(पार्ट दस) जिन मिस्टर झा की BBC में वापसी का जिक्र कर मेरा कांट्रैक्ट खत्म किया, वो तो इस्तीफा दे चुके हैं!

मैं और बीबीसी-10 आज मैं पिछला नहीं बल्कि कल की ही एक ताज़ा सूचना से शुरू करना चाहूंगी. कल मुझे पता चला कि मिस्टर झा ने बीबीसी से इस्तीफ़ा दे दिया है. जैसे ही मुझे पता चला चंद लोगों के लिए रही सही इज्जत भी मेरे दिल से खत्म हो गई. कुछ लोगों पर बहुत …

(पार्ट नौ) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मेरी स्टोरी सरकारी फाइल की तरह राजेश प्रियदर्शी और महिला डेस्क के बीच झूलती रहती मैं और बीबीसी- 9 ‘कहां से हो?’ ‘दिल्ली से ही, जन्म-पढ़ाई सब दिल्ली से ही हुआ है, लेकिन राजस्थान से भी संबंध रखते हैं.’ ‘राजस्थान..? राजस्थान में कहां से हो?’ ‘बूंदी ज़िले से’ ‘अच्छा… राजस्थान में क्या हो?’ ‘दलित हैं …

पार्ट आठ : मैंने BBC हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा से कह दिया- किसी भी स्टोरी के लिए राजेश प्रियदर्शी के पास न जाऊंगी!

मैं और बीबीसी- 8 समय के साथ-साथ मेरे मन में गुस्सा उत्पन्न होना शुरू हो गया. मुझे हमेशा से अपने आत्मसम्मान से बहुत प्यार रहा है. न्यूज़रूम में तीन बार जिस तरह राजेश प्रियदर्शी सर ने मुझे सबके सामने डांटा था, उससे मेरे आत्मसम्मान को गहरा धक्का लगा था.

पार्ट सात : राजेश प्रियदर्शी सर का मैसेज आया- ‘इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता’

मैं और बीबीसी-7 मैं इतने तनाव में आ गई थी कि मेरा ऑफिस जाने का मन ही नहीं करता था. मन में हमेशा यही चलता रहता था कि मेरा एक्सीडेंट हो जाए, मुझे कुछ हो जाए… बस ऑफिस ना जाना पड़े.

(पार्ट छह) मीना को BBC हिंदी के डिजिटल संपादक राजेश प्रियदर्शी करते थे मानसिक रूप से प्रताड़ित!

मैं और बीबीसी-6 मॉर्निंग मीटिंग में ज़्यादातर चर्चा स्टोरी आइडिया को लेकर होती है. अधिकतर स्टोरी राजेश प्रियदर्शी सर ही अप्रूव करते थे, जो बीबीसी हिंदी के डिजिटल संपादक हैं और मीटिंग में अधिकतर समय मौजूद होते थे. मैं भी उस मीटिंग में स्टोरी आइडिया लेकर पहुंचती, लेकिन अधिकतर आइडिया रिजेक्ट कर दिए जाते. शुरू …

मीना कोई अकेली नहीं, भारतीय मीडिया को पूरा दलित वर्ग कुबूल नहीं!

Tahir Mansuri : बीबीसी से मीना कोतवाल को हटाए जाने की घटना को सामान्य मत समझिये. मीना अकेली नहीं हैं जिन पर यह गाज़ गिरी है बल्कि पूरा दलित वर्ग भारतीय मीडिया में अस्वीकार्य है. बीबीसी की मानसिकता पर मुझे पहले भी कोई शक नहीं था कि वह दोगले हैं, मनुवादी एजेंडे पर हैं.

तुम पागल हो जो ये सब लिख रही हो, तुम्हें कोई नौकरी नहीं देगा!

Meena Kotwal : मैं और बबीसी सीरीज़ से इतर… तुम पागल हो, जो ये सब लिख रही हो… तुम्हें कोई नौकरी नहीं देगा… तुम उनके सामने कमजोर हो… तुम विक्टिम कार्ड खेल रही हो… मैं जानती/ता हूं कि तुम्हारे साथ गलत हुआ है पर भेदभाव नहीं हुआ होगा… तुम तो अपना पेपर भी नहीं दे …

(पार्ट पांच) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मैं और बीबीसी-5 डेस्क पर काम करते हुए मुझे नौ महीने हो गए थे. कुछ लोगों का रवैया मेरे प्रति बदलने लगा था. मेरे पीछे से मेरा मज़ाक बनाया जाने लगा, मुझे उल्टा-सीधा कहा जाने लगा. मेरे प्रति कुछ लोगों की बेरुखी साफ़ दिखाई देने लगी थी. मुझे इसका एक कारण ये भी लगा कि …

(पार्ट चार) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मैं और बीबीसी-4 “आप ही मीना हो?” “हां, क्यों क्या हुआ?” “नहीं कुछ नहीं, बस ऐसे ही.” “आपने इस तरह अचानक पूछा..? आप बताइए न किसी ने कुछ कहा क्या?” “नहीं, नहीं कुछ ख़ास नहीं.” (थोड़ी देर बात कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद) “बताइए न मैं किसी को नहीं बताऊंगी.” “मुझसे किसी ने …

(पार्ट तीन) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मैं और बीबीसी- 3 ट्रेनिंग खत्म हो चुकी थी. दो अक्टूबर को मैं और मेरे साथ जॉइन करने वाले सभी ऑफ़िस पहुंच चुके थे. न्यूज़रूम में ये हमारा पहला दिन था. बीबीसी के लिए ये दिन बहुत ख़ास था क्योंकि इस दिन बीबीसी हिंदी का टीवी बुलेटिन शुरू हो रहा था, जिसके उपलक्ष्य में बीबीसी …

(पार्ट दो) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मैं और बीबीसी- 2 ऑफ़िस के कुछ दिन ट्रेनिंग में ही बीते. जब तक ट्रेंनिंग थी तब तक तो सब कुछ कितना अच्छा था. ऑफ़िस के कई लोग आकर बताते भी थे कि ये तुम्हारा हनीमून पीरियड है, जिसे बस एंजॉय करो.

