कभी-कभी पत्रकारिता की डिग्री में आग लगाकर इसे जलते देखने की तमन्ना होती है

अपने हाथों मीडिया लिख रहा अपना मृत्युलेख….. देश के प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाने वाला पत्रकारिता आज खुद की साख पर सवाल खड़ा कर बैठा है. प्रलोभन और टीआरपी की भागदौड़ ने पत्रकारिता का उद्देश्य निरर्थक कर दिया है. आज पत्रकारिता का हाल कुछ यूँ हो गया है कि लोगों ने प्रजातंत्र के चौथा स्तंभ से कन्नी काटना शुरू कर दिया.

कल तक जिस पेशे पर लोग आँख मूँद कर भरोसा कर लिया करते थे, उसे ही आज बीच भरे चौराहे में गाली बक़ी जाती है. गाली देना भी कुछ हद तक लाजमी है, क्योंकि जिस मीडिया ने सरोकार, सच्चाई दिखाने का ठेका ले रखा था, आज उसी ने टीआरपी और प्रलोभन के झांसे में पड़कर अपने महत्व को निरर्थक कर दिया है. मैं अपनी बात करूँ तो मैंने भी पूरी शिद्दत से इस पेशे को अपनाया था, लेकिन पत्रकारिता की स्थिति देख अब यूँ लगता है मानो पत्रकारिता की डिग्री फाड़कर मैं दूर खड़े होकर इसे जलते देखूं.

प्रलोभन टीआरपी ही बस नहीं बल्कि कुछ और भी आपराधिक तत्व हैं जिसने मीडिया को अपने पैरों की जूती बनाकर छोड़ दिया है। आज आलम कुछ यूँ है कि मीडिया संस्थान आज गुंडों और सत्ताधारियों के चमचे बन गए हैं. चारों तरफ झूठ के पुलिंदे बनाये जा रहे हैं. असलियत की खबर को मसाला बनाकर लोगों के बीच परोसा जाता है. अक्सर सुनता हूँ कि परिवारवाद की परिभाषा का जीता जागता सबूत भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और कांग्रेस पार्टी है, लेकिन सच्चाई इतनी ही नहीं है.

परिवारवाद देखना हो तो मीडिया में भी बड़े ही आसानी से देखा जा सकता है. लेकिन मीडिया में परिवारवाद की परिभाषा रिफरेन्स के रूप में दिखाई देता है. किस मीडिया संस्थान में नौकरी के अवसर हैं इस बात का पता लग पाना भी पूरी तरह असंभव है. इसकी वजह है कि आपका मीडिया संस्थान में उपयुक्त रिफरेन्स होना जरूरी है. अगर आपका कोई रिफरेन्स है तो आपको चुटकी बजाते ही नौकरी की जानकारी और नौकरी दोनों ही समय समय पर मिलती रहेगी.

लेखक सचिन मिश्रा युवा पत्रकार हैं. हरिभूमि अखबार और न्यूज वल्ड इंडिया चैनल में काम कर चुके हैं.

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रिसर्च में करियर बनाने का अवसर, एम.एससी. (मीडिया रिसर्च) में पांच जून तक प्रवेश जारी

भोपाल| माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवम संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा चलाये जा रहे एम.एससी. (मीडिया रिसर्च) कोर्स में प्रवेश जारी है| जो विद्यार्थी मीडिया, संचार, विज्ञापन, मार्केट और मार्केटिंग रिसर्च में करियर बनाना चाहते है, वे 5 जून, 2017 तक विश्वविद्यालय की वेबसाइट www.mcu.ac.in या एमपीऑनलाइन के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं|

प्रवेश परीक्षा के माध्यम से ही प्रवेश होंगें| दो-वर्षीय पाठ्यक्रम एम.एससी. (मीडिया रिसर्च) विद्यार्थी को रिसर्च के साथ मीडिया के विभिन्न आयामों, संवाद कौशल, संचार की तकनीक से अवगत करता हैं| वे मीडिया की आधारभूत पढ़ाई और रिसर्च के बारे में गहनता से प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं और प्रायोगिक कार्य भी करते हैं ताकि वे समाचार पत्र, टेलीविज़न चैनल्स, एड एजेंसीज, पीआर एजेंसीज, कॉर्पोरेट हाउसेस, सर्वे और ओपिनियन रिसर्च एजेंसीज, फाइनेंसियल रिसर्च एजेंसीज, मार्केट एवम मार्केटिंग, उपभोक्ता, उत्पाद रिसर्च एजेंसीज में एक रिसर्च प्रोफेशनल के रूप में कार्य कर सके| किसी भी विषय में स्नातक विद्यार्थी इसमें प्रवेश ले सकते हैं| पाठ्यक्रम यूजीसी से मान्यता प्राप्त हैं एवं विश्वविद्यालय के भोपाल और नोएडा परिसर में संचालित हो रहा है|

Admissions continuing in MCU in M.Sc. (media research)

Students aspiring career in media and communication research can apply till June 5

Bhopal. Admissions for the session 2017-18 are going on in M.Sc. (media research) in Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication (MCNUJC). The university is alone in the country to run this fully media and research-centric course. Students aspiring career in media and communication research, ad agencies, market and marketing research, can take admissions by June 5, 2017 with submission of online application through mponline portal or logging in on university’s website www.mcu.ac.in. Admissions will be given in the course on the basis of merit list of entrance test slated to be held on June 11, 2017. This two-year post graduation course comprises studies of different media, communication skills and present communication technologies, along with deeper study of research. The students are imparted theoretical as well as practical training in conducting research so that they can be employable for print, television channels, ad and PR agencies, corporate houses, survey and opinion research agencies, marketing and marketing research, financial research companies, consumer and product research agencies as a research professional. Students graduated in any discipline or appearing in the final semester examination can opt the course.

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हिंदी विवि वर्धा में यौन दुर्व्यवहार के आरोपी के साथ मजबूती से खड़ा है प्रशासन, पीड़िता धरने पर बैठी

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा में विगत एक माह पूर्व 13 मार्च होली के दौरान पीएचडी शोधार्थी संजीव कुमार झा के द्वारा एम. फिल. की शोधार्थी गीता (काल्पनिक नाम) के साथ सार्वजनिक स्थल पर यौन-दुर्वय्वहार किया गया. पीड़िता पिछले एक महीने से न्याय के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के पास शिकायत लेकर जाती रही है. इसकी शिकायत उसने महिला प्रकोष्ठ में भी की, लेकिन आरोपी पर कोई कार्यवाही नहीं की गई.

पीड़िता को प्रशासनिक अधिकारियों ने यह कह कर इधर-उधर दौड़ाया कि यह केस मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है. तरह-तरह से पीडिता को परेशान करने की कोशिश की गई और उस पर यह दबाव भी बनाया गया कि वह अपनी शिकायत को वापस ले ले. वहीँ दूसरी ओर आरोपी द्वारा भी पीड़िता को धमकाया गया लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसका कोई संज्ञान नहीं लिया. आरोपी अपने साथियों के साथ 17 अप्रैल को प्रशासनिक भवन पर भारी संख्या में पहुंचा और सम्बंधित अधिकारियों से मिल कर जाँच को प्रभावित करने की कोशिश की. आरोपी की इन सब गतिविधियों से परेशान होकर पीडिता ने धरने पर बैठने का निर्णय लिया.

पीडिता 09 बजे रात महिला छात्रावास के सामने धरने पर बैठी और उसका साथ देने के लिए भारी संख्या में विद्यार्थी उसके साथ आए. पीडिता से बात करने के लिए चीफ प्रॉक्टर गोपाल कृष्ण ठाकुर, कुलसचिव कादर नवाज खान, उप-कुलानुशासक चित्रा माली और महिला छात्रावास की वार्डन अवंतिका शुक्ला आईं. पीडिता पक्ष से अभी बात ही हो रही थी कि आरोपी पक्ष भी लगभग 50 छात्रों के साथ महिला छात्रावास आ पहुंचा. यह एक तरह से शक्ति प्रदर्शन के माध्यम से पीडिता को डरा कर धरना प्रदर्शन से उठाने की साजिश थी.

शर्म की बात यह है कि यह सब विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों के सामने हुआ. अधिकारियों ने संजीव झा और उनके साथियों को समझा बुझा कर वापस भेज दिया और पीडिता पर भी दबाव बनाया गया कि वह अपना धरना समाप्त करे और कल ऑफिस आकर बात करे. पीडिता ने यह कहते हुए उठने से मना कर दिया कि वह पिछले एक महीने से ऑफिस में बात कर-कर के परेशान हो चुकी है. अत: सभी अधिकारी वापस चले गए.

पूरी रात पीडिता और साथी, महिला छात्रावास के सामने धरने पर बैठे रहे. ध्यान देने की बात यह है कि आरोपी संजीव कुमार पर पहले भी कई आरोप लग चुके हैं और वह उनमे दोषी भी पाया गया है. लेकिन पहले के मामलों में उसे मामूली चेतावनी देकर छोड़ दिया गया. इस केस में भी आरोपी को प्रशासन द्वारा बचाने की कोशिश की जा रही है. यह इस बात से भी स्पष्ट हो रही है कि अभी तक प्रथम दृष्टया प्रशासन ने आरोपी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. इन सब को ध्यान में रखकर पीडिता ने मांग रखी है कि आरोपी संजीव कुमार को तत्काल हॉस्टल से एवं विश्वविद्यालय परिसर से निलंबित किया जाये जिससे कि वह पीडिता और गवाहों को प्रभावित न कर सके.

