हैप्पी बड्डे : जात न पूछो शाश्वत की!

अनेहस शाश्वत

Yashwant Singh : आज बड़े भाई अनेहस शाश्वत Anehas Shashwat का जन्मदिन है. जो लोग शाश्वत जी से ठीक से परिचित हैं, वे उनके मौजियल और हंसोड़ स्वभाव के बारे में जानते हैं. कब किस बात पर ठहाका मार देर तक हा हा हा कर ठठाते रहें, कोई नहीं जानता. हां आज के बोझिल, ग़मज़दा और डिप्रेस्ड माहौल में कई अजनबी लोग उनकी खौफनाक हंसी से अंदर तक हिल जाते हैं, और सोचने लगते हैं कि- ई मनई सच में आदमी है या पागल है जो बिना बात इतनी जोर से हंसे जा रहा है!

शाश्वत जी को हंसने के लिए बहाने की भी जरूरत नहीं और न ही किसी चुटकुले की. वे खुद ही कोई नारा लगाते हैं और हंसना शुरू कर देते हैं. उनके प्रिय नारों में से एक ये भी था- ”इल्लै विल्लै प्रभाकरण… हां चल्लो…..”. वे ये नारे टायलेट में बैठे बैठे भी लगा देते और टायलेट के भीतर ही ठठा कर हंसने लगते. हम बाहर बैठे लोग डर जाते कि इतनी तेज हंसी की आवाज कहां से आई, शाश्वत जी तो टायलेट गए हैं.

पर जब पता चलता कि ये आवाज टायलेट से ही आ रही है तो हम लोग पूछते- ”क्या हुआ भाई साहब?”

शाश्वत जी का जवाब आता- ‘अरे कुछ नहीं. बस अइसे ही कुछ याद आ गया था…’.

और, यह कह कर वह फिर खौफनाक तरीके से चालू …हा हा हा हा… 🙂

शाश्वत जी जाति से ब्राह्मण और लाला दोनों हैं. इसलिए जातीय जहर से भरे इस समाज और सिस्टम में भाई साहब ने अपने डबल जाति होने का भरपूर फायदा उठाया. जहां लालावाद दिखा, वहां लाला बन गए. जहां पंडित वाद दिखा वहां खुद को श्रेष्ठ कश्मीरी नस्ल का ब्राह्मण बता दिया. इसी गच्चे में दैनिक जागरण लखनऊ के संपादक स्वर्गीय पंडित विनोद शुक्ल बहुत दिन तक कनफ्यूजन में रहे कि ई आदमी कउन जात का है? पूरे आफिस में चर्चाएं थीं. कोई शाश्वत जी को लाला कहता तो कोई पंडित. कोई बनिया बताता तो कोई कुछ. शुकुल जी के मुखबिर जब ठीक से कनफर्म न कर पाए और फेल हो गए तो खुद शुकुल जी को मोर्चा संभालना पड़ा क्योंकि उनसे बिना असली जात जाने रहा न जा रहा था. एक रोज शुकुलजी ने शाश्वत जी को पकड़ा और पूछ ही दिए जात. तो, शाश्वत जी एकदम्मे से उनके कान में जाकर बोले- ”पंडीजी, हम तो श्रेष्ठ कश्मीरी नस्ल वाले ब्राह्मण हैं!” इतना कहकर ठठा कर हंसे शाश्वत जी. शुकुल जी भी हंसे. थोड़ी देर बाद शाश्वतजी ने भेद खोला कि वे डबल जाति के हैं. पिताजी लाला थे और माताजी कश्मीरी ब्राह्मण. सो संतान सब डबल जात के हुए न. 🙂

अनेहस शाश्वत जी यूपी के सुल्तानपुर उर्फ सुल्तापुर के रहने वाले हैं. लोकसभा के पहले चुनाव में उनके दादा बाबू गनपतसहाय लड़े थे और जीते भी. मतलब ई कि शाश्वत जी बड़ मनई हैं. माताजी और पिताजी दोनों प्रिंसिपल रहे. दोनों अब स्वर्गवासी हो चुके हैं. सुल्तानपुर के इनके सिविल लाइंस वाले बंगले में हम लोगों ने (भाई Anil Kumar Yadav के नेतृत्व में) अपने बेकारी के दिनों में काफी दिनों तक रोटी तोड़ने का कीर्तिमान स्थापित किया. शाश्वत जी उदारमना है. हम लोगों के पास न नौकरी थी न पइसा. तब इन्होंने अपनी मां का कश्मीरी स्वर्णाभूषण कटेहरू को एक सुनार के यहां गिरवी रखा और उससे मिले पैसे को हम बेकारों में वितरित कर नौकरी खोजने के लिए रवाना होने का निर्देश दिया. खैर, पइसा भी खत्म हो गया घूमने-खोजने में और नोकरिया भी न मिली. सो, फिर हम लोग शाश्वत जी के मत्थे पड़ गए. इस तरह शाश्वत जी के अन्न पर पलते हुए हम लोग ढेर सारी किताबें पढ़ते गए और अखबारों में लिखते गए. इसी दरम्यान मुझे दैनिक जागरण, लखनऊ में नौकरी मिली और फिर वहां से अमर उजाला, कानपुर चला गया.

