जैन हवाला स्कैम ब्रेक करने वाले विनीत बोले- तब भी न्यायपालिका बिकी थी (देखें वीडियो)

जानिए जैन हवाला कांड कैसे खुला और इसे उजागर करने वाले विनीत नारायण के साथ क्या कुछ घटित हुआ… उन्हें क्यों देश छोड़कर भागना पड़ा था… Continue reading

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सुब्रमण्यम स्वामी अब अपनी धोती संभालें : विनीत नारायण (देखें वीडियो)

देश में वीडियो / टीवी पत्रकारिता की शुरुआत ‘कालचक्र’ के माध्यम से करने वाले वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण आजकल भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी से खासे नाराज चल रहे हैं. विनीत के खिलाफ सुब्रमण्यम स्वामी ने आठ पेज की चिट्ठी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के यहां रवाना किया तो जवाब में विनीत नारायण ने स्वामी का कच्चा चिट्ठा खोल दिया. Continue reading

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वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण से भड़ास एडिटर यशवंत की बातचीत (पार्ट वन) : देखें वीडियो

भड़ास एडिटर यशवंत को अपनी किताब ‘अदालत की अवमानना, कानून का दुरुपयोग’ भेंट करते वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण.


भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने जब वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण को नटवरलाल बताते हुए आठ पेज की चिट्ठी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास प्रेषित किया तो अचानक ही विनीत फिर से सुर्खियों में आ गए. Continue reading

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राजदीप और आशुतोष की आत्मा जिंदा होती तो इस डाक्टर से माफी मांग चुके होते, देखें वीडियो

डाक्टर अजय अग्रवाल नोएडा के जिला अस्पताल के सीएमएस हैं. घुटना प्रत्यारोपण के फील्ड में देश के जाने माने डाक्टर हैं. हम बताएंगे कि इनकी जिंदगी किस तरह एक न्यूज चैनल ने तबाह कर दी…. Continue reading

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मीडिया घरानों को नंगा करने वाले ‘कोबरा पोस्ट’ के संपादक अनिरुद्ध बहल का वीडियो इंटरव्यू देखें

दो पार्ट में मीडिया घरानों का स्टिंग कराने वाली मीडिया कंपनी कोबरापोस्ट के कर्ताधर्ता हैं अनिरुद्ध बहल. चमक-दमक और प्रचार से दूर रहने वाले इस शख्स के बारे में लोग कम ही जानते हैं. भड़ास के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ने कल नोएडा स्थित कोबरापोस्ट के आफिस जाकर अनिरुद्ध बहल का एक विस्तृत वीडियो इंटरव्यू किया. Continue reading

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लाल झंडे वाले कबीराना फोटो जर्नलिस्ट सुनील कुमार दत्ता से एक मुलाकात, देखें वीडियो

कबीर के नाम से चर्चित एसके दत्ता उर्फ सुनील कुमार दत्ता आजमगढ़ की एक जानी-मानी शख्सियत हैं. साइकिल से करियर शुरू करने वाले दत्ता साहब दैनिक जागरण, टाइम्स आफ इंडिया, राष्ट्रीय सहारा से लेकर अमर उजाला तक में काम करते हुए कुछ बरस से मोपेड से चलने लगे हैं. जाहिर है, उनके जीवन में, उनकी नैतिकता में, उनके संस्कार में पैसे महत्वपूर्ण नहीं थे, न हैं. वे जीवन को संपूर्णता के साथ जीते-देखते हैं. Continue reading

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सुप्रिय प्रसाद मीडिया इंडस्ट्री के सर्वश्रेष्ठ बॉसेज में से एक हैं!

