एनडीटीवी के बुरे दिन : इनकम टैक्स विभाग ने चैनल के शेयर जब्त कर लिए

कभी कांग्रेस के यार रहे एनडीटीवी और प्रणय राय के दिन इन दिनों भाजपा राज में बुरे चल रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे पी. चिदंबरम व एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय की मिलीभगत से ईमानदार इनकम टैक्स अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव को प्रताड़ित करते हुए पागलखाने तक भिजवा देने का पाप अब असर दिखाने लगा है. इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के शेयर जब्त कर लिए हैं.

दरअसल इनकम टैक्स विभाग के अफसर संजय कुमार श्रीवास्तव ने अपने कार्यकाल में प्रणव राय और पी चिदंबरम की मिलीभगत से 2जी स्कैम के पैसे को हवाला के जरिए ब्लैक से ह्वाइट करने समेत कई किस्म के गड़बड़ घोटाले पकड़े थे जिसके कारण संजय को बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया. इन्हें पागलखाने तक भिजवा दिया गया. इनके उपर कई फर्जी केस लगवा दिए गए. अब एनडीटीवी और प्रणय राय को उन्हीं पापों की सजा भुगतनी पड़ रही है. पी चिदंबरम भी अपने पुत्र के लगातार केंद्रीय एजेंसियों के जाल में फंसते जाने को लेकर एक तरह से उसी पाप की सजा भुगत रहे हैं.

एनडीटीवी के साथ ताजा प्रकरण ये हुआ है कि इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के स्वामित्व वाली कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के सभी शेयर अस्थायी तौर पर जब्त कर लिए हैं. मीडिया कंपनी ने शेयर बाजारों को भेजी सूचना में यह जानकारी दी है. कंपनी के पास कुल 1 करोड़ 88 लाख 13 हजार 928 शेयर हैं जो कुल शेयर का 29.12 प्रतिशत हिस्सा है. आरआरपीआर न्यू दिल्ली टेलिविजन लि. में सबसे बड़ी प्रवर्तक समूह की कंपनी है. यह कंपनी एनडीटीवी 24X7, एनडीटीवी इंडिया और एनडीटीवी प्रॉफिट न्यूज चैनलों का संचालन करती है.

कंपनी की तरफ से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को बताया गया है कि उसे इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर की ओर से 25 अक्टूबर को एक पत्र प्राप्त हुआ है, जिसमें कहा गया है कि आयकर कानून, 1961 की धारा 281बी के तहत अस्थायी तौर पर आरआरपीआर की कंपनी में पूरी हिस्सेदारी कुर्क की जा रही है. यह हिस्सेदारी 1.88 करोड़ इक्विटी शेयरों की बैठती है.

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एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय के घर पर इनकम टैक्स छापा

एक बड़ी खबर एनडीटीवी ग्रुप से आ रही है. चैनल के मालिक प्रणय राय के ठिकानों पर इनकम टैक्स का छापा पड़ा है. सीबीआई ने इस बात की पुष्टि की है. इस बाबत समाचार एजेंसी एएनआई ने जो ट्विटर पर न्यूज फ्लैश जारी किया है उसमें कहा गया है कि प्रणय राय के दिल्ली स्थित घर पर इनकम टैक्स विभाग ने रेड किया है और इसकी पुष्टि केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने की है.

ज्ञात हो कि मोदी सरकार के निशाने पर एनडीटीवी मीडिया समूह शुरू से है. 2जी स्कैम के पैसे को चिदंबरम के साथ मिलकर ब्लैक से ह्वाइट करने के मामले में प्रणय राय इनकम टैक्स की जांच में आरोपी हैं. मनमोहन सरकार के कार्यकाल में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने अपनी जांच रिपोर्ट में इस स्कैम और इसमें चिदंबरम और प्रणय राय की मिलीभगत को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया था जिसके बाद इस आईआरएस अधिकारी को तरह तरह से प्रताड़ित किया गया.


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मोदी सरकार बनने के बाद जांच आगे बढ़ी और कई नोटिस एनडीटीवी और अन्य को भेजे गए. अब इनकम टैक्स ने छापा डालकर इस मामले के कई पहलुओं की पड़ताल शुरू की है. यह भी कहा जाता है कि एनडीटीवी समूह मोदी सरकार को रास नहीं आता इस कारण भी इस ग्रुप के खिलाफ जांच को तेज किया गया है वहीं दूसरे मीडिया समूह जैसे जी ग्रुप और पंजाब केसरी आदि मोदी राज में सरकार की गुणगान में लगे हैं या फिर भाजपा से इनके मालिकान जुड़े हैं, इसलिए इन्हें हर तरह से खुली छूट दी गई है.