(पार्ट एक) वंचित तबके की लड़की मीना कोतवाल की जुबानी बीबीसी की कहानी

मैं और बीबीसी-1 चार सितम्बर, 2017 का दिन यानि बीबीसी में ऑफिस का पहला दिन. रातभर नींद नहीं आई थी, बस सुबह का इंतज़ार था. लग रहा था मानो एक सपना पूरा होने जा रहा है. क्योंकि आज तक घर में तो छोड़ो पूरे परिवार में भी कोई इस तरह बड़े-बड़े ऑफिस में काम नहीं …

यशवंत ने क्यों लिखा- ”जागो सवर्णों जागो! जातिवाद जिंदाबाद! इंडियन पॉलिटिक्स अमर रहे!”

Yashwant Singh : ब्रिटेन में कार्यरत Neeti Vashisht जी को ये स्टेटस (देखें स्क्रीनशॉट) अपडेट किए 10 घण्टे हो गए लेकिन लाइक कमेंट सिर्फ मैंने किया है। मैं सवर्ण घर में पैदा हुआ हूँ लेकिन सवर्ण मानसिकता नहीं रखता। पर इस लोकतंत्र में जब देखता हूँ कि वोट बैंक और प्रेशर ग्रुप ही काम करते …

तो इस कारण RSS वाले आदिवासियों को वनवासी कहते हैं!

आरएसएस का आदिवासियों को वनवासी कहने का षड्यंत्र… यह सर्वविदित है कि आरएसएस हमेशा से आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी कहती है। इसके पीछे बहुत बड़ी चाल है जिसे समझने की ज़रूरत है। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश मे विभिन्न विभिन्न समुदाय रहते हैं जिनके अपने अपने धर्म तथा अलग अलग …

दलित आदिवासी वोटों के बिखराव की यह पटकथा कौन लिख रहा है?

जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उन राज्यों में अचानक कई दलित,आदिवासी, बहुजन, मूलनिवासी संज्ञाओं वाली राजनीतिक पार्टियों का प्रवेश-उद्भव हो गया है। उनके नवनियुक्त नेतागण सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा इस तरह कर रहे हैं जैसे कि वे हेलिकॉप्टर में भर कर आसमान से जमीन पर उम्मीदवारों का छिड़काव कर …

अश्लील वीडियो बना वायरल करने से आहत दलित लड़की ने दी जान, देखें वीडियो

यूपी के मैनपुरी से एक बड़ी खबर है. यहां बेखौफ मनचलों ने एक दलित लड़के से छेड़छाड़ कर पहले उसका वीडियो बनाया और फिर वायरल कर दिया. इससे परेशान लड़की ने जान दे दी. बताया जाता है कि शौच को गयी एक दलित किशोरी के साथ कुछ मनचलों ने छेड़छाड कर वीडियो बना लिया और …

दलित-मुस्लिम मीडियाकर्मियों के उत्पीड़न की एक सच्ची कहानी…सुनेंगे तो रोंगेट खड़े हो जाएंगे…

…अंततः फर्जी केस से बरी हुये पत्रकार योगेंद्र सिंह और अब्दुल हमीद बागवान ! सत्य प्रताड़ित हुआ पर पराजित नहीं! 10 मार्च 2007 वह मनहूस दिन था , जब मेरे दो पत्रकार साथियों अब्दुल हमीद बागवान और योगेंद्र सिंह पंवार को भीलवाड़ा पुलिस द्वारा कईं गंभीर धाराओं में दर्ज कराए गए एक मुकदमे में गिरफ्तार …

हिंदू धर्म में सम्मान नहीं मिला तो बन गए बौद्ध… देखें वीडियो….

कपिल वस्तु घूम आया. वहां बौद्ध स्तूप के सामने बैठे भिक्छुओं ने साफ-साफ कहा कि वे हिंदू धर्म इसलिए छोड़ दिए क्योंकि वहां उन्हें सम्मान नहीं मिल रहा था. इनकी बातें आंखें खोलने वाली हैं.  देखें वीडियो….