Yashwant Singh : संपादक को अपने व्यवहार और दिमाग से कैसा होना चाहिए… मैं जो समझ पाता हूं वो ये कि उसे नितांत डेमोक्रेटिक होना चाहिए. सबकी सुने…सबको मौका दे.. सरल-सहज रहे ताकि उससे कोई भी मिल जुल कह बता सके… नकारात्मकता न हो… कोई बुरा कहे तो जज्ब कर ले… कोई अच्छा करे तो उसे वाहवाही दे दे… आज के दौर के युवा संपादकों की बात करें तो कुछ ही हैं जो इस पैमाने पर खरे उतरते हैं… सुप्रिय प्रसाद को उनमें से एक मानता हूं…

सुप्रिय प्रसाद

सुप्रिय टीवी टुडे ग्रुप के सभी न्यूज चैनलों के मैनेजिंग एडिटर हैं…. जाहिर है, आजतक चैनल उनकी टाप प्रियारिटी में रहता है… सुप्रिय ने हिंदी टीवी पत्रकारिता के जनक एसपी सिंह के साथ लंबे समय तक काम किया.. आईआईएमसी से पढ़े सुप्रिय ने टेलीविजन की तकनीक और इसकी विशिष्टता को पकड़ा-समझा… और यूं कंटेंट-विजुवल के मास्टर बने…

वे सुबह आंख खुलने और रात सोने से पहले तक लगातार कई न्यूज चैनलों को मानीटर करते रहते हैं… चाहें वे घर रहें या आफिस… उनके इर्द गिर्द कई स्क्रीन पर कई हिंदी अंग्रेजी चैनल म्यूट मोड में लगातार चलते रहते हैं…

उन्हें ठीक ठीक पता रहता है कि कब क्या चलना चाहिए आजतक पर… हां, हम आप उनके प्रयोगों की आलोचना कर सकते हैं, वैचारिक आधार पर… लेकिन ये सच है कि उन्होंने आजतक न्यूज चैनल को कंटेंट से लेकर टीआरपी तक में हमेशा नंबर वन बनाए रखा…

ये भी सच है कि नंबर वन हो जाना बड़ी बात नहीं होती… नंबर वन हो जाने के बाद इस नंबर वन की कुर्सी पर बने रहना मुश्किल काम होता है… आजतक नबर वन न्यूज चैनल है और जमाने से नंबर वन है… इसकी काट तलाशने की बहुत कोशिश हुई लेकिन कोई कामयाब न हो पाया…

संपादकीय गुणवत्ता, दर्शनीयता, टीआरपी, देश और समाज के हितों के साथ कदम-ताल करते हुए फैसले लेने पड़ते हैं… बहुत कुछ होता है जिसके आधार पर खबर / विजुअल को लेकर फाइनल डिसीजन की ओर बढ़ना पड़ता है… लेकिन सुप्रिय उलझते नहीं… वे तुरंत फैसले करते हैं… टेलीविजन में देरी-सुस्ती चलती भी नहीं… सुप्रिय की टीवी की समझ और फैसले लेने की तेजी उन्हें सबसे अलग बनाती है.. यही वजह है कि सुप्रिय बरसों से आजतक के संपादक हैं… और, अब तो पूरे ग्रुप के सभी चैनलों के मैनेजिंग एडिटर हैं…

सुप्रिय के बारे में ये मेरा निजी आकलन है… जरूरी नहीं कि आपका नजरिया इससे मेल खाए… ये भी सच है कि मैंने उनके साथ कभी काम नहीं किया.. इसलिए आफिस के अंदर के उनके व्यवहार-रवैये के बारे में नहीं जानता… लेकिन उनके साथ काम कर चुके और करने वाले कई लोगों को अक्सर ये कहते सुना हूं- ”सुप्रिय मीडिया इंडस्ट्री के सर्वश्रेष्ठ बॉसेज में से एक हैं”.