विदित हो कि प्रशासन की आरोपी के प्रति पक्षधरता इस बात से भी उजागर होती है कि जाँच-प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही आरोपी छात्र की पीएचडी थीसिस जमा करा ली गई जबकि जाँच-प्रक्रिया के दौरान आरोपी की अकादमिक गतिविधियों पर हर किस्म की रोक लगाने का नियम है. इसलिए पीडिता ने यह भी मांग रखी है कि जब तक मामले की जाँच पूरी न हो, तब तक आरोपी की अकादमिक गतिविधियों को भी निलंबित किया जाये. रात 09.00 बजे से अभी तक सभी छात्र छात्राए अभी तक महिला छात्रावास के बहार धरने पर बैठे रही और अब विश्वविद्यालय के प्रसशानिक भवन में सुबह से बैठे हैं पर उनकी सुनने की जगह कुलपति के द्वारा धमकाया जा रहा है कि तुम सभी के खिलाफ अब अनुशासनहीनता की कार्यवाही की जाएगी क्योंकि आप सभी ने नियमों को तोड़ प्रदर्शन किया तथा रात भर छात्रावास के बहार धरने पर बैठे.

देखना है कि इस सत्य और शील की लड़ाई में किसकी जीत होती है. पूरे देश की मीडिया से छात्र-छात्राओं ने अनुरोध किया है कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा की अंदरुनी हालात की खबर लें और सच सबके सामने लाएं ताकि न्याय की लड़ाई लड़ने वालों को मजबूती मिल सके.

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बीएचयू पीएचडी एंट्रेंस की टॉपर बनी आदिवासी लड़की

Tauseef Goyaa : देश में वैसे तो दलितों और आदिवासियों की स्थिति सामान्य नहीं है। जेएनयू जैसे संस्थान में अभी तक दूर दराज और वंचित तबके से आने वाले छात्रों के लिए डिप्राइवेशन प्वाइंट मिलते थे। लेकिन अब बंद कर दिए गए हैं। ऐसे में वंचित तबके से आने वाले छात्रों को शिक्षा के द्वार बंद करने की कोशिश की जा रही है। जो व्यक्ति अपने पेट की आग को ठंडा करने के लिए सारा दिन काम करता है और तब भी बमुश्किल ही सारे परिवार के लिए खाना जुटा पाता है उससे यह उम्मीद करना करना की वह पैसे के बल पर अपने बच्चे को स्कूल भेजेगा बेमानी ही है। इन सबके बीच जब कोई आदिवासी छात्र बीएचयू जैसे संस्थान से पीएचडी की प्रवेश परीक्षा निकालता है तो यह बड़ी बात होती है।

और जब यह छात्र कोई आदिवासी लड़की हो और उस पर वह परीक्षा टॉप कर जाए तो जाहिर है वह सारे सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए और जातिवादी दंश को झेलते हुए आगे आई है। ऐसा ही कुछ किया है बीएचयू की हिंदी विभाग की प्रवेश परीक्षा टॉप करने वाली मेधावी आदिवासी छात्रा पार्वती टिर्के ने। पार्वती टिर्के ने जन्म से ही पढ़ाई का माहौल पाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों को पीछे छोड़कर यह कारनामा किया है। उन्होंने सामान्य संवर्ग में टॉप किया है।

इससे पहले पार्वती ने बीएचयू से ही हिंदी ऑनर्स में ग्रेजुएशन और हिंदी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। वह झारखंड की रहने वाली हैं और उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय मसारिया, गुमला से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की है। Ph.D प्रवेश परीक्षा टॉप करने के बाद वह सोशल मीडिया में चर्चित हो गई हैं।

सरोज कुमार लिखते हैं— एक आदिवासी लड़की ने टॉप किया है, वह भी BHU के हिंदी विभाग जैसे घनघोर जातिवादी और दाखिले में बहुत ही ज्यादा भेदभाव करने वाले विभाग के Ph.D के दाखिले में। कब तक रोकोगे ब्राहम्णवादियों, अब नहीं रोक सकोगे!

दिनेश पाल लिखते हैं—आख़िरकार हिंदी विभाग BHU के Ph.D प्रवेश परीक्षा का परिणाम तमाम मुठभेड़, उलझन और जद्दोजहद के बाद आज आ ही गया। सबसे ज्यादा प्रसन्नता मुझे इस बात की है कि पहले स्थान पर झारखंड की एक मेधावी छात्रा(ST) को जगह मिली है।

युवा पत्रकार तौसीफ़ गोया की एफबी वॉल से.

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Loot in private schools

Hon’ble District Magistrate Madam,

With a lot of grief and pain I am writing to you that my two daughters are studying in Adharsheela Global School, Sector – 3, Vasundhara, Ghaziabad in class 6th & 7th respectively. The problem of school’s compulsion to buy BOOKS & STATIONERY” from school only, persists this year too.

Today my wife went to school to buy the text books for the new session from the book counter which is situated in school campus only as communicated by them on result’s day that if anybody who want only books they can come on 3rd April but today they refused to give books to her saying that we do not sell only books, you have to buy stationery also as it is COMPULSORY for every parent to buy books as well as stationery from school only.

School is not only forcing to buy books & stationery from the school but they are also charging for providing annual syllabus which is supposed to be provided FREE to every student. Moreover, the lady at reception also refused my wife to meet coordinator stating that nobody can meet coordinator in working days or working time.

THOUGH AFTER A LONG WAIT OF MORE THAN 2 HRS & DISCUSSION SCHOOL AUTHORITIES ALLOWED TO BUY BOOKS ONLY BUT ALSO THREATENED TO MY WIFE SAYING THAT IF YOU WILL NOT BUY STATIONERY FROM US, ANY OF THE NOTE BOOK WOULD NEITHER BE INSPECTED NOR SIGNED BY THE TEACHER.

Madam, it is my humble request with folded hands to please take action against the school management and save parent’s skin.

With best Regards

Ashish Goel
9310016364
ashish.goel73@gmail.com

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एमपी में पत्रकारिता के छात्र हत्यारे नाथूराम गोडसे को महापुरुष के रूप में पढ़ रहे

Pankaj Chaturvedi : मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार में पत्रकारिता के विद्यार्थियों को पढ़ाई जाने वाली एक किताब में महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को महापुरुष बता कर पढ़ाया जा रहा है । देश के भावी पत्रकारों को पढ़ाई जाने वाली किताबें भी देश की बदली हुई हवा के मुताबिक ढाल कर बनाई जाने लगी है। जिसका ताजा उदाहरण माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की पत्रकारिता पुस्तक में देखा जा सकता है।

इस मुद्दे को लेकर गुरुवार को मध्यप्रदेश विधानसभा में भारी हंगामा हुआ। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर सरकार को निशाना बनाया। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने सदन में यह भी बताया कि इस यूनिवर्सिटी के एक शोधछात्र ने अपने शोधपत्र में नाथूराम गोडसे को महापुरुष बताया है।

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, उन्होंने कहा कि इस किताब के लेखक मोनिका वर्मा और सुरेंद्र पाल हैं। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और सत्तापक्ष के सदस्यों के बीच जमकर नोक-झोंक भी हुयी.

वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

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कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के मुताबिक भीख से चलते हैं मीडिया संस्थान!

रायपुर : काठाडीह स्थित कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि एक बार फिर अपनी हरकतों से सुर्खियों में हैं। इस बार वजह बना है एक प्रश्नपत्र। MSC इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के थर्ड सेमेस्टर के क्वेश्चन् पेपर के सवाल नम्बर 5 में विवि ने पूछा है कि मीडिया संस्थान के लिए धन की व्यवस्था कैसे होती है? और जवाब के विकल्प में भीख और दान जैसे शब्द शामिल हैं। आपको बता दें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पूर्व विभागाध्यक्ष नरेंद्र त्रिपाठी भी अपने चहेते छात्रों की फर्जी अटेंडेंस लगवाते कैमरे में कैद हुये थे जिसे न केवल खबर बनने से रोका गया बल्कि एक छात्र को गैर क़ानूनी तरीके से बिना कारण बताये मुख्य परीक्षा से वंचित भी कर दिया गया।

यह मामला उच्च शिक्षा मंत्री प्रेमप्रकाश पांडे से लेकर शिक्षा विभाग और राज्यपाल तक पहुंचा लेकिन राजनीतिक ताकत के आगे छात्र की गुहार ने दम तोड़ दिया। और दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई जिसके बाद छात्र ने कोर्ट की शरण ली है। अब सवाल यह उठता है कि पत्रकार बनाने वाला एक तथाकथित पत्रकारिता विवि क्या इस तरह पत्रकार तैयार करेगा? या विवि की आड़ में सिर्फ शिक्षा की दलाली चल रही है? वो दलाली जो पूर्व वीसी सच्चिदानंद जोशी के समय से शुरु हुई।

बहरहाल प्रश्नपत्र में ऐसा सवाल देखकर छात्र संघटन NSUI ने इस पर कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है। छात्र नेता हनी सिंह बग्गा ने इसे मीडिया संस्थानों की छवि से खिलवाड़ बताते हुये प्रश्नपत्र की छवि कई मीडिया संस्थानों को भेजी लेकिन विवि ने कई पत्रकारों को बड़े कोर्सेस में दाखिल दे रखा है, जिसके बदले वे विवि की ऐसी खबरें प्रकाशित होने से रोकते हैं। आपको बता दें कि नेताओं के विशेष संरक्षण में चलने वाला यह विवि आये दिन किसी न किसी स्कैंडल को अंजाम देता रहता है। यही वजह है कि विवि की छवि तार-तार हो चुकी है और इसने बेहद कम समय में बदनामी की दौड़ में खुद को काफी आगे पहुंचा लिया है।

