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सुख-दुख

पत्रकारिता की ‘श्री’ का जाना! 

-शंभूनाथ शुक्ल-

दिल्ली में हिंदी की अखबारी पत्रकारिता की रीढ़ समझे जाने वाले श्रीश मिश्र को विधाता ने हमसे छीन लिया। गुरुवार 29 अक्तूबर को उनका हृदय गति रुकने से निधन हो गया। कुल 67 वर्ष के श्रीश मिश्र किसी भी अख़बार के लिए संकटमोचक थे। खेल और फ़िल्म तो उनके प्रिय विषय थे ही संगीत, फ़िल्म और राजनीति पर भी वे लिख देते थे। इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी दैनिक जनसत्ता के वे आधार स्तम्भ थे। वर्ष 1983 में जब अपन रिटेन टेस्ट और इंटरव्यू क्वालीफ़ाई कर जनसत्ता में उप संपादक के पद पर चुने गए थे। तब ही श्रीश मिश्र भी आए थे। हम दोनों ही उप संपादक थे। वे दिल्ली से थे और मैं कानपुर के दैनिक जागरण को छोड़ कर आया था। 

सबसे दाएँ बैठे हैं श्रीश मिश्र बीच में लेखक तथा बाएँ हैं अम्बरीश कुमार पीछे खड़े हैं राजेश जोशी संजय सिन्हा तथा कुमार आनंद टिकमानी 

मेरे साथ ही राजीव शुक्ला और सत्य प्रकाश त्रिपाठी भी कानपुर से चुने गए। राजीव और मुझे तीन इंक्रीमेंट अधिक मिले तो त्रिपाठी जी को चार क्योंकि वे हम दोनों से सीनियर थे और वय में भी। हम तीनों देश के बहु प्रसारित अख़बार दैनिक जागरण से आए थे। बाक़ी जनसत्ता के संपादकीय विभाग में सब तीन वाले थे। मुज़फ़्फ़र पुर से आए कुमार आनंद टिकमानी को चार इंक्रीमेंट मिले थे। प्रभाष जी का तर्क था, कि वे दूर से आए हैं। किंतु त्रिलोचन जी के पुत्र अमित प्रकाश सिंह को पाँच और इतने ही जेपी के सचिव रहे अशोक कुमार को भी मिले। यहाँ देवप्रिय अवस्थी संपादकीय विभाग में प्रमुख थे। उनका रुतबा प्रभाष जी और बनवारी जी के बाद सबसे अधिक था। जिन्हें शायद दस या बारह इंक्रीमेंट एक्स्ट्रा मिले थे। देवप्रिय जी का जलवा बहुत था और सहायक संपादक, जो विशेष संवाददाता भी थे, तक उनसे डरते थे। ऐसे में उनके समक्ष दो रास्ते थे कि वे चुपचाप कॉपी श्रीश जी को पकड़ा देते। श्रीश जी उसे एडिट करने के बाद देवप्रिय जी के समक्ष रखते और वे उन्हें ओके कर देते। 

श्रीश मिश्र का परिवार मूल रूप से फ़र्रुख़ाबाद का था, किंतु उनके पिता बहुत पहले दिल्ली आकर बस गए थे। वे भी पूर्व में इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी अख़बार जनसत्ता में तब रहे थे, जब आज़ादी के फ़ौरन बाद रामनाथ गोयनका ने इसे शुरू किया था,  और जिसके पहले संपादक कानपुर के वरिष्ठ कांग्रेसी एवं संविधान सभा के सदस्य रहे तिवारी वेंकटेश नारायण थे। उनकी मृत्यु के बाद संपादक बने इंद्र विद्यावाचस्पति, जो स्वामी श्रद्धानंद के पुत्र थे और कट्टर आर्य समाजी। उनकी भाषा बेहद क्लिष्ट होती। कहते हैं, एक बार एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका ने उनसे सरल हिंदी में अख़बार निकलने को कहा, तो इंद्र जी बिफर पड़े। बोले, मैं चाय वालों या नाई की दूकान के लिए अख़बार नहीं निकलता। गोयनका जी ने उसी क्षण हाथ से लिख कर अख़बार में यह छपवा दिया, कि कतिपय कारणों से जनसत्ता का प्रक्शन स्थगित किया जा रहा है। जबकि उस वक्त जनसत्ता की प्रतियाँ एक लाख से ऊपर छपती थीं। 

