फर्जी स्टिंग कराने वाले राजदीप सरदेसाई, आशुतोष और अरुणोदय ने कोर्ट में किया सरेंडर, देखें मौके की तस्वीर

दिनभर अदालत में कस्टडी में रहना पड़ा राजदीप, आशुतोष और अन्य को… गाजियाबाद के पूर्व सीएमओ एवं वर्तमान में नोएडा में सीएमएस के पद पर तैनात डॉक्टर अजय अग्रवाल के खिलाफ फर्जी स्टिंग ऑपरेशन करने एवं उसे समाचार चैनल पर चलाकर अजय अग्रवाल की छवि धूमिल करने एवं मानहानि का चल रहा है मुकदमा…

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राजदीप और आशुतोष की आत्मा जिंदा होती तो इस डाक्टर से माफी मांग चुके होते, देखें वीडियो

डाक्टर अजय अग्रवाल नोएडा के जिला अस्पताल के सीएमएस हैं. घुटना प्रत्यारोपण के फील्ड में देश के जाने माने डाक्टर हैं. हम बताएंगे कि इनकी जिंदगी किस तरह एक न्यूज चैनल ने तबाह कर दी…. Continue reading

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राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, राघव बहल समेत नौ लोगों पर मुकदमा चलाने का रास्ता साफ

एक बड़ी खबर आ रही है. जिन दिनों आईबीएन सेवेन और आईबीएन-सीएनएन नाम से  न्यूज चैनलों का संचालन हुआ करता था और इसकी कमान राघव बहल, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष आदि के हाथों में हुआ करती थी, उन्हीं दिनों एक स्टिंग दिखाया गया, ‘शैतान डाक्टर’ नाम से. Continue reading

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राजदीप चाहते तो प्रणब मुखर्जी से माफी मांगने वाला हिस्सा इंटरव्यू की एडिटिंग के दौरान हटवा सकते थे!

Nitin Thakur : प्रभु चावला का एक प्रोग्राम ‘सीधी बात’ आजतक पर आता था। एक दिन प्रभु चावला ने अपने कोंचनेवाले अंदाज़ में एक नेता को छेड़ दिया। नेताजी ने गरम होकर ऑनएयर ऐसा बहुत कुछ कह डाला जो आगे ख़बर भी बना। अगले दिन एक लड़का दूसरे को कह रहा था- ‘कल तो उस नेता ने प्रभु चावला को चुप ही करा दिया। ऐसी-ऐसी सुनाई कि प्रभु चावला मुंह देखता रह गया..कुछ बोल भी नहीं सका। इन पत्रकारों को तो ऐसे ही सुनानी चाहिए’ दूसरा लड़का चुप खड़ा था। पहले वाला और भी बहुत कुछ बोला।

दूसरे को जवाब ना देता देख मुझे मजबूरन बीच में बोलना पड़ा- ‘बीच में बोलने के लिए माफ करना लेकिन क्या तुम्हें समझ आया कि ये जीत प्रभु चावला की ही थी। लोग एंकर का भाषण सुनने के लिए तो टीवी नहीं देखते। ना एंकर की कोशिश होती है कि वो भाषण दे। एंकर की जीत ही इसमें है कि वो सामनेवाले से ऐसा कुछ बुलवा ले जो वो बोलने से बच रहा हो। नेताजी का योजनाबद्ध संयम तुड़वाना ही प्रभु चावला की कोशिश थी। जब तक वो संयम नहीं टूटा प्रभु चावला सवाल कर रहे थे लेकिन जैसे ही बांध टूटा तो फिर प्रभु चावला का काम हो गया और वो चुप्पी लगाकर सुनते रहे। इसे एंकर की बोलती बंद होना नहीं कहते..बल्कि सामनेवाले की ढोलक फोड़ना कहते हैं’

खैर मुझे जो समझ आया वो ज्ञान दे दिया..बाकी तो सब ज्ञानी हैं ही यहां।

आज ये ज्ञान मुझे देने की ज़रूरत इसलिए भी महसूस हुई क्योंकि दो-एक दिन पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का इंटरव्यू राजदीप सरदेसाई ने लिया। इंटरव्यू के दौरान राजदीप ने प्रणब मुखर्जी को एक जवाब के बीच में टोक कर कुछ पूछ लिया। शायद मुखर्जी अपना जवाब मुकम्मल करना चाहते थे लेकिन अचानक हुई टोकाटाकी से उन्हें हल्का गुस्सा आ गया। पुराना नेता, पकी उम्र और सर्वोच्च पद पर आसीन रहने के मिले जुले रुतबे से मुखर्जी ने जो कुछ कहा उसके बीच राजदीप ने अपनी गलती तुरंत मानी और गरिमापूर्ण ढंग से माफी मांग ली। आगे मुखर्जी ने अपना इंटरव्यू अच्छे से दिया और आखिर में खुद भी राजदीप के प्रति थोड़ा कठोर होने के लिए खेद व्यक्त किया।

बावजूद इसके राजदीप ने मुखर्जी से कहा कि मैं इसे सकारात्मक ढंग से लेता हूं। कुछ पेशेवर ट्रोल्स और मीडिया से नफरत पाल बैठे लोगों ने इसे राजदीप का मज़ाक बनाने में इस्तेमाल किया, जबकि ये सबक पत्रकारिता और राजनीति दोनों के नवागंतुकों के लिए था। समय आ गया है जब नेताओं और पत्रकारों को आपसी सम्मान रीस्टोर करना चाहिए। नेताओं को समझना होगा कि वो सत्ताधारी हैं। आज़ाद पत्रकारिता को सांस मिलती रहे तो ही उनका शासन इतिहास का उजला अध्याय माना जाएगा, और पत्रकारों को समझना पड़ेगा कि उनका काम सवालों का जवाब हासिल करना है ना कि हमलावर मुद्रा में सामने वाले को रौंद डालना। बाकी तो जिन लोगों को ना लोकतंत्र समझना है, ना राजनीति और ना पत्रकारिता ये पोस्ट उनके लिए नहीं है।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

अविनाश विद्रोही सबसे बड़ी बात है राजदीप उस भाग को काट सकते थे क्योंकि वो लाइव नही था बाबजूद उसके उन्होंने उस अंश को लोगो को दिखाने का साहस किया ये भी एक तरह की अच्छी रिपोर्टिंग ही है।

Sanjaya Kumar Singh लेकिन भक्त बेचारे इतना जानते तो भक्त क्यों होते ….

Ayush Dubey Bas ye akal sab Mein hoti to sab samajhdar Na kehlaate.

Nitin Thakur कुछ लोगों को सब समझ है लेकिन जानबूझकर अनजान बनते हैं। उनको जो सिद्ध करना होता है सारा ज़ोर वही सिद्ध करने में लगाते हैं।

Puneet Gaur Pranav Babu has habit of scolding, even now senior Congress leaders mentioned it many times, so but his Rajdeep conduct was good, As far as cutting off the portion is concerned, it’s not possible, whole channels credibility would have been in limbo after that (whatever is left) remember Namo interview with DD

Nitin Thakur हां मुखर्जी का ऐसा स्वभाव भी है लेकिन बावजूद इसके अंत में उनका खेद प्रकट करना उनकी उदारता ही दर्शाता है। उन्हें इसकी भी ज़रूरत नहीं थी। बाकी चैनल के पास कोई क्लिप काट देने का पूरा अधिकार और सुविधा होती है।

रोशन मैं पत्रकारिता का छात्र हूं. ‘हमारा काम सवालों का जवाब हासिल करना है ना कि हमलावर मुद्रा में सामने वाले को रौंद डालना’, यह सबक आजीवन याद रखूंगा।

Kamlesh Rathore राजदीप ने अपनी गलती मानी वही बडी बात है नहीं तो आज कल के बेलगाम एंकर कहाँ सुनते किसी की। दूसरा उसे ऑनएयर किया वो बडी हिम्मत है। (वैसे वो नेता जी कौन थे सीधी बात वाले?)

Nitin Thakur नेता और जिससे कहा जा रहा था कि प्रभु चावला की बोलती बंद हो गई दोनों की पहचान गुप्त है।

Ritu Raj Misra आजाद पत्रकारिता का अर्थ गुलाम इंटरव्यूई नहीं होता . नेता ने अगर कुछ बोल दिया तो वो भी संविधान के दायरे में आता है .

Nitin Thakur कहां लिखा गया कि असंवैधानिक है।

Ritu Raj Misra अगर संवैधानिक है तो किसी भी थर्ड पार्टी का मंतव्य इसे परिवर्तित करने का महज एक दृष्टिकोण भर है . मिडिया अपने स्वतंत्रता के अधिकार का बहुत जिक्र करती है जबकि उसके पास और भी अधिकार हैं और भी कर्त्तव्य . जब हम मीडिया में स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उसका अर्थ लगभग लगभग उच्छ्न्खलता होता है. मीडिया के पास दो चीजें हैं बाज़ार के नियम और एथिक्स. बाज़ार ताकतवर होता है और एथिक्स को रौंद देता है तो बचता है सिर्फ बाज़ार . मीडिया में आतंरिक नियमन के तरीके कमजोर है. मैंने किसी पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होते हुए नहीं देखी गैर-जिम्मेदार खबरों पर . लगभग लगभग सभी संस्थाओं को इन्टरनल डिसिप्लिन के लिए कंडक्ट रूल होते हैं . मैंने नहीं देखा कि उन पर कभी कोई कार्यवाही होती है. क्या मीडिया को खुद आर टी आई के अन्दर नहीं आना चाहिए खुद इतनी बड़ी बड़ी बातें करने वाले बिलकुल अपारदर्शी और कमजोर लोग है . मीडिया अपनी आतंरिक कमियों से ढह रहा है . धीमे धीमे मीडिया शुद्ध रूप से मीडिया ही रह जायेगा वह एक कांच का टुकड़ा या लेंस होगा जिसकी नैतिक अथारटी शून्य होगी.

Nitin Thakur खबरों को लेकर मीडिया अकेला नियम नहीं बनाता है। सरकार के विभागों से उसके पास लगातार नोटिस और नोटिफिकेशन आते रहते हैं। उसके मुताबिक ही खबरें चलती हैं। पूरी तरह सरकार को अधिकार देने में डर यही है कि फिर जो सरकार आएगी वही सारे मीडिया को डीडी की तरह चलाएगी। नेहरू ने एक बार कहा था कि मीडिया थोड़ी गड़बड़ी करे तो भी मैं उसकी आज़ादी के पक्ष में हूं। स्वाभाविक है गड़बड़ी से उनका मतलब तब पेड खबरें चला लेने से नहीं रहा होगा, बल्कि वो खबरों को लेकर ही ऐसा कह रहे होंगे। आज भी ज़िम्मेदार मीडिया संस्थान किसी खबर को यूं ही नहीं चलाते। उनके पास कोई ना कोई आधार होता है। हां खबरों के चयन और एंंगल को एडिटोरियल सेंस पर छोड़ा जाता है जिसे किसी भी तरह की चुनौती देने का सीधा मतलब मीडिया की आज़ादी में दखल ही है। वैसे गलत खबरों पर लीगल नोटिस आते रहते हैं और सबको जवाब देना होता है। हर संस्थान के पास वकीलों की टीम है। लोग नहीं जानते कि मीडिया संस्थान हर दूसरे दिन कहीं ना कहीं किसी खबर पर केस लड़ते हैं। आसाराम, केजरीवाल, निर्मल बाबा के चेलों ने तो सीरीज़ में केस दायर किए थे। लोकतंत्र हैं उनको अधिकार है और उसी अधिकार के तहत ज़िम्मेदार संस्थान केस लड़ रहे हैं। इसके इतर कल-परसों में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हुई छुटपुट वेबसाइट्स की बात अलग है । इनमें बहुत एजेंडा वेबसाइट हैं लेकिन न्यूज़ वेबसाइट्स की तरह बिहेव करती हैं। इन्होंने मीडिया की गिरती साख में और बट्टा लगाया है। हां, आरटीआई में मीडिया को आना चाहिए ये सही है। फंडिंग वगैरह का ब्यौरा जानने का सबको अधिकार होना चाहिए।

Rashid Mohd राजदीप सरदेसाई ख़ुद में एक अच्छी शख्शियत है और एक मंझे हुए पत्रकार है।

Dharamveer Katoch राजदीप जानते हैं कौन सी बोल खेलनी है और कौन सी छोड़नी है,आख़िर दिलीप सरदेसाई जैसे बल्लेबाज के बेटे हैं…अब मालिकों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाचने वाले इस बात को समझेंगे?

Nitin Thakur मुझे पता नहीं लगा कि खेलनी और छोड़नी जैसा इसमें क्या था। सवाल पूछने के लालच में और कई बार काउंटर क्वेश्चन में ओवर लैपिंग होती है। जवाब देने वाले की लय टूट जाती है। माफी मांग कर उन्होंने इंटरव्यू को सीधा सीधा चलने दिया है।

Dharamveer Katoch आज के योद्धा पत्रकार कभी मान सकते हैं कि उन्हें माफ़ी मांग लेनी चाहिये,उन्हें तो मानों दुनियां का अंतिम सत्य हाथ लग गया है!

Nitin Thakur हां ये बड़ी दिक्कत तो है ही।

Anuj Agrawal रविशंकर जी को ये इंटरव्यू देखना चाहिये, और उसके बाद बाजपेयी जी को दिया अपना इंटरव्यू, पुण्य सर के संयम काबिलेतारीफ था उस इंटरव्यू में…

Shamim Uddin Ansari प्रभु चावला कोई अच्छे इंटरव्यू कर्ता नहीं थे। अरशद वारसी ने भी उनकी ख़ूब ख़बर ली थी।

Nitin Thakur अपनी अपनी पसंद है। मैं यहां रेटिंग नहीं दे रहा।

नवनीत कुमार अगर आजकल एडिटिंग होना बंद हो जाये तो कमाल हो जाये! उमर अब्दुल्ला भी एक बार ऐसे ही भड़क गए थे प्रभु जी से। तब काफी छोटे थे हम लोग लेकिन तीन पांच समझने लगे थे। उस समय प्रभु जी ने ऐसी डांट लगाई की अब्दुल्ला एकदम चुप हो गए।

Nitin Thakur चैनल मेजबान होते हैं और दूसरे लोग मेहमान। ऐसे में एंकर्स को विनम्रता बरतनी चाहिए, दूसरी बात ये है कि पत्रकार यूं भी कोई पुलिस वाला नहीं होता कि ज़ोर जबरदस्ती से बुलवा ले.. वो समझदारी से ही जवाब निकलवा सकता है। तीसरी बात ये कि कई पत्रकार नेताओं के मुकाबले बहुत विद्वान होते हैं लेकिन उनका काम अक्सर कई मौकों पर ज्ञान झाड़ना नहीं होता। उमर अब्दुल्ला तो वाकई प्रभु चावला के मुकाबले तब बहुत कम ज्ञान रखते होंगे।

नवनीत कुमार जी बिल्कुल उस समय अब्दुल्ला काफी यंग थे। जबकि प्रभू सर वरिष्ठ थे। और धाकड़ भी थे।

Ashok Pandey ठाकुर साहेब इसे आप चाहे सामने वाले की ढोल फोड़ना कहे या उकसा कर सामने वाले से कुछ कहलवाना , लेकिन एक बात तो सत्य है कि ऐंकर अक्सर अपनी सीमा लाँघ जाते हैं , एक सवाल के जवाब से पहले दूसरा सवाल , वो भी बिलकुल आक्रामक अंदाज में। ऐंकर को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐंकर की ही ढोल फोड़ने को आमादा हो जाते हैं।मुझे राज ठाकरे का इंटरव्यू याद है और उस पत्रकार का चेहरा भी। खैर राजदीप सर देसाई का अंदाज पूर्व राष्ट्रपति के साथ जैसा रहा , कईयों के लिए सबक होगा।

Nitin Thakur मैंने तो खुद ही माना है कि ये पत्रकारों के लिए भी एक सबक है। मैं कौन सा बचाव कर रहा हूं कि आप ये कमेंट लिखने को मजबूर हैं। बाकी रहे राज ठाकरे तो वो गुंडे हैं। उनसे सबको डरना भी चाहिए।

Ashok Pandey ठाकुर साहब मैने ऐसा क्या लिख दिया जो आपको बुरा लग गया ..

Nitin Thakur बुरा लगने के काबिल आपने कुछ नहीं लिखा पांडे जी, मैंने बुरा माना भी नहीं है। मैंने बस इतना भर लिखा है कि मैं आपकी सीमा लांघने की बात से सहमत हूं तभी तो लिखा है कि इससे सबक लेना चाहिए।

Mohammed Saood Khan बहुत उम्दा Nitin Thakur bhai… बस आपकी आखिरी लाइन गलत है.. असल में ये पोस्ट लोकतंत्र और पत्रकारिता ना समझने वालों के लिए ज़्यादा ज़रूरी है 🙂

Prashant Mishra आजकल क्यों ऐसा पेश किया जा रहा कि पत्रकार लोहा ले रहे राजनेताओं से? क्या ये सिर्फ़ TRP के लिए है या पत्रकारों की महत्वाकांक्षा पूरी करने का माध्यम मीडिया हो गया है? मुझे लगता है निष्पक्ष पत्रकारिता के चोले में पत्रकार अपना नैसर्गिक भाव भूल रहे हैं, और राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश करते नजर आ रहे।

Neeraj Rawat ऐसा ही रविश कुमार ने किरन बेदी के साथ किया था और …बेदी जी की सिरी राजनेतिक समझ तार तार हो गई थी ऐसे बहुत से उदाहरण है। …अच्छी पत्रकारिता के..

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राजदीप सरदेसाई को अपमानित कर मुकेश अंबानी ने पूरे चौथे खंभे की औकात बता दी (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : देश के सबसे धनी आदमी मुकेश अंबानी का देश के सबसे वरिष्ठ पत्रकारों में से एक राजदीप सरदेसाई ने इंटरव्यू किया. राजदीप बातचीत की शुरुआत मुकेश को देश के सबसे प्रभावशाली / ताकतवर शख्स के रूप में बताते हुए करते हैं और इस पर प्रतिक्रिया मांगते हैं तो इसका जवाब मुकेश अंबानी बहुत घटिया और अहंकारी तरीके से देता है. मुकेश अंबानी का जवाब और उसका अहंकार देख सुन कर एक समझदार आदमी सिर्फ स्तब्ध ही हो सकता है.

