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‘समय संज्ञान’ पत्रिका में बौद्ध अध्येता और वरिष्ठ पत्रकार चंद्रभूषण जी का साक्षात्कार पढ़ें!

चंद्रभूषण-

बौद्ध अध्येता चंद्रभूषण से एक बातचीत (‘समय संज्ञान’ पत्रिका में कुछ दिन पहले छपा इंटरव्यू)

[चंद्रभूषण ने बुद्ध के धर्म पर कई किताबें लिखी हैं. जिनमें हैं—‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’, ‘बुद्धचरित और महाकवि अश्वघोष’ और ‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’. फिलहाल वे भारत में वज्रयान पर जगह-जगह घूमकर शोध कर रहे हैं. चंद्रभूषण का महत्व इस बात में है कि इन्होंने भारत, नेपाल और तिब्बत के ज़िंदा बौद्धों की फील्ड स्टडी करके बौद्ध धर्म के बदलते हुए स्वरूप को महसूस किया. इसलिए किताबी बुद्ध और जिंदा बुद्ध के अंतरालों को समझने के लिए चंद्रभूषण जी से बात करना जरूरी लगा. – संपादक]

वेद प्रकाश—सबसे पहला सवाल तो मैं यह पूछना चाहता हूँ कि आपको बुद्धिज्म में अचानक दिलचस्पी कैसे जगी?

चंद्रभूषण—यह अचानक जैसा मामला नहीं है. भारत में जो प्रगतिशील लोग हैं, उनके अंदर बुद्धिज़्म के प्रति थोड़ा बहुत आकर्षण होता है. लेकिन दिक्कत यह है कि हमारा जो कॉमन सेंस है और जो चीजें हम आमतौर पर बुद्ध के बारे में पढ़ते हैं वो चीजें बुद्ध से विरत करती हैं, बुद्ध से दूर ले जाती हैं. आप कह सकते हैं कि मेरा बुद्धिज्म से पर्सनल जुड़ाव, ठोस रूप से तब बना, जब मुझे तिब्बत जाने का मौका मिला। उस समय, थोड़े अंतराल के लिए भारत और चीन के संबंध अच्छे हो गए थे, तो भारत से 5 पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल को तिब्बत देखने के लिए बुलाया गया था. साथ ही 5 पत्रकार नेपाल से बुलाए गए थे. तो उसमें दक्षिण एशिया से कुल 10 लोग थे.

भारत से पहले हम पेइचिङ गए, फिर वहाँ से ल्हासा गए. कुछ दिन ल्हासा में रुके और उसके बाद अरुणाचल प्रदेश से सटा हुआ जो इलाका है निंगठी, दो-तीन दिन हम वहाँ गए. फिर वहाँ से हमें ब्रीफिंग आदि करने के लिए वापिस पेइचिंग लाया गया. यह कुल 10 लोगों का प्रतिनिधिमंडल था. बाकी 9 लोगों में तो मैंने उससे कोई बदलाव नहीं देखा, एक पत्रकार जैसे जाता है घूमने के लिए आनंद करता है, कुछ रिपोर्ट देता है, फिर अगले असाइनमेंट में काम में लग जाता है. लेकिन मुझे उस दौरे ने थोड़ा परेशान किया, भीतर से. परेशान इस मामले में किया कि बहुत तरह से तिब्बत की संस्कृति, ऐसा लगता है कि वह भारत जैसी ही है.

जैसे उनकी जो लिखावट है, स्क्रिप्ट है, चीन की स्क्रिप्ट से उसका कुछ लेना-देना ही नहीं. चीन की स्क्रिप्ट चित्रलिपि है जबकि तिब्बती लिपि टिपिकल अक्षर से बनने वाली है. एकदम भारतीय जैसी लिपि लगती है. उनकी आस्था, बहुत सारे उपासना के ढंग, बहुत सारी चीजें, मतलब इतना सब बदल जाने के बाद भी, कि दलाई लामा को भारत आए पैंसठ साल होने जा रहे हैं, एक औसत तिब्बती का जो जीवन है वह बहुत भारत से बहुत मिलता जुलता है. आपको आश्चर्य होगा कि ये इतनी मिलती-जुलती संस्कृति है लेकिन हम इसके बारे में कुछ जानते नहीं. और यह भी कि यह बौद्ध संस्कृति है और इस समाज में जाति या इस तरह की कोई संकीर्णता नहीं दिखती.

और दूसरी चीज़ यह है कि पूरा मंदिरों का रूपाकार और दूसरी चीज़ें, सारा कुछ ऐसा लगता था कि यह भारत जैसा ही है. मैंने यह सोचा कि चल के तिब्बत पर कुछ काम करूँगा. बहुत सारी चीजें ऐसी थीं जो बिलकुल समझ से परे थीं. जैसे कि पूरी दुनिया में ऐसा कोई समाज नहीं है जहाँ कि पिछले 2000 साल से राजा के अलावा कोई और राज करता हो. हर जगह राजा ही राज करते थे. इसका एक अपवाद रोमन रिपब्लिक है, जहाँ ईसवी सन शुरू होने के कुछ सदी पीछे और आगे चुने हुए प्रतिनिधियों का राज रहा. इसमें दो चुने हुए लोगों को दो साल के लिए राजा जैसी स्थिति में रखते थे. लेकिन इसके अलावा राजा के अलावा कोई और राज करता हो यह मैंने कहीं नहीं सुना.

लेकिन तिब्बत में सैकड़ों साल एक धार्मिक व्यक्ति राज करता रहा. राजा पैदा होने का ढब वहां नहीं बना. भले ही दलाई लामा वहाँ से हट के इधर आ गए हों लेकिन तीन सौ-साढ़े तीन सौ साल से वहाँ दलाई लामा ही राज करते रहे हैं और वे राजकुल में पैदा नहीं होते. यह कैसे है? कैसे ऐसा हुआ? तो ऐसी बहुत सारी उत्सुकताएँ थीं जो कि मुझे परेशान कर रही थीं लेकिन जब मैं वापिस आया तो नौकरी के कामों में उलझ के रह गया. कुछ-कुछ बौद्ध आयोजनों में शामिल होना जरूर होता रहा, जैसे महाबोधि सोसाइटी, जिसका सारनाथ में मुख्यालय है.

उन्होंने मुझे 2016 में बुलाया—’बुद्ध ऐज अ कम्युनिकेटर’, ‘बुद्ध एक संवादकर्ता के रूप में’—विषय पर बात करने के लिए. लोग ऐसे आयोजनों में अपना कुछ लिखा-उखा पढ़ते होंगे, पर मैं तो बुद्ध पर कुछ नहीं लिख रहा था. उस समय मैंने थोड़ी तैयारी की, थोड़ी पढ़ाई की. तो आप कह सकते हैं कि बुद्ध से मेरा जुड़ाव एक मॉडर्न, 21वीं सदी के ढंग का हुआ. शुरुआत यहाँ से हुई, किसी धार्मिक बुद्ध से मेरा कोई जुड़ाव नहीं हुआ.