दलित नेता चंद्रशेखर पर रासुका अवधि बढ़ाना दलित दमन का प्रतीक : दारापुरी

लखनऊ 30 जनवरी, 2018 : “चंद्रशेखर पर रासुका अवधि बढ़ाना दलित दमन का प्रतीक है.” यह बात आज एस.आर. दारापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने आगे कहा है कि एक तरफ जोगी सरकार अपनी पार्टी से जुड़े लोगों के आपराधिक मामले वापस ले …

यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए…

Surendra Kishore : बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि आपको अपने बारे में एक खास बात बताऊं। यह भी कि वह खास बात किस तरह मेरे जीवन में बड़े काम की साबित हुई। मैंने 1977 में एक बजुर्ग पत्रकार की नेक सलाह मान कर अपने जीवन में एक खास दिशा तय की। उसका मुझे अपार लाभ मिला। मैंने फरवरी 1977 में अंशकालीन संवाददाता के रूप में दैनिक ‘आज’ का पटना आफिस ज्वाइन किया था। हमारे ब्यूरो चीफ थे पारस नाथ सिंह। उससे पहले वे ‘आज’ के कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक थे। वे ‘आज’ के नई दिल्ली ब्यूरो में भी वर्षों तक काम कर चुके थे। पटना जिले के तारण पुर गांव के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बाबूराव विष्णु पराड़कर की यशस्वी धारा के पत्रकार थे। विद्वता और शालीनता से भरपूर।

सहारनपुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार!

 -एस.आर.दारापुरी- संयोजक जन मंच उत्तर प्रदेश एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति उत्तर प्रदेश सभी भलीभांति अवगत हैं कि 5 मई, 2017 को सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव के दलितों के घरों पर उस क्षेत्र के ठाकुरों ने हमला किया था. इसमें लगभग दो दर्जन दलित बुरी तरह से घायल हुए थे और 50 से अधिक घर …

एक दलित नौजवान चंद्रशेखर से राष्ट्र को क्या खतरा है कि उस पर रासुका लगाना पड़ा?

Nadim S. Akhter : एक दलित नौजवान चंद्रशेखर ने ऐसा क्या किया कि उसे हाई कोर्ट से जमानत मिलते ही राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका लगाकर फिर अंदर कर दिया!! जेल वो अपने पैरों पे चलकर गया था, बाहर व्हील चेयर पे निकला। अंदर उसके साथ इस तंत्र ने क्या किया, ये अंदाजा लगा लीजिए।

भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर पर रासुका दलित दमन का प्रतीक : दारापुरी

लखनऊ : “भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर पर रासुका दलित दमन का प्रतीक”- यह बात आज एस.आर. दरापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति, उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने आगे कहा है कि यह उल्लेखनीय है कि चंद्रशेखर को एक दिन पहले ही इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत …

चंद्रशेखर पर रासुका लगाकर प्रदेश सरकार ने अपना सवर्ण-सामंती चेहरा उजागर किया

लखनऊ : रिहाई मंच ने भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर पर योगी सरकार द्वारा रासुका लगाने को लोकतान्त्रिक आवाज़ों का गला घोटना करार दिया है. मंच ने कहा है कि पूरे देश में भाजपा के शासन काल में दलितों पर उत्पीडन बढ़ा है और अब तो सरकार अपने शासन-प्रशासन के जरिये खुद दलितों की आवाज़ उठाने वालों के खिलाफ खुलकर सामने आ गयी है. मंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सवर्ण- सामंती सरकार का दलित विरोधी चेहरा अब खुलकर सामने आ गया है.

यूपी से सपा का साफ रहना पिछड़े वर्ग के हित में है! वजह बता रहे वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र

Satyendra PS : यूपी से सपा का सफाया जारी रहना पिछड़े वर्ग के हित में है। पिछड़े वर्ग की एकता के लिए जरूरी है कि अहीरों में 30 साल के सपा के शासन ने जो ठकुरैती भर दी है वो निकल जाए, वो अपने को पिछड़ा वर्ग का समझने लगें। मुलायम सिंह ने जब संघर्ष किया तो उसमें बेनी प्रसाद, आजम खां, मोहन सिंह, जनेश्वर मिश्र जैसे लोग उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। धीरे धीरे करके एक एक नेता को ठिकाने लगाया गया। उसके बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और ब्लाक अध्यक्ष तक यादव यादव हो गया। इतना ही नहीं, हेलीकाप्टर, जहाज, कार से लेकर साइकिल तक यादव हो गया।

धमकियों के कारण दलित चिंतक प्रो. कांचा इलैया ने खुद को हफ्ते भर से अपने घर में कैद कर रखा है!

प्रो. कांचा इलैया शेफर्ड के पक्ष में उतरे ढेर सारे साहित्यकार और कई संगठन…. दलित चिंतक प्रो. कांचा इलैया शेफर्ड ने पिछले एक हफ्ते से अपने को हैदराबाद के अपने घर में बंद कर रखा है। कारण है, उनकी किताब ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ के एक अध्याय पर आर्य वैश्य समुदाय की आहत भावनाएं। 9 सितम्बर से उन्हें इस आहत समुदाय द्वारा जान की धमकियां मिल रही हैं। तेलुगु देशम पार्टी के एक सांसद टी जी वेंकटेश ने प्रेस कांफ्रेंस करके उन्हें चौराहे पर फांसी देने की बात कही। कुछ दिन पहले उनकी कार पर हमला भी किया गया, जिससे वे बाल-बाल बचकर निकले। तेलंगाना सरकार ने इन तमाम घटनाओं के बावजूद उन्हें अभी तक कोई सरकारी सुरक्षा प्रदान नहीं की है।

हरिशंकर तिवारी के यहां दबिश पर विधानसभा से वाकआउट करने वाली मायावती सहारनपुर के दलित कांड पर चुप क्यों हैं?

