अर्नब गोस्वामी टीवी न्यूज के तालीबानीकरण का गुनहगार है!

-संजय कुमार-

करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताए।
बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाय।।

अर्नब गोस्वामी को आज मीडिया जगत से शिकायत है कि जब मुंबई पुलिस उनके संपादकीय टीम के सहकर्मियों पर एफआईआर दर्ज कर उन्हें परेशान कर रही है तो कोई पत्रकार और मीडिया हाउस उनके समर्थन में सामने क्यों नहीं आ रहा है? ये शिकायत वाजिब होती अगर किसी जमाने का गुड बॉय अर्नब आज बैड बॉय नहीं बन गया होता। एनडीटीवी के बाद अर्नब का जो रूप सामने आया उसमें पत्रकारिता का ये नायक टाइम्स नाउ होते हुए जब रिपब्लिक पहुंचा तो पूरी तरह खलनायक बन बैठा। उसने नया रास्ता अख्तियार किया। और जनपक्षीय और निष्पक्ष पत्रकारिता की जगह एक राष्ट्रवादी पत्रकार बन बैठा। जिसका मतलब आप सब अच्छी तरह जानते हैं।

अर्नब ने अपने रिपब्लिक टीवी में निर्लज्जता की सारी हदें पार कर दी हैं। सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। अब वो किस मुंह से पत्रकार समुदाय से मदद की गुहार लगा रहे हैं। जबकि रोज अपने हिदी और अंग्रेजी चैनल पर देश के सभी नामी-गिरामी पत्रकारों को लुटियंस मीडिया, लुटियंस मीडिया बोलकर कटाक्ष करते रहते हैं। उनकी लानत-मलानत करते रहते हैं। और आज उन्हीं से मदद की गुहार लगा रहे हैं। रहम की भीख मांग रहे हैं। क्या अर्नब को पता नहीं कि उनके डिबेट शो में कथित राष्ट्रवादी या बीजेपी नेताओं को छोड़कर कोई भी बड़ा नेता, पत्रकार, चिंतक आना पसंद नहीं करता। और अगर कोई गलती से चला गया तो पहले उसकी बेइज्जती की जाती है और जब वो जवाब देना चाहता है तो बड़ी बेशर्मी के साथ उनके ऑडियो को कम या बंद करवा दिया जाता है।

अर्नब आपको किस बात की शिकायत है। आज जो लोग आपके साथ खड़े हैं आप उन्हीं का तो प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हीं के लिए भोंपू पत्रकारिता कर रहे हैं। मुंबई के पुलिस कमिश्नर के खिलाफ उनके महकमे में बगावत की खबर आपने दिखाई तो विद्रोह के प्रमाण भी सामने होने चाहिए थे। लेकिन जब आपसे इस बाबत पूछा गया तो आप संविधान की दुहाई देने लगे। इसे पत्रकारिता पर हमला बताने लगे। इसे सोनिया गांधी का षड्यंत्र बताने लगे। उद्धव ठाकरे की साजिश बताने लगे। कहने लगे कि 100 साल पुराने अंग्रेजी कानूनों का इस्तेमाल आपको डराने-धमकाने के लिए किया जा रहा है। दरअसल आप आदतन झूठ बोलते हैं, इसके आदि हो चुके हैं। जरा बताइएगा, आज देश के किस चैनल या नेटवर्क में 1000 संपादकीय कर्मचारी हैं। दरअसल केवल और केवल झूठ बोलना आपकी अदा और अंदाज में शुमार हो चुका है।

अर्नब, आज आपके साथ देश का कोई प्रतिष्ठित पत्रकार, नेता भले ही खड़ा ना हो लेकिन आप जिनलोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वो तो आपके पक्ष में बोल ही रहे हैं। निर्मला सीतारमण, स्मृति ईरानी, नित्यानंद राय, शिवराज सिंह चौहान, नलिन कोहली, मनोज तिवारी, के सी त्यागी समेत कई कंठीधारी बाबा तो इसे लोकतंत्र की हत्या, मीडिया को कुचलने की साजिश, कांग्रेस के डीएनए में तानाशाही और एफआईआर वापिस लेने की मांग तो कर ही रहे हैं। फिर भी आपके मन में कचोट है। क्योंकि आप इनकी असलियत जानते हैं। आप जिन बड़े और इज्जतदार पत्रकारों के साथ काम कर कामयाबी की जिस बुलंदी पह पहुंचे हैं उनसे अपनी रेकग्निशन यानी मान्यता चाहते हैं। और जब आपको ये नहीं मिलता तो मन मसोस कर रह जाते हैं। क्योंकि आपने पत्रकारिता के नाम पर जो नंगापन दिखाया है, इसकी मर्यादा को अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल कर तार-तार किया है, उसके साथ किसी को भी खड़ा होने में शर्म और झिझक तो महसूस होगा ही।

