यशवंत ने क्यों लिखा- ”जागो सवर्णों जागो! जातिवाद जिंदाबाद! इंडियन पॉलिटिक्स अमर रहे!”

Yashwant Singh : ब्रिटेन में कार्यरत Neeti Vashisht जी को ये स्टेटस (देखें स्क्रीनशॉट) अपडेट किए 10 घण्टे हो गए लेकिन लाइक कमेंट सिर्फ मैंने किया है। मैं सवर्ण घर में पैदा हुआ हूँ लेकिन सवर्ण मानसिकता नहीं रखता। पर इस लोकतंत्र में जब देखता हूँ कि वोट बैंक और प्रेशर ग्रुप ही काम करते …

तो इस कारण RSS वाले आदिवासियों को वनवासी कहते हैं!

आरएसएस का आदिवासियों को वनवासी कहने का षड्यंत्र… यह सर्वविदित है कि आरएसएस हमेशा से आदिवासियों को आदिवासी न कह कर वनवासी कहती है। इसके पीछे बहुत बड़ी चाल है जिसे समझने की ज़रूरत है। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश मे विभिन्न विभिन्न समुदाय रहते हैं जिनके अपने अपने धर्म तथा अलग अलग …

दलित आदिवासी वोटों के बिखराव की यह पटकथा कौन लिख रहा है?

जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उन राज्यों में अचानक कई दलित,आदिवासी, बहुजन, मूलनिवासी संज्ञाओं वाली राजनीतिक पार्टियों का प्रवेश-उद्भव हो गया है। उनके नवनियुक्त नेतागण सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा इस तरह कर रहे हैं जैसे कि वे हेलिकॉप्टर में भर कर आसमान से जमीन पर उम्मीदवारों का छिड़काव कर …

अश्लील वीडियो बना वायरल करने से आहत दलित लड़की ने दी जान, देखें वीडियो

यूपी के मैनपुरी से एक बड़ी खबर है. यहां बेखौफ मनचलों ने एक दलित लड़के से छेड़छाड़ कर पहले उसका वीडियो बनाया और फिर वायरल कर दिया. इससे परेशान लड़की ने जान दे दी. बताया जाता है कि शौच को गयी एक दलित किशोरी के साथ कुछ मनचलों ने छेड़छाड कर वीडियो बना लिया और …

दलित-मुस्लिम मीडियाकर्मियों के उत्पीड़न की एक सच्ची कहानी…सुनेंगे तो रोंगेट खड़े हो जाएंगे…

…अंततः फर्जी केस से बरी हुये पत्रकार योगेंद्र सिंह और अब्दुल हमीद बागवान ! सत्य प्रताड़ित हुआ पर पराजित नहीं! 10 मार्च 2007 वह मनहूस दिन था , जब मेरे दो पत्रकार साथियों अब्दुल हमीद बागवान और योगेंद्र सिंह पंवार को भीलवाड़ा पुलिस द्वारा कईं गंभीर धाराओं में दर्ज कराए गए एक मुकदमे में गिरफ्तार …

हिंदू धर्म में सम्मान नहीं मिला तो बन गए बौद्ध… देखें वीडियो….

कपिल वस्तु घूम आया. वहां बौद्ध स्तूप के सामने बैठे भिक्छुओं ने साफ-साफ कहा कि वे हिंदू धर्म इसलिए छोड़ दिए क्योंकि वहां उन्हें सम्मान नहीं मिल रहा था. इनकी बातें आंखें खोलने वाली हैं.  देखें वीडियो…. कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दलित नेता चंद्रशेखर पर रासुका अवधि बढ़ाना दलित दमन का प्रतीक : दारापुरी

लखनऊ 30 जनवरी, 2018 : “चंद्रशेखर पर रासुका अवधि बढ़ाना दलित दमन का प्रतीक है.” यह बात आज एस.आर. दारापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं संयोजक जनमंच उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने आगे कहा है कि एक तरफ जोगी सरकार अपनी पार्टी से जुड़े लोगों के आपराधिक मामले वापस ले रही है वहीं दूसरी ओर शब्बीरपुर में दलितों पर सामंतों के हमले में न्याय मांगने वाले भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर पर हाई कोर्ट से जमानत मिलने पर भी रासुका लगाती है जिसे अब तीन महीने के लिए आगे बढ़ा दिया गया है.

यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए…

Surendra Kishore : बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि आपको अपने बारे में एक खास बात बताऊं। यह भी कि वह खास बात किस तरह मेरे जीवन में बड़े काम की साबित हुई। मैंने 1977 में एक बजुर्ग पत्रकार की नेक सलाह मान कर अपने जीवन में एक खास दिशा तय की। उसका मुझे अपार लाभ मिला। मैंने फरवरी 1977 में अंशकालीन संवाददाता के रूप में दैनिक ‘आज’ का पटना आफिस ज्वाइन किया था। हमारे ब्यूरो चीफ थे पारस नाथ सिंह। उससे पहले वे ‘आज’ के कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक थे। वे ‘आज’ के नई दिल्ली ब्यूरो में भी वर्षों तक काम कर चुके थे। पटना जिले के तारण पुर गांव के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बाबूराव विष्णु पराड़कर की यशस्वी धारा के पत्रकार थे। विद्वता और शालीनता से भरपूर।

सहारनपुर के दलित दोहरे अत्याचार का शिकार!

-एस.आर.दारापुरी-

संयोजक जन मंच उत्तर प्रदेश एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति उत्तर प्रदेश

सभी भलीभांति अवगत हैं कि 5 मई, 2017 को सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव के दलितों के घरों पर उस क्षेत्र के ठाकुरों ने हमला किया था. इसमें लगभग दो दर्जन दलित बुरी तरह से घायल हुए थे और 50 से अधिक घर बुरी तरह से जला दिए गये थे. उक्त हमले में रविदास मंदिर की मूर्ती तोड़ी गयी थी और मंदिर को बुरी तरह से जलाया तथा क्षतिग्रस्त किया गया था. उक्त हमले में एक ठाकुर लड़का जिसने रविदास मंदिर में घुस कर कोई ज्वलनशील पदार्थ छिड़क कर रविदास मंदिर को जलाया था तथा मूर्ती तोड़ी थी दम घुटने के कारण मंदिर से बाहर निकलते ही बेहोश हो गया था और बाद में मर गया था. इस पर हजारों की संख्या में ठाकुरों ने दलित बस्ती पर हमला किया था. हमले में दो दर्जन के करीब दलित बुरी तरह से घायल हुए थे, एक औरत की छाती काटने की कोशिश की गयी थी, दलित औरतों की इज्ज़त लूटने की कोशिश की गयी, ज्वलनशील पदार्थ छिडक कर घरों को जलाया गया और गाय/ भैसों तक को घायल किया गया.

एक दलित नौजवान चंद्रशेखर से राष्ट्र को क्या खतरा है कि उस पर रासुका लगाना पड़ा?

Nadim S. Akhter : एक दलित नौजवान चंद्रशेखर ने ऐसा क्या किया कि उसे हाई कोर्ट से जमानत मिलते ही राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी रासुका लगाकर फिर अंदर कर दिया!! जेल वो अपने पैरों पे चलकर गया था, बाहर व्हील चेयर पे निकला। अंदर उसके साथ इस तंत्र ने क्या किया, ये अंदाजा लगा लीजिए।

भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर पर रासुका दलित दमन का प्रतीक : दारापुरी

लखनऊ : “भीम आर्मी प्रमुख चन्द्रशेखर पर रासुका दलित दमन का प्रतीक”- यह बात आज एस.आर. दरापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एवं सदस्य स्वराज अभियान समिति, उत्तर प्रदेश ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उन्होंने आगे कहा है कि यह उल्लेखनीय है कि चंद्रशेखर को एक दिन पहले ही इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिली थी जिसमे न्यायालय ने माना था कि उसके ऊपर लगाये गये आरोप राजनीति से प्रेरित हैं.