स्टाफ से लेकर कुलपति तक कोई पाक साफ़ नहीं…

विवि के पूर्व कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने अपने कार्यकाल में अपने पद का सिर्फ नाजायज फायदा उठाया। उसके राज में छात्रों की आवाज दबा दी जाती थी। ऐसे भी हालात बने कि कोई छात्र आत्महत्या करने तक मजबूर हुआ तो किसी ने प्रशासन के खिलाफ कोर्ट में केस दर्ज किया। इतना ही नहीं भ्रष्ट कुलपति को देख स्टाफ भी खुलकर मनमानी करता था। क्लास में पढ़ाई कराने की बजाय छात्रों से गाने गवाये जाते थे। यही वजह है कि जोशी के जाते ही छात्रों को लगा अब उनके भविष्य से खिलवाड़ बन्द हो जायेगा लेकिन हाल वही ढ़ाक के तीन पात।

कभी डिग्री फर्जी तो कभी पैसा लेकर एग्जाम में पास किये छात्र…

विवि के शिक्षकों के कारनामों की बात करें तो कई प्रोफेसर ऐसे हैं जिनकी डिग्री और नियुक्ति सन्देह के घेरे में है। कुछ तो कोर्ट के डर से तड़ीपार हुये घूम रहे हैं। इन सबके बीच पेपर में पास कराने के बदले पैसे मांगते बाबू का स्टिंग भी सामने आया लेकिन वह भी सिर्फ एक खबर बनकर रह गया। ऐसा नहीं कि प्रबन्धन के खिलाफ शिकायतें नहीं हुई लेकिन कान में बत्ती डालकर बैठे नेताओं तक पीड़ितों की आवाज पहुंचती नहीं।

आशीष कुमार चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर
ashishchouksey0019@gmail.com

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दीपावली सांग के लिए इस स्कूल प्रेयर से भला अच्छा क्या हो सकता है (सुनें)

Yashwant Singh : दिवाली सांग… मेरठ में मेरे एक मित्र हैं Vishal Jain जी. कई स्कूलों के संचालक हैं. खुद काफी इन्नोवेटिव हैं. नया नया खोजते रचते रहते हैं. इन्होंने अपने स्कूल प्रेयर के लिए अदभुत गीत तैयार कराया है. सुबह सुबह इनके स्कूलों में जो प्रार्थना बच्चे गाते हैं, उसे सुनकर खुद ब खुद बच्चों संग गाने का मन करने लगता है.

यह प्रेयर भारत के गंगा जमुनी तहजीब, सर्व धर्म समभाव का अदभुत उदाहरण है. आइए दिवाली के दिन यह प्रेयर हम सब सुनें और हर तरफ शांति समृद्धि समझदारी हो, इसके लिए प्रार्थना करें.

प्रेयर लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=4bZjvdc149g

आप इसे सुनते हुए यह भी सोचिए कि बचपन के दिनों में अपने स्कूल में कौन सा प्रेयर गाते थे.. अगर याद आए तो उसे भी गुनगुनाइए और सबको सुनाइए.

आप सभी को दीपाावली की ढेरों शुभकामनाएं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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मौत के सौदागर बने कोटा के कोचिंग सेंटर संचालक…. इस साल 16 छात्रों ने आत्महत्या की

इसे शिक्षा का व्यवसायीकरण कहें। युवा पीढ़ी का भटकाव या परिजनों की निगरानी में न रहना या फिर भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था में निराशा का माहौल वजह जो भी हो दूरदराज शहरों में भविष्य बनाने जा रहे युवाओं में से काफी मौत को गले लगा रहे हैं। रात-दिन मेहनत कर पैसे जुटाने वाले परिजन सदमे में जा रहे हैं। स्थिति यह है कि एजुकेशन हब के नाम से प्रसिद्ध हो चुके राजस्थान के कोटा में इस साल 16 विद्यार्थियों ने आत्महत्या की है। ये बात और दर्दनाक है कि इनमें से अधिकतर बिहार के हैं। हाजीपुर के अंकित गुप्ता ने चंबल नदी में छलांग लगाकर इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि वह मेडिकल फील्ड में जाने के अपने माता-पिता के सपने को पूरा नहीं कर पा रहा था।

गत दिनों एक छात्र ने 500 फुट इमारत से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्र भी दो साल से मेडिकल की तैयारी कर रहा था। बताया जा रहा है कि वह डिप्रेशन में रहता था। अभी कुछ ही दिन पहले बिहार से डॉक्टर बनने का सपना लेकर कोटा आई एक छात्रा ने फंदे से लटकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्रा भी हॉस्टल में रहकर मेडिकल की कोचिंग कर रही थी। छात्रा स्वभाव से खुशमिजाज बताई जा रही है। पढ़ने में भी तेज बताई जा रही यह छात्रा सीन साल से मेडिकल की तैयारी कर रही थी। इस छात्रा की तीन साल से कोचिंग करने की वजह से या तो उसे परिजनों के खर्चे की चिंता सता रही हो या फिर साथियों या परिजनों/रिश्तेदारों के ताने। जिस वजह से उसने मौत को गले लगाया।

बात कोटा की नहीं है कि विभिन्न शहरों में इस तरह की खबरे सुनने को मिल जाती है। गत दिनों नोएडा के एमिटी विश्वविद्यालय में एक छात्र ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसी उपस्थिति कम होने की वजह से उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। इन सब बातों को देखते हुए प्रश्न उठता है कि जीवन को उच्च स्तर का बनाने वाली शिक्षा को गृहण करते करते युवा आत्महत्या क्यों कर रहे हैं ? मामला इतना गंभीर है कि इन मामलों पर मंथन बहुत जरुरी हो गया है। क्या इन शिक्षण संस्थानों का माहौल ऐसा विषाक्त कर दिया गया है कि युवा इस माहौल में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। या फिर बच्चों पर परिजनों के उच्च शिक्षा थोप देने की प्रवृत्ति या फिर रोजगार न मिलने की असुरक्षा। या फिर बात-बात पर समझौता करने वाली प्रवृत्ति के चलते युवा में समस्याओं से जूझने का कम हो रहा माद्दा।

आश्चर्य तो इस बात पर होता है कि राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप में सत्र खत्म होने वाले सत्र में इस तरह के संवेदनशील मुद्दे नहीं उठाए जाते हैं। जो मां-बाप तरह-तरह की समस्याओं का सामना करते-करते बच्चों की परवरिश करते हैं। सीने पर पत्थर रखकर बच्चों कों अपने से दूर कर देते हैं। जब उनको बच्चों की मौत की खबर सुनने मिलती तो उनकी मनोदशा क्या होती होगी ? क्या इस बात को कभी शिक्षा का व्यापारियों ने समझने की कोशिश की है ? सरकारों को वोटबैंक की राजनीति के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता।

ये लोग तो वोट के लिए कभी आरक्षण की पैरवी करते हैं तो कभी जातिवाद धर्मवाद की और कभी क्षेत्रवाद की। बच्चों की भविष्य कैसे संवरे ? कैसे बच्चों में भाईचारा बढ़े। इससे न सरकारों को सरोकार है और न ही राजनीतिक दलों को। जिस देश का भविष्य ही दम तोड़ने लगे उसका दशा क्या होने वाली है बताने की जरूरत नहीं। कहीं आरक्षण के नाम पर जातिवाद का जहर। तो कहीं पर भेदभाव और कहीं पर क्षेत्रवाद। कभी कश्मीर में बच्चों के मरने की खबर सुनने को मिलती है तो कभी कर्नाटक में और कभी दिल्ली में। कुछ दिन तक राजनीति होती है और बाद में मामला शांत। जिसके घर से गया झेलता तो वह है। कब सुधरेगी यह व्यवस्था।

राजनीति के बढ़ते वर्चस्व के चलते हर कोई राजनीति में जाना चाहता है। देश व समाज की सेवा करने नहीं बल्कि देश को लूटने। इस व्यवस्था में कहीं पर बच्चे अपराध की दलदल में फंसे जा रहे हैं तो कहीं पर टूटकर आत्महत्या कर ले रहे हैं। सरकारों व राजनीतिक दलों के साथ नौकरशाह को बस चिंता है तो बस लूटखसोट की। जब कोटा एक साल में इतने बड़े स्तर पर आत्महत्या के मामले सामने आए हैं तो सरकारी स्तर पर कोई जांच क्यों नहीं बैठाई गई। बच्चों के पढ़ने के बाद रोजगार ढूंढते समय तो आत्महत्या के मामले सुन लेते थे पर पढ़ाई करते समय आत्महत्या के बढ़ इन मामलों पर मंथन के साथ संबंधित शिक्षण संस्थानों में जांच कमेटी बैठाने की जरूरत है जो ईमानदारी से जांच रिपोर्ट सौंपे।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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खबरों के काले धंधे पर वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गुप्ता ने की पीएचडी : पेड न्यूज पर चिंता महज एक दिखावा है…

प्रो. सुभाष गुप्ता

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गुप्ता को मैनेज्ड/पेड न्यूज के प्रभावों पर शोध के लिए पी-एच. डी. की उपाधि प्रदान की गई है। श्री गुप्ता ने अपने शोध में पाया है कि देश में सबसे बड़े स्तर यानि राष्ट्रपति के चिंता जाहिर करने और संसद, सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेताओं, प्रेस काउंसिल, निर्वाचन आयोग तक के इसके विरोध में बार-बार आवाज उठाने के बावजूद देश में पेड न्यूज के काले खेल को खुली छूट मिली हुई है। स्थितियां ये दर्शा रही हैं कि पेड न्यूज पर चिंता जाहिर करना, एक दिखावा बन कर रह गया है।