तो मैंने पढ़ना शुरू किया—एक संवादकर्ता के रूप में बुद्ध की भाषा के बारे में, संवाद के बारे में. रोज़मर्रा के जीवन से उच्चतर ज्ञान के सृजन के बारे में. उन्हें जो बोध हुआ, एक झटके में जो इलहाम होता है उसको कम्युनिकेट कैसे किया है. एक झटके में आपको कोई चीज़ समझ में आई, उसको कैसे संवाद में लाया जाए, ऐसी कई बहुत कठिन चुनौतियाँ हैं जो कि मॉडर्न कम्युनिकेशन के सामने हैं ही नहीं. मॉडर्न कम्युनिकेशन के सामने क्या ये चुनौती है कि किसी को इलहाम हो गया तो वह कैसे लोगों को बताए? यह चुनौती कैसे आएगी, इसलिए कि आखिरी बार इलहाम तो मोहम्मद साहब को हुआ था, उसके बाद तो किसी को इलहाम नहीं हुआ या बोध नहीं हुआ.

लेकिन बुद्ध इन सारी चीजों के बारे में बात करते हैं और सबसे बड़ी चीज़ यह कि वे कहते हैं कि भाषा व्यवहार से ऊपर उठती है. भारत जैसे देश में जहाँ हम लोग सबसे पुरानी भाषा संस्कृत को मानते हैं, उसको देववाणी कहते हैं. बुद्ध इस चीज़ को ही खंडित करते हैं और कहते हैं कि भाषा व्यवहार से पैदा होने वाली चीज़ है और व्यवहार में ही इसका उपयोग किया जाना चाहिए, व्यवहार में ही इससे उच्चतर ज्ञान का सृजन किया जाना चाहिए.

ऐसी अनेक चीजें हैं जिन्होंने मुझे ‘एक आधुनिक व्यक्ति के रूप में बुद्ध’ के प्रति आकर्षित किया. मैं 3-4 बार महाबोधि सोसाइटी गया तो थोड़ा बहुत उनके संपर्क में आता था. वहाँ लोगों से बात भी करता था, जानने समझने की कोशिश करता था. जैसा कि ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ में मैंने इस घटना का उल्लेख भी किया है. महाबोधि सोसाइटी का और सारनाथ का स्थानीय समाज पर कोई धर्मगत प्रभाव भी है या यह केवल एक मठ की तरह से संचालित होने वाली चीज़ है. यह और ऐसे अनेक सवाल जो एक पत्रकार के मन में होते हैं, मेरे मन में भी उठ रहे थे.

तो बुद्ध से मेरा इंटरैक्शन एक पत्रकार का है और मैं उनसे हर चीज़ पर और उनके बाद के जो भी महान बौद्ध दार्शनिक हुए हैं, उनसे एक पत्रकार की तरह उनका एक खयाली इंटरव्यू करने की कोशिश करता हूँ, जैसा राजेंद्र यादव ने चेखव का इंटरव्यू किया था.

वेद प्रकाश- जिस चीज़ ने मुझे आपसे बात करने के लिए प्रेरित किया है वे दो चीज़ें हैं. पहली यह कि आपने जो यह सूक्ष्म ऑब्ज़र्वेशन किया है कि भारत में बौद्ध धर्म के जितने भी पुनरुद्धारक हुए हैं वे सभी थेरवाद से प्रभावित थे, यह आपको अचानक कैसे महसूस हुआ? जबकि राहुल सांकृत्यायन नागार्जुन और धर्मकीर्ति वगैरह पर बहुत विस्तार से बात करते हैं. डॉक्टर अंबेडकर को जरूर हम थेरवादी कह सकते हैं. वे अपनी किताब में एक तरह से नेति-नेति का इस्तेमाल भी करते हैं कि जो चीज़ इस-इस विचार के अनुरूप नहीं है, वह बुद्ध के धर्म में बाद में जुड़ गई है, जैसे स्वामी दयानंद सरस्वती कहते थे जो कुछ वेदों के ख़िलाफ़ है, वह सब प्रक्षिप्त है. इसके बावजूद बाबासाहब ने कुछ आदर्श हमारे सामने रखे.

मैंने बुद्धिज्म को पढ़ा बाद में, पहले विपस्सना की. और विपश्यनाचार्य सत्यनारायण गोयनका म्याँमार की थेरवादी परंपरा से थे. दो दूसरी जीवनी पढ़ी वह तिक न्यात हन्ह द्वारा लिखी किताब ‘जहँ जहँ चरन पड़े गौतम के’ थी, जो वैसे तो महायानी परंपरा के ज़ेन गुरु थे, पर यह किताब तिपिटकों पर आधारित होने के कारण थेरवादी अधिक लगती है. तो आपको कैसे लगा कि भारत पर थेरवाद का प्रभाव है और हमें महायान और वज्रयान के प्रभावों को भी समझना चाहिए?

चंद्रभूषण—आपने बहुत महत्वपूर्ण सवाल किया है और इस सवाल से जूझना एक तरह से खुद से ही जूझना है. क्योंकि जो भी हम लोग बुद्धिज़्म के बारे में जानते हैं, कॉमन सेंस से, वह सब थेरवादी बुद्धिज़्म के ही बारे में जानते हैं. उसका कारण यह है कि श्रीलंका पर ब्रिटेन का शासन था और बुद्धिज़्म की श्रीलंकाई व्याख्याएं ही यहां आधिकारिक मानी गईं. भारत में जो बुद्धिज़्म की जो खोज हो रही थी, उस खोज की विस्तृत प्रक्रिया में तो मैं नहीं जाऊँगा लेकिन यह हकीकत है कि लगभग 600 साल तक भारत में बुद्धिज्म का कोई नामोनिशान न रहा.
मेरी जो खोजबीन है वह सबसे ज्यादा यही है कि स्मृति से एक विचार कैसे लुप्त हुआ. जीवन से तो चीजें लुप्त हो जाती हैं लेकिन स्मृति में रहती हैं. बुद्ध का धर्म स्मृति से कैसे लुप्त हुआ? इस पर ही मैं काम कर रहा हूँ. यह किताब भी है और आगे भी करना है. तो श्रीलंका में चूँकि ब्रिटेन का शासन था और श्रीलंकाई शासक वर्ग से ब्रिटिश शासक वर्ग के काफी अच्छे रिश्ते बन गए थे. आपको शायद यह ध्यान हो कि अनागारिक धर्मपाल जो भारत में बुद्धिज्म की पुनर्स्थापना के लिए सबसे केंद्रीय व्यक्ति बने जिन्होंने सारनाथ को और लगभग सारे बौद्ध धार्मिक स्थलों को पुनर्जीवित किया. उनका नाम डेविड हयवितरणा था.

वेद प्रकाश—क्या वे अंग्रेज़ थे?