चंद्रशेखर पर रासुका लगाकर प्रदेश सरकार ने अपना सवर्ण-सामंती चेहरा उजागर किया

लखनऊ : रिहाई मंच ने भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर पर योगी सरकार द्वारा रासुका लगाने को लोकतान्त्रिक आवाज़ों का गला घोटना करार दिया है. मंच ने कहा है कि पूरे देश में भाजपा के शासन काल में दलितों पर उत्पीडन बढ़ा है और अब तो सरकार अपने शासन-प्रशासन के जरिये खुद दलितों की आवाज़ उठाने वालों के खिलाफ खुलकर सामने आ गयी है. मंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश की सवर्ण- सामंती सरकार का दलित विरोधी चेहरा अब खुलकर सामने आ गया है.

यूपी से सपा का साफ रहना पिछड़े वर्ग के हित में है! वजह बता रहे वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र

Satyendra PS : यूपी से सपा का सफाया जारी रहना पिछड़े वर्ग के हित में है। पिछड़े वर्ग की एकता के लिए जरूरी है कि अहीरों में 30 साल के सपा के शासन ने जो ठकुरैती भर दी है वो निकल जाए, वो अपने को पिछड़ा वर्ग का समझने लगें। मुलायम सिंह ने जब संघर्ष किया तो उसमें बेनी प्रसाद, आजम खां, मोहन सिंह, जनेश्वर मिश्र जैसे लोग उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। धीरे धीरे करके एक एक नेता को ठिकाने लगाया गया। उसके बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर प्रदेश अध्यक्ष, जिलाध्यक्ष और ब्लाक अध्यक्ष तक यादव यादव हो गया। इतना ही नहीं, हेलीकाप्टर, जहाज, कार से लेकर साइकिल तक यादव हो गया।

धमकियों के कारण दलित चिंतक प्रो. कांचा इलैया ने खुद को हफ्ते भर से अपने घर में कैद कर रखा है!

प्रो. कांचा इलैया शेफर्ड के पक्ष में उतरे ढेर सारे साहित्यकार और कई संगठन…. दलित चिंतक प्रो. कांचा इलैया शेफर्ड ने पिछले एक हफ्ते से अपने को हैदराबाद के अपने घर में बंद कर रखा है। कारण है, उनकी किताब ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ के एक अध्याय पर आर्य वैश्य समुदाय की आहत भावनाएं। 9 सितम्बर से उन्हें इस आहत समुदाय द्वारा जान की धमकियां मिल रही हैं। तेलुगु देशम पार्टी के एक सांसद टी जी वेंकटेश ने प्रेस कांफ्रेंस करके उन्हें चौराहे पर फांसी देने की बात कही। कुछ दिन पहले उनकी कार पर हमला भी किया गया, जिससे वे बाल-बाल बचकर निकले। तेलंगाना सरकार ने इन तमाम घटनाओं के बावजूद उन्हें अभी तक कोई सरकारी सुरक्षा प्रदान नहीं की है।

हरिशंकर तिवारी के यहां दबिश पर विधानसभा से वाकआउट करने वाली मायावती सहारनपुर के दलित कांड पर चुप क्यों हैं?

लखनऊ : “मायावती की सहारनपुर के दलित काण्ड पर चुप्पी क्यों?” यह बात आज एस.आर. दारापुरी, भूतपूर्व आई.जी. व प्रवक्ता उत्तर प्रदेश जनमंच एवं सस्यद, स्वराज अभियान ने प्रेस को जारी ब्यान में कही है. उनका कहना है कि एक तरफ जहाँ मायावती हरीशंकर तिवारी के घर पर दबिश को लेकर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष को गोरखपुर भेजती है और विधान सभा से वाक-आऊट कराती है वहीं मायावती सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में दलितों पर जाति-सामंतों द्वारा किये गए हमले जिस में दलितों के 60 घर बुरी तरह से जला दिए गए, 14 दलित औरतें, बच्चे तथा बूढ़े लोग घायल हुए में न तो स्वयम जाती है और न ही अपने किसी प्रतिनिधि को ही भेजती है. वह केवल एक सामान्य ब्यान देकर रसम अदायगी करके बैठ जाती है.