ताजा छापों के मामले में बताया जा रहा है कि यह प्रकरण बैंक लोन न चुकाने का है. आईसीआईसीआई बैंक का करोड़ों रुपये हड़पने के मामले को लेकर सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय, राधिका राय, एक प्राइवेट कंपनी और अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है. दिल्ली, देहरादून समेत कई शहरों में एनडीटीवी और प्रणय राय के ठिकानों पर सीबीआई व इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी जारी है.

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पत्रकारिता का अर्नबीकरण!

Sanjaya Kumar Singh : अर्नब गोस्वामी को मैं नहीं देखता। भाजपा से उसके संबंध जानने और उसके झुकावों को देखने के बाद अर्नब को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता है। ऐसे में कल नए चैनल के उद्घाटन को लेकर भी दिलचस्पी नहीं रही। लालू यादव से संबंधित ऑडियो के प्रसारण और उसमें गैंगस्टर शहाबुद्दीन का लालू यादव से कहना, “खत्तम है आपका एसपी” – ऐसा कोई मतलब नहीं देता है जो बताया और बनाया जा रहा है। एक साल पुराने इस मामले को जिस तरह पेश किया गया है वह भाजपा समर्थन और लालू-नीतिश विरोध ज्यादा पत्रकारिता या रिपोर्टिंग कम है। ठीक है, अंग्रेजी का यह चैनल बिहार के मतदाताओं पर क्या प्रभाव छोड़ पाएगा। फिर भी…

इस रिपोर्ट में नीतिश की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आने की संभावना के मद्देनजर उनपर टीका टिप्पणी ज्यादा है, उन्हें जवाब देना होगा, नहीं देंगे तो आप (भाजपा वाले) क्या करेंगे जैसे सवाल आदि का वीडियो देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सब कुछ भाजपा की राजनीति का हिस्सा है। भाजपा कहती तो यह है कि कांग्रेस के लोग बेईमान हैं, पैसे कमाए हैं पर चैनल उसके समर्थकों के ज्यादा है। नया चैनल भी उसी के समर्थक का आया। तब, जब भ्रष्टाचार से कमाई बंद है और तमाम चैनलों की माली हालत खराब है। किसी कांग्रेसी का चैनल आया हो तो मुझे पता नहीं है। लेकिन होगा भी तो छोटा-मोटा। पर वह अलग मुद्दा है।

फिलहाल तो मुद्दा है यह है कि भाजपा की राजनीति का जवाब दूसरी पार्टी के लोग उसी की भाषा में क्यों नहीं दे रहे हैं। ये लव लेटर लिखने वाले लव लेटर ही लिखेंगे? पूछेंगे नहीं कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है। पांच साल के लिए फर्जी सर्टिफिकेट पर सांसद चुनी गई ज्योति धुर्वे का मामला अदालत में तय हो यह अगर ठीक भी हो तो पिछली बार पांच साल में रिपोर्ट ही नहीं आने पर कार्रवाई कौन करेगा? देश की राजनीति में सिर्फ भाजपा ही सक्रिय लग रही है बाकी सब भाजपा की चालों को झेल रहे हैं, जवाब देना या दे पाना तो बहुत दूर।

सबका “काला धन” खत्म हो गया और लगता है सिर्फ भाजपा के पास सफेद धन था, है और बचा हुआ है। पत्रकारिता पर एक कार्यक्रम में कल एक मित्र ने “टीवी का अर्नबीकरण” कहा। मैं कहता हूं अर्नब से पत्रकारिता सीखिए। नए स्टार्टअप में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिलेगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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मीडिया को लेकर आशावादी रहे पत्रकार एनके सिंह की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव व वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह को मैंने पहली और आखिरी बार भड़ास फॉर मीडिया के आठवें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित एक समारोह में सुना था। भड़ास आमतौर पर मीडिया से निराश और मेरे जैसे हताश लोगों का मंच है। मैंने बहुत पहले मान लिया था कि भारत में मीडिया का कुछ हो नहीं सकता है। उसके बाद भड़ास4मीडिया की स्थापना हुई और उसकी सफलता के आठवें वर्ष एनके सिंह ने सगर्व कहा था कि भड़ास नकारात्मक है, निराशा परोसता है आदि।

