चंद्र भूषण-

आज जब भारत में हाल यह है कि फिलस्तीन के पक्ष में एक ट्वीट भर करने के लिए मुंबई की एक कॉलेज प्रिंसिपल को इस्तीफा देने पर मजबूर किया जा रहा है, तब अमेरिका में ठीक इसी मुद्दे पर एक ऐतिहासिक छात्र आंदोलन उठ खड़ा हुआ है। महीने भर की दुविधा के बाद अमेरिकी हुकूमत ने आंदोलन को कुचल देने का फैसला किया है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इस आक्रोश का स्वरूप समुदाय आधारित न होकर बड़े आधार वाला और नैतिक है। ऐसे में इसकी गूंज दूर तक जाएगी। मामले की खोजबीन करता यह लेख संपादित रूप में आज के नवभारत टाइम्स में प्रकाशित है।
इजराइल विरोधी आक्रोश से सुलग रहे हैं अमेरिकी कैंपस
अमेरिका में अभी चल रहे देशव्यापी छात्र आंदोलन की बराबरी सन 1968 के विएतनाम युद्ध विरोधी आंदोलन से की जाने लगी है। दिन-रात नारेबाजी, गीत, नाटक और कक्षाओं का बहिष्कार। राजधानी वाशिंगटन डीसी और 22 राज्यों के 50 से ज्यादा विश्वविद्यालयों के छात्र फिलहाल छोटे-छोटे तंबू गाड़कर कैंपस में ही बैठ गए हैं। और यह हंगामा किन्हीं दोयम दर्जे के शिक्षण संस्थाओं में नहीं हो रहा है। अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक-तकनीकी संस्थानों में इस तरह की हलचलें देखी जा रही हैं।
आंदोलन का मुद्दा एक ही है। विश्वविद्यालयों का प्रशासन फिलस्तीनियों पर हमले में इजराइल का साथ दे रही कंपनियों से अपने सारे रिश्ते तोड़ ले।
फिलस्तीन के गाजापट्टी इलाके में चुनी हुई सरकार चलाने वाले कट्टरपंथी संगठन हमास से जुड़े उग्रवादियों ने पिछले साल सितंबर में एक यहूदी त्यौहार के मौके पर इजराइल की सीमा में घुसकर नागरिकों पर हमला किया था। इस हमले में कुछ विदेशी पर्यटकों समेत 1200 इजराइली नागरिक मारे गए थे और ढाई सौ से ज्यादा लोगों को बंधक बना लिया गया था। जवाब में बंधकों को छुड़ाने और हमास को सबक सिखाने के नाम पर इजराइल ने गाजापट्टी पर हमला किया, जिसमें लगभग 35 हजार लोग अबतक मारे जा चुके हैं और इस इलाके के इन्फ्रास्ट्रक्चर की तो बात ही छोड़ दें, यहां मौजूद एक भी मकान सलामत नहीं बचा है।
इतना ही नहीं, हमास से दूरी बनाकर चलने वाले फिलस्तीनी इलाके वेस्ट बैंक पर भी यहूदियों के हमले हुए हैं, जिनमें सैकड़ों फिलस्तीनी मारे गए हैं।
अमेरिकी विश्वविद्यालयों में इस लड़ाई के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन दिसंबर में ही शुरू हो गए थे, लेकिन इनकी सार्वजनिक प्रस्तुति शुरू में वैसी ही थी, जैसी फिलहाल दुनिया के ज्यादातर प्रतिरोध आंदोलनों की रह रही है। एक गड़बड़ी को दूसरी गड़बड़ी का नतीजा बताकर विरोध की अनदेखी करना, और ज्यादा बढ़ता दिखे तो कुचल देना। इस मामले में कहा गया कि फिलस्तीनियों ने जो किया, उसका नतीजा वे भुगत रहे हैं। इसमें किसी नैतिक प्रतिवाद की गुंजाइश कहां बनती है?