इसके तीस साल बाद 1983 में जनसत्ता का प्रकाशन फिर उन्हीं राम नाथ गोयनका ने शुरू कराया। तब संपादक हुए प्रभाष जोशी, जो उनके करीबी भी थे और अंग्रेज़ी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली स्थित स्थानीय संपादक भी। उनकी इच्छा थी कि पूरे देश से ऐसे लोगों को संपादकीय टीम में जोड़ा जाए, जिन्हें लोकल भाषा की समझ हो और जिनमें कम्युनिकेशन स्किल अद्भुत हो। इसके लिए उन्होंने आईएएस परीक्षा का स्टैंडर्ड अपनाया।

पहले सात घंटे चलने वाला रिटेन टेस्ट और फिर इंटरव्यू, जिसमें उस समय देश के ख्यातनाम अर्थशास्त्री एलके जैन, पुलिस के आला प्रमुख रहे एमओ राजगोपाल, जस्टिस देसाई और ख़ुद इंडियन एक्सप्रेस के चीफ़ एडिटर जार्ज वर्गीज़ बैठे थे। जिनकी अंग्रेज़ी को फ़ेस कर पाना हिंदी पत्रकारों के लिए आसान नहीं था। पर फिर भी तीस लोग पास हुए। उनमें से मेरे समेत चार लोग कानपुर से थे। ख़ुद देवप्रिय जी, त्रिपाठी जी, राजीव शुक्ला (जो बाद में मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री बने) और मैं। हालाँकि देवप्रिय जी ख़ुद को कानपुर वालों के साथ नहीं जुड़ते थे। वे बहुत पहले कानपुर छोड़ चुके थे। पहले बम्बई में टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ट्रेनिंग ली फिर दिल्ली नवभारत टाइम्स में रहे। किंतु फिर भी जनसत्ता में यह माना जाता था कि कानपुर वाले उनसे गाइड होते हैं। देवप्रिय जी कट्टर गांधीवादी सर्वोदयी टोले के थे। राजीव और सत्य प्रकाश त्रिपाठी कांग्रेस समर्थक और मेरी पृष्ठभूमि वामपंथी मानी जाती थी। 

दूसरे ध्रुव पर थे, हरिशंकर व्यास जो आरएसएस ख़ेमे से थे और लालकृष्ण आडवाणी के करीबी। रामबहादुर राय और समेत अधिकांश संघ ख़ेमे के उप संपादक उनके साथ थे। वे भी जो राजस्थान के थे। इन सब विचारधाराओं और आग्रह-दुराग्रह तथा पूर्वाग्रह से दूर थे श्रीश मिश्र। खाँटी दिल्ली वाले। और वे उन सब खेमेबंद लोगों के बीच कड़ी थे, किंतु उनका ख़ेमा भी ज़बरदस्त था और कालांतर में तो वह सबसे प्रबल हुआ। इसकी वजह पत्रकार अभय कुमार दुबे बताते थे, कि श्रीश जी कमजोर पत्रकारों को कवच देते हैं। श्रीश जी इस पर कहते, देखो भैये! तुम लोग तो यहाँ नहीं तो कहीं और नौकरी पा जाओगे, पर इन बेचारों का क्या होगा। इसलिए हर कमजोर पत्रकार की वे कॉपी ठीक करते, उसका अनुवाद ठीक करते और उसे बढ़ाते भी।

हालाँकि मेरे से उनकी दूरी थी, परंतु जल्द ही प्रभाष जी ने यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश के लिए एक अलग डेस्क बनाकर मेरे साथ प्रदीप पंडित, सुनील शाह, अमरेन्द्र राय, संजय कुमार सिंह, अरिहन जैन, अजय शर्मा और संजय सिन्हा को जोड़ दिया। मेरा एकक्षत्र राज चला। और मैं रोज़ लड़-झगड़ कर लखनऊ से हेमंत शर्मा अथवा पटना से सुरेंद्र किशोर की कॉपी फ़र्स्ट पेज लीड या टॉप बॉटम लगवा देता। इसी तरह स्टार रिपोर्टर आलोक तोमर और मेरठ के अनिल बंसल हम सब को प्रिय थे।  किंतु भोपाल के महेश पांड़े की कॉपी हमारे साथी, ख़ासकर संजय कुमार सिंह और संजय सिन्हा डस्टबिन में फ़ेक देते। पांड़े जी रोज़ श्रीश जी से शिकायत करते। श्रीश जी डस्टबिन से कॉपी उठाते और अपने जरनल पेजों पर लगवा देते। मेरे साथी मुझसे शिकायत करते और रोज़ श्रीश जी से मैं नाराज़गी जताता। लेकिन श्रीश जी कभी उत्तेजित नहीं होते। 

