इलाहाबाद के दलित परिवार को इंसाफ की दरकार, कहां सो रहे ‘तारनहार’

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इलाहाबाद। यूपी में कमजोर तबके का भगवान ही मालिक है। अखिलेश सरकार का ‘सबके लिए न्याय’ का सरकारी नारा गरीब-दलितों की झोपड़ियों तक पहुंचने के पहले ही दम तोड़ दे रहा है। ताजा उदाहरण इलाहाबाद के नवाबगंज इलाके का है। दलित के उत्पीड़न और उसके बाद शासन-प्रशासन और सरहंगों की मिलीभगत की बेशर्म भूमिका वाली यह आंख खोल देने वाली घटना है। नवाबगंज क्षेत्र के भगौतीपुर के सरखेलपुर गांव का रहने वाला भुक्तभोगी दलित परिवार घर-बार छोड़ पलायन करने को मजबूर हो रहा है। उसकी जान के लाले पड़े हैं।
 
सत्ता पक्ष के दो विधायकों पर आरोपियों की मदद करने का खुला आरोप लग रहा है। नामजद मुकदमा दर्ज हुए आठ दिन बीत गए। पुलिस नामजद आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। न कोई छापा न कोई दबिश। मुल्जिम खुलेआम टहल रहे हैं। पूर्व सांसद व बसपा नेता कपिलमुनि करवरिया जब भुक्तभोगी परिवार को सांत्वना देने बजरंगी की मड़ही पहुंचे तो परिजनों ने पैरों पर गिरकर मदद की गुहार लगाई। इसी प्रकार भाजपा काशी क्षेत्र के महामंत्री और पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय ने पार्टी नेताओं के साथ जब भुक्तभोगी परिवार की मड़ही पर पहुंचे तो बजरंगी की चोटें देखकर दंग रह गए। परेशान बजरंगी के माता-पिता ने सिलसिलेवार उत्पीड़न की दास्तां सुनाई।

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सरकार, पुलिस, लाठी हमारी जाओगे कहां?

भुक्तभोगी परिवार को मुंह बंद करने की खुलेआम धमकी मिल रही है। शिकायत है कि इलाज के लिए अस्पताल जाने या अफसरों के पास जाने पर रास्ते में घेरकर धमकी दी जाती है। भुक्तभोगी के मुताबिक, आरोपी खुलेआम धमकाते हैं-सरकार हमारी, पुलिस हमारी और लाठी भी हमारी, जाओगे कहां?

सुलगता सवाल, कमजोर को कैसे मिले न्याय?

सवाल है कि दलित बजरंगी को न्याय दिलाने के लिए सरकार, नेता, अफसर सामने क्यों नहीं आ रहे हैं। इलाके के भाजपा सांसद केशव मौर्य आए, आश्वासन देकर चले गए। बसपा के पूर्व सांसद कपिलमुनि करवरिया, पूर्व विधायक गुरूप्रसाद, भाजपा के पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय से लेकर कांग्रेस के इलाकाई नेता उमेश तिवारी तक दलित की मड़ही तक पहुंचे और आश्वासन देते हुए अखबारों में नाम फोटो छप जाने तक की औपचारिकता कर वापस लौट गए। बस, खत्म हो गई भूमिका।
 

बड़के पत्रकारों की छोटी सोच

स्थानीय गंवई पत्रकारों को छोड़ दें तो शहर में बैठे ‘बड़के’ पत्रकारों के लिए यह कोई खास खबर ही नहीं है। जिला मुख्यालय से तीस किमी लखनऊ-इलाहाबाद राजमार्ग के किनारे मंसूराबाद-लालगोपालगंज के बीच टूटी-फूटी मड़ही में रहने वाला सात सदस्यों वाला बजरंगी का शोषित परिवार शायद इसीलिए शहर के संस्करणों में सिंगल कालम जगह नहीं पा सका। जिक्र करने पर पत्रकारिता के ‘नए-बछेड़े’ अलग ही ज्ञान बांटते नजर आ रहे हैं। सिविल लाइंस में कॉफी की चुस्की के बीच एक अखबार के स्थानीय संपादक समझाते हैं- क्या करें वहां रिपोर्टर्स टीम भेजकर। फालतू में कंपनी का खर्च बढ़ाना होगा। गरीब, झोपड़ी, दलित… हुंह, सर्कुलेशन बढ़ेगा कि एड में इज़ाफा होगा। न्यूज चैनल्स की भी टीआरपी बढ़ने के चांसेज नहीं, सो दलित का समूचा परिवार जिंदा दफन कर दिया जाए या उसे गांव से उजाड़ दिया जाए। थ्री पी यानि प्रेस, पुलिस और पॉलिटिक्स तीनों के कार्य करने के अपने अलग-अलग तरीके हैं, उनकी अलग-अलग सोच भी।
  

