बीएचयू पीएचडी एंट्रेंस की टॉपर बनी आदिवासी लड़की

Tauseef Goyaa : देश में वैसे तो दलितों और आदिवासियों की स्थिति सामान्य नहीं है। जेएनयू जैसे संस्थान में अभी तक दूर दराज और वंचित तबके से आने वाले छात्रों के लिए डिप्राइवेशन प्वाइंट मिलते थे। लेकिन अब बंद कर दिए गए हैं। ऐसे में वंचित तबके से आने वाले छात्रों को शिक्षा के द्वार बंद करने की कोशिश की जा रही है। जो व्यक्ति अपने पेट की आग को ठंडा करने के लिए सारा दिन काम करता है और तब भी बमुश्किल ही सारे परिवार के लिए खाना जुटा पाता है उससे यह उम्मीद करना करना की वह पैसे के बल पर अपने बच्चे को स्कूल भेजेगा बेमानी ही है। इन सबके बीच जब कोई आदिवासी छात्र बीएचयू जैसे संस्थान से पीएचडी की प्रवेश परीक्षा निकालता है तो यह बड़ी बात होती है।

और जब यह छात्र कोई आदिवासी लड़की हो और उस पर वह परीक्षा टॉप कर जाए तो जाहिर है वह सारे सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए और जातिवादी दंश को झेलते हुए आगे आई है। ऐसा ही कुछ किया है बीएचयू की हिंदी विभाग की प्रवेश परीक्षा टॉप करने वाली मेधावी आदिवासी छात्रा पार्वती टिर्के ने। पार्वती टिर्के ने जन्म से ही पढ़ाई का माहौल पाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों को पीछे छोड़कर यह कारनामा किया है। उन्होंने सामान्य संवर्ग में टॉप किया है।

इससे पहले पार्वती ने बीएचयू से ही हिंदी ऑनर्स में ग्रेजुएशन और हिंदी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। वह झारखंड की रहने वाली हैं और उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय मसारिया, गुमला से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की है। Ph.D प्रवेश परीक्षा टॉप करने के बाद वह सोशल मीडिया में चर्चित हो गई हैं।

सरोज कुमार लिखते हैं— एक आदिवासी लड़की ने टॉप किया है, वह भी BHU के हिंदी विभाग जैसे घनघोर जातिवादी और दाखिले में बहुत ही ज्यादा भेदभाव करने वाले विभाग के Ph.D के दाखिले में। कब तक रोकोगे ब्राहम्णवादियों, अब नहीं रोक सकोगे!

दिनेश पाल लिखते हैं—आख़िरकार हिंदी विभाग BHU के Ph.D प्रवेश परीक्षा का परिणाम तमाम मुठभेड़, उलझन और जद्दोजहद के बाद आज आ ही गया। सबसे ज्यादा प्रसन्नता मुझे इस बात की है कि पहले स्थान पर झारखंड की एक मेधावी छात्रा(ST) को जगह मिली है।

युवा पत्रकार तौसीफ़ गोया की एफबी वॉल से.

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