चंद्रभूषण—नहीं, वे श्रीलंकाई थे, पर ईसाई हो चुके थे. उनका परिवार ईसाई श्रीलंकाई था. वैसे तो सारे सिंहली बौद्ध ही थे, पर लंबे समय के अंग्रेजी राज के कारण वे ईसाई हो गए थे. वहाँ बौद्ध धर्म के पुनर्जागरण का मतलब एक वास्तविक पुनर्जागरण है जिसमें लोग ईसाइयत से वापस बुद्ध के धर्म में लौटे. यह एक चीज़ थी, एक इंटरैक्शन जो ब्रिटिश शासक वर्ग का श्रीलंकाई शासक वर्ग से इतना गहरा था कि धर्मांतरण भी बहुत सारे लोगों ने किया था. भारत में शासक वर्ग ने बड़े पैमाने पर ईसाई धर्म में धर्मांतरण नहीं किया, थोड़े-बहुत लोग ही धर्मांतरित हुए. जबकि कोरिया, जापान आदि में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ. जिन ईसाइयों को हम लोग भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के शीर्ष लोगों के रूप में जानते हैं, जैसे एनी बेसेंट और सी.एफ. एंड्रयूज़, वे लोग बाहरी थे—ब्रिटिश या आयरिश थे. भारत से कोई ईसाई बना हुआ हिंदू धर्म से या किसी मुस्लिम धर्म से, वह कोई भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में प्रमुख भूमिका में पहुँचा हो, ऐसा तो एक भी उदाहरण नहीं है. लेकिन श्रीलंका में आपको ऐसा मिलेगा.

जब यहाँ पता चला कि चीजें निकल रही हैं, जमीन से मूर्तियाँ निकल रही हैं तो पहले तो अंग्रेजों को यह नहीं समझ में आया. उन्होंने पूरे यूरोप की विद्वान मंडली के पास यहाँ के अवशेषों की तस्वीरें भेजी. सारनाथ के और साँची कणिखेरी के. सारनाथ में 1799 में अवशेष दर्ज किए गए और साँची कनिखेरी में 1818 में. तो जो उनकी तस्वीरें मिलती जुलती थी एक-दूसरे से अक्षर की लिखावटें मिलती जुलती थीं, लेकिन वह क्या लिखा है या वह मूर्ति किसकी है या कुछ लिखा भी है या नहीं, यह किसी को नहीं पता था. उन्होंने 1818 में वे तस्वीरें हाथ से ड्रॉ करवाके जो यूरोप में विभिन्न जगहों पर भेजीं तो उन लोगों ने यह कहा कि यह जो ढाँचा मिला है, वह महल भी नहीं है, फोर्ट भी नहीं है, किला भी नहीं है और मंदिर भी नहीं है, तो फिर यह क्या है?

तब श्रीलंका के किसी बुद्धिजीवी ने कहा कि यह तो स्तूप है और यह मूर्ति और यह लिखावट हम पहचान सकते हैं. यह हमारे यहाँ का जीवित धर्म रहा है. तो भारत में इस खोज ने श्रीलंका को पीछे जाने पर मजबूर किया. श्रीलंका का बुद्धिजीवी जो औसतन एक बड़ी संख्या में क्रिश्चियन हो चुका था और कुछ बुद्धिस्ट थे. जो बुद्धिस्ट थे, उन्होंने अब अपनी किताबें पढ़ना शुरू किया और जो ईसाई हो गए थे उन्होंने पलट के सोचना शुरू किया कि ऐसा तो नहीं कि हम ज्यादा बड़ी चीज़ को छोड़ के, छोटी चीज़ में आ गए हैं. तो एक तरह से वहाँ धर्म का पुनर्जागरण हुआ. एक तरह से पुनर्जागरण रियल सेंस में एक ही देश में हुआ और वह श्रीलंका में. और कहीं आप उस तरह का नहीं देखते. तो श्रीलंका के लोग वहाँ से दौड़े कि ये हमारे धर्मस्थल हैं, हमें इनको सिर्फ खुदाई कराके म्यूजियम नहीं बनाना है. यह पूज्य हैं तो सबसे पहले जाकर वे ही यहाँ पर बैठे.

वेद प्रकाश—सारनाथ.

चंद्रभूषण—नहीं, जहाँ मृत्यु हुई.

वेद प्रकाश—अच्छा, कुशीनगर.

चंद्रभूषण—कुशीनगर. सबसे पहले कुशीनगर में जाकर बैठे, फिर सारनाथ को रिवाइव किया, फिर गया को रिवाइव किया.

वेद प्रकाश—हालाँकि उस जगह पर पहले भी जापानी और दूसरे लोग आया करते थे, दर्शन करने के लिए.

चंद्रभूषण—जापानी तो नहीं, पर बर्मी लोग आते थे. बर्मी लोगों का भगवान या देवता यहाँ बैठा है. ऐसा राहुल जी से किसी ने कहा था.

वेद प्रकाश—यानी बर्मी लोगों की स्मृति में था कि बुद्ध यहाँ पर हैं.

चंद्रभूषण—बर्मी लोगों की स्मृति में यह तो था कि बुद्ध भारत के हैं, लेकिन इस जगह से उनका संबंध है, यह खोजे जाने के बाद पता चला. और वह खोजा जाना भी जो था वह बेसिकली जो इन दोनों लोगों के, फाहियान और ह्वेनसाँग के यात्रा वृतांतों के अनुवाद से संभव हुआ. ईत्सिंग का अनुवाद बाद में हुआ. ह्वेनसाँग और फाहियान के यात्रा विवरणों का चीनी से फ्राँसीसी में अनुवाद हुआ, 1825 के आसपास. फ्राँसीसी से वह अंग्रेजी में अनुवाद हुआ. तो इन लोगों ने किताबों में लिखी हुई जगहों को, 1500 साल पुरानी कहानियों से वास्तविक जगहों को खोज निकाला.

जो सबसे फैंटेस्टिक चीज़ मानी जाती है, वह है अलेक्ज़ेंडर कनिंघम और कार्लायल की जिन्होंने इन चीजों को खोज निकाला. मैं कह रहा था कि यह इतनी बड़ी खोज थी कि 60-70 साल के अंदर इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ना और भारत के बौद्धिकों पर भी पड़ना लाजमी था. तो उसमें राहुल सांकृत्यायन, भीमराव अंबेडकर, भदंत आनंद कौसल्यायन, धर्मानंद कोसंबी आदि आते हैं.

वेद प्रकाश—धर्मानंद कोसंबी तो जीवित बौद्ध भिक्षु की तरह थे, एकदम सादा जीवन. मैं कहीं पढ़ रहा था या किसी ने जिक्र किया है कि गाँधी जी जब नौआखली में थे, उस समय भी वे इनके स्वास्थ्य के बारे में चिंतित थे.

चंद्रभूषण—तो इन लोगों पर प्रभाव पड़ना लाजमी था और यह प्रभाव पड़ा और निस्संदेह उस प्रभाव से ही बुद्धिज्म भारत में आज एक जिंदा धर्म है.

वेद प्रकाश—जी, तो वापस सवाल पर आते हैं.

