जब तक चुनावी नुक़सान नहीं, तब तक बीजेपी सावधान नहीं!

दिलीप खान-

किसानों का अभूतपूर्व आंदोलन हो रहा है और बीजेपी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. वजह? वजह साफ़ है कि नरेन्द्र मोदी की बीजेपी को इससे ख़ास चुनावी नुक़सान नहीं हो रहा है. पंजाब में बीजेपी वैसे भी कमज़ोर है. हद से हद सफ़ाया हो जाएगा.

बीजेपी के एक राष्ट्रीय सचिव मुझसे कह रहे थे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को 38-39 सीट का नुक़सान हो सकता है, लेकिन पूर्वी यूपी में राम मंदिर से इस नुक़सान की भरपाई हो जाएगी.

यही वो आत्मविश्वास है जिससे बीजेपी हर जनांदोलन को अनसुना करने की ज़ुर्रत करती है. जब तक उसे सीधा चुनावी नुक़सान नहीं दिखेगा, तब तक वह आंख फेरकर रहेगी. 2017 में जीएसटी के हंगामे के बीच सूरत में व्यापारियों ने मोर्चा खोल रखा था. व्यापारियों को मरहूम जेटली ने 5% रेट का झुनझुना थमाया और उस एक शहर ने बीजेपी को सत्ता में पहुंचा दिया. यानी, जहां लगा कि थोड़ा झुकने से काम चल जाएगा, वहां बीजेपी झुकी.

बेरोज़गारी जैसे आंदोलन का कोई राजनीतिक ठिया नहीं है. लोग आक्रोशित है, लेकिन उतने ही इस बात से उत्साहित हैं कि देश में हिंदुओं की ‘चलने’ लगी है. छात्रों के हितों पर जब सीधी चोट पहुंचती है तो ‘उस दौरान’ सरकार से सवाल होता है. लेकिन आप देखिए उसी तबक़े (किसान, बेरोज़गार, छात्र) की बड़ी आबादी हमेशा इस फिराक में बैठी रहती है कि कोई ऐसा तथ्य मिल जाए, जिससे मोदी का बचाव भी हो जाए और उनका नुक़सान भी न हो.

ये जो सॉफ़्ट कॉर्नर है वही मोदी के वोट में ट्रांसलेट होता है. राजनीतिक चेतना एक आंदोलन से तैयार होती है, लेकिन उसे लगातार मज़बूत करना होता है. वरना, बीजेपी उस चेतना में अपना चेतक दौड़ाती जा रही है.

सीधा मामला है जब तक चुनावी नुक़सान नहीं, तब तक बीजेपी सावधान नहीं.

किसान आंदोलन के बीचो-बीच बीजेपी बंगाल में एकतरफ़ा और असम में आसान जीत हासिल करने जा रही है. उसे क्यों फिक्र होगी किसानों की?


CPM काडर आधारित पार्टी है. किसी एक रैली में लाखों जुटा सकती है. अभी-अभी जुटाया भी. दूर शहर में बैठे लोगों को उस एक रैली से लहर दिखने लगी. लेकिन इस बार वाम और कांग्रेस के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस भी साफ़ हो रही है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने 5-6 साल में जो किया है उसकी फ़सल तैयार हो चुकी है. जो हालत है उसमें बीजेपी इस बार 294 में से 200 या उससे ज़्यादा सीटें जीत सकती है. ऊपर से चुनाव आयोग ने 8 चरण में वोटिंग करवाकर बीजेपी की राह और आसान कर दी है.

बीजेपी को क्यों किसानों, मज़दूरों, बेरोज़गारों, छात्रों, दलितों, आदिवासियों या किसी भी फिक्र होगी? हिंदू जगाने वाली ताबीज बांटकर चुनाव जीतने का सरल रास्ता है उसके पास. वाम और कांग्रेस अपने को तृणमूल का मज़बूत विपक्ष साबित करने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं, इसलिए विपक्ष का ज़्यादातर वोट ममता के ख़िलाफ़ बीजेपी को जा रहा है.

रिजल्ट आने के बाद चौंकिएगा नहीं और न ही EVM की याद दिलाइएगा. बंगाल दरक गया है.

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