सुप्रिय के खिलाफ, आजतक चैनल के खिलाफ और इस समूह के मालिकों के खिलाफ भड़ास पर कई दफे खबरें छपी…. लेकिन सुप्रिय ने कभी बुरा नहीं माना… वो जानते हैं कि भड़ास होने का क्या मतलब है.. उनका व्यवहार न बदला… मैं कई बार सोचता हूं कि उनकी जगह मैं खुद होता तो क्या ऐसा व्यवहार अगले के साथ कर पाता… मैंने दशक भर में कई संपादक देखे हैं जो अच्छा छपने पर तो खुश रहते हैं लेकिन जहां कोई एक खबर उनके या उनके संस्थान के खिलाफ छपी, एकदम से गदा लेकर हनुमान बन जाते हैं… गदर काटने पर तुल जाते रहे हैं… खैर, यह सब हमेशा होता है, जो खबर के कामकाज से ताल्लुक रखते हैं, उन्हें अच्छे से पता होता है…

सुप्रिय की चर्चा यहां यूं कर रहा था कि उनका एक इंटरव्यू मैंने वर्ष दो हजार दस में लिया था. तब वो इंटरव्यू मैंने लिखकर भड़ास पर प्रकाशित किया था. टेक्स्ट फारमेट में. उसी दरम्यान यूं ही, बातचीत के कुछ वीडियो क्लिप्स भी तैयार कर लिया था… कल एक हार्ड ड्राइव चेक करते हुए संयोग से वो वीडियो क्लिप्स मुझे मिल गए… अब जबकि मैं वीडियो एडिटिंग भी सीख रहा हूं तो फौरन उन वीडियो क्लिप्स को जोड़कर यूट्यूब पर अपलोड कर दिया… सुप्रिय को सुनिए… ये आठ साल पहले वाले सुप्रिय हैं… जब उनको मैंने ये वीडियो लिंक भेजा तो बोले- अब तो नया इंटरव्यू लेने का वक्त आ गया है… मैंने जवाब दिया- आपने मेरे मुंह की बात छीन ली…

सुप्रिय के पुराने वीडियो इंटरव्यू को देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=Kniys9qyXyQ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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भास्कर ग्रुप को धूल चटाने वाली इस लड़की का इंटरव्यू देखें-सुनें

मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ने में बहुत बड़े बड़े पत्रकारों की पैंट गीली हो जाती है लेकिन भास्कर समूह में रिसेप्शनिस्ट पद पर कार्यरत रही एक लड़की ने न सिर्फ भास्कर ग्रुप से कानूनी लड़ाई लड़ी बल्कि अपना हक हासिल करने की अग्रसर है.

कोर्ट के आदेश पर भास्कर ग्रुप ने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत इसे मिलने वाले लाखों रुपये अदालत में जमा करा दिए हैं. लतिका चह्वाण नामक यह लड़की डीबी कार्प के मुंबई आफिस में रिसेप्शनिस्ट हैं. इनसे बातचीत की आरटीआई एक्सपर्ट और मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह जी ने.

इंटरव्यू देखने सुनने के लिए नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करें :

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‘मलिकज़ादा’ के विमोचन के बाद यशवंत ने की इसके लेखक नज़ीर मलिक से बातचीत, देखें वीडियो

35 साल सेवा के बाद वरिष्ठ पत्रकार को क्यों देना पड़ा दैनिक जागरण से इस्तीफा, जानिए पूरी दास्तान… सिद्धार्थनगर जिले के दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ रहे वरिष्ठ पत्रकार नज़ीर मलिक अपने जीवन, करियर और संघर्षों की कहानी बयां कर रहे हैं, भड़ास संपादक यशवंत से एक विशेष बातचीत में… 

‘मलिकज़ादा’ क़िताब का विमोचन पिछले दिनों सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज में आयोजित पूर्वांचल साहित्य सम्मलेन में किया गया. इसके लेखक हैं नज़ीर मलिक.  दैनिक जागरण के गोरखपुर एडिशन से संबद्ध सिद्धार्थनगर जिले के लंबे समय तक ब्यूरो चीफ रहे वरिष्ठ पत्रकार नज़ीर मलिक ने भड़ास संपादक यशवंत से एक विशेष बातचीत में इस किताब के अलावा अपने करियर और जीवन में आए ढेर सारे उतार-चढ़ावों को लेकर विस्तार से बात की.