कुछ समय बीतने के बाद कानपुर में भी शाश्वत जी उसी अमर उजाला में नौकरी करने पहुंचे जहां अपन भी सेवा देने में तत्पर थे. शाश्वत जी ने राजसी अंदाज में बड़ा सा मकान लिया और कुत्तों को खिलाने के लिए ढेर सारे पारले बिस्कुट को एक बड़े टिन के बाकस में भर दिया. हम लोग जब उनसे मिलने जाते तो हम लोगों को वह गरीब आदमी मानकर कुत्ता तुल्य बिस्किट फेंक देते खाने के लिए और खुद वह एनर्जी देने वाला बड़ मनई ब्रांड क्रीम बिस्कुट खाते. पर हम लोग कुत्ता वाला पारले बिस्कुट खाकर भी खुश थे क्योंकि उस समय तनख्वाह इतनी न मिलती थी कि हम लोग शाश्वत जी से वर्ग संघर्ष छेड़ कर इस अमानवीय कुकृत्य के खिलाफ क्रांति की बिगुल बजा पाते. शाश्वत जी हम लोगों को चुपचाप बहुत तेज तेज बिस्कुट खाते देखकर कई बार कह भी देते थे कि इस देस के गरीब आदमियों को सहूर कब्बों नहीं आएगा. खाते भी हैं तो चपर चपर की आवाज निकाल कर. 🙂

फिलहाल शाश्वत जी को जन्मदिन की बधाई दीजिए और उनसे कहिए कि वे मरणोपरांत के लिए जो जीतेजी वसीयत तैयार कर रहे हैं, उसमें मेरा भी नाम डाल दें ताकि दो पइसा हमको भी मिल जाए. इसके बदले में भड़ास पर उनके बारे में हर साल उनकी पुण्यतिथि के दिन अच्छा सा लेख लिखा करूंगा जिनमें केवल उनकी महानता का वर्णन होगा. साथ ही उनकी लेखनी के सम्मान में और पत्रकारिता क्षेत्र में उनके अतुलनीय व अद्वितीय योगदान के लिए एक बड़ा जलसा दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में कराता रहूंगा जिसमें देश भर की बड़ी विभूतियां शाश्वतजी को याद कर कर घंटों माइक पकड़ कर बोलेंगे, वे भले शाश्वत जी से कभी मिले न रहे हों तो क्या.

वसीयत से याद आया कि ये भी बता दूं कि शाश्वत जी ने शादी बियाह नहीं किया है. वह ऐसे बंधनों में कभी फंसे नहीं और जब हम लोगों की शादी हुई तो ठठाकर हंसते हुए बोले कि गरीब आदमी कभी सुधरेंगे नहीं. पइसा है नहीं, बियाह कर लेंगे और तुरंत बच्चा पैदा कर देंगे. फिर सारे परानी कांय कांय हाय हाय करते हुए जिंदगी भर अपने और पड़ोसियों-दोस्तों-मित्रों को परेशान करते रहेंगे…

खैर.

जाते जाते एक चेतावनी भी देना चाहता हूं. अगर वसीयत में मेरा नाम न हुआ, शाश्वत जी के मरणोपरांत वसीयत खुलने के दौरान मेरा नाम न दिखा तो उसी दिन से भड़ास पर पोलखोल अभियान शाश्वत जी के खिलाफ शुरू कर दूंगा और इनके बारे में ऐसी ऐसी कहानियां भड़ास पर छापूंगा जो इन्हें खुद भी जीते जी नहीं पता होगी. इसलिए कहूंगा कि हे भलेमानुस और धनी आदमी, दो पइसा गरीबों को देते जाना. दुआ देंगे. और बाकी नाम बदनाम करना हो तो भइया देख लेना.

फिलहाल तो उम्मीद यही है कि आप वसीयत में मेरा नाम डालेंगे और अथाह चल-अचल संपत्ति का चालीस फीसदी हिस्सा मेरे नाम कर देंगे. उम्मीद पर दुनिया कायम है. हैप्पी बड्डे के दिन आपका भक्त दुआ कर रहा कि जो भी ज्ञात अज्ञात सफेद काला रुपया पइसा है आपके पास, वह बढ़ता रहे, बैंक बैलेंस फलता फूलता रहे. बस, वसीयतवा में हमार नमवा डालना न भूलिएगा सरकार.

