‘अंडबंड’ गोस्वामी का फिलहाल कोई इलाज नहीं है!

Girish Malviya : अरनब का फिलहाल कोई इलाज नहीं है. वो भी एक तरह का नोवेल कोरोना वायरस है. संक्रमण फैलाने वाला नोवेल कोरोना वायरस. इसलिए उसकी बात करना उसके कृत्यों को बढ़ावा देना होगा.

शास्त्रों में लिखा भी है ‘Any Publicity is Good Publicity’. आप ट्विटर पर उसके विरुद्ध अभियान चलाएं या उसके विरुद्ध अपने राज्यों में एफआईआर करें, उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है! ट्विटर पर उसके समर्थन में खड़ी ऑर्गेनाजाइज्ड सेना आपकी बिखरी हुई सेना से कहीं ज्यादा सक्षम और कहीं ज्यादा विशाल है. आप नोटिस भेजोगे, वो अच्छा वकील भेज देगा. केंद्र सरकार तो उसके साथ है ही, उसका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं है!

यह बात वो अच्छी तरह से जानता है, उसकी पार्टी को 301 सीट मिली है लोकसभा में. एक साल भी पूरा नहीं हुआ है इस बात को. अभी चार साल और उसे दर्शकों की छाती पर बैठकर मूँग दलना है. वो जानता है कि हफ्ते पंद्रह दिन में यह बात आई गयी हो जाएगी.

आप क्या सोचते हैं! उसने ऐसा बिना सोचे समझे बोला होगा? बहुत शातिराना तरीके से उसने बहस का रुख अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश की है. अभी खबर आयी है कि रात में अरनब ओर उसकी पत्नी पर हमला हुआ है? अब आप देखिए कैसे बैकफुट पर जाता है उसके विरुद्ध बनाया गया माहौल!

ऐसे लोगों से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका हमें गाँधी जी सिखा गए हैं. कोई एक मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो. मेरे विचार से सोनिया गांधी को आज आगे बढ़कर यह कहना चाहिए कि- ‘अरनब मेरे भाई मुझे जितना भी भला बुरा कहना है कह लो, बस एक बार जरा उन मजदूरों की बात कर लो जो आठ आठ दिन तक पैदल चल कर घर पुहंचने से पहले ही सड़क पर दम तोड़ गए, उन गरीबों की बात कर लो जिन्हें एक वक्त का खाना भी तीन दिन में एक बार नसीब हो रहा है, एक बार उस बीमार की बात कर लो जो इलाज के लिए दर दर भटक रहा है. उसके बाद मेरे प्यारे अरनब भाई मुझे जितनी गालियां देना है अपने चैनल पर दे देना.’


Apurva Bhardwaj : अर्णब कैसे बने अंडबंड गोस्वामी… आप को क्या लगता है कि अर्णव गोस्वामी शुरू से ही ऐसे ही प्राइम टाइम पर कानफोड़ू चिल्लाने वाले वाले गटरछाप एंकर थे औऱ ऐसी ही सड़कछाप भाषा और पत्रकारिता किया करते थे? अगर आप ऐसा सोच रहे तो तो माफ कीजिये, आप बिलकुल गलत सोच रहे हैं. मैं आपको अर्णव के अंडबंड गोस्वामी बनने की सच्ची कहानी सुनाता हूँ.

अर्णब सेना के अधिकारी के बेटे हैं. उनके दादा असम के बुद्विजीवी लेखक, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेसी थे. अर्णब ने 12वीं कक्षा मेरे राज्य एमपी के जबलपुर केन्द्रीय विद्यालय से की है. जब उनके साथ पढ़ने वाले लोगों से बात की तो पता चला अर्णब स्वभाव से बहुत अंतर्मुखी और शर्मीले थे, लेकिन वो बहुत ही महत्वाकांक्षी थे. अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिये वो किसी भी हद तक भी जा सकते थे. पढ़ाई के दौरान भी उन्होंने थ्री इडियट् के “चतुर” की तरह सारे हथकंडे अपनाए जो एक रट्टू तोता टाइप स्टूडेंट् टॉप आने के लिया करता है.