दलित प्रोफेसर वाघमारे के जातीय उत्पीड़न की अंतहीन दास्तान

प्रोफेसर सुनील वाघमारे 34 साल के नौजवान हैं, जो महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के खोपोली कस्बे के एमसी कॉलेज में कॉमर्स डिपार्टमेंट के हेड रहे हैं और इसी महाविद्यालय के वाईस प्रिंसीपल भी रहे हैं. उत्साही, ईमानदार और अपने काम के प्रति निष्ठावान वाघमारे मूलतः नांदेड के रहने वाले हैं. वाणिज्य परास्नातक और बीएड करने के बाद वाघमारे ने वर्ष 2009 में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर इस कॉलेज को ज्वाइन किया था. वर्ष 2012 तक तो सब कुछ ठीक चला. मगर जैसे ही वर्तमान प्राचार्य डॉ एनबी पवार ने प्रिंसिपल का दायित्व संभाला, प्रोफेसर वाघमारे के लिये मुश्किलों का दौर शुरू हो गया.

बसपा की तेज़ी से घटती हैसियत से उपजी ‘असुरक्षा’ ने एक अति-अक्रोशित दबंग दलित संगठन को जन्म दे दिया

Surya Pratap Singh : आज के उत्तर प्रदेश में ‘सुगबुगाहट’ से ‘सुलगाहट’ तक की नयी दास्ताँ….पश्चिमी उ.प्र. में जातीय संघर्ष से उपजा दलित ‘उग्रवाद’ …65,000 युवाओं की हथियार धारी अति-उग्र, उपद्रवी ‘भीम-सेना’ का जन्म ……’भीम आर्मी भारत एकता मिशन (BABA Mission)!!! मुज़फ़्फ़रनगर दंग़ो के बाद से धार्मिक उन्माद व जातीय हिंसा से पश्चिमी उत्तर प्रदेश ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा है ….इसमें वोटों की राजनीति हमेशा आग में घी का काम करती रही है…

भाजपा नेता ने हड़पी एक दलित की माईन्स, कोर्ट ने दिए जांच के आदेश

भीलवाड़ा, 1 मई 2017 : राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया के कृपापात्र और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी के खासमखास माने जाते हैं भीलवाड़ा नगर विकास न्यास के अध्यक्ष गोपाल खंडेलवाल। इसीलिए उनको यूआईटी की बागडोर दी गई। जिले के उभरते हुए ब्राह्मण नेता हैं। दशकों से भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय हैं। पूर्व में पंचायत राज संस्थाओं में चुने जा चुके हैं। खनन क्षेत्र में बड़ा नाम है। भाजपा की राजनीती के साथ साथ खनन व्यवसायी के रूप में भी उनका बड़ा नाम है।

मायावती का दलित वोट बैंक क्यों खिसका?

हाल में उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा चुनाव में मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी की बुरी तरह से हार हुयी है। इस चुनाव में उसके बहुमत से सरकार बनाने के दावे के विपरीत उसे कुल 19 सीटें मिली हैं जिनमें शायद केवल एक ही आरक्षित सीट है। उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आयी है। एनडीटीवी के विश्लेषण के अनुसार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश में बसपा को दलित वोटों का केवल 25% वोट ही मिला है जबकि इसके मुकाबले में सपा को 26% और भाजपा को 41% मिला है। दरअसल 2007 के बाद बसपा के वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आयी है जो 2007 में 30% से गिर कर 2017 में 22% पर पहुँच गया है। इसी अनुपात में बसपा के दलित वोटबैंक में भी कमी आयी है। अभी तो बसपा के वोटबैंक में लगातार आ रही गिरावट की गति रुकने की कोई सम्भावना नहीं दिखती। मायावती ने वर्तमान हार की कोई ईमानदार समीक्षा करने की जगह ईवीएम में गड़बड़ी का शिगूफा छोड़ा है। क्या इससे मायावती इस हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से बच पायेगी या बसपा को बचा पायेगी?

