कवि और पत्रकार निलय उपाध्याय को जिंदगी ये किस मोड़ पर ले आई!

Hareprakash Upadhyay : कल निलय उपाध्याय से मुलाकात हुई। लखनऊ आये थे। करीब दिन भर साथ रहा। अरसे बाद उनके फेसबुक वाल पर जाना हुआ था। पता नहीं कैसे। मैंने या उन्होंने, पता नहीं किसने और किस कारणवश एक-दूसरे को अरसे से अनफ्रेंड किया हुआ है। मैंने ही किया होगा, तुनकमिजाजी बेहद भरी है मेरे भीतर। खैर, फेसबुक पर उनका स्टेटस था कि वे लखनऊ पहुँचने वाले हैं तो मैंने कमेंट कर दिया, लखनऊ आइएगा तो मिलिएगा। मुझे खुशी हुई कि मेरे अनुरोध का उन्होंने मान रखा।

निलय उपाध्याय

अरसे से मुझे उनकी गतिविधियों का कोई पता नहीं है। कहीं-कहीं से कभी-कभी उड़ती हुई, बहुत अस्पष्ट लगभग फुसफुसाहट वाली ध्वनि में यह सूचना आती थी कि मुंबई छोड़ दिया है उन्होंने। परिवार भी। और दर-बदर भटक रहे हैं। गंगोत्री से गंगासागर तक। मुझे दिलचस्पी नहीं थी। सबका अपना जीवन है। पर कल जब वे लखनऊ पहुँचकर फोन किये, तो कहा कि मिलने आना तो दो रोटी भी लेते आना, तो धक्क से लगा। बहुत चिंता हुई। पूछा कैसे आये हैं, तो अंदर से एक लगभग चहकती हुई आवाज़ में जैसे किसी बच्चे को मनपसंद खिलौना मिल गया हो, उन्होंने बताया कि एक मारूती ले ली है। बहुत खुशी हुई। पर उनसे मिलकर और उनकी मारूती से मिलकर लगभग रोना आया।

आप भी मिलते मित्रो, तो ऐसा ही हाल आपका भी होता। निलय जी को अगर आप जानते हैं और उऩको पढ़ा है, तो आप मिलकर निश्चित बहुत दुःखी होते। जितने जर्जर वे, उतनी ही जर्जर उनकी मारूती। मारूती में ही ठुँसी हुई गृहस्थी। कथरी-कमरी, बरतन-बासन, चूल्हा-चौका सब। किताब-कापी भी। जहाँ साँझ-वहाँ बिहान। मारूती ऐसी है कि चल रही है, तो चल रही है मगर उसके चलने का कोई भरोसा नहीं जगता। फर्रूखाबाद से आ रही है मारूती। किसी सज्जन ने अपनी गाड़ी का एक बढ़िया टायर निकालकर लगा दिया है इसमें। पर इस एक टायर के भरोसे कैसे चलेगी गाड़ी, पूछना था मुझे निलय जी से, पर पूछ नहीं सका। निलय जी भी लगभग वैसे ही। बीमार, बहुत ही कमजोर लगे। बार-बार कह रहे थे- इस साल बच गया, तो समझो बच गया वरना किसी अनजान जगह पर लुढ़का हुआ मिलूंगा।निराला की पंक्ति याद आयी, दुःख ही जीवन की कथा रही।

निलय उपाध्याय को लगभग बीस साल से जानता हूँ, जब वे एक युवा कवि थे और वे आरा से एक अख़बार निकालते थे। पाक्षिक। चंदा माँग-माँगकर। खुद ही लिखते थे और खुद ही बेचते थे। प्रकाशक के रूप में लक्ष्मी उपाध्याय, भाभी जी का नाम जाता था। उस अख़बार को लेकर इतने उत्साहित रहते थे कि उसे एक दिन जिले के चप्पे-चप्पे में बिछा देने का संकल्प जाहिर करते। एक दफ्तर भी बनाया। कुछेक स्टाफ भी रखा। उस अखबार को निकालने और जमा देने के जज्बे में शायद भाभी जी का एकाध गहना भी बिका। कुछ समय बाद अखबार बंद हो गया। पता नहीं कैसे। एक छोटी सी सरकारी नौकरी थी। वह भी रहस्यमय ढंग से छुटी या छोड़ी गयी। जेल गये। बदनाम हुए। अपना आरा छूटा। मुंबई चले गये। चार बच्चों और बीवी समेत पूरी गृहस्थी लादे। वहाँ क्या-क्या हुआ, पता नहीं। एक अरसे तक बीच-बीच में सूचनाएं मिलतीं, स्थितियाँ सुधर रही हैं। बच्चे पढ़ गये। काम में लग गये। ये फिल्म-वो सीरीयल। मुझे उनकी कोई फिल्म या सीरीयल देखने का सौभाग्य न मिला। इस बीच सूचना मिली कि वे गंगायात्रा पर निकले हैं। गंगोत्री से गंगासागर। बस।

करीब तीन साल पहले एक बार अचानक लखनऊ मेरे घर आये तो जिद कर मैंने उन्हें एक शाम घर पर रोक लिया था। बातें करते रहे काफी लंबी। ये उपन्यास, वो किताब। वो संगठन, वो प्रकाशन। गंगा में प्रदूषण। जन जागृति। साहित्य की दुनिया में व्याप्त तमाम बुराइयाँ वगैरह-वगैरह। सबसे लड़ने की बात। हो गयी बात। सुन लिया मैंने। हर आदमी का अपना रास्ता होता है। मैंने कहा, कभी आपके साथ कुछ दिन घूमेंगे। उसके बाद निलय जी से कोई वास्ता ही नहीं रहा।

इस बार की मुलाकात में पंजे भर टैब्लयाड अखबार, कई छोटी-छोटी पुस्तिकाएं। गंगोत्री से गंगासागर नाम की एक किताब दी उन्होंने मुझे। बहुत श्रद्धा से लिया मैंने। पढ़ूँगा आराम से। जहाँ जाते हैं, वहाँ लोगों को इसे देते हैं। लोग ले लेते हैं बस। जैसा कि उनकी बात से लगा, लोग ले लेते हैं। पैसे नहीं देते। पढ़ते भी नहीं हैं। निलय जी कहते हैं, लोग पढ़ते नहीं हैं। जो लोग पढ़ते हैं, वे किसी बदलाव में शामिल नहीं हैं। अब निलय जी लोक संस्कृति को जगा रहे हैं। जगह-जगह लोक गीतों को बचाने-बढ़ाने का संकल्प लिया है। गंगा के किनारे बसे शहरों और गाँवों में जाते हैं, महिलाओं और लोगों को जुटाते हैं, सभा-संगोष्ठी करते हैं। लोक संस्कृति और गीतों को ढूँढ़ते हैं। लोक गीतों को गवाते हैं। एक टीम बनाया है। लोक गायन की टीम। जगह-जगह उसके आयोजन करने हैं। उससे पैसा आएगा, निलय जी सोचते हैं। फिर उसी से बाकी काम भी होगा। जहाँ कुछ भले लोग मिल जाते हैं, हफ्ते-दस दिन रोक लेते हैं, वहीं से निलय जी एक अखबार निकाल देते हैं। अखबार है- ‘गंगा समय’।

‘गंगा समय’ में गंगा की चिंता है, गंगा किनारे बसे लोगों के तमाम सुख-दुख भी हैं। निलय जी से पूछा, आप क्या समझते हैं, इससे कुछ बदलेगा? आप पैसे-पैसे के मोहताज हैं। आपको उन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों के आगे हाथ पसारने पड़ेंगे, जहाँ सब पसारते हैं। क्या फर्क पड़ने वाला है? निलय जी इसका कोई ठीक उत्तर नहीं दे पाते हैं। उनका परिवार चिंतित है। चाह रहा है कि वे फिर से पारिवारिक ज़िंदगी में लौट आएं। मैंने भी यही कहा। पर उनका कहना है कि क्या मुझे अपनी मर्जी से जीने का हक नहीं है? मैं किसी का क्या ले रहा हूँ? मैं जो कर रहा हूँ, वह मुझे अच्छा लग रहा है। एक लेखक का काम है, लोगों को जगाना, बताना, वह मैं कर रहा हूँ। निलय जी अपने मिशन में कामयाब हों। निलय जी के पास संपत्ति के नाम पर एक लैपटॉप है, जिसमें उनकी लिखी और अप्रकाशित बहुत सारी अप्रकाशित किताबें हैं। यह आदमी लगातार भटकते हुए, लिख कैसे ले रहा है? पर जो बचेगा, वह क्या रचेगा। जो जोखिम उठाते हैं, वही लिख पाते हैं।

पता नहीं, यह सब पढ़कर वे क्या सोचेंगे। कहीं नाराज तो नहीं होंगे? उनकी निजता को तो कहीं खोल नहीं दिया मैंने? पर जाने दीजिए। मुझे भी अपनी बेचैनियों को जाहिर करने का हक है। कल हिल गया, निलय जी से मिलकर।

पत्रकार और साहित्यकार हरेप्रकाश उपाध्याय की फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Vijai Kumar Shukla पिछले दिनों मधुकर सर के साथ निलय सर से मिलना हुआ। मैं इतना प्रभावित हुआ कि उन पर एक लेख भी दिया था। उनके साथ रामकोला चीनी मील के गेस्टहाउस में संक्षिप्त कविता पाठ भी हुआ..