चंद्रभूषण—तो ये मैं कह रहा था कि इस महान सकारात्मक प्रभाव के बावजूद केवल इसका एक नकारात्मक प्रभाव रहा जिसका संबंध आपके प्रश्न से है, वह यह है कि खुद श्रीलंका में भी जो थेरवाद है वह ऑर्गेनिक नहीं है. ऑर्गेनिक इस अर्थ में नहीं कि श्रीलंका में महायान परंपरा भी थी वज्रयान परंपरा भी थी और इन सबके मठ थे और इन सबकी क्रियाएँ थी. सारा कुछ था. सन् 1100 के आस-पास वहाँ एक बड़ा राजा उभरा, उसका नाम मुझे नहीं ध्यान आ रहा. उसने इन सबके मठों पर हल चलवा दिए और यह कह दिया कि या तो गृहस्थ जीवन में लौट जाओ नहीं तो मार दिए जाओगे.

वेद प्रकाश—वह राजा बौद्ध था या हिंदू?

चंद्रभूषण—वह राजा बौद्ध था, हीनयानी राजा था.

वेद प्रकाश—पर वह बौद्ध मठों को क्यों तोड़ रहा था?

चंद्रभूषण—क्योंकि वह मानता था कि चरित्रहीन और पतित लोग हैं, महायान और वज्रयान वाले. वह मानता था कि बौद्ध धर्म में किसी भिक्षु के साथ स्त्री कहाँ से आएगी. जब बुद्ध घर छोड़कर निकल गए तो स्त्री कहाँ से आएगी. हालाँकि यह सही है कि श्रीलंका में स्त्रियों का मठ बहुत लंबे समय तक रहा है. भारत में तो भिक्षुणियों का मठ केवल 500 साल तक रहा. उसके बाद भिक्षुणियों का मठ समाप्त हो गया लेकिन श्रीलंका में भिक्षुणियों का मठ किसी न किसी रूप में चलता रहा, बहुत बाद तक. लेकिन महायान और वज्रयान में स्त्री से जो संबंध है, वह संबंध हीनयान में नहीं है. फर्क है दोनों में.

वेद प्रकाश—क्या फर्क है?

चंद्रभूषण—महायान और वज्रयान दोनों पंथों में स्त्री से संबंध में फर्क है, थोड़ा फर्क है. वो फर्क कैसे पैदा हुआ? इस पर हम आएँगे क्योंकि जब हम हीनयान, महायान और वज्रयान की बात करते हैं तो हम 1500 साल की बात कर रहे हैं. और हम ध्यान रखें कि भारत की आज़ादी को अभी 75 साल हुए हैं. हम उसके 20 गुना समय की बात कर रहे हैं. 1500 साल की बात कर रहे हैं. 1500 साल में चीजें बदलती हैं, बहुत स्तरों पर.

तो इस समय के बोध का अभाव और श्रीलंका में एक ही पंथ का बचना और बाकी दोनों पंथों का जड़ मूल समाप्त कर दिया जाना. इसने एक ऐसा पांथिक दृष्टिकोण पैदा किया जिसके चलते जो दूसरे जो मत थे और मैं आपको इस बारे में विस्तार से उससे बात कर सकता हूँ. जिस तरह से श्रीलंकाई सोचते हैं या अभी का हीनयान सोचता है, उस तरह से अब से 1500 साल पहले के हीनयानी, वज्रयानी और महायानी एक-दूसरे के बारे में नहीं सोचते थे.

वेद प्रकाश—यह बात आपकी किताब से निकलकर आती है.

चंद्रभूषण—उनके संबंध पांथिक नहीं थे. नागार्जुन एक महायानी चिंतक थे लेकिन नागार्जुन के पक्ष में नागार्जुन की प्रशंसा करते हुए पुराने हीनयान में भी आपको चीजें मिल जाती हैं. जैसे मान लीजिए वसुबंधु हुए, वसुबंधु तो हीनयानी थे. हीनयानी से वे महायानी हुए, धर्मकीर्ति के यहाँ आपको तीनों ही पंथों का सम्मान मिलता है. बुद्धघोष हीनयानी चिंतक हैं, उनके यहाँ आपको कहीं पर पांथिक दृष्टिकोण नहीं मिलता. हम कह रहे हैं कि महायान और वज्रयान को चारित्रिक पतन के रूप में देखने का जो दृष्टिकोण है वह चाहे राहुल जी का हो, चाहे डॉ.अंबेडकर का हो, चाहे वह कोसंबी का हो, चाहे वह देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय का हो, ये सारे लोग अपने समय से जुड़े हुए सरलीकरण के शिकार रहे.

इसमें बाकी लोगों पर मुझे कोई ऐतराज नहीं है क्योंकि उनका भिन्न पंथों से संपर्क ही नहीं था. राहुल जी पर मुझे एतराज होता है इसलिए कि राहुल जी वज्रयानियों के संपर्क में रहे, महायानियों के संपर्क में रहे. चीन तो पूरा महायानी ही हुआ. तिब्बत में रहे और चीन में रहे. वो कैसे ऐसा कह सकते हैं कि महायानी और वज्रयानी चारित्रिक रूप से पतित लोग थे? मैं चकित रह जाता हूँ कि मान लीजिए कि मैंने पैतीस की उम्र में कह दिया तो मुझे 55 की उम्र में तो सुधार लेना चाहिए. 55 में तो यह कहना चाहिए था कि इसको ऐसे पढ़ा जाए लेकिन ऐसा कोई सुधार उनमें नहीं दिखाई देता.

वेद प्रकाश—यानी कि आप यह कह रहे हैं कि महायान या वज्रयान में जो सेक्स आदि चीजें आईं वह उसका पतन नहीं था, उसे किसी और तरह से देखना चाहिए?

चंद्रभूषण—उसे विकास समझना चाहिए और विकास के क्रम में ऐसा होता है कि हर चीज़ सकारात्मक ही नहीं होती. उसमें सकारात्मक भी होती है, नकारात्मक भी होती है. लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि सकारात्मक तत्व बहुत ज्यादा है. बहुत ज्यादा, मतलब जिन पर कि ध्यान भी नहीं जाता और कई नकारात्मक चीजें भी हैं, जिन पर बात होनी चाहिए. किसी भी फिनोमना के बारे में जब हम बात करते हैं और इस पर सबसे ज्यादा चीनियों ने और माओत्से तुंग ने जोर दिया कि स्याह सफेद में उसको नहीं जाँचना चाहिए. इसीलिए माओत्से तुंग की मृत्यु के बाद जब पहला जो वक्तव्य आया तंग श्याओ पिंग का- जिन्हें खुद बहुत समय तक गाँव में एक तरह से निर्वासित रखा गया था- लेकिन उन्होंने यह कहा कि माओत्से तुंग में 60% श्रेष्ठ था 40% खराब, इसलिए वो श्रेष्ठ थे.