उस मौके पर भी श्री सिंह ने मीडिया से जबरदस्त उम्मीद दिखाई थी जो निश्चित रूप से आशावाद का चरम था। उसके बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मीडिया से कुछ उम्मीद की जाए और मुझे ऐसा भी नहीं लगा कि मीडिया ने अपने लिए कोई और बड़ा या गंदा गड्डा खोद लिया है। भाजपा का उदय और विस्तार निश्चत रूप से एक ऐसा मुद्दा है जो मीडिया में सिरे से गायब है पर मीडिया अगर दंतहीन, विषहीन हो गया या बना दिया गया है तो वह भाजपा के लिए ही। पर वह अलग मुद्दा है।

मुझे तो गुजरे करीब साल में ऐसा कुछ खास फर्क नजर नहीं आया कि उसके बारे में राय बदली जाए (जिसकी पहले खराब नहीं थी उसकी बात कर रहा हूं)। हां, एनके सिंह को फिर कहीं सुनने का मौका नहीं लगा। आज यूं ही अखबार पलटते हुए एनके सिंह का लिखा एक लेख दिखा- ‘आज के जमाने में हिन्दी अखबारों का एडिट पेज कौन पढ़े औऱ किस लिए पढ़े’।

फिर भी एनके सिंह की तस्वीर देखकर और पुराने संदर्भ के मद्देनजर पढ़ना पड़ा। अब अगर एनके सिंह को मीडिया की हालत खराब लग रही है तो मैं मान लेता हूं कि मैं इस मामले में उनसे योग्य चाहे ना हूं, 10-12 साल आगे जरूर चल रहा हूं। मीडिया की हालत पर एक जानकार, अनुभवी और काफी समय तक आशावादी रहे एनके सिंह की निश्चित रूप से महत्वपूर्ण टिप्पणी है। आप भी पढ़िए। नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए…

http://epaper.navodayatimes.in/c/18283157

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जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से हिन्दी पत्रकारिता को अच्छे कार्यकर्ता मिले। उनमें से ज्यादातर अब बूढ़े, रिटायर और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इस बीच, नौकरी का हाल भी सबको पता चल गया है। छह लाख की फीस और 10 हजार की सैलरी। संयोग से छह लाख के एजुकेशन लोन की ईएमआई भी इतनी ही बनती है। ऐसे में शिक्षित पत्रकार कितने होंगे ये तो भविष्य बताएगा। राष्ट्रवादी सरकार कुछ मजबूर पत्रकार जरूर बनाएगी। कार्यकर्ताओं की यह नई खेप शौक से या मजबूरी में पत्रकारिता ही करेगी। हिन्दी मीडिया को 25 साल और वेतन भत्तों की चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मंदिर बने ना बने। हिन्दी पत्रकारिता ऐसे ही चलती रहेगी।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार और उद्यमी संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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पीएम मोदी के घर पर एसपीजी की महिलाएं रात में ड्यूटी क्यों नहीं करना चाहतीं?

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री के घर और निजता से संबंधित ये कैसी खबर? इस बार के “शुक्रवार” (24 फरवरी – 02 मार्च 2017) मैग्जीन में एक गंभीर खबर है। पहले पेज पर प्रमुखता से प्रकाशित इस खबर का शीर्षक है, “फिर विवादों में घिरी एसपीजी” लेकिन यह प्रधानमंत्री निवास से संबंधित विवाद खड़ा कर रही है। खबर के मुताबिक एसपीजी की महिला सुरक्षा कर्मियों ने अपने आला अफसरों से गुहार लगाई है कि उन्हें रात की ड्यूटी पर न रखा जाए।

यहां यह गौरतलब है कि प्रधानमंत्री के घर में परिवार की कोई महिला सदस्य नहीं रहती है। आम जानकारी यही है कि प्रधानमंत्री अपने घर पर अकेले रहते हैं। ऐसे में भारतीय संस्कारों के लिहाज से महिला सुरक्षा कर्मियों की रात की ड्यूटी लगनी ही नहीं चाहिए। उन्हें अधिकारियों से गुहार लगाने की आवश्यकता ही क्यों पड़े? यही नहीं, खबर में आगे कहा गया है, “माना जा रहा है कि वे किसी विवाद का साक्षी बनना नहीं चाहती हैं।” यह और गंभीर है।