उमाशंकर सिंह परमार ओह … यह है जीवन की असली पहचान, सब कुछ छोडकर उतर गये सडक पर। सलाम निलय सर

Gopeshwar Singh निलय साधु हो गए हैं क्या हरेप्रकाश?

Hareprakash Upadhyay सर साधु होना, पता नहीं क्या होता है, पर आदमी जब भोजन तक को मोहताज हो, पर उसकी कोई चिंता नहीं। बस उसे अपने काम की धुन हो, तो उसे क्या होना कहते हैं, मुझे नहीं पता….

Gopeshwar Singh निलय से एक ज़माने में ख़ूब मिलना – जुलना होता था | पटना में वे दो – तीन बार मेरे घर भी आए थे | जब से मुंबई गए मुलाकात नहीं हुई |

Hareprakash Upadhyay अरसे से वे मुंबई नहीं हैं। वे लेखकों से अब नहीं मिल रहे

अनुनाद वाकई निलय जी कमजोर लग रहे हैं. दाे बरस पहले मेरे पास आए थे, तब ठीक थे…

Govind Mathur ये सब जान कर आश्चर्य हुआ और कहीं थोड़ा सुखद भी किऐसे समय में जब लोग ( कवि भी) सुख, सुविधा और संपन्नता के पीछे दौड़ रहें है । सम्मान – पुरस्कार के लिए जोड़ – तोड़ कर रहें है। एक कवि सब कुछ छोड़ निर्लिप्त भाव से निकल पड़ा है, कुछ सार्थक करने के लिए बिना किसी प्रचार के।

Lalita Asthana मुंबई में तो सब अच्छा चल रहा था…. कई सीरियल थे उनके पास।

Ajit Priyadarshi  अब लेखक होकर और लेखक होने की यही सच्चाई है वरना हम सब तरतीबवार सुखी जीवन जीते लोग बस कलमघिस्सू हैं…

Anirudh Sinha बिल्कुल सही। पिछले साल वे मुझसे मुंगेर में मिले थे

आपका वल्लभ बहाव के साथ और अनिश्चितता में जीवन। अपना सुख पहचान लेना ही बड़ी बात है हरे भाई। शरीर को हज़ार सुविधा दें तब भी बीमार तो हो ही जाता है।

Vedpal Singh निलय जी कमजोर शरीर से है अंदर से बेहद मजबूत है फर्रुखाबाद प्रवास में उनके साथ 1 दिन बिताने का मौका मिला वह चाहते हैं कि उन्हें कोई सलाह देने के बजाय वह जो कुछ कर रहे हैं उसमें अपनी इच्छा के अनुसार सहयोग करें

Hareprakash Upadhyay आपकी बात सही है वेदपाल जी।

Satish Chandra Jha बेशक उनको अपनी चिंता नहीं है, लेकिन समाज को इस कालजयी व्यक्तित्व की चिंता जरूर करनी चाहिए.

Dwarika Prasad Agrawal जो घर फूंके आपना सो चले हमारे साथ

Lakshmi Upadhyay आपको व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती माफ कीजियेगा लेकिन जो आप लिखे हैं उसके आधार पर आपको निलय उपाध्याय के साथ में होना चाहिए था

Dwarika Prasad मुझमें इतना साहस नहीं है Agrawal Lakshmi Upadhyay ji. मित्र मंडली में आपका स्वागत है.

Bikram Singh जो परिवार का नहीं हुआ वह और क्या करेगा। अपने सपनों के लिए बीवी बच्चों को झोक देना कहा कि अकलमंदी है। अपने आप को इस तरह करना ठीक नहीं। इन्हें किसी अच्छे मानसिक डॉक्टर की जरूरत है…

Neelotpal Ramesh निलय उपाध्याय कभी कमजोर हो ही नहीं सकते हैं| उनके अंदर जिजीविषा है जिसके बल पर वे कुछ भी कर लेंगे| आपने तो उनके अतीत को मेरे आंखों के सामने साकार कर दिया| बहुत सुंदर संस्मरण!

Umashankar Upadhyay आप इन्हें कनविन्स कीजिए कि ये अपने परिवार मे लौटें। चित्र में रूग्ण दिख रहे हैं।

Lakshmi Upadhyay मैं इस पोस्ट पर बोलना नहीं चाह रहीं थी फिर भी मैं अपने जज्बात को रोक नहीं पाई और बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि निलय उपाध्याय गणितज्ञ डा वशिष्ठ नारायण सिंह जिस मेंटल स्थिति में चले गए हैं, उसी मेंटल स्थिति जाना चाह रहे हैं… नहीं तो एक लेखक का ताकत उसकी कलम है और कलम कभी भटकती नहीं है.. जो काम कलम कर सकती है वो काम दुनिया की कोई ताकत नहीं कर सकती… जिद्द और जुनून सही है लेकिन पागलपन की हद तक नहीं..

Hareprakash Upadhyay आपकी बात सही है भाभी

Akhilanand Ojha  भाभी से पुरी तरह सहमत हूं.. और जो लोग भैया को समर्थन करने वाली बातें लिखते हैं..वे खाए पीए अघाए लोग है..उनको दूसरे की फटेहाली विचलित नही करती..ऐ लोग अपने परिवार के लिए कुछ भी करने को तैयार होते..दूसरों को भटकता देख आनंदित होने वाले लोग होते हैं.. भावनात्मक रूप से जुडा कोई व्यक्ति किसी को भटकते हुए नही देखना चाहेगा..खैर भैय्या वापस लौंटें..घर परिवार के बीच.. यही कामना होगी

संग सार सीमा अभी कुछ दिनों पहले तो पटना में मिले थे एक कार्यक्रम में उनकी कविता पढने की शैली काफी जानदार लगी थी मुझे ….

Dhananjay Mani Tripathi मैं भी नीलय जी से मिल चुका हूँ और उनकी किताब जो उन्होंने मुझे भेट किया था के लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं… बहुत अच्छी किताब है। आप भी पढिये

सोनी मणि इस पोस्ट को पढ़ कर बहुत दुख हुआ… निलय जी वास्तव में बीमार लग रहे हैं।

Seema Singh बहुत मार्मिक हृदय स्पर्शीय बातें कहीं, साथ ही तकलीफ भी महसूस हो रही है। तरस भी आता है, लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता … सुनना उन्हें किसी की बरदास्त नहीं, हर किसी से नाराजगी, काश ! इन्हें कोई समझा पाता कि उनका यह भटकाव आत्म हत्या से कम नहीं है। शायद वह मानेगा नहीं लेकिन यह मेरा धर्म भाई है, भटक रहा है, मन का मौजी है … देख रही हूँ कैसा कंकाल सा हो गया है, कोई पूछे लक्ष्मी उपाध्याय से उनके दिल पर क्या गुजरती होगी… लेकिन नहीं, निलय उपाध्याय भला उनके बारे में क्यों सोचेंगे… उन्हें तो अपनी पसन्द की जिन्दगी जो जीनी है फिर भले ही उनके पीछे जो रह गए… वो कहीं जाए, कुछ भी करें …

Subhash Neerav निलय जी को लेकर लिखा तुम्हारा यह संस्मरण दिल को झकझोर गया! ऐसे भी खुद्दार और जुनूनी लोग हैं अभी दुनिया में! ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखे और उनके भीतर का जुनून और ऊर्जा बनाए रखे!