लखनऊ : “मायावती की सहारनपुर के दलित काण्ड पर चुप्पी क्यों?” यह बात आज एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व आई.जी. व प्रवक्ता उत्तर प्रदेश जनमंच एवं सस्यद, स्वराज अभियान ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि एक तरफ जहाँ मायावती हरीशंकर तिवारी के घर पर दबिश को लेकर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष को गोरखपुर भेजती है और विधान सभा से वाक-आऊट कराती है वहीं मायावती सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलितों पर जाति-सामंतों द्वारा किये गए हमले जिस में दलितों के 60 घर बुरी तरह से जला दिए गए, 14 दलित औरतें, बच्चे तथा बूढ़े लोग घायल हुए में न तो स्वयम जाती है और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को ही भेजती है. वह केवल एक सामान्य ब्यान देकर रसम अदायगी करके बैठ जाती है.

दलित प्रोफेसर वाघमारे के जातीय उत्पीड़न की अंतहीन दास्तान

प्रोफेसर सुनील वाघमारे 34 साल के नौजवान हैं, जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के खोपोली कस्बे के एमसी कॉलेज में कॉमर्स डिपार्टमेंट के हेड रहे हैं और इसी महाविद्यालय के वाईस प्रिंसीपल भी रहे हैं. उत्साही, ईमानदार और अपने काम के प्रति निष्ठावान वाघमारे मूलतः नांदेड के रहने वाले हैं. वाणिज्य परास्नातक और बीएड करने के बाद वाघमारे ने वर्ष 2009 में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर इस कॉलेज को ज्वाइन किया था. वर्ष 2012 तक तो सब कुछ ठीक चला. मगर जैसे ही वर्तमान प्राचार्य डॉ एनबी पवार ने प्रिंसिपल का दायित्व संभाला, प्रोफेसर वाघमारे के लिये मुश्किलों का दौर शुरू हो गया.

बसपा की तेज़ी से घटती हैसियत से उपजी ‘असुरक्षा’ ने एक अति-अक्रोशित दबंग दलित संगठन को जन्म दे दिया

Surya Pratap Singh : आज के उत्तर प्रदेश में ‘सुगबुगाहट’ से ‘सुलगाहट’ तक की नयी दास्ताँ….पश्चिमी उ.प्र. में जातीय संघर्ष से उपजा दलित ‘उग्रवाद’ …65,000 युवाओं की हथियार धारी अति-उग्र, उपद्रवी ‘भीम-सेना’ का जन्म ……’भीम आर्मी भारत एकता मिशन (BABA Mission)!!! मुज़फ़्फ़रनगर दंग़ो के बाद से धार्मिक उन्माद व जातीय हिंसा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है ….इसमें वोटों की राजनीति हमेशा आग में घी का काम करती रही है…

भाजपा नेता ने हड़पी एक दलित की माईन्स, कोर्ट ने दिए जांच के आदेश

भीलवाड़ा, 1 मई 2017 : राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया के कृपापात्र और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी के खासमखास माने जाते हैं भीलवाड़ा नगर विकास न्यास के अध्यक्ष गोपाल खंडेलवाल। इसीलिए उनको यूआईटी की बागडोर दी गई। जिले के उभरते हुए ब्राह्मण नेता हैं। दशकों से भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय हैं। पूर्व में पंचायत राज संस्थाओं में चुने जा चुके हैं। खनन क्षेत्र में बड़ा नाम है। भाजपा की राजनीती के साथ साथ खनन व्यवसायी के रूप में भी उनका बड़ा नाम है।

मायावती का दलित वोट बैंक क्यों खिसका?

हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी की बुरी तरह से हार हुयी है। इस चुनाव में उसके बहुमत से सरकार बनाने के दावे के विपरीत उसे कुल 19 सीटें मिली हैं जिनमें शायद केवल एक ही आरक्षित सीट है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है। एनडीटीवी के विश्लेषण के अनुसार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को दलित वोटों का केवल 25% वोट ही मिला है जबकि इसके मुकाबले में सपा को 26% और भाजपा को 41% मिला है। दरअसल 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 22% पर पहुँच गया है। इसी अनुपात में बसपा के दलित वोटबैंक में भी कमी आयी है। अभी तो बसपा के वोटबैंक में लगातार आ रही गिरावट की गति रुकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। मायावती ने वर्तमान हार की कोई ईमानदार समीक्षा करने की जगह ईवीएम में गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ा है। क्या इससे मायावती इस हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच पायेगी या बसपा को बचा पायेगी?

दलित राजनीति की दरिद्रता

क्या यह दलित राजनीति की दरिद्रता नहीं है कि यह केवल आरक्षण तक ही सीमित
हो कर रह जाती है या इसे जानबूझ कर सीमित कर दिया जाता है? क्या दलितों
की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, तथा सामाजिक एवं आर्थिक शोषण
एवं पिछड़ापन दलित राजनीति के लिए कोई मुद्दा नहीं है? भाजपा भी आरएसएस के
माध्यम से चुनाव में आरक्षण के मुद्दे को जानबूझ कर उठवाती है ताकि
दलितों का कोई दूसरा मुद्दा चुनावी मुद्दा न बन सके। इसके माध्यम से वह
हिन्दू मुस्लिम की तरह आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधियों का ध्रुवीकरण
करने का प्रयास करती है जैसा कि पिछले बिहार चुनाव से पहले किया गया था.
ऐसा करके वह दलित नेताओं का काम भी आसान कर देती है क्योंकि इससे उन्हें
दलितों के किसी दूसरे मुद्दे पर चर्चा करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। इसी
लिए तो दलित पार्टियां को चुनावी घोषणा पत्र  बनाने और जारी करने की
ज़रूरत नहीं पड़ती। परिणाम यह होता है कि दलित मुद्दे चुनाव के केंद्र
बिंदु नहीं बन पाते.

