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका यही है कि राजनीतिक रूप से सशक्त बना जाए। देश की स्वतन्त्रता के बाद जब भारत में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई तो दलितों ने इसे  अपने लिए एक बहुत बड़ी नेमत समझा। इस शुभ अवसर का लाभ उठाते  हुए पूरे के पूरे दलित वर्ग ने सांप्रदायिक ताकतों के डर अपने दिल व दिमाग से उतारकर और परिणाम बेपरवाह होकर अपने नेतृत्व का साथ दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनसंख्या के आधार 18-20% यानी अल्पसंख्यक में होने के बावजूद भी उन्होंने कई बार सरकार बनाई और एक समय तो ऐसा भी आया कि जब दलितों के चिर प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली पार्टी भाजपा को भी दलित नेतृत्व के सामने गठबंधन के लिए सिर झुकाना पड़ा।

देश के मुसलमानों के सामने अपनी स्थिति को बदलने के लिए यह एक जीता जागता और स्पष्ट उदाहरण है। अगर दलितों ने भी मुसलमानों की तरह सांप्रदायिक शोषक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने की चिंता पाल ली होती और वह भी अपने नेतृत्व की स्थापना करने के बजाय अन्य राजनीतिक दलों की पूंछ पकड़ कर बैठे रहते तो आज दलितों का भी वही हाल होता जो मुसलमानों का है। जबकि दलितों ने दूरदृष्टि से काम लिया, आगामी चुनावों के परिणाम और सांप्रदायिक ताकतों के खौफ से बेपरवा होकर उन्होंने अपने नेतृत्व का साथ दिया और आज इसका नतीजा सब के सामने है। लोकतांत्रिक भारत में मुसलमानों के पास भी अपने पैरों पर खड़े होने के लिए इससे हटकर कोई दूसरा रास्ता नहीं है कि वे अपने नेतृत्व को मजबूत करें और सभी कठिनाइयों, संदेह, और शिकायतों को पीछे छोड़ कर अपने नेतृत्व का साथ दें। राजनीतिक रूप से सशक्त होने से ही देश के मुसलमानों अनगिनत समस्याओं का समाधान निकल सकता है। दलितों की तरह मुसलमानों को भी अपने सभी मतभेदों को भूलकर और अपने दिल व दिमाग से सांप्रदायिक ताकतों के डर का बोझ उतार कर अपने टूटे फूटे नेतृत्व को मजबूत करना होगा। वैसे देखा जाए तो मुसलमानों ने दलितों की तुलना में साम्प्रदायिक शक्तियों की बर्बरता का एक हिस्सा भी नहीं झेला है। दलित वर्ग तो आज भी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव के जहर को पी रहा है। ऐसे में जब दलित सांप्रदायिक ताकतों के डर को अपने मन से उतार कर अपना नेतृत्व स्थापित कर सकते हैं तो फिर मुसलमान क्यों नहीं?

अगर दूरदृष्टि से काम लिया जाए और आगामी चुनावों के परिणाम और सांप्रदायिक ताकतों के डर से ऊपर उठकर सोचा जाए तो यह बात दिन के उजाले की तरह स्पष्ट हो जाती है कि मुसलमानों के पास राजनीतिक दिवालियापन से बाहर निकलने का एकमात्र यही रास्ता है कि जो भी थोड़ा बहुत प्रभावी मुस्लिम नेतृत्व और मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों के बीच मौजूद हैं, उन्हीं को मजबूत किया जाए। अन्य समुदायों के नेतृत्व पर भरोसा करने या उनकी राजनीतिक गुलामी करने से मुसलमानों का राजनीतिक दिवालियापन दूर होने से रहा। वैसे भी मुसलमानों ने अपनी राजनीतिक पार्टियों को मजबूत करने के अलावा अन्य सभी विकल्पों को आजमा कर देख लिया है। इन विकल्पों में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों से लेकर दलित व पिछड़े नेतृत्व सहित सभी क्षेत्रीय पार्टियां शामिल हैं, जिन्हें मुसलमानों ने कई कई बार अपना एकमुश्त वोट देकर सफल किया मगर सत्ता प्राप्त करने के बाद उन सभी ने मुसलमानों की समस्याओं को हल करने के बजाय मुसलमानों को अपना राजनीतिक गुलाम बनाए रखने के लिए दिन रात एक कर दिया और सांप्रदायिक ताकतों के अनजाने भय में डाल कर मुसलमानों को हमेशा ही उभरते मुस्लिम नेतृत्व से शंकित करने का काम किया जिसका परिणाम  यह निकला कि मुसलमान राजनीतिक रूप से विकलांग होकर रह गए।

