अनुराधा बेनीवाल-
कैंसर के कारणों का अभी तक सही से पता नहीं लगा पाया है इंसान। पापा ने कभी सिगरेट शराब को हाथ नहीं लगाया, बाहर का खाना नहीं खाया, ऑर्गैनिक सब्जियां, घर का दूध दही, योग, ध्यान, प्राणायाम सब किया। कैंसर से पहले उन्होंने कभी अंग्रेजी दवाइयाँ नहीं खाई। इसका मतलब ये नहीं है के उन्हे “अच्छी” लाइफस्टाइल का ये फल मिला। इसका मतलब ये है के उन्हे जब कैंसर हुआ तो वो उससे लड़ पाए। उनके अंदर उससे लड़ने की ताकत थी।
सिर्फ खान-पान, रहन-सहन ही हमारा लाइफस्टाइल नहीं बनाते, हमारे विचार, हमारे आस पास वाले लोग, हमारे बचपन के traumas, हमारी टेंशन, हमारे दुख-सुख, हमारा अंहकर, हमारा लालच, हमारी ईर्ष्या, हमारी वासना, हमारा डर, ये सब मिल कर मिल कर हमें बनाते हैं। जितना नुकसान एक सिगरेट कर सकती है, उतना ही जलन हमे जला सकती है। मुझे पक्का नाप-तोल नहीं पता, लेकिन हमारे डर और टेंशन हमारा हाजमा खराब कर सकते हैं। हमारे मेंटल स्टेट का सीधा असर हमारे शरीर पर होता है।
कैंसर नई बीमारी नहीं है, बस अब पता चल जाता है। लिवर कैंसर को लोग पीलिया समझते रहे और मरते रहे। इससे डरने की जरूरत नहीं, इसे समझने और सही से इलाज करवाने की है। अच्छा लाइफस्टाइल होगा तो लड़ने की ताकत मिलेगी।
कीमो को लेकर हमारे आस-पास ढेरों गलतफेमियाँ हैं। कुछ लोगों को लगता है के कैंसर से ज्यादा खतरनाक कीमो है। प्लीज इसपर रिसर्च करें और इलाज से ना डरें। कीमो के साइड एफएक्टस को नजदीकी से देखते रहें और बिल्कुल इग्नोर ना करें।
कुछ जरूरी चीजें – कीमो कराने के बाद आपको रेगुलर CBC करवाना होगा, व्हाइट ब्लड सेल्स का घटना एक बड़ा सिम्प्टम है और इसे इग्नोर करना जानलेवा हो सकता है। लेकिन अगर आप रेगुलर चेक करेंगे और डॉक्टर की सलाह को फॉलो करेंगे तो ये बिल्कुल मैनेजेबल है।
बाल झड़ना आम है। ट्रेटमेंट खत्म होने के बाद वापस आ जाते हैं। बिल्कुल टेंशन ना लें।
बुखार इग्नोर ना करें। थोड़ा बुखार हर बार होगा लेकिन तेज़ बुखार इन्फेक्शन का साइन हो सकता है, एकदम से डॉक्टर की सलाह ले। बिल्कुल इग्नोर ना करें। दिन मे दो-तीन बार बुखार चेक करें।
मुह में छाले, मसूढ़ों का छीलना हो सकता है, जिससे खाने में दिक्कत आ सकती है। उसके लिए बताई गई दवाई खाएं और लिक्विड खाना खाएं। खाना जरूरी है चाहे भूख हो या ना हो। शरीर को लड़ने की ताकत चाहिए होगी। प्रोटीन, प्रोटीन, प्रोटीन जितना हो सके उतना खाएं। अपनी CBC रिपोर्ट डॉक्टर को भेजें और सलाह लेते रहें।
असिडिटी और उलटी आना कीमो के बाद आम है। असिडिटी की दवाई लें, ज्यादा उलटी आए तो उसकी भी दवाई लें और खूब सारा लिक्विड पियें।
चीनी से दूर रहें! हो सके तो किसी भी तरह आर्टफिशल का मीठा ना खाएं।
हड्डियों में दर्द होगा, पैन्किलर खाएं और आराम करें। जब भी थोड़ा बहुत चल पाएं, नाच पाएं, या एक्सर्साइज़ कर पाएं, करें।
पापा कीमो के दौरान भी लगातार प्राणायाम करते रहे। रोज एक-डेढ़ घंटा। वो बार-बार इसकी जरूरत पर अभी भी जोर डालते हैं, और आज भी रोज करते हैं।