आप जब मुंबई के एन एम जोशी मार्ग स्थित थाना पहुंचे तो किसी अन्य चैनल का कैमरा क्यों नहीं था? मुंबई में हजारों पत्रकार हैं, लेकिन आपके साथ एक दर्जन पत्रकार भी नजर नहीं आए। आपके चैनल के तीन कैमरे, तीन माइक के साथ आपके ही कई सहकर्मी मौजूद थे। यहां तक कि आपके राष्ट्रवादी राजनीतिक विचारों से साम्य रखने वाली सबसे बड़ी वीडियो न्यूज एजेंसी एएनआई ने भी आपके इस ड्रामे, नौटंकी को कवर करना जरूरी नहीं समझा और इसके लिए अपनी टीम भेजने की जरूरत महसूस नहीं की।

आप अकेले थाने के सामने खड़े होकर कभी उद्धव ठाकरे तो कभी पुलिस कमिश्नर परम बीर सिंह की लानत मलानत करते रहें। सबको चुनौती देते रहे। पुलिस कमिश्नर को जेल भेजने की धमकी देते रहे। सरकार गिराने की बात करते रहे। आप हरवक्त खुद ही खबर बनने की कोशिश करते रहते हैं। आपको ये तय करना चाहिए कि आप पत्रकार हैं, राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, किसी पार्टी के प्रवक्ता हैं या फिर राष्ट्रवादी राजनेता हैं। वैसे आप ये तो एलान खुद ही करते हैं कि आपका रिपब्लिक टीवी नेटवर्क राष्ट्रवादी चैनल है। इसका मतलब देश भी समझता है और आप भी बेहतर तरीके से समझते ही होंगे।
आपको आत्मचिंतन करना चाहिए कि पत्रकार समुदाय से मदद की गुहार के बावजूद आपके साथ देश का कोई पत्रकार, कोई मीडिया हाउस खड़ा क्यों नहीं होता? आप पत्रकारिता के किन मानदंडों को पूरा करते हैं। आपको एनबीए की सदस्यता क्यों छोड़नी पड़ी। एफआईआर दर्ज होने के बाद आज आपको चौतरफा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पुलिस थानों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, फिर भी कोई पत्रकार खुद को आपके साथ आइडेंटीफाई नहीं करना चाहता। वो ऐसा करने से कतराता, घबराता है। क्योंकि आप पत्रकारों के बड़े समुदाय के बीच घृणा, हंसी और प्रहसन के पात्र बन गए हैं?

अर्नब, मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि पालघर मामले में साधुओं की हत्या का आरोप आपने किस आधार पर सोनिया गांधी पर मढ़े। वहीं आप कर्नाटक में, उत्तर प्रदेश में साधुओं की हत्या पर खामोश रहे। कोरोना फैलाने के लिए तबलीगी जमात को किस तरह कसूरवार ठहराकर समाज में सांप्रदायिकता और घृणा फैलाने की कोशिश की। सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी की पुष्टि एम्स अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने की। फिर भी आप उसे हत्या बताते रहे। आपने सुशांत को न्याय दिलाने के नाम पर किस बेशर्मी के साथ बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को हीरो बनाया ताकि बिहार चुनावों के लिए जातीय गोलबंदी में मदद पहुंचाई जा सके। इन सबके लिए हाई कोर्ट ने आपको बार बार फटकार भी लगाई है, लेकिन इससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ता। आपका एक रिपोर्टर मुंबई की सूनसान सड़कों पर कैमरे के सामने बंदरों की तरह उछलता-कूदता रहता है और आप उसे खोजी पत्रकारिता और न्याय दिलाने की कवायद बताते रहते हैं।