Shachi Mishra क्या कहूं लिखने के लिए शब्द नहीं मिल रहे हैं कई सालों से मेरे Facebook पर मित्र हैं पुराने चेहरे और आज के चेहरे में जमीन आसमान का फर्क आ गया है

Anand Gupta ओह! साल भर में उनसे दो बार मिल चुका हूँ। वे शरीर से क्रमशः दुर्बल पड़ते जा रहे हैं। चिंता हो रही है।

Rupa Singh निलय उपाध्याय! बहुत अपना आत्मीय नाम मेरे लिए। बहुत छोटू सी थी, नागार्जुन दादा के उकसाने पर पत्रिका निकालने का काम किया, पहली कृति में छपे दो बड़े नाम, रामधारीसिंह दिवाकर और निलय उपाध्याय। तुरंत भेजी थी अपनी कविताएँ। उन्हें याद हो न हो। अपनी मर्ज़ी से जीवन जीना यही होता है.. मैं एक लाचार, भयभीत सक्षम, उनके इस सशक्त विजय क्रांति पथ को सलाम करती हूँ। जलन महसूस करती हूँ। उन्हें मेरा अतीव स्नेह।

Anuradha Singh बहुत गर्व है कि निलय जी को व्यक्तिगत रूप से जानती हूँ, परस्पर प्रचुर सम्मान व स्नेह है। उनसे जब मिली उनमें एक विनम्र मृदुल कवि देखा। उनके जैसे कम लोग हैं जो पर्यावरण की चिंता में घर बार छोड़ सन्यासियों सा जीवन जियें। साधुवाद आपके इस लेख का।

शंकरानंद निलय जी के बारे में जानकर दु:ख हुआ। जो समय और समाज बन रहा है उसमें यह दुर्घटना सहज संभव है।

Ushakiran Khan निलय, ये क्या कर रहे हो? लौट आओ तुरत। कैसी भी दुनिया है, उसके साथ जीकर हिलाओ दुनिया को। लौटो बाबू!

Kumar Sushant निलय जी बहुत ही भद्र इंसान है।

Sarang Upadhyay इधर बीते दो साल पहले दिल्‍ली में मुलाकात हुई जब गंगा वाली किताब का विमोचन था. उसके बाद मिला नहीं. मुंबई में पास ही रहते थे. गंगा वाली किताब के कई पन्‍ने पढ़कर सुनाते रहे. कभी कविताएं तो कभी कहानियां. एक दिन खुद बनाकर लिट्टी चोखा खिलाए. सर बीते दिन बहुत याद आते हैं. उनके साथ लंबा समय बीता. लेकिन ये पोस्‍ट व्‍यथित करती है. वे बहुत ही भावुक हैं. अपने स्‍वास्‍थ्‍य का ध्‍यान रखिए अब Nilay Upadhyay सर अब बहुत हुआ घर आ जाइए.

Dibyopama Astha Thank you Hareprakash Upadhyay ji… aapke post aur aapke concern ke liye… papa wapas ghar Laute ya na laute… we are there for him.. we have full faith over his work too… thoda miscommunication ho gaya … Lambe samay tak ghar se bahar hone ke vajah se ..

Udbhrant Sharma मेरी कभी भेंट नहीं हुई,मगर तुम्हारी इस पोस्ट ने मुझे भी हिला दिया।निलय नोएडा आएं तो उनके पुनर्वास की बात सोची जाए।मैं इतना ही कहूँगा कि आपको परिवार और बच्चों के साथ ऐसा खिलवाड़ करने का हक़ नहीं। ऐसा जीवन जीने की चाह थी तो विवाह से दूर रहना चाहिए था।मेरी…See more

Nagendra Pratap निलय से डेढ़ साल पहले दो मुलाकातें हुई थीं, बनारस में। भाऊ (राघवेन्द्र दुबे) के साथ आए थे। उस वक्त देखकर ये तो नहीं लगा था कि बात यहां तक पहुंच चुकी है। मैंने तब इसे निलय की पुरानी फक्कड़ी के रूप में ही लिया था। बनारस में ही रहकर गंगा वाला काम कर रहे थे। एक-दो प्रेस कांफ्रेंस भी की थीं गंगा घाट पर। उस दौरान फोन पर कई बार बात भी हुई। लेकिन हरे, आपने जो तस्वीर दिखाई है वह विचलित करने वाली है। ‘अकेला घर हुसैन का’ लिखने वाले निलय को लौटना होगा घर को। तुम्हारा घर भी अकेला है मित्र … तुम्हारे इंतजार में।

Sheela Punetha दो साल पहले मैं भी निलय जी से मिली थी .तब इतने कमजोर नहीं थे .उन्हें घर लौटना चाहिये .ये सारे काम वे घर में परिवार के साथ रहकर और अच्छी तरह कर सकते .

Shailendra Kumar Shukla निलय भैया से दो बार BHU में मिलना हुआ, जानता पहले से था उनकी कविताओं के माध्यम से । बहुत दिलचस्प और जिंदादिल इंसान।

Dev Kumar Pukhraj वाकई ऐसे ही और इन्हीं परिस्थितियों में जी रहे हैं निलय जी। लेकिन वे दया और करुणा के पात्र नहीं है। उनके भीतर जुनून है। गंगा और व्यवस्था को लेकर गुस्सा है। हम उनके शुभचिंतक हैं तो हमें उनके मिशन की गंभीरता को समझना होगा। उनका साथ देना होगा। बाकी रही घर-परिवार की बात, तो उसको लेकर अलग-अलग राय हो सकती है। मेरी भी है।

Kumar Sushant हरे भाई। एक निलय जी पर एक केंद्रित अंक मंतव्य का निकालिए। निलय जी से सीधे मेरा संपर्क नहीं है पर मुझे लगता है कि एक अंक इस आदमी पर निकलना चाहिए।

Mahesh Shrivastava समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध

Ranjana Gupta कितने निलय होंगे और भी ..ओह कुछ पहचान में आ जाते है कुछ नहीं ..

Sandeep Tiwari आप मिल के हिल गये सर और मैं पढ़ के हिल गया..

Shikha Singh हरे प्रकाश जी निलय सर अभी पिछले नवीन भी क ई दिन रुक कर गये थे मेरे घर,और अभी सीधे हमारे घर फर्रुखाबास में दो रोज रुकने के बाद आपके पास गये है, निलय सर मुझे भी बहुत दुःख हो रहा है पर कोई सवाल नही करूँगीं , बस दुआ करुँगी कि वो अपने इस कार्य में सफलता प्राप्त करें मेरी शुभकामनाएँ

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चर्चित युवा कवि डॉ. अजीत का पहला संग्रह ‘तुम उदास करते हो कवि’ छप कर आया, जरूर पढ़ें

डॉ. अजीत तोमर

किसी भी लिखने वाले के लिए सबसे मुश्किल होता है अपनी किसी चीज़ के बारे में लिखना क्योंकि एक समय के बाद लिखी हुई चीज़ अपनी नहीं रह जाती है. वह पाठकों के जीवन और स्मृतियों का हिस्सा बन जाती है. जिस दुनिया से मैं आता हूँ वहां कला, कल्पना और कविता की गुंजाईश हमेशा से थोड़ी कम रही है. मगर अस्तित्व का अपना एक विचित्र नियोजन होता है और जब आप खुद उस पर भरोसा करने लगते हैं तो वो आपको अक्सर चमत्कृत करता है. औपचारिक रूप से अपने जीवन के एक ऐसे ही चमत्कार को आज आपके साथ सांझा कर रहा हूँ.

कविता लिखना मेरे लिए खुद से बातचीत करने का एक सलीका भरा रहा है मगर कभी सोचा नहीं था कि मैं कविता लिखते-लिखते इतनी दूर अकेला चला आऊँगा कि मेरी परछाई भी दुनिया भर के कवियों के अस्तित्व की एक लिपि के जैसी नजर आने लगेगी. सच कहूं तो थोड़ा डरा हुआ हूँ क्योंकि जब आप अपने लिखे हुए का एक दस्तावेजीकरण करते है तो साथ में एक उम्मीद और एक जिम्मेदारी का भी दस्तावेजीकरण करते हैं. मेरे दोस्त ही मेरे पाठक हैं और मेरे पाठक ही मेरे दोस्त हैं. मैं इसे 21 वीं सदी के किसी सफल बिजनेस मॉडल के रूप में नहीं देखता हूँ. मैं इसे उम्मीद और सहभागिता के स्नेह और आशा के एक जीवंत मॉडल के रूप में देखता हूँ.

यह दोस्तों के भरोसे और सतत आग्रह का ही परिणाम है कि मेरा कविताओं का पहला संकलन ‘तुम उदास करते हो कवि’ प्रकाशित होकर बाज़ार में आ गया है. ये बाज़ार शब्द अपने आप में बेहद डराता भी है क्योंकि यहाँ सफलता का आकलन बिक्री से भी होता है मगर मेरे लिए सफलता का आकलन आपके प्रेम से है. मैं चाहता हूँ कि मेरे जैसे लोग कविता लिखते रहें और वो पाठकों तक पहुँचती रहे.  इसके लिए जरूरी है प्रकाशक का कविता में निवेश का भरोसा कायम रहे और मेरे जैसे लोग अपनी बेहतर कोशिशें आप तक पहुंचाते रहें.