मुसलमानों को यह बात समझनी होगी कि इस दावे में कोई दम नहीं है कि मुसलमानों के एकजुट होने और अपनी पार्टी बनाने से हिंदू समुदाय एकजुट हो जाएगा और सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत होंगी। अगर इस धारणा को मान भी लिया जाए तो इस तथ्य से कौन इनकार कर सकता है कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है, कोई भी उतार चढ़ाव हमेशा के लिए नहीं होता है बल्कि सब कुछ क्षणिक (वक़्ती) होता है। वैसे तो मुसलमानों के एकजुट होने से पहले तो हिंदू समुदाय के एकजुट होने की संभावना बहुत कम है लेकिन अगर हो भी जाए तो यह भी एक वक़्ती बात होगी, क्योंकि कि बसपा, सपा, कांग्रेस और वामपंथी दलों सहित अन्य कई पार्टियां मुसलमानों के चिंता में अपने अस्तित्व (वजूद) से समझौता नहीं करेंगी। यह तो केवल देश के मुसलमानों की विशेषता रही है कि वह सांप्रदायिक शक्तियों की चिंता में अपने राजनीतिक अस्तित्व से समझौता करके बैठ गए और देश की आजादी के बाद से अपने गौरवशाली अतीत पर गर्व करने और दूसरों के नेतृत्व की राजनीतिक गुलामी करने अलावा उन्हें और कुछ सुझाई नहीं दे रहा है।

बहरहाल मुस्लिम नेतृत्व की चिंता में देश की अन्य सभी पार्टियां सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला कर अपने अस्तित्व को मिटाने का खतरा नहीं मोल ले सकती हैं बल्कि इसके विपरीत यही पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने की खातिर मुस्लिम नेतृत्व से गठबंधन करने के लिए खुद आगे आएंगी और तब मुसलमान अपने शर्तों पर इन पार्टियों को झुकने के लिए मजबूर कर सकेंगे। इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि देश के अधिकतर पार्टियां अवसरवादी हैं। जब दो पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी बसपा और भाजपा सत्ता के लिए गठबंधन कर सकते हैं तो आगे चलकर अन्य दलों का मुस्लिम नेतृत्व के साथ गठबंधन क्यों नहीं हो सकता? और अगर आगे चलकर कोई भी पार्टी मुस्लिम नेतृत्व के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार न हो तब भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुसलमान अपनी 20-22 प्रतिशत आबादी के दमखम पर मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में होंगे और अपने खिलाफ वाली किसी भी आवाज़ या कार्रवाई का जोरदार तरीके से विरोध कर सकेंगे और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की स्थिति में होंगे।

लेकिन याद रखें, यह सब तभी संभव है जब मुसलमान अपने नेतृत्व और अपनी राजनीतिक दलों को मजबूत कर लें और उनका लगातार साथ दें, इसी एक तरीके से मुसलमानों को राजनीति में हिस्सेदारी मिल सकती है। मुस्लिम नेतृत्व स्थापित होने से पहले न तो मुसलमानों को राजनीति में हिस्सा मिल सकता है और न ही इससे पहले कोई प्रभावी प्रेशर ग्रुप बनने की संभावना है। अगर कोई प्रेशर ग्रुप बना भी लिया गया तो भी वह किसी काम का नहीं होगा,  कोई पार्टी मुसलमानों की एक न सुनेगी और न ही उनकी समस्याओं को हल करने के लिए गंभीर होगी, मुसलमान चाहे जितना चीख़ते चिल्लाते और विरोध करते रहें…..।

जब देश के सात आठ प्रतिशत आबादी वाले वर्गों से लेकर दो ढाई प्रतिशत आबादी वाले वर्ग भी अपना नेतृत्व स्थापित कर और एकजुट होकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंच सकते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर 15 प्रतिशत जनसंख्या वाले मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर सकते?  जबकि कई राज्यों और क्षेत्रों में मुसलमानों की आबादी 30-40 और कहीं कहीं तो उस से भी ऊपर है। मुसलमानों को इस विषय में गहनता से विचार करने की आवश्यकता है।

लेखक इमामुद्दीन अलीग Imamuddin Alig युवा और स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 8744875157 के जरिए किया जा सकता है.

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Delhi HC issues notice to top editorial staff of UNI

New Delhi : Taking strong cognizance of the torture and humiliation of a dalit employee of United News of India (UNI), a prestigious news agency of the country, the Delhi High court yesterday issued notice to two high profile scribes of UNI including Joint Editor Neeraj Bajpayee, Journalist Ashok Upadhyay and an another employee of the agency Mohan Lal Joshi.

While hearing the case Delhi high court hon’bleJustice Pratibha Rani issued the notices directing the trio to file a reply by July 15, 2016 informed the counsel Jitendra kumar Jha and Shahid Iqbal. The counsels further said that after taking cognizance of non filing of any appeal by the government lawyer against acquittal of the accused by a lower court, judge asked the government lawyer about it and he admitted that no writ was filed against the decision of the lower court and he accepted the notice .

