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बीबीसी को भारत में क्यों गालियाँ मिलती हैं!

शीतल पी सिंह-

आप में से बहुत सारे रेडियो युग के नहीं हैं। हमारे जमाने में गाँव में जहाँ मैं अब फिर से रहता हूँ रेडियो ही संचार की त्वरितता का इकलौता साधन था। ताज़ा अख़बार क़स्बे के बाज़ार में (गांव से ढाई किलोमीटर दूर) अगली सुबह दस बजे तक आता था जिसे पूरे गाँव के एकाध ही लोग जो अध्यापक थे और क़स्बे का बाज़ार पारकर अपने विद्यालयों में पढ़ाने जाते थे, शाम को बाँचकर (पढ़कर) लौटते थे और फैली हुई अफ़वाहों पर सरमन जारी करते थे। फिर भी उसे फाइनल न माना जाता। कसक रह जाती।

तब हमारे एक चाचा मरफ़ी के रेडियो का ऐंटीना खींचते हुए सहन और बाग़ के पेड़ों के बीच इधर उधर फुदकते हुए सों-सों करती हुई आवाज़ों के बीच कभी कभी बीबीसी लगा देते थे और वह जब बीबीसी सुनकर ज़ोर से चिल्लाते हुए कुछ बताते तो उसे फ़ाइनल मान लिया जाता और उस सूचना पर पूर्णविराम लग जाता।

तब कांग्रेस का युग था लेकिन ठाकुर बामनों के परदेस से कमाकर तीज त्योहारों और छुट्टियों में लौटते जवान और अधेड़ लोगों में से अनेक उसके आलोचक थे और बीबीसी समर्थक।

फिर इकहत्तर की लड़ाई हुई और तब रेडियो पाकिस्तान हरियाणा तक क़ब्ज़ा कर चुका था जबकि असल में ढाका में उसकी फ़ौज सरेंडर पर दस्तख़त कर रही थी तब पुनः बीबीसी का सिक्का जमा और जो कुछ सों सों करती फ्रीक्वेंसी पकड़ती आवाज़ों के बीच सुनाई देता था वही अंतिम सत्य माना जाता था।

क़स्बे के कई दुकानदार तब भी जनसंघी थे और उनके यहाँ स्वतंत्र भारत नामक अख़बार आता था। तब मैं नहीं समझता था लेकिन बाद में जान सका कि वह उस समय भी खुले तौर पर दक्खिनी टोले का अख़बार था।

फिर छिहत्तर सतहत्तर में आपातकाल ही लग गया तब मैं झाँसी में था और मेरे मोहल्ले के अनेक युवा और तरुण शाखा लगाते थे, उन सब का सबसे प्रिय सूचना स्त्रोत बीबीसी ही था और हमेशा बना रहा।

लेकिन अब दशकों बाद सूचना के माध्यमों में अभूतपूर्व बदलावों के बाद मैं देख रहा हूँ कि बीबीसी अभी भी है लेकिन उसकी सूचना पर मेरे बचपन से युवावस्था में ठप्पा लगाने वाली जमात की राय पूरी तरह बदल चुकी है। उन्हें अब बीबीसी में वह नज़र आता है जो मेरी युवावस्था के दौरान लाल पार्टियों (कम्युनिस्ट दलों)के सस्ते सफ़ेद काग़ज़ों पर लाल स्याही में लिखा हुआ मिलता था। शब्दावली में फर्क है लेकिन टोन वही है, वे साम्राज्यवाद का भोंपू लिखते थे तो ये पश्चिमी देशों का एजेंडा लिखते हैं!

बीबीसी, सीएनएन, एपी, एएफपी, रायटर आदि वेदवाणी नहीं हैं लेकिन उनकी आलोचना उनके कंटेंट पर होने की जगह जब उनके अस्तित्व पर केंद्रित मिलती है तो वह भी निरा प्रोपेगंडा या सिर्फ़ भड़ास निकालने के सिवा और कुछ नहीं है।

इन संस्थाओं में जो कमी हैं उनके बारे में इनमें काम कर रहे/चुके अनेक लोगों ने अनेक बार सामने आकर इन्हें आइना दिखाया है और गूगल करते ही सब मिल जाता है। यह वही साबित करता है जो मानव सभ्यता जानती बूझती है कि कोई भी परफ़ेक्ट नहीं है, न इंसान न संस्थान। लेकिन ठीक यही बात हमारे अपने बारे में भी लागू होती है।

खैर हाल फ़िलहाल बीबीसी को इसलिए गालियाँ /आलोचना मिल रही हैं क्योंकि उसने भारत में लगभग प्रचलन से ग़ायब एक फ़ील्ड रिपोर्ट कर दी है जो कुंभ मेले में हुईं उन मौतों के बारे में है जिन्हें प्रशासन ने योजनाबद्ध तरीक़े से और ढिठाई से छिपाया। देश के पौने पाँच सौ न्यूज़ चैनलों और डेढ़ लाख अख़बारों ने वह काम नहीं किया जो सबको मालूम था लेकिन जिसे सब छिपाने में प्रत्यक्ष परोक्ष शामिल थे!

इसलिए बीबीसी को ख़ारिज किया ही जाना चाहिए कि वह धर्मविरुद्ध गया है!

केंद्रीय मंत्री के ब्रह्मभोज की खबर यहां पढ़ें…

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2 Comments

2 Comments

  1. Usman

    June 13, 2025 at 2:05 pm

    Apne bilkul sahi kaha hai

  2. MAHENDRA PANT

    June 14, 2025 at 11:33 am

    Bbc pehele high standard ka tha,non partial,unbiased.
    Now standard is very low.
    Always criticise Bharat.Now Bharat is not under colonial rule,advanced country,well educated people’s,believe in democracy, peaceloving country,should not be taken in other war.give respect to be respected.

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