मैनेज्ड/पेड न्यूज के इस काले खेल के लिए सबसे ज्यादा बदनाम पत्रकार होते हैं, लेकिन इस गोरखधंधे में पत्रकारों से ज्यादा मीडिया घरानों के मालिकों, मैनेजमेंट, नेताओं और कॉरपोरेट घरानों के हाथ सने हुए हैं। आटे, दाल, हल्दी यानि हर उत्पाद में मिलावट करने वालों को सजा देने के लिए सदियों से कानून बने हुए हैं, लेकिन सच में झूठ की मिलावट करने, खबरों में विज्ञापन की मिलावट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की कोई व्यवस्था देश भर में नहीं है। इस मिलावट को रोकने के लिए कोई कानून तक नहीं बना है। प्रेस काउंसिल और निर्वाचन आयोग की इस संबंध में कानून बनाने की सिफारिशें पांच साल से केंद्र सरकार की फाइलों में धूल खा रही हैं।

इस शोध में अमेरिका, भारत और कई देशों के जनसंचार के माध्यमों के साथ ही भड़ास फोर मीडिया से अनेक संदर्भ लिये गए हैं। भड़ास फोर मीडिया पर पेड न्यूज के विरूद्ध अभियान के अंदाज में प्रकाशित आलेखों और समाचारों का शोध में पेड न्यूज की हकीकत समझने और सामने लाने के लिए अनेक स्थानों पर उपयोग किया गया है। पेड न्यूज के प्रभावों का उल्लेख करते हुए पाया गया है कि पेड न्यूज के कारण चुनाव महंगे हो रहे हैं, अर्थ व्यवस्था में काले धन का उपयोग और प्रभाव बढ़ता जा रहा है और चुनावों में ज्यादा धन खर्च करने की क्षमता वाले लोगों को फायदा मिलता है, भले ही वे आपराधिक प्रवृत्ति के हों। ईमानदार और योग्य लोग चुनाव प्रक्रिया में पीछे छूट रहे हैं । योग्य और ईमानदार लोगों को चुनाव से दूर करके पेड न्यूज देश में लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रही हैं। पेड न्यूज के कारण अच्छे उत्पाद और सेवाएं नुकसान उठा रहे हैं।

अखबार और न्यूज चैनल पेड न्यूज के जरिये आंशिक सच या झूठ परोस कर अपने पाठकों व दर्शकों को गुमराह करके गलत फैसले लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उत्पादों, सेवाओं, नेताओं, दलों, स्वयंभू धर्म गुरूओं से लेकर फिल्मी हस्तियों तक के बारे में इस तरह लोगों के निर्णयों को प्रभावित किया जा रहा है। हालांकि पेड न्यूज के खिलाफ खुद पत्रकारों ने ही आवाज बुलंद की है और आज भी कुछ मीडिया हाउस इस काले कारोबार से दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन किसी स्तर पर ऐसा कुछ होता नजर नहीं आ रहा है, जिससे मीडिया की साख को तार-तार करने वाले इस धंधे पर रोक लगने की उम्मीद की जा सके।

यह एक विडम्बना ही है कि एक ओर तो मीडिया घराने किसी व्यापार की तरह अपने कारोबार को चलाना चाहते हैं। दूसरी ओर, वे चाहते हैं उनके कारोबार को हर तरह के नियंत्रण से मुक्त रखा जाए। किसी भी तरह की मिलावट करने से उन्हें रोकने की कोई व्यवस्था न की जाए। निरंकुश होकर कारोबार चलाने की छूट की चाहत के पीछे मीडिया की हनक छुपी है। ताज्जुब है कि यह हनक, साल दर साल इस निरंकुशता को बचाने में कामयाब भी हो रही है।

इस अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि पेड न्यूज अब महज अखबार या न्यूज चैनल की खबर के रूप में नजर नहीं आती। बल्कि कोई लाभ लेकर खबर न छापने, किसी के खिलाफ या पक्ष में  ज्यादा समाचार देना, सर्वेक्षण और रैंकिंग भी इसी के बदले हुए रूप हैं। मनमाना भुगतान करके किसी पत्र या पत्रिका की रैंकिंग में ऊपर स्थान पाना या कोई लाभ लेकर किसी सर्वेक्षण में किसी नेता या दल को आगे दिखाना या किसी को पीछे दिखाना भी एक कृत्य है।

पेड न्यूज पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए भी यह शोध में कुछ उपाय बताये गए हैं। सुभाष गुप्ता को ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी ने पी-एच.डी. की उपाधि प्रदान की है। इसी यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर सुभाष गुप्ता ने यह शोध मैनेजमेंट स्टडीज के विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष कुमार के निर्देशन में किया है।  26 वर्ष तक प्रमुख समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर सेवा करने के बाद श्री गुप्ता छह वर्षों से पत्रकारिता शिक्षण से जुड़े हैं।

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इस भ्रष्ट व्यवस्था में बच्चों की तथाकथित उच्च शिक्षा पर लाखों रुपये न फूंकें!

सामान्य शिक्षा दिलाइए और खर्चीली उच्च शिक्षा पर व्यय होने वाले धन को बच्चों के नाम फिक्स डिपॉजिट कर दीजिए… Continue reading

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एक मैग्जीन ऐसी भी… इंटरव्यू विशाल जैन (एडिटर इन चीफ)

Vishal Jain

Yashwant Singh : एक मेरे पुराने मित्र हैं. विशाल जैन. आजकल वे एजुकेशन और स्कूलिंग के फील्ड में कई नए प्रयोग कर रहे हैं. एक रोज उनसे मुलाकात हुई तो सामने टेबल पर रखी उनकी मैग्जीन पर भी नजर चली गई. इसके पन्ने पलटने लगा. लगा कि इसके बारे में सबको बताना चाहिए. क्या खूब हो कि आपका बच्चा स्कूल पढ़ने गया हो और एक दिन वह कमिश्नर का इंटरव्यू कर लाए और उसे एक मैग्जीन में छाप भी दिया जाए. विशाल अपने स्कूल के बच्चों से ऐसे कई क्रिएटिव काम कराते हैं.

आपको ये मैग्जीन आनलाइन फ्री में मिल सकती है, वीडियो के अंत में बताए दिखाए गए मेल आईडी पर मेल करने पर. या फिर चाहें तो Vishal Jain को एफबी पर पकड़ कर उनके इनबाक्स में अपनी मेल आईडी मैसेज कर मैग्जीन की मांग कर सकते हैं. मैग्जीन के बारे में विशाल से बातचीत का वीडियो नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं…

एक मैग्जीन ऐसी भी… इंटरव्यू विशाल जैन (एडिटर इन चीफ) 

https://www.youtube.com/watch?v=4wjrNM25pNQ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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फर्जी इंस्टीट्यूट ‘राधा गोविंद इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ के खिलाफ एफआईआर का आदेश

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से बड़ी खबर। न्यायलय ने दिया फर्जी इंस्टीट्यूट के खिलाफ एफआईआर का आदेश। एक छात्र पारस ने अपनी शिकायत जिले के पुलिस अधीक्षक से लेकर मुख्यमंत्री तक की लेकिन विडंबना देखिए कि उसकी किसी ने नहीं सुनी। उसकी शिकायत थी कि वह जिस इंस्टीट्यूट में पढ़ रहा था वह फर्जी है। उसके अनुसार उस जैसे हजारों विद्यार्थियों का भविष्य बर्बाद किया जा रहा है। वह कहता रहा लेकिन सुनने वाला कौन था। आखिरकार उसने एक आरटीआई लगाई और फिर सच प्रामाणिक और लिखित तौर पर सामने आया। इसके बाद न्यायालय की शरण ली और जहां से इंस्टीट्यूट के खिलाफ मामला दर्ज करा सका।

मामला है राधा गोविंद इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का जिस पर फर्जी इंस्टीट्यूट होने का आरोप है। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट चंदौसी मुरादाबाद ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला संज्ञेय अपराध है और स्वीकार करने के योग्य है। न्यायालय ने थाना बनियाठेर को आदेशित करते हुए कहा किप्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 156 3 में वर्णित तथ्यों के आधार पर सुसंगत धाराओं में मामला दर्ज कर नियमानुसार विवेचना कराया जाना सुनिश्चित किया जाए। उक्त मामले के आरोपी हैं पवन कुमार शर्मा चेयरमैन मनोज तोमर, मैनेजिंग डायरेक्टर और आशीष कुमार डायरेक्टर। अब यह बात उठना लाजमी है कि एक इंस्टीट्यूट खुलेआम फर्जी रूप से चलता रहा और सारे जिम्मेदार मौन रहे। आखिर पारस की शिकायत क्यों नहीं सुनी गई और खुले आम फर्जी इंस्टीट्यूट कैसे चलता रहा?

वैसे भी तथ्यों के आधार पर यह गंभीर सवाल उठना लाजमी है। यह खुद को हापुड़ दिल्ली रोड पर स्थित मोनाड विश्वविद्यालय से संबद्ध घोषित कर रहा था लेकिन मोनाड विश्वविद्यालय ने लिखित में कहा कि उक्त परिसर के अतिरिक्त उसके कोई सम्बन्धित परिसर हैं ही नहीं। अगर आरोप सही है तो फिर राधा गोविन्द इंस्टीट्यूट ऑफ टैक्नोलॉजी निकट अकरोली चौराहा चंदौसी जिला सम्भल जैसे इंस्टrट्यूट, स्कूल, या फिर विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश में खुलेतौर पर हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद करते रहे और हमारी सरकार शिक्षा क्षेत्र में ‘पूरे होते वादे’ के विज्ञापनों से जनता को अपना बेसुरा राग सुनाती रही। क्या ऐसा ही संवरेगा हमारा आज? क्या ऐसे अपराध पूर्ण समाज से बनेगा हमारा कल? क्या यहीं है वह पूरे होते वादे? क्या यहीं है हमारा उत्तम प्रदेश उत्तर प्रदेश?