Earlier UNI Joint Editor Mr Bajpayee,journalist Mr Upadhyay and an another employee of UNI Mr Joshi were sent to tihar jail by lower court in 2013 in connection with the SC/ST case lodged at Parliament Street police station with FIR No. 61/2013. The trio who have unleashed a reign of terror in the organisation were put behind the bars for one week from 12/12/2013 to 18/12/2013.

As per the case these three acused had humiliated and had threatened the victim, (petitioner )Virender Verma, a Dalit employee of UNI in the office premises on 14/03/2013. The incident took place within the premises of the UNI located on 9, Rafi Marg, New Delhi situated within 200 meters of the Indian Parliament. The case was lodged Under Sec 3 of SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 in which the accused persons were acquitted by the lower court.

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एक फेसबुक पोस्ट पर IIMC में घमासान, दलित छात्रों ने की कंप्लेन, कमेटी गठित

आईआईएमसी छात्रों के बीच एक फेसबुक पोस्ट से घमासान मच गया है. दलित छात्रों ने पूरे मामले की एससी-एसटी एक्ट में शिकायत की है. इस पूरे मामले की जड़ में एक टीचर का हाथ होने की बात कही जा रही है. एक टीचर द्वारा छात्र को धमकी दिए जाने का घटनाक्रम भी हो गया है. दरअसल IIMC में पढ़ने वाले एक छात्र ने कुछ दिनों पहले रोहित वेमुला की आत्महत्या पर सोशल मीडिया में सवाल उठाने वालों की नीयत पर एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी. इस पोस्ट पर कुछ छात्रों ने आपत्ति जाहिर की और इसे लेकर कॉलेज के साथ ही एससी-एसटी कमीशन, आदिवासी मामलों के मंत्रालय, और सामाजिक न्याय मंत्रालय तक शिकायत कर दी.

दलित छात्रों कहना है कि उस पोस्ट से उनकी भावनाएं आहत हुईं और वो संबंधित छात्र के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहते हैं. उनकी शिकायत के बाद कॉलेज ने इस मामले की सुनवाई के लिए एक कमेटी का गठन किया, जिसमें आरोपी छात्र के विभागाध्यक्ष को ही नहीं शामिल किया गया. अब आरोपी छात्र का कहना है कि उसे कुछ बोलने नहीं दिया जा रहा और उसे ऐसे माहौल में बहुत डर लग रहा है. ऐसा बताया जा रहा है कि बुधवार शाम को IIMC के ही एक छात्र ने अंग्रेजी पत्रकारिता विभाग के टीचर अमित सेनगुप्ता को दूसरे पक्ष के लोगों को भड़काते हुए सुना. उसने इस बात की लिखित शिकायत ओएसडी अनुराग मिश्रा और अन्य विभागाध्यक्षों से की. इस शिकायत के बाद कथित आरोपी टीचर अमित सेनगुप्ता ने छात्र को कैंपस में ही घेर लिया और शिकायत वापस लेने की बात कहने लगे.

छात्र के मुताबिक टीचर ने कहा कि अगर वो शिकायत वापस नहीं लेता है, तो वो उस पर मानहानि का मुकदमा कर देंगे. इस मुद्दे पर उनकी और कुछ छात्रों की तीखी बहस भी हुई. अब सुनने में आ रहा है कि टीचर ने छात्र को देख लेने की धमकी दी है. प्लेसमेंट का वक्त करीब होने के चलते छात्र घबराया हुआ है और उसने इस बात की फिर से शिकायत करने की बात कही है. केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला यह संस्थान में बीते कुछ समय से चर्चा में है. पहले तो संस्था के डीजी पर सवाल उठे थे और फिर उनकी विदाई के बाद अभी तक नया डीजी ना आने के चलते पिछली बैच के छात्रों का दीक्षांत समारोह भी काफी देरी से हो रहा है.

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IIMC में कुछ गड़बड़ हो रहा है

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IIMC Alumni Association Condemns attack on Journalist and IIMCian Kishan Barai

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सारे चैनल, बड़े अखबार और मैग्जीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं, कोई अपवाद नहीं है

Dilip C Mandal : आप लोग मेरे स्टेटस को Like करना बंद कीजिए प्लीज. अपना लिखिए. जैसा बन पड़े, वैसा लिखिए. लिखना क्राफ्ट है. करने से हाथ सध जाता है. फोटो और वीडियो लगाइए. यहां संघियों को अपना टाइम लगाने दीजिए. देश को लाखों बहुजन फुले-आंबेडकरवादी लेखक और कम्युनिकेटर चाहिए. भारत के सारे चैनल और बड़े अखबार और मैगजीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं. कोई अपवाद नहीं है. वहां कुछ लोग सहानुभूति का नाटक कर रहे हैं. पर वे दूसरों की तरफ से ही खेल रहे हैं. निर्णायक क्षणों में वे आपके साथ नहीं होंगे. भारतीय मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आपका लेखक बनना जरूरी है. आपके लाइक्स का मैं क्या करूंगा? लिखिए.

