दरकता उत्तराखंड : अगर अब भी न जागे….!

प्राकृतिक रुप से बेहद खूबसूरत उत्तराखंड को प्रकृति ने क्या कुछ नही दिया । हरे भरे नज़ारे, पहाड़, कल कल करती नदियां, पहाड़ों से गिरते झरने, खुशनुमा मौसम । स्वस्थ जीवन के लिये इससे बेहतर आबो हवा और क्या हो सकती है । उत्तराखंड की प्राकृतिक सोम्यता और सरलता पर आखिर किस की नज़र लग गई कि वहां प्रकृति अपने गुस्से का लगातार इजहार कर रही है । पिछले कुछ सालों से जिस तरह उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं से जानमाल का भारी नुकसान हो रहा हैं उसे देखकर कहना पड़ता है कि उत्तराखंड आपदाओं का प्रदेश बनता जा रहा है । जून 2013 में हिमालय ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी आपदा देखी।

इस आपदा में हुए जान-माल के भारी नुकसान ने देश-दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा। छह हज़ार से ज्यादा लोगों को जान से हाथ धौना पड़ा, सैकड़ो घर और परिवार उजड़ गये । क्या उसके बाद भी हमारी सरकार और समाज ने कोई सबक सीखा । 2013 की आपदा को तीन साल बीत गये, 2016 में हम कहां खड़े हैं । आपदा इस बार भी आई, कई लोगों की जान चली गई, घर के घर बह गये, कुछ गांवों में आपदा के समय बचाने वाले स्थानीय लोग भी तेज़ बारिश के बहाव में बह गये । सवाल आज भी वही है कि इन आपदाओं से निपटने में हमारी सरकार और प्रशासन कितने सक्षम हैं।

उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं के कहर का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। राहत और बचाव की तमाम कोशिशों के दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर हमारी तैयारियों की पोल खुल जाती है । आपदा या हादसों के वक्त राहत के लिये सबसे जरुरी है तय समय पर राहत पहुंचाना लेकिन भौगोलिक हो या कोई भी कारण हमारी तैयारियाँ अधूरी ही नजर आती हैं । भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखंड देश का संवेदनशील इलाका है । हिमालय की पर्वत श्रंखला में यहाँ के पहाड़ उतने मजबूत नहीं हैं कि ग्लेशियर पिघलने, बादल फटने या सामान्य भूकंप के तेज़ झटके सह सकें ।  दुखद बात है कि सारी बातों को जानने के बावजूद विकास के नाम पर बिना सोचे समझे पेड़ो का कटान, पहाड़ों का सीना चीरती सड़के, कदम-कदम पर होटल और रिजार्ट और बांध बनते चले जा रहे हैं और तमाम चिंताओं और आपदाओं के बावजूद  ये सिलसिला बदस्तूर जारी है । 2013 के केदारनाथ हादसे ने दिखा दिया कि प्रकृति को समझे बिना उससे छेड़छाड़ कितना भयावह नतीजा हो सकता है।

इस वक्त पूरे हिमालयी क्षेत्र के पहाड़, नदियां और जनसमुदाय संकट में है, क्योंकि संसाधनों के लिए इनका बेपनाह दोहन हो रहा है । पहाड़ों में पलायन के लिये रोज़गार को एक अहम कारण माना जाता था, फिर अच्छी और उच्च शिक्षा के लिये पलायन की बात कही जाने लगी । अब पीने के पानी का संकट गहराता जा रहा है, आने वाले समय में ये भी पलायन का एक प्रमुख कारण बनेगा । अब जिस तरह से दिन ब दिन आपदायें लोगों के जीवन के लिये संकट खड़ा कर रहीं हैं निश्चित तौर पर ये भी बड़े पैमाने पर पलायन का सबब बनेगीं । जरुर सोचने का समय है कि क्यों पहाड़ लोगों से खाली होते जा रहे हैं । या कहें कि लोग पहाड़ों को छोड़ने पर मजबूर हो रहें हैं।

वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और विकास की अनियत्रिंत गतिविधियां क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं । आपदा प्रबंधन के लिये उत्तराखंड में सरकारों की तरफ से कई कदम उठाये गये लेकिन उन्हे नाकाफी ही कहा जायेगा । अनियंत्रित मौसम के दबावों के दंश झेलते तमाम पर्वतीय इलाके एक अघोषित भय से त्रस्त हैं। सामान्य सी बरसात और आंधी भी उनकी नींदें उड़ा देती है। ऐसे में उत्तराखंड में प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने वाला विकास नहीं किया गया तो प्रकृति के कहर को थामा नहीं जा सकेगा । उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं को वहां कायम और नए बन रहे हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों के नकारात्मक असर के रूप में भी देखा गया है।

शीतल आबोहवा, हरेभरे मैदान और खूबसूरत पहाडियां, ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने यहां अपने अनपुम सौन्दर्य की छठा दिल खोलकर बिखेरी है । यही वजह है कि देसी विदेशी पर्यटक यहां अनायस ही खिंचे चले आते है । यहां पर्यटन के लिहाज से अपार संभावनाए है । हरियाली है, पर्वत हैं, झील हैं, कलकल करती नदियां है, क्या नहीं है । सही मायनों में कहा जाये तो पर्यटन उत्तराखंड की आर्थिक रीढ़ है । लेकिन इन प्राकृतिक आपदाओं का असर निश्चित रुप से पर्यटन पर भी पड़ रहा है । लेकिन पिछले दशक में पर्यटन के तीव्र विस्तार में आपदा प्रबंधन के आधारभूत नियमों पर ध्यान नहीं दिया गया। पहाड़ के घबराए हुए लोगों पर मौसम की बदलती परिस्थितियों के बाद पूरा हिमालयी क्षेत्र चिंताग्रस्त दिख रहा है। यह जीवन से जुड़ा हुआ बुनियादी सवाल है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का ये खेल कब तक जारी रहेगा । सब कुछ सरकारों के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता है इसके लिये उत्तराखंड के जागरुक समाज को खुद भी आगे आना होगा । वक्त का तकाज़ा है कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिये एक वृहद नीति बननी चाहिये।  व्यवस्था और आस्था के बीच बिगड़ते मौसम के मिज़ाज को समझना होगा । तभी प्राकृतिक आपदाओं की बजाय मानव निर्मित आपदाओं को रोका जा सकता है।

Regards,

Nadeem Ansari

Sr. Anchor/Correspondent
DD News, New Delhi
email :- nadeem.ddnews@gmail.com

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