फर्जी स्टिंग कराने वाले राजदीप सरदेसाई, आशुतोष और अरुणोदय ने कोर्ट में किया सरेंडर, देखें मौके की तस्वीर

दिनभर अदालत में कस्टडी में रहना पड़ा राजदीप, आशुतोष और अन्य को… गाजियाबाद के पूर्व सीएमओ एवं वर्तमान में नोएडा में सीएमएस के पद पर तैनात डॉक्टर अजय अग्रवाल के खिलाफ फर्जी स्टिंग ऑपरेशन करने एवं उसे समाचार चैनल पर चलाकर अजय अग्रवाल की छवि धूमिल करने एवं मानहानि का चल रहा है मुकदमा…

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राजदीप सरदेसाई को अपमानित कर मुकेश अंबानी ने पूरे चौथे खंभे की औकात बता दी (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : देश के सबसे धनी आदमी मुकेश अंबानी का देश के सबसे वरिष्ठ पत्रकारों में से एक राजदीप सरदेसाई ने इंटरव्यू किया. राजदीप बातचीत की शुरुआत मुकेश को देश के सबसे प्रभावशाली / ताकतवर शख्स के रूप में बताते हुए करते हैं और इस पर प्रतिक्रिया मांगते हैं तो इसका जवाब मुकेश अंबानी बहुत घटिया और अहंकारी तरीके से देता है. मुकेश अंबानी का जवाब और उसका अहंकार देख सुन कर एक समझदार आदमी सिर्फ स्तब्ध ही हो सकता है.

इन बनियों की नजर में पत्रकार और मीडिया की औकात कुछ नहीं होती है, क्योंकि ये पूंजी के बल पर मीडिया मालिकों को ही खरीद लेते हैं या फिर पूरे मीडिया हाउस का अधिग्रहण कर लेते हैं. ऐसे में जाहिर है ये किसी की परवाह क्यों करें, खासकर पत्रकार की. लेकिन ये इतने भद्दे, घृणित, जाहिल, असंस्कारी और उद्दंड हो सकते हैं, इसका अंदाजा कतई नहीं था. इस वीडियो में इंटरव्यू का वो वाला हिस्सा भी है जिसमें राजदीप सरदेसाई को मुकेश अंबानी नीचा दिखाने के लिए ‘मैं आपको सीरियसली नहीं लेता हूं’ टाइप की बात कहता है. वीडियो के शुरू और लास्ट में मेरा थोड़ा-सा भाषण है, क्योंकि वीडियो देखकर मन में भड़ास इकट्ठी हो गई तो सोचा एक नया वीडियो बनाकर इसे निकाल ही दूं.

ध्यान रखें, जो जब बुरा करे, उसे खूब गरियाइए, दौड़ा दौड़ा कर गरियाइए, लेकिन इस वीडियो में तो सिर्फ और सिर्फ मुकेश अंबानी की नीचता व अहंकार दिख रहा है. हां, राजदीप जरूर अपनी शालीनता और पेशे की गरिमा बनाए रखते हैं और बिलकुल रिएक्ट नहीं करते हैं. सच में राजदीप सरदेसाई को सैल्यूट करने का मन करता है. मुकेश अंबानी ने अपनी नीचता इस इंटरव्यू के जरिए दिखा दी है.

वीडियो देखने के लिए लिंक नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=FArsyPA4fHs

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

उरूज बानो Is vedio me volume bahut kam h sir..dono ki batcheet samjh nhi aa rahi

Dushayant Shaarma यशवन्त जी, जो जिस लायक होगा उसी हिसाब से डील होगी. सीधी सी बात है मुकेश अंबानी खरीददार है और राजदीप बिकायु है, अब आप इन दोनों से और क्या उम्मीद कर सकते हैं. इस लिए आप जैसे हैं वैसे ही मस्त रहिये

Yashwant Singh मुकेश अंबानी ने तो मोदी जी को भी खरीद लिया है, जियो का विज्ञापन करते हैं, मतलब मोदी जी भी बिकाऊ हैं?

Yashwant Singh आपको पता होना चाहिए कि आईबीएन7 और सीएनएन आईबीएन जब बिक गया था तो राजदीप वगैरह ही थे जो अंबानी के दबाव को खारिज करके खबरें दिखाते थे जिसके कारण उन्हें चैनल से निकाल दिया गया. किसी को यूं ही बिकाऊ नहीं कहना चाहिए वरना भक्तों दासों की कैटगरी में आएंगे. अंबानी देश के बड़े उद्योगपति हैं, उन्हें देश के एक बड़े पत्रकार का सम्मान करना चाहिए था, भारतीय संस्कार यह सिखाता है. वैसे भी जो पेड़ जितना फलदार होता है, उतना झुकता भी है.

Dushayant Shaarma थोड़ा असहमत हूँ भाई, सिर्फ मोदी का विरोध करने से कोई न्यूट्रल पत्रकार कैसे हो सकता है. पत्रकार वो है जो अच्छी बातों की तारीफ करे और गलत बात का विरोध करे. लेकिन राजदीप उन पत्रकारों की श्रेणी में है जो सिर्फ मोदी विरोध को असली पत्रकारिता समझते हैं. माफ़ कीजियेगा मैं आपसे इस मामले में असहमत हूँ

Manmohan Bhalla जब चैनल न्यूज़ की जगह व्यूज़ दिखाने लगें तो वास्तविकता की सार्थकता लुप्त होने लगती है ।।।।।  लेकिन दुर्भाग्य से यही सब आज की पत्रकारिता का स्वरूप बन चुका है

सुबोध खंडेलवाल पूरे इंटरव्यू में मुझे कही भी मुकेश अंबानी अहंकारी नजर नहीं आए उलटा राजदीप अति उत्साही दिखते रहे। यदि कोई किसी पत्रकार को सीरियसली नहीं लेता तो इसमें मीडिया के अपमान की बात कहाँ से आ गई? आपने एक सवाल किया सामने वाले ने इसका जवाब दिया। अब उसका जवाब कैसा हो क्या ये भी सवाल पूछने वाला तय करेगा यशवंत भाई? और वैसे भी राजदीप का सिर्फ ब्रांड बड़ा है उनका वैचारिक स्तर देखना हो तो राज ठाकरे के इंटरव्यू देख लीजिए। दो साल पहले पूछे गए सवाल दो साल बाद दोहरा रहे थे। दोनों इंटरव्यू में राज ठाकरे गरियाते रहे और राजदीप मिमियाते रहे

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

सुबोध खंडेलवाल गुरु महाराज आप जिस पत्रकार के अपमान की बात कर रहे हो पहले उससे तो पूछ लो उसे अपमान लगा या सम्मान लगा? और अपमान लगा तो खुद अपनी बौद्धिकता से उस पूंजीपति को वही जवाब क्यों नहीं दिया ?

