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सुख-दुख

जनकवि गोरख पांडेय की याद : पढ़ें कुछ कविताएं

जनकवि, मार्क्सवादी दार्शनिक और चिंतक गोरख पांडेय को उनकी 30वीं पुण्यतिथि पर सादर नमन, लाल सलाम। मौजूदा दौर में उनकी कमी बहुत कचोटती है मगर उनके शब्द हौसला बढ़ाते हैं, यह दुनिया बदलेगी, जरूर बदलेगी।

1.
प्रधानमंत्री का कहना है –
विरोधियों की गैर जिम्मेदाराना
हरकतें देखते हुए –
उन्हें प्रधानमंत्री बने रहना है। (18.3.1976)

2.
मैंने सोचा –
शेरों के राज्य में प्यार की हिफाजत
के लिए हथियार और साहस बहुत जरूरी हैं
और सभी नरभक्षियों का बेमुरौव्वत
सफाया कर दिया जाना चाहिए। (25.3.1976)

3.
हालत यहां तक पहुंच चुकी है –
भेड़ियों का हमला और तेज हो चुका है
गांव गांव से बच्चों को
रातो रात उठा लिया जाता है
खून के साथ वे दिल और दिमाग
भी चाट रहे हैं।
जंगल-व्यवस्था के भीतर
आदमी की तरह बोलने
चलने और हाथ उठाने पर
पाबंदी लगा दी गई है
अब आगे से रेंग कर चलना होगा
लूट की जुबान
शहद घोलकर बोलनी होगी
इजाजत है तो सिर्फ यह कि
हाथों से अपने साथियों का
गला घोंट दो। (24.6.1976)

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