सीनियर डाक्टर के खिलाफ फर्जी खबर चलाने वाले राजदीप को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं

निचली अदालत में अपने खिलाफ चल रहे केस की सुनवाई रोकने को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को राहत नहीं मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया है. Continue reading

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राजदीप सरदेसाई, आशुतोष, राघव बहल समेत नौ लोगों पर मुकदमा चलाने का रास्ता साफ

एक बड़ी खबर आ रही है. जिन दिनों आईबीएन सेवेन और आईबीएन-सीएनएन नाम से  न्यूज चैनलों का संचालन हुआ करता था और इसकी कमान राघव बहल, राजदीप सरदेसाई, आशुतोष आदि के हाथों में हुआ करती थी, उन्हीं दिनों एक स्टिंग दिखाया गया, ‘शैतान डाक्टर’ नाम से. Continue reading

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राजदीप चाहते तो प्रणब मुखर्जी से माफी मांगने वाला हिस्सा इंटरव्यू की एडिटिंग के दौरान हटवा सकते थे!

Nitin Thakur : प्रभु चावला का एक प्रोग्राम ‘सीधी बात’ आजतक पर आता था। एक दिन प्रभु चावला ने अपने कोंचनेवाले अंदाज़ में एक नेता को छेड़ दिया। नेताजी ने गरम होकर ऑनएयर ऐसा बहुत कुछ कह डाला जो आगे ख़बर भी बना। अगले दिन एक लड़का दूसरे को कह रहा था- ‘कल तो उस नेता ने प्रभु चावला को चुप ही करा दिया। ऐसी-ऐसी सुनाई कि प्रभु चावला मुंह देखता रह गया..कुछ बोल भी नहीं सका। इन पत्रकारों को तो ऐसे ही सुनानी चाहिए’ दूसरा लड़का चुप खड़ा था। पहले वाला और भी बहुत कुछ बोला।

दूसरे को जवाब ना देता देख मुझे मजबूरन बीच में बोलना पड़ा- ‘बीच में बोलने के लिए माफ करना लेकिन क्या तुम्हें समझ आया कि ये जीत प्रभु चावला की ही थी। लोग एंकर का भाषण सुनने के लिए तो टीवी नहीं देखते। ना एंकर की कोशिश होती है कि वो भाषण दे। एंकर की जीत ही इसमें है कि वो सामनेवाले से ऐसा कुछ बुलवा ले जो वो बोलने से बच रहा हो। नेताजी का योजनाबद्ध संयम तुड़वाना ही प्रभु चावला की कोशिश थी। जब तक वो संयम नहीं टूटा प्रभु चावला सवाल कर रहे थे लेकिन जैसे ही बांध टूटा तो फिर प्रभु चावला का काम हो गया और वो चुप्पी लगाकर सुनते रहे। इसे एंकर की बोलती बंद होना नहीं कहते..बल्कि सामनेवाले की ढोलक फोड़ना कहते हैं’

खैर मुझे जो समझ आया वो ज्ञान दे दिया..बाकी तो सब ज्ञानी हैं ही यहां।

आज ये ज्ञान मुझे देने की ज़रूरत इसलिए भी महसूस हुई क्योंकि दो-एक दिन पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का इंटरव्यू राजदीप सरदेसाई ने लिया। इंटरव्यू के दौरान राजदीप ने प्रणब मुखर्जी को एक जवाब के बीच में टोक कर कुछ पूछ लिया। शायद मुखर्जी अपना जवाब मुकम्मल करना चाहते थे लेकिन अचानक हुई टोकाटाकी से उन्हें हल्का गुस्सा आ गया। पुराना नेता, पकी उम्र और सर्वोच्च पद पर आसीन रहने के मिले जुले रुतबे से मुखर्जी ने जो कुछ कहा उसके बीच राजदीप ने अपनी गलती तुरंत मानी और गरिमापूर्ण ढंग से माफी मांग ली। आगे मुखर्जी ने अपना इंटरव्यू अच्छे से दिया और आखिर में खुद भी राजदीप के प्रति थोड़ा कठोर होने के लिए खेद व्यक्त किया।