दलित राजनीति की दरिद्रता

क्या यह दलित राजनीति की दरिद्रता नहीं है कि यह केवल आरक्षण तक ही सीमित
हो कर रह जाती है या इसे जानबूझ कर सीमित कर दिया जाता है? क्या दलितों
की भूमिहीनता, गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, तथा सामाजिक एवं आर्थिक शोषण
एवं पिछड़ापन दलित राजनीति के लिए कोई मुद्दा नहीं है? भाजपा भी आरएसएस के
माध्यम से चुनाव में आरक्षण के मुद्दे को जानबूझ कर उठवाती है ताकि
दलितों का कोई दूसरा मुद्दा चुनावी मुद्दा न बन सके। इसके माध्यम से वह
हिन्दू मुस्लिम की तरह आरक्षण समर्थक और आरक्षण विरोधियों का ध्रुवीकरण
करने का प्रयास करती है जैसा कि पिछले बिहार चुनाव से पहले किया गया था.
ऐसा करके वह दलित नेताओं का काम भी आसान कर देती है क्योंकि इससे उन्हें
दलितों के किसी दूसरे मुद्दे पर चर्चा करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। इसी
लिए तो दलित पार्टियां को चुनावी घोषणा पत्र  बनाने और जारी करने की
ज़रूरत नहीं पड़ती। परिणाम यह होता है कि दलित मुद्दे चुनाव के केंद्र
बिंदु नहीं बन पाते.

मनु स्मृति, मनु मूर्ति और मनुवाद के विरुद्ध जन आन्दोलन का ऐलान

मनुवाद विरोधी सम्मलेन संपन्न

जयपुर : सावित्री बा फुले की जयंती के मौके पर राजस्थान भर से आये प्रतिनिधियों की मौजूदगी में मनुवाद विरोधी सम्मलेन का आयोजन किया गया. इसमें सर्वसम्मति से तय हुआ कि राजस्थान उच्च न्यायालय के परिसर में लगी मनु की मूर्ति के हटने तक देश व्यापी आन्दोलन किया जायेगा जो विभिन्न राज्यों तथा राजस्थान के जिला मुख्यालयों तक भी जायेगा. यह भी निर्णय लिया गया कि मनुवाद विरोधी अभियान का एक शिष्टमंडल शीघ्र ही राजस्थान के मुख्य न्यायाधीश से मिलकर मांग करेगा कि हाई कोर्ट परिसर में लगी अन्याय के प्रतीक मनु की मूर्ति को हटाने के लिए शीघ्र सुनवाई की जाये.

झूठ की फैक्ट्री तो आप चला रहे हैं राकेश सिन्हा जी!

आरएसएस विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा जी ने बीबीसी हिन्दी सेवा को दिये साक्षात्कार में यह दावा किया है कि -“संघ में कोई साधारण से साधारण कार्यकर्ता भी जातिवादी व्यवहार नहीं करता है.” सिन्हा ने यह दावा मेरे इस आरोप के जवाब में किया है, जिसमें मैने आरएसएस के लोगो द्वारा मेरे साथ किये गये जातिगत भेदभाव की कहानी सार्वजनिक की. मैं फिर से दौहरा रहा हूं कि- “आरएसएस एक सवर्ण मानसिकता का पूर्णत: जातिवादी चरित्र का अलोकतांत्रिक संगठन है, जो इस देश के संविधान को खत्म करके मनुस्मृति पर आधारित धार्मिक हिन्दुराष्ट्र बनाना चाहता है.”

भारत का एक ऐसा गाँव जहाँ भीमराव का संविधान नहीं, मनुस्मृति का विधान चलता है!