दैनिक जागरण ने करीब साढ़े तीन दशक के सेवा के बाद नज़ीर साहब से किस किस्म का सुलूक किया, इसका खुलासा भी उन्होंने किया. नेपाल के मामलों के विशेषज्ञ नज़ीर मलिक ने ढेर सारी बड़ी खबरें ब्रेक कर चुके हैं और उनकी खबरें पूरे देश में दैनिक जागरण की पहले पन्ने पर लीड बनी हैं. माया मैग्जीन से करियर की शुरुआत करने वाले नज़ीर मलिक से पूरी बातचीत को आप नीचे दिए वीडियो पर क्लिक करके देख-सुन सकते हैं :  

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मोदी जी का इंटरव्यू और जी न्यूज के सामने पकौड़े वाला….

Nitin Thakur : सुधीर सर ने जो इंटरव्यू लिया उसे जर्नलिज़्म के पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए. छात्रों को वो हुनर सिखाया जाए कि एकतरफा संवाद करनेवाले नेता के भाषण के बीच में सवालनुमा टिप्पणी कुशलतापूर्वक घुसाकर कैसे इंटरव्यू होने का भ्रम पैदा किया जाता है. मोदी जी ने बाकायदा समझाया कि कैसे ज़ी न्यूज़ के बाहर पकौड़े तलनेवाले को 200 रुपए रोज़ाना का रोज़गार मोदीकाल में मिला है।

उन्होंने कायदे से ये भी बताकर कि ऐसे रोज़गार सरकारी आंकड़ो में नहीं आ पाते आगे तक की शंकाओं का समाधान कर दिया। अब कोई उनसे आंकड़े लेकर सवाल ना करे क्योंकि ये सब आंकड़ों में तो होता नहीं। सबसे अद्भुत तो वो दृश्य था जब मोदी जी इस अनर्थशास्त्र की आखिरी लाइन बोल रहे थे तो एंकर महोदय ने पूरी श्रद्धा से उनकी वो लाइन अपने शब्दों से पूरी की। आह… खेल लो बैडमिंटन.. जितनी देर खेलना चाहते हो.. लोग लंबे वक्त तक एक ही आदमी से मूर्ख नहीं बनते रह सकते। जिस दिन कुएं में डाली गई तुम्हारी अफीम का नशा टूटा ये ही तुम्हें दौड़ाएंगे.. फिर तुम पकौड़े तलना.. जैसे इतिहास के कई नायकों ने बाद में तले।

वैसे, टेक्निकली देखा जाए तो ज़ी के सामने कोई पकौड़े वाला नहीं खड़ा है. हर जगह सिर्फ अवैध अतिक्रमण किए ज़ी वालों की कारें पार्क रहती हैं. अगर कहीं कोई पकौड़े वाला है तो वो “आज तक” के सामने और “दैनिक भास्कर” के बगल में है. मोदी जी जब मिसाल दे रहे थे तो एंकर को उन्हें बताना चाहिए था कि सर हम तो किसी ठेलेवाले को खड़ा ही नहीं होने देते. यूं मोदी जी को एक दौरा फिल्मसिटी का भी करना चाहिए. उनके ढेरों छिपे-खुले प्रशंसक बड़ी मेहनत से चैनलों की नौकरी करते हुए बीजेपी की बेगार करते हैं. अब ये भी क्या बात हुई कि वो इंटरव्यू के लिए भी जाएं तो निर्जन में बसे इंडिया टीवी जाएं. हमारे यहां आएं.. दो सौ रुपए रोज़ की कमाई वाले पकौड़े वाले से लाकर पकौड़े मैं खिलाऊंगा.. चाय वो झा जी की पियेंगे या चंदू की वो तो उन्हें ही बताना पड़ेगा.