इन बनियों की नजर में पत्रकार और मीडिया की औकात कुछ नहीं होती है, क्योंकि ये पूंजी के बल पर मीडिया मालिकों को ही खरीद लेते हैं या फिर पूरे मीडिया हाउस का अधिग्रहण कर लेते हैं. ऐसे में जाहिर है ये किसी की परवाह क्यों करें, खासकर पत्रकार की. लेकिन ये इतने भद्दे, घृणित, जाहिल, असंस्कारी और उद्दंड हो सकते हैं, इसका अंदाजा कतई नहीं था. इस वीडियो में इंटरव्यू का वो वाला हिस्सा भी है जिसमें राजदीप सरदेसाई को मुकेश अंबानी नीचा दिखाने के लिए ‘मैं आपको सीरियसली नहीं लेता हूं’ टाइप की बात कहता है. वीडियो के शुरू और लास्ट में मेरा थोड़ा-सा भाषण है, क्योंकि वीडियो देखकर मन में भड़ास इकट्ठी हो गई तो सोचा एक नया वीडियो बनाकर इसे निकाल ही दूं.

ध्यान रखें, जो जब बुरा करे, उसे खूब गरियाइए, दौड़ा दौड़ा कर गरियाइए, लेकिन इस वीडियो में तो सिर्फ और सिर्फ मुकेश अंबानी की नीचता व अहंकार दिख रहा है. हां, राजदीप जरूर अपनी शालीनता और पेशे की गरिमा बनाए रखते हैं और बिलकुल रिएक्ट नहीं करते हैं. सच में राजदीप सरदेसाई को सैल्यूट करने का मन करता है. मुकेश अंबानी ने अपनी नीचता इस इंटरव्यू के जरिए दिखा दी है.

वीडियो देखने के लिए लिंक नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=FArsyPA4fHs

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

उरूज बानो Is vedio me volume bahut kam h sir..dono ki batcheet samjh nhi aa rahi

Dushayant Shaarma यशवन्त जी, जो जिस लायक होगा उसी हिसाब से डील होगी. सीधी सी बात है मुकेश अंबानी खरीददार है और राजदीप बिकायु है, अब आप इन दोनों से और क्या उम्मीद कर सकते हैं. इस लिए आप जैसे हैं वैसे ही मस्त रहिये

Yashwant Singh मुकेश अंबानी ने तो मोदी जी को भी खरीद लिया है, जियो का विज्ञापन करते हैं, मतलब मोदी जी भी बिकाऊ हैं?

Yashwant Singh आपको पता होना चाहिए कि आईबीएन7 और सीएनएन आईबीएन जब बिक गया था तो राजदीप वगैरह ही थे जो अंबानी के दबाव को खारिज करके खबरें दिखाते थे जिसके कारण उन्हें चैनल से निकाल दिया गया. किसी को यूं ही बिकाऊ नहीं कहना चाहिए वरना भक्तों दासों की कैटगरी में आएंगे. अंबानी देश के बड़े उद्योगपति हैं, उन्हें देश के एक बड़े पत्रकार का सम्मान करना चाहिए था, भारतीय संस्कार यह सिखाता है. वैसे भी जो पेड़ जितना फलदार होता है, उतना झुकता भी है.

Dushayant Shaarma थोड़ा असहमत हूँ भाई, सिर्फ मोदी का विरोध करने से कोई न्यूट्रल पत्रकार कैसे हो सकता है. पत्रकार वो है जो अच्छी बातों की तारीफ करे और गलत बात का विरोध करे. लेकिन राजदीप उन पत्रकारों की श्रेणी में है जो सिर्फ मोदी विरोध को असली पत्रकारिता समझते हैं. माफ़ कीजियेगा मैं आपसे इस मामले में असहमत हूँ

Manmohan Bhalla जब चैनल न्यूज़ की जगह व्यूज़ दिखाने लगें तो वास्तविकता की सार्थकता लुप्त होने लगती है ।।।।।  लेकिन दुर्भाग्य से यही सब आज की पत्रकारिता का स्वरूप बन चुका है

सुबोध खंडेलवाल पूरे इंटरव्यू में मुझे कही भी मुकेश अंबानी अहंकारी नजर नहीं आए उलटा राजदीप अति उत्साही दिखते रहे। यदि कोई किसी पत्रकार को सीरियसली नहीं लेता तो इसमें मीडिया के अपमान की बात कहाँ से आ गई? आपने एक सवाल किया सामने वाले ने इसका जवाब दिया। अब उसका जवाब कैसा हो क्या ये भी सवाल पूछने वाला तय करेगा यशवंत भाई? और वैसे भी राजदीप का सिर्फ ब्रांड बड़ा है उनका वैचारिक स्तर देखना हो तो राज ठाकरे के इंटरव्यू देख लीजिए। दो साल पहले पूछे गए सवाल दो साल बाद दोहरा रहे थे। दोनों इंटरव्यू में राज ठाकरे गरियाते रहे और राजदीप मिमियाते रहे

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

सुबोध खंडेलवाल गुरु महाराज आप जिस पत्रकार के अपमान की बात कर रहे हो पहले उससे तो पूछ लो उसे अपमान लगा या सम्मान लगा? और अपमान लगा तो खुद अपनी बौद्धिकता से उस पूंजीपति को वही जवाब क्यों नहीं दिया ?

Yashwant Singh सुबोध खंडेलवाल ha ha ha, बात तो सही कही आपने

अविनाश विद्रोही यशवंत भाई एक बात बताओ अम्बानी क्यों न बतमीजी करे देश का सबसे शक्तिशाली यानी प्रधान मंत्री तक उस से पूछ कर फैंसला लेता है लगभग 18 चैनल के करीब उसके अपने है और बाकियों पर उसके विज्ञापन ,किस की इतनी ओकात है आज के समय में जो मुकेश अंबानी के खिलाफ एक भी खबर चलाए या उसके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करे ,अहंकार आना स्वाभविक है ।

Prafulla Nayak इसके लिए ऑफर किसका था।
अम्बानी का या पत्रकार का।
इस पर ही पूरा किस्सा निर्भर है
कि इंटरव्यू देने अम्बानी गये थे या इसके लिए पत्रकार साहब कई महीनों से प्रयासरत थे।
वैसे यह भी याद होगा पीएम् मोदी की पहली यूएस यात्रा के दौरान इनके क्या सवाल थे और जनता का क्या मूड था।
वो वीडियो भी यू ट्यूब पर है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

Prafulla Nayak पर जवाब अधूरा है बॉस

Yashwant Singh स्टैंड लेना सीखिए. वीडियो देखिए. मुकेश अंबानी की हरकत निंदनीय है. बाकी अपने घर का झगड़ा हम लोग लड़ते सुलझाते रहेंगे. अंबानी की साकानाकामाका.

Prafulla Nayak गये यह थे
या या यह इन्हें बुलाया गया था?
स्टैंड अपनी जगह है।
साइड में।

Yashwant Singh गांड़ मराने गए थे. बस. अगर वीडियो देख के समझ नहीं आ रहा कि एक पत्रकार इंटरव्यू ले रहा तो आपसे बतियाना बेकार. बाई द वे, आप पत्रकार हो या नहीं? अगर नहीं हो तो आपको नहीं समझ आएगा.

Prafulla Nayak कौन गया था
अपनी लाल कराने बॉस।
नाराज़ मत होइए।

Yashwant Singh अप्रासंगिक सवाल. पत्रकार एसाइनमेंट पर ही जाता है. आपको अगर बेसिक समझ नहीं है तो क्या बात की जाए.

Prafulla Nayak साहब, हम अनपढ़
आप ज्ञानी
लेकिन बेसिक आप बता नहीं रहे हैं।
One वे।
यातायात।

Ankit Mathur भाई साहब नब्बे प्रतिशत मीडिया हाउस के मालिकाना हक प्राप्त करने के पष्चात अगर एक अदना से पत्रकार को दिये गये साक्षातकार में अहंकार झलका देता है अम्बानी तो क्या गलत करता है! आखिर मालिक है!

Suneet Upadhyay फेसबुक पर अम्बानी की ऐसी तैसी लिखने वालों को भी कौन सीरियस लेता है 🙂

Pawan Kumar Upreti इसमें अंबानी की क्या गलती है यशवंत भाई, जनता के बीच में चौड़ा होकर घूमने वाले पत्रकार नेताओं के तलवे चाटते फिरेंगे, दलाली करेंगे, सिर्फ अपना हित सोचेंगे, चाहे पत्रकारिता में बाकी मर रहे हों, ऐसे में वे अपने संपादक और मालिकानों की गालियां सुनने को अभिशप्त रहेंगे, जैसा लगभग सभी मीडिया संस्थानों में हो रहा है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

Awadhesh Mishra में आपकी बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ यशवंत भाई .. ये आपके बिचार हो सकते है .

सुबोध खंडेलवाल यशवंत भाई ये वो ही राजदीप है जिन्होंने यूपीए सरकार के समय आईबीएन चैनल में कैश फॉर वोट का स्टिंग आपरेशन करके ऐनवक्त पर स्टोरी ड्रॉप कर दी थी। क्यों की थी ये आप भी जानते हो, समझते हो। फिर भी याद दिलाता हूँ यूपीए सरकार ने लेफ्ट की समर्थन वापसी के बाद कुछ भाजपा सांसदों को पैसा देकर सदन से गैर हाजिर रहने का सौदा किया था। भाजपा सांसदों ने इस पूरी पेशकश और सौदेबाजी का स्टिंग ऑपरेशन राजदीप और आशुतोष से करवाया था। ये तय हुआ था कि सदन की कार्रवाई शुरु होने के पहले आईबीएन इसका प्रसारण करेगा लेकिन राजदीप की निष्ठा मीडिया के सिद्धांतों और लोकतंत्र के प्रति नहीं नोट की थैलियों की तरफ झुक गई। चैनल ने स्टिंग दिखाया ही नहीं। फिर सरकार को बेनकाब करने के लिए भाजपा सांसदों ने सदन में उनको दी गई नोटों की गड्डियां लहराई थी। इसके बाद भी आप चाहे तो राजदीप का प्रशंसा गान जारी रख सकते है। मुझे आपसे और आपको मुझसे असहमत होने का पूरा अधिकार है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

सुबोध खंडेलवाल Haahaahaa यदि मैं आपको कह दू कि मैं आपको सीरियसली नहीं लेता तो क्या इसका मतलब ये है कि मैंने आपका अपमान कर दिया ? मतलब ये जरूरी है कि हर आदमी राजदीप को सीरियसली ले ? या ये जरूरी है कि अंबानी उन्हें सीरियसली ले ? आपके लिए महत्वपूर्ण क्या है ? ये कि मुकेश अंबानी उन्हें सीरियसली ले या ये कि वो ईमानदारी से पत्रकारिता करे। राजदीप ने इंटरव्यू की शुरुआत ही तलवे चाटने से की । ये क्यों कहा कि मेरे साथ देश के सबसे पावरफुल व्यक्ति है ? ये कहकर राजदीप ने खुद को छोटा और मुकेश अंबानी को बड़ा दिखाने का अति उत्साह दिखाया । यदि राजदीप में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर और प्रेजेंस ऑफ़ माइंड होता तो वो अंबानी को करारा जवाब दे सकते थे पर वो तो अंबानी के पास बैठकर गदगद हो रहे थे।ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है।

Mahesh Gupta यशवंत जी इसमें किसी की जाति से क्या लेना देना है जो आप जाति पर गालि दे रहे है

Yashwant Singh बनिया जाति को नहीं बल्कि बनियाटिक प्रवृत्ति यानि बनियावाद को गरियाया जा रहा है.

Mahesh Gupta आपने साफ शब्दों मे बनिया जाति का उल्लेख कर उनको बेइज्जत करने का घृणित कार्य किया है

सुबोध खंडेलवाल यशवंत भाई अपनी सृजनात्मकता से व्यापार करने और दूसरों को रोजगार देने वाला हर इंसान बनिया है। चाहे वो रिलायंस वाला मुकेश अंबानी हो या भड़ास वाले यशवंत भाई।

Aanand Singh अम्बानी ने कहा कि वह नहीं मानते कि वह सबसे ताक़तवर हैं। तो इसमें क्या अहंकार है?

Yashwant Singh लगता है कोई आप दूसरा वीडियो देख आए. वह अगर यही कह रहा है तो फिर तो ये पूरी पोस्ट ही बेकार है. धन्य हैं.

Aanand Singh मैंने कहा सुनाई या तो ठीक से नहीं दे रहा है यशवंत जी।

Aanand Singh या तो साफ़ सुनाई नहीं दे रहा! आप मूल बातचीत की यथावत लिंक दीजिए न!

Yashwant Singh उस बातचीत में भी इतना ही है. बाकी तो दूसरे सवालों का सामान्य जवाब है. ताकतवर वाले सवाल के जवाब में अंबानी कह रहा कि मैं तुम्हें सीरियसली नहीं लेता.

Aanand Singh मैंने दोबारा सुना । वह पहले प्रश्न का यह उत्तर देते हैं कि मैं नहीं मानता । और मैं आपको सीरियसली लेता नहीं। इसका अभी फ़िलहाल आशय इतना ही है कि जो बात आप कह रहे हैं उसे नहीं मानता । आपके इस प्रश्न को मैं गंभीर प्रश्न नहीं मान रहा। मेरी धन्यता…

Yogesh Garg पूँजी को सलाम कर रहे है राजदीप फिर कैसा अपमान?

पूजन प्रियदर्शी सीरियसली नहीं लेते तो इंटरव्यू भी नहीं देते।

सुबोध खंडेलवाल गुरु महाराज यशवंत जी आप जिस पत्रकार के अपमान की बात कर रहे हो पहले उससे तो पूछ लो अंबानी की बात उसे अपमानजनक लगी या सम्मानजनक ? और यदि अपमानजनक लगी तो तो खुद अपनी बौद्धिकता और प्रखरता से उस पूंजीपति को वही जवाब क्यों नहीं दिया ? वैसे राजदीप की बॉडी लैंग्वेज तो ऐसी लग रही थी मानो अंबानी के पास बैठकर उन्होंने बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है

Sunil Bajpai ::पत्रकार ::
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते।
बिना सुरा के हम ना रहते
कच्ची भी पा जाते
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -१

ऐसा कोई भ्रष्ट नहीं है।
जो ना मुझको पास बुलाये।
कुत्तों सा दुत्कारे मुझको
लेकिन बोतल रोज दिलाये।।
कसम ईश की खाकर कहते
तलवे चाटे जाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -२

पहले तो हालत खराब थी।
और ना थी पहचान
जबसे पत्रकार कहलाया
आलीशान मकान
इसी लिए तो हम भी जमकर
भ्रष्टों की महिमा गाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -३

ऐसा कोई लाभ नही है
जो है नही उठाया
तलवे चाट चाट कर उनके
लाखों माल कमाया।।
बिना सुन्दरी के सच मानों
हम भी ना सो पाते।।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते- ४

अगर आप से लाभ मिले तो
जो चाहो कर देंगे।
रातों को रंगीन करो तो
मां – बहने भी देंगे – 5

इसीलिए तो सब कुछ पाकर
उढ़े गगन में जाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -७

सुनील बाजपेयी

Thakur Sujan Singh Sikarwar Yashwant Singh bhai rajdeep ka itna paksh lena aap per sak ho raha h…. Rajdeep koi dudh ka dhula nhi h

Surendra Mahto Kushwaha Rajdeep jaise ke kiye shalinta waise hi hai jaise pakistaniyo ke hamdardi….kahe ka shalinta jo khaate india ka hai aur din bhar secular ke aad me india ko aur hindu ko girane ka ek v mouka nhi vhhodate hai…god job Ambani

Maninder Singh Sumit awasthi amish devgan sudhir chowdhry rohit sardana deepak chourasiya mukesh ambani ke puppet hai

Kamal Kumar Singh इसको तो मै भी सीरियसली नहीं लेता,मै कौन सा आमिर या घमण्डु हु।  😀

Yashwant Singh सुधीर चौधरी को सीरियसली लेने वाले राजदीप को क्यों लेंगे? हालांकि मेरा कहना है कि पत्रकारिता को बेहद उदात्तता से देखना चाहिए. कोई भाजपाई विचार का है, कोई कांग्रेसी, तो कोई वामी तो कोई आपिया तो कोई व्यापारी विचार का है तो कोई दलाल टाइप है. राजनीति में जो जो लक्षण दिखते मिलते हैं वो सब मीडिया में भी है, इसलिए किसी एक को पूरा खारिज या पूरा स्वीकार करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए. सबकी अच्छाइयों बुराइयों का तार्किक विश्लेषण करना चाहिए और जिसका जो अच्छा हो उसकी तारीफ, जो बुरा हो उसकी आलोचना की जानी चाहिए.

Kamal Kumar Singh हा हा हा। क्या हुआ सुधीर आपके जमात का नहीं ? वो पत्रकार नहीं ? 😀

Yashwant Singh यही तो कह रहा हूं कि सुधीर के साथ भी अगर मुकेश अंबानी ने ऐसी हरकत की होती तो भी मैं मुकेश अंबानी को गरियाता. बात स्टैंड लेने की है. लेकिन आप बता रहे हैं कि मैं भी राजदीप को सीरियसली नहीं लेता. यह दिखाता है कि आपकी भक्त टाइप सोच में अंबानी ने जो हरकत की वो कुछ नहीं, हां आपके जो पूर्वाग्रह हैं राजदीप के प्रति वो यथावत कायम है, अभिव्यक्त हो रहा है.