मुझे उम्मीद ही नहीं पूरा भरोसा है कि हम मिल-जुलकर इस जिम्मेदारी को उसके मुकाम तक जरुर लेकर जाएंगे. ‘तुम उदास करते हो कवि’ किताब अगर आपके पास रहेगी तो आप उदासी में मुस्कुरा सकेंगे बतौर कवि बस मैं इतनी ही प्रत्याभूति दे सकता हूँ. नीचे अमेजन का लिंक दे रहा हूँ यहाँ से आप किताब ऑर्डर करके मंगा सकते है. चूंकि सभी दोस्त जानते है कि फेसबुक पर मेरा लिखा हुआ ‘ओनली फॉर फ्रेंड्स’ रहता है इसलिए किताब की बात को अब आगे पहुंचाना अब आपके जिम्मे छोड़ता हूँ. आपके जरिए अधिकतम लोगों तक मेरी कविताएँ पहुंचे, ये एक छोटी सी आशा मेरी भी है.

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सस्नेह

डॉ. अजित तोमर

https://www.facebook.com/nomadicajeet


पिता पर लिखी गई डा. अजीत तोमर की चार कविताएं पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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अलीगढ़ के एसएसपी राजेश पांडेय की इस संवेदनशीलता को आप भी सलाम कहेंगे

आमतौर पर पुलिस महकमे से जुड़े लोगों को रुखा-सूखा और कठोर भाव-भंगिमाओं वाला आदमी माना जाता है. लेकिन इन्हीं के बीच बहुतेरे ऐसे शख्स पाए जाते हैं जिनके भीतर न सिर्फ भरपूर संवेदनशीलता होती है बल्कि वे अपने समय के साहित्य से लेकर कला और जनसरोकारों से बेहद नजदीक से जुड़े होते हैं. किसी जिले का पुलिस कप्तान वैसे तो अपने आप में दिन भर लूट हत्या मर्डर घेराव आग आदि तरह-तरह के नए पुराने अपराधों-केसों में उलझ कर रह जाने के लिए मजबूर होता है लेकिन वह इस सबके बीच अपने जिले की साहित्य की किसी बड़ी शख्सियत से इसलिए मिलने के लिए समय निकाल ले कि उनकी सेहत नासाज़ है तो यह प्रशंसनीय बात है.

गोपाल दास नीरज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. ”कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे….” रचने वाले गोपाल दास नीरज ने राजकपूर की ढेर सारी फिल्मों के गीत लिखे. मंच पर नीरज जी की सबसे ज्यादा डिमांड रही है. पद्म भूषण नीरज जी अलीगढ़ में निवास करते हैं. अलीगढ़ में एसएसपी के पद पर राजेश पांडेय हैं जो लखनऊ के भी एसएसपी रह चुके हैं. राजेश पांडेय को जब सूचना मिली कि नीरज जी की सेहत इन दिनों ठीक नहीं है तो वह फौरन वर्दी में ही उनसे मिलने उनके आवास की ओर चल पड़े.

परसों शाम करीब आठ बजे राजेश पांडे जब नीरज जी के आवास पर पहुंचते हैं तो उनकी सादगी देखकर दंग रह जाते हैं. नीरज जी के कमरे में कूलर चल रहा था. एसी नहीं है घर में. अलीगढ़ के एक डिग्री कालेज में प्रोफेसर रह चुके महाकवि पदमभूषण नीरज जी बेहद सरल सहज इंसान हैं. वे स्वास्थ्य कारणों से अब ह्वील चेयर पर चलते हैं. आठ बजे शाम पहुंचे एसएसपी राजेश पांडेय रात साढ़े दस बजे लौटे.

यह पहली बार नहीं जब राजेश पांडेय महाकवि नीरज जी के घर पहुंचे हों. करीब दो महीने पहले जब उन्हें पता चला कि नीरज जी की तबियत काफी बिगड़ गई है तो वो खुद एक नामचीन डाक्टर को साथ लेकर उनके यहां पहुंचे और इलाज में मदद की. राजेश पांडेय महीने में एक बार नीरज जी के यहां जाकर उनका हालचाल पूछ आते हैं. इस संवेदनशीलता को लेकर अलीगढ़ के लोग एसएसपी राजेश पांडेय की काफी सराहना करते हैं.

अलीगढ़ के युवा छात्रनेता जियाउर्ररहमान का कहना है कि हम सभी लोग पुलिस विभाग से लॉ एंड आर्डर बेहतर करने की तो उम्मीद करते हैं लेकिन कोई शख्स इससे आगे जाकर जब हमारे सुख-दुख में शरीक होने लगता है तो यकीनन अच्छा लगता है. पुलिस कप्तान राजेश पांडेय जी का यह बड़प्पन है जो अपने जिले अलीगढ़ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर शख्सियत गोपाल दास नीरज जी के इलाज में सक्रिय हिस्सेदारी लेते हैं और उन्हें स्वस्थ-प्रसन्न रखने की कोशिश करते हैं. उनके इस कदम से पुलिस विभाग के बाकी लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए और जो जिस इलाके में है, वहां की साहित्य, शिक्षा, कला आदि क्षेत्रों की चर्चित हस्तियों को उचित मान-सम्मान और मदद करनी चाहिए.

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‘उन्मत्त’ मस्त कवि हैं, पागल तो जमाना है

रेलवे की मजदूर बस्ती में कोई एक शाम थी। कॉमरेड लॉरेंस के आग्रह पर हम नुक्कड़ नाटक खेलने गए थे। सफ़दर हाशमी के ‘मशीन’ को हमने ‘रेल का खेल’ नाम से बदल दिया था। इम्प्रोवाइजेशन से नाटक बेहद रोचक बन पड़ा था और चूँकि नाटक सीधे उन्हीं को सम्बोधित था, जो समस्याएं झेल रहे थे, इसलिए उन्हें कहीं गहरे तक छू रहा था। नाटक के बाद देर तक तालियाँ बजती रहीं और चीकट गन्दे प्यालों में आधी-आधी कड़क-मीठी चाय पीकर हम लोग वापसी के लिए गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगे। छोटा स्टेशन होने के कारण वोटिंग हाल नहीं था, इसलिए रेलवे गार्ड के बड़े-बड़े बक्सों को इकठ्ठा कर हम लोगों ने आसन जमा लिया। तभी कॉमरेड लॉरेंस एक कविनुमा शख़्स के साथ नमूदार हुए जो आगे चलकर सचमुच ही कवि निकला। कवि का नाम वासुकि प्रसाद ‘उन्मत’ था।

उन्मत ने नाटक से ज्यादा मेरे लिखे शीर्षक गीत की तारीफ़ की। जब कोई आपकी किसी रचना की कुछ ज्यादा ही तारीफ़ करे तो आपको फौरन इस बात का अंदेशा हो जाना चाहिए कि तारीफ़ करने वाला भी रचनाकार है। ‘आप भी लिखते हैं?’ मैंने शिष्टता के साथ पूछा। जवाब में उन्होंने ‘अर्ज करता हूँ’ की औपचारिकता निभाए बगैर एक कविता अर्ज कर दी। कविता मारक थी। मुकर्रर वगैरह हुआ तो उन्होंने कहा कि जितनी देर में कविता दोहराऊंगा, उतने समय में एक नई कविता हो जायेगी। उन्होंने दूसरी कविता सुनाई, फिर तीसरी, फिर चौथी। इसके बाद संख्या याद नहीं रहे। बक्से में बैठे-बैठे अधप्याली चाय का एक दौर और हुआ और ‘उन्मत्त’ का काव्य-पाठ तब तक चलता रहा जब तक की गाडी आकर खड़ी नहीं हो गई।

इसके बाद के कुछ पल संकट और जोखिम वाले थे। रेलगाड़ी के गार्ड ने सिटी बजाकर झंडी लहराना शुरू कर दिया था। बाकी सारे साथी गाड़ी में सवार हो गए थे। गाड़ी छूटने को थी और छूट चुकी कविता अपने आधे मुकाम पर थी। गाड़ी छूटती तो अगली गाड़ी के आने में लम्बा अंतराल था और कविता को छोड़ता तो कवि का अपमान होता। मैंने विदा के लिए हाथ बढ़ाया तो उन्होंने हाथों को मजबूती से पकड़ लिया। कविता बदस्तूर जारी थी। गाड़ी के पहिए घूमने शुरू हो गए थे। मैंने अपना बायाँ हाथ उनके कन्धों पर डाला और कविता सुनते-सुनते ही थोड़े बल के साथ उन्हें गाड़ी की दिशा में धकेला। चूंकि इस कार्रवाई से कविता-वाचन और श्रवण की प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आ रही थी, इसलिए उन्होंने भी अपना पूरा सहयोग बरता। कविता की अंतिम पंक्ति खत्म होते न होते मैं थोड़ी गति पकड़ चुकी गाड़ी मैं सवार हो चुका था और हाथ हिलाते हुए मैं ‘बाय-बाय’ की जगह ‘वाह-वाह’ कर था।