Yashwant Singh सुबोध खंडेलवाल ha ha ha, बात तो सही कही आपने

अविनाश विद्रोही यशवंत भाई एक बात बताओ अम्बानी क्यों न बतमीजी करे देश का सबसे शक्तिशाली यानी प्रधान मंत्री तक उस से पूछ कर फैंसला लेता है लगभग 18 चैनल के करीब उसके अपने है और बाकियों पर उसके विज्ञापन ,किस की इतनी ओकात है आज के समय में जो मुकेश अंबानी के खिलाफ एक भी खबर चलाए या उसके विरुद्ध आवाज़ बुलंद करे ,अहंकार आना स्वाभविक है ।

Prafulla Nayak इसके लिए ऑफर किसका था।
अम्बानी का या पत्रकार का।
इस पर ही पूरा किस्सा निर्भर है
कि इंटरव्यू देने अम्बानी गये थे या इसके लिए पत्रकार साहब कई महीनों से प्रयासरत थे।
वैसे यह भी याद होगा पीएम् मोदी की पहली यूएस यात्रा के दौरान इनके क्या सवाल थे और जनता का क्या मूड था।
वो वीडियो भी यू ट्यूब पर है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

Prafulla Nayak पर जवाब अधूरा है बॉस

Yashwant Singh स्टैंड लेना सीखिए. वीडियो देखिए. मुकेश अंबानी की हरकत निंदनीय है. बाकी अपने घर का झगड़ा हम लोग लड़ते सुलझाते रहेंगे. अंबानी की साकानाकामाका.

Prafulla Nayak गये यह थे
या या यह इन्हें बुलाया गया था?
स्टैंड अपनी जगह है।
साइड में।

Yashwant Singh गांड़ मराने गए थे. बस. अगर वीडियो देख के समझ नहीं आ रहा कि एक पत्रकार इंटरव्यू ले रहा तो आपसे बतियाना बेकार. बाई द वे, आप पत्रकार हो या नहीं? अगर नहीं हो तो आपको नहीं समझ आएगा.

Prafulla Nayak कौन गया था
अपनी लाल कराने बॉस।
नाराज़ मत होइए।

Yashwant Singh अप्रासंगिक सवाल. पत्रकार एसाइनमेंट पर ही जाता है. आपको अगर बेसिक समझ नहीं है तो क्या बात की जाए.

Prafulla Nayak साहब, हम अनपढ़
आप ज्ञानी
लेकिन बेसिक आप बता नहीं रहे हैं।
One वे।
यातायात।

Ankit Mathur भाई साहब नब्बे प्रतिशत मीडिया हाउस के मालिकाना हक प्राप्त करने के पष्चात अगर एक अदना से पत्रकार को दिये गये साक्षातकार में अहंकार झलका देता है अम्बानी तो क्या गलत करता है! आखिर मालिक है!

Suneet Upadhyay फेसबुक पर अम्बानी की ऐसी तैसी लिखने वालों को भी कौन सीरियस लेता है 🙂

Pawan Kumar Upreti इसमें अंबानी की क्या गलती है यशवंत भाई, जनता के बीच में चौड़ा होकर घूमने वाले पत्रकार नेताओं के तलवे चाटते फिरेंगे, दलाली करेंगे, सिर्फ अपना हित सोचेंगे, चाहे पत्रकारिता में बाकी मर रहे हों, ऐसे में वे अपने संपादक और मालिकानों की गालियां सुनने को अभिशप्त रहेंगे, जैसा लगभग सभी मीडिया संस्थानों में हो रहा है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

Awadhesh Mishra में आपकी बात से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ यशवंत भाई .. ये आपके बिचार हो सकते है .

सुबोध खंडेलवाल यशवंत भाई ये वो ही राजदीप है जिन्होंने यूपीए सरकार के समय आईबीएन चैनल में कैश फॉर वोट का स्टिंग आपरेशन करके ऐनवक्त पर स्टोरी ड्रॉप कर दी थी। क्यों की थी ये आप भी जानते हो, समझते हो। फिर भी याद दिलाता हूँ यूपीए सरकार ने लेफ्ट की समर्थन वापसी के बाद कुछ भाजपा सांसदों को पैसा देकर सदन से गैर हाजिर रहने का सौदा किया था। भाजपा सांसदों ने इस पूरी पेशकश और सौदेबाजी का स्टिंग ऑपरेशन राजदीप और आशुतोष से करवाया था। ये तय हुआ था कि सदन की कार्रवाई शुरु होने के पहले आईबीएन इसका प्रसारण करेगा लेकिन राजदीप की निष्ठा मीडिया के सिद्धांतों और लोकतंत्र के प्रति नहीं नोट की थैलियों की तरफ झुक गई। चैनल ने स्टिंग दिखाया ही नहीं। फिर सरकार को बेनकाब करने के लिए भाजपा सांसदों ने सदन में उनको दी गई नोटों की गड्डियां लहराई थी। इसके बाद भी आप चाहे तो राजदीप का प्रशंसा गान जारी रख सकते है। मुझे आपसे और आपको मुझसे असहमत होने का पूरा अधिकार है।

Yashwant Singh हम मीडिया के आदमी हैं और मुकेश अंबानी जैसा अगर हमारे किसी साथी का अपमान करेगा तो उसकी ऐसी की तैसी.