Kamal Kumar Singh आप चाहे कितना नाराज हो ले, सच तो ये है स्युडो लोगो का चेहरा बेनकाब होने के बाद कोइ भी उन्हें सीरियसली नहीं लेता। मैं भी नहीं। मै कौनसा अम्बानी का पोंछ हु भैया? :D…हाँ , सिरियस मैं सुधीर को भी नहीं लेता। रोहित सरदाना को जरूर लेता हूँ।

Mahesh Singh यशवंत जी मेरे हिसाब से अम्बानी ने कोई गलती नहीं की और कही से वे अशालीन नहीं दिखे बल्कि मुझे सरदेसाई जी या तो जरुरत से ज्यादा चापलूसी या महिनी करते नजर आये जो एक धूर्त आदमी करता है

Dhyanendra Tripathi यशवंत भाई, आप नि:संदेह एक प्रखर मीडिया विश्लेषक और उसकी निगहबानी करने वाले स्वयंसेवक भी है, पर पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि मुकेश जी इस साक्षात्कार में कहीं से अहंकारी नज़र नहीं आ रहे. हॉं .. राजदीप जी के सवाल पर उनका ये कहना कि वो उन्हे सीरियसली नहीं लेते का निहितार्थ और भावार्थ शायद उनकी निर्दोषिता को इंगित करता है. वो राजदीप जी से ये कहना चाहते हैं कि वो सबसे ताकतवर शख्सीयत नहीं हैं. यह कहने में उनका लहजा जो भी रहा हो उससे आप कुछ भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर इसमें अहंकार वाली बात कतई तौर पर नहीं है. मुकेश जी शायद बातचीत में इतने धूर्त और अभिजात नहीं बन पाये हैं कि उनके जवाब बड़े रेटोरिक हों. हॉं जो देश का सबसे धनवान व्यक्ति है, उसमें कुछ खास और अलग तो होगा ही और वो सामने भी आयेगा. आप एक बार उनसे मिल लीजिये, दावा है कि आप का नजरिया बदल जायेगा.. गरियाने के त्वरित नतीजे पर हर बार पहुंचना न्यायसंगत नहीं भाई..

Mahesh Singh यसवंत जी यदि सरदेसाई जी आपको कहे की you are the father of journalism तो आप क्या उत्तर देगे

Yashwant Singh तो मैं कहूंगा ये आपका अनुचित विश्लेषण है, लेकिन इतनी ज्यादा महानता बख्शने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद 😀

Mahesh Singh निःसंदेह

Nakul Chaturvedi राजदीप में न जाने कौन सी बात ख़ास लगती है आपको.. राजदीप के इंटरव्यू की शुरुआत ही ओछी थी… बाकी का फिर क्या हाल होगा.. इतना समझदारों को समझ आता है..

Yashwant Singh ये इंटरव्यू का तरीका होता है नकुल जी. पता नहीं आप पत्रकार हैं या नहीं. इंटरव्यू का एक तरीका यह होता है कि हलके फुलके सवाल से शुरू करें और गंभीर सवाल की तरफ जाएं. शुरुआत हलके फुलके से इसलिए की जाती है ताकि माहौल टेंस न रहे, इंटरव्यू देने वाला सहज फील करे. बाकी राजदीप का जितना विरोध मैंने किया है, वो आपने न तो पढ़ा होगा न सुना होगा, इसलिए कोई सफाई नहीं दूंगा. सोच तब गड़बड़ होती है जब हम अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से लगातार चीजों को देखते रहते हैं. अगर अंबानी ने ये हरकत सुधीर चौधरी के साथ की होती तो भी मैं इसी तरह से अंबानी को गरियाता क्योंकि मसला मीडिया जैसे चौथे खंभे के प्रतीक किसी वरिष्ठ पत्रकार को पूरी तरह नान सीरियस बताकर पूरे पेशे की गरिमा को खारिज करने का है.

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एक बड़े मंत्री ने दी थी चैनल पर गुजरात दंगों की कवरेज बंद करा देने की धमकी : राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपने पत्रकारिता से जुड़े अनुभवों को एक किताब ‘मोर न्‍यूज इज गुड न्‍यूज’ में बयान किया है। इस किताब में उन्‍होंने एक चौंकाने वाला दावा किया है। सरदेसाई के मुताबिक, उन्‍हें एक हाई प्रोफाइल मिनिस्‍टर ने गुजरात दंगों की कवरेज न करने की धमकी दी थी। ऐसा न करने पर चैनल बंद करवा देने की बात कही थी।

किताब में छपे अंश के मुताबिक, ‘अगर बिग फाइट (टीवी शो) के जरिए एनडीटीवी में मुझे एंकरिंग का अनुभव मिला तो गुजरात 2002 वो वक्‍त है, जो शायद मेरी रिपोर्टिंग का वो पल था जो आज भी याद आता है। इस बारे में काफी कुछ कहा और लिखा जा चुका है। उसमें जोड़ने के लिए बहुत ज्‍यादा कुछ नहीं है सिवाए इसके कि मुझे टीम पर गर्व है, जिसने इस संघर्ष को कवर करने के लिए बेहद मुश्‍क‍िल हालात में काम किया। इस टीम में कैमरापर्सन नरेंद्र और प्रणव, रिपोर्टर संजीव सिंह और नलिन मेहता शामिल थे। मैं और जो कहूंगा वो यही है कि ऐसा कोई दूसरा ऐसा संगठन नहीं है, जहां मैं इतनी आजादी और निर्भीकता से रिपोर्टिंग कर पाता। मुझे याद है कि 2002 में बीजेपी की केंद्र और राज्‍य में सत्‍ता थी। मुझे याद है कि एक हाई प्रोफाइल मंत्री ने मुझे टेलिफोन करके कहा था, ‘अगर तुम दंगा कवर करोगे इसकी कीमत चुकाओगे, राजदीप, हम हमेशा के लिए चैनल पर बैन लगा देंगे।’ मैंने उन्‍हें कहा कि वे इस बारे में रॉय (चैनल के मालिक) को कॉल करें और उनसे बात करें। रॉय ने मुझे एक बार भी कवरेज घटाने के लिए नहीं कहा। उनकी ओर से बस यही संदेश था कि तथ्‍यों पर आधारित बात कहनी है।”

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करारा जवाब मिलने के तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई माफी मांग बैठे!

Shrimant Jainendra : सानिया मिर्जा के ऑटोबायोग्राफी लांचिंग के मौके पर राजदीप सरदेसाई ने उससे पूछा कि आप कब सेटल हो रही हैं? उनका इशारा बच्चे और परिवार की तरफ था। सानिया ने कहा, ‘क्‍या आपको नहीं लगता कि मैं सेटल हूं? आप निराश लग रहे हैं क्‍योंकि मैंने इस वक्‍त मातृत्‍व की जगह दुनिया की नंबर वन बनना चुना। लेकिन मैं आपके सवाल का जवाब जरूर दूंगीं। ये उन सवालों में से एक है, जिसका हम महिलाओं को अक्‍सर सामना करना पड़ता है। दुर्भाग्‍य से यह कोई मायने नहीं रखता कि हमने कितने विंबलडन जीते या नंबर वन बने, हम सेटल नहीं होते। हालांकि, मातृत्‍व और परिवार शुरू करना भी मेरी जिंदगी में होगा। और ऐसा जब होगा तो मैं जरूर बताऊंगी कि मेरी इसे लेकर क्‍या योजना है?’

राजदीप ने तुरंत माफी मांगते हुए कहा, ‘मैं माफी मांगता हूं। मुझे लगता है कि मैंने गलत ढंग से सवाल पूछा। आप पूरी तरह से सही हैं। मैं ऐसा किसी पुरुष एथलीट से कभी नहीं पूछता।’ सानिया ने कहा, ‘मैं बहुत खुश हूं। आप पहले ऐसे जर्नलिस्‍ट हैं, जिसने नेशनल टीवी पर माफी मांगी हो।’ सानिया ने अंत में कहा, ‘मुझे उम्‍मीद है कि आज से कुछ साल बाद एक 29 साल की लड़की से यह नहीं पूछा जाएगा कि वो कब बच्‍चे पैदा करने वाली है जब वो नंबर वन हो।’

श्रीमंत जैनेंद्र की एफबी वॉल पर प्रकाशित इस पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से एक पठनीय कमेंट यूं है…

Suraj Raw इस पुरूषवादी मानसिकता पर मैं यहाँ ज्यादा नहीं लिखना चाहूँगा लेकिन आज की मीडिया में जिस तरह की अराजकता वयाप्त हुई है ; बेशक इसकी प्रतिष्ठा को काफी हद तक धूमिल करेगी। आज बहुत सारे ऐसे पत्रकारों के सवाल पूछने के पीछे जो एक ठसक दिखाई पड़ता है इससे साफ जाहिर होता है कि वो भी कहीं न कहीं खुद को कुछ अतिविशिष्ट मान बैठे हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि दूसरों की गलतियाँ ढूँढते ढूँढते हम अपने आप को लेकर कुंद हो जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया अगर विकास के इसी रफ्तार से चलती रही तो आने वाले कुछ समय में लोग वास्तव में मीडिया को दूसरी दुनिया की चीज मान बैठेंगे।

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यूपी विधानसभा का कटघरा : राजदीप आये और विधानसभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल आजतक ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोड़ना पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलो ने हंगामा किया था। आजम खां से इस्तीफे तक की मांग हुई थी। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग आपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति में इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लड़ने वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में जर्बदस्त कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ।

वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंजिया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करंजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने करंजिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये।

भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। 70 के दशक में सामाजिक कार्यकर्ता केशव सिंह को तत्कालीन विधायक नरसिंह नारायण पांडे के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के मामले में सदन में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ केशव सिंह हाईकोर्ट से स्टे ले आये, लेकिन सदन ने इस स्टे को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया था कि विधायिका पर हाईकोर्ट का कोई आदेश लागू नहीं होता है। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद केशव को सदन में हाजिर होना पड़ा और उन्हें दंडित भी किया गया। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरे में आकर मांफी मांगनी पड़ी थी।

बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मींडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पूंजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके।आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा,जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये।

आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहाँ खड़ा है,इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में हैं। एनडीटीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। ‘इंडिया टीवी’ के रजत शर्मा अपने को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी है। इसी तरह से जी टीवी वालों के भी भाजपा से अच्छे संबंध हैं। आईबीएन 7 को उद्योगपति मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रानिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।

आज देश में जो माहौल बना हुए है,उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं।

नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। देश का दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया घटिया नेताओं को आगे करके देश का बड़ा नुकसान करने में लगा है। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने के दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट् के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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कुछ मीडिया हाउसों पर कारपोरेट्स का दबाव है : राजदीप सरदेसाई

अजमेर : यहां आयोजित साहित्य सम्मेलन के गुफ्तगू सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहा कि मैं नहीं मानता कि पूरी मीडिया बिकी हुई है. ये देश बेइमानों का देश नहीं है. इस देश की अधिकांश जनता ईमानदार है. ईमानदारी के कारण ही देश तरक्की कर रहा है. मीडिया जनता पर निर्भर है, किसी कॉर्पोरेट पर निर्भर नहीं है. हां कुछ मीडिया हाउस में कॉर्पोरेट के कारण समस्या है लेकिन उनका भी समाधान होगा. उन्होंने माना कि कुछ मीडिया हाउस पर कॉर्पोरेट्स का दबाव है.

इस सत्र में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अदिति मेहता के सवालों का जवाब देते हुए सरदेसाई ने कहा कि अब डिजिटल मीडिया की ताकत बढ़ रही है. आम जनता को भी अब सिटीजन जर्नलिस्ट बनना होगा. कार्पोरेट्स और बिल्डर्स मीडिया हाउस बना रहे हैं ताकि वे मीडिया की आड़ में अपने काम निकाल सकें. राजनीतिक दलों ने चुनावों में पेड न्यूज के कैंसर को जन्म दिया है. लेकिन सभी मीडिया हाउस में ऐसा नहीं है. हाल ही में कुछ कॉर्पोरेट्स ने एक ग्रुप बनाया है जो चाहते हैं कि देश का मीडिया पारदर्शिता और ईमानदारी से काम करे.

सरदेसाई ने कहा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया बिजनेस मॉडल बन गया है, जो बिकेगा वो चलेगा. इससे पत्रकारिता की नई परिभाषा बनी है और पत्रकारों की आत्मा को ही समाप्त कर दिया है. विज्ञापनदाता का भी दबाव होता है कि यदि चैनल की टीआरपी ज्यादा होगी तो ही वह विज्ञापन देगा. इसलिए न्यूज चैनल में प्रतिदिन आज का बकरा या आज का मुर्गा कौन तय कर उसे ही दिनभर अलग अलग अंदाज में दिखाया जाता है. ऐसे में दर्शकों को खुद अपने आप से सवाल करना चाहिए कि वे क्या देखना पसंद करेंगे. 

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

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दिल्ली में इन दिनों तीन-चार चैनल सुपारी जर्नलिज्म चला रहे हैं : राजदीप सरदेसाई

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

देश के मीडिया उद्योग में नीरा राडिया से लेकर पीटर और इंद्राणी मुखर्जी तक ने पैसे लगाए निकाले। पत्रकार और राजनीतिज्ञ राजीव शुक्ल (पत्नी भी) मीडिया में हैं।  राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे। कॉरपोरेट की बात करूं तो सहारा से लेकर रिलायंस तक का पैसा मीडिया में है। इनके कारनामे आप सब जानते हैं। 1800 करोड़ रुपए के निवेश पर बीएमडब्लू में 1800 लोगों को नौकरी और अखबार या चैनल पैसे ना होने से बंद हो रहे हैं। कैसे-कैसों के कैसे कैसे चैनल खुल रहे हैं। मीडिया में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन रह रहा है, कौन भागने वाला है, कौन टिकने आया है, कौन पिटने वाला है, कौन भुनाने आया है, कौन जोड़ने, कौन तोड़ने, कौन धंधा करने और कौन कमाने। गंवाने भी कोई आया है क्या। कौन कमा रहा है, कैसे? नहीं कमा रहा है तो क्यो? कोई गंवा भी रहा है क्या। कहां से।

सरकारी विज्ञापनों की 8000 करोड़ रुपए की मलाई कौन और कैसे खा रहा है? कौन ललचा रहा है? किसे अंगूर खट्टे लग रहे हैं – बहुत सारे सवाल और विषय हैं। क्षेत्र तो बहुते बड़ा है। अनुसंधान का। घोटाला घपला का। बहुत मसाला होगा। फिल्म सीरियल, कहानी, उपन्यास, नाटक-नौटकी, कविता के लिए। इसपर कुछ होना चाहिए। कच्चा माल भड़ा पड़ा है। कैसे निकलेगा। दूसरी ओर, प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत एफडीआई की ही अनुमति है। दूसरे कई उद्योगों में 100 प्रतिशत है। मेक इन इंडिया का नारा है। तो विदेशी संस्थान को 100 प्रतिशत निवेश से अखबार निकालने या मीडिया चैनल चलाने की इजाजत क्यों नहीं। कौन मना कर रहा है, विरोध कौन कर रहा है। कोई समर्थक भी है क्या। क्या कारण हैं। ये सब जानने का अधिकार तो हमें है। कुछ सोचो, कुछ करो। देसी मीडिया संस्थानों की दशा इतनी खराब है। फिर भी एफडीआई नहीं। आखिर क्यों? दक्षिण भारत में मीडिया और राजनीति का जो मेल है, पश्चिम भारत में क्या कहने , उत्तरपूर्व में मीडिया की अलग ही दुनिया है। बहुत ही मसालेदार।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल और राजदीप सरदेसाई की ‘आफ दी रिकार्ड’ बातचीत लीक, आप भी देखें वीडियो

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की आफ दी रिकार्ड बातचीत लीक होने का मामला सभी को पता है. अब केजरीवाल और राजदीप सरदेसाई की निजी बातचीत लीक हो गई है. राजदीप सरदेसाई जब केजरीवाल का इंटरव्यू करने के लिए बैठे तो नजीब जंग के मसले पर निजी बात करने लगे. इस दौरान इंटरव्यू की तैयारी के लिए बाकी स्टाफ सक्रिय था. निजी बातचीत के दौरान माइक और कैमरा आन था. नजीब जंग के पाला बदलने को लेकर दोनों लोग दुखी दिखे.

(वीडियो देखने के लिए उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक करें)

केजरीवाल का यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. इस नए वीडियो में राजदीप से केजरीवाल की जो अनाधिकारिक बातचीत है, उसमें राजदीप पूछते हैं केजरी से कि क्या वो बिहार में प्रचार करेंगे. इस पर केजरी कहते हैं कि वह इस सवाल का इंटरव्यू के दौरान जवाब देना चाहेंगे. गौरतलब है कि इसी टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस को ठुल्ला कहकर पुकारा था जिसके बाद दो पुलिस कॉस्टेबलों ने उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया था.

केजरीवाल ने हाल ही में यह साक्षात्कार दिया था जिसमें उन्होंने कई सवालों का जवाब दिया. लेकिन जिस तरह से यह वीडियो लीक हुआ है उसने एक बार फिर से केजरीवाल की मीडियाकर्मियों के साथ नजदीकी सामने आयी है. इससे पहले भी केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें उनकी टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी से बातचीत थी और उस साक्षात्कार में केजरीवाल यह कहते हुए सुने गए थे कि इस बात को थोड़ा बार-बार चला दीजिएग.

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: www.goo.gl/pYmdp9

(नोट- वीडियो फ्लैश फाइल यानि FLV फार्मेट में है इसलिए संभव है कइयों के मोबाइल पर न दिखे. इसलिए इसे आप अपने लैपटाप या कंप्यूटर पर देखें.)