किसी भी फिनोमिना के बारे में अगर आप देखते हैं तो उसके बारे में ऐसा क्या करना कि या तो पूजा करने लगें या फिर गाली देने लगें? अगर कोई फिनोमिना 500 साल स्थिर रहा है. 500 साल वज्रयान चला, 500-600 साल महायान चला. चारित्रिक रूप से पतित कोई पंथ 10 साल चल जाए तो बहुत बड़ी बात है. ऐसा कैसे हो सकता है कि एक चीज़ जो 500-700 साल चल जाए. तो मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय इतिहास पर हम जब भी कोई वक्तव्य देते हैं तो यह चूँकि इतनी पुरानी चीजें हैं कि हमको ठहर कर बोलना चाहिए.

वेद प्रकाश—अगला प्रश्न है कि महायान में आपके अनुसार क्या चीज़ें थीं जो ज्यादा सकारात्मक हुईं पर इस दृष्टिकोण के चलते हमारी नजरों से ओझल हो गई और जिनको हम आगे एक लोकतांत्रिक समाज का निर्माण करने के लिए खाद पानी के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.

चंद्रभूषण—महायान दार्शनिकों का धर्म है. दार्शनिकों से तात्पर्य यह है कि महायान में सबसे ज्यादा ग्रंथ लिखे गए, दार्शनिक विमर्श बहुत हुए, व्याकरण पर, ज्ञानमीमांसा पर. आप कह सकते हैं कि ऐसे अनेक प्रश्न जो उस समय के बड़े दार्शनिक प्रश्न रहे हैं उन सब प्रश्नों पर स्टैंड लिया महायान के लोगों ने। और जो वैदिक चिंतन धारा के बिंदु थे वह भी विकसित हो रहे थे. उससे ये लोग बहुत तीखे विमर्श में गए. इसीलिए जिस एक पंथ का संपूर्ण विलोप हुआ पूरे दक्षिण एशिया से, वह महायान है. इसलिए कि उसमें वाकई वैदिक धारा से सबसे तीखी बहसें हुईं, उसका कुछ नहीं बचा. वज्रयान का तो फिर भी थोड़ा बहुत आपको मिल जाएगा.

वेद प्रकाश—नाथपंथियों से पहले जो सिद्ध हुए उनके जिक्र में?

चंद्रभूषण—वज्रयान के बारे में बात हो जाएगी. सारे सिद्ध वज्रयानी हैं, लेकिन मैं महायान के बारे में कह रहा हूँ.

वेद प्रकाश—जी, सिद्धों के लेखन में मिलता है लेकिन महायान के बारे में सब गायब है.

चंद्रभूषण—महायान का संपूर्ण विलोप हुआ. कुछ भी नहीं बचा.

वेद प्रकाश—महायान की जो किताबें भी मिल रही हैं, धर्मकीर्ति की प्रमाणवार्तिक आदि ये सब हम रीक्रिएट कर रहे हैं.

चंद्रभूषण—यह प्रमाणवार्तिक तिब्बत से ले आए राहुल जी. कुछ नहीं था, भारत में जीरो था, कुछ नहीं था. धर्मकीर्ति का कुछ भी यहाँ नहीं मिला. थोड़ा सा प्रमाणवार्तिक तो संस्कृत में भी मिल गया था, वज्रसूची भी नेपाल में मिल गई थी.

वेद प्रकाश—तभी आप कहते हैं कि जब राहुल जी ने यह सब किया उसके बाद भी इसके प्रति ऐसा दृष्टिकोण क्यों रखा. जबकि वह अपनी किताब ‘दर्शन दिग्दर्शन’ में तो यहाँ तक बोलते हैं कि आप धर्मकीर्ति को प्राचीन हीगल मान सकते हैं. और वे यह भी कहते हैं कि यदि मार्क्स को समझना हो तो पहले बौद्ध दर्शन को पढ़ना चाहिए.

चंद्रभूषण—क्योंकि एपिस्टिमोलॉजी पर, ज्ञानमीमांसा पर तो वह अकेला ही आदमी है भारत में जिसने गहरा काम किया है. मतलब दुनिया को कैसे हम जानते हैं, दुनिया को कैसे जाना जाए? इस पर तो वह अकेला आदमी है जिसने काम किया है. बाकी जो लोग हैं जैसे शंकर है या दूसरे लोग वह तो ऑलरेडी डिफाइन कर देते हैं कि एक माया हो गया, एक ब्रह्म हो गया. माया को माया की शर्त पर जानना है, ब्रह्म को ब्रह्म की शर्त पर जानना है. ब्रह्म जो है वह अपने को माया के रूप में प्रस्तुत करता है, यह वेदांत हो गया. लेकिन धर्मकीर्त की जो दुनिया है वह वास्तविक दुनिया है जो आपके इर्द-गिर्द की दुनिया है. जो रियल फिनोमिना की दुनिया है उसको कैसे जाना जाए. आपको कांट में जो बहस दिखती है और फिर कांट के बाद से हीगल में मिलती है.

वेद प्रकाश—श्चेरबात्सकी ने धर्मकीर्ति की तुलना कांट से की है.

चंद्रभूषण—बिलकुल.

वेद प्रकाश—एक तरह से मॉडर्न फिलॉसफी जहाँ से विकसित होती है. मार्क्स दो दार्शनिकों से बहुत प्रभावित थे, एक हीगल और दूसरे कांट. इसका मतलब यह हुआ कि हमारे यहाँ विश्व की टक्कर का जो दर्शन था वह धर्मकीर्ति और नागार्जुन जैसे महायानी बौद्ध दार्शनिकों में था. क्या यह कहा जा सकता है?

चंद्रभूषण— वसुबंधु, दिङ्नाग और धर्मकीर्ति में. नागार्जुन और असंग के साथ यह है कि वे फिलॉसफर तो हैं लेकिन उतना एनालिटिकल फिलॉसफर नहीं हैं. ऊपर वाले तीनों एनालिटिकल फिलॉसफर हैं.

वेद प्रकाश— और भी तो कई बहुत बड़े बुद्धिस्ट फिलॉसफर हैं.

चंद्रभूषण—यह पूरी सीरीज है जिसमें कि आप 10-15 नाम एक तरफ से गिना सकते हैं.

वेद प्रकाश—इसका मतलब भारत में आधुनिक अर्थों में जिस तरह दर्शनशास्त्र विकसित है उसमें बौद्ध दार्शनिकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है.

चंद्रभूषण—मैं संक्षेप में अगर 4-5 नामों के बारे में बता सकूँ, जैसे सबसे बड़े नाम की शुरुआत असंग से होती है, नागार्जुन के बाद…

वेद प्रकाश- वसुबंधु भी हैं न …

चंद्रभूषण—असंग के छोटे भाई हैं वसुबंधु. इन दोनों भाइयों को एक तरह से नालंदा के चांसलर या पीठाधीश कह सकते हैं और इन दोनों की उम्र में काफी फर्क है, लगभग 15 साल का. यह भी विचित्र है कि असंग के पिता क्षत्रिय हैं तो वसुबंधु के पिता ब्राह्मण हैं. पर माँ एक है. और माँ पूज्य हैं. मतलब उनका जगह-जगह एक पूज्य स्त्री के रूप में जिक्र आता है. यह इस तरह का समाज है जो आज का अमेरिका है या जिसको आप देख रहे हैं. वह अपमानित या अवमानित स्त्री नहीं हैं, वह पूज्य स्त्री हैं.