‘उन्मत्त’ से मेरी यह पहली हाहाकारी मुलाक़ात थी। इसके बाद कुल जमा दो बार और मिला। ‘उन्मत्त’ भिलाई के लोको शेड में फीटर का काम करते थे। पता नहीं अभी नौकरी में हैं या नहीं। एक अरसे से उनसे भेंट नहीं हुई। कोई सम्पर्क सूत्र भी नहीं है। उनकी कविताएँ सीधे दिल पर चोट करती थीं। भाषा और शिल्प चाहे जो हो, बात बिल्कुल खरी कहते थे। अफ़्रीकी क्रन्तिकारी अश्वेत कवि बेंजामिन मोलाइस की फाँसी पर उनकी लिखी कविता साधारण श्रोता को भी दहला देती थी। वे काली लाशों का पहाड़ खड़ा कर देने पर भी न झुकने, न टूटने की बात कहते थे। यह कविता अब मेरे पास नहीं है। किसी एक कैसेट में रिकॉर्ड है पर वह शायद ही चल पाए।

‘उन्मत्त’ अक्खड़ थे। जमाना कवियों को थोड़ा पागल समझता है तो अपना उपनाम ‘उन्मत्त’ रख लिया -‘लो, कहते रहो हमें पागल!’ जमाने को ठेंगे पर रखते थे। रेलवे में छुटभैये अफसरों का स्वागत भी धार्मिक रीति-रिवाज से होता है ताकि तलुए चाटने की महान परम्परा में कोई दाग न लग जाए। किसी छोटे अफसर की मत मारी गई थी जो उसने ‘उन्मत्त’ को स्वागत-गान लिखने कह दिया। ‘उन्मत्त’ ने स्वागत-गान ऐसा लिखा कि आइन्दा स्वागत-समारोह तो दूर, उन्हें किसी बिदाई समारोह में भी नहीं बुलाया गया। एक-दो और कविताएँ है। हनुमान की भक्ति का भक्तों ने केवल महिमा-मण्डन किया है। ‘उन्मत्त’ उसे किसी और नजरिए से देखते हैं। कुत्तों वाली कविता उन कुत्तों पर है, जिनकी शक्लें इंसानी हैं पर जिह्वां और दुम में रत्तीभर भी फर्क नहीं है!

कुत्ते

एक साथ सारे के सारे कुत्ते
मुझ पर टूट पड़े हैं

फेंक रहा मैं उन पर ढेला
अर्द्धरात्रि में निपट अकेला
लेकिन सभी तरफ से मुझ पर
दौड़ रहा कुत्तों का रेला
कुत्ते मुझको काट खा रहे
मैं भी पत्थर मार रहा हूँ
लहूलुहान पड़ा हूँ मैं भी
वे भी लहूलुहान पड़े हैं

एक साथ सारे के सारे कुत्ते
मुझ पर टूट पड़े हैं

जूठन खाने वाले कुत्ते
पूंछ हिलाने वाले कुत्ते
अपने से कमज़ोरों पर ही
बस गुर्राने वाले कुत्ते
चुगलखोर जासूसी कुत्ते
अलसेशियन-शिकारी कुत्ते
देशी-दीन -भिखारी कुत्ते
भूरे, कबरे, काले कुत्ते
झबरे बालों वाले कुत्ते
एक साथ सारे कुत्तों के
गड़े हुए मुझपर जबड़े हैं

एक साथ सारे के सारे कुत्ते
मुझ पर टूट पड़े हैं

स्वागत-गान

अपना स्वागत खुद करवाने वालो
आपका स्वागत है
स्वागत के भूखो
हमको मरवाने वालो
आपका स्वागत है

कृपा आपकी
नहीं हमारे तन पर अब तक मांस जमा
हमको खाने और पचाने वालो
आपका स्वागत है

नये पुराने सारे पापी
एक साथ एकत्र हुए
यमदूतों को भी शर्माने वालों
आपका स्वागत है

हमको डंडे-लात मार-मार के
करने वालों ठंडा-शांत
खुलकर के आतंक मचाने वालो
आपका स्वागत है

सूखी हड्डी फेंक-फेंककर हम सबके आगे
हमको कुत्तों-बिल्ली सा लड़वाने वालो
आपका स्वागत है

गदहे को घोड़ा और
घोड़े को गदहा बनाने वालो धन्य
चमड़े का सिक्का चलवाने वालो
आपका स्वागत है

सड़ा-सड़ाकर ठंडे बस्तों में हर एक समस्या को
देश को कब्रिस्तान बनाने वालो
आपका स्वागत है

आपका पैसा, आपका तंबू
आपकी माला और गुलाल
खुद ही नारियल-शाल मंगाने वालों
आपका स्वागत है

अपने हाथों से लिख करके
अपना ही अभिनंदन पत्र
चमचों के हाथों पढ़वाने वालो
आपका स्वागत है

स्वागत के भूखों
हमको मरवाने वालो
आपका स्वागत है

थिएटर एक्टिविस्ट दिनेश चौधरी से संपर्क iptadgg@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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कैंसर की नई दवा के परीक्षण में जुटे गाजीपुर के डाक्टर एमडी सिंह का कवि रूप (देखें वीडियो इंटरव्यू)

Yashwant Singh : गाज़ीपुर जिले के मशहूर चिकित्सक डॉक्टर मुनि देवेंद्र सिंह उर्फ एमडी सिंह के कवि रूप को उनके ही जिले के बहुत कम लोग जानते होंगे। इस बार गाज़ीपुर प्रवास की उपलब्धि रहे DR. MD SINGH जी. आधे घंटे तक उनसे विस्तार से बातचीत हुई और पूरी बातचीत को मोबाइल में रिकार्ड किया. इस इंटरव्यू में एक डॉक्टर को कैसा होना चाहिए और संवेदनशीलता किस तरह शब्दों में ढलकर व्यक्ति को कवि बना देती है, इसके बारे में बताया डाक्टर एमडी सिंह ने. Continue reading

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सुना है आज कल वह बड़ा पत्रकार हो गया…

एक रचना अपनी जमात के लिए

खबरों पर विज्ञापन जो इतना सवार हो गया।
उगाही का ही अड्डा हर अखबार हो गया ।।

संपादकों की शोखियां तो नाम की ही रह गईं।
मैनेजरों के कंधों पर सब दारोमदार हो गया।।

उन तेवरों का ताप तो वे विशेषांक ले उड़े।
खबरनबीस लूट का खुद हथियार हो गया।।

छापने न छापने का हर दाम फिक्स हो गया।
कलम के बूते यह कैसा कारोबार हो गया।।

है हुनर उसको आ गया ऐंठने का आम से।
सुना है आज कल वह बड़ा पत्रकार हो गया।।

जब सुर्खियां बने हुए हैं बस राग दरबार के।
अफसाना लिख रहा हूं सच लाचार हो गया।।

xxx

वो भी कितना गजब का कलमकार है।
एक जेब में विपक्ष दूसरी में सरकार है।।

भूखे बच्चों की चित्कार कैसे सुनेगा वो।
जिसके लिए पैसा इकलौता सरोकार है।।

उसकी तहरीरों पर हसें कि रोयें बताओ।
कुछ भी लिख देना उसका कारोबार है।।

हुनर इश्तहार ऐंठने का खूब आतो उसे।
प्रबंधन बोले,उसके दम पर अखबार है।।

इस गठजोड में छुपा खूब जमा जोड़ है।
सियासी लूट में शामिल हुआ पत्रकार है।।  

रचनाकार विनोद भावुक ‘फोकस हिमाचल’ साप्ताहिक मैग्जीन के सम्पादक हैं. उनसे संपर्क vinod.bhavuk.mandi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पिता के मर जाने पर मनुष्य के अंदर का पिता डर जाता है…

पिता पर डॉ. अजित तोमर की चार कविताएं

1.

पिता की मृत्यु पर
जब खुल कर नही रोया मैं
और एकांत में दहाड़ कर कहा मौत से
अभी देर से आना था तुम्हें
उस वक्त मिला
पिता की आत्मा को मोक्ष।

***

पिता की अलग दुनिया थी
मेरी अलग
दोनों दुनिया में न कोई साम्य था
न कोई प्रतिस्पर्धा
जब पिता नही रहे
दोनों दुनिया के बोझ तले दब गया मैं
मेरी आवाज़ कहीं नही पहुँचती थी
मुझ तक भी नही।

***

कोई भी गलत काम करने से पहले
ईश्वर का मुझे लगता था बहुत भय
पिता की मौत के बाद
ईश्वर का भय हुआ समाप्त
और पिता का भय बढ़ गया
इस तरह ईश्वर अनुपस्थित हुआ मेरे जीवन से
पिता के जाने के बाद।

***

पिता के मर जाने पर
मनुष्य के अंदर का पिता डर जाता है
वो जीना चाहता है देर तक
अपने बच्चों के लिए
भले जीते जी वो कुछ न कर पाए
मगर
मर कर नही बढ़ाना चाहता
अपने बच्चों की मुश्किलें।

2.