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राजदीप सरदेसाई के खिलाफ मानहानि मामले की कार्यवाही पर सुप्रीम कोर्ट की रोक

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी पंत और न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की पीठ ने वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई  और सात अन्य सहयोगियों की उस याचिका को पहले से ही लंबित मामले के साथ संलग्न कर दी, जिनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 499 (मानहानि) और धारा 500 (मानहानि के लिए सजा) की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। 

आंध्र प्रदेश के हैदराबाद के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं एसआईटी) राजीव त्रिवेदी की कथित रूप से मानहानि किए जाने के मामले मे जारी समन के खिलाफ शीर्ष अदालत द्वारा 15 मई को अपील खारिज होने के बाद टीवी पत्रकार ने इस मुद्दे पर नई याचिका दायर की है। इस मामले में अन्य पत्रकारों में सिद्धार्थ गौतम, स्वाती वशिष्ठ, वीके शशिकुमार, अहमद अली शैक, गुलाब कोठारी, हेमेन्द्र शर्मा और लतीफ मोहम्मद खान शामिल थे।

न्यायालय ने संक्षिप्त सुनवाई के दौरान कहा गया कि अवकाशकालीन पीठ द्वारा उनकी अपील खारिज किए जाने के बाद उन्होंने नई याचिका दायर करने का फैसला किया है। शीर्ष अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत शुरु की गई आपराधिक प्रक्रिया निरस्त करने के लिए दायर याचिकाएं अस्वीकार करने संबंधी आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा था। 

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राजदीप सरदेसाई अपनी किताब इस तरह बेचते हैं…

Virendra Yadav : दिल्ली जाने पर खान मार्किट के बुकसेलर्स ‘बाहरीसंस’ में भरसक जाने की कोशिश करता हूँ. कारण एक पंथ दो काज हो जाता है ,नीचे किताब ऊपर फैब इंडिया का कुर्ता. परसों शाम वहां जाकर किताबें देख ही रहा था कि सामने राजदीप सरदेसाई दीख गए .एक व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए उनसे बातचीत शुरू ही की थी कि उन्होंने कहा कि ‘मेरी किताब आपने पढी की नहीं ?’ और किताब उठाकर उसे थमाते हुए कहा कि ‘पढ़िए जरूर’.

फिर अगले आधे घंटे में जो भी उनसे मुखातिब हुआ हर एक को उन्होंने किताब खरीदने के लिए प्रेरित किया और किताब पर अपने हस्ताक्षर करने के लिए बेचैन दिखे .इस तरह तीन -चार ग्राहक तो उन्हें मिल ही गए …..बाद में दुकान के ही एक कारकून ने बताया कि राजदीप हर तीसरे-चौथे दिन वहां आकर इसी तरह अपनी किताब प्रमोट करते है. …जब स्टार पर्सनालिटी अपनी मार्केटिंग इस तरह करते हों तो बेचारा हिन्दी का लेखक यदि कुछ आत्मविज्ञापन कर ही लेता है तो क्या गलत करता है !

हिंदी साहित्यकार, आलोचक और चिंतक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली में इन दिनों तीन-चार चैनल सुपारी जर्नलिज्म चला रहे हैं : राजदीप सरदेसाई


: चैनलों में रात में नौटंकी चलती है : पत्रकार राजदीप सरदेसाई का कहना है कि दिल्ली में इन दिनों तीन-चार चैनल सुपारी जर्नलिज्म चला रहे हैं। वहां मालिकों के इशारे पर, जो कि सरकार की तरफ देख रहे हैं, आम आदमी पार्टी को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने खुलकर कहा कि रात को चैनलों पर जो नौटंकी हो रही है, उसमें आम आदमी पार्टी पर तो चर्चा होती है, लेकिन उनके प्रतिनिधि को नहीं बुलाया जाता। दिल्ली में आखिर हो क्या रहा है?

चार बाग में हुए सेशन “डीकंस्ट्रक्टिंग चेंज : द इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया” में राजदीप ने समकालीन राजनीति पर खुलकर चर्चा की। चर्चा 2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी के उत्थान और विपक्ष के दर्जे से वंचित कांग्रेस और राहुल गांधी पर केंद्रित रही। पत्रकार मिहिर शर्मा और मधु त्रेहान ने सत्र को रोचक बनाया। राजदीप ने मीडिया के रवैये पर सवाल उठाया। इमरजेंसी के दौर की चर्चा करते हुए कहा कि तब मीडिया पर सेंसरशिप थी, लेकिन अब एक अलग दौर आ गया है, जिन्हें प्रधानमंत्री से सवाल पूछने चाहिए, वे सेल्फी ले रहे हैं। हालांकि इस डाउनफॉल के लिए मीडिया खुद ही जिम्मेदार है।

राजदीप ने कहा कि भारत दिल्ली में नहीं, बल्कि राज्यों की राजधानियों में है। जहां कई मुख्यमंत्री विकास के लिए काम कर रहे हैं। उन्हें समझ में आ गया है कि चुनावों में विकास के मुद्दे से ही जीत हासिल की जा सकती है। मिहिर शर्मा ने सवाल उठाया कि चुनावों में जो वादे किए गए थे, अब युवाओं को रोजगार चाहिए। 13 मिलियन को रोजगार की जरूरत है, जबकि हैं सिर्फ एक मिलियन। अब देखना है पांच साल में क्या होगा?

राजदीप ने कहा कि वे मोदी के चीयरलीडर नहीं हैं, लेकिन मोदी ने जो किया, वह सामने है। उन्होंने इस उम्र में भी सोशल नेटवर्किंग के माध्यम को अपनाया और युवाओं के करीब पहुंचे। इनमें वो 18-23 साल के युवा हैं, जो उदारीकरण के बाद जन्मे हैं और मोदी के 2002 के सबसे बुरे दौर के समय मात्र आठ साल के थे। जबकि राहुल सोशल नेटवर्किंग से दूर हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेसी मित्रों से इस बारे में चर्चा करते हैं, तो जवाब आता है कि राहुल जनता से सीधा सम्पर्क करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि राहुल को यदि कुछ करना है, तो पांच साल के लिए लखनऊ जाएं, वहां सीधे एक-एक व्यक्ति से मिलें और उत्तरप्रदेश में पांच साल में सरकार बनवाकर दिल्ली आएं। मिहिर ने कहा कि केन्द्र सरकार भूमि सुधार बिल लाई, लेकिन कांग्रेस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। उस समय उनके नेता जन्मदिन मना रहे थे, जबकि इस पर गंभीर चि ंतन ही नहीं हुआ। राजदीप ने यहां भी चुटकी ली और कहा कि अब जागीरदारी और जमींदारी प्रथा की तरह पार्टियां नहीं चलेंगी।

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बड़ा संपादक-पत्रकार बनने की शेखर गुप्‍ता और राजदीप सरदेसाई वाली स्टाइल ये है…

Abhishek Srivastava : आइए, एक उदाहरण देखें कि हमारा सभ्‍य समाज आज कैसे गढ़ा जा रहा है। मेरी पसंदीदा पत्रिका The Caravan Magazine में पत्रकार शेखर गुप्‍ता पर एक कवर स्‍टोरी आई है- “CAPITAL REPORTER”. गुप्‍ता की निजी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी, उनकी कामयाबियों और सरमायेदारियों की तमाम कहानियां खुद उनके मुंह और दूसरों के मार्फत इसमें प्रकाशित हैं। इसके बाद scroll.in पर शिवम विज ने दो हिस्‍से में उनका लंबा साक्षात्‍कार भी लिया। बिल्‍कुल बेलौस, दो टूक, कनफ्यूज़न-रहित बातचीत। खुलासों के बावजूद शख्सियत का जश्‍न जैसा कुछ!!!

दूसरा दृष्‍टान्‍त लेते हैं। अभी दो दिन पहले राजदीप सरदेसाई आजतक के ‘एजेंडे’ में अरुण जेटली से रूबरू थे। अमृता धवन ने जेटली से अडानी-मोदी संबंध पर एक सवाल किया जिस पर जेटली उखड़ गए। राजदीप ने टोकते हुए कहा कि पिछले दस साल में अडानी की संपत्ति में बहुत इजाफा हुआ है। इस पर हाजिरजवाब जेटली तड़ से बोले, ”राजदीप, वो तो तुमने भी बहुत पैसा कमाया है।” इस पर राजदीप ने लिटरली दांत चियार दिया। दस सेकंड बाद शायद उन्‍हें लगा कि इसका प्रतिवाद करना चाहिए और वे बोले कि अडानी से उनकी तुलना ना की जाए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

दरअसल, कारवां की प्रोफाइल ने शेखर गुप्‍ता का पोस्‍टमॉर्टम करने के बहाने कुछ बातें स्‍थापित कर दी हैं जो अब तक खुद कहने में ‘कामयाब’ संपादकों को शायद संकोच होता था। पहली बात, कि एक पत्रकार economically liberal और socially liberal एक साथ एक ही समय में हो सकता है (बकौल गुप्‍ता) यानी पत्रकार को पैसे बनाने से गुरेज़ नहीं होना चाहिए बशर्ते वह कर चुकाता हो। दूसरे, हर कोई (सोर्स भी) एक पत्रकार का ‘मित्र’ है। उसका काम इन मित्रों के संभावित समूहों के बीच संतुलन साधना है। तीसरा, पत्रकार का unapologetic होना उसके ग्‍लैमर को बढ़ाता है। उसे अपने किसी भी किए-अनकिए को लेकर खेद/पश्‍चात्‍ताप नहीं होना चाहिए। चौथा, ये तीनों काम करते हुए भी वह जो कर रहा है वह अनिवार्यत: पत्रकारिता ही है और इसका जश्‍न मनाया जाना चाहिए। आर्थिक सुधार के बाद के दौर में बड़ा संपादक-पत्रकार बनने के ये कुछ गुण हैं, जिसका उत्‍कर्ष शेखर गुप्‍ता या राजदीप सरदेसाई हो सकते हैं।

इन स्‍थापनाओं में ‘मूल्‍यबोध’ कहां है? पत्रकार की ‘पॉलिटिक्‍स’ क्‍या है? ये सवाल हवा में ऐसे उड़ा दिए गए हैं गोया इनकी बात करना पिछड़ापन हो। ज़रा पूछ कर देखिए, शेखर गुप्‍ता के लोकेशन से इसका जवाब शायद यह मिले कि तुम काबिल हो तो पैसे क्‍यों नहीं कमाते? गरीब रहने में क्‍या मज़ा है? चूंकि यही लोकेशन अब मुख्‍यधारा में स्‍थापित है या हो रही है, लिहाजा पत्रकारिता के आदर्श शेखर गुप्‍ता ही होंगे। ठीक वैसे ही जैसे साहित्‍य के आदर्श अशोक वाजपेयी होंगे। शेखर गुप्‍ता, अम्‍बानी और राडिया से लटपट करते रहें या अशोक वाजपेयी रमन सिंह से, फिर भी वे अनुकरणीय बने रहेंगे क्‍योंकि पोस्‍ट-रिफॉर्म भारत में यह बात तय की जा चुकी है कि आप सामाजिक बदलावकारी छवि बनाए रखते हुए पैसे बना सकते हैं चूंकि आप ईमानदार करदाता हैं। इसे कहते हैं चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का तो मेरा हइये है। आप इनकी आलोचना कर के देखिए, आपको कूढ़मगज, कनजर्वेटिव, अलोकतांत्रिक, कुंठित, असफल, कुढ़ने वाला, सनातन निंदक करार दिया जाएगा क्‍योंकि ”आपके अंगूर खट्टे हैं।”

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों आजाद पत्रकार के बतौर सोशल मीडिया और वेब माध्यमों पर सक्रिय होकर जनपक्षधर पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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Secular राजदीप सरदेसाई को Communal मनोहर पर्रिकर पर प्यार आ गया!

Dilip C Mandal : सेकुलर और कम्युनल में क्या रखा है? राजदीप सरदेसाई कट्टर Secular गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) हैं और मनोहर पर्रिकर कट्टर Communal गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB). और फिर प्राइड यानी गर्व का क्या है? हो जाता है. राजदीप को पर्रिकर और प्रभु पर गर्व हो जाता है. सारस्वत को सारस्वत पर गर्व हो जाता है. सेकुलर को कम्युनल पर दुलार आ जाता है. वैसे, अलग से लिखने की क्या जरूरत है कि दोनों टैलेंटेड हैं. वह तो स्वयंसिद्ध है. राजदीप भी कोई कम टैलेंटेड नहीं हैं.

सेकुलर को
कम्युनल पर
प्यार आ गया
प्राइड आ गया.

प्यार शाश्वत है,
प्यार सारस्वत है.

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दो चीज़ों का डर नहीं होना चाहिए। एक तो कि कोई हैक कर लेगा। तो क्या? फिर से बना लेंगे और 10 दिन में पढ़ने वाले भी आ जाएँगे। दूसरा डर कि धार्मिक आस्था को चोट वाला कोई मुक़दमा हो गया तो? एक तो होगा नहीं। कौन अपने धार्मिक ग्रंथों की क़ानूनी पड़ताल कराके उनकी फ़ज़ीहत करना चाहेगा? मुक़दमा हुआ तो हम इस बारे में पढ़ेंगे बहुत और बताएँगे भी बहुत। दूसरे, इस धारा में सज़ा होती नहीं। मैंने कभी सुना नहीं। मुझे करेक्ट कीजिए। तो मस्त रहिए। टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र को थैंक यू कहिए। इतने साल में न मेरा हैक हुआ न किसी ने मुक़दमा किया।

xxx

मनुस्मृति और तमाम स्मृतियों के हिसाब से गोडसे जी को तो क्या, उनकी बिरादरी में किसी को भी बड़े से बड़े अपराध के लिए फाँसी नहीं हो सकती थी। मैकॉले जी ने भारत में पहली बार IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना दिया। क़ानून की नज़र में सब बराबर हो गए। समान अपराध के लिए समान दंड लागू हो गया। तो गोडसे जी को फाँसी हो गई मैकॉले जी के विधान से। इसलिए भी मैकॉले जी भारत में विलेन माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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किसी ने मुझे उकसाया और मैं आपा खो बैठा, उसके बाद जो हुआ उसके लिए खेद जताता हूं : राजदीप सरदेसाई

: My statement on Madison Square Garden – Rajdeep Sardesai :

Over the last week, several versions have appeared on an unfortunate incident at Madison Square Garden when Prime Minister was addressing the Indian American community. Through this period, I have chosen to remain mainly silent because I didn’t want to add to the noise that has prevented any rational explanation.

However, I do believe it is important to put events of the day in context. I along with my camera person was outside Madison Square garden about three hours before the prime minister was to arrive. Our aim was to capture the mood, which was joyous and excited.We were able to reflect much of this in our coverage.

I probably took more selfies on a single day than ever before with the crowd. Sadly, a small group of people began to heckle and abuse us. For a long while, I smiled and shrugged this off and even tried to strike up a conversation to ease the tension.

But after a while, the heckling reached a stage where we had to stop the broadcast as the crowd began to push and jostle. I was abused in terribly foul terms, my family was called names and I was kicked in the shins when my back was turned. The pushing and jostling continued even as I tried not to engage. I had gone to the event with hopes of goodwill instead the volley of name calling was unrelenting and shocking to me.My camera person and other witnesses would bear testimony to this.

A few moments later, I saw someone heckle me again and I lost my patience .I uttered an expletive and lunged at the person. It was an unfortunate response and one which I deeply regret. Whatever the provocation, there is no excuse for me to have got into a scuffle.

Over 26 years of journalism, I have endured a variety of situations but have always maintained my dignity and composure. No amount of provocation justifies a physical response.

I do, however, believe that surrounding, heckling and hurling vicious personalized abuse while a journalist is doing a professional job is also unacceptable. We journalists have a challenging job at the best of times and only ask to be allowed to perform our duties unhindered without intimidation.

The freedom of the press is an integral part of our democracy and should be respected by all.

@sardesairajdeep

October 10
2014

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राजदीप जैसे राष्ट्रीय पत्रकार को जनता ने एक झापड़ में अन्तर्राष्ट्रीय बना दिया

बारात  में अक्सर कोई शराबी या बिना पिए ही कोई किसी से लड़ जाए और पिट जाए तो कोई नहीं कहता कि दूल्हे ने पिटवा दिया या उसके बाप ने पिटवा दिया। या दुल्हन ने और उसके बाप ने पिटवा दिया। तो फिर अमेरिका में राजदीप की करतूतों के लिए वह पिट गये तो मोदी इसके लिए कैसे जिम्मेदार हैं? यह आसानी से समझ में आ जाने वाली एक सामान्य सी बात है। और इसके लिए अमेरिका की सरकार जिम्मेदार नहीं है, यह भी कैसे समझ लिया जाए।

राजदीप की करतूतों से देश का मीडिया बदनाम हुआ है। भारत की बदनामी हुयी है। यह आदमी देश के बाहर जाकर अपने ही मुल्क के लोगों से लड़ा, उनसे अभद्रता की और सौ बार पूछा “क्या वह मोदी के लिए वापस भारत लौटेंगे?” हर बार जवाब हां में मिला। इन लोगों ने भारत की तरक्की के अपने सपने बताना चाहे तो इसने पीठ फेर ली। इसने एक बार भी यह नहीं सुनना चाहा कि क्या वे देश की तरक्की के लिए वापस अपने वतन लौटेंगे? इसे इस बात की ज़रा भी खुशी नहीं हुई कि अमेरिका में बसे भारतीय अपने वतन के लिए किस कदर कसक रहे हैं कि वह अपने देश के प्रधानमंत्री को सुनने आये। अमेरिका में रहकर भारत के लिए व्यग्र हैं।

राजदीप सरदेसाइयों की गलत फहमी दूर हुयी है। ये भांडगिरी पर पत्रकारिता की मुहर ठोकते रहे। और अब इस गलतफहमी में जी रहे थे कि अमेरिका में बसे भारतीय इनके चैनल पर दिखने के लिए जो यह बोलेंगे वही वह भी बोलेंगे! बेवकूफ ये हैं, जनता नहीं। और अपने देश का चौथा खम्भा कहलाने वाले मीडिया में महज दलाली करने को बेवजह घुस आये लोग अपने ही मुल्क के खिलाफ लोगों को भड़काने में लगे हैं? यह वही लोग हैं जो यह कह रहे हैं कि ओबामा ने मोदी को भाव नहीं दिया। यही वे लोग हैं जो यह अमरीका की सड़कों  सरेआम भारतीयों को उसकी सरकार के खिलाफ भड़का रहे हैं। तो सवाल यह भी उठना वाजिब है कि इन्हें अमरीका का वीजा क्या भरत के खिलाफ भारतीयों को बरगलाने के लिए मिला? यह देश द्रोह से कम नहीं है और देश मीडिया से बहुत बड़ा है।

पिछले 70 सालों में देश की युवा शक्ति ने देश से निराश होकर अपने भविष्य के लिए भारत में अपनी सम्पत्ति बेच कर भी पढ़ाई की और अमेरिका जैसे देशों में जाकर नौकरी करने लगे, कभी वापस न लौटने की शपथ लेकर। अब उनसे देश का मीडिया यह पूछे क्या वह मोदी के लिए भारत आएंगे? और उसका जवाब भी हाँ में सौ मिल जाने के बाद भी यही सवाल बार बार पूछा जाए तो किसे गुस्सा नहीं आएगा और कौन यह नहीं सोचेगा कि सामने वाला दिल दिमाग से कितना दुरस्त है, यही परखा जाए? पूरे अमेरिका ने अपने देश की सड़कों पर भारत के मीडिया का सामन्य ज्ञान देखा! उसकी प्रतिभा और नामचीन (पत्रकारिता या भांडगीरी) हो चुके लोगों की अपने देश के प्रति चिंता देखी। उनके लक्ष्य देखे। उनके चिंतन के विषय देखे। उनकी देश भक्ति देखी। राष्ट्र की बात तो उनके चिंतन में ही नहीं है।

इसमें मोदी का क्या हाथ है? भाजपा का क्या हाथ है? ओबामा हाथ क्यों नहीं है?

