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सुख-दुख

सिगरेट शराब तंबाकू से दूर दूर तक कोई नाता नहीं रखने वाले शख़्स को हुआ फोर्थ स्टेज कैंसर!

Yashwant Singh-

जीवन नश्वर है। ये हम लोग बार बार भूल जाते हैं और जीवन बार बार हमको विविध तरीकों से यही बात याद दिलाता रहता है। मेरे बड़े भाई तुल्य एक शख़्स का आज ये मैसेज आया। मैं शॉक्ड! इन्होंने कभी एक पान तक न खाया होगा। सिगरेट शराब तंबाकू से दूर दूर तक कोई नाता नहीं। बहुत ही अनुशासित जीवनचर्या! उन्हें देखकर मैं कभी सोच नहीं सकता कि इन्हें कभी कोई रोग होगा! और हुआ तो सीधे फोर्थ स्टेज कैंसर! उसमें भी कैंसर का प्राइमरी सोर्स अभी तक पकड़ में नहीं आया!

“कोई बात नहीं
बेस्ट ट्रीटमेंट चल रहा है
बाकी ईश्वर के हाथ में है!”

उनकी लिखीं ये तीन लाइनें उम्मीद बँधाती हैं। वे स्वस्थ हो जायेंगे, ये भरोसा-विश्वास है हम सबको।

उनका नाम डिस्क्लोज नहीं कर रहा हूँ क्योंकि उन्होंने अभी अनुमति नहीं दी है। घर परिवार पद प्रतिष्ठा से मजबूत हैं। इसलिए पैसे के संकट जैसी कोई बात नहीं है। पर सबसे बड़ी चिंता तो यही है कि कैंसर ने सच में महामारी का रूप ले लिया है। ये कब किसे क्यों कितना हो जाएगा, कुछ नहीं कह सकते।

आज ही दूल्हे की घोड़े पर बैठे बैठे मौत का वीडियो सबने देखा। हार्ट फेल भी महामारी हुआ पड़ा है। कभी कभी ख़ुद पर से ही यकीन उठता लगने लगता है। ख़ुद को झिंझोड़ कर यकीन कराना पड़ता है कि ज़िंदा हूँ मैं!

सच में अब पल भर की ही जिंदगानी है सबके पास!


डॉ पथिक-

सडन डेथ के जितने भी विडियोज देखने को मिलते हैं उन विडियोज में एक बात कॉमन है, डीजे अथवा लाउड स्पीकर की तेज आवाज जो हृदय को कंपित करने वाला शोर शराबा पैदा करती है।

आजकल ये नाचते गाते घोड़ी पर चढ़ते लोग जिस प्रकार मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं ऐसा पहले नही होता था। अत्यधिक शारीरिक श्रम करते लोग भी आजकल मृत्यु का वरण कर रहे हैं ये भी चिंतन बात है। पुलिस अथवा फौज की भर्ती हेतु लगाई गई दौड़ में कुछ युवा मृत हुए हैं।

अब जिसे इंजेक्शन लगना था वो तो लग चुका है उसका कुछ नही किया जा सकता। सांप के निकलने के बाद लकीर पीटना अनुचित है।

खैर ऐहतियात के लिए जो बातें हमें ध्यान रखना है उनमें से मुख्य बात है कि तेज आवाज कानफोडू संगीत के आसपास नहीं जाना है। किसी के विवाह में जाने से भी परहेज करें। कहीं ऐसा न हो कि आप जाएं किसी दूसरे की सुहागरात मनवाने और इधर आपकी तेरई हो जाए।

और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगले 2- 5 साल तक हमें औकात से ज्यादा शारीरिक श्रम नही करना है। बल्कि मैं तो कहता हूं कि यौन संबंध को छोड़कर किसी भी प्रकार के शारीरिक श्रम से हमें परहेज करना चाहिए।

अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए सबके दाता राम।।


शांता तिवारी- भाई साहब! सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा, पान, शराब का सम्बन्ध कैंसर से कितना है यह आज तक नहीं समझ सकी हूँ और यह भी कि जिनको शराब से लेकर ऊपर लिखी हर चीज में डूबे देखा है उन्हें तो कैंसर से मरते आज तक नहीं देखा, हाँ मेरी माँ और मेरे हमसफ़र जो इन चीजों की चर्चा तक त्याज्य मानते रहे, जो आजीवन विशुद्ध शाकाहारी रहे और जिनकी सुबह की शुरुआत ही जीवन भर तुलसी दल और नीम की दातून से होती रही उन्होंने सीधे फोर्थ स्टेज कैंसर का सामना किया… ईश्वर की लीला छोड़ कुछ और नहीं मान पाती हूँ मैं किसी भी बीमारी को । कैंसर तो फिलहाल इस सदी का सबसे बड़ा अभिशाप बनकर उभर रहा है, ईश्वर जाने आगे कैसा समय आएगा…मुझे तो आपाधापी भरे जीवन और अत्यधिक आबादी के दबाव में जहरीले पानी और कीटनाशकों के मेल से तैयार सब्जियाँ, जीवन में केमिकल्स का दवाईयों से लेकर डिब्बा बन्द खाद्य पदार्थों के रूप में बढ़ता प्रवेश, जल से लेकर वायु तक में घुल चुका भयंकर प्रदूषण ही पहला कारण समझ में आता है जो सीधा सादा जीवन जीने वाले लोग आसानी से ऐसी भयानक बीमारियों की चपेट में आते जा रहे … बाकी क्या ही कहा जाए, परिजनों का दुर्भाग्य कह सकते हैं या प्रारब्ध का परिणाम… जो भी हो हम सब विवश हैं!

संतोष सिंह- सच में आशंका तो रहती है कि हम सब की जिंदगी क्षणभंगुर है. पर डर सिर्फ बच्चों को देखकर लगता है कि उनकी जिम्मेदारी अभी पूरी होनी है. बाकि खुद के लिए कभी डर नही लगता.. दोस्त के लिये प्रार्थना और दुआएँ कि जल्द स्वस्थ हों!

अनुराग शुक्ला- खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरी कैंसर को विस्फोटक बना रहा है। दूध, मसाले, आटा, तेल, घी, फल-सब्जियां कुछ भी नहीं छोड़ा है। रुपयों के लालच में मिलावटखोर कैंसर उत्पन्न करने वाले केमिकल धड़ल्ले से लोगों को खिला रहे हैं। न तो उन्हें उसके असर की जानकारी है और न ही अनुपात की। सरकारों और अधिकारियों को कुछ फर्क ही नहीं पड़ता। मीडिया की तो बात ही छोड़ दीजिए। सोशल मीडिया की खबरों से लोग जरूर समझने-डरने लगे हैं पर बचें कैसे? कोई रास्ता ही नहीं दिखता। बड़े लोग तमाम चोचलेबाजी कर बचने का दंभ भरते हैं लेकिन मर वो भी रहे हैं।

H Ansari- मिलावटखोरी, और पिसे हुए मसाले या खड़े मसाले में मानक से ज़्यादा केमिकल इस्तेमाल करना भी इसका बहुत बड़ा कारण है। हमारे गांव में एक ही परिवार के दो लोग लीवर कैंसर से मर गए जोकि बहुत मेहनती किसान थे। उनके घर में सब्जी मसाले में mdh गोल्डी मसाला बहुत इस्तेमाल होता था।

Sudeept Kumar- इंसान ही इंसान का दुश्मन बना बैठा है। हम अपनी नस्लों को खत्म करने की सुपारी लिए बैठे हैं। आज बाजार में बिकने वाला हर खाद्य पदार्थ, स्ट्रीट फूड से लगाया पांच सितारा तक में बनने वाले फूड आइटम्स कैंसर के वाहक हैं। किसी को भी कभी भी हो सकता है। वजह भी हमारे ही भेष में बैठे मुनाफाखोर हैं।

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