बावजूद इसके राजदीप ने मुखर्जी से कहा कि मैं इसे सकारात्मक ढंग से लेता हूं। कुछ पेशेवर ट्रोल्स और मीडिया से नफरत पाल बैठे लोगों ने इसे राजदीप का मज़ाक बनाने में इस्तेमाल किया, जबकि ये सबक पत्रकारिता और राजनीति दोनों के नवागंतुकों के लिए था। समय आ गया है जब नेताओं और पत्रकारों को आपसी सम्मान रीस्टोर करना चाहिए। नेताओं को समझना होगा कि वो सत्ताधारी हैं। आज़ाद पत्रकारिता को सांस मिलती रहे तो ही उनका शासन इतिहास का उजला अध्याय माना जाएगा, और पत्रकारों को समझना पड़ेगा कि उनका काम सवालों का जवाब हासिल करना है ना कि हमलावर मुद्रा में सामने वाले को रौंद डालना। बाकी तो जिन लोगों को ना लोकतंत्र समझना है, ना राजनीति और ना पत्रकारिता ये पोस्ट उनके लिए नहीं है।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

अविनाश विद्रोही सबसे बड़ी बात है राजदीप उस भाग को काट सकते थे क्योंकि वो लाइव नही था बाबजूद उसके उन्होंने उस अंश को लोगो को दिखाने का साहस किया ये भी एक तरह की अच्छी रिपोर्टिंग ही है।

Sanjaya Kumar Singh लेकिन भक्त बेचारे इतना जानते तो भक्त क्यों होते ….

Ayush Dubey Bas ye akal sab Mein hoti to sab samajhdar Na kehlaate.

Nitin Thakur कुछ लोगों को सब समझ है लेकिन जानबूझकर अनजान बनते हैं। उनको जो सिद्ध करना होता है सारा ज़ोर वही सिद्ध करने में लगाते हैं।

Puneet Gaur Pranav Babu has habit of scolding, even now senior Congress leaders mentioned it many times, so but his Rajdeep conduct was good, As far as cutting off the portion is concerned, it’s not possible, whole channels credibility would have been in limbo after that (whatever is left) remember Namo interview with DD

Nitin Thakur हां मुखर्जी का ऐसा स्वभाव भी है लेकिन बावजूद इसके अंत में उनका खेद प्रकट करना उनकी उदारता ही दर्शाता है। उन्हें इसकी भी ज़रूरत नहीं थी। बाकी चैनल के पास कोई क्लिप काट देने का पूरा अधिकार और सुविधा होती है।

रोशन मैं पत्रकारिता का छात्र हूं. ‘हमारा काम सवालों का जवाब हासिल करना है ना कि हमलावर मुद्रा में सामने वाले को रौंद डालना’, यह सबक आजीवन याद रखूंगा।

Kamlesh Rathore राजदीप ने अपनी गलती मानी वही बडी बात है नहीं तो आज कल के बेलगाम एंकर कहाँ सुनते किसी की। दूसरा उसे ऑनएयर किया वो बडी हिम्मत है। (वैसे वो नेता जी कौन थे सीधी बात वाले?)

Nitin Thakur नेता और जिससे कहा जा रहा था कि प्रभु चावला की बोलती बंद हो गई दोनों की पहचान गुप्त है।

Ritu Raj Misra आजाद पत्रकारिता का अर्थ गुलाम इंटरव्यूई नहीं होता . नेता ने अगर कुछ बोल दिया तो वो भी संविधान के दायरे में आता है .

Nitin Thakur कहां लिखा गया कि असंवैधानिक है।

Ritu Raj Misra अगर संवैधानिक है तो किसी भी थर्ड पार्टी का मंतव्य इसे परिवर्तित करने का महज एक दृष्टिकोण भर है . मिडिया अपने स्वतंत्रता के अधिकार का बहुत जिक्र करती है जबकि उसके पास और भी अधिकार हैं और भी कर्त्तव्य . जब हम मीडिया में स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उसका अर्थ लगभग लगभग उच्छ्न्खलता होता है. मीडिया के पास दो चीजें हैं बाज़ार के नियम और एथिक्स. बाज़ार ताकतवर होता है और एथिक्स को रौंद देता है तो बचता है सिर्फ बाज़ार . मीडिया में आतंरिक नियमन के तरीके कमजोर है. मैंने किसी पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होते हुए नहीं देखी गैर-जिम्मेदार खबरों पर . लगभग लगभग सभी संस्थाओं को इन्टरनल डिसिप्लिन के लिए कंडक्ट रूल होते हैं . मैंने नहीं देखा कि उन पर कभी कोई कार्यवाही होती है. क्या मीडिया को खुद आर टी आई के अन्दर नहीं आना चाहिए खुद इतनी बड़ी बड़ी बातें करने वाले बिलकुल अपारदर्शी और कमजोर लोग है . मीडिया अपनी आतंरिक कमियों से ढह रहा है . धीमे धीमे मीडिया शुद्ध रूप से मीडिया ही रह जायेगा वह एक कांच का टुकड़ा या लेंस होगा जिसकी नैतिक अथारटी शून्य होगी.