भारत के बाहर जाकर भारत को उसके प्रधानमंत्री को बुरा भला कहना और कहलवाना क्या देश द्रोह नहीं है? और जब किसी को गुस्सा आये तो मोदी मोदी–हाय पत्रकार पत्रकार। इन जैसे लोगों की ही वजह से आज देश में पत्रकार बदनाम है। और जब जब पत्रकारों पर सत्ता या उसके दलालों ने हमले किये तब ये राष्ट्रीय पत्रकार बने रहे और आज इन्हें आम जनता ने एक झापड़ में अन्तराष्ट्रीय बना दिया।

शाबास भारत!!

 

आशीष अग्रवाल। asheesh_agr64@yahoo.co.in

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मार खाएं, घाटा हो जाए, फंस जाएं, सरकार बकाया निकाल दे तो पत्रकार हो जाएंगे

(File Photo Sanjay Kumar Singh)

Sanjaya Kumar Singh : कई मित्रों ने कहा कि राजदीप सरदेसाई की पिटाई पर मैंने नहीं लिखा। साथी Sumant ने कहा है, “…. हमारी खामोशी भी पत्रकारिता के गिरते स्तर की गुनहगार है संजय भाई …..।” सुमंत से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। कैश फॉर वोट स्कैम और उसकी लापता सीडी का मामला आपको याद होगा। एक मामला मैं और याद दिलाता हूं। हर्षद मेहता ने एक कॉलम लिखना शुरू किया था और उसका हिन्दी अनुवाद मुझे हिन्दी के अखबारों में छपवाना था। उस समय कई संपादकों ने कहा था कि हर्षद मेहता का कॉलम नहीं छापेंगे। हर्षद मेहता होते तो आज अखबार या चैनल भी चला रहे होते और वो संपादक उनकी नौकरी बजा रहे होते। पर वो अलग मुद्दा है। उस समय इतनी नैतिकता तो थी इनमें।

पर अब? मुझे सुभाष गोयल उर्फ सुभाष चंद्रा याद आते हैं। सुना है अपने चैनल पर लोगों को उद्यम चलाना सीखा रहे हैं। ये कैसे पत्रकार? धंधेबाज हैं। पैसे कमाना लक्ष्य है। मार खाएं, घाटा हो जाए, फंस जाएं, सरकार बकाया निकाल दे तो पत्रकार हो जाएंगे। ऐसे पत्रकारों को मैं पत्रकार नहीं मानता। उनकी पिटाई को पत्रकार की पिटाई नहीं मानता। वैसे भी खिलाड़ी पिता का पत्रकार बेटा राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता की एक दुकान खड़ी करके उसे 4000 करोड़ रुपए में बेच चुका है। 4000 करोड़ रुपए का मालिक बनने के लिए उसने पत्रकारिता के साथ-साथ तमाम हथकंडे अपनाए होंगे। ऐसे को दुनिया पत्रकार माने तो माने मैं नहीं मानता। ऐसे लोगों की पिटाई के कई कारण हो सकते हैं, भले ही प्रत्यक्ष तौर पर पत्रकारिता दिखाई दे। रामनाथ गोयनका को पत्रकार माना जा सकता है पर राजदीप सरदेसाई और रजत शर्मा को पत्रकार मानना मुझे नहीं जम रहा। अब तो सुभाष गोयल भी पत्रकार हैं – सरकारी मान्यता से लेकर दिल्ली में बंगला झटक लें तो हम-आप क्या कर लेंगे। पर ये ऐसे पत्रकार हैं जो पत्रकारिता के साथ सारे धंधे करेंगे और पिटेंगे तो पत्रकार हो जाएंगे।

जनसत्ता अखबार में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. 


(File Photo Mukesh Yadav)

Mukesh Yadav :राजदीप मारपीट प्रकरण में अब दूसरे पक्ष का विडियो सामने आया है! अगर पहला विडियो राजदीप द्वारा प्रायोजित था तो दूसरा सुब्रामण्यम स्वामी (बीजेपी) द्वारा प्रायोजित नहीं होगा इस बात की क्या गारंटी है? गौरतलब है कि दोनो ही विडियो बस कुछ सेकंड के हैं! एक में राजदीप पर हमला होते हुए दिख रहा है तो दूसरे विडियो में राजदीप खुद हमलावर है! आखिर इस पूरे सिलसिले को समेटता हुआ मास्टर विडियो कहाँ है? बेशक इस मामले में अब थर्ड पार्टी इन्वेस्टीगेशन होना ही चाहिए, तब तक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी…जो भी दोषी होगा मेरी तरफ से उसकी एडवांस में निंदा।

जो मित्र ‘दूसरे विडियो’ में राजदीप को आक्रामक मुद्रा में देख निष्कर्षत: उसे विलेन घोषित कर चुके हैं, वे जल्दबाजी में संभवत: अर्ध सत्य ही देख पा रहे हैं! उन्हें कुछ दूसरे विडियो खोजकर देखने चाहिए। इनमें एकदम साफ नजर आ रहा कि आरएसएस के स्वयं सेवकों ने किस कदर राजदीप की घेराबंदी की हुई है और लगातार अपमानित कर रहे हैं! अगर आप मुझसे सहमत नहीं हो तो क्या बोलने नहीं दोगे? सवाल नहीं पूछने दोगे? रिपोर्टिंग नहीं करने दोगे? उलटे लांछन लगाओगे?…तुम्हारी ऐस्सी की तैस्स..! बस यही हुआ था। राजदीप का दोष सिर्फ इतना है कि – ही जस्ट गेट प्रोवोक्ड बाय दोज फासिस्ट्स! मैडिसन स्क्वायर में हुई इस घटना के माध्यम से आरएसएस ने न्यूज़ मीडिया को साफ़ सन्देश दे दिया है- या तो आप हमारे और हमारी सरकार के साथ हैं या फिर आप कहीं नहीं हैं! और आपके साथ भी वही किया जाएगा, जो तुम्हारे इस बंधु (राजदीप) के साथ हुआ है!…समझे की नहीं!

मीडिया से जुड़े रहे पत्रकार मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

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सरदेसाई के साथ घटनाक्रम से मोदी हुए विचलित, अडानी ने राजदीप तक पीएम का संदेश पहुंचाया

रेडिफ डाट काम ने एक बड़ी खबर फ्लैश की है. इसके मुताबिक राजदीप सरदेसाई के साथ जो कुछ हुआ उससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काफी विचलित हुए. मोदी के मित्र उद्योगपति अडानी ने राजदीप को बुलाकर पीएम का निजी संदेश उन तक पहुंचाया. अडानी ने राजदीप सरदेसाई को बताया कि उनके साथ जो कुछ हुआ है, उससे प्रधानमंत्री काफी अपसेट हैं.  पूरी खबर इस प्रकार है…

Modi upset over attack on Rajdeep Sardesai

Modi’s friend, billionaire Gautam Adani, called Sardesai and delivered a personal message from the prime minister.

Prime Minister Narendra Modi has kept silent over rowdy elements within his Bharatiya Janata Party, and among his fans. But Sunday’s incident at the Madison Square Garden in New York when journalist Rajdeep Sardesai was abused and manhandled, forced the prime minister to react.

Modi’s friend, billionaire Gautam Adani, called Sardesai and delivered a personal message from the prime minister, stating that Modi was upset over the incident. Sardesai was abused by a small group of Modi fans and then manhandled moments before the grand event to honour the prime minister commenced at the Madison Square Garden.

Sardesai recently joined Headlines Today as a consultant editor after parting ways with CNN-IBN. Things were fine initially. Those who recognised Sardesai took scores of selfies with the television celebrity near New York’s Penn station.

Suddenly, Sardesai was hit on the back by someone to which he objected. A small group of people then started abusing him and reportedly told him that he should migrate to Pakistan along with his wife, journalist Sagarika Ghose and his children.

Sardesai objected strongly to this, especially when his children were abused. He took on the guy threatening him. Unfortunately, the man who hit Rajdeep was not shot on camera, but subsequent events have been recorded.

Many believe it is time Modi speaks out against such incidents where over-enthusiastic fans have gone berserk.

In recent months, Haryana Chief Minister Bhupinder Singh Hooda and then Maharashtra chief minister Prithviraj Chauhan were hooted in the prime minister’s prsence.

A small group of people, some of them dressed in saffron, started yelling at journalist Rajdeep Sardesai outside the Madison Square Garden, the venue of Prime Minister Narendra Modi’s community reception on Sunday morning as he stood there with his television crew.

Sardesai, who was standing close to the entrance of the Madison Square Garden, was also pushed around by some people before others intervened.

It was not clear what triggered off the incident. “The prime minister will not be very happy when he comes to know about what you guys are doing today. I am an Indian too and here to cover our prime minister’s visit,” Sardesai told the people trying to rough him up.

“I think these people still hold a grudge over my reporting after the 2002 riots,” Sardesai told this correspondent who was present at the scene.

Some presumably Modi supporters also made disparaging remarks about a group of protestors gathered under the banner Alliance for Justice and Accountability opposite the main entrance of the Madison Square Garden on Seventh Avenue.

Holding banners and buntings, the AJA raised anti-Modi slogans, protesting his alleged divisive agenda.

“The humans are standing on this side of the street and the dogs are on the other side,” one person was overheard as saying.

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संघियों की बेहूदगी और नग्नता का विरोध करने पर राजदीप ने कीमत चुकाई!

Vasudev Sharma : हमें तो उस वक्त ही लग गया था कि राजदीपजी की पिटाई होने वाली है, जब वे उन दो बच्चियों से बातचीत करने की कोशिश कर रहे थे, जो मोदी के लिए लगाए जाने वाले हिंदुत्व के नारों का विरोध कर रही थीं। जब राजदीप ने एक बच्ची से मोदी-मोदी के शोर में विरोध का कारण पूछा, तब उस बच्ची ने कहा था कि हम इनकी इसी बेहूदगी का विरोध कर रहे हैं। मेडिसन स्केवर गार्डन से राजदीप ने उन तीन स्वरों को सुनाया जो आरएसएस के स्वयंसेवकों की बेहूदगी और नग्नता का विरोध कर रहे थे, ऐसे में उन्हें इसकी जो कीमत चुकानी थी, वह चुकाई।

वैसे मेडिसन स्केवर गार्डन के आस-पास विरोध प्रदर्शन करने वाले भारतीयों की संख्या भी पर्याप्त थी, जिसे दिखाया नहीं गया। शायद राजदीप उसे दिखाने की कोशिश करते, वैसे ऐसा नहीं कर पाएं, इसीलिए भी उनके साथ हाथा-पाई जरूरी थी। मेडिसन स्केवर गार्डन में भक्तों का उन्माद चरम पर था, लोकसभा चुनावों के समय आमसभाओं के दौरान मोदी-मोदी की जो आवाजें सुनाई देती थीं, वे मेडिसन गार्डन में भी सुनाई दे रही थीं। मेडिसन स्केवर गार्डन का नाजारा एक बात तो साबित करता है कि संघ अपने स्वयंसेवकों को उन्मादित करने में सफल रहा है। अमरीका में राजदीप के साथ जो कुछ भी हुआ, उसे उन्माद के आतंकवाद में बदलने की शुरूआत भी कह सकते हैं, यह शुरूआत अमरीका से हुई है, उसी अमरीका से जिसने ओसामा बिन लादेन को पैदा किया था। मेडिसन स्केवर गार्डन का उन्माद भारत को पाकिस्तान के करीब न पहुंचा दे, यह सोचकर चिंता भी होती है और डर भी लगता है।

राज एक्सप्रेस अखबार के छिंदवाड़ा ब्यूरो चीफ वासुदेव शर्मा के फेसबुक वॉल से.

Nadim S. Akhter : हां-हां, गलती राजदीप की थी भक्तगणों, तो….और क्या-क्या करना है राजदीप के साथ?? एक पत्रकार को भक्तगण भूखे भेड़ियों की तरह घेर लेंगे. उन्हें पता नहीं क्या-क्या कहेंगे (जो वीडियो में नहीं दिखाई-सुनाई दे रहा है, बहस काफी देर से हो रही है). फिर हूटिंग करेंगे. पत्रकार की बखिया उधेड़ेंगे, उसे भला-बुरा कहेंगे, उसकी पैंट उतारेंगे और उसके जीवनभर की कमाई को ये कहके दांव पर लगा देंगे कि तुम तो पक्षपाती हो. अगर नहीं हो, मेरे आराध्य, मेरे देव के बारे में सवाल मत पूछो. ऐसा मत बोलो. वैसा मत बोलो. देख नहीं रहे, कितनी भीड़ जमा है? तुम्हें सच नहीं दिखता क्या? कैसे पत्रकार हो यार? पक्षपाती कहीं के. हमारे आराध्य सबकुछ बदलकर रख देंगे. तुम अपना विश्लेषण और अपना Objective point of view अपने पास रखो. ये ज्ञान हिन्दुस्तान में अपने चैनल के स्टूडियो में बैठकर बघारना. यहां नहीं. यहां हम हैं.

हमारे आराध्य के बारे में एक सवाल भी हमें गंवारा नहीं. चलिए, भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वालों के अल्पज्ञान पर क्या रोष जताना और क्या गम गीला करना!! जो आज तक ये नहीं समझ पाए कि मर्यादापुरुषोत्तम राम ने एक मामूली धोबी के कथन पर अपने जीवन का इतना बड़ा फैसला लिया कि अपनी पत्नी को अकेले वनवास को भेज दिया. राम राजा थे. सबके प्यारे थे. चाहते तो धोबी को कठोर से कठोर दंड देते. ऐसा दंड कि फिर कभी कोई माता सीता के बारे में ऐसे शब्द बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. लेकिन भगवान राम सहनशील थे. प्रजा की आलोचना और उनके कटु वचनों को भी वो सीने से लगाने का माद्दा रखते थे. एक आम धोबी की बात को उन्होंने इतनी गंभीरता से लिया कि उनके जीवन की पूरी कहानी ही बदल गई. लेकिन यहां भक्तगण अपने आराध्य के बारे में कुछ कटु नहीं सुनना चाहते. शांति से उसका जवाब नहीं देना चाहते. वे पत्रकार को भीड़ में एक जोकर और एक तमाशाई बना देना चाहते हैं. उसके आत्मसम्मान को अंदर तक भेद देना चाहते हैं. वे पत्रकार से भिड़ जाएंगे लेकिन संयम नहीं बरतेंगे. पत्रकार से अपेक्षा ये है कि वो उनकी गालियों को सुनकर, अपमान का घूंट पीकर, हूटिंग को बर्दाश्त करके चुपचाप वहां से कट ले. उन्हें जवाब ना दे. उनका प्रतिकार ना करे. और ये अपेक्षा भी कि पत्रकार, इंसान नहीं होते. उनमें भावनाएं नहीं होतीं.सिर्फ आपमें और हममें होती हैं. वाह रे लोकतंत्र. वाह रे लॉजिक. वाह रे प्रोपगंडा. वाह रे भक्तगणों.!!!! https://www.facebook.com/video.php?v=477128325760154

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


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राजदीप हाथापाई प्रकरण को पत्रकारिता या फ्री स्पीच पर संकट मानते हैं तो आप इसकी आड़ में गिरोहबाजी कर रहे हैं

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राजदीप हाथापाई प्रकरण को पत्रकारिता या फ्री स्पीच पर संकट मानते हैं तो आप इसकी आड़ में गिरोहबाजी कर रहे हैं

Abhishek Parashar: राजदीप सरदेसाई ने गाली दी और जब पलट कर गाली मिली तो उन्होंने धक्का मुक्की की शुरुआत की. प्रेस क्लब में भी सरदेसाई के साथ पत्रकारों ने धक्का मुक्की की थी तब राजदीप या सागरिका, मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा, पर इन दोनों में किसी एक ने कहा था कि पत्रकारों में ‘हैव्स’ और ‘हैव्स नॉट’ की एक जमात है और ‘हैव्स नॉट’ ही उन्हें टारगेट करते हैं. सरदेसाई दंपति ने इस मामले को बेहद शातिराना तरीके से एक गलत मोड़ दे दिया था. अमेरिका में जिसने भी राजदीप को पलट कर गाली दी वह ‘हैव्स नॉट’ की श्रेणी में तो कतई नहीं आता है. तो मैडम सागरिका या राजदीप सरदेसाई या फिर उनके समर्थकों को यह बात समझ में आ जानी चाहिए कि थप्पड़ मारने वाला या आलोचना करने वाले हमेशा ‘हैव्स नॉट’ नहीं होता है.