सुबोध खंडेलवाल Haahaahaa यदि मैं आपको कह दू कि मैं आपको सीरियसली नहीं लेता तो क्या इसका मतलब ये है कि मैंने आपका अपमान कर दिया ? मतलब ये जरूरी है कि हर आदमी राजदीप को सीरियसली ले ? या ये जरूरी है कि अंबानी उन्हें सीरियसली ले ? आपके लिए महत्वपूर्ण क्या है ? ये कि मुकेश अंबानी उन्हें सीरियसली ले या ये कि वो ईमानदारी से पत्रकारिता करे। राजदीप ने इंटरव्यू की शुरुआत ही तलवे चाटने से की । ये क्यों कहा कि मेरे साथ देश के सबसे पावरफुल व्यक्ति है ? ये कहकर राजदीप ने खुद को छोटा और मुकेश अंबानी को बड़ा दिखाने का अति उत्साह दिखाया । यदि राजदीप में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर और प्रेजेंस ऑफ़ माइंड होता तो वो अंबानी को करारा जवाब दे सकते थे पर वो तो अंबानी के पास बैठकर गदगद हो रहे थे।ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है।

Mahesh Gupta यशवंत जी इसमें किसी की जाति से क्या लेना देना है जो आप जाति पर गालि दे रहे है

Yashwant Singh बनिया जाति को नहीं बल्कि बनियाटिक प्रवृत्ति यानि बनियावाद को गरियाया जा रहा है.

Mahesh Gupta आपने साफ शब्दों मे बनिया जाति का उल्लेख कर उनको बेइज्जत करने का घृणित कार्य किया है

सुबोध खंडेलवाल यशवंत भाई अपनी सृजनात्मकता से व्यापार करने और दूसरों को रोजगार देने वाला हर इंसान बनिया है। चाहे वो रिलायंस वाला मुकेश अंबानी हो या भड़ास वाले यशवंत भाई।

Aanand Singh अम्बानी ने कहा कि वह नहीं मानते कि वह सबसे ताक़तवर हैं। तो इसमें क्या अहंकार है?

Yashwant Singh लगता है कोई आप दूसरा वीडियो देख आए. वह अगर यही कह रहा है तो फिर तो ये पूरी पोस्ट ही बेकार है. धन्य हैं.

Aanand Singh मैंने कहा सुनाई या तो ठीक से नहीं दे रहा है यशवंत जी।

Aanand Singh या तो साफ़ सुनाई नहीं दे रहा! आप मूल बातचीत की यथावत लिंक दीजिए न!

Yashwant Singh उस बातचीत में भी इतना ही है. बाकी तो दूसरे सवालों का सामान्य जवाब है. ताकतवर वाले सवाल के जवाब में अंबानी कह रहा कि मैं तुम्हें सीरियसली नहीं लेता.

Aanand Singh मैंने दोबारा सुना । वह पहले प्रश्न का यह उत्तर देते हैं कि मैं नहीं मानता । और मैं आपको सीरियसली लेता नहीं। इसका अभी फ़िलहाल आशय इतना ही है कि जो बात आप कह रहे हैं उसे नहीं मानता । आपके इस प्रश्न को मैं गंभीर प्रश्न नहीं मान रहा। मेरी धन्यता…

Yogesh Garg पूँजी को सलाम कर रहे है राजदीप फिर कैसा अपमान?

पूजन प्रियदर्शी सीरियसली नहीं लेते तो इंटरव्यू भी नहीं देते।

सुबोध खंडेलवाल गुरु महाराज यशवंत जी आप जिस पत्रकार के अपमान की बात कर रहे हो पहले उससे तो पूछ लो अंबानी की बात उसे अपमानजनक लगी या सम्मानजनक ? और यदि अपमानजनक लगी तो तो खुद अपनी बौद्धिकता और प्रखरता से उस पूंजीपति को वही जवाब क्यों नहीं दिया ? वैसे राजदीप की बॉडी लैंग्वेज तो ऐसी लग रही थी मानो अंबानी के पास बैठकर उन्होंने बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है

Sunil Bajpai ::पत्रकार ::
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते।
बिना सुरा के हम ना रहते
कच्ची भी पा जाते
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -१

ऐसा कोई भ्रष्ट नहीं है।
जो ना मुझको पास बुलाये।
कुत्तों सा दुत्कारे मुझको
लेकिन बोतल रोज दिलाये।।
कसम ईश की खाकर कहते
तलवे चाटे जाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -२

पहले तो हालत खराब थी।
और ना थी पहचान
जबसे पत्रकार कहलाया
आलीशान मकान
इसी लिए तो हम भी जमकर
भ्रष्टों की महिमा गाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -३

ऐसा कोई लाभ नही है
जो है नही उठाया
तलवे चाट चाट कर उनके
लाखों माल कमाया।।
बिना सुन्दरी के सच मानों
हम भी ना सो पाते।।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते- ४

अगर आप से लाभ मिले तो
जो चाहो कर देंगे।
रातों को रंगीन करो तो
मां – बहने भी देंगे – 5

इसीलिए तो सब कुछ पाकर
उढ़े गगन में जाते।
हम तो भइया सब करते हैं।
पत्रकार कहलाते -७

सुनील बाजपेयी

Thakur Sujan Singh Sikarwar Yashwant Singh bhai rajdeep ka itna paksh lena aap per sak ho raha h…. Rajdeep koi dudh ka dhula nhi h

Surendra Mahto Kushwaha Rajdeep jaise ke kiye shalinta waise hi hai jaise pakistaniyo ke hamdardi….kahe ka shalinta jo khaate india ka hai aur din bhar secular ke aad me india ko aur hindu ko girane ka ek v mouka nhi vhhodate hai…god job Ambani

Maninder Singh Sumit awasthi amish devgan sudhir chowdhry rohit sardana deepak chourasiya mukesh ambani ke puppet hai

Kamal Kumar Singh इसको तो मै भी सीरियसली नहीं लेता,मै कौन सा आमिर या घमण्डु हु।  😀

Yashwant Singh सुधीर चौधरी को सीरियसली लेने वाले राजदीप को क्यों लेंगे? हालांकि मेरा कहना है कि पत्रकारिता को बेहद उदात्तता से देखना चाहिए. कोई भाजपाई विचार का है, कोई कांग्रेसी, तो कोई वामी तो कोई आपिया तो कोई व्यापारी विचार का है तो कोई दलाल टाइप है. राजनीति में जो जो लक्षण दिखते मिलते हैं वो सब मीडिया में भी है, इसलिए किसी एक को पूरा खारिज या पूरा स्वीकार करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए. सबकी अच्छाइयों बुराइयों का तार्किक विश्लेषण करना चाहिए और जिसका जो अच्छा हो उसकी तारीफ, जो बुरा हो उसकी आलोचना की जानी चाहिए.