असंग को अगर सरल दृष्टि से देखा जाए तो आप कह सकते हैं कि यह ब्राह्मणवाद का प्रवेश हो रहा है. इसलिए कि असंग के यहाँ धारणियाँ हैं, प्रार्थनाएँ हैं, असंख्य बोधिसत्वों की गुंजाइश है. वे बोधित्व के लिए जगह बनाते हैं. बोधिसत्व जो है वह कल्पना प्रसूत हैं ऐसा माना जाता है. जो वास्तविक बोधिसत्व थे, वे तो बुद्ध ही थे. 500 साल तक बुद्ध बनने की उनकी जो यात्रा थी, वे हर जन्म में बोधिसत्व थे. बोधिसत्व अर्थात् बुद्ध बनने की यात्रा में लगा हुआ सत्त्व. असंग कहते हैं कि अगर एक हाथी बोधिसत्व है, अगर एक बंदर बोधिसत्व है, अगर एक सिंह बोधिसत्व है, अगर एक पक्षी बोधिसत्व है तो एक सामान्य मनुष्य बोधिसत्व क्यों नहीं हो सकता? एक सामान्य मनुष्य में बुद्ध बनने का बीज क्यों नहीं हो सकता.

यह असंग के यहाँ दिखाई देता है. उसमें कुछ एक शायद वास्तविक जीवन के लोग भी रहे होंगे जिनको कि बोधिसत्वों का दर्जा दिया गया, जैसे फाहियान के यहाँ दो शिक्षकों का उल्लेख आता है जो अबौद्ध हैं, बौद्ध नहीं हैं. उनमें एक का नाम मंजुश्री है और दूसरे का नाम विमलकीर्ति. यह सामान्य लोग हैं, बौद्ध नहीं हैं. लेकिन बौद्धों को बुद्धिज्म पढ़ाते हैं. फाहियान ने भी उनसे बुद्धिज़्म सीखा, यह आप कल्पना कर सकते हैं? क्या कोई ईसाई किसी गैर ईसाई से ईसाइयत सीखेगा? वह कोई और चीज़ सीख लेगा पर ईसाइयत हरगिज नहीं सीखेगा.

वेद प्रकाश—मतलब बहुत ही अद्भुत खुला समाज था. नालंदा या तक्षशिला विश्वविद्यालय बहुत ही खुले स्थान थे.

चंद्रभूषण—तो अब जिन बोधिसत्वों के बारे में हम जानते हैं उनमें सबसे बड़े बोधिसत्व तो मंजुश्री ही हैं.

वेद प्रकाश—और वे बौद्ध नहीं हैं!

चंद्रभूषण—यह पता नहीं कि मंजुश्री जो हैं वह काल्पनिक हैं या किसी व्यक्ति के नाम पर है. यह संभव है कि जिन मंजुश्री का जिक्र फाहियान ने किया है, हो सकता है कालांतर में उन्हीं को मंजुश्री बोधिसत्व मान लिया गया हो. कब मंजुश्री का नाम पहली बार आया, अवलोकितेश्वर का नाम कब पहली बार आया? कब सामंतभद्र का नाम पहली बार आया यह मुझे नहीं पता. एक का पता है जो वज्रसत्व या वज्रपाणि हैं, उनके बारे में पता है कि 650 के आस-पास पहली बार उनका नाम आता है. वैरोचन का नाम सबसे पहले 500-600 के आस-पास आता है. उनके ग्रंथ मिलते हैं, जैसे ‘वैरोचनाभिसंबोधि सूत्र’. लेकिन उसमें से कुछ एक हो सकता है जो मनुष्य रहे हों और उनको बोधिसत्व माना गया.

धरती पर रहने वाले बोधिसत्व और आकाश में रहने वाले बोधिसत्व, यह फर्क है. तो असंग से इसकी शुरुआत होती. कोई भी रैशनलिस्ट व्यक्ति इसको मानेगा कि यह काल्पनिक तत्वों का, बुद्ध के तार्किक धर्म में काल्पनिक तत्वों का प्रवेश है. लेकिन कोई दूसरा व्यक्ति यह भी कह सकता है कि न जाने कितने फिलॉसफर, कणाद से लेकर कपिल और वात्सायन और न जाने कौन-कौन किताबों में रह गए. उनका नाम भी कोई नहीं जानता. लेकिन बुद्ध चले आ रहे हैं. तो यह बिलकुल संभव है कि असंग ने दर्शन में जो धर्म की जो गुंजाइश बनाई, उसके कारण यह हुआ हो.

वेद प्रकाश—पर यह अवधारणा तो बौद्ध धर्म के मूल में भी है न, कि कोई भी मनुष्य बुद्ध बन सकता. उनकी पूरी प्रक्रिया जो है कि आप विपस्सना करो या आप धर्म के रास्ते पर चलो तो बुद्ध बन सकते है. यह वही तो है.

चंद्रभूषण—नहीं, यह वही नहीं है, हीनयान में कोई व्यक्ति अधिकतम अर्हत बन सकता है. अर्हत से ऊपर कोई नहीं जा सकता.

वेद प्रकाश—मतलब आम समझ में जो है वो ऐसा लगता कोई भी बुद्ध बन सकता है.

चंद्रभूषण—बुद्ध के धर्म में आप जो कुछ भी करते हैं वह अर्हत बनने के लिए ही करते हैं. अर्हत का मतलब उस पार चला गया. इस पार से उस पार चला गया. जो 500 अर्हतों की जो पहली महासंगीति हुई थी. हीनयान में वही सर्वोच्च स्थल रही है जहाँ आप पहुँचने का प्रयास करते हैं. पर बाद में यह हुआ जैसा लामा तारानाथ लिखते हैं कि बनारस में लोगों ने भिक्षुओं को भिक्षा देने से मना कर दिया था. यह चीज़ मौर्य वंश के खात्मे से थोड़ा पहले की बात है. लोगों ने कहा कि इतना हमारे घर में नहीं है कि हम इतने लोगों का ध्यान रख सकें. हर चीज़ की एक सीमा होती है कि एक बुद्ध हो गए, अब तीन सौ, चार सौ, पाँच सौ साल गुजर गए हैं कब तक आप झोली लिए हुए आते चले आओगे? आपका धंधा है, आप अपनी मुक्ति के लिए लगे हो, हम कितना आपको सपोर्ट करें.

वेद प्रकाश—यानी हमारे लिए आपकी क्या उपयोगिता है?

चंद्रभूषण—हम आपको कब तक सपोर्ट करें, अब निकलिए.

वेद प्रकाश—बुद्ध के धर्म में महिलाओं और जाति के प्रति जो दृष्टि है, उस पर कुछ बोलिए.