Anand Sharma : पकोड़ा जलेबी बेचने वाले हल्दीराम हैं। पैन कांटिनेंट ब्रांड। आप जैसे डिग्रीधारियों की फौज रोज़ सुबह लाला का चरणामृत करती है। बुरा न मानना पर उद्यमिता से आप का दूर दूर तक वास्ता नही क्यों कि उसमें लगता है जिगर जिसको आपने अपनी तनखा के लिए गिरवी रख दिया है। जिगर वाले रामदेव, गोपालजी मिल्क, सलोनी मस्टर्ड आयल, पारस मिल्क, घासीटाराम कराची हलवाई, MDH और शक्ति मसाला होते हैं, किसी प्लांट के सुपरवाइजर नहीं।

Sheetal P Singh : महान मोदी जी ने करीब पौने चार साल बिताने के बाद पहली बार एक तिहाड़ी पत्रकार को आमने सामने से उपकृत किया। वैसे मंच से तो वे रोज भाषण ठेले रहते हैं पर किसी असली पत्रकार से आमना सामना करने का साहस उनमें नहीं दिखता। कांग्रेस के राहुल गांधी ने इधर कुछ इम्प्रूव किया है वरना तो वे भी प्रायोजित प्रेस का ही सामना करते थे।

Rakesh Kayasth : किस्सा पुराना हो चुका है, लेकिन सुधीर चौधरी को प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करता हुआ देखकर दोबारा याद आ गया। जयललिता जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं, तब राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए एक डिबेट कंपीटशन हुआ था। विषय था– अम्मा ज्यादा hardworking हैं या फिर ज्यादा efficent. पक्ष और विपक्ष में जोरदार दलीले पेश की गईं। विजेता वह सरकारी कर्मचारी बना जिसने धारदार तर्कों के आधार पर साबित कर दिया कि अम्मा दोनो हैं।

Rajeev Ranjan Jha : संघ-भाजपा से ‘जुड़े’ पत्रकार जब तक वाम-कांग्रेस के अनुकूल सवाल पूछते हैं, तब तक ही वे खरे व सच्चे होते हैं। दूसरा कोई भी सवाल पूछते ही वापस संघी-भाजपाई हो जाते हैं। दूसरी ओर वाम-कांग्रेस के पत्रकार स्वाभाविक रूप से ही खरे व सच्चे होते हैं और कभी भी गलत सवाल नहीं पूछते हैं। वाम-कांग्रेस के पत्रकार कभी पक्षपात नहीं करते, क्योंकि पक्ष एकमात्र उन्हीं का है, दूसरों का कोई पक्ष नहीं होता। दूसरों का जो होता है, वह केवल गलत होता है। वाम-कांग्रेस की बातों को काटने वाला हमेशा अलोकतांत्रिक, फासीवादी, सांप्रदायिक, कट्टर, मनुवादी, ब्राह्मणवादी, प्रतिक्रियावादी होता है। और हाँ, कम समझ रखने वाला मूर्ख भी…

सौजन्य : फेसबुक

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समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो चुकी है… देखें इंटरव्यू भाग-दो

चर्चित आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को एनडीटीवी के आर्थिक घपलों को पकड़ने के कारण बहुत प्रताड़ित किया गया. इस अफसर के पास एनडीटीवी की पूरी कुंडली है. भड़ास से बातचीत में एसके श्रीवास्तव ने खुलासा किया था कि मनमोहन राज में तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने NDTV पर छापा डालने जा रहे इनकम टैक्स अफसरों को रोक दिया था.

IRS अफसर एसके श्रीवास्तव से भड़ास संपादक यशवंत सिंह की बातचीत का दूसरा पार्ट हाजिर है…. इस वीडियो के जरिए जानिए… आखिर प्रणय राय और पी. चिदंबरम में इतनी तगड़ी यारी के पीछे का कारण क्या है… -एनडीटीवी प्रबंधन में दम है तो वह कंपनी के संकट और कालेधन से रिश्ते को लेकर पब्लिक डिबेट करा ले…. -प्रणय राय कंपनी को लूट खा गए, अब एनडीटीवी को इसके मीडियाकर्मियों के हवाले कर देना चाहिए….-समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो गई है… वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

फर्स्ट पार्ट पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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प्रणय राय की काली कमाई की पोल खोल दी इस IRS अधिकारी ने, देखें वीडियो

प्रणय राय अपना अफ्रीका वाला फार्म हाउस गिरवी रख देते तो सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरी बच जाती… 

