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सियासत

अतीक की असली कहानी (1) : भुक्खल को चेतावनी- काफिला गुज़रे तो असलहा गाड़ी के बाहर दिखाई ना‌ दे‌ वर्ना…

मोहम्मद ज़ाहिद-

इलाहाबाद जंक्शन से हर सुबह एक तांगा सवारी बैठाती और खुल्दाबाद, हिम्मतगंज, चकिया पर सवारी उतारती चढ़ाती जंक्शन से 5 किमी दूर स्थित “कसरिया” जाती और फिर वहां से इसी तरह इलाहाबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन आती। सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक सवारी ढोने का काम चलता रहता।

यह तांगा फिरोज़ अहमद का था जिससे वह जीविकोपार्जन के लिए सवारी ढोते थे।

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फिरोज़ अहमद गद्दी बिरादरी के (मुसलमानों में यादव) थे जिनकी इलाहाबाद पश्चिमी और नवाबगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी आबादी है। यह लोग शौकिया घोड़े और व्यवसायिक रूप से गाय भैंस बकरी इत्यादि पाल कर दूध‌ का व्यवसाय करने के लिए जाने जाते हैं।

इस बिरादरी का परंपरागत पहनावा सफेद कुर्ता, सफेद तहमद और सफेद साफा था। अतीक अहमद जीवन भर इसी वेशभूषा को धारण किए रहे।

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कसरिया या कसारी मसारी फिरोज अहमद का पुस्तैनी गांव‌ था , उसी गांव के चकिया मुहल्ले में फिरोज अहमद ने 1972 में घर बनवाया और अपने दो बेटों अतीक अहमद और खालिद अज़ीम उर्फ अशरफ तथा तीन बेटियों शाहीन और परवीन और सीमा के साथ चकिया में रहने लगे।

10 अगस्त 1962 को जन्म लेने वाले और जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उम्र के 17वें साल में अतीक अहमद पर पहला केस दर्ज हुआ और वर्ष 1979 में अतीक अहमद पर अपने गांव कसारी-मसारी में ही भेंड़ चराने वाले लड़के की हत्या का आरोप लगा और वह इसमें नामजद हो गये। आरोप था कि झगड़े में उस लड़के के सर पर चोट लगी और वह मर गया।

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अतीक अहमद कक्षा 8 पास थे , दसवीं में फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके थे और वह दोपहर बाद अक्सर अपने अब्बा फिरोज अहमद के उसी घोड़े पर बैठकर इलाहाबाद के पुराने इलाके नखासकोना , अटाला और रोशनबाग में आया करते थे।

1984 में रोशनबाग के छोटे मोटे दबंग वाहिद राइफल (बदला हुआ नाम) के यहां अतीक अहमद बैठकी लगाते थे , कभी कभी होटल से चाय भी लाते थे , वाहिद राइफल के लिए पान लाते थे।

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चुंकि अतीक अहमद बेहतरीन घुड़सवारी और पहलवानी करते थे , इसलिए कम लोगों को पता होगा कि उन्हें लोग “पहलवान” के नाम से जानते थे।

सफेद घोड़े पर बैठकर सफेद कुर्ता सफेद तहमद और सफेद साफा बांधे‌ लंबी मूंछों वाले अतीक अहमद रोशन बाग , अटाला और नखास कोहना पर पहचाने‌ जाने लगे।

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उस समय इलाहाबाद में “भुक्खल महाराज” का एकछत्र राज था , उनके पिता पंडित जगत नारायण करवरिया की कौशांबी (उस समय कौशांबी इलाहाबाद का हिस्सा था) में धाक थी।

पंडित जगत नारायण करवरिया कौशांबी के घाटों और बालू खनन के बेताज बादशाह थे , उनके दो बेटे थे श्याम नारायण करवरिया उर्फ़ मौला महाराज और विशिष्ट नारायण करवरिया ऊर्फ भुक्खल महाराज। भुक्खल महाराज अपने समय के सबसे बड़े बमबाज थे।

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यह दोनों भाई इलाहाबाद आए और शहर के कल्याणी देवी मुहल्ले में हवेली बनवा कर रहने लगे और बालू खनन के साथ साथ रियल स्टेट के धंधे के बेताज बादशाह बनकर उभरे।

शहर में घर खाली करवाने या विवादास्पद जमीन मकान खरीदने के मामले में यह लोग सिद्धहस्त हो गये और इससे काफी संपत्ति बनाई , तब इलाहाबाद में भुक्खल महाराज का एकछत्र सिक्का चलता था।

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उनके नाम की दहशत थी।

दरअसल इलाहाबाद गंगा जमुना के घाटों से बालू खनन के लिए प्रसिद्ध है , और गंगा तथा जमुना से बालू निकालने के लिए यहां दर्जनों घाट हैं और यहां का रिवाज है कि जिसकी सरकार उसके‌ लोगों की घाट और घाट का बालू। कांग्रेस की सरकारों में करवरिया इन घाटों के बेताज बादशाह थे।