Nitin Thakur खबरों को लेकर मीडिया अकेला नियम नहीं बनाता है। सरकार के विभागों से उसके पास लगातार नोटिस और नोटिफिकेशन आते रहते हैं। उसके मुताबिक ही खबरें चलती हैं। पूरी तरह सरकार को अधिकार देने में डर यही है कि फिर जो सरकार आएगी वही सारे मीडिया को डीडी की तरह चलाएगी। नेहरू ने एक बार कहा था कि मीडिया थोड़ी गड़बड़ी करे तो भी मैं उसकी आज़ादी के पक्ष में हूं। स्वाभाविक है गड़बड़ी से उनका मतलब तब पेड खबरें चला लेने से नहीं रहा होगा, बल्कि वो खबरों को लेकर ही ऐसा कह रहे होंगे। आज भी ज़िम्मेदार मीडिया संस्थान किसी खबर को यूं ही नहीं चलाते। उनके पास कोई ना कोई आधार होता है। हां खबरों के चयन और एंंगल को एडिटोरियल सेंस पर छोड़ा जाता है जिसे किसी भी तरह की चुनौती देने का सीधा मतलब मीडिया की आज़ादी में दखल ही है। वैसे गलत खबरों पर लीगल नोटिस आते रहते हैं और सबको जवाब देना होता है। हर संस्थान के पास वकीलों की टीम है। लोग नहीं जानते कि मीडिया संस्थान हर दूसरे दिन कहीं ना कहीं किसी खबर पर केस लड़ते हैं। आसाराम, केजरीवाल, निर्मल बाबा के चेलों ने तो सीरीज़ में केस दायर किए थे। लोकतंत्र हैं उनको अधिकार है और उसी अधिकार के तहत ज़िम्मेदार संस्थान केस लड़ रहे हैं। इसके इतर कल-परसों में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हुई छुटपुट वेबसाइट्स की बात अलग है । इनमें बहुत एजेंडा वेबसाइट हैं लेकिन न्यूज़ वेबसाइट्स की तरह बिहेव करती हैं। इन्होंने मीडिया की गिरती साख में और बट्टा लगाया है। हां, आरटीआई में मीडिया को आना चाहिए ये सही है। फंडिंग वगैरह का ब्यौरा जानने का सबको अधिकार होना चाहिए।

Rashid Mohd राजदीप सरदेसाई ख़ुद में एक अच्छी शख्शियत है और एक मंझे हुए पत्रकार है।

Dharamveer Katoch राजदीप जानते हैं कौन सी बोल खेलनी है और कौन सी छोड़नी है,आख़िर दिलीप सरदेसाई जैसे बल्लेबाज के बेटे हैं…अब मालिकों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाचने वाले इस बात को समझेंगे?

Nitin Thakur मुझे पता नहीं लगा कि खेलनी और छोड़नी जैसा इसमें क्या था। सवाल पूछने के लालच में और कई बार काउंटर क्वेश्चन में ओवर लैपिंग होती है। जवाब देने वाले की लय टूट जाती है। माफी मांग कर उन्होंने इंटरव्यू को सीधा सीधा चलने दिया है।

Dharamveer Katoch आज के योद्धा पत्रकार कभी मान सकते हैं कि उन्हें माफ़ी मांग लेनी चाहिये,उन्हें तो मानों दुनियां का अंतिम सत्य हाथ लग गया है!

Nitin Thakur हां ये बड़ी दिक्कत तो है ही।

Anuj Agrawal रविशंकर जी को ये इंटरव्यू देखना चाहिये, और उसके बाद बाजपेयी जी को दिया अपना इंटरव्यू, पुण्य सर के संयम काबिलेतारीफ था उस इंटरव्यू में…

Shamim Uddin Ansari प्रभु चावला कोई अच्छे इंटरव्यू कर्ता नहीं थे। अरशद वारसी ने भी उनकी ख़ूब ख़बर ली थी।

Nitin Thakur अपनी अपनी पसंद है। मैं यहां रेटिंग नहीं दे रहा।

नवनीत कुमार अगर आजकल एडिटिंग होना बंद हो जाये तो कमाल हो जाये! उमर अब्दुल्ला भी एक बार ऐसे ही भड़क गए थे प्रभु जी से। तब काफी छोटे थे हम लोग लेकिन तीन पांच समझने लगे थे। उस समय प्रभु जी ने ऐसी डांट लगाई की अब्दुल्ला एकदम चुप हो गए।