अगर आपको लगता है कि राजदीप के साथ हुई बदतमीजी से पत्रकारिता या फ्री स्पीच पर संकट आ गया है तो आप इसकी आड़ में गिरोहबाजी कर रहे हैं. यह बात साफ साफ समझ लेने की जरूरत है कि मोदी को अमेरिका में जो लोग भी सुनने गए थे वह न तो भारत की तरह ट्रक या टेंपो में भेड़ बकरी की तरह ठूंस कर लाए गए लोग थे और नहीं वह बीजेपी के कैडर थे. मोदी विदेशों में रहने वाले भारतीयों में क्यों पॉपुलर है इसका अंदाजा आपको लगाने के लिए आपको बाहर जाना होगा और अगर इसके लिए फिलहाल पैसे नहीं हैं तो फिर वहां जो रह रहे हैं उनसे उनके भारतीय होने के मायने मतलब समझने होंगे. फिर आपको पता चलेगा कि मनमोहन बनाम मोदी का फर्क उनकी पहचान को कैसे पुख्ता करता है. बहरहाल मामला राजदीप का था तो यह उतनी बड़ी बात नहीं है जिसको लेकर इतना स्यापा किया जाए. यह सब होता रहता है. अगर किसी को राजदीप को पीटना होता तो उसके लिए अमेरिका जाने तक का इंतजार नहीं करना होता. चूंकि आपके पास टाइम है और गिरोहबाजी की आदत है तो आप पत्रकारिता की स्वतंत्रता बनाम फासीवाद का छद्म डिबेट शुरू करेंगे. जिस दिन आईबीएन से छंटनी हुई थी उस दिन आपको फ्री स्पीच पर कोई संकट नहीं दिखा था. छंटनी से तो सारे फंडामेंटल्स मजबूत हुए थे न उस दिन ? और वहीं फंडामेंटल्स आज आपको बिखरते नजर आ रहे हैं. दोगली बात करते हैं आप. सरदेसाई को पत्रकारिता या फ्री स्पीच का पर्याय बनाने की शातिराना हरकत मत कीजिए.

पत्रकार अभिषेक पराशर के फेसबुक वॉल से.

Awadhesh Kumar : राजदीप का व्यवहार गुंडों जैसा… राजदीप सरदेसाई ने जो किया वह किसी भी पत्रकार के लिए शर्म का विषय है। किसी भी परिस्थिति में पत्रकार उतनी गंदी गालियां दें, मारपीट पर उतारु हो जाए यह स्वीकार्य नहीं हो सकता। एसहोल का शाब्दिक अर्थ ऐसा है जिसे लिखना तक मुश्किल हो रहा है। मलद्वार के छिद्र के भाग को ऐसहोल मान लिया जाए तो कह रहे थे कि तुम्हारे गांड के छेद पर मारुंगा। मैं जीवन में पहली बार यह शब्द लिख रहा हूं। लिखते हुए शर्मींदगी हो रही है। जीवन में कभी बोला भी नहीं। उसके बाद उन्होने जो कहा उसका अर्थ यही था कि तुमने धन कमा लिये लेकिन रहे गंवार के गंवार। फिर गुस्से में धकेलना….। ये तो गुंडागर्दी सदृश कार्य है। पत्रकारिता कर्म में हमने न जाने कितनी बार लोगों के गुस्से झेले हैं, गालियां सुनी हैं, विरोध का सामना किया है। पर कभी आपा नहीं खोया।

कई बार लोगों को शालीन तरीके से हैण्डल करना पड़ता है। रैलियों में ऐसा होता है, पर हम कभी ऐसा नहीं करते। नरेन्द्र मोदी को लेकर उत्साहित समूह कई बार ज्यादा विरोध और अभद्र हरकत कर बैठता है, पर उससे निपटने का तरीका ये नहीं है। हंसते हुए बात करंे तो उनका सहयोग भी मिलता है। वहां तो केवल उनके कुछ प्रश्न पर मोदी समर्थकों ने आपत्ति उठाई थी कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो? जब वे न माने तो मोदी मोदी का नारा लगने लगा। उस समय बचने की आवश्यकता थी। कोई जरुरी था कि आप 2002 के दंगे, वीजा का मामला, कोर्ट का सम्मन, वहां होने वाले एनजीओ के तथाकथित विरोध पर वहीं प्रश्न पूछे हीं? अमेरिका की धरती पर वहां के किसी प्रवासी भारतीय को गांड पर मारने की बात करते हैं और दूसरे को सभ्य नहीं होने की का प्रमाण पत्र देते हैं। असभ्य तो आप है। आखिर इससे बड़ी असभ्यता क्या हो सकती है? यह गुंडागर्दी ही कहा जाएगा। क्षमा करना दोस्तों मुझे स्पष्ट करने के लिए एक अश्लील शब्द प्रयोग करना पड़ा जो न मैं करता हूं न किसी को अपने वाल पर अनुमति देता हूं।

पत्रकार अवधेश कुमार के फेसबुक वॉल से.


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राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने अपने दाग और जी न्यूज के पाप धोने में जुटे सुधीर चौधरी

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राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने अपने दाग और जी न्यूज के पाप धोने में जुटे सुधीर चौधरी

सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को… जी न्यूज पर पत्रकारिता की रक्षा के बहाने हाथापाई प्रकरण को मुद्दा बनाकर राजदीप सरदेसाई को घंटे भर तक पाठ पढ़ाते सुधीर चौधरी को देख यही मुंह से निकल गया.. सोचा, फेसबुक पर लिखूंगा. लेकिन जब फेसबुक पर आया तो देखा धरती वीरों से खाली नहीं है. युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने सुधीर चौधरी की असलियत बताते हुए दे दनादन पोस्टें लिख मारी हैं. विनीत की सारी पोस्ट्स इकट्ठी कर भड़ास पर प्रकाशित कर दिया. ये लिंक http://goo.gl/7i2JRy देखें. ट्विटर पर पहुंचा तो देखा राजदीप ने सुधीर चौधरी पर सिर्फ दो लाइनें लिख कर तगड़ा पलटवार किया हुआ है. राजदीप ने रिश्वत मांगने पर जेल की हवा खाने वाला संपादक और सुपारी पत्रकार जैसे तमगों से सुधीर चौधरी को नवाजा था..

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया द्वारा जिंदल समूह के नवीन जिंदल से कोल ब्लाक धांधली प्रकरण की खबर रोकने के एवज में करोड़ों रुपये मांगने से संबंंधित स्टिंग की खबर को सबसे पहले भड़ास ने पब्लिश किया था (देखें http://goo.gl/x5y9Bz ) . उसके बाद इंडियन एक्सप्रेस समेत दूसरे मीडिया हाउसेज ने खबर को तब उठाया जब दिल्ली पुलिस ने नवीन जिंदल की लिखित शिकायत और प्रमाण के रूप में सौंपी गई स्टिंग की सीडी को देखकर एफआईआर दर्ज कर ली. फिर तो ये प्रकरण बड़ा मुद्दा बन गया और चारों तरफ पत्रकारिता के पतन की कहानी पर चर्चा होने लगी. सुधीर और समीर तिहाड़ जेल भेजे गए. इनके आका सुभाष चंद्रा पर गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी, लेकिन वो जेल जाने से बच पाने की एलीट तिकड़म भिड़ाने में कामयाब हो गए.

उन दिनों राजदीप सरदेसाई ने भी सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 पर सुधीर चौधरी के ब्लैकमेलिंग में जेल जाने के बहाने पत्रकारिता के पतन पर गहरा आंसू बहाया था. अब समय का पहिया जब काफी चल चुका है तब राजदीप सरदेसाई अपनी गालीगलौज व हाथापाई वाली हरकत के कारण सबके निशाने पर हैं और इनकी करतूत के चलते पत्रकारिता की हालत पर दुखी होकर टपाटप आंसू बहा रहे हैं सुधीर चौधरी. सोचिए जरा. इस देश के आम आदमी को मीडिया का संपूर्ण सच भला कैसे समझ में आएगा क्योंकि उसे कभी राजदीप सरदेसाई में सच्चा पत्रकार दिखता होगा तो कभी सुधीर चौधरी पत्रकारिता के हनुमान जी लगते होंगे.

इस विचित्र और घनघोर बाजारू दुनिया में दरअसल जनता के लिए सच जैसी पक्षधरता / चीज पर कोई मीडिया वीडिया काम नहीं कर रहा. सब अपने अपने एजेंडे, अपने अपने राग द्वेष, अपने अपने मतलब पर काम कर रहे हैं और इसे जन पत्रकारिता का नाम दे रहे हैं. ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरी हों या हाथापाई-गालीगलौज करने वाले राजदीप सरदेसाई. इन जैसों ने असल में केवल खुद की ब्रांडिंग की है और अपनी ब्रांडिंग के जरिेए अपने लालाओं और अपनी तिजोरियां भरी हैं. क्या गलत है, क्या सही है, इस पर हम लोग भले तात्कालिकता / भावुकता के शिकार होकर फेसबुक-ट्विटर पर एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हों, एक दूसरे को समझा ले जाने या निपटा देने में जुटे हुए हों लेकिन सच्चाई यही है कि अंततः राजदीप, सुधीर, हम, आप… हर कोई अपनी सुरक्षा, अपने हित, अपने दांव, अपने करियर, अपनी जय-जय में जुटा हुआ है और जो फिसल जा रहा है वह हर हर गंगे कहते हुए खड़ा होने की कोशिश मेें जुट जा रहा है.

देखिए इन्हीं मोदी महोदय को. गुजरात के दंगों के दाग से ‘मुक्त’ होकर विश्व नायक बनने की ओर चल पड़े हैं. इनकी बातें सुन सुन कर अब तो मुझको भी लगने लगा है कि सच में भारत को बहुत दिनों बाद कोई कायदे का नेता मिला है जो देश को एकजुट कर, एक सूत्र में पिरोकर बहुत आगे ले जाएगा… लेकिन जब मोदी की विचारधारा, मोदी के भक्तों, मोदी के अतीत को देखता हूं तो सारा उत्साह ठंढा पड़ जाता है क्योंकि ये लोग अपने हित के लिए कुछ भी, जी हां, कुछ भी, बुरा से बुरा तक कर डालते हैं. पर, समय और हालात, दो ऐसी चीज हैं भाइयों कि इनके कारण बुरे से बुरे को अच्छे से अच्छा में तब्दील होते देखा जा सकता है और अच्छे से अच्छा को बुरे से बुरा बताया जा सकता है. ऐसे ही हालात में मिर्जा ग़ालिब साहब ने कहा होगा…

रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो

बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ कोई न हो

और अंत में… जाते-जाते…

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के स्टिंग की वो सीडी जरूर देखिए जिसकी खबर भड़ास पर आने के बाद तहलका मचा और बाद में इन दोनों संपादकों को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल जाना पड़ा… आज यही सुधीर साहब देश को जी न्यूज पर राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने सच्ची-अच्छी पत्रकारिता सिखा रहे थे… इस लिंक पर क्लिक करें… http://goo.gl/N96BR8

बाकी, सुधीर चौधरी और जी न्यूज की संपूर्ण कथा इस लिंक में है… http://goo.gl/6k7p41

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली में जेल जा चुके सुधीर चौधरी पत्रकारिता की नसीहत दे रहे हैं राजदीप सरदेसाई को!

(File Photo Vinit Kumar)

Vineet Kumar : जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली मामले में जेल जा चुके सुधीर चौधरी आज राज राजदीप सरदेसाई को पत्रकारिता कैसे की जाए, नसीहत दे रहे हैं. चैनल शाम से एकतरफा स्टोरी चला रहे हैं. ‪#‎shameaAbroad‬ को ट्रेंड बनाने की कोशिश में लोगों से प्रतिक्रिया मांग रहा है…. आलोक मेहता जैसे बुरी तरह साख गंवा चुके संपादक हां में हां मिला रहे हैं. मुझे राजदीप सरदेसाई के पक्ष में कुछ नहीं कहना है… बस अफसोस इस बात का है कि आप वरिष्ठ, अनुभवी मीडियाकर्मियों ने जिस तरह अपनी जुबान बंद रखी, गलत का खुलकर विरोध नहीं किया, कई बार सरोगेट ढंग से शह दिया तो ऐसे दिन देखना स्वाभाविक ही है.

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जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली मामले में बुरी तरह साख गंवा चुके सुधीर चौधरी को जिस दिन गिरफ्तार किया गया, उस रात की बुलेटिन में देश के न्यूज चैनल के बेहद ही विश्वसनीय आवाज और चेहरा पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा- आज देश के लिए काला दिन है, आज देश के लिए इमरजेंसी जैसा दिन है..वाजपेयीजी को जितना मैं जानता-समझता और पढ़ता हूं, ये बात कहने के बाद संभवतः भारी बोझ महसूस किया होगा और जी न्यूज छोड़ दिया..उनकी गिल्ट ऐसा करके कितनी कम हुई होगी, नहीं मालूम लेकिन तोड़-जोड़ करके, बीइए-एनबीए सबको धत्ता बताकर ये दागदार संपादक न केवल जेल से बाहर आ गया बल्कि पहले की तरह उसी बेशर्मी से मूल्यों, नैतिकता, सरोकार का ज्ञान दर्शकों को देने लगा. वाजपेयीजी बेहद सच्चे, संवेदनशील और सादगी पसंद टीवी पत्रकार हैं. ऐसे लोग टेलीवजन दुनिया में अब नहीं आते..उन्हें सुधीर चौधरी की गिरफ्तारी के लिए इमरजेंसी शब्द प्रयोग का शायद हमेशा अफसोस रहे लेकिन उनके जी न्यूज छोड़ देने के बावजूद इन्डस्ट्री के भीतर सडांध कम तो नहीं हो गयी. व्यक्तिगत स्तर का ये फैसला कुछ बदल तो नहीं ही पाया.

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आप अपने देश में रहकर खबर के नाम पर दलाली मामले में जेल जाइए ( जी न्यूज), जेल जाते समय पुलिस को धमकाइए कि तुम्हें पता नहीं है कि मैं कौन हूं..थप्पड़ खाकर गाल रगड़िए. फर्जी स्टिंग ऑपरेशन करवाकर एक शिक्षिका को देह व्यापार का धंधा करनेवाली बताइए( लाइव इंडिया फर्जी स्टिंग ऑपरेशन) लेकिन विदेश में जाने के बाद राष्ट्रभक्त हो जाइए…सुधीर चौधरी की इस अदा पर कौन नहीं मर मिटेगा दोस्तों.

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महिलाओं को शुरु से अपमानित करते आए हैं सुधीर चौधरीः पहले शिक्षिका उमा खुराना का, अब सागरिका घोष का…  साल 2007 में सुधीर चौधरी जिस लाइव इंडिया के संपादक थे, उनके एक नउसिखुए रिपोर्टर प्रकाश सिंह जो कि रातोंरात चमकना चाहते थे, दिल्ली के एक स्कूल की शिक्षिका का फर्जी स्टिंग किया और उन्हें अपनी स्कूली छात्राओं को देह व्यापार में धकेलने, दलाली करनेवाला बताया. नतीजा, दिल्ली के तुर्कमान गेट पर दहशत का माहौल बन गया. हजारों की भीड़ और शिक्षिका उमा खुराना को खींचते, कपड़े फाड़ते धकियाते लोग..उस दिन उमा खुराना को लोग जान तक से मार देते. जांच हुई. स्टिंग फर्जी पायी गयी. प्रकाश सिंह को निकाला गया. चैनल एक महीने तक ब्लैक आउट किए जाने का फैसला आया..इस पूरे मामले पर संपादक सुधीर चौधरी ने कहा- रिपोर्टर ने मुझे धोखे में रखा, मुझे इस स्टोरी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इस मामले से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया. आज इसी सुधीर चौधरी को न केवल अपने चैनल, अमेरिका के चैनल एबीसी की, मोदी सरकार की पल-पल की खबर और जानकारी है बल्कि राजदीप सरदेसाई और मोदी भक्तों के बीच झड़प में राजदीप की पत्नी( उनके लिए सागरिका घोष की पहचान बस यही है, उनकी अपनी पहचान से कोई मतलब नहीं) के नाम को कैसे घसीटा जा सकता है?

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मोदी भक्त और राजदीप सरदेसाई के बीच झड़प में उनकी पत्नी की क्या भूमिका है? हम ये बिल्कुल नहीं कह रहे कि राजदीप सरदेसाई पूरी तरह निर्दोष हैं..लेकिन राजदीप सरदेसाई पर लगातार सवाल कर रहे जी न्यूज से ये कौन पूछेगा कि इस झड़प में राजदीप की पत्नी सागरिका घोष की क्या भूमिका रही है ? सागरिका का नाम जी न्यूज जिस तरह अपनी बुलेटिन में लगातार घसीट रहा है, क्या उसी मीडिया की नैतिकता के दायरे में आता है जिसकी दुहाई दागदार और दलाली के आरोप में जेल जा चुके चैनल के संपादक सुधीर चौधरी, अलग-अलग बुलेटिन के एंकर और आलोक मेहता जैसे संपादक दे रहे हैं. राजदीप सरदेसाइ पर कांग्रेसी होने का ठप्पी लगाने के लिए सागरिका घोष को अलग से टारगेट करना जी न्यूज की किस पत्रकारिता की नैतिकता का नमूना है. आप इस पैकेज को देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि जो झड़प हुई है, उसके लिए राजदीप सरदेसाई न केवल सागरिका घोष से सलाह-मशविरा करके किया बल्कि इसलिए भी किया क्योंकि वो कांग्रेसी हैं..अगर राजदीप इतने दुराग्रही हैं तो जी न्यूज, सुधीर चौधरी तो महान दूरदर्शी ही हुए. https://www.youtube.com/watch?v=54xGasucqAc

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जी न्यूज ने पत्रकारिता की नई परिभाषा दी. चैनल का कहना है कि अगर आपके देश का प्रधानमंत्री भारत को ब्रांड बनाने की कोशिश में विदेश जाता हो तो आप लोगों से कोई ऐसा सवाल न करें कि जिससे कि देशभक्ति पर आंच आ जाये.. आलोक मेहता एंकर और सुधीर चौधरी के समर्थन में कह रहे हैं कि आप पहले भारतीय हैं, उसके बाद पत्रकार है. भारतीयता और मोदी भक्ति कैसे एक-दूसरे में इमर्ज किया जा रहा है, देखते जाइए. सवाल बहुत सीधा है कि अगर आपकी देशभक्ति इस बात से निर्धारित होती है कि विदेश में कोई आपके नेता, मंत्री या प्रभावशाली व्यक्ति से असहमति में बात न करे, खबर न दिखाए तो क्या यही बात आप दूसरे देशों के संदर्भ में बर्दाश्त करते हैं?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


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अंबानी के दलाल और पत्रकारों की नौकरी खाने वाले राजदीप की ताज़ा गुंडई के दीदार करें


जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के स्टिंग की सीडी, जिसके बाद ब्लैकमेलिंग के आरोप में ये दोनों संपादक जेल गए, देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें… http://goo.gl/N96BR8

 