मनु स्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद के विरुद्ध जन आन्दोलन का ऐलान

मनुवाद विरोधी सम्मलेन संपन्न

जयपुर : सावित्री बा फुले की जयंती के मौके पर राजस्थान भर से आये प्रतिनिधियों की मौजूदगी में मनुवाद विरोधी सम्मलेन का आयोजन किया गया. इसमें सर्वसम्मति से तय हुआ कि राजस्थान उच्च न्यायालय के परिसर में लगी मनु की मूर्ति के हटने तक देश व्यापी आन्दोलन किया जायेगा जो विभिन्न राज्यों तथा राजस्थान के जिला मुख्यालयों तक भी जायेगा. यह भी निर्णय लिया गया कि मनुवाद विरोधी अभियान का एक शिष्टमंडल शीघ्र ही राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर मांग करेगा कि हाई कोर्ट परिसर में लगी अन्याय के प्रतीक मनु की मूर्ति को हटाने के लिए शीघ्र सुनवाई की जाये.

झूठ की फैक्ट्री तो आप चला रहे हैं राकेश सिन्हा जी!

आरएसएस विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा जी ने बीबीसी हिन्दी सेवा को दिये साक्षात्कार में यह दावा किया है कि -“संघ में कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता भी जातिवादी व्यवहार नहीं करता है.” सिन्हा ने यह दावा मेरे इस आरोप के जवाब में किया है, जिसमें मैने आरएसएस के लोगो द्वारा मेरे साथ किये गये जातिगत भेदभाव की कहानी सार्वजनिक की. मैं फिर से दौहरा रहा हूं कि- “आरएसएस एक सवर्ण मानसिकता का पूर्णत: जातिवादी चरित्र का अलोकतांत्रिक संगठन है, जो इस देश के संविधान को खत्म करके मनुस्मृति पर आधारित धार्मिक हिन्दुराष्ट्र बनाना चाहता है.”

भारत का एक ऐसा गाँव जहाँ भीमराव का संविधान नहीं, मनुस्मृति का विधान चलता है!

किसी नरक से कम नहीं है बरजांगसर जहाँ अभी तक दलितों से जबरन मृत पशु डलवाये जा रहे हैं…. राजस्थान के बीकानेर जिले की डूंगरगढ़ तहसील का गाँव है बरजांगसर. यूँ तो देश ने काफी तरक्की कर ली है, तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है, कानून का शासन स्थापित है, दलित लोग दासता से मुक्त कर दिए गए हैं, भेदभाव ओर छुआछुत को अपराध घोषित किया जा चुका है और किसी भी दलित को जबरन किसी भी अस्वच्छ पेशे में नहीं धकेला जा सकता है, विशेषकर मृत पशु को निस्तारित करने जैसे काम में तो कतई नहीं. यह सब अच्छी अच्छी बातें भारत के संविधान में लिखी हुई हैं, मगर बीकानेर जिले के बरजांगसर में भारत के कानून अभी लागू नहीं होते हैं. अभी वहां संविधान का राज नहीं स्थापित हो पाया है, भीमराव का विधान नहीं, अभी भी वहां पर मनु नामक शैतान का विधान लागू है, इसीलिए तो आज भी बरजांगसर के दलितों को जबरन मरे हुए जानवर डालने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

यह ब्राह्मण समुदाय शिक्षा पर एकाधिकार रखना अपना दैविक अधिकार समझता है

रोहित वेमुला श्रृंखला का लेख…. शिक्षालयों में जरुरी है एजुकेशन डाइवर्सिटी…

-एच.एल.दुसाध

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर केन्द्रित एक पुस्तक को अंतिम रूप देने में विगत कुछ सप्ताहों से बुरी तरह व्यस्त हूँ. मेरे संपादन में तैयार हो रही ’शैक्षणिक परिसरों में पसरा भेदभाव : सवर्ण वर्चस्व का परिणाम’ नामक सवा दो सौ पृष्ठीय यह पुस्तक देश के शिक्षा जगत के 27 प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों और 13 विद्वानों के साक्षात्कार से समृद्ध है. गत 23 अप्रैल को इस किताब के दूसरे प्रूफ पर नजर दौड़ाते और लेखों को चार अध्यायों में सजाते–सजाते सुबह के पांच बज गए थे. देर रात तक काम करने के बाद रविवार 24 अप्रैल की सुबह 10 बजे के करीब नींद से जागा. आदत के अनुसार चाय की चुस्की लेते हुए अख़बारों पर नजर दौड़ाने लगा. अचानक एक बहुपठित अखबार के दूसरे पृष्ठ के एक खबर पर मेरी दृष्टि चिपक गयी. मैंने एकाधिक बार ध्यान से उस खबर को पढ़ा. ’डीयू के दलित शिक्षकों ने लगाया प्रताड़ना का आरोप’ शीर्षक से छपी निम्न खबर को मेरी ही तरह शायद और लोगों ने भी बहुत ध्यान से पढ़ा होगा-

हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं, वे नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें

केरल में निर्भया जैसी दरिंदगी से उबाल, घटनास्थल से लौटी महिलाओं की टीम ने किया की खुलासा