Nitin Thakur चैनल मेजबान होते हैं और दूसरे लोग मेहमान। ऐसे में एंकर्स को विनम्रता बरतनी चाहिए, दूसरी बात ये है कि पत्रकार यूं भी कोई पुलिस वाला नहीं होता कि ज़ोर जबरदस्ती से बुलवा ले.. वो समझदारी से ही जवाब निकलवा सकता है। तीसरी बात ये कि कई पत्रकार नेताओं के मुकाबले बहुत विद्वान होते हैं लेकिन उनका काम अक्सर कई मौकों पर ज्ञान झाड़ना नहीं होता। उमर अब्दुल्ला तो वाकई प्रभु चावला के मुकाबले तब बहुत कम ज्ञान रखते होंगे।

नवनीत कुमार जी बिल्कुल उस समय अब्दुल्ला काफी यंग थे। जबकि प्रभू सर वरिष्ठ थे। और धाकड़ भी थे।

Ashok Pandey ठाकुर साहेब इसे आप चाहे सामने वाले की ढोल फोड़ना कहे या उकसा कर सामने वाले से कुछ कहलवाना , लेकिन एक बात तो सत्य है कि ऐंकर अक्सर अपनी सीमा लाँघ जाते हैं , एक सवाल के जवाब से पहले दूसरा सवाल , वो भी बिलकुल आक्रामक अंदाज में। ऐंकर को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐंकर की ही ढोल फोड़ने को आमादा हो जाते हैं।मुझे राज ठाकरे का इंटरव्यू याद है और उस पत्रकार का चेहरा भी। खैर राजदीप सर देसाई का अंदाज पूर्व राष्ट्रपति के साथ जैसा रहा , कईयों के लिए सबक होगा।

Nitin Thakur मैंने तो खुद ही माना है कि ये पत्रकारों के लिए भी एक सबक है। मैं कौन सा बचाव कर रहा हूं कि आप ये कमेंट लिखने को मजबूर हैं। बाकी रहे राज ठाकरे तो वो गुंडे हैं। उनसे सबको डरना भी चाहिए।

Ashok Pandey ठाकुर साहब मैने ऐसा क्या लिख दिया जो आपको बुरा लग गया ..

Nitin Thakur बुरा लगने के काबिल आपने कुछ नहीं लिखा पांडे जी, मैंने बुरा माना भी नहीं है। मैंने बस इतना भर लिखा है कि मैं आपकी सीमा लांघने की बात से सहमत हूं तभी तो लिखा है कि इससे सबक लेना चाहिए।

Mohammed Saood Khan बहुत उम्दा Nitin Thakur bhai… बस आपकी आखिरी लाइन गलत है.. असल में ये पोस्ट लोकतंत्र और पत्रकारिता ना समझने वालों के लिए ज़्यादा ज़रूरी है 🙂

Prashant Mishra आजकल क्यों ऐसा पेश किया जा रहा कि पत्रकार लोहा ले रहे राजनेताओं से? क्या ये सिर्फ़ TRP के लिए है या पत्रकारों की महत्वाकांक्षा पूरी करने का माध्यम मीडिया हो गया है? मुझे लगता है निष्पक्ष पत्रकारिता के चोले में पत्रकार अपना नैसर्गिक भाव भूल रहे हैं, और राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश करते नजर आ रहे।

Neeraj Rawat ऐसा ही रविश कुमार ने किरन बेदी के साथ किया था और …बेदी जी की सिरी राजनेतिक समझ तार तार हो गई थी ऐसे बहुत से उदाहरण है। …अच्छी पत्रकारिता के..

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करारा जवाब मिलने के तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई माफी मांग बैठे!

Shrimant Jainendra : सानिया मिर्जा के ऑटोबायोग्राफी लांचिंग के मौके पर राजदीप सरदेसाई ने उससे पूछा कि आप कब सेटल हो रही हैं? उनका इशारा बच्चे और परिवार की तरफ था। सानिया ने कहा, ‘क्‍या आपको नहीं लगता कि मैं सेटल हूं? आप निराश लग रहे हैं क्‍योंकि मैंने इस वक्‍त मातृत्‍व की जगह दुनिया की नंबर वन बनना चुना। लेकिन मैं आपके सवाल का जवाब जरूर दूंगीं। ये उन सवालों में से एक है, जिसका हम महिलाओं को अक्‍सर सामना करना पड़ता है। दुर्भाग्‍य से यह कोई मायने नहीं रखता कि हमने कितने विंबलडन जीते या नंबर वन बने, हम सेटल नहीं होते। हालांकि, मातृत्‍व और परिवार शुरू करना भी मेरी जिंदगी में होगा। और ऐसा जब होगा तो मैं जरूर बताऊंगी कि मेरी इसे लेकर क्‍या योजना है?’