Yashwant Singh :  आपको मालूम है, प्रणय राय ने काली कमाई से अफ्रीका में सैकड़ों एकड़ का फार्म हाउस खरीद रखा है जिसमें ऐय्याशी के सारे साजो-सामान उपलब्ध है. प्रणय राय ने गोवा में समुद्र किनारे बंगला खरीद रखा है. दिल्ली और देहरादून में बंगले खरीद रखे हैं. एक हेलीकाप्टर भी खरीदा हुआ है. Continue reading

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युवा अखबार मालिक अभिजय चोपड़ा शतरंज के जरिए पंजाबी युवाओं में फैली नशे की लत को देंगे मात

दिमाग के खेल शतरंज यानि चेस में अब उत्तर भारत, खासतौर पर पंजाब के कई खिलाड़ी अपनी धाक जमाने लगे हैं। पंजाब में चेस के इस बढ़ते कल्चर का श्रेय ‘पंजाब केसरी’ के डायरैक्टर अभिजय चोपड़ा को जाता है जिन्होंने जालन्धर में पंजाब केसरी सेंटर ऑफ चेस एक्सीलैंस शुरू किया है। इस मंच के तहत जालन्धर में चेस प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे भाग लेकर चेस की बारीकियां सीख रहे हैं और अपने आपको बड़े टूर्नामैंट के लिए तैयार कर रहे हैं। भड़ास ने अभिजय चोपड़ा के साथ जालन्धर में विशेष बातचीत की। पेश है अभिजय चोपड़ा से बातचीत का एक अंश :

प्रश्र : चेस प्रतियोगिता के आयोजन के पीछे सोच क्या है?
उत्तर : पंजाब इस समय नशे की समस्या से जूझ रहा है। युवा पीढ़ी नशे में डूब रही है जिस कारण देश का नुकसान हो रहा है। हालांकि इसकी रोकथाम के लिए प्रयास हो रहे हैं लेकिन ये प्रयास सही दिशा में न होने के कारण उनके नतीजे नहीं मिल पा रहे। इस बीच मैंने सोचा कि मैं इस बीमारी से युवाओं को दूर रखने के लिए किस तरह का योगदान दे सकता हूं तो मेरे दिमाग में सबसे पहला रास्ता युवाओं को खेलों से जोडऩे का ही आया। पंजाब में युवा स्कूल से छुट्टी होने के बाद गाड़ी उठा कर गेड़ी मारने निकल जाते हैं। यदि उससे मन भर जाता है तो शराब या बीयर का सहारा लेते हैं लेकिन कुछ समय से युवाओं का रुझान शराब के अलावा चरस, अफीम और हैरोइन जैसे नशे की तरफ बढ़ गया था। युवा ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास वक्त है और जिंदगी में उन्होंने अपने लक्ष्य निर्धारित नहीं किए हैं। मेरी सोच है कि युवा यदि अपने लक्ष्य निर्धारित करेंगे तो वे उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मेहनत करेंगे जिससे वे नशे से दूर रहेंगे। मुझे बाकी खेलों में इस तरह का फोकस नजर नहीं आता है। मैं इसका एक उदाहरण भी देना चाहूंगा। जालन्धर में चेस एसोसिएशन चेस प्रतियोगिताओं का आयोजन करती है और ‘पंजाब केसरी’ इन प्रतियोगिताओं में प्रायोजक की भूमिका में रहता है। मेरे पिता श्री अविनाश चोपड़ा जी ने एक बार मुझे ऐसी प्रतियोगिता में जाने को कहा तो मैंने देखा कि राऊंड खत्म होने के बाद खाली समय में भी बच्चे अपने चेस मैप खोल कर अभ्यास कर रहे थे। यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई। फिर मैंने जालन्धर के जूनियर चैस खिलाड़ी दुष्यंत से बात की। वह इस समय ग्रैंडमास्टर बन चुका है। दुष्यंत उस वक्त लास वेगास में चेस खेल कर आया था। मैंने उससे पूछा कि उसने वेगास में क्या कैसीनो, ट्वाय शॉप या बड़े-बड़े होटल देखे तो दुष्यंत का जवाब था कि मैं वहां चैस खेलने गया था और मेरा पूरा ध्यान खेल में था। होटल में अपने कमरे में भी चेस का ही अभ्यास कर रहा था क्योंकि मुझे जीतना था। ये दोनों बातें मेरे दिमाग में बैठ गईं और मुझे लगा कि पंजाब के युवाओं को लक्ष्य देना पड़ेगा और यह लक्ष्य सिर्फ चेस से दिया जा सकता है।