रामजी मिश्र ‘मित्र’ की रिपोर्ट.

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दिल्ली सरकार के एक स्कूल में भ्रष्टाचार का खुला खेल खेला जा रहा!

केजरीवाल जी, आप बता दो, क्या मैडम की जांच होगी और गरीबों को न्याय मिलेगा?

राजधानी दिल्ली के विवेक विहार में राम मंदिर के आगे पार्क के पास एक दिल्ली सरकार का स्कूल है जहाँ भ्रष्टाचार का खुला खेल खेला जा रहा है. गरीबों के बच्चों का एडमिशन मना कर दिया जाता है और पीछे से जिसका जुगाड़ पार्षद तक है उसी के बच्‍चे का एडमिशन होता है। इस बात का जीता जागता सबूत है कि एक दिन एक पत्रकार बंधु एडमिशन कराने के लिए प्रिंसिपल महोदया के पास गए तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि सीटें तो फुल हैं लेकिन पार्षद कहेंगी तो एडमिशन होगा। 

कल्पना कीजिये कि जिस गरीब आदमी कि पहुँच पार्षद तक न हो उसके बच्चों का एडमिशन कैसे होगा? स्कूल के गेट के बाहर आने पर सारी पोल और खुल गई। तमाम लोग गेट पर खड़े थे। उन्हें अंदर नहीं आने दिया जा रहा था जबकि वो लोग एडमिशन के लिए परेशान थे। कुछ तो टीसी के लिए परेशान दिखे। लेकिन इन्हें अंदर ही नहीं आने दिया जाता है।

आम आदमी के बच्‍चों का एडमिशन मैडम की तानाशाही के कारण नहीं हो रहा है। जिनका जुगाड है वह लोग तो एडमिशन करवा ले रहे हैं मगर आम आदमी जो पढा लिखा नहीं है वही अब भ्रष्‍टाचार का शिकार हो रहा है जिसकी सुनवाई दिल्‍ली सरकार भी नहीं कर रही है। अब यह लोग अपने बच्‍चों को क्‍या पढाएंगे, यह तो केजरीवाल साहब बताएंगे।   

प्रिंसिपल मैडम बहुत कानून जानती हैं लेकिन शायद शिक्षा विभाग के मंत्री जी और डायरेक्टर साहब ने शायद उन्हें शिक्षा का अधिकार कानून नहीं पढ़ाया है कि एडमिशन के लिए मना नहीं कर सकती हैं लेकिन पार्षद का आशीर्वाद है तो मनमानी खूब चल रही है। मैडम कहती हैं कि हम किसी विधायक या मंत्री को नहीं जानते हैं। जबकि स्कूल की अगर ठीक तरीके से ऑडिट करा ली जाए तो बहुत गोलमाल मिलेगा। कंप्यूटर लैब में तो खूब गोल माल हुआ है। सेटअप असेंबल किया हुआ लगाया लगता है। इसका बिल किस कंपनी का है, यह तो डायरेक्टर साहब ही जानें।

सवाल यह है कि इन गरीबों की सुनवाई कौन करेगा? मैडम करती नहीं हैं। अब केजरीवाल जी, आप बता दो, क्या मैडम की जाँच होगी और गरीबों को न्याय मिलेगा?

अजीत कुमार पाण्‍डेय
पत्रकार
ajit.editor@gmail.com

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“LOOT” by private school authorities

Mrs. Smriti Irani

Hon’ble Education Minister

India.

Respected Madam,

I would like to bring to your kind notice the following activities which are going on regularly in Adharsheela Global School, Sector-3, Vasundhara, Ghaziabad:-

1. All parents are forced to buy books, stationery & uniform from school only (audio clip 29th March enclosed in which teacher of this school is confirming to me that it’s mandatory to buy books & stationery from school only and there is no other choice for parents).

2. In audio clip of 30th March (1st) there is a long conversation between me and school principal where she is saying whatever she do is correct and whatever she says is right. She is not ready to accept this that all parents are being forced by the school to buy books and stationery from the school only whereas I am saying that it is not correct whatever she is saying as I have a proof that I am being told by your staff that “ALL THE PARENTS HAVE TO BUY BOOKS & STATIONERY FROM SCHOOL ONLY”.

She is also agreeing that there is no “Parent Teacher Association” which is mandatory for every CBSE affiliated school.

3. In Audio clip of 30th March (2nd) you can listen the conversation between me and school principal in which she is saying that the NCERT books are of very low level and also accepting that the books of private publishers are being used by the schools just because of the COMMISSION goes to school management.

4.  In audio clip of 23rd April you can listen that principal is again saying that NCERT books are of very low level and also not able to satisfy me why school is charging – Activity Fee, Examination Fee & Sports Fee on monthly basis when they have already charged Rs.9500/- towards annual fee. In reply to my monthly fee question she said that this is the only school who is giving breakup of monthly fee and also said there are lot of expanses on printing and examination sheets which is also wrong statement of the principal because school uploads the assignments & holiday homework and asks students to download on their own and complete.

School is also charging Rs.100/- for syllabus which I believe is also not correct. School is also “LURED” students by saying that “IF THEY WILL TAKE SUBSCRIPTION OF TIME N/E MAGAZINE THEY WILL TAKE THEM TO CINEMA HALL TO WATCH “JUNGLE BOOK” MOVIE. School offered the same subscription last year also and made it mandatory but rolled back the mandatory and made it optional when school authorities were questioned by the parents.

In reply to my question regarding annual charges, she said that Rs.9500/- is towards development charges because school is expanding and also making Labs and moreover school has not generated any profit so far. My question is that if Rs.9500/- is towards development than for what they are charging Rs.1500/- (FEE RECEIPTS ENCLOSED OF DIFFERENT SCHOOL).

Madam, I am not able to understand that is the school now a “EDUCATION SHOP” from where management wants to generate profit instead of giving education?

Madam, I request you to kindly look into it and take appropriate action against the school to stop the “LOOT” and save hard earned money of the parents.

Best Regards

Ashish Goel

ashish.goel73@gmail.com

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दसवीं पास हैं तो तीन महीने में पत्रकार बनें!

जी हां. ये दावा है एक विज्ञापन का. विज्ञापन में बताया गया है कि उन्हें तीन महीने में क्या क्या सिखाया जाएगा ताकि पत्रकार बन सकें. साथ ही पांच सौ रुपये अलग से देने पर उन्हें क्या अलग ज्ञान दिया जाएगा. सोचिए. दसवीं पास अगर तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद पत्रकार बन गया तो वह क्या देश समाज को दिशा देगा और सच्चाई को क्या कितना समझ पाएगा. जिनको खुद अपने ज्ञान को अपडेट करने की जरूरत है, वही जब पत्रकार बनकर सही गलत का फैसला करेंगे तो जाहिर तौर पर उनका दकियानूसी माइंडसेट आम जन और समाज का बहुत नुकसान करेगा. दसवीं पास पत्रकार बनने का यह विज्ञापन आजकल सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया जा रहा है और लोग पत्रकारिता के गर्त में गिरने को लेकर चिंता जता रहे हैं.

असल में पत्रकारिता शिक्षा के नाम पर इन दिनों हर कोई अपनी जेब भर रहा है. लुट रहे हैं आम घरों के नौजवान जो मीडिया के ग्लैमर के चक्कर में गली गली खुले संस्थानों के प्रलोभनों दावों वायदों में फंस कर लाखों रुपये गंवा बैठते हैं और बाद में दर दर भटकने को मजबूर हो जाते हैं. कोई छोटा न्यूज चैनल हो या बड़ा, कोई छोटा अखबार हो या बड़ा, सब के सब मीडिया स्कूल चला रहे हैं और बच्चों को फंसाकर उनका पैसा, समय और जीवन बर्बाद कर रहे हैं. इसी तर्ज पर अब कमाई के चक्कर में कुछ ऐसे धंधेबाज आ गए हैं जो दसवीं पास को पत्रकार बनाने लगे हैं.

अभी तो गनीमत है कि ये दसवीं पास को पत्रकार बनाने का दावा कर रहे हैं. कल को कुछ लोग दसवीं फेल, आठवीं फेल को पत्रकार बनाने का दावा लेकर आ सकते हैं और लोग धड़ल्ले से पैसे देकर पत्रकार बनने के लिए लालायित भी हो जाएंगे. गांवों से लेकर शहरों तक के युवाओं को ये लगता है कि अगर वे पत्रकार बन गए और उन्हें पत्रकार होने का कार्ड मिल गया तो बड़े आराम से पुलिस ले लेकर अफसर नेता मंत्री सबसे मिल लेंगे और गाड़ी पर प्रेस लिखाकर खुद को पत्रकार कहते हुए भीड़ में अलग दिखेंगे व कई तरह के लाभ हासिल कर लेंगे. ऐसे छोटे मोटे प्रलोभनों के कारण मीडिया स्कूल की ढेर सारी दुकानें खुल रही हैं जिसमें प्रेस कार्ड बेचा जा रहा है.

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Undergraduate journalism courses must be scrapped, says media professionals

New Delhi : Journalism and Mass Communication institutes in India have grown in number with close to 150 media and communication courses ranging from bachelors, masters, post graduate diploma to diploma and certificate programmes on offer. An assessment conducted by CMS Academy, New Delhi reveals that there are inconsistencies in these programmes that are being offered and there are lack of parameters under which one can evaluate the courses and the institutes for their quality. As a follow up of this study, a symposium on Vision for Media & Communication Education in India was organized on August 7th, 2015 at IIC.