-संदीप ठाकुर-

नई दिल्ली। दुराचार और जघन्य हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली यह
वारदात दिल्ली के निर्भया कांड से भी कहीं ज्यादा वीभत्स और दिल दहला
देने वाली है। यह केवल एक गरीब मेहनती और महत्वाकांक्षी दलित लड़की की
कहानी नहीं है बल्कि समाज के दबे कुचले उन हजारों-लाखों लड़कियों के
अरमानों की भी दास्तान है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद न सिर्फ कुछ कर
गुजरने की चाह रखतीं हैं, परंतु चाहतों के असली जामा पहनाने का हौसला
लेकर दिन रात मेहनत करतीं हैं। लेकिन समाज के दबंगों को उनकी यह तरक्की
हजम नहीं होती।

देश के मुसलमानों को दलितों से सीखना चाहिए राजनीति का सबक

इमामुद्दीन अलीग

इतिहास के अनुसार देश के दलित वर्ग ने सांप्रदायिक शोषक शक्तियों के अत्याचार और दमन को लगभग 5000 वर्षों झेला है और इस इतिहासिक शोषण और भीषण हिंसा को झेलने के बाद अनपढ़, गरीब और दबे कुचले दलितों को यह बात समझ में आ गई कि अत्याचार, शोषण,सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका यही है कि राजनीतिक रूप से सशक्त बना जाए। देश की स्वतन्त्रता के बाद जब भारत में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई तो दलितों ने इसे  अपने लिए एक बहुत बड़ी नेमत समझा। इस शुभ अवसर का लाभ उठाते  हुए पूरे के पूरे दलित वर्ग ने सांप्रदायिक ताकतों के डर अपने दिल व दिमाग से उतारकर और परिणाम बेपरवाह होकर अपने नेतृत्व का साथ दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनसंख्या के आधार 18-20% यानी अल्पसंख्यक में होने के बावजूद भी उन्होंने कई बार सरकार बनाई और एक समय तो ऐसा भी आया कि जब दलितों के चिर प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली पार्टी भाजपा को भी दलित नेतृत्व के सामने गठबंधन के लिए सिर झुकाना पड़ा।

Delhi HC issues notice to top editorial staff of UNI

New Delhi : Taking strong cognizance of the torture and humiliation of a dalit employee of United News of India (UNI), a prestigious news agency of the country, the Delhi High court yesterday issued notice to two high profile scribes of UNI including Joint Editor Neeraj Bajpayee, Journalist Ashok Upadhyay and an another employee of the agency Mohan Lal Joshi.

एक फेसबुक पोस्ट पर IIMC में घमासान, दलित छात्रों ने की कंप्लेन, कमेटी गठित

आईआईएमसी छात्रों के बीच एक फेसबुक पोस्ट से घमासान मच गया है. दलित छात्रों ने पूरे मामले की एससी-एसटी एक्ट में शिकायत की है. इस पूरे मामले की जड़ में एक टीचर का हाथ होने की बात कही जा रही है. एक टीचर द्वारा छात्र को धमकी दिए जाने का घटनाक्रम भी हो गया है. दरअसल IIMC में पढ़ने वाले एक छात्र ने कुछ दिनों पहले रोहित वेमुला की आत्महत्या पर सोशल मीडिया में सवाल उठाने वालों की नीयत पर एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी. इस पोस्ट पर कुछ छात्रों ने आपत्ति जाहिर की और इसे लेकर कॉलेज के साथ ही एससी-एसटी कमीशन, आदिवासी मामलों के मंत्रालय, और सामाजिक न्याय मंत्रालय तक शिकायत कर दी.

सारे चैनल, बड़े अखबार और मैग्जीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं, कोई अपवाद नहीं है

Dilip C Mandal : आप लोग मेरे स्टेटस को Like करना बंद कीजिए प्लीज. अपना लिखिए. जैसा बन पड़े, वैसा लिखिए. लिखना क्राफ्ट है. करने से हाथ सध जाता है. फोटो और वीडियो लगाइए. यहां संघियों को अपना टाइम लगाने दीजिए. देश को लाखों बहुजन फुले-आंबेडकरवादी लेखक और कम्युनिकेटर चाहिए. भारत के सारे चैनल और बड़े अखबार और मैगजीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं. कोई अपवाद नहीं है. वहां कुछ लोग सहानुभूति का नाटक कर रहे हैं. पर वे दूसरों की तरफ से ही खेल रहे हैं. निर्णायक क्षणों में वे आपके साथ नहीं होंगे. भारतीय मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आपका लेखक बनना जरूरी है. आपके लाइक्स का मैं क्या करूंगा? लिखिए.