खबर में (टाइपिंग की कुछ गड़बड़ी है) कहा गया है कि एसपीजी के तत्कालीन निदेशक दुर्गा प्रसाद को हटा दिया गया था। हटाने की कोई वजह नहीं बताई गई थी। हालांकि जिस तरह से यह कार्रवाई की गई थी उसमें तमाम अटकलों को बल मिला था। इनमें एक अटकल यह भी थी कि दुर्गा प्रसाद चाहते थे कि प्रधानमंत्री से जो भी मिलने आए उसे कैमरों के सामने से गुजरना पड़े और उसका पूरा रिकार्ड रखा जाए। इसमें कोई बुराई नहीं है और यह जरूरी भी लगता है। पर उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी (और पद से हटा दिया गया)। खबर में यह नहीं लिखा है कि दुर्गाप्रसाद के बाद कौन निदेशक हैं और अब क्या होता है। ना ही अभी के निदेशक से कोई बातचीत की गई है।

खबर में आगे लिखा है, अब यह अफवाह जोर पकड़ रही है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि उनके निवास में लगे कैमरे कमरों के अंदर नजर रखें। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं तो शयन कक्षों में कैमरे नहीं होने चाहिए और दरवाजे तक को कैमरे की नजर में लाकर अंदर छोड़ा जा सकता है और इस पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। पर विवाद हैं औऱ महिलाएं रात में ड्यूटी करना नहीं चाहती हैं – सबको जोड़ कर देखिए तो एक बड़ी खबर बनती है। अगर अधिकृत खबर नहीं छपी तो तरह-तरह की अफवाहें उड़ती रह सकती हैं और प्रधानमंत्री के घर के बारे में ऐसी खबरें, जैसे अंदर जाने वालों के लिए कैमरा नहीं है – सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Pratima Rakesh दाल में काला है या पूरी दाल काली है ?स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप कहीं साहब के पास आने वाले लोगों की सूचना लीक ना कर दे इसलिये ये मनाही हो रही है!

Surendra Grover इस खबर को पढ़ कर लग रहा है कि दाल में कुछ काला ज़रूर है जिसकी साक्षी वे महिला सुरक्षा कर्मी नहीं बनना चाहती..

Sanjaya Kumar Singh है कोई जो कर सके इस खबर का फॉलो अप? कांग्रेसी इस स्तर तक नहीं गिरते।

Pankaj Pathak लगता है ‘साहेब’ खुद घर में रेनकोट पहने घूमते हैं, नहाने का तो पता नहीं।

Sunil Kumar Singh गुजरात में मुख्यमंत्री रहने के दौरान मोदी के आवास पर एक महिला आती थी जिससे वो अकेले में मिलते थे । ऐसा एक आईपीएस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है इस मुद्दे पर दिल्ली विधानसभा में चर्चा भी हो चुकी है जो ऑन दी रिकॉर्ड है ।

आलोक पाण्डेय कांग्रेसी अफवाह उड़ाने में माहिर है

Sanjaya Kumar Singh हां भाई। कैमरा ही नहीं रहेगा तो सबूत कहां से आए। वो तो एनडी तिवारी जैसे लोग लगवाते हैं और खुद वीडियो बांटते हैं।


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भाजपा के पक्ष में प्रायोजित तरीके से लिखने वाले प्रदीप सिंह कोई अकेले पत्रकार नहीं हैं

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

Sanjaya Kumar Singh : चुनाव जीतने की भाजपाई चालें, मीडिया और मीडिया वाले… उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। भक्त, सेवक, कार्यकर्ता, प्रचारक सब अपनी सेवा भक्ति-भाव से मुहैया करा रहे हैं। इसमें ना कुछ बुरा है ना गलत। बस मीडिया और मीडिया वालों की भूमिका देखने लायक है। नए और मीडिया को बाहर से देखने वालों को शायद स्थिति की गंभीरता समझ न आए पर जिस ढंग से पत्रकारों का स्वयंसेवक दल भाजपा के पक्ष में लगा हुआ है वह देश के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा एक सांप्रादियक पार्टी है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन मजबूरी में ही करती है।