Speaking on the occasion, Dr N B Rao, Chairman of CMS, said that, “Taking a long term view to observe the inter-linkages of the sectors within media and communication is important.” Adding to the agenda of the symposium, Ms Vasanti, Director General and Project Lead of the study said that, “The state of media and communication education in India demands a standardized system to be put into place.  With an attempt to address such issues related to curriculum, faculty training, a group called Alliance of Media and Communication Educators have been formed.”

Quality Parameters Ranking: More than 40 speakers attended this day-long symposium and participated in ranking quality parameters to evaluate media and communication programmes in the country. The seven main quality parameters that emerged out of the CMS Academy study are-
Student Quality
Teacher Quality
Learning & Teaching Resources
Curriculum Quality
Learning & Teaching Practices/Quality
Employability  & Entrepreneurial Ability/Knowledge & Skills Acquisition Quality
Vision, Leadership, Research & Innovation

The group consisting of senior academicians, journalists, media critics and researchers laid down their points/weightage on each of the above mentioned parameters that will help CMS Academy draft a final quality parameter document to evaluate specialized media courses. Vision for Media and Communication in India: The panel discussion on Vision for Media and Communication in India, discussed the necessity of standardizing the media education sector. In view of the findings, the panelists also felt that there are far too many factors that are ailing the sector. Veteran journalist, Mr. Q W Naqvi remarked that under-graduate journalism courses must be scrapped as students need to build their foundation on a particular subject before studying journalism.

Dr Nalini Rajan and Professor B P Sanjay, who were part of the study as the Indian Advisory Group members, also reiterated that media education sector should train students to adapt to various organizational requirements. With the digital revolution, news media has changed the way it functions. However, the news media education sector has not been able to keep up with these advancements.

Mr. Nidheesh Tyagi from BBC Hindi in his observation of the media education sector said that the teachings should be focused outside the classroom. He added that young professionals are relying on Google for news stories, which is unfortunate. Group Discussions- Thereafter, two parallel group discussions were held on Media & Communication Industry Requirements and Employer Expectations and Harmonizing Curriculum and Teaching Practices. The discussion on Harmonizing Curriculum and Teaching Practices involved faculties looking into the necessary components of developing a curriculum and adoption of innovative teaching practices. All its participants felt that the curriculum is not developed according to industry requisite, that these curriculum need to be updated regularly and training its faculties do not happen at all. 

The final panel discussion on Indicators of Quality Media and Communication Education had industry professionals deliberating on the quality of the young professionals hired by them. “The journalism institutes are not at all aware of the changes in the industry; there were hardly any books to teach on the media scenario in India”, Mr. K G Suresh, Consulting Editor of DD News, said. Advertising professional Mr. Rajkumar Jha, said that media and communication institutes’ approach of teaching students need to be revamped. Professional experience for a longer duration during the course can play an important in adapting to the current industry needs.

About CMS Academy- CMS Academy is a training and resource centre committed to provide quality Professional Development Programs (PDPs) in media & communication education.. It’s research based Professional Development Programs specifically focus on innovation and enhancing quality standards of the education system in the country. It develops professional development programmes, designs curriculums/ courses, ranks courses/ programmes, etc. Its Annual ranking of Media and Communication programs /courses will advocate for establishing global standards for media education in the country. 

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छात्र के करियर से खिलवाड़ करने वाले राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी और आर्यभट्ट इंजीनियरिंग कॉलेज को हाईकोर्ट ने कारण बताओ नोटिस जारी किया

राजस्थान हाइकोर्ट की जयपुर पीठ ने छात्र के भविष्य से खिलवाड़ करने पर राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी कोटा और आर्यभट्ट इंजीनियरिंग कॉलेज चाचियावास अजमेर को कारण बताओ नोटिस जारी किया। छात्र गिरीश मीणा के जीवन से कॉलेज और यूनिवर्सटी ने किया खिलवाड़। माननीय उच्च न्यायलय ने प्रथम दृष्टया कॉलेज व यूनिवर्सिटी की लापरवाही मानते हुए दोनों के खिलाफ नोटिस जारी कर कोर्ट 29 जुलाई 2015 को हाईकोर्ट जयपुर में तलब किया।

 

गिरीश मीणा पुत्र श्री जीवतराम मीणा, अजमेर ने वर्ष 2010 में आर्यभट इंजीनियरिंग कॉलेज अजमेर में बी-टेक इलेक्ट्रिकल में दाखिला लिया था। गिरीश मीणा ने 2012 में चतुर्थ सेमेस्टर के विषय इलेक्ट्रो मेग्नेटिक फील्ड की लिखित परीक्षा दी थी। लेकिन परीक्षा में कॉलेज ने लापरवाही करते हुए छात्र के सेशनल मार्क्स नहीं भेजे और छात्र की परीक्षा में अनुपस्थिति दिखाई। जबकि सेशनल मार्क्स की परीक्षा गिरीश मीणा ने उसी वर्ष कॉलेज में दी थी। साथ ही उसी वर्ष इसी पेपर के लिखित परीक्षा में छात्र गिरीश मीणा के 25 नंबर भी आये। वर्ष 2012 में गिरीश मीणा ने सेशनल और लिखित दोनों पेपर दिए थे लेकिन गिरीश मीणा को लिखित में पास कर सेशनल में अनुपस्थित कर फ़ैल घोषित कर दिया गया।

वर्ष 2013 में छात्र गिरीश मीणा के इसी पेपर के जो उसने वर्ष 2012 में दिया था उसके सेशनल परीक्षा के नंबर कॉलेज ने राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी कोटा को नही भेजे। वही छात्र गिरीश मीणा के आर्यभट कॉलेज ने वर्ष 2014 में जिस सेशनल परीक्षा में गिरीश मीणा को 2012 में अपसेन्ट दिखाया था, उसके नंबर यूनिवर्सिटी को वर्ष 2014 में 18 नंबर के साथ भेज दिए। लेकिन फिर से यूनिवर्सिटी ने इसी पेपर के लिखित परीक्षा में छात्र को फ़ैल घोषित कर दिया।जबकि लिखित परीक्षा में छात्र के 2012 में 25 नंबर आये थे।

छात्र गिरीश मीणा के 2012 में सेशनल नंबर 16 थे तथा लिखित परीक्षा में 25 थे। दोनों नंबरो को जोड़कर छात्र गिरीश मीणा के 41 नंबर हो गए और छात्र उक्त परीक्षा में इन नंबरो के आधार पर पास हो गया। कॉलेज कहता है कि उन्होंने सेशनल मार्क्स यूनिवर्सिटी को भेज दिए और यूनिवर्सटी कहती है कि सेशनल मार्क्स हमे प्राप्त नही हुए। लेकिन विश्व विधालय व् कॉलेज की धांधली के कारण आज तक छात्र को बेवजह हैरान व् परेशान होना पड़ रहा है। यूनिवर्सिटी और कॉलेज से परेशान छात्र मानसिक रूप से तनाव ग्रस्त चल रहा है।

वहीं कॉलेज ने छात्र को पत्र जारी कर 2013 में सूचित किया है कि कॉलेज ने यूनिवर्सिटी को सेशनल मार्क्स भेज दिए है। जिसकी कॉपी भी गिरीश मीणा के पास है। विश्वविद्यालय व कॉलेज से हैरान और परेशान होने के पश्चात गिरीश मीणा ने हाईकोर्ट वकील कपिल माथुर के जरिये हाईकोर्ट जयपुर  याचिका दायर की। जिसमे माननीय उच्च न्यायलय ने प्रथम दृष्टया कॉलेज व् यूनिवर्सिटी की लापरवाही मानते हुए दोनों के खिलाफ नोटिस जारी कर 29 जुलाई 2015 को हाई कोर्ट जयपुर में दोनों को तलब किया है। यूनिवर्सिटी व् कॉलेज की इस बड़ी लापरवाही के कारण छात्र गिरीश मीणा का जीवन अंधकारमाय हो गया है।  आर्यभट इंजीनियरिंग कॉलेज अजमेर के पीड़ित इंजीनियरिंग स्टूडेंट गिरीश मीणा का मोबाइल नंबर 07688866516 है।

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जब माननीय ही बांटे फर्जी डिग्री तो फिर रोकेगा कौन

बात सिर्फ दक्षिण कश्मीर के एक स्कूल शिक्षक मो. इमरान खान की नहीं है। जो गाय पर निबंध नहीं लिख पाए। इसे सरकारी स्कूलों पर तंज कहिए या व्यवस्था का दंश, हकीकत यही है कि हर जगह हर कहीं सरकारी स्कूल क्या हरेक विभाग में ऐसे नमूने देखने को मिल जाएंगे। अगर कायदे से जांच हुई तो देश भर में न जाने कितनें फर्जी नौकरशाहों पर गाज गिरेगी जो दुनिया में चौंकाने वाला बड़ा आंकड़ा होगा।  

जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में एक गुरूजी की काबिलियत को लेकर सवाल उठा तो जज मुजफ्फर हुसैन अतर ने बरोज बीते जुमा सुनवाई करते हुए हकीकत से खुद ही रूबरू होने का फैसला लिया और गुरूजी को गाय पर खुली अदालत में ही निबंध लिखने का हुक्म दे दिया। गुरूजी हक्का  बक्का और पसीने पसीने हो गए। कहने लगे कि कोर्ट रूम के बाहर लिखने की इजाजत दी जाए वह भी जज साहब ने कुबूल कर ली ; शायद जज साहब को लगा हो, कोर्ट में इसे घबराहट हो रही हो। 