प्रश्र: शतरंज में आपको निजी तौर पर क्या पसंद है?
उत्तर : शतरंज एक खूबसूरत खेल है और इस खेल में आप 15 मिनट में ही जीत का मजा व संतुष्टि हासिल कर सकते हैं। मैं अखबार से जुड़ा हुआ हूं और हमारे प्रोफेशन में सही या गलत का निर्णय अगले दिन का अखबार देख कर होता है लेकिन चेस के खेल में आप 15 मिनट में सही या गलत का नतीजा पा सकते हैं। मैं यहां एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। मैं ट्रेन में अपने दोस्तों के साथ यात्रा कर रहा था और मैंने अपने एक दोस्त तजिन्द्र बेदी को यात्रा के दौरान चेस खेलते समय 2 घोड़ों के साथ मात दे दी। इस बीच हमारे एक तीसरे दोस्त हेमकंवल ने इस गेम पर टिप्पणी करते हुए फेसबुक पर लिखा-‘बेदी दी हार दो घोड़ेयां दी मार’। जब हम तीनों दोस्त इकट्ठे होते हैं तो यह घटना हम आज भी याद करते हैं।

प्रश्र : चेस में प्यादा बढ़ते-बढ़ते रानी जितनी ताकत पा लेता है। क्या असल में भी जीवन आपको ऐसा ही लगता है?
उत्तर : बिल्कुल। भारत में तो हम कर्मों के सिद्धांत को मानते हैं और भगवद् गीता में भी कर्मों का फल मिलने की बात कही गई है लेकिन हम यदि दुनिया के सफल लोगों की बात करें तो वे भी धीरे-धीरे ही ताकतवर हुए। मशहूर पेंटर बिनसन वैंगो ने 18 साल की उम्र में पेंटिंग बनाना सीखा और 32 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई लेकिन उन्होंने अपने जीवन की बेहतरीन पेंटिंग्स 30 साल की उम्र के बाद बनाई। इसी तरह दुनिया की मशहूर फूडचेन मैकडोनल्ड के मालिक ने यह कंपनी रिटायरमेंट के बाद शुरू की थी और बाद में यह दुनिया की सफल कंपनियों में से एक बनी।

प्रश्र : मीडिया में चेस के खेल को जगह नहीं मिलती लेकिन ‘पंजाब केसरी’ में चेस को प्रमुखता से कवर करने के पीछे क्या सोच है?
उत्तर : मैं बाकी अखबारों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा क्योंकि वे भी हमारी इंडस्ट्री का हिस्सा हैं लेकिन जिस तरह से टेलीविजन में सारा खेल टी.आर.पी. यानी कि टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट का होता है और टी.आर.पी. हासिल करने के लिए ही खबरें चलाई जाती हैं उसी तरह अखबार में वही छपता है जिससे पाठकों की संख्या बढ़े लेकिन पंजाब केसरी समूह की शुरू से ही यह परंपरा रही है कि हम खबरों के मामले में सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। मेरे परदादा शहीद लाला जगत नारायण, मेरे दादा जी श्री विजय चोपड़ा और पिता श्री अविनाश चोपड़ा के बाद मुझ पर भी समाज के लिए कुछ करने की जिम्मेदारी है तथा मैं उन्हीं के सिद्धांतों पर चल कर वह काम कर रहा हूं जिससे समाज का भला हो और समाज में बदलाव हो। समाज में इस बदलाव के लिए अखबार की बड़ी भूमिका होती है। जब हम अखबार में लिखते हैं कि प्रागनंदा जैसे छोटे खिलाड़ी दुनिया भर में चेस के माध्यम से देश का नाम रोशन कर रहे हैं तो अभिभावकों को भी लगता है कि उनके बच्चे भी ऐसा कर सकते हैं।