‘लोकमत’ अखबार के मालिक विजय दर्डा ने आरक्षण के खिलाफ पहले पन्ने पर जहरीला लेख लिखा

Dilip C Mandal :  महाराष्ट्र के लोकतांत्रिक, न्यायप्रिय और समतावादी लोगों का अभिनंदन! शानदार, ज़बरदस्त, ज़िंदाबाद। देश को फुले, सावित्रीबाई, शाहू, बाबासाहेब जैसे महापुरुष देने वाले प्रदेश ने देश को एक बार फिर रास्ता दिखाया है और इसकी गूँज देश के अलग अलग हिस्सों में सुनाई देगी, तो इस बात को याद किया जाएगा कि नींव का पत्थर महाराष्ट्र के लोगों ने रखा था। लोकमत, महाराष्ट्र का सबसे ज्यादा बिकने वाला समाचारपत्र है और ज़ाहिर है कि समाज के तमाम समूहों के लोग उसे खरीदते हैं।

बिहार में सामूहिक दलित संहार पर कोबरा पोस्ट का स्टिंग – ‘ऑपरेशन ब्लैक रैन’

‘कोबरा पोस्ट’ ने बिहार में दलित जन-संहार पर ‘ऑपरेशन ब्लैक रैन’ स्टिंग किया है। उसने राज्य के छह सामूहिक दलित संहार के अपराधियों पर कैमरा फोकस करते हुए खुलासा किया है कि किस तरह मध्य बिहार में रणवीर सेना मिलिशिया तक कानून के लंबे हाथ पहुंचने से बच रहे हैं। उन्हें किस तरह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है और ऐसे संहारों के लिए उन्हें एक खास वर्ग से लगातार आर्थिक सहयोग और समर्थन भी मिल रहा है।

दलितों और महिलाओं पर अत्याचार के खिलाफ लखनऊ में विरोध प्रदर्शन

लखनऊ : राजस्थान के नागौर जिले के गांव डंगवासा में 14 मई को दबंगों  द्वारा चार  दलितों की निर्मम हत्या व कई  लोगों को गंभीर रूप से घायल करने, उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले के गांव बड़े हरेवा में 16 मई को पांच दलित महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने के विरोध में भारतीय समन्वय संगठन (लक्ष्य) के कार्यकर्ताओं ने गत दिनो प्रदर्शन किया।  

लखनऊ में दलित अत्याचार के खिलाफ प्रदर्शन मार्च करते लक्ष्य के कार्यकर्ता

एक और खैरलांजी : दलितों की कब्रगाह बनता जा रहा राजस्थान का नागौर जिला

राजस्थान की राजधानी जयपुर से तक़रीबन ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित अन्य पिछड़े वर्ग की एक दबंग जाट जाति की बहुलता वाला नागौर  जिला इन दिनों दलित उत्पीडन की निरंतर घट रही शर्मनाक घटनाओं की वजह से कुख्यात हो रहा है. विगत एक साल के भीतर यहाँ पर दलितों के साथ जिस तरह का जुल्म हुआ है और आज भी जारी है ,उसे देखा जाये तो दिल दहल जाता है ,यकीन ही नहीं आता है कि हम आजाद भारत के किसी एक हिस्से की बात कर रहे है .ऐसी ऐसी निर्मम और क्रूर वारदातें कि जिनके सामने तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों द्वारा की जाने वाली घटनाएँ भी छोटी पड़ने लगती है .क्या किसी लोकतान्त्रिक राष्ट्र में ऐसी घटनाएँ संभव है ? वैसे तो असम्भव है ,लेकिन यह संभव हो रही है ,यहाँ के राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचें की नाकामी की वजह से …

Justice for Dalit Journalist Nagaraju, Candlelight Vigil outside TNIE Tomorrow

New Delhi : Journalists, academicians, activists, lawyers and eminent personalities came together in solemn remembrance of the death of Dalit journalist Nagaraju Koppula who died after a protracted battle with cancer. Participants at the condolence meeting held on April 23, resolved to fight for justice against the casteist discrimination and contractual exploitation meted out to him by his employers The New Indian Express.

The tale of a dalit journalist

Nagaraju Koppula overcame impossible hurdles to become an English language journalist. Shocked to hear of his death at 35, PARANJOY GUHA THAKURTA recalls his determination.

He was truly exceptional in more ways than one. Born into an extremely poor and socially backward family in a village in Khammam district in Andhra Pradesh (now Telengana), he was able to overcome the circumstances of his upbringing to work in an English – yes English! – daily newspaper in Hyderabad before cancer consumed him a few weeks before his 35th birthday.

हिंदी पत्रकारिता में दलित चिंतकों की मजबूत हिस्सेदारी : अरविंद मोहन

नई दिल्ली : वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता में दलित चिंतकों की हिस्सेदारी इतनी मजबूत हो गई है कि यदि उनके सामाजिक-साहित्यिक मुद्दों को केन्द्र में नहीं रखा गया तो यह पत्रकारिता के पेशे से बेईमानी और इसकी व्यवसायिकता की हानि होगी। प्रो. राजकुमार ने कहा कि शिक्षा ही प्रतिरोध की शक्ति देती है। 

अगर इन गालियों का इस्तेमाल करते हैं तो आप दलित-ओबीसी विरोधी हैं!

Pramod Ranjan : आप अपने विरोधियों के लिए किस प्रकार की गालियों का इस्‍तेमाल करते हैं? ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव व अनेक स्‍त्रीवादी इस मसले को उठाते रहे हैं कि अधिकांश गालियां स्‍त्री यौनांग से संबंधित हैं। पुरूष एक-दूसरे को गाली देते हैं, लेकिन वे वास्‍तव में स्‍त्री को अपमानित करते हैं। लेकिन जो इनसे बची हुई गालियां हैं, वे क्‍या हैं? ‘चूतिया’, ‘हरामी’, ‘हरामखोर’..आदि। क्‍या आप जानते हैं कि ये भारत की दलित, ओबीसी जातियों के नाम हैं या उन नामों से बनाये गये शब्‍द हैं। इनमें से अनेक मुसलमानों की जातियां हैं।

‘आजतक’ और ‘हेडलाइंस टुडे’ में क्या दलित विरोधी मानसिकता वाले सवर्ण भरे पड़े हैं?