चंद्रभूषण—बुद्ध पक्ष में नहीं थे महिलाओं को भिक्षु बनाने के. आनंद ने काफी संघर्ष किया, वैचारिक संघर्ष. और शुरुआत जो है वह शाक्य राजपरिवार की स्त्रियों को भिक्खुनी बनाने से हुई. लगभग 500 साल भारत में महिलाएँ भिक्षुणी बनती रहीं. लेकिन उस बीच में भिक्षुणियों से बलात्कार की कई घटनाएँ सामने आईं. यह समाज बहुत मामलों में बहुत बर्बर रहा है और सबसे बड़ी चीज़ यह है कि बर्बरता को ओट देने की विचारधारा इसके पास रही है. यह ज्यादा बुरी बात है. वैसे तो हर जगह पर, हर समाज में बर्बरता होती रही है लेकिन बर्बरता को ओट देने के लिए, उसको आड़ देने के लिए कोई पवित्र विचारधारा हमारे समाज में ही उपलब्ध रही है, वह भी हमेशा से.

तो यह चीज़ कि भिक्षुणी भिक्षा माँगने के लिए जा रही है और वो सेफ नहीं है, यह चीज़ पूरे धर्म को कलंकित करने वाली रही. जिसका नतीजा यह हुआ कि जब चीन में भिक्षुणियों का पहला मठ स्थापित करना हुआ तो उन्होंने भारत किसी को नहीं भेजा क्योंकि भारत में भिक्षुणियों का मठ था ही नहीं, समाप्त हो गया था. उन्होंने श्रीलंका भेजा, यह चौथी सदी के आस-पास की बात होगी. तो श्रीलंका से चीन में भिक्षुणियों का मठ स्थापित करने के लिए भिक्षुणियाँ गई और जाकर उन्होंने वहाँ भिक्षुणियों का मठ स्थापित किया. महायान के समय में भिक्षुणियों के मठ आमतौर पर नहीं हैं, यह एक कमजोरी है. पर स्त्रियों का सम्मान तो है.

वेद प्रकाश—मेरा सवाल यही था कि भिक्षुणियों के मठ बनाना एक बात हुई. पर स्त्री पुरुष में मतभेद देखना, पुरुष को श्रेष्ठ मानना और स्त्री को दासी मानना, क्या ऐसी प्रवृत्ति, ऐसी विचारधारा बुद्धिज़्म में मिलती है?

चंद्रभूषण —विचार के स्तर पर तो नहीं. लेकिन जैसे जैन धर्म में आज भी आप इतनी साध्वियाँ देखते हैं, वैसा आपको बौद्ध धर्म में दिखाई नहीं पड़ता.

वेद प्रकाश —क्या जैन साध्वियों के साथ बलात्कार नहीं हुए होंगे, उनके साथ भी हुए होंगे. उन्होंने कैसे प्रोटेक्ट किया?

चंद्रभूषण—जो एक बुनियादी फर्क जैन दर्शन और बौद्ध दर्शन में है, वह यह कि जैन दर्शन ने महावीर के ही समय से अपना सीमित दायरा रखा.

वेद प्रकाश —मतलब वो भिक्षुणियाँ भिक्षा माँगने बाहर जाती नहीं थीं, मठ के भीतर ही रहती थीं.

चंद्रभूषण- छोटे दायरे में रहती थीं. मतलब जैसे अभी भी जैन साध्वियाँ जैनों के ही यहाँ ही ठहरती हैं. जो स्थापित जैन परिवार हैं, उन्हीं के यहाँ ठहरती हैं. उनसे मेरी रोज मुलाकात हो जाती है टहलते हुए, लेकिन उनका तय है कि वह किस परिवार की महिला के साथ टहल रही होंगी और किसके घर में रुकेंगी. उसके बाहर वे नहीं जातीं. बौद्ध धर्म में यह तय नहीं है कि किस घर से भिक्षा लेनी है और यह स्ट्रिक्टली प्रोहिबिटेड है कि भिक्षा में अपनी मर्जी नहीं चलानी है.

वेद प्रकाश—वह आपको भिक्षा में जो दे दे, वही आपको खाना है.

चंद्रभूषण—बुद्ध के धर्म में जो पहला विभाजन हुआ, वह इस सवाल पर कि सोने-चाँदी की भिक्षा लेनी है या नहीं? जो थेरवादी थे वो इस पर अड़ गए कि सोने चाँदी की भिक्षा नहीं लेनी है. तो जो महायानी थे उन्होंने कहा कि जब भगवान ने स्वयं ऐसा कहीं नहीं कहा है, भिक्षा के बारे में च्वाइस नहीं है. अगर सुअर का माँस दिया गया तो आपको सुअर का माँस खाना है. बुद्ध की मृत्यु उसी से हुई न. जो मिल गया वो खाना है. जो मिल गया वह लेना है. आपकी मर्जी क्यों?

वेद प्रकाश—यह कहा गया है कि अगर माँस आपके लिए पकाया गया हो, खास तौर पर, तो नहीं खाना है. पर आप कहीं जा रहे हैं और कोई आपको दे दे तो आप उसको ग्रहण कर सकते हैं.

चंद्रभूषण—तो अगर यह है कि अगर बुद्ध ने कहीं कहा ही नहीं कि भिक्षा में चॉइस है, आपके पास न तो यह चॉइस है कि आप किस घर से भिक्षा लोगे, न यह चॉइस है कि क्या भिक्षा लोगे. जो भी घर मिलेगा…

वेद प्रकाश—इसका एक लाभ यह हुआ कि बुद्ध के धर्म का प्रसार बहुत हुआ. क्योंकि बौद्ध भिक्खु हरेक के घर गए.

चंद्रभूषण—यह बौद्ध और जैन धर्म में बुनियादी अंतर है. इसके बारे में असंग और वसुबंधु के बारे में हमने सुना ही, ऐसी अनेक…

वेद प्रकाश—आप कुछ बड़े बौद्ध दार्शनिकों का नाम बता दीजिए जैसे आपने असंग और वसुबंधु के नाम बताए.

चंद्रभूषण—तो असंग की जो बेसिक पोजीशन रही है जो मैंने कहा कि जो धारणागत और कहा जाए कि जो आपने महसूस किया, ऐसी चीजें भी यथार्थ होती हैं, जो रैशनलिज़्म से थोड़ा बाहर जाती हैं. रैशनलिज़्म में हम मानते हैं कि चीजों का कोई प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए. असंग ने उसको छोड़ दिया. वसुबंधु जो थे, वे शुरू में असंग के बड़े विरोधी थे और वह थेरवादी भी थे.

उन्होंने असंग के बारे में ऐसा भी कहा कि असंग ने हाथी के वजन के बराबर लिख दिया है लेकिन उसमें तत्व बहुत कम है. लेकिन बाद में वसुबंधु की पोजीशन बदली और उन्होंने असंग पर टीका लिखी और वह बहुत प्रसिद्ध महत्वपूर्ण टीका है जिसमें उन्होंने कहा कि ऐसी चीजों की गुंजाइश है. जो आपका अनुभव है, जो प्रत्यक्ष सत्य नहीं है लेकिन जो आपने महसूस किया है. तो उससे बहुत सारी चीजों की, गड़बड़ चीजों की गुंजाइश हो सकती है.