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अंबानी के दलाल और पत्रकारों की नौकरी खाने वाले राजदीप की ताज़ा गुंडई के दीदार करें

Dayanand Pandey : राजदीप सरदेसाई को शहीद बता कर उन को सर चढ़ा लेने वाले मित्र एक बार इस लिंक को ज़रूर देखें। उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात समझ में आ जाएगी। राजदीप ने कितने दिनों तक अंबानी की दलाली की है आईबीएन7 में और कितनों के पेट पर लात मारा है, क्या यह भी लोग भूल गए हैं? खैर उनकी ताज़ा गुंडई के दीदार करें! goo.gl/7lPcEp

Rajkishor : पत्रकार के साथ हाथापाई गलत है, लेकिन अगर पत्रकार यही काम करे तो..? तीखे सवाल पूछने का हक पत्रकारों को उनके काम की जरूरत के लिए मिला है। यह कोई विशेषाधिकार नहीं। आप निष्पक्ष होकर अपना काम करें तो ही इज्जत मिलेगी। जाहिर है कि मर्यादा तो पत्रकार महोदय की भी है। अमेरिका में राजदीप सरदेसाई के साथ मोदी समर्थकों की हाथापाई पर तमाम साथी बेहद व्यग्र और उग्र हैं। जब तक पूरा वीडियो नहीं देखा, मुझे भी यह विचलित कर रहा था। पूरा वीडियो देखने के बाद राजदीप का जो असली चेहरा सामने आया वह ज्यादा दुखद और शर्मनाक है। जरा सी हूटिंग बर्दाश्त नहीं कर पाने पर राजदीप ने ही मोदी समर्थक पर हाथ छोड़ा। इसके बाद धक्कामुक्की हुई। यहां तक जो हुआ, उसे भी जाने दें तो राजदीप ने पूरे घटनाक्रम की गलत रिपोर्टिंग भी की। ऐसा दिखाया कि मोदीभक्तों ने उनके ऊपर हमला कर दिया। वैसे मोदी के अंध समर्थक जितने आक्रामक हैं, उससे यह लोगों को बहुत अस्वाभाविक भी नहीं लगा। मगर वीडियो कुछ और कहता है। इस घटना को पत्रकार या पत्रकारिता पर हमला मान रहे साथियों से इल्तिजा है कि एक बार वीडियो जरूर देखें। goo.gl/7lPcEp

Vyalok Pathak : मैं बचपन से कहता आ रहा हूं कि थोड़ी देर ठहरकर प्रतिक्रिया देना बहुत अच्छा होता है। अब, जिस एक व्यक्ति की पिटाई की बड़ी चर्चा हो रही है, मैडिसन स्क्वायर पर, उसको लेकर दो-तीन सवाल। 1. हालांकि, आज की तारीख़ में कोई पत्रकार है, इसी पर मुझे संदेह है….बड़ेवाले तो प्रबंधक, मैनेजर या दलाल हैं और जो छोटे हैं, वे क्लर्क, किरानी, कर्मचारी या अधिक-से अधिक आइटी कर्मचारी हैं। फिर, इसके पत्रकार होने का दावा क्यों किया जा रहा है? 2. जिस तथाकथित विक्टिम के पत्रकार होने की चर्चा की जा रही है, वह शायद वही व्यक्ति है न, जो एक स्टिंग खा गया था। जिसने 300 कर्मचारियों की नौकरी खा ली थी और जिसने अपनी ‘शानदार’ कमाई से करोड़ों का बंगला खरीदा है। क्या, उसके आय के स्रोत की जांच हुई? 3. क्या हा हुसैन करनेवालों ने पूरा वीडियो देखा? क्या उनको पता है कि तथाकथित विक्टिम ने लोगों को उकसाया, गाली दी और यहां तक कि हाथापाई भी की? और, आखिरकार…. 4. जब पूरा वीडियो आ गया है, तो क्या मर्सिया पढ़नेवाले सभी महात्माओं से यह उम्मीद की जाए, कि वे अपनी बात वापस लेंगे, माफी मांगेंगे और उस ‘विक्टिम’ का संस्थान उसको तत्काल प्रभाव से उसकी नौकरी से मुक्त करेंगा, उसे वापस बुलाएगा और उसका बहिष्कार करेगा? ऐसी कोई उम्मीद इनसे मुझे तो नहीं है… goo.gl/7lPcEp

(राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार दयानंद पांडेय, दैनिक जागरण के पत्रकार राजकिशोर और छुट्टा पत्रकार व्यालोक पाठक के फेसबुक वॉल से.)

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गलती राजदीप सरदेसाई की है, खुद पहले गाली दी और खुद पहले हमला किया (देखें नया वीडियो)

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गलती राजदीप सरदेसाई की है, खुद पहले गाली दी और खुद पहले हमला किया (देखें नया वीडियो)

Yashwant Singh : इतना बड़ा फ्रॉड निकलेगा राजदीप सरदेसाई, मुझे अंदाजा नहीं था. नया वीडियो साबित कर रहा है कि पहले गाली राजदीप सरदेसाई ने दी और पहले हमला भी राजदीप सरदेसाई ने किया. लेकिन कांग्रेसी और अंबानी परस्त इस पत्रकार ने घटनाक्रम के वीडियो को अपने हिसाब से संपादित कर केवल वो हिस्सा रिलीज कराया जिसमें उन (राजदीप) पर एनआरआई हमला करते हुए दिख रहा है. इसे देखकर मुझे भी लगा कि किसी पत्रकार पर कोई कैसे भला हमला कर सकता है, वो भी अमेरिका जैसी जगह में. पर अब जब दूसरा पक्ष सामने आ रहा है, पूरा वीडियो सामने आ रहा है तो पता चल रहा है कि राजदीप ने खुद सब तमाशा क्रिएट किया, गाली-हमले की शुरुआत करके.

इस प्रकरण को वैचारिक चश्मे से देखने वालों को उनका चश्मा मुबारक. न मुझे कभी संघ से प्रेम रहा है और न मोदी से. न मुझे अब वामपंथ से प्रेम है और न ही कांग्रेस परस्त क्रांतिकारिता से. इसलिए मैं कह सकता हूं कि राजदीप सरदेसाई ने खुद को टीआरपी दिलाने, खुद को ट्विटर पर ट्रेंड कराने, खुद को कांग्रेस की नजरों में चढ़ाने के लिए ये सब हरकत की होगी. सुब्रमण्य स्वामी ने सब कुछ विस्तार से सामने रख दिया है. इसे http://goo.gl/2El989 पढ़-देख सकते हैं. राजदीप अपनी चाल में कामयाब भी रहे. मोदी की अरबों रुपये वाली पीआर मायाजाल में सेंध लगा गए और ट्विटर पर ट्रेंड करने लगे, और मोदी की ट्रेंडिंग न्यूज से होड़ लेने लगे. एक नहीं बल्कि दो-दो हैश टैग ट्रेंड करने लगा, एक पक्ष में एक विपक्ष में. देखते ही देखते एक खेमा राजदीप को हीरो मानने लगा और उन पर कथित हमले को मीडिया पर, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला मानने लगा और मोदी-संघ को गरियाने लगा. मोदी और संघ परस्त खेमा राजदीप पर हमले को उचित बताने लगा और राजदीप के कांग्रेसी अतीत व मोदी विरोधी अतीत का हवाला देने लगा.

इन दोनों छोरों की सरगर्मी चल ही रही थी कि असली सच्चाई सामने आई. राजदीप किस तरह गाली दे रहे हैं और जवाबी गाली सुन रहे हैं, राजदीप किस तरह हमला कर रहे हैं और जवाबी हमला पा रहे हैं, इसका वीडियो सामने आ गया. इस लिंक http://goo.gl/7lPcEp पर क्लिक करके वीडियो देख सकते हैं. इसे देखने के बाद अंबानी के इशारे पर सैकड़ों मीडियाकर्मियों की नौकरी खाने वाले राजदीप से सिर्फ घृणा ही की जा सकती है. राजदीप का काम किसी राजनेता जैसा है जो अपने फायदे के लिए उल्टा-सीधा करके जनमत को पोलराइज करता है. अगर राजदीप को राजनीति ही करनी है तो उन्हें पत्रकारिता छोड़कर सीधे कांग्रेस का दामन थाम लेना चाहिए और मैदान में उतर जाना चाहिए. एमजे अकबर ने भाजपा का दामन थामा, उसी तरह राजदीप को कांग्रेस वाला हो जाना चाहिए. संसद घूस कांड के स्टिंग को हजम कर जाने वाले राजदीप के पाप कम नहीं हैं.

विचारधारा के चश्मे से चीजों को देखने वालों के लिए सब कुछ आग्रह-दुराग्रह के हिसाब से गलत-सही होता है. इसीलिए अब भी कई लोग राजदीप पर हमले की निंदा कर रहे हैं. मैं अपने पुराने वक्तव्य को वापस लेता हूं. अब मैं कहूंगा कि राजदीप सरदेसाई ने जो हरकत की है वह परम निंदनीय है. ऐसे अपराध को अंजाम देने वाले राजदीप को टीवी टुडे ग्रुप से मुक्त हो जाना चाहिए या कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता की स्वस्थ और गंभीर परंपरा को दागदार किया है. उनके जैसे वरिष्ठ पत्रकार से ये कतई अपेक्षा नहीं की जाती कि वे किसी को गाली देंगे और फिर उस पर हमला करेंगे. इस प्रकरण से संबंधित अन्य खबरों के लिए इन लिंक पर क्लिक कर सकते हैं…

http://goo.gl/qe2moy

http://goo.gl/jdwJo2

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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राजदीप हाथापाई प्रकरण पर पत्रकारों के बीच भी ध्रुवीकरण : कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में

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अंबानी के दलाल और पत्रकारों की नौकरी खाने वाले राजदीप की ताज़ा गुंडई के दीदार करें

 

 

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राजदीप हाथापाई प्रकरण पर पत्रकारों के बीच भी ध्रुवीकरण : कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में

Ashish Maharishi : देश में जब से Narendra Modi की भगवा सरकार बनी है, तब से हिंदुत्‍व के ठेकेदारों की गुंडागर्दी बढ़ गई है। देश ही नहीं बल्कि भारत के बाहर भी ये ताकतें सिर उठा रही हैं। Rajdeep Sardesai को पहले गाली देना और फिर हमला करना यह बताता है कि भगवा आतंक एक बार फिर देश में सिर उठाने के लिए बेताब है। याद कीजिए 1992 और 2002, जब इन ताकतों ने पूरी दुनिया में हमारे देश को बदनाम कर दिया था। संघ से शिक्षा दीक्षा पाकर ये ताकत हर जगह फैल चुकी हैं। झुग्‍गी झोपड़ी से लेकर न्‍यूज रूम तक ये फैले हुए हैं। इनका विरोध जितना कीजिए, कम है। राम और हिंदू धर्म के ये ठेकेदार न सिर्फ इंसानियत के दुश्‍मन हैं, बल्‍कि हिंदुत्‍व के भी दुश्‍मन हैं। गांधी के ये हत्‍यारे अब गांधी और विवेकानंद को बेच रहे हैं। दोस्‍तों, पत्रकार Rajdeep Sardesai पर हमले का खुले या छिपे तरीके से समर्थन करने वालों को मित्र सूची से हटा रहा हूं। मित्र सूची में सांप्रदायिक लोग नहीं चाहिए। यदि आप पत्रकार पर हमले का समर्थन करते हैं तो अपने आप मेरी सूची से हट जाएं। वरना मुझे हटाना पड़ेगा।

Dr. Subramanian Swamy : From yesterday many media houses are playing a small, incomplete clip and claiming that Modi supporters attacked Rajdeep Saradesai! Now watch this video to know what really happened! It was our renowned Journalist who actually first abused, and attacked an NRI at Madison Square Garden, NYC. After this incident NRI’s started calling Police, which is the right thing to do! Also, you can find other YouTube videos where our leading Journalist is insulting NRIs by calling them Idiots, frenzy Narendra modi supporters, people with money but no class etc.!  Video Link… https://www.youtube.com/watch?v=9nVswhKG9So

Awadhesh Kumar : मित्रों, कल राजदीप सरदेसाई के साथ दुर्व्यवहार की मैंने निंदा की थी। कारण, उस समय हमारे पास एबीपी न्यूज चैनल का वही वीडिया उपलब्ध था जिसमें उनको धक्का देते हुए हाथ से पिटाई हो रही है। हालांकि उस समय भी मैंने आश्चर्य प्रकट किया था कि आखिर आज तक और हेडलाइन टुडे जिसके वे प्रतिनिधि हैं, इसे क्यों नहीं दिखा रहा है! अब एक वीडियो क्लिप आया है जिसमें राजदीप भी आम मुहल्ले के लड़कों की तरह बाजाब्ता हाथों से एक व्यक्ति पर हमला करते हैं, उसे मारते हुए धकेलते हैं। लोग कह रहे हैं, आप ऐसा कैसे कर सकते हैं। एक साथ कई लोग कह रहे हैं कि कॉल द पुलिस, कॉल द पुलिस। यह अमेरिकी स्वभाव है कि कानून वहां लोग हाथ में नहीं लेते। ऐसा होने पर लोग पुलिस को ही बुलाते हैं। इसके आगे पीछे का वीडियो नहीं है। राजदीप का व्यवहार भी वहां असभ्य है। वह व्यवहार कहीं से भी समर्थन देने योग्य नहीं है। जाहिर है, या तो राजदीप पहले किसी के द्वारा टोकने पर उसे मारते हुए धकेलते हैं या पहले उनके साथ कुछ हुआ है। पर जिस समय वे धकेलते हुए दिख रहे हैं उस समय वह व्यक्ति उन पर हमला नहीं कर रहा है। हो सकता है उसके बाद गुस्से में उन पर हमला हुआ हो। लेकिन राजदीप के द्वारा किया गया कृत्य भी किसी दुष्टि से स्वीकार्य नहीं है। लगता ही नहीं कि कोई वरिष्ठ गंभीर पत्रकार ऐसा कर सकता है। वहां मोदी मोदी का नारा सुनाई दे रहा है, एक युवक उनको टोकता भी है कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं और उस पर वे उस पर हमला कर देते हैं। इसलिए अच्छा होगा कि पूरी घटना का वीडियो फुटेज लाया जाए। सच्चाई तभी सामने आएगी। मेरा अनुरोध होगा कि जिसके पास भी पूरा वीडियो फुटेज हो वो जरुर सामने लायें।

Sanjay Tripathi : वैसे समर्थक होना बुरा नही है सर भक्त होना दुखद है जो व्यक्ति को विवेक शून्य बनाती है।यह ऐसी परंपरा बन रही है जिसका परिणाम बहुत घातक होगा। यदि राजदेसाई का नाटक पूर्व नियोजित है तो मोदी का नाटक वहां की भीड़ सब पूर्वनियोजित है।वहां सब गुजराती की भीड़ इकट्ठा की गई थी जिसके लिये बाकायदा दिन रात प्रयास किया गया है। और जो विरोध कर रहे थे उनको दूर किया गया।और रही बात अमेरिका मे सम्मान की तो वो वहा के सरकारी आचरण से दिखता है न कि भाड़े के भीड़ से न तो एयर पोर्ट पर ही कोई प्रोटोकॉल न ही ट्रैफिक रोका गया।एक सामान्य आदमी जैसा व्यवहार अमेरिका प्रशासन द्वारा किया गया।

Satya Prakash Chaudhary : राजदीप सरदेसाई पर हमले की खबर एबीपी न्यूज को छोड़ कर हर जगह गायब दिखी. सचमुच अंबानी के सिक्कों ने पत्रकारों खास कर संपादकों को कुत्ते में बदल दिया है. भौंकनेवाले नहीं, तलवे चाटनेवाले. गलती चाहे जिसकी हो, पर यह खबर तो दिखनी, छपनी चाहिए थी…

Ajay Kumar : सत्‍यप्रकाश जी, कुछ वीडियो फेसबुक पर अपलोड हैं, जिसमें राजदीप सरदेसाई जी के रिपोर्टिंग का तरीका दिख रहा है। हाथ पहले राजदीप सरदेसाई जी ने चलाया है। उस पर भी गौर किया जाना चाहिए। पत्रकार के तौर पर हम किसी के विरोधी हो सकते हैं। किसी के विचार से असहमत हो सकते हैं। लेकिन हमें भी अपनी मर्यादा नहीं लांघनी चाहिए। कुछ वीडियो में यह दिख रहा है कि राजदीप सरदेसाई जी शायद अपनी सीमा को लांघ रहे हैं।

Yogesh Kumar Sheetal : क्रिया की प्रतिक्रिया होती है ऐसा शायद राजदीप सरदेसाई ने पहली बार इतनी नजदीक से अनुभव किया होगा!

Suresh Chiplunkar : काश कि पीटा होता… पूरा वीडियो देखा है मैंने… शुरुआत इस “ट्रेडर” ने ही की थी पहले एक दर्शक को Asshole बोलकर, फिर धक्का देकर… इसके साथ सिर्फ जवाबी धक्कामुक्की ही हो पाई… कान के नीचे जोरदार आवाज़ निकल ही नहीं पाई… खेद की बात है. दोनों मियाँ-बीबी नंबर एक के नौटंकीबाज हैं… अपनी किताब बेचने का स्टंट है ये सब.

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हाथापाई प्रकरण को लेकर ट्विटर और फेसबुक पर तीव्र प्रतिक्रिया, राजदीप सरदेसाई भी बोले…

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हाथापाई प्रकरण को लेकर ट्विटर और फेसबुक पर तीव्र प्रतिक्रिया, राजदीप सरदेसाई भी बोले…

Rajdeep Sardesai : Great crowd at Modison square garden! except a few idiots who still believe abuse is a way of proving their machismo! Glad we caught the idiots on cam. Only way to shame the mob is to show them. Super speech by Modi; not so super behaviour by some bhakts. Guess some things won’t change.