Ajitesh Mridul : This is how Headlines Today depicted Bihar’s CM Jiten Manjhi. I just want to tell them that sucking up to Bhajappa and all is OK, but at least hire people who understand the social construct. Mushars, don’t eat rats just for the heck of it. Read and learn about their sufferings.

प्रसार भारती के नौकरशाहों ने एससी-एसटी कर्मियों के साथ अन्याय किया, विरोध में कैंडल मार्च और सभा

नई दिल्ली : आकाशवाणी और दूरदर्शन के एसटी-एससी प्रशासनिक कर्मचारी महासंघ ने नियुक्ति, प्रोन्नति, बैकलाग भरने और स्थानांतरण में अन्याय, उत्पीडन और जातिगत भेदभाव के खिलाफ शांतिपूर्ण कैंडल मार्च आयोजित किया। यह मार्च आकाशवाणी भवन से प्रसार भारती, पीटीआई बिल्डिंग तक जुलूस की शक्ल में पहुंचा जहां एक सभा  के रूप में तब्दील हो गया। इसमें देश भर में कार्यरत आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के अभियांत्रिकी, तकनीकी और प्रोग्राम के प्रशासनिक वर्ग के अधिकारियों ने भाग लिया।

सलाम मांझी! सलाम कंवल भारती!

दलित-पिछड़ों यानी मूलनिवासी की वकालत को द्विज पचा नहीं पा रहे हैं। सामाजिक मंच पर वंचित हाषिये पर तो हैं ही, अब राजनीतिक और साहित्यिक मंच पर भी खुल कर विरोध में द्विज आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान से उच्च जाति वर्ग पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर बौखलाहट और तीखा विरोध के साथ सामने आया तो वहीं लखनउ में कथाक्रम की संगोष्ठी ‘लेखक आलोचक, पाठक सहमति, असहमति के आधार और आयाम’, में लेखक कंवल भारती के यह कहने पर कि ‘साहित्य और इतिहास दलित विरोधी है। ब्राह्मण दृष्टि असहमति स्वीकार नहीं करती।

मीडिया में नौकरियां रेफरेंस के आधार पर दी जाती हैं और रेफरेंस आधारित भर्ती प्रक्रिया में सवर्ण लोगों को ज्यादा फायदा मिलता है

: मीडिया में दलित और दलितों के सरोकार : आखिर क्या वजह है कि मीडिया में दलितों के साथ दलितों के सरोकार भी अनुपस्थित हैं? क्या इसके पीछे जातीय आग्रह-पूर्वाग्रह जिम्मेदार नहीं है? आमतौर पर छिटपुट खबरों के अलावा मैन स्ट्रीम मीडिया में दलित सरोकारों के कवरेज के प्रति नकारत्मक रवैया ही देखने को मिलता है। तमाम विकास के दावों के बावजूद जातीय आधार पर भेदभाव बरता जाना आज भी हमारे देश में आम बात है। यह जातीय भेदभाव मीडिया में भी आसानी से देखा जा सकता है। मीडिया में फैसले लेने वाले ऊपर से नीचे 1 से 10 तक पदों पर दलित ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे।

मीडिया के बर्ताव से दुखी जीतन मांझी बोले- मीडिया की नजर में मैं गंवार हूं

बिहार के गया जिले के गोशाला के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, आप सभी जानते हैं कि मैं कैसा हूं और कितना पढ़ा-लिखा हूं. पर, मीडियावालों का हाल देखिए. उनकी नजरों में हम निठाह गंवार हैं. मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि नीतीश कुमार के साथ मेरा चोली-दामन का संबंध है. दोनों के बीच कहीं कोई मनभेद या मतभेद नहीं है. हाल-फिलहाल मीडिया में जो बातें सामने आयी हैं, सब फिजुल की हैं. किसी का कोई आधार नहीं है. वे दोनों (सीएम व नीतीश) अपने-अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं. नीतीश कुमार पार्टी को सशक्त बनाने में लगे हैं. पार्टी ने मुङो सरकार चलाने का दायित्व सौंपा है. मैं अपना काम कर रहा हूं.

बीएचयू में संघ की शाखा और मुसलमानों के प्रति नफरत के बीज

Om Thanvi : प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा के दूसरे भाग ‘मणिकर्णिका’ की बात मैंने परसों की थी। उस किताब में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दिनों का एक प्रसंग इस तरह हैः

बकरी चराने वाले को जिंदा जलाना और कूड़ा बीनने वालियों के साथ गैंगरेप

Mitra Ranjan : हमारे समाज में मौजूद जातिगत दर्जेबंदी ने किस कदर लोगों को वहशी बना दिया है उसके बारे में कुछ भी कहना कम है। अभी बिहार में हुई दो घटनाएँ इसी ओर इशारा कर रही हैं – किसी दबंग साहब के खेत में एक दलित परिवार की बकरी चले जाने पर १५ साल के किशोर के साथ मार-पीट और बाद में उसको जिन्दा जला देने का अमानवीय कृत्य और कूड़ा बीनने वाली ५ दलित बच्चियों /महिलाओं के साथ गैंगरेप की क्रूर घटना ! किस संवेदना की बात करते हैं साहब। और मीडिया- चैनल और प्रिंट, इन खबरों को संजीदगी एवं तत्परता से सामने लाने से मुंह चुराते रहे।