राजदीप ने तुरंत माफी मांगते हुए कहा, ‘मैं माफी मांगता हूं। मुझे लगता है कि मैंने गलत ढंग से सवाल पूछा। आप पूरी तरह से सही हैं। मैं ऐसा किसी पुरुष एथलीट से कभी नहीं पूछता।’ सानिया ने कहा, ‘मैं बहुत खुश हूं। आप पहले ऐसे जर्नलिस्‍ट हैं, जिसने नेशनल टीवी पर माफी मांगी हो।’ सानिया ने अंत में कहा, ‘मुझे उम्‍मीद है कि आज से कुछ साल बाद एक 29 साल की लड़की से यह नहीं पूछा जाएगा कि वो कब बच्‍चे पैदा करने वाली है जब वो नंबर वन हो।’

श्रीमंत जैनेंद्र की एफबी वॉल पर प्रकाशित इस पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से एक पठनीय कमेंट यूं है…

Suraj Raw इस पुरूषवादी मानसिकता पर मैं यहाँ ज्यादा नहीं लिखना चाहूँगा लेकिन आज की मीडिया में जिस तरह की अराजकता वयाप्त हुई है ; बेशक इसकी प्रतिष्ठा को काफी हद तक धूमिल करेगी। आज बहुत सारे ऐसे पत्रकारों के सवाल पूछने के पीछे जो एक ठसक दिखाई पड़ता है इससे साफ जाहिर होता है कि वो भी कहीं न कहीं खुद को कुछ अतिविशिष्ट मान बैठे हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि दूसरों की गलतियाँ ढूँढते ढूँढते हम अपने आप को लेकर कुंद हो जाते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया अगर विकास के इसी रफ्तार से चलती रही तो आने वाले कुछ समय में लोग वास्तव में मीडिया को दूसरी दुनिया की चीज मान बैठेंगे।

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यूपी विधानसभा का कटघरा : राजदीप आये और विधानसभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा में गत दिनों तमाम राजनैतिक दलों ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर मीडिया का जमकर विरोध किया। विपक्ष के नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने तो वर्तमान मीडिया को ‘पक्षपाती’ तक कह डाला। दरअसल, सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से संबंधित एक इलेक्ट्रानिक चैनल आजतक पर प्रसारित किये गये ‘स्टिंग आपरेशन’ की जांच रिपोर्ट में मीडिया घराने टीवी टुडे को दोषी पाया गया। इस संबंध में विधानसभा द्वारा गठित जांच समिति ने सदन में जो रिपोर्ट रखी उसमें बड़े इलेक्ट्रानिक मीडिया आजतक को ‘कटघरे’ में खड़ा कर दिया। रिपोर्ट में जहां तो मंत्री आजम खां को क्लीन चिट दी गई वहीं मीडिया पर पक्षपात पूर्ण कार्य करने का आरोप लगा।

असल में मुजफ्फरनगर दंगों के समय इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल आजतक ने आजम खां का एक स्टिंग दिखाया था, जिसमें कुछ पुलिस वाले कहते दिख रहे थे कि ऊपर (सत्तारूढ़ दल) से आये आदेशों के चलते उन्हें एक वर्ग विशेष के कुछ अपराधियों को छोड़ना पड़ गया। उस समय विधान सभा में यह मामला उठने पर भाजपा सहित सभी विपक्षी दलो ने हंगामा किया था। आजम खां से इस्तीफे तक की मांग हुई थी। विपक्ष के हमलों से घिरता देख अध्यक्ष ने स्टिंग आपरेशन की जांच के लिये सदन की एक सर्वदलीय समिति गठित कर दी। भाजपा ने इस जांच समिति से बाद में अपने को अलग कर लिया।

जांच समिति में इसी 16 फरवरी को अपनी रिपोर्ट सदन में रखी। समिति ने पाया कि ‘स्टिंग’ फर्जी था और सरकार को बदनाम करने के लिये किया गया था। मामला मीडिया और सियासतदारों के बीच का था। इसी वजह से हमेशा आपस में लड़ने वाले नेता एकजुट हो गये। भाजपा ने जरूर इससे दूरी बनाये रखी। इसकी वजह भी थी, इस स्टिंग ऑपरेशन के सहारे भाजपा को लोकसभा चुनाव में जर्बदस्त कामयाबी मिली थी। जांच समिति ने उक्त चैनल के पत्रकारों को अवमानना का दोषी पाया। दोषी करार दिये जाने के बाद भी उक्त चनैल का कोई भी पदाधिकारी सदन में हाजिर नहीं हुआ।