(राजदीप ने उपरोक्त बयान अलग-अलग टुकड़ों में फेसबुक और ट्वीट पर लिखा जिसे कंपाइल करके यहां दिया गया है. राजदीप के साथ हाथापाई किए जाने को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया शुरू हो गई है. पढ़े-लिखे लोगों ने इस हरकत की निंदा की है. भाजपा से जुड़े और संघी मानसिकता के लोगों ने राजदीप में ही दोष निकालना शुरू कर दिया है. पढ़िए कुछ ट्टवीटर और फेसबुकी स्टेटस.)

taslima nasreen : If Sardesai called you ‘asshole’,you could’ve called him ‘dickhead’.Why did you attack him physically?Learnt nothing about freespeech in US?

Qamar Waheed Naqvi : बेहद निन्दनीय घटना है. एक पत्रकार का काम है हर तरह के सवाल पूछना, चाहे वे सवाल आपको अच्छे लगें या नहीं. पत्रकार सवाल पूछने के लिए स्वतंत्र है और आप जवाब देने के लिए. लेकिन क्या पत्रकार के सवाल का जवाब थप्पड़ होता है? यह लोकतंत्र की किस पाठशाला में पढ़ाया जाता है?

Awadhesh Kumar : मेडिसन स्क्वायर में राजदीप सरदेसाई के साथ बदसलूकी निंदनीय… मेडिसन स्क्वायर के बाहर जिस तरह पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ बदसलूकी हुई वह निंदनीय है। जिन लोगों ने ऐसा किया उनने शायद यह नहीं सोचा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस कार्यक्रम मंें यदि सभ्यता और शालीनतम का पालन नहीं होगा तो दुनिया में भारत के बारे में क्या संदेश जाएगा। मैं यह मानता हूं कि भारत में ऐसे पत्रकार हैं, जिनने गुजरात और नरेन्द्र मोदी को लेकर अतिवादी नजरिया रखा और ऐसी प्रस्तुतियां कीं जिनसे उनके समर्थकों के अंदर आक्रोश है। इस कारण मीडिया के दूसरे लोग भी उनके निशाने पर हो जाते हैं। लेकिन यह वहशी तरीका वह भी विदेश की भूमि पर भारतीयों की ही छवि कलंकित करेगा। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। वैचारिक मतभेद का सामना विचार से करें, एक कवर करने गए पत्रकार ही नहीं किसी के साथ ऐसा व्यवहार हर दृष्टि से अस्वीकार्य है। हालांकि आश्चर्य की बात है कि राजदीप सरदेसाई जिस आज तक चैनल से जुड़े हैं वह केवल वहां से कार्यक्रम लाइव कर रहा है और एबीपी उनके साथ बदसलूकी का दृश्य दिखा रहा है।

Anil Pandey : Delhi Journalists Association ki taraf se mai Rajdeep Sardesai par hamale ki ninda karata hun.

Satyaprakash Gupta : Indian saffron in America has beaten sober Indian journalist Rajdeep Sardesai who was covering the entire festive mood of South Asian . Is this face of saffron face of American Indian Hindu ? Alas..These people will never invest money in development of India. These people did not support Indigenous people of Bhopal ,who died down in sleep.

Rukmini Sen : When you say there will be only one voice, everyone has to like this one person and hate this other one! When you decide for us that we have to be homogeneous and there is only one way of being you are being a Bigot!!! Don’t touch a journalist BJP and VHP workers! Don’t do it in India and don’t do it in USA. You are doing exactly what Indira Gandhi did during Emergency!! You may have many of your family members in Media right now but everything is transitory! A country goes through many changes in every few years!! DON’T PLAY AROUND WITH FREE SPEECH and DEMOCRACY!!

Dilnawaz Pasha : ट्विटर पर मेडिसन गॉर्डन से आ रहे अपडेट्स देख रहा हूँ. अमरीका में रह रहे भारतीय उत्सव मना रहे हैं. देखकर अच्छा लग रहा है. लेकिन बीच-बीच में लगातार आ रहा पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ बदसलूकी का वीडियो आँखों में चुभ रहा है!
   
Nadim S. Akhter : जब तेरा घर जल रहा था, मैं हँस रहा था। जब मेरा घर जला, रोना तो दूर, कोई हंसने भी नहीं आया। राजदीप पर हमला पार्टी -पक्ष-विचारधारा से ऊपर की बात है। यह मीडिया पर हमला है। निंदा भर्त्सना से काम नहीं चलेगा, आवाज़ बुलंद करिए। तो राजदीप सरदेसाई “गुंडों” को जनता समझ कर सवाल पूछ रहे थे। यहीं मार खा गए ना!! आस्था होती ही अंधी है। भक्तों से पूछकर देख लो!!

Siddharth Kalhans : राजदीप सरदेसाई पर अमेरिका में हुए हमले, देश भर में पत्रकारों पर हो रहे हमलों के विरोध में कल दिनांक 29 सितंबर को लखनऊ में हजरतगंज चौराहे पर गांधी प्रतिमा पर धरना आएं और फासीवाद के विरोध में आवाज बुलंद करें। शाम चार बजे।  निवेदक–सिद्धार्थ कलहंस, हसीब सिद्दीकी, जेपी तिवारी, के विश्वदेव राव, आशीष अवस्थी (IFWJ), Vandana Misra, Ram Kishore, (पीयूसीएल), औबैदुल्लाह नासिर, ताहिरा हसन, सुरेश बहादुर जी, रामकिशोर, अब्दुल वहीद भाई Abdul Waheed, लालजी निर्मल, रामकुमार, उत्कर्ष सिन्हा। गांधी प्रतिमा, जीपीओ, हजरतगंज, लखनऊ। सोमवार, 29 सितंबर, शाम चार बजे।
   
Rana Yashwant : न्यूयार्क में राजदीप के साथ हाथापाई- साफगोई औऱ साहस से सवाल पूछने के पत्रकार के बुनियादी अधिकार पर हमला है । शर्मनाक है। अपने नेता के खिलाफ सवाल ना सुनने की ऐसी मानसिकता ज़हरीली और संक्रामक है । मीडिया के लिये यह एक खतरनाक संकेत है।

Mohammad Anas : यदि रत्ती भर भी ज़मीर बाक़ी रह गया है तो मोदी की कवरेज़ बंद कर देनी चाहिए। जिसके समर्थक गुंडें हो उसका नेता कैसा होगा। Shame on you Mr. Modi. कभी सुना था किसी ने की मनमोहन सिंह के समर्थकों ने मीडिया या आम जनता से बदसलूकी की हो। विज्ञान भवन में एक दाढ़ी टोपी टाइप एनजीओ वाले ने क्या कुछ नहीं कहा था उन्हें। कोई समर्थक उठा था क्या हाथ छोड़ने के लिए? फासीवादियों ,तुम्हे सिर्फ डंडे पड़ने चाहिए, चप्पल नहीं।

Navin Kumar : पहली खबर- विवेकानंद की परंपरा निभाने गए नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने पत्रकार राजदीप सरदेसाई को न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर पर धुना. दूसरी ख़बर- दो पराये चैनलों (न्यूज24 और एबीपी) को छोड़कर सारे चैनलों पर मोदी की शान में प्रायोजित नाच-गाने के प्रसारण का सिलसिला जारी है। तीसरी खबर – मोदी के सारे भक्त पत्रकार प्रसन्न हैं।

Sanjay Sharma : राजदीप सरदेसाई देश के जाने माने पत्रकार है . उन पर अमेरिका में उस समय हमला हुआ जब हमारे प्रधानमंत्री अमेरिका में मौजूद है . उन्हें इस घटना की तीखी निंदा करना चाहिए.

Vikram Singh Chauhan : न्यूयार्क में वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ नरेंद्र मोदी के भाड़े के टट्टुओं द्वारा मारपीट की मैं कड़े शब्दों में निंदा करता हूँ। अमेरिका में मैं इस घटना के बाद मोदी और उनके समर्थको को हजार लानते भेजता हूँ। कुछ लानते उन पत्रकारों और मीडिया हाउस के लिए भी जो अपने बिरादरी के वरिष्ठ सहयोगी के साथ इस हुए इस मारपीट को दबाकर वहां सिर्फ मोदी -मोदी कर रहे हैं। मोदी अपने गुंडों से वहां भी वहीँ काम करवा रहा हैं जो भारत में करवाता रहा हैं? जो व्यक्ति देश में कभी मीडिया को निष्पक्ष देखने की कल्पना भी करते हैं वे अभी सभी न्यूज़ चैनल खोल ले! नपुंसकों मुझे ख़ुशी हैं मैं तुम्हारी भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ! अत्यंत शर्मनाक

Shubham Pandey : A senior Journalist has been slapped. Have some guts, people. The Madision Garden broadcast should have been stopped by now. What a shame!
   
Utkarsh Sinha : राजदीप सरदेसाई की पिटाई उद्घोषणा है , जो सहमत नहीं होंगे मारे जायेंगे …
   
पंकज कुमार झा : हर उस आदमी को राजदीप सरदेसाई से खुन्नस होना चाहिए जो भारत के साथ है. लोगों को याद होगा वो घटना जिसमें तमाम पेशेवर उसूलों को धत्ता बताते हुए राजदीप ने सांसद खरीदने की खबर को रातों-रात बेच कर भाजपा के पीठ में छूरा घोपा था. कोई निंदा नहीं सरदेसाई के साथ हुए व्यवहार की. वो इसी के काबिल हैं.

Padampati Sharma : पत्रकार राजदीप सरदेसाई की थोड़ी देर पहले मैडिसन स्क्वायर मे पिटाई हुई है….कारणो का पता नहीं …यह दुखद तो है पर यह भी वास्तविकता है कि हमारे मित्र राजदीप तथाकथित प्रगतिशील पत्रकारिता की सड़ी लाश ढोने वाले चुनिंदा झंडाबरदारों मे एक है….अभी हमारी सहयोगी – मित्र एंकर शशि शर्मा से जानकारी मिली कि राजदीप वहां लोगों से पूछ रहे थे कि यहां आने के लिये भाजपा ने कितने पैसे दिये है…गोया वह यह समझ रहे थे कि भारत मे कोई राजनीतिक रैली हो रही है…हिंसा खराब है मगर पिटाई को अति आक्रोश की स्वत: स्फूर्त प्रतिक्रिया समझा जा सकता है.

Mita Zulca : BJP supporters assaulting Rajdeep Sardesai outside Madison Square Garden is despicable and should be condemned by all. Typical.

Vineet Kumar : जब आप असहमति बर्दास्त नहीं कर सकते तो सडक, नदी साफ़ करके भी जनतंत्र को और गंदला ही करेंगे..जनतंत्र की जड़ें श्रद्धा और भक्ति से नहीं, असहमति और सबकी सुनने-कहने देने की स्पेस से मज़बूत होती है.. जिन लम्पटों को देश के एक राष्ट्रीय चैनल के मीडियाकर्मी राजदीप सरदेसाई को पीटने की हद तक जाने में संकोच नहीं होता, वो देश के लिये क्या सोचता है और कर सकता है, ये इस वीडियो देखकर आप खुद समझ सकते हैं..
कॉर्पोरेट मीडिया से जुड़े राजदीप जैसों के साथ जब ये हो सकता है तो एक मामूली,स्वतंत्र मीडियाकर्मी के साथ क्या हो सकता है, सोचकर ही सिहरन होती है..

Amit Bhaskar : राजदीप जी के हिम्मत की दाद देता हूँ कि भाजपाई संस्कारपूर्ण कुकुरों के बीच रह के भी रिपोर्टिंग की, जिन्होंने उन पर हमला तक कर दिया। ऐसे दोगले चरित्रहीन और नकारा लोग भाजपा या मोदी समर्थक ही हो सकते हैं। मीडिया को भी समझना चाहिए कि उनके आका उन्हें अपने पैरों के जूते की नोक क्यों मानने लगे हैं? शर्म आनी चाहिए और मोदी साहब को माफी मांगनी चहिए अपने बेलगाम सनकी और बेवकूफ समर्थकों के लिए।

Vineet Kumar : जब आप असहमति बर्दास्त नहीं कर सकते तो सडक, नदी साफ़ करके भी जनतंत्र को और गंदला ही करेंगे..जनतंत्र की जड़ें श्रद्धा और भक्ति से नहीं, असहमति और सबकी सुनने-कहने देने की स्पेस से मज़बूत होती है.. जिन लम्पटों को देश के एक राष्ट्रीय चैनल के मीडियाकर्मी राजदीप सरदेसाई को पीटने की हद तक जाने में संकोच नहीं होता, वो देश के लिये क्या सोचता है और कर सकता है, ये इस वीडियो देखकर आप खुद समझ सकते हैं..
कॉर्पोरेट मीडिया से जुड़े राजदीप जैसों के साथ जब ये हो सकता है तो एक मामूली,स्वतंत्र मीडियाकर्मी के साथ क्या हो सकता है, सोचकर ही सिहरन होती है..

Amit Bhaskar : राजदीप जी के हिम्मत की दाद देता हूँ कि भाजपाई संस्कारपूर्ण कुकुरों के बीच रह के भी रिपोर्टिंग की, जिन्होंने उन पर हमला तक कर दिया। ऐसे दोगले चरित्रहीन और नकारा लोग भाजपा या मोदी समर्थक ही हो सकते हैं। मीडिया को भी समझना चाहिए कि उनके आका उन्हें अपने पैरों के जूते की नोक क्यों मानने लगे हैं? शर्म आनी चाहिए और मोदी साहब को माफी मांगनी चहिए अपने बेलगाम सनकी और बेवकूफ समर्थकों के लिए।

आशीष सागर : एक भाजपा समर्थक पत्रकार शिवानन्द द्विवेदी सहर लिखता है- ”उफ़, अमेरिका में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को भीड़ ने पीट दिया। ऐसा बिलकुल नही होना चाहिए, निंदनीय। भले ही कोई पिटने योग्य क्यों न हो लेकिन शान्ति एवं अहिंसा का तकाजा यही है कि उसे भी न पीटा जाय। यह एक निंदनीय कृत्य।”  पर क्या ये एक ज़िम्मेदार कलम के सिपाही के बोल हैं? माना कि राजदीप सरदेसाई ने कभी आईबीएन7 और सीएनएन में कुछ हद तक चाटुकारिता की होगी. ऐसा हर न्यूज़ चैनल का वो पत्रकार करता है जो पद और प्रभाव के चंगुल में है.  लेकिन राजदीप देश के लगभग सभी बड़े समाचार पत्र में लिखते है. गंभीरता से लिखते है. ध्यान रहे अगर पत्रकारों में भी एकता नही रही तो अकले राजदीप ही नही कभी न कभी आप भी मारे जाओगे. मतभेद अच्छे है मगर मनभेद नहीं. एकजुट रहें.

मूल खबर…

न्यूयार्क में राजदीप सरदेसाई को सरेआम थप्पड़ मारा, मीडिया जगत स्तब्ध

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न्यूयार्क में राजदीप सरदेसाई को सरेआम थप्पड़ मारा, मीडिया जगत स्तब्ध

नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे के दौरान आज वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक व्यक्ति ने सरेआम थप्पड़ मार दिया. आरोप है कि थप्पड़ मारने वाला युवक मोदी समर्थक था और वह खुद को प्रखर राष्ट्रवादी बता रहा था. राजदीप ने अपने साथ हुई बदसलूकी पर कुछ भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. राजदीप सरदेसाई इन दिनों टीवी टुडे ग्रुप से जुड़े हुए हैं और मोदी दौरे का कवरेज करने अमेरिका पहुंचे हैं. नीचे तस्वीर में देखें, बाईं तरफ खड़े राजदीप के चेहरे पर दाईं तरफ से एक युवक ने घूंसा चेहरे पर मार रखा है.

ऐसी चर्चा है कि राजदीप सरदेसाई की विचारधारा को लेकर भाजपा के ‘गरम खेमे’ के कई लोग उनसे बेहद खफा रहते हैं. ऐसे ही एक सिरफिरे युवक ने राजदीप सरदेसाई को सामने देख उन पर हमला बोल दिया और उन्हें दोनों हाथों से पकड़कर झकझोरते हुए थप्पड़ मार दिया. इस पूरे प्रकरण को कुछ कैमरों ने कैद कर लिया है. राजदीप सरदेसाई के साथ की गई बदसलूकी के वीडियो को एबीपी न्यूज पर कुछ देर के लिए दिखाया गया. पत्रकार दिबांग और विनोद शर्मा ने इस घटना की निंदा की और अमेरिकी दौरे के दौरान भारत के वरिष्ठ पत्रकार के साथ इस तरह की हरकत को शर्मनाक करार दिया. राजदीप के साथ हुए घटनाक्रम को टीवी टुडे समूह के न्यूज चैनलों पर अभी तक नहीं दिखाया गया है जबकि राजदीप इसी समूह के लिए कवरेज करने की खातिर अमेरिका गए हुए हैं. भड़ास के एडिटर Yashwant Singh ने कहा है कि हमले जैसा कुकृत्य निंदनीय है. यह घटनाक्रम परम निंदनीय है. वैचारिक असहमतियों के कारण कोई किसी पर हमला कर दे, यह फासिज्म ही तो है…

विजय सोनकर शास्त्री समेत कई भाजपा नेताओं ने भी राजदीप सरदेसाई पर हुए हमले की निंदा की है और कहा है कि ऐसी किसी हरकत को सपोर्ट नहीं किया जा सकता. राजदीप सरदेसाई के साथ सरेआम की गई मारपीट की घटना से भारतीय मीडिया जगत स्तब्ध है. हर कोई इस हरकत को अंजाम देने वाले शख्स को कड़ी से कड़ी सजा देने मांग कर रहा है. पर खुद राजदीप ने इस घटना पर कुछ कहने बताने से इनकार कर दिया है. राजदीप सरदेसाई के साथ मारपीट की यह घटना नरेंद्र मोदी के मेडिसन स्क्वायर पर भाषण के कुछ देर पहले हुई. बताया जा रहा है कि हमलावर भाजपा और मोदी का प्रचंड समर्थक है. वह राजदीप सरदेसाई को उनकी विचारधारा और उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण के कारण पसंद नहीं करता था. राजदीप पर अटैक करने वाला हमलावर एनआरआई है और काफी संपत्ति वाले घर का बताया जाता है.

मारपीट के वीडियो को देखने के लिए इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=DZyKEUOF1R4

पढ़िए इसके आगे की खबर….

हाथापाई प्रकरण को लेकर ट्विटर और फेसबुक पर तीव्र प्रतिक्रिया, राजदीप सरदेसाई भी बोले…

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