फेसबुक समेत सोशल मीडिया में RSS की दादागीरी टूट चली है. सोशल मीडिया के लाखों लोकतांत्रिक बहुजनों, SC, ST, OBC, माइनॉरिटी, उदार – प्रगतिशील सवर्ण लेखकों और लेखिकाओं ने संघ के इस किले को भेद दिया है. इंटरनेट पर एकचटिया संघी गुंडागर्दी का जमाना गया. संघ को अब उसी की भाषा में जवाब मिल रहा है. कोई रियायत नहीं. जैसा हमला, उसी जोड़ का जवाब. क्रिया के बराबर और कई बार ज्यादा प्रतिक्रिया. संघी गाली गलौज का भी मुकम्मल जवाब लोग दे रहे हैं. बहुजनों के पास संघ की तरह कॉल सेंटर और पेड वर्कर नहीं हैं. पर संख्या बल है, तर्क है, न्याय और इंसानियत की ताकत है.

सोशल मीडिया में पहली बाजी RSS के हाथ लगी थी. लोकसभा चुनाव में. संघ जीता, क्योंकि मुकाबला कांग्रेस से था, जिसने कॉल सेंटर का जवाब कॉल सेंटर से देने की कोशिश की. लेकिन संघ के पास कॉल सेंटर के अलावा भक्त भी थे. बीजेपी के हिंदु बनाम मुस्लिम खेल में कांग्रेस का सोशल मीडिया छटपटा कर रह गया. उस समय के खेल में बहुजन शामिल नहीं सके थे. बाजी पलटने की शुरुआत बिहार से हुई. बहुजनों ने पहली बार अपना दम दिखाया. संसाधन संघ के पास थे, पर सोशल मीडिया के मैदान में उसे पसीने छूट गए. आरजेडी के सोशल मीडिया प्रबंधक SanJay Yadav की कोई काट बीजेपी के पास नहीं थी. देश भर के बहुजन लेखकों ने मिलकर बाजी पलट दी. और अभी तो खेल शुरू हुआ है….सारे संघी सोशल मीडिया पर हैं. वहीं बहुजनों का बड़ा हिस्सा तो अभी स्मार्ट फोन खरीदने की तैयारी कर रहा है. देखते जाओ.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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प्रधान संपादक शशिशेखर चतुर्वेदी जी, आपका रिपोर्टर दरअसल निकम्मा और मुफ्तखोर है

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मोदीजी, नागपुर में बैठे पेशवा लोग बहुत डेंजरस हैं, उन्होंने चुनाव न जिता पाने पर आडवाणी जी को नहीं छोड़ा

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‘लोकमत’ अखबार के मालिक विजय दर्डा ने आरक्षण के खिलाफ पहले पन्ने पर जहरीला लेख लिखा

Dilip C Mandal :  महाराष्ट्र के लोकतांत्रिक, न्यायप्रिय और समतावादी लोगों का अभिनंदन! शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद। देश को फुले, सावित्रीबाई, शाहू, बाबासाहेब जैसे महापुरुष देने वाले प्रदेश ने देश को एक बार फिर रास्ता दिखाया है और इसकी गूँज देश के अलग अलग हिस्सों में सुनाई देगी, तो इस बात को याद किया जाएगा कि नींव का पत्थर महाराष्ट्र के लोगों ने रखा था। लोकमत, महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा बिकने वाला समाचारपत्र है और ज़ाहिर है कि समाज के तमाम समूहों के लोग उसे खरीदते हैं।

इसके बावजूद अखबार के संपादक ने अपने बहुसंख्यक पाठकों के न्यायपूर्ण हित के खिलाफ जाते हुए आरक्षण के खिलाफ पहले पन्ने पर एक ज़हरीला लेख लिखा, जिससे समाज में कड़वाहट फैलने की आशंका थी। इस वजह से राज्य में, खासकर नागपुर में हजारों लोग शांतिपूर्ण तरीके से सड़कों पर निकल आए और अखबार के इस अलोकतांत्रिक व्यवहार का ज़ाहिर निषेध किया। अखबार को जलाया गया और लोगों ने ग्राहकी बंद करा दी। यह संख्या इतनी बडी थी कि अगले ही दिन अखबार घुटनों के बल आ गया और पहले पेज पर छापा कि वह आरक्षण के खिलाफ नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि उसने आज तक कभी भी आरक्षण का विरोध नहीं किया। 🙂 झूठ कहा। लेकिन जाने दीजिए। अस्तु, बधाई।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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