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सुख-दुख

अतिवादिता की शिकार हो गई है पत्रकारिता

पिछले कुछ समय से दो भागों में विभाजित होकर पत्रकारिता अतिवादिता की शिकार हो गई है। या तो पत्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ है या फिर उनके कट्टर समर्थक। इसके इतर तीसरी धारा की गुंजाईश ही नहीं है। हर चीज को मोदी समर्थन और मोदी मुखालिफ नजरिये से देखा जा रहा है। एक ही तथ्य को परस्पर दो तरीके से पेश किया जा रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है डेमोक्रेसी को देखने-सुनने और समझने-समझाने के नजरिया भी मुखतलफ हो गये। सार्वजनिक मसलों पर आपने कुछ बोला नहीं कि फट से लोग आपके प्रति यह राय बना लेंगे कि आप या तो मोदी समर्थक है या फिर मोदी विरोधी। मतलब साफ है कि मोदी वह धुरी हो बन चुके हैं जिनके इर्दगिर्द पूरे देश घूम रहा है। या फिर यूं कहा जाना ज्यादा बेहतर होगा कि घूमता सा प्रतीत हो रहा है। साल 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी पूरी ताकत के साथ लार्जर दैन लाइफ की छवि बनाने की दिशा में चल रहे हैं। जो कोई मोदी के खिलाफ बोले उसे राष्ट्रद्रोही करार देना पत्रकारों का एक गिरोह का पुनीत कार्य बन चुका है। पत्रकारों का दूसरा गिरोह अपनी पूरी ताकत से मोदी की कब्र खोदने का दम भरते हुये खुद की छवि लार्जर दैन लाइफ वाली बनाने में लगा हुआ है। मजे की बात है कि दोनों गिरोह दुहाई डेमोक्रेसी की दे रहे हैं। मानो ये लोग डेमोक्रेसी को दुर्योद्धन की जंघा पर जबरन बैठाने से बचाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाये हुये हो।

डेमोक्रेसी को प्राचीन यूनान के साथ जोड़कर देखा जाता है। कुलीनतंत्र, राजतंत्र और अधिनायकवाद की दरियाओं और घाटियों से सैर करते हुये डेमोक्रेसी पोस्ट मार्डन युग में खुद निखारते हुये रफ्तार पकड़े हुये हैं। भारत में भी डेमोक्रेसी कई कदम आगे निकल चुका है। ऐसे में जब पत्रकारों का मोदी मुखालिफ गिरोह यह हल्ला मचाता है कि भारत में डेमोक्रेसी खतरे में, बोलने की आजादी खतरे में, एक-एक करके जनतांत्रिक संस्थाओं को कुचला जा रहा है, शैक्षणिक के स्वरूप में परिवर्तन किये जा रहे हैं तो ऐसा लगता है कि कौओं का झूंड अपने किसी साथी की मौत पर कांव-कांव कर रहा हो। ठीक इसी तरह से मोदी समर्थक पत्रकारों का गिरोह उनकी आलोचना करने वालों को जब राष्ट्रविरोधी, गद्दार, देशद्रोही का लांछन देते हैं तो ऐसा लगता है जैसे भारी बरसात के बाद मेढ़कों का झुंड एक स्वर में टर्रा रहा हो। इस कांव-कांव और टर्राहट के बीच डेमोक्रेसी को सही संदर्भ में देखने और समझने वाले पत्रकार या तो खामोश हो जाते हैं या फिर उनकी की सुनता ही नहीं है। या फिर उनकी बातों को किसी को सुनने ही नहीं दिया जाता है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में भी एक चुनी हुई मजबूत सरकार की नुमाइंदगी कर रहे थे और 2019 में देश की जनता ने दोबारा उनके और भी मजबूती के साथ उनके उनकी नीतियों और रीतियों पर मुहर लगाकर फिर से देश की बागडोर उनको सौंप दी। ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ यह विश्लेषण का मुद्दा हो सकता है। लेकिन लगातार यह कहना कि ऐसा होने से मुल्क की डेमोक्रेसी खतरे में है, उन मतदाताओं की तौहीन है जो मतदान केंद्रों पर बटन दबाने के लिए गये। ठीक इसी तरह मोदी के खिलाफ बोलने वालों को गद्दार और देशद्रोही कहना भी उचित नहीं है।