वैसे यह सिलसिला पुराना है। इससे पूर्व 1954 में ब्लिट्ज के संपादक आर. के. करंजिया को भी एक समाचार से सदन की अवमानना के मामले में विधान सभा में पेश होना पड़ा था। करंजिया सदन में हाजिर हुये और अपनी बात रखी, तब सदन ने करंजिया को माफ कर दिया था। इसी प्रकार माया राज में पत्रकार राजदीप सरदेसाई को एक विधायक उदयभान करवरिया के संदर्भ में गलत समाचार प्रसारित करने के लिये नोटिस देकर सदन में बुलाया गया था। राजदीप आये और विधान सभा अध्यक्ष के कमरे में ही माफी मांग कर चले गये।

भाजपा राज में केशरीनाथ त्रिपाठी ने दूरदर्शन पर रोक लगा दी थी। दूरदर्शन पत्रकार को प्रेस दीर्घा में आने से रोक दिया गया था। वैसे गैर पत्रकारों को भी अक्सर अवमानना के मामलों में सदन में हाजिर होना पड़ता रहा है। 70 के दशक में सामाजिक कार्यकर्ता केशव सिंह को तत्कालीन विधायक नरसिंह नारायण पांडे के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने के मामले में सदन में हाजिर होने का आदेश दिया गया था। इसके खिलाफ केशव सिंह हाईकोर्ट से स्टे ले आये, लेकिन सदन ने इस स्टे को यह कहते हुए मानने से इंकार कर दिया था कि विधायिका पर हाईकोर्ट का कोई आदेश लागू नहीं होता है। लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद केशव को सदन में हाजिर होना पड़ा और उन्हें दंडित भी किया गया। इसी तरह से 1990 के दशक में आईएएस अधिकारी शंकर दत्त ओझा को विवादास्पद बयान के चलते सदन के कटघरे में आकर मांफी मांगनी पड़ी थी।

बहरहाल, बात मीडिया की ही कि जाये तो मीडिया समाज का दर्पण होता है। उसे दर्पण बनकर ही रहना चाहिए। आजादी की जंग के समय मींडिया देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराने में इसी लिये अपना महत्वपूर्ण योगदान दे पाया था क्योंकि उस समय पत्रकारिता मिशन हुआ करती थी। मिशन देश को आजादी दिलाने का था। आजादी के मिशन को पूरा करने में कई पत्रकारों को जान तक की कुर्बानी देनी पड़ी थी, लेकिन किसी ने कोई गिला-शिकवा नहीं किया। आजादी के बाद से पत्रकार भले ही बढ़ते गये हों लेकिन पत्रकारिता की धार लगातार कुंद होती गई। बड़े-बड़े पूंजीपति मीडिया में सिर्फ इसी लिये पैसा लगाते हैं जिससे की वह मोटी कमाई कर सकें और इसकी आड़ में अपने अन्य धंधों को भी आगे बढ़ाया जा सके।आज शायद ही कोई मीडिया समूह ऐसा होगा,जो पत्रकारिता के अलावा अन्य तरह के करोबार से न जुड़ा हो। सबके अपने-अपने हित हैं। पत्रकारिता के माध्यम से कोई अपना धंधा चमकाना चाहता है तो किसी को इस बात की चिंता रहती है कि कैसे सरकार या राजनैतिक दलों पर दबाव बनाकर सांसदी हासिल की जाये या बड़े-बड़े पदों पर अपने चाहने वालों को बैठाया जाये।

आज के परिदृश्य में पत्रकारिता का स्तर क्या है। यह कहाँ खड़ा है,इस बात को जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि करीब-करीब सभी मीडिया घराने किसी न किसी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। कहीं किसी नेता का कोई न्यूज चैनल चल रहा है या फिर अखबार प्रकाशित हो रहा है तो कहीं उद्योगपति मीडिया के धंधे में पौबारह कर रहे हैं। इसी लिये अक्सर समाचारों में विरोधाभास देखने को मिलता है। अगर बात इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों की कि जाये तो एबीपी न्यूज चैनल (यानी आनंद बाजार पत्रिका) वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने में लगा है। मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका यह चैनल नहीं छोड़ता है। ‘न्यूज ‘24’ चैनल कांग्रेस के एक सांसद और पत्रकार का है। यहां भी भाजपा को घेरने का उपक्रम चलता रहता है। ‘इंडिया न्यूज’ चैनल के मालिक भी कभी कांग्रेसी नेता थे, आज वह बीजेपी में हैं। एनडीटीवी बंगाली परिवार से ताल्लुक रखने वाले राय साहब का है। राय साहब को वृंदा करात के पति की बहन ब्याही है। ‘इंडिया टीवी’ के रजत शर्मा अपने को प्रधानमंत्री मोदी का करीबी है। इसी तरह से जी टीवी वालों के भी भाजपा से अच्छे संबंध हैं। आईबीएन 7 को उद्योगपति मुकेश अंबानी ने खरीद लिया है। यही हाल कमोवेश अन्य इलेक्ट्रानिक चैनलों ओर प्रिंट मीडिया घरानों का भी है।