एक मेरे पिता थे
जो यदा-कदा कहतें थे
तुम्हारे बस का नही ये काम

एक वो है
जिनका पिता मैं हूँ
उनकी अपेक्षाओं पर जब होता हूँ खारिज़
ठीक यही बात कहतें वो
आपके बस का नहीं ये काम

दो पीढ़ियों के बीच
इतना मजबूर हमेशा रहा हूँ मैं
ये कोई ग्लैमराइज्ड करने की बात नही
ना अपनी काहिली छिपाने की
एक अदद कोशिश इसे समझा जाए

बात बस इतनी सी है
मैं चूकता रहा हूँ हमेशा बेहतर और श्रेष्ठतम् से
नही कर पाता
कुछ छोटे छोटे मगर बुनियादी काम
और मनुष्य होने के नातें
ये एक बड़ी असफलता है मेरी
यह भी करता हूँ स्वीकार

अपने पिता और पुत्रों के मध्य
संधिस्थल पर बैठा प्रार्थनारत हूँ न जाने कब से
घुटनों के बल बैठे बैठे मेरी कमर दुखने लगी है
मेरा कद  रह गया है आधा

इसलिए नही देख पाता
अपने आसपास बिखरी
छोटी-बड़ी खुशियों को

मेरे वजूद का यही एक ज्ञात सच है
जो बता सकता हूँ मैं
अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ।

3.

संयोग से उस दौर में
मेरा जन्म हुआ
जहां पिता पुत्र के अंतर्द्वन्द बेहद गहरे थे
समाज तब करवट ले रहा था
मेरे से पूर्ववर्ती पीढ़ी
विचार और संवेदना के स्तर पर नही थी
इस किस्म की विद्रोही

हम नालायक थे
वो रही थी अपेक्षाकृत आज्ञाकारी

मेरा विद्रोह किसी क्रांति के निमित्त न था
ये काफी हद तक भावनात्मक रहा
कुछ कुछ वैसा ही
जैसा सबको रहती है शिकायत कि
पिता उन्हें ठीक से समझ नही पाए
मगर
एक ईमानदार सवाल यह भी है
क्या हम ठीक से समझ पाए पिता को

ऐसा क्यों हुआ हमारा अस्तित्व ही
चुनौति बन गया उनके लिए
हमारे मुद्दें भिन्न थे तर्क भिन्न थे
एकदम अलग थी दुनिया
मगर अक्सर बहस क्यों रही एकतरफा

पिता के साथ क्यों नही विकसित हो पाया
हमारा लोकतांत्रिक रिश्ता
दोनों के हिस्से में आती रही हमेशा
थोड़ी जिद थोड़ी परेशानी

एक चूके हुए समय में
पिता पुत्र का साथ होना था बेहद जटिल
आदर की कल्पनाओं के साथ बनता रहा
असहमतियों का पहाड़

पिता कुछ इस तरह उपस्थित रहें हमारे जीवन में
जैसे कुँए में रस्सी
हम पिता की अपेक्षाओं से नही
खुद के असंतुलन से होते रहे सहज
नही समझ पाए
प्यार का होता है एक गैर बौद्घिक संस्करण भी

पिता के जीते जी
हमारे कन्धे जुते रहें खुद के यथार्थ को जोतने में
हमें उम्मीद थी कि हम पैदा करेंगे कुछ नया
जिसे देख विस्मय से चुप हो जाएंगे पिता

और जब एकदिन पिता चुप हो गए हमेशा के लिए

हमनें पाया सारी ज़मीन बंजर थी
जिसे जोत रहे थे हम बेतुके उत्साह के साथ

हम उस दौर के पुत्र है
जो अपने पिता के पिता बननें की फिराक में थे
मगर साबित हुए
खुद एक औसत पिता

दरअसल, पिता होना इतना आसान नही था
ये बात तब समझ में आई
जब पिता नही थे,पिता की कुछ स्मृतियाँ थी
जो रोज़ हंसती थी हमारे एकांत पर
जो रोज़ रोती थी हमारी मजबूरियों पर

पिता मजबूरी के प्रतीक नही थे
हमनें उनको बनाया ऐसा
भले ही हमारा मन्तव्य उनको छोटा करना नही था
मगर सच तो ये भी है
तमाम समझदारी के दावों के बीच
हम नही नाप पाए अपने ही पिता का कद।

4.

कभी कभी खीझकर
पिताजी मुझे कहते थे
सियासती
खासकर जब मैं तटस्थ हो जाता
या फिर उनका पक्ष नही लेता था
उनके एकाधिकार को चुनौति देने वाली व्यूह रचना का
वो मुझे मानते थे सूत्रधार
उन्हें लगता मैं अपने भाईयों को संगठित कर
उनके विरोध की नीति का केंद्र हूँ
गर्मा गरम बातचीत में उन्हें लगता
मिलकर उनको घेर रहा हूँ
उनको जीवन और निर्णयों को अप्रासंगिक बताने के लिए
सबको करता हूँ दीक्षित
बावजूद ऐसे गुस्से भरे आरोपों के
एक मैं ही था
जिसकी बात मानते थे वो
क्यों, ये आजतक नही जान पाया
मैंने देखा उनको धीरे धीरे ढल जाना
बिना किसी मजबूरी के
तमाम असहमतियों के बावजूद
पिता बचे मेरे जीवन में बेहद आदर के साथ
कुछ क्षमा प्रार्थनाओं की शक्ल में
और मैं पता नही किस रूप में बचा
उनके चले जाने के बाद
तमाम सियासत के बावजूद मैं हार गया एक दिन
तमाम विरोध के बावजूद वो जीत गए उस दिन
हमेशा की तरह।

© डॉ.अजित

वेस्ट यूपी के जिला शामली निवासी कवि डा. अजित तोमर ब्लॉगर भी हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय लेखन करते हैं. डॉ. अजित फिलवक्त हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में अध्यापन कर रहे हैं. उनसे आनलाइन संपर्क dr.ajeet82@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. उनका पूरा पोस्टल एड्रेस इस प्रकार है-  डॉ. अजित सिंह तोमर, ग्राम+पोस्ट: हथछोया, जनपद: शामली , पिन: 247778, उत्तर प्रदेश, मोबाईल: 09997019933

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रमाशंकर यादव उर्फ विद्रोही जी की एक कविता ‘पुरखे’

पुरखे

नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।

सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।

ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।

कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।

वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।

कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।

पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।

विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।

डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।

धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।

खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।

जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

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फादर कामिल बुल्के तुलसी के हनुमान हैं : केदारनाथ सिंह

वाराणसी। प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह ने कहा है कि कुछ चीजें रह जाती हैं जिसकी कसक जीवन भर, आखिरी सांस तक बनी रहती है। मेरे जीवन की कसक कोई पूछे तो कई सारी चीजों में एक है फादर कामिल बुल्के से न मिल पाने, न देख पाने की कसक। मैं उन दिनों बनारस में था जब वे इलाहाबाद में शोध कर रहे थे। धर्मवीर भारती, रघुवंश से अक्सर उनकी चर्चा सुनता था लेकिन उनसे न मिल पाने का सुयोग घटित न होना था तो न हुआ। वे तुलसी के हनुमान थे। हनुमान ने जो काम राम के लिए किया है, तुलसीदास और रामकथा के लिए वही काम फादर कामिल बुल्के ने किया।

केदारनाथ सिंह मंगलवार को पराड़कर स्मृति भवन में अयोध्या शोध संस्थान और सोसाइटी फार मीडिया एण्ड सोशल डेवलपमेण्ट के संयुक्त तत्वाववधान में फादर कामिल बुल्के जयन्ती समारोह में विचार व्यक्त कर रहे थे। इस मौके पर उन्होंने पत्रकार-कवि आलोक पराड़कर द्वारा सम्पादित ‘रामकथा : वैश्विक सन्दर्भ’ का लोकार्पण किया। श्री सिंह ने कहा कि फादर बुल्के के शोध ग्रन्थ रामकथा की काफी चर्चा रही है। वास्तव में इस ग्रन्थ से हिन्दी में तुलनात्मक साहित्य की शुरूआत होती है। उन्होंने इस ग्रन्थ में देश-विदेश की रामकथाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया है। वे बड़े शैलीकार भी थे। श्री सिंह ने कहा कि हिन्दी के उनका अनुराग इस कारण हुआ क्योंकि उन्होंने बेल्जियम में फ्रेंच के विरूद्ध फ्लेमिश की लड़ाई देखी थी। उन्होंने कहा कि फादर बु्ल्के ने कहीं लिखा है कि अगर मैं हिन्दी की सेवा में नहीं लगता तो फ्लेमिश का क्रान्तिकारी होता।