लेकिन अमेरिकी विश्वविद्यालयों के विरोध प्रदर्शन में एक बड़ी तादाद यहूदी छात्रों की भी शामिल थी, जो इजराइल के साथ अपने भावनात्मक रिश्तों के बावजूद बेंजामिन नेतन्याहू की इजराइली हुकूमत को यहूदियों के बचाव के नाम पर फिलस्तीनियों के जनसंहार का लाइसेंस देने के लिए तैयार नहीं थे।
यह आंदोलन बढ़ने लगा तो कुछ डॉनल्ड ट्रंप समर्थक राजनेताओं ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में यह मुद्दा उठाया कि देश के प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी कैंपसों में यहूदी विरोधी (एंटी-सेमिटिक) हलचलें बहुत तेज हो गई हैं और समय से इन्हें रोका नहीं गया तो कभी भी कोई अप्रिय घटना घट सकती है। इस मामले में जवाब देने के लिए कुछ विश्वविद्यालयों के कुलपतियों (प्रेजिडेंट्स) को संसद में बुलाया गया, जिनमें दो ने उपरोक्त आरोप से सहमति जताते हुए इस्तीफा भी दे दिया। लेकिन कोलंबिया यूनिवर्सिटी की प्रेजिडेंट ने इस आंदोलन से सख्ती से निपटने की बात संसद में कही तो छात्रों ने इस विश्वविद्यालय के कैंपस में ही डेरा डाल देने का फैसला कर लिया।
जवाब में प्रेजिडेंट ने पुलिस बुला ली। छात्रों के खेमे जबरन हटाए गए तो कुछ तोड़फोड़ भी हुई। लेकिन अगले दिन ये तंबू न सिर्फ यहां बल्कि पचास और कैंपसों में वापस गड़ गए। सबसे बड़ी बात यह है कि लाख कोशिशों के बाद भी इसे सिर्फ फिलस्तीनी, अरब या मुसलमान छात्रों का आंदोलन साबित करने की अमेरिकी प्रशासन, मीडिया और बाकी एस्टैब्लिशमेंट की कोशिशें बिल्कुल कामयाब नहीं हो पा रही हैं। भारी पैसे खर्च करके दुनिया भर से पढ़ने आए छात्रों के अलावा ठेठ अमेरिकी छात्रों का समर्थन भी इसे प्राप्त है।
जून की शुरुआत में ही अमेरिकी विश्वविद्यालयों की परीक्षाएं होती हैं। शिक्षक अभी ऑनलाइन क्लासेज ले रहे हैं। प्रशासन को उम्मीद है कि इम्तहान शुरू होने तक आंदोलन अपने आप ठंडा पड़ने लगेगा। लेकिन छात्रों का इरादा चुनावी साल में देर तक टिकने का है। उनका कहना है कि जिस तरह हाइड्रोकार्बन कारोबार में पैसा लगाने वाली कंपनियों के बॉयकॉट से अमेरिका में पर्यावरण चेतना पैदा हुई है, वैसा ही इजराइल की जंगखोरी के साथ भी होगा।
कोलंबिया विश्वविद्यालय के उलट जिन विश्वविद्यालयों का प्रशासन समझाने-बुझाने के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता है, उनका कहना है कि इजराइल से आर्थिक रिश्ता रखना या न रखना उनके हाथ में नहीं है।
एक अच्छी यूनिवर्सिटी चलाने के लिए हर साल करोड़ों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिसका बड़ा हिस्सा किसी घराने की बंधी हुई पूंजी से आता है। किसी उद्यमी परिवार ने इस मद में एक बड़ी रकम किसी समय डाल दी, जिसको निवेश के जरिये बढ़ाने या बचाए रखने का काम असेट मैनेजमेंट कंपनियां (एएमसी) करती हैं। इसका कोई हिस्सा अगर इजराइल को हथियार बेचने वाली किसी कंपनी में लगा है, तो एएमसी को इस कंपनी से अपना धन निकालने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसा किया गया और उस एएमसी ने हाथ खड़े कर दिए तो यूनिवर्सिटी दिवालिया हो जाएगी।
आंदोलन में शामिल अरब छात्रों का नारा है ‘नॉट टु ऑवर पीपल’, जबकि यहूदी छात्रों की ओर से ‘नॉट इन ऑवर नेम’ का नारा लगाए जाने की बात ऊपर कही जा चुकी है। एक तीसरा नारा ‘फ्रॉम रिवर टु सी, पैलस्टीन विल बी फ्री’ खूब पॉपुलर हो रहा है, हालांकि कुछ राजनेता इसे यहूदियों के जनसंहार के आह्वान जैसा बता रहे हैं। रही बात इस आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव की तो इसका नुकसान सबसे ज्यादा राष्ट्रपति जोसफ बाइडन और उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी को ही होगा।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से हर अमेरिकी राजनेता सबसे पहले यहूदी जनमत की चिंता करता है, जिसकी पहली शर्त इजराइल को बिना शर्त समर्थन देने की मानी जाती है। जो बाइडन भी अपनी समझ से ऐसा ही कर रहे हैं। लेकिन अमेरिका का यहूदी समुदाय इस बार दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक हिस्सा बेंजामिन नेतन्याहू की आक्रामक नीतियों के विरोध में है, जबकि दूसरा डटकर उनके पक्ष में खड़ा है और फिलस्तीन समर्थक समझे जाने वाले नेताओं को हराने के लिए काम कर रहा है। इनमें यहूदी छात्रों का पहले धड़े की तरफ झुकना बाइडन की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
रही बात डॉनल्ड ट्रंप की, तो छात्र आंदोलन को वे बाइडन की कमजोर गृहनीति का नतीजा बता रहे हैं और खुद को इजराइल और यहूदी समुदाय के सुयोग्य संरक्षक की तरह पेश कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इजराइल-फिलस्तीन मसले की मौजूदा स्थिति के लिए कोई एक व्यक्ति सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो वे ट्रंप हैं, जिन्होंने राष्ट्रपति रहते अपनी तरफ से फिलस्तीन का वजूद मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इसके लिए इजराइल के कट्टरपंथी यहूदी नेताओं की पीठ ठोकते रहे। लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों के पक्ष में अपना सब कुछ दांव पर लगाकर उतरे छात्रों का आंदोलन ट्रंप को फायदा पहुंचाए, यह खुद में एक बड़ी विडंबना है।