और उसके बाद बहुत बड़ा नाम एक आता है दिङ्नाग का. दिङ्नाग का जो स्कूल है वह धर्मकीर्ति का स्कूल है. इस स्कूल का लॉजिक है, कहना है कि दो ही चीज़ों के जरिए दुनिया को जाना जा सकता है—प्रत्यक्ष और अनुमान. प्रत्यक्ष यानी जो आपका अनुभव होगा और अनुमान यानी आप उससे जो निष्कर्ष निकालते हैं. अब इसी चीज़ के जरिए उन लोगों ने सिद्ध-अनुभूत मतलब कोई ऐसा व्यक्ति जिसको बोध हुआ और बोध तो सबको होता नहीं, उसकी बातों के लिए भी गुंजाइश बनाई है.

वेद प्रकाश—यानी साधना के उच्च स्तरों पर जो अनुभव होते हैं.

चंद्रभूषण—मान लीजिए कि बुद्ध का जो अनुभव है, महाभिसंबोधि है, एक झटके में ऐसी जो चीज़ आती है उसको आप प्रत्यक्ष और अनुमान के जरिए कैसे जानें. तो यह दोनों जो बड़े तर्कशास्त्री माने जाते हैं, इनको प्रमाण स्कूल ही बोला जाता है. दिङ्नाग और दिङ्नाग के काफी समय बाद धर्मकीर्ति. दिङ्नाग और धर्मकीर्ति के बीच में कई लोग आते हैं.

वेद प्रकाश—क्या कोई पुस्तक मिलेगी हिंदी में, जो इसका बहुत अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करती हो.

चंद्रभूषण—मेरे खयाल से शुरूआती स्तर के लिए राहुल सांकृत्यायन की ‘दर्शन दिग्दर्शन’ बहुत अच्छी है. यदि और गहराई में जाना हो तो आचार्य नरेंद्र देव की चीजें खोजनी पड़ेंगी. आचार्य नरेंद्र देव का जो मैग्नम ओपस है, वह तो वसुबंधु का “अभिधर्मकोश” है जिसे इन्होंने संपादित कर छपवाया. और एक विहंगावलोकन भी किया है, ‘बौद्ध धर्म दर्शन’ में. पर दर्शन में मेरी गति उतनी नहीं है. ये ऐसे दार्शनिक हैं जिनपर पूरा जीवन लग जाता है.

विदेशों में ऐसे लोग हैं कि दिङ्नाग पर काम कर रहे हैं तो पूरा जीवन उसी में लगा दिया. मैंने एक पत्रकार की तरह पढ़ा है और मैं इन पर एक-दो पन्ना लिख सकता हूँ. तो धर्मकीर्ति के बाद जो महायानी चिंतक हुए हैं, वे व्याख्याकार अधिक हैं. उनमें सबसे बड़ा नाम शांतिदेव का आता है. आचार्य शांतिदेव राजकुमार थे, वे 700 ईस्वी के आसपास हुए. और वे ऐसे आचार्य थे जिनकी महायान और वज्रयान में समान रूप से गति थी.

वेद प्रकाश—यह जो आपने जानकारी दी, बहुत दिलचस्प है कि महायान, वज्रयान, थेरवाद में आपस में कोई लड़ाई नहीं थी.

चंद्रभूषण— जी हाँ, इनकी आपस में कोई अस्ल लड़ाई नहीं थी.

वेद प्रकाश—एक ही व्यक्ति इधर भी चला जाता है, उधर भी चला जाता है. तो हमारे मन में जो महायान, वज्रयान, थेरवाद का भेद है, वह इस बात से टूट जाता है.

चंद्रभूषण—मतलब उसको हम समझ नहीं पाए. पूर्वाग्रह के साथ शुरू करना होगा लेकिन पढ़ के राय बनाएं,, यह मेरा कहना है. शांतिदेव के बाद एक बड़ा नाम शांतरक्षित का आता है. शांतरक्षित तिब्बत में बुद्ध के धर्म की आधारशिला रखने वाले हैं और वहाँ की लिपि और सब कुछ में उनका योगदान बहुत बड़ा है. उसके बाद कमलशील बहुत बड़े नाम हैं. उनकी तिब्बत में ही मृत्यु हुई. एक शास्त्रार्थ के बाद उनके टेस्टिकल्स को ऐंठ के उनको मार दिया और वहाँ पांथिक जैसा कुछ मामला हो गया. फिर वहाँ पद्मसंभव हो गए. उसके बाद बड़ा महायानी चिंतक नाम दीपंकर का आता है जो 1041 में भारत से तिब्बत गए और वह अंतिम बड़े विद्वान थे जो बाहर जाने वाले भारत के थे और फिर इस दौर के जो लोग आपको मिलेंगे, वह आपको सिद्ध ही मिलेंगे.

कहते हैं कि बुद्ध ने धर्मचक्र को पहली बार घुमाया. धर्मचक्र घुमाने का मतलब यह है कि जन्म और मृत्यु का जो अंतहीन चक्र जो चल रहा था उस चक्र को उन्होंने उलटकर मुक्ति की, जन्म मृत्यु से बाहर जाने की, गुंजाइश उसमें पैदा की. फिर बुद्धिज़्म में धारणा है कि दूसरी बार जब धर्मचक्र घूमा, तब बोधिसत्वों के लिए गुंजाइश हुई. जब तीसरी बार धर्मचक्र घूमा तो सिद्धों के लिए जगह बनी. सामान्य जीवन में ही अब आप देवतुल्य हो जाते हैं. शरीर के साथ ही आप मुक्त हो जाते हैं.

हीनयान में यह धारणा है कि धर्मचक्र एक ही बार घूम गया. अब आपके लिए रास्ता खुल गया. अब आप इस पार से उस पार चले जाएँ, जो अर्हत है, वह मुक्त है. बोधिसत्व का मतलब यह है कि वह अपनी मुक्ति को टाल रहा है. ऐसा नहीं है कि वह मुक्ति के रास्ते पर नहीं है. वह मुक्त हो सकता है लेकिन और लोगों को मुक्त करना चाहता है इसलिए अपनी मुक्ति को टाल रहा है. जब एक महायानी को प्रवज्या दी जाती है तो उसको यह संकल्प लेना होता है कि मैं संसार की मुक्ति के लिए अपनी मुक्ति को स्थगित करूँगा.

वेद प्रकाश—समाज के प्रति कितना गहरा समर्पण है.

चंद्रभूषण—नेपाल के बौद्ध परिवारों में बच्चों को जो प्रवज्या दिलाते हैं उसमें भी प्रवज्या के समय यह संकल्प उनको बोलना होता है कि मैं संसार की मुक्ति के लिए अपनी मुक्ति को स्थगित रखूँगा.

वेद प्रकाश—वाह! क्या बढ़िया अवधारणा है कि सबकी मुक्ति में ही हमारी मुक्ति है. सबका मंगल हो.

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