मैं जानता हूं कि वसीयत में नाम डलवाने के चक्कर में कई और लोग लगे हैं और आपकी सेवा टहल कर रहे हैं. पर मैं सबसे योग्य कैंडीडेट हूं, ये आप भी जानते हैं. क्या कउनो दूसरा भक्त आपको आज हैप्पी बड़्डे के दिन हैप्पी बड़्डे बोला? आपका फोटो डाल कर लिक्खा? नहीं न. इसलिए मेरा नाम सर्वमान्य रूप से वसीयतनुरूप है प्रभु.

जैजै.
यशवंत

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं-

Shravan Shukla हाहाहा हैप्पी बर्थडे। लेकिन बर्थडे पर गिफ्ट देने की जगह बड़ा वाला हिस्सा कब्जिया रहे हैं।

Yashwant Singh बेटा वसीयत पर नजर न रखना वरना मडर हो जाएगा… तुम भी सुल्तापुर वाले हो, मुझे पता है कि सुल्तापुरिया खुरपेंची होते हैं… 🙂

Ravindra Ojha अनेहस कहां खो गए हो, एकांतवासी होकर क्‍या खोज रहे हो, तस्‍वीर देखी तो याद आ गए, बहुत मिस कर रहा हूं, जन्‍म दिन की बधाई जहां रहो वहीं मस्‍ती करो

Yashwant Singh खो नहीं गए हैं, भोग विलास पूर्ण जीवन में लीन हैं, हम दोस्तों को दुरदुरा कर दूर किए हुए हैं.. 😀

Bhupal Bahadur Singh आपने कितने सुन्दर सत्य का उद्घाटन किया है. अदभुत. वैसे, पूर्व में अनेहस मुगल शासक शाहजहाँ थे. आप सभी अवगत हो लें.

Yashwant Singh तभी वो हर बात में मुगल दौर का जिक्र करते रहते हैं..

Rasik Dwivedi आदर और सम्मान संग बड़े भाई को बहुत बधाई। मै तो शाश्वत जी का शिष्य सरीखा चिंटू हूँ। मेरी खबरों को धार देने और लेखन की बारीकियों को बताने समझाने वाले मास्टर का अभिनंदन

Yashwant Singh भाई, बस वसीयत में दावेदार न बनिएगा वरना मडर हो जाएगा… बाकी आप जो भी हों… 🙂

Rasik Dwivedi न भैया। उसमें सिर्फ आप ही जोर आजमाइश करिए।

Lakhan Salvi जन्मदिन मबारक. साथ ही अजब डिक्सनरी के गजब शब्दों के लिए शुभकामनाएं (मौजियल, लालावाद, अनेहस)

Arun Asthana अनेहस साला शाश्वत कमीना है इसीलिए कमीनों का परम मित्र है। गर्व से कहता हूं- मेरा भी वैसा ही मित्र है। दस साल बाद भी मिलेगा तो वैसे ही मिलेगा। हमने भी आवारगी के तमाम दिनरात साथ काटे हैं। आजकल दुनिया का सबसे फायदे वाला धंधा कर रहा है। पता नहीं कितना माल काट रहा है। इसीलिए इतनी तारीफ कर रहा हूं। यशवंत को 40 फीसदी के साथ मुझे भी बस दस फीसद लिख देना भाई। उसके ब्याज से हर साल यशवंत के जलसे में दारू पार्टी करूंगा और पियक्कड़मित्र शाश्वत आल्हा गाएंगे और वही कहेंगे जो यहां मै कह रहा हूं- अनेहस अमर रहेगा।

Yashwant Singh अरुण सर, वसीयत में हिस्सेदारी में प्रतिद्वंद्वी न बनिए सर क्योंकि सारा दावा मेरा ही है. अगर कई दावेदार आ गए तो जैसे ठेकापट्टी पाने में गदर हो जाता है वैसे ही यहां भी मडर हो जाएगा 🙂

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One comment on “हैप्पी बड्डे : जात न पूछो शाश्वत की!”

  • Pulin Tripathi says:

    एक बेहतरीन और बेचारे शाश्वत जी, कहाँ हैं? पूछा किसी ने। लखनऊ में एक आश्रम में हा हा हा करते दिन गुजर कर रहे हैं। Golden talks लिख रहे हैं। यहां वसीयत की बात हो रही है। जो कि वो पहले ही मेरे पास रख चुके हैं। ठप्पा लगा के। कानूनी लड़ाई किसी के मन में आ रही हो तो मडर यहां भी होते हैं।

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