Kamal Kumar Singh हा हा हा। क्या हुआ सुधीर आपके जमात का नहीं ? वो पत्रकार नहीं ? 😀

Yashwant Singh यही तो कह रहा हूं कि सुधीर के साथ भी अगर मुकेश अंबानी ने ऐसी हरकत की होती तो भी मैं मुकेश अंबानी को गरियाता. बात स्टैंड लेने की है. लेकिन आप बता रहे हैं कि मैं भी राजदीप को सीरियसली नहीं लेता. यह दिखाता है कि आपकी भक्त टाइप सोच में अंबानी ने जो हरकत की वो कुछ नहीं, हां आपके जो पूर्वाग्रह हैं राजदीप के प्रति वो यथावत कायम है, अभिव्यक्त हो रहा है.

Kamal Kumar Singh आप चाहे कितना नाराज हो ले, सच तो ये है स्युडो लोगो का चेहरा बेनकाब होने के बाद कोइ भी उन्हें सीरियसली नहीं लेता। मैं भी नहीं। मै कौनसा अम्बानी का पोंछ हु भैया? :D…हाँ , सिरियस मैं सुधीर को भी नहीं लेता। रोहित सरदाना को जरूर लेता हूँ।

Mahesh Singh यशवंत जी मेरे हिसाब से अम्बानी ने कोई गलती नहीं की और कही से वे अशालीन नहीं दिखे बल्कि मुझे सरदेसाई जी या तो जरुरत से ज्यादा चापलूसी या महिनी करते नजर आये जो एक धूर्त आदमी करता है

Dhyanendra Tripathi यशवंत भाई, आप नि:संदेह एक प्रखर मीडिया विश्लेषक और उसकी निगहबानी करने वाले स्वयंसेवक भी है, पर पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि मुकेश जी इस साक्षात्कार में कहीं से अहंकारी नज़र नहीं आ रहे. हॉं .. राजदीप जी के सवाल पर उनका ये कहना कि वो उन्हे सीरियसली नहीं लेते का निहितार्थ और भावार्थ शायद उनकी निर्दोषिता को इंगित करता है. वो राजदीप जी से ये कहना चाहते हैं कि वो सबसे ताकतवर शख्सीयत नहीं हैं. यह कहने में उनका लहजा जो भी रहा हो उससे आप कुछ भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं पर इसमें अहंकार वाली बात कतई तौर पर नहीं है. मुकेश जी शायद बातचीत में इतने धूर्त और अभिजात नहीं बन पाये हैं कि उनके जवाब बड़े रेटोरिक हों. हॉं जो देश का सबसे धनवान व्यक्ति है, उसमें कुछ खास और अलग तो होगा ही और वो सामने भी आयेगा. आप एक बार उनसे मिल लीजिये, दावा है कि आप का नजरिया बदल जायेगा.. गरियाने के त्वरित नतीजे पर हर बार पहुंचना न्यायसंगत नहीं भाई..

Mahesh Singh यसवंत जी यदि सरदेसाई जी आपको कहे की you are the father of journalism तो आप क्या उत्तर देगे

Yashwant Singh तो मैं कहूंगा ये आपका अनुचित विश्लेषण है, लेकिन इतनी ज्यादा महानता बख्शने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद 😀

Mahesh Singh निःसंदेह

Nakul Chaturvedi राजदीप में न जाने कौन सी बात ख़ास लगती है आपको.. राजदीप के इंटरव्यू की शुरुआत ही ओछी थी… बाकी का फिर क्या हाल होगा.. इतना समझदारों को समझ आता है..

Yashwant Singh ये इंटरव्यू का तरीका होता है नकुल जी. पता नहीं आप पत्रकार हैं या नहीं. इंटरव्यू का एक तरीका यह होता है कि हलके फुलके सवाल से शुरू करें और गंभीर सवाल की तरफ जाएं. शुरुआत हलके फुलके से इसलिए की जाती है ताकि माहौल टेंस न रहे, इंटरव्यू देने वाला सहज फील करे. बाकी राजदीप का जितना विरोध मैंने किया है, वो आपने न तो पढ़ा होगा न सुना होगा, इसलिए कोई सफाई नहीं दूंगा. सोच तब गड़बड़ होती है जब हम अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से लगातार चीजों को देखते रहते हैं. अगर अंबानी ने ये हरकत सुधीर चौधरी के साथ की होती तो भी मैं इसी तरह से अंबानी को गरियाता क्योंकि मसला मीडिया जैसे चौथे खंभे के प्रतीक किसी वरिष्ठ पत्रकार को पूरी तरह नान सीरियस बताकर पूरे पेशे की गरिमा को खारिज करने का है.

