राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, राघव बहल समेत नौ लोगों पर मुकदमा चलाने का रास्ता साफ

एक बड़ी खबर आ रही है. जिन दिनों आईबीएन सेवेन और आईबीएन-सीएनएन नाम से  न्यूज चैनलों का संचालन हुआ करता था और इसकी कमान राघव बहल, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष आदि के हाथों में हुआ करती थी, उन्हीं दिनों एक स्टिंग दिखाया गया, ‘शैतान डाक्टर’ नाम से. Continue reading

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करारा जवाब मिलने के तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई माफी मांग बैठे!

Shrimant Jainendra : सानिया मिर्जा के ऑटोबायोग्राफी लांचिंग के मौके पर राजदीप सरदेसाई ने उससे पूछा कि आप कब सेटल हो रही हैं? उनका इशारा बच्चे और परिवार की तरफ था। सानिया ने कहा, ‘क्‍या आपको नहीं लगता कि मैं सेटल हूं? आप निराश लग रहे हैं क्‍योंकि मैंने इस वक्‍त मातृत्‍व की जगह दुनिया की नंबर वन बनना चुना। लेकिन मैं आपके सवाल का जवाब जरूर दूंगीं। ये उन सवालों में से एक है, जिसका हम महिलाओं को अक्‍सर सामना करना पड़ता है। दुर्भाग्‍य से यह कोई मायने नहीं रखता कि हमने कितने विंबलडन जीते या नंबर वन बने, हम सेटल नहीं होते। हालांकि, मातृत्‍व और परिवार शुरू करना भी मेरी जिंदगी में होगा। और ऐसा जब होगा तो मैं जरूर बताऊंगी कि मेरी इसे लेकर क्‍या योजना है?’

राजदीप ने तुरंत माफी मांगते हुए कहा, ‘मैं माफी मांगता हूं। मुझे लगता है कि मैंने गलत ढंग से सवाल पूछा। आप पूरी तरह से सही हैं। मैं ऐसा किसी पुरुष एथलीट से कभी नहीं पूछता।’ सानिया ने कहा, ‘मैं बहुत खुश हूं। आप पहले ऐसे जर्नलिस्‍ट हैं, जिसने नेशनल टीवी पर माफी मांगी हो।’ सानिया ने अंत में कहा, ‘मुझे उम्‍मीद है कि आज से कुछ साल बाद एक 29 साल की लड़की से यह नहीं पूछा जाएगा कि वो कब बच्‍चे पैदा करने वाली है जब वो नंबर वन हो।’

श्रीमंत जैनेंद्र की एफबी वॉल पर प्रकाशित इस पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से एक पठनीय कमेंट यूं है…

Suraj Raw इस पुरूषवादी मानसिकता पर मैं यहाँ ज्यादा नहीं लिखना चाहूँगा लेकिन आज की मीडिया में जिस तरह की अराजकता वयाप्त हुई है ; बेशक इसकी प्रतिष्ठा को काफी हद तक धूमिल करेगी। आज बहुत सारे ऐसे पत्रकारों के सवाल पूछने के पीछे जो एक ठसक दिखाई पड़ता है इससे साफ जाहिर होता है कि वो भी कहीं न कहीं खुद को कुछ अतिविशिष्ट मान बैठे हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि दूसरों की गलतियाँ ढूँढते ढूँढते हम अपने आप को लेकर कुंद हो जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया अगर विकास के इसी रफ्तार से चलती रही तो आने वाले कुछ समय में लोग वास्तव में मीडिया को दूसरी दुनिया की चीज मान बैठेंगे।

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यूपी विधानसभा का कटघरा : राजदीप आये और विधानसभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल आजतक ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोड़ना पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलो ने हंगामा किया था। आजम खां से इस्तीफे तक की मांग हुई थी। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग आपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति में इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लड़ने वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में जर्बदस्त कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ।

वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंजिया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करंजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने करंजिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये।

भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। 70 के दशक में सामाजिक कार्यकर्ता केशव सिंह को तत्कालीन विधायक नरसिंह नारायण पांडे के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के मामले में सदन में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ केशव सिंह हाईकोर्ट से स्टे ले आये, लेकिन सदन ने इस स्टे को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया था कि विधायिका पर हाईकोर्ट का कोई आदेश लागू नहीं होता है। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद केशव को सदन में हाजिर होना पड़ा और उन्हें दंडित भी किया गया। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरे में आकर मांफी मांगनी पड़ी थी।

बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मींडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पूंजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके।आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा,जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये।

आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहाँ खड़ा है,इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में हैं। एनडीटीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। ‘इंडिया टीवी’ के रजत शर्मा अपने को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी है। इसी तरह से जी टीवी वालों के भी भाजपा से अच्छे संबंध हैं। आईबीएन 7 को उद्योगपति मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रानिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।

आज देश में जो माहौल बना हुए है,उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं।

नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। देश का दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया घटिया नेताओं को आगे करके देश का बड़ा नुकसान करने में लगा है। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने के दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट् के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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कुछ मीडिया हाउसों पर कारपोरेट्स का दबाव है : राजदीप सरदेसाई

अजमेर : यहां आयोजित साहित्य सम्मेलन के गुफ्तगू सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहा कि मैं नहीं मानता कि पूरी मीडिया बिकी हुई है. ये देश बेइमानों का देश नहीं है. इस देश की अधिकांश जनता ईमानदार है. ईमानदारी के कारण ही देश तरक्की कर रहा है. मीडिया जनता पर निर्भर है, किसी कॉर्पोरेट पर निर्भर नहीं है. हां कुछ मीडिया हाउस में कॉर्पोरेट के कारण समस्या है लेकिन उनका भी समाधान होगा. उन्होंने माना कि कुछ मीडिया हाउस पर कॉर्पोरेट्स का दबाव है.

इस सत्र में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अदिति मेहता के सवालों का जवाब देते हुए सरदेसाई ने कहा कि अब डिजिटल मीडिया की ताकत बढ़ रही है. आम जनता को भी अब सिटीजन जर्नलिस्ट बनना होगा. कार्पोरेट्स और बिल्डर्स मीडिया हाउस बना रहे हैं ताकि वे मीडिया की आड़ में अपने काम निकाल सकें. राजनीतिक दलों ने चुनावों में पेड न्यूज के कैंसर को जन्म दिया है. लेकिन सभी मीडिया हाउस में ऐसा नहीं है. हाल ही में कुछ कॉर्पोरेट्स ने एक ग्रुप बनाया है जो चाहते हैं कि देश का मीडिया पारदर्शिता और ईमानदारी से काम करे.

सरदेसाई ने कहा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया बिजनेस मॉडल बन गया है, जो बिकेगा वो चलेगा. इससे पत्रकारिता की नई परिभाषा बनी है और पत्रकारों की आत्मा को ही समाप्त कर दिया है. विज्ञापनदाता का भी दबाव होता है कि यदि चैनल की टीआरपी ज्यादा होगी तो ही वह विज्ञापन देगा. इसलिए न्यूज चैनल में प्रतिदिन आज का बकरा या आज का मुर्गा कौन तय कर उसे ही दिनभर अलग अलग अंदाज में दिखाया जाता है. ऐसे में दर्शकों को खुद अपने आप से सवाल करना चाहिए कि वे क्या देखना पसंद करेंगे. 

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

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दिल्ली में इन दिनों तीन-चार चैनल सुपारी जर्नलिज्म चला रहे हैं : राजदीप सरदेसाई

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

देश के मीडिया उद्योग में नीरा राडिया से लेकर पीटर और इंद्राणी मुखर्जी तक ने पैसे लगाए निकाले। पत्रकार और राजनीतिज्ञ राजीव शुक्ल (पत्नी भी) मीडिया में हैं।  राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे। कॉरपोरेट की बात करूं तो सहारा से लेकर रिलायंस तक का पैसा मीडिया में है। इनके कारनामे आप सब जानते हैं। 1800 करोड़ रुपए के निवेश पर बीएमडब्लू में 1800 लोगों को नौकरी और अखबार या चैनल पैसे ना होने से बंद हो रहे हैं। कैसे-कैसों के कैसे कैसे चैनल खुल रहे हैं। मीडिया में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन रह रहा है, कौन भागने वाला है, कौन टिकने आया है, कौन पिटने वाला है, कौन भुनाने आया है, कौन जोड़ने, कौन तोड़ने, कौन धंधा करने और कौन कमाने। गंवाने भी कोई आया है क्या। कौन कमा रहा है, कैसे? नहीं कमा रहा है तो क्यो? कोई गंवा भी रहा है क्या। कहां से।