अर्णब गोस्वामी घोर वामपंथ से मध्यमार्गी होते हुए कब घोर दक्षिपंथ की ओर मुड़ गए, उसका अंदाजा उनके पत्रकारिता करियर से लगता है. अर्णब ने अपना करियर टेलीग्राफ से शुरू किया जो अपने वामपंथी झुकाव के लिए जाना जाता है. फिर वो प्रणय रॉय के एनडीटीवी के साथ मध्यमार्ग पर चल पड़े. वो पहले पत्रकार थे जिन्होंने 1999 में सोनिया गाँधी का इंटरव्यू लिया था. इसके बाद वो “न्यूज आर” एक ब्रांड बन गए. जिस सोनिया गाँधी ने उन्हें ब्रान्ड बनाया, आज वो ही अवसरवादी कहीं गईं.

2005 से 2006 तक अर्णव का करियर ढलान पर था. अर्णव ने 1999 में ही खुद का चैनल शुरू करने का सपना देख लिया था. 2002 तक आते आते वो एनडीटीवी में अपना प्रभुत्व जमाने लगे और इसी क्रम में उनकी राजदीप औऱ बरखा जैसे पत्रकारों से अनबन शुरू हो गई. इसलिए अर्णव ने 2005 में दिल्ली से मुंबई का रुख कर लिया और टाइम्स ग्रुप के साथ टाइम्स नाउ नामक चैनल शुरू कर लिया. तब तक अर्णव बहुत ही शर्मीले पत्रकार थे लेकिन उन्होंने नेशन वांट्स टू नो में समाचार के साथ ओपिनियन भी देना शुरू कर दिया. टेबलॉयड मिरर जैसी पत्रकारिता टीवी पर शुरू कर दी और चीखने चिल्लाने वाली व सनसनी पत्रकारिता भारत के नए इंग्लिश बोलने वाले मिडिल क्लास के लिए नई थी. उन्होंने इसको दोनों हाथों में उठाकर अपने बेडरूम में रख लिया.

2006 से 2016 तक अर्णब ने टाइम्स नाउ को अपने चीखने से टॉप पर पहुँचा दिया. 2016 में अर्णव को लगने लगा कि वो खुद इतना बड़ा ब्रांड है कि उन्हें टाइम्स ग्रुप की जरूरत ही नहीं है. इसलिए वो चोरी चुपके अपने चैनल के लिए फंडिंग की जुगाड़ में लग गए. इसकी भनक टाइम्स के मालिक विनीत जैन को लग गई. उन्होंने अर्णब को स्टूडियो में घुसने तक नहीं दिया. ऐसे में उनकी अंधभक्ति ने उनका साथ दिया. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के कहने पर उद्योगपति सांसद राजीव चंद्रेशेखर ने उनके नए चैनल रिपब्लिक टीवी को महज 100 दिन में खड़ा कर दिया.

अर्णब कितने डरपोक हैं, इस बारे में आप लोगों को अपना अनुभव बताता हूँ. 1998 में एक बार स्टार न्यूज पर डिबेट के दौरान अर्णब गोस्वामी ने उमा भारती पर टिप्पड़ी कर दी. उस पर फायर ब्रान्ड उमा भारती ने लाइव टीवी पर कड़ी फटकार लगाई और सरेआम माफी मंगवाई. डरे-सहमे अर्णव ने केंद्रीय मंत्री से डरकर हाथ जोड़कर माफी मांगी थी. अर्णव सोनिया गाँधी से पहले उमा भारती और स्मृति ईरानी का भी अपमान कर चुके हैं. हमारे इंदौर के कैलाश जी ने भी उन्हें दिन में तारे दिखा दिये थे. अब इस भक्त टाइप लालची साँप को पालना बंद कर दीजिए. यह वक्त पड़ने पर किसी को भी डंस सकते हैं.

अर्णब की कहानी दीपक चौरसिया की कहानी की तरह है. कैसे एक प्रतिभावान पत्रकार अपनी महत्वाकांक्षा के चलते पत्रकारिता जैसे प्रोफेशन को सूली पर चढ़ा गया और कल का अदभुत अर्णब आज अंडबंड गोस्वामी हो गया, ये पत्रकारिता के छात्रों के लिए शोध का विषय बन चुका है.

लेखक गिरीश मालवीय और अपूर्व भारद्वाज इंदौर के प्रतिभाशाली युवा विश्लेषक हैं.



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One comment on “‘अंडबंड’ गोस्वामी का फिलहाल कोई इलाज नहीं है!”

  • Vaibhav Mishra says:

    यार, कुछ हजार रुपये के खर्चे पर चलने वाली बेवसाइट उस अर्नब गोस्वामी को पत्रकारिता सिखा रही है, जिसकी पर्सनल वर्थ 1000 करोड़ है। ये लेख लिखने वाले से राह चलते हुए पूछ लिया जाए तो 1000 रुपये नहीं निकलेंगे।

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