परिवार दोस्तों के साथ बैठ कर हंसी मज़ाक करें, गेम्स खेलें, गाना सुने, कहानियाँ सुनाएं। हमने कभी टीवी नहीं देखा, पापा को लगता है के उनकी एनर्जी टीवी देख कर खर्च होती है, आप देखें आपको कैसा लगता है। एनर्जी बचाएं।
चिड़ होगी, डर लगेगा, भाग जाने को मन करेगा। बीमार का ध्यान रखना, खास करके जब आप भावनात्मक रूप से उसके साथ जुड़े हों बिल्कुल आसान नहीं है। मुझे अस्पताल के अलावा कहीं भी जाना अच्छा लगता था। बस कहीं भी चले जाना, जहां बीमार और बीमारी की बात ना हो। मैं और बहन (आशु) एक दूसरे को ब्रेक देते रहे। हम दोनों अपने दोस्तों से मिलने चले जाते या कहीं घूम आते, ताकि वापस आकर और ताकत के साथ काम कर सकें। ब्रेक लेना बहुत जरूरी है, बिल्कुल गिल्ट ना महसूस करें। आशु को वर्काउट करके एनर्जी मिलती है वो समय मिलने पर (चाहे रात दस बजे!) एक घंटा म्यूजिक लगा कर जरूर वर्काउट करती थी। खुद को बचाना बेहद जरूरी है। ब्रेक लें और ब्रेक दें। ना गिलट महसूस करें, ना करवाएं।
नेगटिव बात करने वालों और रोने वालों से बहुत बहुत दूर रहें। चाहे जीवन लंबा नहीं हो पाएगा लेकिन जितना होगा बेहद सुखद होगा। हमें लगता था के चाहे हमारे पास सिर्फ छः महीने हैं हम उन्हे पूरा जी लें और सुंदर यादे बना लें। एक दूसरे के साथ का कोई मोल नहीं है।
Love. Fight. Win.
- पापा की आज सुबह की तस्वीर… कैंसर मुक्त होने के सात महीने बाद।

कैंसर और हम
जब पहली बार डॉ पंकज ने पापा के लक्षण (हाजमा खराब, वजन कम और खून की कमी) सुन कर हिंट दिया के कुछ बड़ा हो सकता है, हमें कैंसर शब्द सुनने, बोलने और सोचने में भी डर लगता था। पापा ने एन्डॉस्कापी कराने से मना कर दिया और कहीं हमारे दिल में भी रहा के नहीं हाजमा ही खराब है बस, एक बार वो ठीक हो जाए, खून भी बढ़ जाएगा और वजन भी। – डिनाइअल – हम मानना या सोचना भी नहीं चाहते थे के कुछ कैंसर जैसा हो सकता है। तो एन्डॉस्कापी नहीं कारवाई, और जिस चीज का पता फरवरी में लग सकता था उसका पता सितंबर में लगा। मैं काफी समय तक खुद को दोष देती रही के क्यूँ पापा को और फोर्स नहीं किया।
PET स्कैन के बाद जब कैंसर और उसका फैलना कन्फर्म हुआ तब मैं “कैंसर” शब्द ना बोल पा रही थी, ना लिख पा रही थी। मैं ट्यूमर बोलती/लिखती रही। “C” अक्षर लिखने में मेरे हाथ कांप जाते थे। मैंने कैंसर बोलना और लिखना तब तक शुरू नहीं किया जब तक पापा ठीक नहीं होने लगे। – डर – हव्वा – टैबू।
पापा का इलाज गुड़गाँव में होता था, हम गाँव (तीन घंटे दूर) में रह रहे थे। हर इक्कीस दिन में जाना होता था, कई बार बीच में भी अगर कुछ चेकअप होना हो तो। पापा अस्पताल के बेड पर थे और डॉक्टर इलाज कर रहे थे। हमारे हाथ में ना कुछ था, ना हम कुछ चाह कर भी कर सकते थे। लेकिन हमारा सांस लेना जरूरी था, पापा को ड्राइव कर के अस्पताल लेकर जाना, डॉक्युमेंट्स साइन करना, दवाइयाँ ले कर आना, नर्स को बुलाना, खाना ले कर आना, हर दूसरे दिन इन्जेक्शन लगवा कर लाना, हर हफ्ते ब्लड चेकअप कराना, किडनी लीवर चेकअप कराना, रोज शुगर चेक करना, ईमर्जन्सी के लिए तैयार रहना, डॉक्टर से बात करना, अस्पताल में रूम बुक करना (फोर्टिस में