नरेन्द्र मोदी को जिन स्थितियों में जिस तरह प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया और उसके बाद जीतने पर उन्होंने जो सब किया, जो कार्यशैली रही वह काफी हद तक तानाशाह वाली है। इसे उनकी घोषित-अघोषित, दिखने वाली और न दिखने वाली अच्छाइयों के बदले तूल न दिया जाए यह तो समझ में आता है। पर अपेक्षित लाभ न होने पर भी नरेन्द्र मोदी और आज की भाजपा का समर्थन भारत जो इंडिया बन रहा था उसे हिन्दुस्तान बनाने का समर्थन करना है। मीडिया का काम आम लोगों को इस बारे में बताना और इंडिया से हिन्दुस्तान बनने के नफा-नुकसान पर चर्चा करना है पर मीडिया के एक बड़े हिस्से ने तय कर लिया हो उग्र हिन्दुत्व ही देशहित है।

मीडिया पैसे के लिए और दबाव में ऐसा करे – तो बात समझ में आती है। उसे रोकने के लिए भी दबाव बनाया जा सकता है। पाठकों को बताया जा सकता है और उम्मीद की जा सकती है कि जनता चीजों को समझेगी तो मीडिया से ऐसे प्रभावित नहीं होगी जैसे आमतौर पर हो सकती है। लेकिन स्थिति उससे विकट है। मीडिया के लोग खुलकर भाजपा का समर्थन कर रहे हैं। कुतर्क कर रहे हैं और स्वीकार कर रहे हैं वे तथाकथित राष्ट्रवादी, देशभक्ति वाली और हिन्दुत्व की पत्रकारिता कर रहे हैं। जो पुराने लोग संघ समर्थक पत्रकार माने जाते हैं उन्हें भी अब घोषित रूप से समर्थन करने में हिचक नहीं है।

इसी क्रम में आज वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह ने आज जागरण में प्रकाशित अपने लेख, “उत्तर प्रदेश की चुनावी हवा” का लिंक फेसबुक पर साझा किया है। पूरा लेख क्या होगा इसका अंदाजा है इसलिए पढ़ा नहीं और जो अंश हाइलाइट किया गया है उसे पढ़ने के बाद समझ में आ जाता है कि लेखक कहना क्या चाहता है। संबंधित अंश है, “यदि भाजपा मोदी के प्रचि वंचित तबकों के आदर भाव को वोट में बदल लेती है तो चुनाव जातीय समीकरणों से परे जा सकता है।” प्रदीप सिंह फेसबुक पर सक्रिय नहीं है। इस लेख से पहले उनका जो लेख उनकी वाल पर दिख रहा है वह 2 दिसंबर का है। आज 23 फरवरी को एक लेख का लिंक देने भर से यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि वे भाजपा का प्रचार कर रहे हैं। पर दो दिंसबर की उनकी पोस्ट है, “राज्यसभा में हंगामा और नारेबाजी कर रहे सदस्यों से सभापति हामिद अंसारी ने पूछा ये नारे सड़कों पर क्यों नहीं लग रहे? सवाल तो बड़ा वाजिब है। पर अभी तक कोई जवाब आया नहीं है।” इसे 17 लोगों ने शेयर किया है।

दो दिसंबर को ही उनकी एक और पोस्ट है जो एक दिसंबर को जागरण में ही प्रकाशित उनके लेख का लिंक है या उसे साझा किया गया है। इससे पहले उनकी पोस्ट 6 अक्तूबर की है। यह भी जागरण में प्रकाशित उनके लेख का लिंक है। लेख का शीर्षक है, “कुतर्कों के नए देवता” और यह सर्जिकल स्ट्राइक पर है। इसकी शुरुआत इस तरह होती है, “कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। फिल्म अमर प्रेम का यह गाना भारतीय नेताओं पर सटीक बैठता है। नेता किसी घटना, बयान या भाषण पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह सोचता है कि जो हुआ है उसका फायदा किसे होगा। फायदा अपने विरोधी को होता दिखे तो वह विरोध में किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। इस मामले में अमूमन फौज को अपवाद माना जाता था, लेकिन अब नहीं। यह नरेंद्र मोदी का सत्ता काल है।” इस पोस्ट में लिखा है, “मित्रों लम्बे अंतराल के बाद आपसे मुखातिब हो रहा हूं। दैनिक जागरण के आज के संस्करण में सम्पादकीय पेज पर छपा मेरा लेख आपकी सेवा में पेश है।”