प्रभाष जी के बाद राहुल देव, अच्युतानंद मिश्र तथा ओम थानवी संपादक हुए। तब तक संपादकीय विभाग की वह प्रखरता भी समाप्त हो गई और पारस्परिक हेल-मेल तथा हास-उल्लास व भिड़ंत भी। बाद में मैं पहले चंडीगढ़ संस्करण का संपादक होकर चला गया और फिर कोलकाता। इसके बाद 2003 में मैंने जनसत्ता छोड़ कर अमर उजाला के कानपुर-लखनऊ संस्करण के संपादक का दायित्त्व सँभाला। लेकिन श्रीश जी वही रहे, दिल्ली के स्थानीय संपादक हुए तथा वहीं से अवकाश लिया। 

आज उनके क्रिमेशन में जाने का मन था, किंतु एनजीटी की गुंडई के चलते मुझे एकदम चक्क कंडीशन की अपनी इनोवा कार इटावा ट्रांसफ़र कर देनी पड़ी और मैं नहीं जा सका। श्रीश जी का पारिवारिक जीवन बहुत कष्टप्रद रहा। तीस साल पहले उनकी पत्नी नहीं रही थीं और अपनी दोनों प्यारी बच्चियों का लालन-पोषण उन्होंने ही किया। माँ-बाप और बहन की देख रेख की और हर विषय पर लिखते भी रहे।

वरिष्ठ पत्रकार श्री देवप्रिय अवस्थी ने उन्हें याद करते हुए लिखा है- “जनसत्ता की शुरुआती टीम के बेहतरीन सदस्यों में शुमार श्रीश हरफनमौला पत्रकार थे। खेल और फिल्म संबंधी विषयों पर उन्हें महारत हासिल थी। मुझे याद है कि संजीव कुमार के निधन की खबर आने पर जब मैंने फिल्म पेज के प्रभारी मनमोहन तल्ख से फिल्म का साप्ताहिक पेज संजीव कुमार पर केंद्रित करने को कहा तो उन्होंने यह कहकर हाथ ऊंचे कर दिए कि इस हफ्ते का पेज तैयार हो चुका है। अब नया पेज नहीं बन सकता।  फिर मैंने श्रीश जी से बात की तो वह फौरन एक लेख लिखने को तैयार हो गए। एक लेख संजीव कुमार के प्रशंसक रहे संपादक प्रभाष जोशी जी ने लिखा। फिर तल्ख जी ने कुछ और सामग्री जुटाकर नए सिरे से पेज तैयार किया।

श्रीश जी का चयन इंडिया टुडे (हिंदी) की शुरुआती टीम (१९८६) में हो गया था। इसमें जनसत्ता के अन्य साथी जगदीश उपासने, अशोक कुमार, सुधांशु भूषण मिश्र और अच्छेलाल प्रजापति भी शामिल थे। प्रभाष जी के आग्रह पर  श्रीश जी ने इंडिया टुडे नहीं जाने का फैसला किया। देर से ही सही, उन्हें इस फैसले का लाभ भी मिला और वे जनसत्ता के स्थानीय संपादक बने।

अपने लेखन-संपादन कर्म के साथ उन्हें अपने परिवार में भी कुछ ज्यादा ही जिम्मेदारियां निभानी पड़ीं। उनसे बहुत यादें जुड़ी हैं। ऐसे साथियों-मित्रों का अचानक जाना बहुत अखरता है। नियति के लेखे के  सामने हम सब बेबस हैं।”

पुराने साथी अम्बरीश कुमार लिखते हैं- “वे जनसत्ता के पत्रकारों को न सिर्फ संभालते बल्कि लगातार काम भी करवा लेते थे अपने स्वभाव से। कितनी विचारधारा के लोग थे जनसत्ता मे। गांधीवादी, समाजवादी, वामपंथी और धुर वामपंथी। इनके साथ संघ परिवार का भी एक बड़ा खेमा था। जाहिर है विचारों की टकराहट होती, विवाद होता। पर प्रभाष जोशी का अनुशासन ऐसा कि खबरों पर कोई असर न पड़ने पाए यह ध्यान रखा जाता।

ऐसे में श्रीश जी डेस्क को संभालते थे। जनसत्ता को गढ़ने में डेस्क की बड़ी भूमिका भी थी। बड़े राजनीतिक विवाद का दौर था वह। दरअसल जनसत्ता की डेस्क को लंबे समय तक श्रीश जी ने ही संभाला भले कोई भी न्यूज एडिटर रहा हो। प्रभाष जोशी भी यह बात जानते समझते थे। और बाद के दो तीन संपादक भी। जनसत्ता को बनाने में डेस्क की बड़ी भूमिका थी तो डेस्क को सँभालने में श्रीश जी की बहुत बड़ी भूमिका थी। कोई अहंकार नहीं कोई दुराव नहीं। और आठ दस घंटे तक काम करते रहना। ऐसे पत्रकार बहुत कम होते हैं। बहुत याद आएंगे श्रीश जी!” 

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