सिंगल कमरा मिलना नामुमकिन जैसा है, घंटों ऑफिस के बाहर बैठ कर मिन्नत करनी पड़ती है), बिल अदा करने की लाइन (1-2 घंटा) लगना और इस सारे प्रोसेस में पापा अकेले भी ना रहें उनके साथ किसी का होना। हम ज्यादातर तीन जन अस्पताल में हर समय मौजूद रहते थे फिर भी लगता था के कम हैं। दोस्तों का उस समय आ कर हाथ बटाने की कोई कीमत नहीं तय की जा सकती। वो जब साथ बैठ कर चाय पी लेते, या घर से कुछ अच्छा बना कर ले आते, या बाहर की दुनिया की कोई बात कर लेते, तो थोड़ी देर के लिए ध्यान बट जाता, आराम मिल जाता और हम आगे के लिए तैयार हो जाते। बीमार को तो डॉक्टर ठीक करेगा लेकिन उसके घर वालों की आप बहुत मदद कर सकते हैं। इससे पहले मुझे लगता था के कोई बीमार है तो मेरे जाने से क्या होगा? फालतू भीड़ होगी। लेकिन नहीं, कोई आ कर रोए ना, बाहर की बात कर ले, चाय पिला दे, खाना खिला दे, “हाय ये क्या हो गया” ना कहे, आपको गले लगा ले, सब ठीक हो जाएगा कह दे, बस कह भर दे, तो घर वालों को जरूरी साँसे और हिम्मत मिल जाती है। जब कोई दोस्त मैसेज भी कर देता के “सब ठीक होगा, मैं साथ हूँ” तो लगता जैसे सच में सब ठीक हो जाएगा। – साथ – दोस्ती – एक दूसरे की जरूरत – ये सब बेशकीमती है। मैंने ऐसे बेशकीमती दोस्त बनाए हैं।
फोर्टिस में इलाज – हमें नहीं पता था के कहाँ इलाज करवाना है, या कहाँ इलाज करवाना चाहिए। इस दौरान ये अनुभव हुआ के या तो डॉक्टर के फसो मत (जरूरत ना पड़े) और फसो तो बेस्ट के फसो! जब अप्रैल में एक छोटे प्राइवेट अस्पताल में पापा का अल्ट्रा साउन्ड और सीटी स्कैन हुआ उनका खून (hb) चार रह गया था, डाक्टरों ने उन्हे चार दिन में छुट्टी दे दी, बिना कुछ कहे सुने। तब बीमारी उनके शरीर में थी, रेपोर्ट्स में नहीं आई, या तो गलत रेपोर्ट्स बनी या मशीनें पुरानी/खराब थी। जिस बीमारी का अप्रैल में पता लग जाना चाहिए था उसका पता छः महीने बाद लगा। पापा गूगल में सर्च कर के अस्पताल चले गए थे। ऐसा ना करें प्लीज।

पापा की पहली बाइआप्सी रिपोर्ट गलत आई थी, ऐसा होने के चांस सिर्फ एक पर्सेन्ट होते हैं। जो कैंसर उन्हे गलत रिपोर्ट में बताया गया था वो कहीं ज्यादा खतरनाक था। मैं अस्पताल को गलत रिपोर्ट देने के लिए सू नहीं कर सकती, गलती का स्कोप हर जगह होता है, लेकिन आप आखिर तक चमत्कार का इंतज़ार करें। अगर पैशन्ट में हिम्मत है, जान है, जीने की इच्छा शक्ति है तो उसका साथ दें। खूब रिसर्च करें और अनुभवी स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास जाने की कोशिश करें। लोगों से बात करें, रेफ्रन्स लें। डॉ हर्षवर्धन ने हमें गाइड किया और हम उनके दिखाए रास्ते पर चले। सबके पास डॉ हर्षवर्धन नहीं होंगे लेकिन अपनी तरफ से जांच पड़ताल करने की पूरी कोशिश करें, दोस्तों को बताएं/पूछे, मदद लेने में बिल्कुल ना हिचकिचाएं। मैं डॉ हर्षवर्धन को नहीं जानती थी, आज तक मिली भी नहीं, मिली तो मैं अभिषेक जी से भी नहीं, लेकिन मैंने सबको फोन घुमाये और बिना शर्म के मदद की गुहार लगाई। – रिसर्च – Sometimes the bravest thing you can do is, ask for help.