क्या है मामला

इलाहाबाद के गंगापार स्थित नवाबगंज थाना। यहां भगौतीपुर ग्रामपंचायत का मजरा है सरखेलपुर। सरखेलपुर गांव में दलित जाति का लक्ष्मण अपने पांच बेटियों और दो बेटों के साथ मड़ही में रहता है। लक्ष्मण कई साल से बीमार हालत में है। परिवार में उसका सोलह वर्षीय बेटा बजरंगी और पत्नी मंगलावती मजदूरी कर मुफलिसी का जीवन गुजार रहे हैं। 13 जुलाई को सुबह उसी गांव के कुछ दबंगों ने मुफ्त में मजदूरी करने का दबाव डाला। इंकार करने पर बजरंगी को पेड़ से उल्टा लटका कर लाठियों से कई घंटे पीटा गया। उसे गंभीर यातना दी गई। पैर का नाखून प्लास से उखाड़ा गया। इतना ही नहीं, अधमरे बजरंगी को जिंदा दफन करने की कोशिश भी गई। परिजनों ने बगल स्थित पुलिस चैकी श्रृंग्वेरपुर को सूचित किया। वहां के दरोगा ने सिपाहियों के साथ मौके पर पहुंचकर घायल बजरंगी को वहशियों के चंगुल से छुड़ाया। नवाबगंज थाने में लक्ष्मण ने तहरीर दी। नामजद तीन मुल्जिमों के खिलाफ एफआईआर दर्ज तो कई पर पुलिस ने मामूली धारा में केस लिखा। आरोप तो यहां तक लगाया जा रहा है कि सत्तापक्ष के दो विधायकों के फोन आने के बाद पुलिस नामजद मुल्जिमों के सामने नतमस्तक नजर आ रही है।

पुलिस का खेल, बदल दी तहरीर

भुक्तभोगी परिवार की शिकायत है कि केस हल्का करने के लिए पहले बजरंगी को चोरी के मामले में फंसाने की तैयारी की गई। स्थानीय मीडिया के सक्रिय होने के बाद गंभीर दशा में घायल बजरंगी को थाने से छोड़कर नामजद रिपोर्ट लिखी गई। इतना ही नहीं, थाने में लक्ष्मण ने जो तहरीर दी थी उसे बदलकर दूसरी तहरीर पर केस दर्ज किया गया है। सीओ सोरांव ऑफिस से एफआईआर की कॉपी मिलने के बाद लक्ष्मण को असलियत का पता चला। उसने इस आशय की शिकायत पुलिस अफसरों से मिलकर की पर नतीजा शून्य ही रहा। भुक्तभोगी परिजनों की शिकायत है कि शायद पुलिस के ढुलमुल रवैए के चलते ही दबंग टाइप के अभियुक्त खुलेआम टहल रहे हैं। बड़े अफसर भी पूरी तरह आंख मूंदे हुए हैं।
 
लाख टके का सवाल है कि समाज के अति पिछड़े और कमजोर असहाय बजरंगी सरीखे लोगों को क्या घुट घुटकर जीना ही नीयति है? आखिर कब तक ऐसा चलेगा। कहां सोए हो दलित के मसीहाओं? कानून के रक्षकों…? क्यां यूपी में गरीबों का निवास करना अभिशाप है…???

घटनास्थल से लौटकर शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट। (प्रथम चित्रः पीड़ित परिवार से घटना की जानकारी लेते पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय, खाट पर लेटा घायल बजरंगी) लेखक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान आदि अखबारों में कई साल विभिन्न पदों पर रह चुके हैं। संपर्क- मोबाइल-09565694757, ईमेलः shivashanker_panddey@rediffmail.com

मूल ख़बरः

इलाहाबाद के गांव में दलित युवक को जिंदा दफनाने की कोशिश, विधायक के फोन पर छोड़े गए आरोपी

 

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