ब्रिटिश उपनिवेश की आखिरी दो निशानियाँ जो बची हुई हैं- बीबीसी और शेक्सपीयर!

रंगनाथ सिंह-

थोड़ी देर पहले गूगल पर ऋषि सुनक सर्च किया तो टॉप 4 स्टोरीज के तौर पर ये लिंक आए। दो समाचार हैं, दो विचार। दोनों समाचार दो प्रमुख मीडिया संस्थानों की वेबसाइट पर छपे हैं। दोनों विचार दो स्टार्टअप वेबसाइटों पर। एक अंग्रेज द्वारा लिखा गया है, दूसरा भारतीय द्वारा।

एक विचार एंड्रू वाइटहेड ने लिखा है जिसका सार है कि ऋषि सुनक ब्रिटेन के लिए अच्छे विकल्प नहीं हैं! दूसरा विचार ज्योति मल्होत्रा ने लिखा है जिसका सार है कि सुनक का हारना तय है क्योंकि प्रवासियों को लेकर उनका रुख ‘शर्मनाक’ है! वो दोहरे मापदण्डों वाले नेता हैं आदि-इत्यादि। क्विंट और प्रिंट पर छपे एंड्रू वाइटहेड और ज्योति मल्होत्रा के लेखों का निष्कर्ष एक है बस कारण अलग-अलग गिनाए गए हैं।

एंड्रू लम्बे समय तक बीबीसी में रहे हैं. वह भारत में बीबीसी न्यूज के संवाददाता रहे हैं। बीबीसी विश्व समाचार सेवा के प्रमुख रहे हैं जिसके तहत बीबीसी हिन्दू, उर्दू, बांग्ला इत्यादि आते हैं। एंड्रू के ट्विटर बॉयो में लिखा है कि वो ‘कश्मीर की चिन्ता’ करते हैं।

ज्योति नियमित रूप से बीबीसी रेडियो में कंट्रीब्यूट करती रही हैं। उनके सार्वजनिक बॉयो अनुसार वह भारत के घरेलू और विदेशी मामलों की जानकार हैं। प्रिंट से पहले वो इण्डियन एक्सप्रेस और स्टार न्यूज में रही हैं। उनके पुराने लेखों से जाहिर होता है कि ज्योति भी कश्मीर की चिन्ता करती रही हैं।

ज्योति ने लेख का समापन सुनक के ‘हिन्दू रहने’ ‘गीता पढ़ने’ ‘हाथ पर रक्षाबंधन बाँधने’ का उल्लेख करते हुए उन्हें धर्म सीखने के लिए गीता पढ़ने और दया सीखने के लिए शेक्सपीयर पढ़ने की नसीहत दी है! ब्रिटेन में पले-बढ़े बच्चे को शेक्सपीयर पढ़ने, जिसने ब्रिटेन में गीता की शपथ लेकर पद ग्रहण किया हो उसे गीता पढ़ने की सलाह!

एंड्रू और ज्योति का लेख पढ़कर याद आया कि कुछ लोग कहते हैं, बीबीसी और शेक्सपीयर ब्रिटिश उपनिवेश की आखिरी दो निशानियाँ बची हैं। यहाँ तक कि इंग्लिश भी अब ब्रिटिश के बजाय अमेरिकी ज्यादा चलती है।



 

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