सरकारी विज्ञापनों की 8000 करोड़ रुपए की मलाई कौन और कैसे खा रहा है? कौन ललचा रहा है? किसे अंगूर खट्टे लग रहे हैं – बहुत सारे सवाल और विषय हैं। क्षेत्र तो बहुते बड़ा है। अनुसंधान का। घोटाला घपला का। बहुत मसाला होगा। फिल्म सीरियल, कहानी, उपन्यास, नाटक-नौटकी, कविता के लिए। इसपर कुछ होना चाहिए। कच्चा माल भड़ा पड़ा है। कैसे निकलेगा। दूसरी ओर, प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत एफडीआई की ही अनुमति है। दूसरे कई उद्योगों में 100 प्रतिशत है। मेक इन इंडिया का नारा है। तो विदेशी संस्थान को 100 प्रतिशत निवेश से अखबार निकालने या मीडिया चैनल चलाने की इजाजत क्यों नहीं। कौन मना कर रहा है, विरोध कौन कर रहा है। कोई समर्थक भी है क्या। क्या कारण हैं। ये सब जानने का अधिकार तो हमें है। कुछ सोचो, कुछ करो। देसी मीडिया संस्थानों की दशा इतनी खराब है। फिर भी एफडीआई नहीं। आखिर क्यों? दक्षिण भारत में मीडिया और राजनीति का जो मेल है, पश्चिम भारत में क्या कहने , उत्तरपूर्व में मीडिया की अलग ही दुनिया है। बहुत ही मसालेदार।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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बड़ा संपादक-पत्रकार बनने की शेखर गुप्‍ता और राजदीप सरदेसाई वाली स्टाइल ये है…

Abhishek Srivastava : आइए, एक उदाहरण देखें कि हमारा सभ्‍य समाज आज कैसे गढ़ा जा रहा है। मेरी पसंदीदा पत्रिका The Caravan Magazine में पत्रकार शेखर गुप्‍ता पर एक कवर स्‍टोरी आई है- “CAPITAL REPORTER”. गुप्‍ता की निजी से लेकर सार्वजनिक जिंदगी, उनकी कामयाबियों और सरमायेदारियों की तमाम कहानियां खुद उनके मुंह और दूसरों के मार्फत इसमें प्रकाशित हैं। इसके बाद scroll.in पर शिवम विज ने दो हिस्‍से में उनका लंबा साक्षात्‍कार भी लिया। बिल्‍कुल बेलौस, दो टूक, कनफ्यूज़न-रहित बातचीत। खुलासों के बावजूद शख्सियत का जश्‍न जैसा कुछ!!!

दूसरा दृष्‍टान्‍त लेते हैं। अभी दो दिन पहले राजदीप सरदेसाई आजतक के ‘एजेंडे’ में अरुण जेटली से रूबरू थे। अमृता धवन ने जेटली से अडानी-मोदी संबंध पर एक सवाल किया जिस पर जेटली उखड़ गए। राजदीप ने टोकते हुए कहा कि पिछले दस साल में अडानी की संपत्ति में बहुत इजाफा हुआ है। इस पर हाजिरजवाब जेटली तड़ से बोले, ”राजदीप, वो तो तुमने भी बहुत पैसा कमाया है।” इस पर राजदीप ने लिटरली दांत चियार दिया। दस सेकंड बाद शायद उन्‍हें लगा कि इसका प्रतिवाद करना चाहिए और वे बोले कि अडानी से उनकी तुलना ना की जाए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

दरअसल, कारवां की प्रोफाइल ने शेखर गुप्‍ता का पोस्‍टमॉर्टम करने के बहाने कुछ बातें स्‍थापित कर दी हैं जो अब तक खुद कहने में ‘कामयाब’ संपादकों को शायद संकोच होता था। पहली बात, कि एक पत्रकार economically liberal और socially liberal एक साथ एक ही समय में हो सकता है (बकौल गुप्‍ता) यानी पत्रकार को पैसे बनाने से गुरेज़ नहीं होना चाहिए बशर्ते वह कर चुकाता हो। दूसरे, हर कोई (सोर्स भी) एक पत्रकार का ‘मित्र’ है। उसका काम इन मित्रों के संभावित समूहों के बीच संतुलन साधना है। तीसरा, पत्रकार का unapologetic होना उसके ग्‍लैमर को बढ़ाता है। उसे अपने किसी भी किए-अनकिए को लेकर खेद/पश्‍चात्‍ताप नहीं होना चाहिए। चौथा, ये तीनों काम करते हुए भी वह जो कर रहा है वह अनिवार्यत: पत्रकारिता ही है और इसका जश्‍न मनाया जाना चाहिए। आर्थिक सुधार के बाद के दौर में बड़ा संपादक-पत्रकार बनने के ये कुछ गुण हैं, जिसका उत्‍कर्ष शेखर गुप्‍ता या राजदीप सरदेसाई हो सकते हैं।