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‘आजतक’ निष्पक्ष है तो भाजपा की जबरदस्त जीत पर इस चैनल के न्यूज रूम में क्यों बंटी मिठाई? (देखें वीडियो)

Mayank Saxena : इस वीडियो में एक समाचार चैनल है, एक पत्रकार है; जिसको निष्पक्ष होना चाहिए…वह जाहिल एक राजनैतिक दल के जीतने पर कभी बेहद पवित्र और निष्पक्ष रही न्यूज रूम जैसी जगह पर मिठाई बांट रहा है…एक पत्रकार जिसका निष्पक्ष होने का दावा है; जिसको संघी गुंडों ने क्या-क्या न कहा, बेशर्मी से कैमरा पर मिठाई खा कर, अमित शाह को अपनी निष्ठा की दुहाई दे रहा है…10 और पत्रकार ताली बजा रहे हैं…और बजाय अपने न्यूज़रूम में मिठाई बांट रहे इस पत्रकार को नौकरी पर रखने के लिए शर्मिंदा होने के; चैनल इस वीडियो को गर्व से अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर रहा है।

ये पत्रकारिता का ऐतिहासिक युग है, अभी आप एक राजनैतिक दल के प्रति दंडवत हो जाने के लिए; पत्रकारों को सर पर बिठाये हैं। एक विशेष दल के समर्थक पत्रकारों को ही देशभक्त मान रहे हैं। बाद में आप इस युग को याद करेंगे, रोते हुए…कि वो जो इस दौर में भी सर उठाये और रीढ़ सीधी करे खड़े थे…आपने उनको गाली दी और धीरे-धीरे परिदृश्य से ही बाहर कर दिया। न सदन में विपक्ष बचा और न ही पत्रकारिता में…ये ऐतेहासिक युग के तौर पर याद किया जाएगा, क्योंकि तब आपको बचाने वाला कोई नहीं होगा। सिर्फ ये मिठाई बांटने वाले पत्रकार होंगे…दरअसल तब मिठाई खाने वाले पत्रकार भी नहीं बचेंगे…जो बचेंगे, उनको ज़बरन मिठाई खानी पड़ेगी!!

रामराज्य मुबारक़ हो, पत्रकारिता का भस्मासुर युग मुबारक़ हो!!!

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=rH__gndxcFA

युवा पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मयंक सक्सेना की एफबी वॉल से… उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Shahid Khan : I did not find anything wrong in this video particularly Rajdeep conduct. Please note Rajdeep is just an employee any by accepting laddo he has shown he has big heart. Anjana om kashyap conduct is questionable.

Pashupati Jha : खुशियां मानते हुए आधुनिक पॉलीटिक्स की आधुनिक परिभाषा भी बता रहे हैं। Politics is about messaging…..it’s about road shows…it’s about social media…it’s about sending out simple messages.

Kashyap Kishor Mishra : एक पत्रकार को निष्पक्ष होना चाहिए पर निष्पक्षता की सान भी तो निरपेक्ष हो, यदि दक्षिणपंथी राजनितिक रूझान का प्रदर्शन जाहिल हरकत है तो एक पत्रकार का अपना वामपंथी रूझान प्रदर्शित करना भी उतनी ही जाहिल हरकत है

Mayank Saxena : न्यूज़रूम में या ऑन ड्यूटी कैसा भी रुझान प्रकट करना ग़लत है। लेकिन आप अगर पत्रकार के तौर पर साम्प्रदायिकता के विरोध की बात कर रहे हैं या बिना वजह इसमें वाम को घसीटने की प्रवृत्ति के कारण ये लिख रहे हैं, तो आप भी जानते हैं कि आप क्या कर रहे हैं। ज़रा दिखाइए कि कब किस वामपंथी पत्रकार ने ऐसे लड्डू बांटे हैं, टीवी पर खड़े हो कर वाम का समर्थन किया है?

Shakti Singh Bhabor : राजदीप सरदेसाई पक्का जाति समर्थक है। प्रभु, पर्रिकर, गडकरी, जावडेकर के मंत्री बनने पर इन्होंने ट्वीट कर कहा था कि अब सरकार सही हाथो में है।

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करारा जवाब मिलने के तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई माफी मांग बैठे!

Shrimant Jainendra : सानिया मिर्जा के ऑटोबायोग्राफी लांचिंग के मौके पर राजदीप सरदेसाई ने उससे पूछा कि आप कब सेटल हो रही हैं? उनका इशारा बच्चे और परिवार की तरफ था। सानिया ने कहा, ‘क्‍या आपको नहीं लगता कि मैं सेटल हूं? आप निराश लग रहे हैं क्‍योंकि मैंने इस वक्‍त मातृत्‍व की जगह दुनिया की नंबर वन बनना चुना। लेकिन मैं आपके सवाल का जवाब जरूर दूंगीं। ये उन सवालों में से एक है, जिसका हम महिलाओं को अक्‍सर सामना करना पड़ता है। दुर्भाग्‍य से यह कोई मायने नहीं रखता कि हमने कितने विंबलडन जीते या नंबर वन बने, हम सेटल नहीं होते। हालांकि, मातृत्‍व और परिवार शुरू करना भी मेरी जिंदगी में होगा। और ऐसा जब होगा तो मैं जरूर बताऊंगी कि मेरी इसे लेकर क्‍या योजना है?’

राजदीप ने तुरंत माफी मांगते हुए कहा, ‘मैं माफी मांगता हूं। मुझे लगता है कि मैंने गलत ढंग से सवाल पूछा। आप पूरी तरह से सही हैं। मैं ऐसा किसी पुरुष एथलीट से कभी नहीं पूछता।’ सानिया ने कहा, ‘मैं बहुत खुश हूं। आप पहले ऐसे जर्नलिस्‍ट हैं, जिसने नेशनल टीवी पर माफी मांगी हो।’ सानिया ने अंत में कहा, ‘मुझे उम्‍मीद है कि आज से कुछ साल बाद एक 29 साल की लड़की से यह नहीं पूछा जाएगा कि वो कब बच्‍चे पैदा करने वाली है जब वो नंबर वन हो।’

श्रीमंत जैनेंद्र की एफबी वॉल पर प्रकाशित इस पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से एक पठनीय कमेंट यूं है…

