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उत्तर प्रदेश

यूपी विधानसभा का कटघरा : राजदीप आये और विधानसभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल आजतक ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोड़ना पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलो ने हंगामा किया था। आजम खां से इस्तीफे तक की मांग हुई थी। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग आपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति में इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लड़ने वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में जर्बदस्त कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ।

वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंजिया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करंजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने करंजिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये।

भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। 70 के दशक में सामाजिक कार्यकर्ता केशव सिंह को तत्कालीन विधायक नरसिंह नारायण पांडे के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के मामले में सदन में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ केशव सिंह हाईकोर्ट से स्टे ले आये, लेकिन सदन ने इस स्टे को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया था कि विधायिका पर हाईकोर्ट का कोई आदेश लागू नहीं होता है। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद केशव को सदन में हाजिर होना पड़ा और उन्हें दंडित भी किया गया। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरे में आकर मांफी मांगनी पड़ी थी।

बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मींडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पूंजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके।आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा,जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये।

आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहाँ खड़ा है,इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में हैं। एनडीटीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। ‘इंडिया टीवी’ के रजत शर्मा अपने को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी है। इसी तरह से जी टीवी वालों के भी भाजपा से अच्छे संबंध हैं। आईबीएन 7 को उद्योगपति मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रानिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।

आज देश में जो माहौल बना हुए है,उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं।

नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। देश का दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया घटिया नेताओं को आगे करके देश का बड़ा नुकसान करने में लगा है। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने के दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट् के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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