आज देश में जो माहौल बना हुए है,उसके बारे में निसंकोच कहा जा सकता है सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है तो इसके लिये मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है। देश की सियासत गरमाई हुई है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। खबर के नाम पर मीडिया में वह सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं।

नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं। देश का दुर्भाग्य है कि वर्षों से मीडिया का एक वर्ग और खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया घटिया नेताओं को आगे करके देश का बड़ा नुकसान करने में लगा है। इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं लगाया गया तो देश के गर्दिश में जाने के दिन थमने वाले नहीं है। मीडिया का कर्तव्य देशहित है। किसी व्यक्ति विशेष, समूह या विचारधारा को आगे बढ़ाने के बजाये मीडिया को सिर्फ समाज और राष्ट् के लिये पत्रकारिता करनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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कुछ मीडिया हाउसों पर कारपोरेट्स का दबाव है : राजदीप सरदेसाई

अजमेर : यहां आयोजित साहित्य सम्मेलन के गुफ्तगू सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहा कि मैं नहीं मानता कि पूरी मीडिया बिकी हुई है. ये देश बेइमानों का देश नहीं है. इस देश की अधिकांश जनता ईमानदार है. ईमानदारी के कारण ही देश तरक्की कर रहा है. मीडिया जनता पर निर्भर है, किसी कॉर्पोरेट पर निर्भर नहीं है. हां कुछ मीडिया हाउस में कॉर्पोरेट के कारण समस्या है लेकिन उनका भी समाधान होगा. उन्होंने माना कि कुछ मीडिया हाउस पर कॉर्पोरेट्स का दबाव है.

इस सत्र में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अदिति मेहता के सवालों का जवाब देते हुए सरदेसाई ने कहा कि अब डिजिटल मीडिया की ताकत बढ़ रही है. आम जनता को भी अब सिटीजन जर्नलिस्ट बनना होगा. कार्पोरेट्स और बिल्डर्स मीडिया हाउस बना रहे हैं ताकि वे मीडिया की आड़ में अपने काम निकाल सकें. राजनीतिक दलों ने चुनावों में पेड न्यूज के कैंसर को जन्म दिया है. लेकिन सभी मीडिया हाउस में ऐसा नहीं है. हाल ही में कुछ कॉर्पोरेट्स ने एक ग्रुप बनाया है जो चाहते हैं कि देश का मीडिया पारदर्शिता और ईमानदारी से काम करे.

सरदेसाई ने कहा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया बिजनेस मॉडल बन गया है, जो बिकेगा वो चलेगा. इससे पत्रकारिता की नई परिभाषा बनी है और पत्रकारों की आत्मा को ही समाप्त कर दिया है. विज्ञापनदाता का भी दबाव होता है कि यदि चैनल की टीआरपी ज्यादा होगी तो ही वह विज्ञापन देगा. इसलिए न्यूज चैनल में प्रतिदिन आज का बकरा या आज का मुर्गा कौन तय कर उसे ही दिनभर अलग अलग अंदाज में दिखाया जाता है. ऐसे में दर्शकों को खुद अपने आप से सवाल करना चाहिए कि वे क्या देखना पसंद करेंगे. 

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दिल्ली में इन दिनों तीन-चार चैनल सुपारी जर्नलिज्म चला रहे हैं : राजदीप सरदेसाई

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

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राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के कारनामे और मीडिया में एफडीआई… भारत को एफडीआई (विदेशी संस्थागत निवेश) तो चाहिए पर समाचार मीडिया में सिर्फ 26 प्रतिशत एफडीआई की इजाजत है। दूसरी ओर, कोई भी (भारतीय नागरिक) मीडिया मंडी में दुकान खोल ले रहा है। यहां तक तो ठीक है – पर तुरंत ही टोकरी उठाकर हांफता-कांपता कभी जेल, कभी अस्पताल पहुंच जा रहा है। पर कोई देखने वाला नहीं है। ना अस्पताल में, ना जेल में। वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन तो पुराने संस्थान नहीं देते, नए और नौसिखुओं से क्या उम्मीद? कार्रवाई किसी पर नहीं होती।