कोर्ट के बाहर भी गुरूजी निबंध नहीं लिख पाए तो एक वरिष्ठ वकील से जज ने गुरूजी को अंग्रेजी से उर्दू में अनुवाद करने के लिए सरल पंक्ति देने को कहा। गुरूजी अनुवाद भी नहीं कर पाए और उसमें भी फेल। अब एक और बहाना गढ़ा कि वो गणित के शिक्षक हैं। जज साहब ने उनकी इस गुहार को भी मान लिया और चौथी कक्षा का एक सवाल हल करने को दे दिया। मगर गुरूजी वह भी नहीं कर पाए। जज साहब सारा माजरा समझ गए और तुरंत ही गुरूजी पर पुलिस एफआईआर दर्ज कराने का फैसला सुना दिया। दरअसल मामला यह था शिक्षक मो. इमरान खान ने बोर्ड ऑफ हायर एजूकेशन दिल्ली, नगालैण्ड ओपन यूनिवर्सिटी से डिग्रियां ले रखी थीं जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इन्ही के आधार पर उसे शिक्षक की नौकरी दे दी गई क्योंकि डिग्री मे गुरूजी को उर्दू में 74ए अंग्रेजी में 73ए गणित में 66 अंक मिले थे यानी डिग्रियों के मुताबिक वो टॉपर हैं सो नौकरी मिल गई। इसी पर एक याचिका प्रस्तुत की गई और ये सच्चाई सामने आई। जज ने कहा अध्यापक के ज्ञान को समझा जा सकता है, सूबे के विद्यार्थियों का भविष्य क्या होगा, यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है, सरकार एक पैनल गठित करे और गैर मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं से जारी डिग्रियों की जांच करे। काश ऐसा ही आदेश पूरे देश के लिए हो जाए !

देश में फर्जी डिग्रियां बेचना एक उद्योग का रूप ले चुका है। पैसा लेकर डिग्रियों के बांटे जाने का खेल अच्छा खासा चल रहा है। अभी इसी 12 मई को ही यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन ने देश की 21 फर्जी यूनिवर्सिटी की सूची जारी की है और साफ कहा है कि विद्यार्थी इनमें दाखिला न लें सभी की डिग्रियां अमान्य हैं। सीधा मतलब डिग्रियां फर्जी हैं और सब पैसे के लिए हो रहा है। इनमें सबसे ज्यादा 9 यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश की हैं जो वाराणसी संस्कृत यूनिवर्सिटी, वाराणसी यूपी और जगतपुरी, दिल्ली महिला ग्राम विद्यापीठ, इलाहाबाद गांधी हिंदी विद्यापीठ, इलाहाबाद नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ इलेक्ट्रो कम्प्लेक्स होमियोपैथी, कानपुर नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूनिवर्सिटी ; ओपन यूनिवर्सिटी अचलताल अलीगढ़, उप्र यूनिवर्सिटी मथुरा महाराणा प्रताप शिक्षा निकेतन यूनिवर्सिटी, प्रतापगढ़ इंद्रप्रस्थ शिक्षा परिषद, इंस्टीट्यूशनल एरिया खोड़ा माकनपुर नोएडाएगुरुकुल यूनिवर्सिटी वृंदावन मथुरा दूसरे नंबर दिल्ली आता है जिसकी 5 यूनिवर्सिटी हैं जिनके नाम कमर्शियल यूनिवर्सिटी लिमिटेड, दरियागंज यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी, वोकेशन यूनिवर्सिटी, एडीआर.सेंट्रिक ज्यूरिडिकल यूनिवर्सिटी, एडीआर हाउस, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग हैं। 

मध्यप्रदेश की एक केसरवानी विद्यापीठ, जबलपुर कर्नाटक की एक बडागानवी सरकार वर्ल्ड ओपन यूनिवर्सिटी एजुकेशन सोसाइटी, बेलगाम केरल की एक सेंट जॉन कृष्णट्‌टम तमिलनाडु की एक डीडीबी संस्कृत यूनिवर्सिटीए पुत्तुर त्रिची पश्चिम बंगाल की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन कोलकाता और महाराष्ट्र की राजा अरेबिक यूनिवर्सिटी का नाम शामिल है। यूजीसी भी महज सूची जारी कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है।

ये तो केवल बानगी मात्र हैं जो जांच के बाद सामने हैं। हकीकत में देश भर में न जाने कितने लोग फर्जी डिग्रियों से बड़े बड़े ओहदे तक जा पहुंचे हैं जो एक जिन्दा दफन राज है। यूनिवर्सिटी ग्रान्ट कमीशन के दिशा निर्देशों के अनुसारए कोई भी प्राइवेट या डीम्ड यूनिवर्सिटी अपने राज्य के बाहर नियमित या डिस्टेंस मोड में डिग्री नहीं दे सकती है। लेकिन फिर भीए कई प्राइवेट यूनिवर्सिटी धड़ल्ले से राज्य के बाहर डिग्रियां बांट रही हैं और करोडों की अवैध कमाई का जरिया बनी हुई हैं। फर्जी डिग्री को लेकर दिल्ली के कानून मंत्री तक शक के दायरे में हैं और केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी भी खूब चर्चा में रहीं।

हैरानी वाली बात है कि बीएड और फिजियोथेरैपी जैसे नियमित रूप से पढ़े जाने वाले कोर्स भी डिस्टेंस मोड में चल रहे हैं। सवाल फिर वही कि क्या ये सब ठीक है तो फिर इनको रोका क्यों नहीं जा रहा है। अब जब तकनीक का जमाना है हम 3 जी से आगे 4 जी और 5 जी की उड़ान भरने ही वाले हैं और सारा सूचना तंत्र जेब में है तो फिर डिग्रियों के फर्जीवाड़े को उसी समय क्यों नहीं पकड़ा जा सकता जब नौकरी या रोजगार के पंजीयन के लिए अभ्यर्थी को दर्ज किया जाता है। 

यह कमीशन खोरी का अवैध खेल है जो सबको पता है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 144 और आपराधिक दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 188 के तहत फर्जीडिग्रियों को बांटने वाली संस्थाओं को बंद किया जा सकता है पर इसे करेगा कौन। यूं ही फर्जी डिग्रियां बंटती रहेंगी और देश के होनहार टेलेण्ट का  गला घुटता रहेगा। सवाल फिर भी अनुत्तरित लेकिन इसे रोकेगा कौन क्योंकि ज्यादातर शिक्षा माफिया बड़े बड़े माननीय जो बन गए हैं । भला हो अदालत जो मामला वहां तक पहुंच जाता है तो न चाहकर भी सच्चाई सामने आ ही जाती है।

लेखक पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार ऋतुपर्ण दवे से संपर्क : rituparndave@gmail.com

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यूपी में जंगलराज : केएनआईटी सुलतानपुर में क्यों है इस कदर भ्रष्टाचार!

कमला नेहरू प्रौद्यौगिकी संस्थान सुलतानपुर में भ्रष्टाचार की जडे़ं इतनी गहरी है जिसका पूरा अन्दाजा लगा पाना थोड़ा मुश्किल है। तकनीकी शिक्षा के लिए सरकारी गजट और शासन द्वारा बनाये गये नियम कानून के यहां कोई मायने नहीं हैं।  कई कहानियां हैं। एक-एक कर बताते हैं। यहां कार्यवाहक निदेशक के रूप में के.सी. वर्मा तैनात है। इनकी खुद की तैनाती एक बड़ी कहानी है, जिसे बाद में बताएंगे। पहले इनके अपने अपने चहेते सदा शिव मिश्र के बारे में जानिए। वर्मा जी ने अपने चहेते सदा शिव मिश्र को 2012 में दो बार पदोन्नति दी, शासनादेश एवं निर्देशों की धज्जियां उड़ाकर। लाबिंग मजबूत करने के लिए राम चन्द्र तिवारी को निदेशक के वैयक्तिक सहायक के पद पर अनर्गल पदोन्नत करने के साथ ही अन्य लाभ देने का काम किया गया।

खास बात है कि पहले संस्थान में वित्त एवं लेखाधिकारी का पद सृजित नहीं था जिससे वित्त सम्बन्धी कार्यों में खासी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। संस्थान की बोर्ड ऑफ गवर्नर ने वित्त की इन समस्याओं को संज्ञान में लेते हुये संस्थान में एक अतिरिक्त ‘सहायक कुलसचिव (लेखा)’ के पद हेतु अनुमोदन दिया, जिस पर आरसी सिंह की नियुक्ति हुयी थी। कुछ वर्षों बाद 1988-89 में उ.प्र. शासन द्वारा केएनआईटी में एक वित्त एवं लेखाधिकारी नियुक्त किया गया। इसके बाद बोर्ड ऑफ गवर्नर ने स्वीकृत अतिरिक्त ‘सहायक कुलसचिव(लेखा)’ के पद हेतु यह आदेश दिया कि यह पद केवल तभी तक जीवित रहेगा जब तक आरसी सिंह सेवानिवृत्त नहीं हो जाते और आरसी सिंह के सेवानिवृत्त होने के बाद वह पद स्वतः ही समाप्त माना जायगा।