Suraj Raw इस पुरूषवादी मानसिकता पर मैं यहाँ ज्यादा नहीं लिखना चाहूँगा लेकिन आज की मीडिया में जिस तरह की अराजकता वयाप्त हुई है ; बेशक इसकी प्रतिष्ठा को काफी हद तक धूमिल करेगी। आज बहुत सारे ऐसे पत्रकारों के सवाल पूछने के पीछे जो एक ठसक दिखाई पड़ता है इससे साफ जाहिर होता है कि वो भी कहीं न कहीं खुद को कुछ अतिविशिष्ट मान बैठे हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि दूसरों की गलतियाँ ढूँढते ढूँढते हम अपने आप को लेकर कुंद हो जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया अगर विकास के इसी रफ्तार से चलती रही तो आने वाले कुछ समय में लोग वास्तव में मीडिया को दूसरी दुनिया की चीज मान बैठेंगे।

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यूपी विधानसभा का कटघरा : राजदीप आये और विधानसभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल आजतक ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोड़ना पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलो ने हंगामा किया था। आजम खां से इस्तीफे तक की मांग हुई थी। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग आपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति में इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लड़ने वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में जर्बदस्त कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ।

वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंजिया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करंजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने करंजिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये।

भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। 70 के दशक में सामाजिक कार्यकर्ता केशव सिंह को तत्कालीन विधायक नरसिंह नारायण पांडे के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के मामले में सदन में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ केशव सिंह हाईकोर्ट से स्टे ले आये, लेकिन सदन ने इस स्टे को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया था कि विधायिका पर हाईकोर्ट का कोई आदेश लागू नहीं होता है। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद केशव को सदन में हाजिर होना पड़ा और उन्हें दंडित भी किया गया। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरे में आकर मांफी मांगनी पड़ी थी।

बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मींडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पूंजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके।आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा,जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये।

आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहाँ खड़ा है,इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में हैं। एनडीटीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। ‘इंडिया टीवी’ के रजत शर्मा अपने को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी है। इसी तरह से जी टीवी वालों के भी भाजपा से अच्छे संबंध हैं। आईबीएन 7 को उद्योगपति मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रानिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।

आज देश में जो माहौल बना हुए है,उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं।

नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। देश का दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया घटिया नेताओं को आगे करके देश का बड़ा नुकसान करने में लगा है। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने के दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट् के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

देश के मीडिया उद्योग में नीरा राडिया से लेकर पीटर और इंद्राणी मुखर्जी तक ने पैसे लगाए निकाले। पत्रकार और राजनीतिज्ञ राजीव शुक्ल (पत्नी भी) मीडिया में हैं।  राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे। कॉरपोरेट की बात करूं तो सहारा से लेकर रिलायंस तक का पैसा मीडिया में है। इनके कारनामे आप सब जानते हैं। 1800 करोड़ रुपए के निवेश पर बीएमडब्लू में 1800 लोगों को नौकरी और अखबार या चैनल पैसे ना होने से बंद हो रहे हैं। कैसे-कैसों के कैसे कैसे चैनल खुल रहे हैं। मीडिया में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन रह रहा है, कौन भागने वाला है, कौन टिकने आया है, कौन पिटने वाला है, कौन भुनाने आया है, कौन जोड़ने, कौन तोड़ने, कौन धंधा करने और कौन कमाने। गंवाने भी कोई आया है क्या। कौन कमा रहा है, कैसे? नहीं कमा रहा है तो क्यो? कोई गंवा भी रहा है क्या। कहां से।

सरकारी विज्ञापनों की 8000 करोड़ रुपए की मलाई कौन और कैसे खा रहा है? कौन ललचा रहा है? किसे अंगूर खट्टे लग रहे हैं – बहुत सारे सवाल और विषय हैं। क्षेत्र तो बहुते बड़ा है। अनुसंधान का। घोटाला घपला का। बहुत मसाला होगा। फिल्म सीरियल, कहानी, उपन्यास, नाटक-नौटकी, कविता के लिए। इसपर कुछ होना चाहिए। कच्चा माल भड़ा पड़ा है। कैसे निकलेगा। दूसरी ओर, प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत एफडीआई की ही अनुमति है। दूसरे कई उद्योगों में 100 प्रतिशत है। मेक इन इंडिया का नारा है। तो विदेशी संस्थान को 100 प्रतिशत निवेश से अखबार निकालने या मीडिया चैनल चलाने की इजाजत क्यों नहीं। कौन मना कर रहा है, विरोध कौन कर रहा है। कोई समर्थक भी है क्या। क्या कारण हैं। ये सब जानने का अधिकार तो हमें है। कुछ सोचो, कुछ करो। देसी मीडिया संस्थानों की दशा इतनी खराब है। फिर भी एफडीआई नहीं। आखिर क्यों? दक्षिण भारत में मीडिया और राजनीति का जो मेल है, पश्चिम भारत में क्या कहने , उत्तरपूर्व में मीडिया की अलग ही दुनिया है। बहुत ही मसालेदार।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल और राजदीप सरदेसाई की ‘आफ दी रिकार्ड’ बातचीत लीक, आप भी देखें वीडियो

केजरीवाल और पुण्य प्रसून बाजपेयी की आफ दी रिकार्ड बातचीत लीक होने का मामला सभी को पता है. अब केजरीवाल और राजदीप सरदेसाई की निजी बातचीत लीक हो गई है. राजदीप सरदेसाई जब केजरीवाल का इंटरव्यू करने के लिए बैठे तो नजीब जंग के मसले पर निजी बात करने लगे. इस दौरान इंटरव्यू की तैयारी के लिए बाकी स्टाफ सक्रिय था. निजी बातचीत के दौरान माइक और कैमरा आन था. नजीब जंग के पाला बदलने को लेकर दोनों लोग दुखी दिखे.

(वीडियो देखने के लिए उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक करें)

केजरीवाल का यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है. इस नए वीडियो में राजदीप से केजरीवाल की जो अनाधिकारिक बातचीत है, उसमें राजदीप पूछते हैं केजरी से कि क्या वो बिहार में प्रचार करेंगे. इस पर केजरी कहते हैं कि वह इस सवाल का इंटरव्यू के दौरान जवाब देना चाहेंगे. गौरतलब है कि इसी टीवी साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस को ठुल्ला कहकर पुकारा था जिसके बाद दो पुलिस कॉस्टेबलों ने उनके खिलाफ पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया था.