खर्च – जितना हमें बताया गया था उससे कम हुआ। बहुत सारे तरीके हैं दवाइयों को आधे से भी कम दामों में अक्वाइअर करने के। हम पहली बार केमिस्ट के दस पर्सेंट डिस्काउंट देने पर खुश हो गए थे वो डिस्काउंट जान पहचान निकलते निकलते पचास से सत्तर पर्सेंट तक आ गया। कैंसर में डॉक्टर की फीस से ज्यादा महंगी दवाइयाँ होती हैं। कीमो (रसायन) एक तरह की नहीं होती, जैसे कैंसर सब एक नहीं होते। बहुत सारे कैंसर एकदम ठीक हो जाते हैं, बहुत के साथ लंबा जीवन जिया जा सकता है, बहुत खतरनाक वाले भी अच्छे इलाज और साथ से कम कष्टदायक हो सकते हैं, जितना जीवन बचा है उससे सुख से जिया जा सकता है। कैंसर के इलाज के लिए सरकार जरूरतमंदों को पाँच लाख तक की मदद देती है। प्लीज खूब सारी रिसर्च करें, मदद मांगे और हिम्मत ना हारें। जानती हूँ कहना आसान है और हिम्मत बार-बार टूटती थी लेकिन और कोई चारा नहीं है।
हौंसला – हर थोड़ी देर के बाद ब्रेकडाउन होता है। आप डॉक्टर से बात करके आए होते हैं और एकदम से सांस रुकने लगती है, और लगता है के आपकी जान पहले निकलेगी। पापा के साथ हंस रहे होते हैं और कमरे से बाहर निकल कर लगता है सांस गले में अटक गई हैं और आप दहाड़े मार कर रोने लगेंगे। आपके आस-पास वाले आपको उस समय में गले लगा सकते हैं, गिरने से रोक सकते हैं और पानी पिला सकते हैं। आप किसी भी हालत में पैशन्ट के सामने नहीं टूट सकते। नींद नहीं आएगी और आप पूरा समय सोचते रहेंगे के ऐसा क्यूँ हो रहा है, मेरे साथ ही क्यूँ हो रहा है। लाइट बंद करके सांस लेने की कोशिश कर सकते हैं, लंबी वाक करने जा सकते हैं, पैशन्ट के साथ बैठ कर उस समय को पूरा जी सकते हैं। मुझे हिम्मत मिलती थी survival ब्लॉग्स से, उन लोगों की कहानियाँ पढ़ के जिन्होंने कैंसर को हराया, चमत्कारी कहानियाँ पढ़ के, मैं ढूंढ-ढूंढ कर कैंसर survivors की कहानियाँ पढ़ती और हिम्मत बटोरती। अगर लाखों में एक इंसान भी बचा है तो मुझे लगता के मेरे पापा वही होंगे। मैं सोचती थी के एक दिन मैं भी पापा की सर्वाइवल कहानी लिखूँगी।
मैंने उन लोगों को भी ढूंढा जो कीमो करवा चुके हैं, उनसे कीमो के साइडअफेक्टस के बारे में पूछा। अगर कोई सेम चीज़े इक्स्पीरीअन्स कर चुका है और ठीक हो चुका है तो वहाँ से हिम्मत मिलती है, डर कम लगता है। कीमो से व्हाइट ब्लड सेल घट जाते हैं, उन्हे बढ़ाने के लिए इन्जेक्शन लिए जाते हैं, उन इन्जेक्शन से हड्डियों में इतना दर्द होता है जैसे टूट रही हैं। लेकिन ये सिर्फ साइड अफेक्ट है ठीक हो जाता है। बालों का गिरना आम है। मैंने पापा का सर खुद शेव किया, बाल गिरने से पहले। उनके साथ बिताया हर पल, उनके लिए किया गया कोई भी काम नेमत जैसा था। मैं डीटेल में साइड-अफेक्टस के बारे में लिखूँगी कभी। शायद किसी ब्लॉग पर कोई पूछना चाहे तो मुझे ईमेल भेज सकता है।