कमला नेहरू प्रोद्यौगिक संस्थान सुलतानपुर के सोसाइटी बाइलॉज के अनुसार प्रशासनिक पद कुलसचिव, उपकुलसचिव एवं सहायक कुलसचिव के पद हैं। इन पदों की भर्ती प्रक्रिया में कुलसचिव, उपकुलसचिव नियम 4सी व सहायक कुलसचिव नियम 4ए के अन्तर्गत गठित चयन समिति के मध्यम से की जायेगी और इन पदों के लिए अर्हता स्टीयरिंग कमेटी द्वारा निरधारित की जायेगी, लेकिन 2012 मे अशोक तिवारी की मृत्यु के रिक्त सहायक कुलसचिव प्रशासन पद पर सीधी भर्ती प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए बिना विज्ञापन के कार्यवाह निदेशक के.सी. वर्मा अपने चहेते सदा शिव मिश्र की नियुक्ति कर दी, बिना स्टीयरिंग कमेटी के, जो नियमानुसार गलत था ।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. के.बी. नायक के कार्यकाल में भी सहायक कुलसचिव प्रशासन पद पर शैलेन्द्र श्रीवास्तव को भी निदेशक के वैयक्तिक सहायक की पदोन्नति एवं उपकुलसचिव पद पर अशोक तिवारी की पदोन्नति कर दी गयी थी। शासन के हस्तक्षेप के बाद प्रतिकूल कार्यवाही की थी। एस.सी. भट्ट को उपकुलसचिव सीधी भर्ती पर नियुक्त किया और पदोन्नत कर्मचारियों को उनके मूल पद पर वापस कराया। सदाशिव मिश्रा ने भी सहायक कुलसचिव पद पर प्रोन्नत हेतु आवेदन किया था जिसे निरस्त कर दिया गया था, लेकिन अवसर देखकर श्री मिश्रा ने अपनी पदोन्नति ‘सीधी-भर्ती’ के पद पर करा ली।

जानकारी के अनुसार वर्तमान सहायक कुलसचिव प्रशासन सदाशिव मिश्रा की पदोन्नति क्लर्क से प्रधान सहायक पद पर भी नियम विरुद्ध तरीके से की गयी। संस्थान में तकनीकी सहायक वर्ग एवं तृतीय श्रेणी के गैर तकनीकी वर्ग के कर्मचारियों के प्रोन्नति हेतु संस्थान नियमावली में वर्णित प्राविधानों के अनुसार विचार करने के लिए आदेश की व्यवस्था दी गयी है जिसके अनुसार विभागीय प्रोन्नति समिति का गठन में एक असेसमेन्ट बोर्ड का अध्यक्ष- अध्यक्ष, सम्बन्धित विभागाध्यक्ष-सदस्य, कुलसचिव-सदस्य का प्राविधान है। समिति की सहायता के लिये एक असेसमेन्ट बोर्ड का गठन भी किया गया है जिसमें संस्थान के एक वरिष्ठ प्रोफेसर-अध्यक्ष, सम्बन्धित विभागाध्यक्ष-सदस्य, एक वाह्य विशेषज्ञ-सदस्य, एक अन्य विभाग के वरिष्ठ शिक्षक-सदस्य होंगे। प्रधान सहायक पद के लिए विभागीय प्रोन्नति समिति का गठन किया गया था और प्रोन्नति प्रक्रिया सम्पन्न की गयी थी जिसमें अतिउत्तम श्रेणी में चयनित अभ्यर्थियों की पदोन्नति न करते हुये पांचवीं वरीयता प्राप्त अभ्यर्थी सदाशिव मिश्र की पदोन्नति की गयी।

वर्तमान कार्यवाहक निदेशक केएस वर्मा ने संस्थान स्तर पर गुपचुप तरीके से प्रोन्नति समिति का गठन करके सदाशिव मिश्रा की पदोन्नति चुपचाप कर दी और ‘स्टीयरिंग कमेटी’ के आदेश की अवहेलना करते हुये सीधी भर्ती के पदों को प्रोन्नत द्वारा भर दिया। जिनकी प्रोन्नति 1995 में ‘प्रधान सहायक’ पद पर ही गलत तरीके से की गयी थी। सदाशिव मिश्रा की ही दो पदोन्नतियाँ की गयी हैं जबकि अन्य अभ्यर्थी श्री मिश्र से आधिक योग्य अभ्यर्थी को एक भी प्रोन्नति नहीं दी गयी है। इसके साथ ही सदाशिव मिश्रा एवं राम चन्द्र तिवारी निदेशक के वैयक्तिक सहायक को पदोन्नति के साथ-साथ एसीपी का लाभ भी दिया जा रहा है।

फर्जीवाड़ा कर की गई निदेशक की नियुक्ति, बसपा शासन में नियम विरुद्ध दिया गया कार्यभार

बसपा के शासनकाल में रहस्यमयी तरीके से कमला नेहरू प्रोद्यौगिक संस्थान (केएनआईटी) के निदेशक की नियुक्ति नियमों की अनदेखी द्वारा की गयी थी। ‘बहनजी’ के कार्यकाल में प्रभावशाली कैबिनेट मंत्री के दबाव मे मंत्री के रिश्तेदार बताये जाने वाले केएस वर्मा को शासन द्वारा निर्धारित मापदडों को पूरा कराये बिना ही कमला नेहरू प्रोद्यौगिक संस्थान सुल्तानपुर के निदेशक पद पर नियुक्ति कर दी गई। यही नहीं तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री के रिश्तेदार बताए जाने वाले केएस वर्मा को 30 जनवरी 2010 को संस्थान में कार्यभार ग्रहण करा दिया गया।

गौरतलब है कि 2010 के पहले किसी भी तकनीकी संस्थान के निदेशक के लिए प्रकाशित विज्ञापन व भारत सरकार के नियम के अनुसार किसी भी तकनीकी संस्थान के निदेशक के पद के लिए 05 वर्ष का प्रोफेसर का अनुभव व 45 वर्ष की आयु का मापदंड निर्धारित था। तकनीकी शिक्षा के लिए अखिल भारतीय तकनीकि शिक्षा परिषद्, नई दिल्ली ने 5 मार्च 2010 को सम्पूर्ण भारत में तकनीकी शिक्षा हेतु शिक्षकों एवं अन्य पद पर नियुक्त के लिये सरकारी गजट एफ.नम्बर 37-3 / लीगल / 2010 जारी किया, जिसके अनुसार भी किसी भी संस्थान में निदेशक पद के लिए 03 वर्ष का प्रोफेसर का अनुभव अनिवार्य किया गया। लेकिन आईपीएन के सूत्रों के मुताबिक कमला नेहरू प्रद्यौगिक संस्थान में एक ऐसे निदेशक केएसवर्मा की नियुक्ति की गयी थी, जिसकी कार्यभार के समय उम्र 43 वर्ष, 09 माह, 27 दिन तथा प्रोफेसर का अनुभव मात्र 01 वर्ष, 03 माह, 09 दिन था।

प्रदेश सरकार द्वारा संस्थान के सर्वोच्च पद पर इस प्रकार की नियुक्ति एक गम्भीर अनियमितता की, जो उच्चस्तरीय जाँच का विषय है, परन्तु प्रकरण को लगातार दबाया जा रहा है। यहाँ तक कि केएस वर्मा का कार्यकाल जनवरी 2013 में समाप्त भी हो गया लेकिन दबंगई और राजनैतिक पकड़ की वजह से आजतक पद पर बने हुये हैं। नियमानुसार कार्यभार समाप्त होने के 06 माह पूर्व ही प्रशासनिक नीति-निर्णय के अधिकार समाप्त हो जाते हैं। यह शर्त सेवानिवृत्त होने पर भी लागू होती है, परन्तु केएस वर्मा पर यह भी लागू नहीं होता, क्योंकि आगामी 10 अक्टूबर को संस्थान के निदेशक पद के लिए साक्षात्कार का जो समय निर्धारित हुआ है, उसके चयनसमिति के सदस्यों का निर्धारण भी कार्यवाहक निदेशक एवं उम्मीदवार केएस वर्मा ने स्वयं किया है।

28  सितम्बर 2014 को संस्थान में प्रदेश सरकार के प्राविधिक शिक्षा मंत्री शिवाकान्त ओझा के दौरे को लेकर कार्यवाही किये जाने के भी संकेत मिले थे, लेकिन दौरे के बाद किसी प्रकार की कार्यवाही का कोई सुराख नहीं है। जबकि मंत्री जी के दौरे को लेकर संस्थान के शिक्षकों एवं कर्मचारियों का एक गुट लामबंद होता नजर आया था, लेकिन मंत्री जी के सामने ‘बिल्ली के गले मे घंटी कौन बाँधे ?’ वाली कहावत ही सामने आयी। केएस वर्मा के राजनैतिक रसूख के आगे कर्मिकों ने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी और मामला वहीं का वहीं दबाने में केएस वर्मा की लाबी सफल हुई, जबकि उस समय वर्मा संस्थान में उपस्थित नहीं थे। कई शिक्षकों एवं कर्मचारियों ने केएस वर्मा के भ्रष्टाचार को अनेकों बार उच्चस्तर तक पहुंचाया भी है, परन्तु उन्हें यातना ही झेलनी पड़ी है। जैसे दिवाकर जोशी एवं कमलेश कुमार को केएस वर्मा ने बिना किसी आरोप के निलम्बित भी कर दिया था। यही नहीं सहायक आचार्य आरुणी सिंह को कार्य करने के बाद भी 09 माह तक वेतन ही नहीं दिया गया।

केएनआईटी, सुल्तानपुर में कोई भी शिक्षक प्रताड़ित किए जाने के डर से कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुआ। हालांकि नाम न छापने की शर्त पर इस मामले और इसके साथ अन्य कई भ्रष्टाचार के मामलों में कार्यवाहक निदेशक के संलिप्त होने की बात साक्ष्यों के साथ ऊजागर की गयी, लेकिन जब कार्यवाहक निदेशक केएस वर्मा से इस सम्बन्ध में जानकारी चाही गयी तो हफ्तों के टालामटोली के बाद भी उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला।

लखनऊ से योगेन्द्र श्रीवास्तव की विशेष रिपोर्ट.

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