इससे पहले की पोस्ट सात जुलाई की है जो उन्होंने किसी और का लिखा साझा किया है और अंग्रेजी में है। यह पोस्ट राजनीतिक नहीं है। प्रदीप सिंह का रुझान भाजपा की तरफ है, यह कोई नई बात नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि वे इनदिनों अपने सामान्य कार्य से अलग जागरण में लिख रहे हैं उसे फेसबुक पर साझा कर रहे हैं और जागरण उनके नाम के साथ उनकी ई-मेल आईडी नहीं, response@jagran.com छाप रहा है। क्या यह पेड न्यूज या प्रायोजित लेख है? कहने की जरूरत नहीं है कि Pradeep Singh अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक कार्यरत रहे और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से यह मीडिया विश्लेषण लिया गया है. संजय से संपर्क anuvaad@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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जब ‘भक्त’ अखबार बनाते हैं…

Sanjay Kumar Singh :  नोटबंदी का मामला पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में था। इसके अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस और नवोदय टाइम्स का पहला पेज देखिए। इंडियन एक्सप्रेस की खबर की शीर्षक है, “क्या नकदी नीति जल्दबादी में अपनाई गई, क्या दिमाग लगाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा”। यह खबर एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है और फोल्ड से ऊपर है। यही खबर नवोदय टाइम्स ने फोल्ड के नीचे छापी है और शीर्षक लगाया है, “सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी पर पूछा, कब सामान्य होंगी स्थितियां”, दूसरी लाइन में, “हालात 10-15 दिन में ठीक हो जाएंगे : सरकार”।

कहने की जरूरत नहीं है कि दोनों अखबारों ने एक ही खबर को जो ट्रीटमेंट दिया है उसी से खबर की धार कम हो जाती है। यह सामान्य है होता रहता है। पर खबर से आप नुकसान पहुंचाएं तो उसकी भरपाई भी कर दें। एक खबर मजबूरी में छापनी पड़ी (इतने बेशर्म नहीं हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ऐसी खबर खा जाएं या अंदर छाप दें) तो उसकी भरपाई करने वाली खबर वहीं छाप दें। नवोदय टाइम्स ने आज यह शर्मनाक काम किया है। इसी अखबार में पहले पेज की आज की बॉटम लीड है, “नोटबंदी : पीएम के दिल्ली ऑफिस में बैठकर काम करती थी रिसर्चर्स की टीम”। दूसरी लाइन है, “मोदी ने 6 विश्वस्तों के साथ की गोपनीय तैयारी !” अब आप बताइए, इस दूसरी खबर का कोई मतलब है? तैयारी की पूरी पोल खुल गई, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि दिमाग नहीं लगाया गया तो शीर्षक कुछ और लगाना तथा दूसरी खबर छापकर कहना कि दिमाग लगाया था। पाठकों को मूर्ख समझना है। आज से नवोदय टाइम्स पढ़ना बंद।

पुनःश्च – एक मित्र ने कमेंट में लिखा है कि नवोदय टाइम्स वाली खबर हिन्दुस्तान में भी है। पत्रकारिता की भाषा में इसे प्लांटेशन कहा जाता है। छपने के बाद तो शर्मनाक हो ही जाता है इसलिए छापने से पहले समझना होता है कि हमारा उपयोग तो नहीं किया जा रहा है। सरकार (या किसी परम भक्त) ने सुप्रीम कोर्ट में खिंचाई वाली खबर की भरपाई जारी की और अखबार ने नतमस्तक होकर सेवा मुहैया करा दी। विडंबना यह है कि इसपर सरकार सर्विस टैक्स नहीं लेती।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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रेल में हवाई यात्रा के सुख बनाम भारतीय रेल