कीमो के बाद कोविड 19 जैसा हाइजीन बरतना होता है। इम्यूनिटी लो हो जाती है और कई बार इंसान कैंसर की बजाए किसी और बीमारी से मर जाता है।
डिप्रेशन, चिड़, निराशा और एंजाइटी, कैंसर के ही बाल बच्चे हैं, ये सब आयेंगे, आपको उन लोगों का साथ चाहिए होगा जो आपको यहाँ से बाहर निकलने में मदद कर सकें। एक दूसरे के साथ हंसते रहना, रोते भी रहना, लेकिन हंसते भी! म्यूजिक चला कर नाचना, एक्सरसाइज करना, पेट्स के साथ खेलना, त्योहार मनाना, चाय बना कर पीना, सूरज को छिपते देखना, चिड़ियों को सुनना… जो अच्छा लगे और ऊर्जा दे ऐसा सब करना।
मेहमानों और रिश्तेदारों को एनर्टैन मत करना। आप एक जंग लड़ रहे हैं, आपको मेहमान नवाजी ना करने की इजाजत है। सिर्फ मिलने आ कर चाय नाश्ता कर कर, “गलत किया भगवान ने!” कह कर जाने वाले लोगों से बचना। आपको बहुत सारी ताकत की जरूरत होगी, मिलेगी कम, बचानी ज्यादा होगी।
मेरे लिए ये सुनना के, “हाय ये क्या हो गया, नहीं होना चाहिए था, उम्र ही क्या थी, हेल्दी लाइफस्टाइल था, कैसे हो गया ये सब, क्यूँ हो गया.. हाय तुम बेचारे.. ट्इच ट्इच ट्इच..” सबसे बड़ा ट्रिगर था। ये सुन कर मैं पूरा दिन नहीं उभर पाती थी। मैंने उन सब लोगों से बात करना बंद कर दिया जो ऐसा बोलते या बोल सकते थे।
मैं सुनना चाहती थी, “कोई बात नहीं अनु मस्त लाइफ जी है पापा ने और भी जितनी जियेंगे मस्त जियेंगे!”
कहानी – एक आदमी को देर रात एक जरूरी काम के लिए घर से निकलना पड़ा। अमावस की रात थी, रास्ते में जंगल था। आदमी का पैर फिसला और वो पहाड़ी से जैसे गिरता गया, उसने चट्टान और पेड़ों को पकड़ लिया। रात गहराती गई, ठंड बढ़ती गई, उसके हाथ छिल गए, वो किसी तरह नाखूनों को पत्थरों में गाड़े टंगा रहा। एक समय आया जब उसके हाथ सुन्न हो गए, अब वो और नहीं कुछ पकड़ सका। नीचे गिरा और ये क्या छः इंच नीचे जमीन थी। लेकिन अंधेरे में उसे नहीं दिखा, और वो डर के मारे लहूलुहान हालत में लटका रहा। जिसे नहीं जानते उसका डर होता है…. मौत भी शायद छः इंच नीचे जमीन है, जिसका पता नहीं है, और जिससे बचने के लिए इंसान लहूलुहान कई बार जीवन से चिपका रहता है। जीवन खूबसूरत है लेकिन शायद मौत भी खूबसूरत है बस हमें नहीं पता। – इस कहानी को मैं बार-बार पढ़ती थी और सबको सुनाती थी।
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