सूचना संकलन के साथ-साथ सरकार की नीतियों और कार्यों पर नजर रखना पत्रकारों का स्वाभाविक कर्म है। तकनीकी क्रांति ने तो हर शख्स को पत्रकार और संपादक बना दिया है। मोबाइल में लगे हुये कैमरे का झट से इस्तेमाल करते हुये लोग शॉट्स बनाते हैं और पहल झपकते उसे सोशल मीडिया पर प्रेसित भी कर देते हैं। और लिखने वाले लोग जमकर लिखते भी हैं। ऐसी स्थिति में यह तर्क कि देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में गले से नीचे नहीं उतरता है। वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि समय के साथ तमाम मीडिया घरानों पर सियासी रंग कुछ ज्यादा ही चढ़ गया है। लेकिन इस तल्ख हकीकत को समझने की जरुरत है कि मीडिया संस्थानों का यह बदला हुआ भी पूरी तरह से मुनाफाखोरी के सिद्धांतों पर आधारित है। ऐसा नहीं है कि मीडिया हाउस पहले मुनाफाखोर नहीं थे। मुनाफाखोर थे लेकिन कहीं न कहीं पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों का भी उन पर असर था।

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मोदी हुकूमत के पहले टर्म में राष्ट्रवाद के बाजार को जमीन मिली थी, जिसका इस्तेमाल मीडिया संस्थानों ने खाने और मुटाने के लिए बखूबी किया। मीडिया घरानों को पता था कि यदि दोबारा मोदी की ताजपोशी होती है तो उन्हें एक बार फिर राष्ट्रवाद की लहलहाती फसल को छक कर चरने का मौका मिलेगा। मोदी के दोबारा सत्ता में आने के बाद मीडिया इसी काम लगी हुई है। मीडिया का चरित्र पहले भी ऐसा ही था। अंतर सिर्फ इतना है कि इसके पहले वह सेक्यूलरवाद के नाम पर फसल चल रही थी। आज सेक्यूलरवादी मीडिया संस्थाओं के लिए कमोबेश अकाल की स्थिति बनी हुई है।

हर विचारधारा की एक उम्र होती है। लेकिन डेमोक्रेसी एक ऐसी विचारधारा है जो समय बीतने के साथ और जवान हो रहा है और आगे भी होती जाएगा। साम्यवाद और राष्ट्रवाद 19 वीं शताब्दी में आपस में टकराकर अपनी ताकत खो चुके हैं, लेकिन डेमोक्रेसी का सफर जारी है। भारत का रिपब्लिक कोई वाइमर गणतंत्र नहीं है जो एक फूंक से उड़ जाये। और न ही किसी पार्टी विशेष का नेता और यहां के प्रधानमंत्री की रीतियों और नीतियों के खिलाफ मुखर होने वाले लोगों को देशद्रोही कहा जा सकता है। भारत में बह रही ये दोनों धाराएं लोगों को गुमराह करने वाली है। इनसे इतर निकलकर डेमोक्रेसी को सही संदर्भ जानने और समझने की प्रवृति को विकसित करने की जरुरत है ताकि एक निश्चित फ्रेमवर्क में समस्यओं को चिन्हित करते हुये लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने की कला का निरंतर अभ्यास चलता रहे।

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लेखक आलोक नंदन शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क alok.nandan72@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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1 Comment

1 Comment

  1. Sp

    September 9, 2019 at 7:19 pm

    लेख मे बेवजह उर्दू के शब्दो का प्रयोग किया गया है. इससे आसानी से बचा जा सकता था. हिंदी एक समृद्ध भाषा है , इसका सम्मान बनये रखे. उम्मीद है की कम से कम 14 सितम्बर को तो आप इस बात का ध्यान रखेंगे.

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