किसी नरक से कम नहीं है बरजांगसर जहाँ अभी तक दलितों से जबरन मृत पशु डलवाये जा रहे हैं…. राजस्थान के बीकानेर जिले की डूंगरगढ़ तहसील का गाँव है बरजांगसर. यूँ तो देश ने काफी तरक्की कर ली है, तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रहा है, कानून का शासन स्थापित है, दलित लोग दासता से मुक्त कर दिए गए हैं, भेदभाव ओर छुआछुत को अपराध घोषित किया जा चुका है और किसी भी दलित को जबरन किसी भी अस्वच्छ पेशे में नहीं धकेला जा सकता है, विशेषकर मृत पशु को निस्तारित करने जैसे काम में तो कतई नहीं. यह सब अच्छी अच्छी बातें भारत के संविधान में लिखी हुई हैं, मगर बीकानेर जिले के बरजांगसर में भारत के कानून अभी लागू नहीं होते हैं. अभी वहां संविधान का राज नहीं स्थापित हो पाया है, भीमराव का विधान नहीं, अभी भी वहां पर मनु नामक शैतान का विधान लागू है, इसीलिए तो आज भी बरजांगसर के दलितों को जबरन मरे हुए जानवर डालने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

यह ब्राह्मण समुदाय शिक्षा पर एकाधिकार रखना अपना दैविक अधिकार समझता है

रोहित वेमुला श्रृंखला का लेख…. शिक्षालयों में जरुरी है एजुकेशन डाइवर्सिटी…

-एच.एल.दुसाध

रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर केन्द्रित एक पुस्तक को अंतिम रूप देने में विगत कुछ सप्ताहों से बुरी तरह व्यस्त हूँ. मेरे संपादन में तैयार हो रही ’शैक्षणिक परिसरों में पसरा भेदभाव : सवर्ण वर्चस्व का परिणाम’ नामक सवा दो सौ पृष्ठीय यह पुस्तक देश के शिक्षा जगत के 27 प्रतिष्ठित विद्वानों के लेखों और 13 विद्वानों के साक्षात्कार से समृद्ध है. गत 23 अप्रैल को इस किताब के दूसरे प्रूफ पर नजर दौड़ाते और लेखों को चार अध्यायों में सजाते–सजाते सुबह के पांच बज गए थे. देर रात तक काम करने के बाद रविवार 24 अप्रैल की सुबह 10 बजे के करीब नींद से जागा. आदत के अनुसार चाय की चुस्की लेते हुए अख़बारों पर नजर दौड़ाने लगा. अचानक एक बहुपठित अखबार के दूसरे पृष्ठ के एक खबर पर मेरी दृष्टि चिपक गयी. मैंने एकाधिक बार ध्यान से उस खबर को पढ़ा. ’डीयू के दलित शिक्षकों ने लगाया प्रताड़ना का आरोप’ शीर्षक से छपी निम्न खबर को मेरी ही तरह शायद और लोगों ने भी बहुत ध्यान से पढ़ा होगा-

हमारे चारों ओर उंची जाति के लोग रहते हैं, वे नहीं चाहते थे कि हम उनके बीच रहें

केरल में निर्भया जैसी दरिंदगी से उबाल, घटनास्थल से लौटी महिलाओं की टीम ने किया की खुलासा

-संदीप ठाकुर-

नई दिल्ली। दुराचार और जघन्य हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली यह
वारदात दिल्ली के निर्भया कांड से भी कहीं ज्यादा वीभत्स और दिल दहला
देने वाली है। यह केवल एक गरीब मेहनती और महत्वाकांक्षी दलित लड़की की
कहानी नहीं है बल्कि समाज के दबे कुचले उन हजारों-लाखों लड़कियों के
अरमानों की भी दास्तान है जो तमाम मुश्किलों के बावजूद न सिर्फ कुछ कर
गुजरने की चाह रखतीं हैं, परंतु चाहतों के असली जामा पहनाने का हौसला
लेकर दिन रात मेहनत करतीं हैं। लेकिन समाज के दबंगों को उनकी यह तरक्की
हजम नहीं होती।