केजरीवाल ने हाल ही में यह साक्षात्कार दिया था जिसमें उन्होंने कई सवालों का जवाब दिया. लेकिन जिस तरह से यह वीडियो लीक हुआ है उसने एक बार फिर से केजरीवाल की मीडियाकर्मियों के साथ नजदीकी सामने आयी है. इससे पहले भी केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें उनकी टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी से बातचीत थी और उस साक्षात्कार में केजरीवाल यह कहते हुए सुने गए थे कि इस बात को थोड़ा बार-बार चला दीजिएग.

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: www.goo.gl/pYmdp9

(नोट- वीडियो फ्लैश फाइल यानि FLV फार्मेट में है इसलिए संभव है कइयों के मोबाइल पर न दिखे. इसलिए इसे आप अपने लैपटाप या कंप्यूटर पर देखें.)

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राजदीप सरदेसाई अपनी किताब इस तरह बेचते हैं…

Virendra Yadav : दिल्ली जाने पर खान मार्किट के बुकसेलर्स ‘बाहरीसंस’ में भरसक जाने की कोशिश करता हूँ. कारण एक पंथ दो काज हो जाता है ,नीचे किताब ऊपर फैब इंडिया का कुर्ता. परसों शाम वहां जाकर किताबें देख ही रहा था कि सामने राजदीप सरदेसाई दीख गए .एक व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए उनसे बातचीत शुरू ही की थी कि उन्होंने कहा कि ‘मेरी किताब आपने पढी की नहीं ?’ और किताब उठाकर उसे थमाते हुए कहा कि ‘पढ़िए जरूर’.

फिर अगले आधे घंटे में जो भी उनसे मुखातिब हुआ हर एक को उन्होंने किताब खरीदने के लिए प्रेरित किया और किताब पर अपने हस्ताक्षर करने के लिए बेचैन दिखे .इस तरह तीन -चार ग्राहक तो उन्हें मिल ही गए …..बाद में दुकान के ही एक कारकून ने बताया कि राजदीप हर तीसरे-चौथे दिन वहां आकर इसी तरह अपनी किताब प्रमोट करते है. …जब स्टार पर्सनालिटी अपनी मार्केटिंग इस तरह करते हों तो बेचारा हिन्दी का लेखक यदि कुछ आत्मविज्ञापन कर ही लेता है तो क्या गलत करता है !

हिंदी साहित्यकार, आलोचक और चिंतक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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बड़ा संपादक-पत्रकार बनने की शेखर गुप्‍ता और राजदीप सरदेसाई वाली स्टाइल ये है…

Abhishek Srivastava : आइए, एक उदाहरण देखें कि हमारा सभ्‍य समाज आज कैसे गढ़ा जा रहा है। मेरी पसंदीदा पत्रिका The Caravan Magazine में पत्रकार शेखर गुप्‍ता पर एक कवर स्‍टोरी आई है- “CAPITAL REPORTER”. गुप्‍ता की निजी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी, उनकी कामयाबियों और सरमायेदारियों की तमाम कहानियां खुद उनके मुंह और दूसरों के मार्फत इसमें प्रकाशित हैं। इसके बाद scroll.in पर शिवम विज ने दो हिस्‍से में उनका लंबा साक्षात्‍कार भी लिया। बिल्‍कुल बेलौस, दो टूक, कनफ्यूज़न-रहित बातचीत। खुलासों के बावजूद शख्सियत का जश्‍न जैसा कुछ!!!

दूसरा दृष्‍टान्‍त लेते हैं। अभी दो दिन पहले राजदीप सरदेसाई आजतक के ‘एजेंडे’ में अरुण जेटली से रूबरू थे। अमृता धवन ने जेटली से अडानी-मोदी संबंध पर एक सवाल किया जिस पर जेटली उखड़ गए। राजदीप ने टोकते हुए कहा कि पिछले दस साल में अडानी की संपत्ति में बहुत इजाफा हुआ है। इस पर हाजिरजवाब जेटली तड़ से बोले, ”राजदीप, वो तो तुमने भी बहुत पैसा कमाया है।” इस पर राजदीप ने लिटरली दांत चियार दिया। दस सेकंड बाद शायद उन्‍हें लगा कि इसका प्रतिवाद करना चाहिए और वे बोले कि अडानी से उनकी तुलना ना की जाए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

दरअसल, कारवां की प्रोफाइल ने शेखर गुप्‍ता का पोस्‍टमॉर्टम करने के बहाने कुछ बातें स्‍थापित कर दी हैं जो अब तक खुद कहने में ‘कामयाब’ संपादकों को शायद संकोच होता था। पहली बात, कि एक पत्रकार economically liberal और socially liberal एक साथ एक ही समय में हो सकता है (बकौल गुप्‍ता) यानी पत्रकार को पैसे बनाने से गुरेज़ नहीं होना चाहिए बशर्ते वह कर चुकाता हो। दूसरे, हर कोई (सोर्स भी) एक पत्रकार का ‘मित्र’ है। उसका काम इन मित्रों के संभावित समूहों के बीच संतुलन साधना है। तीसरा, पत्रकार का unapologetic होना उसके ग्‍लैमर को बढ़ाता है। उसे अपने किसी भी किए-अनकिए को लेकर खेद/पश्‍चात्‍ताप नहीं होना चाहिए। चौथा, ये तीनों काम करते हुए भी वह जो कर रहा है वह अनिवार्यत: पत्रकारिता ही है और इसका जश्‍न मनाया जाना चाहिए। आर्थिक सुधार के बाद के दौर में बड़ा संपादक-पत्रकार बनने के ये कुछ गुण हैं, जिसका उत्‍कर्ष शेखर गुप्‍ता या राजदीप सरदेसाई हो सकते हैं।