देश के मीडिया उद्योग में नीरा राडिया से लेकर पीटर और इंद्राणी मुखर्जी तक ने पैसे लगाए निकाले। पत्रकार और राजनीतिज्ञ राजीव शुक्ल (पत्नी भी) मीडिया में हैं।  राजदीप सरदेसाई ने अपना पैसा निकाल लिया पर मीडिया छोड़ नहीं रहे। कॉरपोरेट की बात करूं तो सहारा से लेकर रिलायंस तक का पैसा मीडिया में है। इनके कारनामे आप सब जानते हैं। 1800 करोड़ रुपए के निवेश पर बीएमडब्लू में 1800 लोगों को नौकरी और अखबार या चैनल पैसे ना होने से बंद हो रहे हैं। कैसे-कैसों के कैसे कैसे चैनल खुल रहे हैं। मीडिया में कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कौन रह रहा है, कौन भागने वाला है, कौन टिकने आया है, कौन पिटने वाला है, कौन भुनाने आया है, कौन जोड़ने, कौन तोड़ने, कौन धंधा करने और कौन कमाने। गंवाने भी कोई आया है क्या। कौन कमा रहा है, कैसे? नहीं कमा रहा है तो क्यो? कोई गंवा भी रहा है क्या। कहां से।

सरकारी विज्ञापनों की 8000 करोड़ रुपए की मलाई कौन और कैसे खा रहा है? कौन ललचा रहा है? किसे अंगूर खट्टे लग रहे हैं – बहुत सारे सवाल और विषय हैं। क्षेत्र तो बहुते बड़ा है। अनुसंधान का। घोटाला घपला का। बहुत मसाला होगा। फिल्म सीरियल, कहानी, उपन्यास, नाटक-नौटकी, कविता के लिए। इसपर कुछ होना चाहिए। कच्चा माल भड़ा पड़ा है। कैसे निकलेगा। दूसरी ओर, प्रिंट मीडिया में 26 प्रतिशत एफडीआई की ही अनुमति है। दूसरे कई उद्योगों में 100 प्रतिशत है। मेक इन इंडिया का नारा है। तो विदेशी संस्थान को 100 प्रतिशत निवेश से अखबार निकालने या मीडिया चैनल चलाने की इजाजत क्यों नहीं। कौन मना कर रहा है, विरोध कौन कर रहा है। कोई समर्थक भी है क्या। क्या कारण हैं। ये सब जानने का अधिकार तो हमें है। कुछ सोचो, कुछ करो। देसी मीडिया संस्थानों की दशा इतनी खराब है। फिर भी एफडीआई नहीं। आखिर क्यों? दक्षिण भारत में मीडिया और राजनीति का जो मेल है, पश्चिम भारत में क्या कहने , उत्तरपूर्व में मीडिया की अलग ही दुनिया है। बहुत ही मसालेदार।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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राजदीप सरदेसाई अपनी किताब इस तरह बेचते हैं…

Virendra Yadav : दिल्ली जाने पर खान मार्किट के बुकसेलर्स ‘बाहरीसंस’ में भरसक जाने की कोशिश करता हूँ. कारण एक पंथ दो काज हो जाता है ,नीचे किताब ऊपर फैब इंडिया का कुर्ता. परसों शाम वहां जाकर किताबें देख ही रहा था कि सामने राजदीप सरदेसाई दीख गए .एक व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए उनसे बातचीत शुरू ही की थी कि उन्होंने कहा कि ‘मेरी किताब आपने पढी की नहीं ?’ और किताब उठाकर उसे थमाते हुए कहा कि ‘पढ़िए जरूर’.

फिर अगले आधे घंटे में जो भी उनसे मुखातिब हुआ हर एक को उन्होंने किताब खरीदने के लिए प्रेरित किया और किताब पर अपने हस्ताक्षर करने के लिए बेचैन दिखे .इस तरह तीन -चार ग्राहक तो उन्हें मिल ही गए …..बाद में दुकान के ही एक कारकून ने बताया कि राजदीप हर तीसरे-चौथे दिन वहां आकर इसी तरह अपनी किताब प्रमोट करते है. …जब स्टार पर्सनालिटी अपनी मार्केटिंग इस तरह करते हों तो बेचारा हिन्दी का लेखक यदि कुछ आत्मविज्ञापन कर ही लेता है तो क्या गलत करता है !

हिंदी साहित्यकार, आलोचक और चिंतक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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