देश के मुसलमानों को दलितों से सीखना चाहिए राजनीति का सबक

इमामुद्दीन अलीग

इतिहास के अनुसार देश के दलित वर्ग ने सांप्रदायिक शोषक शक्तियों के अत्याचार और दमन को लगभग 5000 वर्षों झेला है और इस इतिहासिक शोषण और भीषण हिंसा को झेलने के बाद अनपढ़, गरीब और दबे कुचले दलितों को यह बात समझ में आ गई कि अत्याचार, शोषण,सांप्रदायिक पूर्वाग्रह और भेदभाव से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका यही है कि राजनीतिक रूप से सशक्त बना जाए। देश की स्वतन्त्रता के बाद जब भारत में लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई तो दलितों ने इसे  अपने लिए एक बहुत बड़ी नेमत समझा। इस शुभ अवसर का लाभ उठाते  हुए पूरे के पूरे दलित वर्ग ने सांप्रदायिक ताकतों के डर अपने दिल व दिमाग से उतारकर और परिणाम बेपरवाह होकर अपने नेतृत्व का साथ दिया, जिसका नतीजा यह निकला कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जनसंख्या के आधार 18-20% यानी अल्पसंख्यक में होने के बावजूद भी उन्होंने कई बार सरकार बनाई और एक समय तो ऐसा भी आया कि जब दलितों के चिर प्रतिद्वंद्वी मानी जाने वाली पार्टी भाजपा को भी दलित नेतृत्व के सामने गठबंधन के लिए सिर झुकाना पड़ा।

Delhi HC issues notice to top editorial staff of UNI

New Delhi : Taking strong cognizance of the torture and humiliation of a dalit employee of United News of India (UNI), a prestigious news agency of the country, the Delhi High court yesterday issued notice to two high profile scribes of UNI including Joint Editor Neeraj Bajpayee, Journalist Ashok Upadhyay and an another employee of the agency Mohan Lal Joshi.

एक फेसबुक पोस्ट पर IIMC में घमासान, दलित छात्रों ने की कंप्लेन, कमेटी गठित

आईआईएमसी छात्रों के बीच एक फेसबुक पोस्ट से घमासान मच गया है. दलित छात्रों ने पूरे मामले की एससी-एसटी एक्ट में शिकायत की है. इस पूरे मामले की जड़ में एक टीचर का हाथ होने की बात कही जा रही है. एक टीचर द्वारा छात्र को धमकी दिए जाने का घटनाक्रम भी हो गया है. दरअसल IIMC में पढ़ने वाले एक छात्र ने कुछ दिनों पहले रोहित वेमुला की आत्महत्या पर सोशल मीडिया में सवाल उठाने वालों की नीयत पर एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी. इस पोस्ट पर कुछ छात्रों ने आपत्ति जाहिर की और इसे लेकर कॉलेज के साथ ही एससी-एसटी कमीशन, आदिवासी मामलों के मंत्रालय, और सामाजिक न्याय मंत्रालय तक शिकायत कर दी.

सारे चैनल, बड़े अखबार और मैग्जीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं, कोई अपवाद नहीं है

Dilip C Mandal : आप लोग मेरे स्टेटस को Like करना बंद कीजिए प्लीज. अपना लिखिए. जैसा बन पड़े, वैसा लिखिए. लिखना क्राफ्ट है. करने से हाथ सध जाता है. फोटो और वीडियो लगाइए. यहां संघियों को अपना टाइम लगाने दीजिए. देश को लाखों बहुजन फुले-आंबेडकरवादी लेखक और कम्युनिकेटर चाहिए. भारत के सारे चैनल और बड़े अखबार और मैगजीन ब्राह्मणवादी सवर्णों के नियंत्रण में हैं. कोई अपवाद नहीं है. वहां कुछ लोग सहानुभूति का नाटक कर रहे हैं. पर वे दूसरों की तरफ से ही खेल रहे हैं. निर्णायक क्षणों में वे आपके साथ नहीं होंगे. भारतीय मीडिया को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आपका लेखक बनना जरूरी है. आपके लाइक्स का मैं क्या करूंगा? लिखिए.