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भुक्खल महाराज का दुर्भाग्य कहिए या अतीक अहमद का सौभाग्य कि कौशांबी का रास्ता चकिया से होकर गुजरता था , अब भी गुज़रता है, भुक्खल महाराज जब भी कौशांबी जाते तो तमाम जिप्सी और महेंद्रा जीप की गाड़ियों के काफिले में उनके बैठे लोग अपने असलहे बाहर‌ निकाले रहते।

अतीक अहमद को यह नागवार लगता की कोई उनके मुहल्ले से असलहों का प्रदर्शन करते हुए जाए।

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कहते हैं कि एक‌ दिन उन्होंने हाथों में असलहा लिए भुक्कल महाराज का काफिला रोक लिया और दबंगई से चेतावनी दी कि कल से काफिला गुज़रे तो असलहा गाड़ी के बाहर दिखाई ना‌ दे‌ वर्ना …….

भुक्कल महाराज की काफी उम्र हो चुकी थी पंगा लेने की बजाय उन्होंने अक्लमंदी दिखाई और अगली बार से काफिले ने रास्ता ही बदल दिया, शहर में इसे लेकर सनसनी फैली और इस घटना ने 23-24 साल के अतीक अहमद को शहर में चर्चित कर दिया।

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यह दौर था जब इलाहाबाद में सलीम शेरवानी की टार्च और बैटरी “जीप इंडस्ट्रियल सिंडिकेट” की भारत में तूती बोलती थी।

उसी दौर में संभवतः 1984-85 में जीप इंडस्ट्रियल सिंडिकेट के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी थी और कहा जाता है कि सलीम शेरवानी ने तब हड़ताल खत्म कराने के लिए अतीक अहमद की मदद ली और अतीक अहमद ने हर कर्मचारी के घर जाकर अपनी दबंगई से उन्हें मजबूर किया कि वह काम पर आएं, और हड़ताल खत्म हो गयी।

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इसके बाद अतीक अहमद इलाहाबाद में दबंग के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब हुए।

मगर उन्होंने तब तक ना किसी से हफ्ता वसूला ना किसी को परेशान किया ना किसी की ज़मीन मकान कब्जा किया ना किसी की बहन बेटी की तरफ गलत नज़र उठाई। और उसी समय क्यों ? उनका अपराधिक जीवन जैसा भी हो पर उन्होंने मरते दम तक कभी किसी की बहन बेटी की तरफ बुरी नज़र नहीं डाली।

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सन‌ 1989-90 के उसी दौर में इलाहाबाद नगर महापालिका के पार्षद का चुनाव होने वाला था और तब किसी आरोप में अतीक अहमद जेल में थे और‌ वहीं से वह चकिया से निर्दलीय सभासद के प्रत्याशी बने तो शहर भर में हाथ में बेड़ियों और जेल की सलाखों को पकड़े अतीक अहमद के बड़े बड़े कट आऊट इलाहाबाद की सड़कों पर पट गये।

सभासद के चुनाव में सरायगढ़ी और नखासकोना से निर्दलीय ही खड़े हुए “चांद बाबा” , “चांद बाबा” हाफ़िज़ कुरान थे , 5 फिट 2 इन्च के पतले दुबले और सर पर हर वक्त गोल टोपी पहने उलट खोपड़ी वाले “चांद बाबा” के नाम सरायगढ़ी में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाली औरतों को लगातार बम मार कर मीरगंज भगाने का कारनामा दर्ज हो चुका था।

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उसी समय इलाहाबाद में चौक के आसपास ‘चांद बाबा’ नाम का खौफ था. नाम इतना बड़ा की पुलिस भी चांद बाबा से पंगे लेने से कतराती थी। ना सिर्फ पुलिस बल्कि नेता भी चांद बाबा के अपराधिक वर्चस्व से डरते थे।

चांद बाबा उलट दिमाग का शख्स था , बात करते करते आऊट हो जाता था , तुरंत ब्लड प्रेशर हाई, तुरंत गाली गलौज करने लगता और मारपीट शुरू कर देता था। उसका गैंग भी वैसा ही खतरनाक था जिसमें जग्गा और छम्मन जैसे खतरनाक बमबाज शामिल थे।

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कहा जाता है कि कि इलाहाबाद की कोतवाली का गेट तक चांद बाबा के डर से उस समय बंद हो गया था जो कभी भी बंद नहीं हुआ करता था‌ ना फिर कभी बंद हुआ।

इस चुनाव में अतीक अहमद ने जेल से ही जीत दर्ज की और चांद बाबा ने भी जीत दर्ज की‌ और शहर में चांद बाबा के सामने अतीक अहमद आ खड़े हुए।

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कहा जाता है कि चांद बाबा से आजिज़ पुलिस और स्थानीय नेताओं‌ विशेष कर इलाहाबाद उत्तरी से कांग्रेस के तत्कालीन विधायक ने चांद बाबा के बराबर अतीक अहमद को खड़ा करने में खूब मदद किया।

जारी….

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लेखक मोहम्मद ज़ाहिद इलाहाबाद के सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उनसे संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है।

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