कल 08792 निजामुद्दीन-दुर्ग एसी सुपरफास्ट स्पेशल से वास्ता पड़ा। निजामुद्दीन से चलने का ट्रेन का निश्चित समय सवेरे 830 बजे है सुबह सात बजे नेशनल ट्रेन एनक्वायरी सिस्टम पर चेक किया तो पता चला ट्रेन राइट टाइम जाएगी। यहीं से चलती है इसलिए कोई बड़ी बात नहीं थी। स्टेशन पहुंचा तो बताया गया प्लैटफॉर्म नंबर चार से जाएगी। प्लैटफॉर्म पर पहुंच गया तो घोषणा हुई (संयोग से सुनाई पड़ गया वरना देश भर में कई स्टैशनों के कई प्लैटफॉर्म पर घोषणा सुनाई नहीं पड़ती है और हम कुछ कर नहीं सकते) कि ट्रेन एक घंटे लेट है। परेशान होने के सिवा कुछ कर नहीं सकता था।

ट्रेन नए निर्धारित समय से खुली और कोई 23 मिनट मेकअप करती हुई 37 मिनट लेट ग्वालियर से रवाना हुई। फिर भारतीय रेल के रूप में आ गई और लेट होते हुए सुबह एक घंटा 40 मिनट देर से दुर्ग पहुंच गई। वैसे तो भारतीय रेल अपनी बीमारियों से 67 साल जूझती रही है और किसी को कोई उम्मीद पहले भी नहीं थी पर नरेन्द्र मोदी सरकार बनने के बाद चार्टर्ड अकाउंटैंट रेल मंत्री ने यात्रियों की जेब काटने के ढेरों बंदोबस्त किए हैं और उसमें एसी सुपरफास्ट स्पेशल जैसी ट्रेन चलाई है जिसमें एक दिन पहले भी बगैर किसी तत्काल, वीआईपी या फ्लेक्सी फेयर के नीचे के दो बर्थ आमने-सामने मिल जाते हैं। और लगभग खाली ट्रेन बुजुर्ग यात्रियों को बगैर वरिष्ठ नागरिकों वाली छूट के देर से ही सही, आराम से गंतव्य तक पहुंचा देती है।

इस तरह बुजुर्गों के पास बच्चों का कमाया पैसा है तो उन्हें आराम भी मिल ही रहा है। पर रेलयात्रा को किराये से लेकर अन्य तरह से भी हवाई यात्रा बनाने की कोशिशों को पूरा होने में अभी बहुत देर है और उसमें सबसे बड़ी बाधा है ट्रेन का लेट चलना। बाकी स्टेशन पर लिफ्ट, एसक्लेटर न होना, बैठने के लिए बेंच से लेकर पंखों तक का अकाल और कुलियों की लूट-मनमानी के तो कहने ही क्या हैं। लेकिन वो सब कोई मुद्दा नहीं है। जनता के पैसे से चलने वाली ट्रेन का उद्देश्य जनता को लूट कर मुनाफा कमाना हो गया है यह समझने की भी जरूरत नहीं है।

अब रेल यात्रा को हवाई यात्रा बनाने की बात चली ही है तो यह भी बता दूं कि कल निजामुद्दीन स्टेशन पर शताब्दी जैसी एक ट्रेन आकर लगी तो माथा ठनका। निजामुद्दीन से कौन सी शताब्दी? याद आया, थोड़ी देर पहले विमान परिचारिका जैसी यूनिफॉर्म में कुछ सुंदर स्मार्ट लड़कियां खड़ी थीं, अब नजर नहीं आ रही हैं। ट्रेन से ये विमान परिचारिकाएं कहां जा रही हैं? दिमाग चला और समझ में आ गया कि ये गतिमान एक्सप्रेस है और परिचारिकाएं विमान की नहीं, गतिमान एक्सप्रेस की थीं। इस पर याद आया कि जब गतिमान एक्सप्रेस चलने की घोषणा हुई थी तो भक्तों ने उसका कितना शानदार प्रचार किया था।

विदेशी ट्रेन से लेकर बड़े-बड़े विमानों के अंदर के दृश्यों की फोटो चिपकाकर उन्हें गतिमान एक्सप्रेस बताया था। कुछ अखबारों और मीडिया चैनलों के वेब पन्नों ने भी यह करामात “चित्र : सिर्फ समझने के लिए” जैसे जुमलों के साथ किया था। बाद में हुई निराशा का अंदाजा इस बात से लगता है कि ट्रेन चलनी शुरू हुई तो किसी भक्त यात्री ने उस पर कुछ नहीं लिखा। दरअसल भक्त सिर्फ तारीफ करते हैं. निन्दा नहीं। निन्दा की अपेक्षा वे हमसे करते हैं पर सरकार की नहीं, विरोधी दलों की।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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