इन स्‍थापनाओं में ‘मूल्‍यबोध’ कहां है? पत्रकार की ‘पॉलिटिक्‍स’ क्‍या है? ये सवाल हवा में ऐसे उड़ा दिए गए हैं गोया इनकी बात करना पिछड़ापन हो। ज़रा पूछ कर देखिए, शेखर गुप्‍ता के लोकेशन से इसका जवाब शायद यह मिले कि तुम काबिल हो तो पैसे क्‍यों नहीं कमाते? गरीब रहने में क्‍या मज़ा है? चूंकि यही लोकेशन अब मुख्‍यधारा में स्‍थापित है या हो रही है, लिहाजा पत्रकारिता के आदर्श शेखर गुप्‍ता ही होंगे। ठीक वैसे ही जैसे साहित्‍य के आदर्श अशोक वाजपेयी होंगे। शेखर गुप्‍ता, अम्‍बानी और राडिया से लटपट करते रहें या अशोक वाजपेयी रमन सिंह से, फिर भी वे अनुकरणीय बने रहेंगे क्‍योंकि पोस्‍ट-रिफॉर्म भारत में यह बात तय की जा चुकी है कि आप सामाजिक बदलावकारी छवि बनाए रखते हुए पैसे बना सकते हैं चूंकि आप ईमानदार करदाता हैं। इसे कहते हैं चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का तो मेरा हइये है। आप इनकी आलोचना कर के देखिए, आपको कूढ़मगज, कनजर्वेटिव, अलोकतांत्रिक, कुंठित, असफल, कुढ़ने वाला, सनातन निंदक करार दिया जाएगा क्‍योंकि ”आपके अंगूर खट्टे हैं।”

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों आजाद पत्रकार के बतौर सोशल मीडिया और वेब माध्यमों पर सक्रिय होकर जनपक्षधर पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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Secular राजदीप सरदेसाई को Communal मनोहर पर्रिकर पर प्यार आ गया!

Dilip C Mandal : सेकुलर और कम्युनल में क्या रखा है? राजदीप सरदेसाई कट्टर Secular गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) हैं और मनोहर पर्रिकर कट्टर Communal गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB). और फिर प्राइड यानी गर्व का क्या है? हो जाता है. राजदीप को पर्रिकर और प्रभु पर गर्व हो जाता है. सारस्वत को सारस्वत पर गर्व हो जाता है. सेकुलर को कम्युनल पर दुलार आ जाता है. वैसे, अलग से लिखने की क्या जरूरत है कि दोनों टैलेंटेड हैं. वह तो स्वयंसिद्ध है. राजदीप भी कोई कम टैलेंटेड नहीं हैं.

सेकुलर को
कम्युनल पर
प्यार आ गया
प्राइड आ गया.

प्यार शाश्वत है,
प्यार सारस्वत है.

xxx

दो चीज़ों का डर नहीं होना चाहिए। एक तो कि कोई हैक कर लेगा। तो क्या? फिर से बना लेंगे और 10 दिन में पढ़ने वाले भी आ जाएँगे। दूसरा डर कि धार्मिक आस्था को चोट वाला कोई मुक़दमा हो गया तो? एक तो होगा नहीं। कौन अपने धार्मिक ग्रंथों की क़ानूनी पड़ताल कराके उनकी फ़ज़ीहत करना चाहेगा? मुक़दमा हुआ तो हम इस बारे में पढ़ेंगे बहुत और बताएँगे भी बहुत। दूसरे, इस धारा में सज़ा होती नहीं। मैंने कभी सुना नहीं। मुझे करेक्ट कीजिए। तो मस्त रहिए। टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र को थैंक यू कहिए। इतने साल में न मेरा हैक हुआ न किसी ने मुक़दमा किया।

xxx

मनुस्मृति और तमाम स्मृतियों के हिसाब से गोडसे जी को तो क्या, उनकी बिरादरी में किसी को भी बड़े से बड़े अपराध के लिए फाँसी नहीं हो सकती थी। मैकॉले जी ने भारत में पहली बार IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना दिया। क़ानून की नज़र में सब बराबर हो गए। समान अपराध के लिए समान दंड लागू हो गया। तो गोडसे जी को फाँसी हो गई मैकॉले जी के विधान से। इसलिए भी मैकॉले जी भारत में विलेन माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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किसी ने मुझे उकसाया और मैं आपा खो बैठा, उसके बाद जो हुआ उसके लिए खेद जताता हूं : राजदीप सरदेसाई

: My statement on Madison Square Garden – Rajdeep Sardesai :

Over the last week, several versions have appeared on an unfortunate incident at Madison Square Garden when Prime Minister was addressing the Indian American community. Through this period, I have chosen to remain mainly silent because I didn’t want to add to the noise that has prevented any rational explanation.

However, I do believe it is important to put events of the day in context. I along with my camera person was outside Madison Square garden about three hours before the prime minister was to arrive. Our aim was to capture the mood, which was joyous and excited.We were able to reflect much of this in our coverage.

I probably took more selfies on a single day than ever before with the crowd. Sadly, a small group of people began to heckle and abuse us. For a long while, I smiled and shrugged this off and even tried to strike up a conversation to ease the tension.

But after a while, the heckling reached a stage where we had to stop the broadcast as the crowd began to push and jostle. I was abused in terribly foul terms, my family was called names and I was kicked in the shins when my back was turned. The pushing and jostling continued even as I tried not to engage. I had gone to the event with hopes of goodwill instead the volley of name calling was unrelenting and shocking to me.My camera person and other witnesses would bear testimony to this.

A few moments later, I saw someone heckle me again and I lost my patience .I uttered an expletive and lunged at the person. It was an unfortunate response and one which I deeply regret. Whatever the provocation, there is no excuse for me to have got into a scuffle.

Over 26 years of journalism, I have endured a variety of situations but have always maintained my dignity and composure. No amount of provocation justifies a physical response.

I do, however, believe that surrounding, heckling and hurling vicious personalized abuse while a journalist is doing a professional job is also unacceptable. We journalists have a challenging job at the best of times and only ask to be allowed to perform our duties unhindered without intimidation.

The freedom of the press is an integral part of our democracy and should be respected by all.

@sardesairajdeep

October 10
2014

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