इतना ही नहीं, हाथरस कांड में तो आपने हद ही कर दी। बलात्कार पीड़िता के परिवार के साथ खड़े होने की जगह आप उत्तर प्रदेश की सत्ता के लिए मुफीद हत्या के आरोपियों के पक्ष में खड़े नजर आए। आपने अपने चैनल पर दो कौड़ी के साधुओं, संन्यासियों, चाटुकारों, चापलूसों को अपनी तारीफ करवाने के लिए जगह दी। इसे पत्रकारिता नहीं भड़ुआपन कहते हैं। अर्नब, मैं पूछना चाहता हूं कि चाहे टीआरपी में हेराफेरी कर ही सही, आपने आजतक को धूल चटाकर नंबर वन की कुर्सी हासिल की। फिर भी इज्जत हासिल नहीं कर पाए?

आपकी खबर मीडिया में तभी छपती है जब आपके खिलाफ पुलिस की कोई कार्रवाई होती है। आप कानून के शिकंजे में होते हैं। आपका काम तो आम लोगों के दुख-दर्द में शामिल होना है, लेकिन आपका अपना दुख-दर्द इतना ज्यादा है कि आपको इससे ही फुर्सत नहीं मिलती। इतना ही नहीं, टीआरपी हेराफेरी कांड में मुंबई पुलिस ने आपसे चैनल का हिसाब किताब क्या मांग लिया आपने आसमान सिर पर उठा लिया। खबर देने की जगह खुद ही खबर बनकर हाय-हाय करने लगे। पत्रकारिता की दुहाई देकर छाती पीटने लगे।

आज आप संविधान, लोकतंत्र और पुलिसिया कानून की दुहाई दे रहे हैं। संविधान से हासिल बोलने की आजादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग कर रहे हैं। क्या आप रोज टीवी स्क्रीन पर एंकरिंग करते हुए खुद ही इसकी धज्जियां नहीं उड़ाते हैं। आप रोज विपक्ष को गाली देने का काम करते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष का नाम ले लेकर उसे कोसते रहते हैं। सोनिया सेना, राहुल सेना, वाड्रा सेना और पता नहीं क्या-क्या कहते हैं। आप एनडीए में शामिल सभी पार्टियों की छोड़कर बाकी राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें देख लेने, सबक सिखाने की चुनौती देते हैं। मगर मोदी, योगी का नाम लेने में आपके हलक सूखने लगते हैं। क्या एक पत्रकार के रूप में आपको ये शोभा देता है?

अर्नब, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सूत्र वाक्य फ्रांस के दार्शनिक फ्रांस्वा मेरी ऐरोएट, जिन्हें दुनिया वाल्तेयर के नाम से जानती है, ने कही थी। ‘जरूरी नहीं कि मैं आपकी बात से सहमत रहूं, लेकिन मैं आपके बोलने के अधिकार की मरते दम तक रक्षा करूंगा।‘ और इस मामले में मैं आपके साथ खड़ा रहूंगा। लेकिन आपसे ये उम्मीद भी रहेगी कि आप अपने कामों का मूल्यांकन करेंगे। क्योंकि आपने टीवी न्यूज इंडस्ट्री में ज्यादातर एंकरों को अपने जैसा ही बना दिया है। टीवी पत्रकारिता की एक पीढ़ी को खराब कर दिया है। काबिल एंकरों को जाहिल बना दिया है। सब के सब एंकर टीवी स्क्रीन पर खबर देने की जगह चिल्लाने लगे हैं। जजमेंटल होने लगे हैं। पक्षपाती पत्रकारिता का ये दौर भयावह है जो हमें अफगानिस्तान में तालीबानी शासन की याद दिलाता है, जिसमें विरोध की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। मतलब, या तो आप हमारे साथ हैं या फिर देशद्रोही हैं, राष्ट्रविरोधी हैं। मैंने अपनी बात कबीर के एक दोहे से शुरू की थी और कबीरे के ही एक दोहे से खत्म करता हूं…

कबीरा मन पंछी भया, भये ते बाहर जाय।

जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।

लेखक परिचय: संजय कुमार बीते 30 साल से कई अखबार, पत्र-पत्रिकाओं और टीवी न्यूज चैनल से जुड़े रहे हैं। फिलहाल स्वराज एक्सप्रेस न्यूज चैनल के कार्यकारी संपादक हैं।

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