इन स्‍थापनाओं में ‘मूल्‍यबोध’ कहां है? पत्रकार की ‘पॉलिटिक्‍स’ क्‍या है? ये सवाल हवा में ऐसे उड़ा दिए गए हैं गोया इनकी बात करना पिछड़ापन हो। ज़रा पूछ कर देखिए, शेखर गुप्‍ता के लोकेशन से इसका जवाब शायद यह मिले कि तुम काबिल हो तो पैसे क्‍यों नहीं कमाते? गरीब रहने में क्‍या मज़ा है? चूंकि यही लोकेशन अब मुख्‍यधारा में स्‍थापित है या हो रही है, लिहाजा पत्रकारिता के आदर्श शेखर गुप्‍ता ही होंगे। ठीक वैसे ही जैसे साहित्‍य के आदर्श अशोक वाजपेयी होंगे। शेखर गुप्‍ता, अम्‍बानी और राडिया से लटपट करते रहें या अशोक वाजपेयी रमन सिंह से, फिर भी वे अनुकरणीय बने रहेंगे क्‍योंकि पोस्‍ट-रिफॉर्म भारत में यह बात तय की जा चुकी है कि आप सामाजिक बदलावकारी छवि बनाए रखते हुए पैसे बना सकते हैं चूंकि आप ईमानदार करदाता हैं। इसे कहते हैं चित भी मेरी, पट भी मेरी, सिक्‍का तो मेरा हइये है। आप इनकी आलोचना कर के देखिए, आपको कूढ़मगज, कनजर्वेटिव, अलोकतांत्रिक, कुंठित, असफल, कुढ़ने वाला, सनातन निंदक करार दिया जाएगा क्‍योंकि ”आपके अंगूर खट्टे हैं।”

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों आजाद पत्रकार के बतौर सोशल मीडिया और वेब माध्यमों पर सक्रिय होकर जनपक्षधर पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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Secular राजदीप सरदेसाई को Communal मनोहर पर्रिकर पर प्यार आ गया!

Dilip C Mandal : सेकुलर और कम्युनल में क्या रखा है? राजदीप सरदेसाई कट्टर Secular गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB) हैं और मनोहर पर्रिकर कट्टर Communal गौड़ सारस्वत ब्राह्मण (GSB). और फिर प्राइड यानी गर्व का क्या है? हो जाता है. राजदीप को पर्रिकर और प्रभु पर गर्व हो जाता है. सारस्वत को सारस्वत पर गर्व हो जाता है. सेकुलर को कम्युनल पर दुलार आ जाता है. वैसे, अलग से लिखने की क्या जरूरत है कि दोनों टैलेंटेड हैं. वह तो स्वयंसिद्ध है. राजदीप भी कोई कम टैलेंटेड नहीं हैं.

सेकुलर को
कम्युनल पर
प्यार आ गया
प्राइड आ गया.

प्यार शाश्वत है,
प्यार सारस्वत है.

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दो चीज़ों का डर नहीं होना चाहिए। एक तो कि कोई हैक कर लेगा। तो क्या? फिर से बना लेंगे और 10 दिन में पढ़ने वाले भी आ जाएँगे। दूसरा डर कि धार्मिक आस्था को चोट वाला कोई मुक़दमा हो गया तो? एक तो होगा नहीं। कौन अपने धार्मिक ग्रंथों की क़ानूनी पड़ताल कराके उनकी फ़ज़ीहत करना चाहेगा? मुक़दमा हुआ तो हम इस बारे में पढ़ेंगे बहुत और बताएँगे भी बहुत। दूसरे, इस धारा में सज़ा होती नहीं। मैंने कभी सुना नहीं। मुझे करेक्ट कीजिए। तो मस्त रहिए। टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र को थैंक यू कहिए। इतने साल में न मेरा हैक हुआ न किसी ने मुक़दमा किया।

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मनुस्मृति और तमाम स्मृतियों के हिसाब से गोडसे जी को तो क्या, उनकी बिरादरी में किसी को भी बड़े से बड़े अपराध के लिए फाँसी नहीं हो सकती थी। मैकॉले जी ने भारत में पहली बार IPC यानी इंडियन पीनल कोड बना दिया। क़ानून की नज़र में सब बराबर हो गए। समान अपराध के लिए समान दंड लागू हो गया। तो गोडसे जी को फाँसी हो गई मैकॉले जी के विधान से। इसलिए भी मैकॉले जी भारत में विलेन माने जाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल के फेसबुक वॉल से.

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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