समारोह में काशी विद्यापीठ के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो.सर्वजीत राय ने कहा कि फादर कामिल बुल्के वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने देश में हिन्दी में शोध करने की शुरूआत की। इसके पहले विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी में शोध होते थे। हिन्दी विद्वान जितेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि बेल्जियम में फ्लेमिश की उपेक्षा से द्रवित फादर बुल्के ने हिन्दी की उपेक्षा देखकर उसकी सेवा का निर्णय किया। वे कई भाषाओं के जानकार थे। उदय प्रताप कालेज के हिन्दी के पू्र्व विभागाध्यक्ष रामसुधार सिंह ने कहा कि रामकथा जैसा शोध आजतक नहीं हो सका है। समारोह में काशी विद्यापीठ के सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुरेन्द्र प्रताप, बिशप फादर यूजिन जोसेफ के प्रतिनिधि ने भी विचार व्यक्त किए। इस मौके पर वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी भी उपस्थित थे।

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इला कुमार के पांचवें काव्य-संग्रह के लोकार्पण में संचालक महोदय खुद पच्चीस मिनट तक बोले

दिल्ली : वरिष्ठ कवयित्री इला कुमार के पाँचवें काव्य-संग्रह  “आज पूरे शहर पर” का लोकार्पण पिछले दिनों हिन्दी भवन / दिल्ली में किया गया.  कला सम्पदा एवं वैचारिकी की ओर से हिंदी भवन / दिल्ली में आयोजित लोकार्पण कार्यक्रम में एक विचारगोष्ठी की शुरुआत करते हुए विजयशंकर ने इला कुमार की काव्य –पुस्तकों (ठहरा हुआ एहसास, जिद मछली की, किन्हीं रात्रियों में, कार्तिक का पहला गुलाब) एवं उपन्यास तथा अनुवाद (रिल्के और लाओ त्ज़ु) के साथ-साथ उपनिषद कथाओं और हिन्दुत्व से सम्बंधित पुस्तकों का रचनाकार बताते हुए उनके महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदान की चर्चा की.

विजय शंकर ने जनमानस के मन से कविता की बढती दूरी पर चिंता व्यक्त की. कवयित्री सविता सिंह ने कविता, स्त्री विमर्श के संतुलन और सौंदर्य से अपनी बात शुरू करके कहा कि कविता के साथ  स्त्री का सम्बंध अपने सेल्फ के साथ सम्बन्ध होने जैसा है, जबकि पुरुष का कविता के साथ सम्बन्ध वैसे ही है जैसे किसी अन्य के साथ. उन्होंने इला कुमार की कविताओं में बचपन के आह्लाद और अकेलेपन की उदासी को चिह्नित किया. आलोचक ज्योतिष जोशी ने कहा, ‘मैंने पूरे संग्रह को दो-दो बार पढ़ा. इस संग्रह की कविताओं को स्त्री या पुरुष द्वारा लिखी गई न कहकर मात्र कवि द्वारा लिखित कहा जाना चाहिए. ये प्रचलित फ्रेम से हटकर लिखी गईं कविताएं हैं और यह आज की मंचीय कविता–पाठ से अलग किस्म का पाठ है.” उन्होने कई कविताओं का जिक्र किया –  समवाद, कहा मैंने शहर से, आज का कवि, मध्य रात्रि के बीच आदि. 

संचालक ओम निश्चल कार्यक्रम के संचालन के नियमों को ध्वस्त करते हुए लगातार पच्चीस मिनटों तक बोले लेकिन लोकार्पित संग्रह पर उन्होंने नहीं के बराबर बोला. साहित्यकार धनंजय कुमार ने मंच की तरफ से इस विसंगति के बारे में असंतोष व्यक्त किया.

अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री कृष्णदत्त पालीवाल ने कवि की अंतर्दृष्टि और द्रष्टा भाव के साथ-साथ कविताओं की पठनीयता की तरफ संकेत किया. उन्होंने संग्रह की कविताओं के बीच सूर्य और सूर्यबिम्बों  के दुहराव को भी इंगित किया. कविता को समर्पित इस कार्यक्रम में उमेश वर्मा, सुरेन्द्र ओझा, डा. वेदप्रकाश, मृत्युन्जय कुमार, अनुराग सचान, बिपिन चौधरी, डा. हर्षबाला, डा. प्रिया शर्मा, अनिल जोशी, सरोज जोशी, नरेश शांडिल्य, गीताश्री, अमृता ठाकुर आदि उपस्थित थे.

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खेवली में मनाई गयी धूमिल जी की जयंती

वाराणसी : जंसा क्षेत्र के खेवली गाँव में कल दिन भर बड़ी चहल पहल रही, बड़ी संख्या में साहित्यकार, कवि, लेखक और सामजिक कार्यकर्त्ता जुटे थे. वजह थी इस गाँव में ही जन्म लिए समकलीन कविता के स्तम्भ जन कवि स्व सुदामा पाण्डेय की जयंती. वे अपनी कविताएँ “धूमिल” उपनाम से लिखते थे.मात्र 38 वर्ष की ही कुल अवस्था में उन्होंने अनेक काव्य संग्रहों की रचना की और साहित्य में अमर हो गए.धूमिल जी का जन्म खेवली में हुआ था. खेवली में सुबह से ही आस पास के गाँव के बच्चे उनके निवास पर एकत्र होने लग गये थे.श्रम दान द्वारा गाँव में साफ़ सफाई की गयी. 10 बजे से एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता आयोजित हुयी जिसमे उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले 20 बच्चो को एक सामाजिक संस्था “आशा” ट्रस्ट द्वारा रोचक बाल साहित्य देकर पुरस्कृत किया गया.

इसके बाद एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था “दूसरे प्रजातंत्र की तलाश और धूमिल”. गोष्ठी के पूर्व धूमिल जी के चित्र पर उनकी धर्मपत्नी श्रीमती त्रिमूर्ति देवी सहित अन्य लोगों ने माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की. गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा की आज 4 दशक बाद धूमिल की रचनाएँ सामयिक और व्यवहारिक लगती हैं. प्रजातंत्र में आम आदमी की व्यथा और दुर्दशा को धूमिल ने ह्रदय से महसूस किया और उनकी लेखनी में उसका सजीव चित्रण भी दीखता है.उन्होंनेउपनी रचनाओं में लोकतंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और व्यवस्था की खामियों पर बड़ी बेबाकी से प्रहार किया.वे छाहते थे की कविताओं का इस्तेमाल जनता की भाषा में होना चाहिए. धूमिल आम आदमी की समस्याओं का जिक्र अपनी कविताओं में प्रभावशाली ढंग से करते थे.  वक्ताओं में प्रमुख रूप से प्रो श्रद्धानंद जी, प्रो शिव कुमार मिश्र, डा सदानंद मिश्र, डा गोरख नाथ पाण्डेय, डा रमाकांत राय, श्री प्रकाश राय, हौसिला प्रसाद, अशोक पाण्डेय, रत्न शंकर पाण्डेय, प्रभाकर सिंह, अभिलाष सिंह, संतोष कुमार सिंह, देवी शरण सिंह आदि विचारक, लेखक और साहित्यकार शामिल थे

गोष्ठी के बाद बच्चो द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए किये गए.आशा सामाजिक विद्यालय के बच्चों ने पंचायती प्रणाली में महिलाओं के नेत्रित्व की जरूरत को उजागर करने वाला नाटक ” किसनी की जीत” प्रस्तुत कर सभी को प्रभावित किया. धूमिल जयंती समारोह का आयोजन धूमिल शोध संसथान,  विवेकानंद काशी जन कल्याण समिति, सझासंस्कृति मंच, आशा ट्रस्ट, लोक समिति, धूमिल जन संपर्क समिति और स्थानीय निवासियों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था.

कार्यक्रम के आयोजन में प्रमुख रूप से मनीष कुमार, राम कुमार, आनंद शंकर पाण्डेय, कन्हैया पाण्डेय, अशोक पाण्डेय, धनञ्जय त्रिपाठी, प्रदीप सिंह, दीन दयाल सिंह, राजबली वर्मा, नंदलाल मास्टर, सुरेश राठोर, सूरज पाण्डेय, इंदुशेखर सिंह आदि का विशेष योगदान था.

