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जब ‘भक्त’ अखबार बनाते हैं…

Sanjay Kumar Singh :  नोटबंदी का मामला पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में था। इसके अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स का पहला पेज देखिए। इंडियन एक्सप्रेस की खबर की शीर्षक है, “क्या नकदी नीति जल्दबादी में अपनाई गई, क्या दिमाग लगाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा”। यह खबर एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है और फोल्ड से ऊपर है। यही खबर नवोदय टाइम्स ने फोल्ड के नीचे छापी है और शीर्षक लगाया है, “सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी पर पूछा, कब सामान्य होंगी स्थितियां”, दूसरी लाइन में, “हालात 10-15 दिन में ठीक हो जाएंगे : सरकार”।

Sanjay Kumar Singh :  नोटबंदी का मामला पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में था। इसके अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स का पहला पेज देखिए। इंडियन एक्सप्रेस की खबर की शीर्षक है, “क्या नकदी नीति जल्दबादी में अपनाई गई, क्या दिमाग लगाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा”। यह खबर एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है और फोल्ड से ऊपर है। यही खबर नवोदय टाइम्स ने फोल्ड के नीचे छापी है और शीर्षक लगाया है, “सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी पर पूछा, कब सामान्य होंगी स्थितियां”, दूसरी लाइन में, “हालात 10-15 दिन में ठीक हो जाएंगे : सरकार”।

कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों अखबारों ने एक ही खबर को जो ट्रीटमेंट दिया है उसी से खबर की धार कम हो जाती है। यह सामान्य है होता रहता है। पर खबर से आप नुकसान पहुंचाएं तो उसकी भरपाई भी कर दें। एक खबर मजबूरी में छापनी पड़ी (इतने बेशर्म नहीं हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ऐसी खबर खा जाएं या अंदर छाप दें) तो उसकी भरपाई करने वाली खबर वहीं छाप दें। नवोदय टाइम्स ने आज यह शर्मनाक काम किया है। इसी अखबार में पहले पेज की आज की बॉटम लीड है, “नोटबंदी : पीएम के दिल्ली ऑफिस में बैठकर काम करती थी रिसर्चर्स की टीम”। दूसरी लाइन है, “मोदी ने 6 विश्वस्तों के साथ की गोपनीय तैयारी !” अब आप बताइए, इस दूसरी खबर का कोई मतलब है? तैयारी की पूरी पोल खुल गई, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दिमाग नहीं लगाया गया तो शीर्षक कुछ और लगाना तथा दूसरी खबर छापकर कहना कि दिमाग लगाया था। पाठकों को मूर्ख समझना है। आज से नवोदय टाइम्स पढ़ना बंद।

पुनःश्च – एक मित्र ने कमेंट में लिखा है कि नवोदय टाइम्स वाली खबर हिन्दुस्तान में भी है। पत्रकारिता की भाषा में इसे प्लांटेशन कहा जाता है। छपने के बाद तो शर्मनाक हो ही जाता है इसलिए छापने से पहले समझना होता है कि हमारा उपयोग तो नहीं किया जा रहा है। सरकार (या किसी परम भक्त) ने सुप्रीम कोर्ट में खिंचाई वाली खबर की भरपाई जारी की और अखबार ने नतमस्तक होकर सेवा मुहैया करा दी। विडंबना यह है कि इसपर सरकार सर्विस टैक्स नहीं लेती।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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