भवदीय:
वल्लभाचार्य पाण्डेय
साझा संस्कृति मंच

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रामविलास शर्मा आर्य-अनार्य की बहस को साम्राज्यवाद का हथियार मानते थे

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डॉ. रामविलास शर्मा (10 अक्टूबर 1912- 30 मई, 2000) हिंदी के महान समालोचक और चिंतक थे। 10 अक्टूबर, 1912 को जिला उन्नाव के ऊंचगांव सानी में जन्मे रामविलासजी ने 1934 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. और फिर 1938 में पी-एच.डी की। 1943 से 1971 तक आगरा के प्रसिद्ध बलवंत राजपूत कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते रहे। 1974 तक आगरा विवि के कुलपति के विशेष आग्रह पर के.एम. मुंशी विद्यापीठ के निदेशक का कार्यभार संभाला। ‘राष्ट्रवाद’ और ‘मार्क्सवादी  चेतना’  रामविलास शर्मा के चिंतन-दर्शन का केंद्र-बिंदु है। बाल्मीकि, कालिदास, भवभूति,  भक्ति आंदोलन से लगायत भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद्र, निराला, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन और अमृतलाल नागर तक उन्होंने विश्वसनीय, वस्तुनिष्ठ (और ‘विवादास्पद’ भी!) मूल्यांकन किया।

उनकी सभी मान्यताओं से सहमति नहीं रखने वाले लोग भी उनकी वैचारिक साधना और संघर्ष-साधना के प्रति आदर रखते हैं। डॉ. शर्मा ने हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति को कई महत्वपूर्ण और मौलिक अवदान दिए। उनकी भाषा में सहजता, स्पष्टता व मौलिकता देखते ही बनती है। उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बाद हिंदी की प्रगतिशील आलोचना को समृद्ध करने में महती भूमिका तो निभायी ही, भाषा विज्ञान, दर्शनशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र और भारतीय संस्कृति को व्याख्यायित करने में अपनी अद्भुत व अप्रतिम मेधा एवं दृष्टि का परिचय दिया। उनकी ज्ञान -मीमांसा का परिक्षेत्र जितना व्यापक है, उतना ही गंभीर। उन्होंने अपने पी-एच.डी. शोध पत्र (जिसका परीक्षण इंग्लैंड में हुआ) और कुछ शुरुआती  निबंधों को छोडक़र आजीवन हिंदी में ही लिखा।

हिंदी और अंग्रेजी भाषा-साहित्य के प्राय: सभी जानकार एवं मूर्धन्य यह भलीभांति जानते हैं कि वे चाहते तो ‘ग्लोबल गांव’ में अंग्रेजी में लिखकर ‘इंटरनेशनल’ हो सकते थे। लेकिन नहीं, हजार वर्ष के हिंदी भाषा और साहित्य की परंपरा को वे पूरी दुनिया में अपनी भाषा में ही उल्लेखित कर रहे थे। उनका साहित्यिक जीवन 1933 से शुरू हुआ, जब वे महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के संपर्क में आये। निराला साहित्य की समालोचना में उनका महान योगदान है। जब चारों तरफ से निराला की कविताओं को कमतर सिद्ध किया जा रहा था, उस समय उन्होंने उनकी सृजनात्मकता को ऊंचाई प्रदान किया। बौधिक समर्थन दिया। ‘निराला की साहित्य साधना (तीन भागों में) में निराला के जीवन और साहित्य को जैसा रचा गया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। निराला के बारे में उन्होंने लिखा है कि ‘जैसे 1857 का कोई योद्धा साहित्य के मैदान में चला आया हो।’

वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह का कहना है कि ‘ज्यादा सही है कि वह योद्धा रामविलास जी ही हैं।’ आचार्य भोला शंकर व्यास जैसे मूर्धन्य संस्कृत और हिंदी आचार्य, घोर परम्परावादी पंडित विद्यानिवास मिश्र और वामपंथी नामवर सिंह एक साथ डॉ. शर्मा के प्रति नतमस्तक हैं।

डॉ. शर्मा आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद हिंदी के सबसे प्रतिष्ठित और विश्वसनीय समालोचक हैं। शुक्लजी की तरह उन्होंने भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर आलोचना रची। उनका कहना था कि ‘यदि हमें भारतीय इतिहास का सही-सही मूल्यांकन करना है तो हमें अपनी परंपरा और प्राचीन साहित्य को देखना होगा।’ जिस समय कम्युनिस्ट विचारधारा के ‘जड़’ लेखक-विचारक तुलसी, परंपरा, वेद, पुराण पर लिखने- बोलने से हिचकते और लजाते थे उस दौर में रामविलासजी ने परंपरा और ऋग्वेद पर लिखकर यह बताया कि परंपरा से पीछा छुड़ाना और बिना जाने उसे बुर्जुवा साहित्य घोषित करना एक बड़ी भूल होगी। राजनीति की तरह साहित्य और चिंतन में भी प्रगतिशील लेखक ‘ऐतिहासिक भूल’ को बार-बार दोहराते रहे।

जिंदगी की अंतिम सांसों तक मार्क्सवादी दर्शन और विचारधारा के प्रति विश्वास रखते रहे रामविलास शर्मा जड़ कम्युनिस्ट नहीं थे। वे ईमानदार भारतीय चिंतक थे, जिनके लिए परंपरा, तुलसीदास, वेद -पुराण-शास्त्र का भी अत्यन्त महत्व था। इसीलिए उन्हें ‘ऋषि मार्क्सवादी कहा गया। जब वामपंथी लेखक तुलसीदास को दरकिनार कर रहे थे, तब डॉ. शर्मा सत्साहस के साथ तुलसी साहित्य के सौंदर्य शास्त्र को रच रहे थे और बता रहे थे कि तुलसीदास भारतीय मानस को समझने के सर्वोत्तम माध्यम हैं। प्रेमचंद को तुलसी के बाद सर्वाधिक जनप्रिय सर्जक माना।

आर्यों के मुद्दे पर वे अटल रहे कि आर्य भारत के मूल थे। आर्य-अनार्य की बहस को साम्राज्यवाद का हथियार मानते थे। उनके शब्दों में- ‘हमारे जितने पूंजीवादी और मार्क्सवादी इतिहासकार हैं वे आर्यों को एक अखंड इकाई मानकर चलते हैं। हमारा कहना है कि भारत में आर्यों की कोई अखंड इकाई नहीं थी। नस्ल के आधार पर कभी भी भारतीय समाज या संसार के किसी भी समाज का संगठन नहीं हुआ है।’ रामविलासजी नास्तिक थे, सेकुलर थे, लेकिन ‘राष्ट्रनिरपेक्ष’ मार्क्सवादी चिन्तक नहीं थे।

रामविलास जी ने महाप्राण निराला और आचार्य शुक्ल के मार्फत एक लेखक की छवि का भी निर्माण किया। साम्राज्यवाद विरोध के प्रति उनका नजरिया हमेशा अडिग रहा। ऋग्वैदिक ऋषियों से लेकर रामविलास जी तक एक चरित्र देखने को मिलता है।

उन्हें अनेक पुरस्कार-सम्मान मिले। लेकिन पुरस्कारों के प्रति उदासीनता प्रकट कर उन्होंने साहित्यकार और चिंतक की वास्तविक भूमिका के प्रति सचेत किया। साहित्य अकादमी और अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों-सम्मानों से सम्मानित हुए। लाखों रुपयों की पुरस्कार राशि को अहिंदी प्रान्तों में हिंदी के उत्थान ओर विकास के लिए दान कर दिया। निराला ने शुक्ल जी को हिंदी के हित का अभिमान कहा। यही बात डॉ. शर्मा पर भी लागू होती है। हम सभी को उनसे प्रेरणा लेकर ‘अपनी धरती और अपने लोग’ (रामविलास जी की आत्मकथा) के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का प्रयास करना चाहिए।

हिंदी प्रदेश का और सारे देश का सांस्कृतिक विकास इस प्रयास की सफलता पर निर्भर है। साहित्य और लेखक की जिम्मेदारी को वह पिछलग्गू नहीं मानते। उनकी स्पष्ट धारणा है कि ‘ऐसा नहीं होता कि समाज के रथ में लेखक पीछे बंधा हुआ हो और उसके पीछे लीक पर घिसरता हुआ चलता है। लेखक सारथी होता है जो लीक देखता हुआ साहित्य की बागडोर संभाले हुए उसे उचित मार्ग पर ले चलता है।’ हिन्दी जाति, हिन्दी संस्कृति की उनकी अवधारणा बिल्कुल मौलिक है। उनका कहना था कि ‘हिन्दी भाषा जनता को अपनी शक्ति पहचानना है। स्वयं संगठित होकर ही वह राष्ट्रीय एकता की अडिग आधारशिला बन सकती है। स्वयं एकताबद्ध होकर, अपना आर्थिक-सांस्कृतिक विकास करते हुए हिंदी प्रदेश समस्त भारतीय गणतंत्र को दृढ़ता और विश्वास से आगे बढ़ा सकता है।’

रामविलास जी का सारा जीवन और लेखन हम सब के लिए प्रकाश स्तम्भ है।

 

पी.के. पांडे <pramodsudarshantvacademy@gmail.com>

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