प्रश्र : ‘पंजाब केसरी’ के टूर्नामेंट से सीखने वाले जालन्धर के जूनियर खिलाड़ी विदित जैन ने टॉप रेटिड खिलाड़ी को हराया तो कैसा लगा?
उत्तर : विदित की सफलता ने मुझे भावुक कर दिया। यह विदित की जीत नहीं थी, यह मेरी खुद की जीत थी और इस जीत से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है। लोगों में यह धारणा है कि मैं अमीर परिवार में पैदा हुआ हूं और हमें सब कुछ विरासत में मिला है लेकिन जब विदित जीत कर आया तो मुझे लगा कि मेरे द्वारा शुरू किए गए इस छोटे से प्रयास से बच्चे आगे बढ़ रहे हैं। यह मेरे लिए परम संतुष्टि की बात थी। मैं चाहता हूं कि देश से सैकड़ों बच्चे ग्रैंडमास्टर बनें और देश चेस की दुनिया में सुपर पावर बन कर उभरे।

प्रश्र : भविष्य में चेस को लेकर आपकी क्या योजनाएं हैं?
उत्तर : मैंने बचपन में डर के कारण चेस खेलना छोड़ा था लेकिन अब मैं वह डर बच्चों के मन से खत्म करना चाहता हूं। यह डर तभी खत्म होगा जब बच्चे ज्यादा से ज्यादा प्रतियोगिताएं खेलेंगे। ऐसा करके उनमें आत्मविश्वास आएगा। सवाल यह नहीं है कि हम रेटिंग टूर्नामैंट करवाते हैं या नहीं क्योंकि मैं ये सब पब्लिसिटी के लिए कर रहा हूं। मैं यह चाहता हूं कि मेरे शहर, मेरे राज्य और मेरे देश के बच्चे चेस में आगे बढ़ें और ‘पंजाब केसरी’ की यह प्रतियोगिता उनके लिए अभ्यास का एक मंच बने।

प्रश्र : प्रतियोगिता के लिए कोई भी एंट्री फीस न लेने के पीछे क्या सोच है?
उत्तर : इसका सारा श्रेय मेरे पिता श्री अविनाश चोपड़ा जी को जाता है। उन्होंने मुझे कहा कि बेटा किसी भी खिलाड़ी से एक रुपया भी चार्ज नहीं करना है। हम समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं और इसके लिए हमने उन बच्चों से कुछ नहीं लेना जिनमें आगे चल कर देश के लिए खेलने की संभावना है तो मैं कुछ बोल नहीं पाया। अखबार के जरिए यदि मैं समाज में सुधार कर सकता हूं तो मैं यह क्यों न करूं?

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मीडिया केंद्रित फिल्म ‘JD’ में कई पत्रकारों ने किया काम, गिना रहे हैं डायरेक्टर शैलेंद्र पांडेय सबके नाम (देखें वीडियो)

मीडिया पर जोरदार फ़िल्म ‘जेडी’ बनाने वाले शैलेन्द्र पांडेय ने निकाली अपनी भड़ास। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को कठघरे में खड़ा किया। कई असली पत्रकारों ने फिल्म में पत्रकार का किरदार निभाया है। तो, फ़िल्म में किन-किन असली पत्रकारों ने रोल किया, उन सबके नामों का किया खुलासा किया। शैलेंद्र पांडेय से बातचीत की भड़ास के संपादक यशवंत सिंह ने।

शैलेंद्र कानपुर के बगल के जिले उन्नाव के रहने वाले हैं। फिलहाल राजस्थान पत्रिका समूह में नेशनल फोटो एडिटर हैं। उन्हें फोटो जर्नलिज्म के लिए रामनाथ गोयनका एवार्ड भी मिल चुका है। ‘जेडी’ शैलेंद्र की पहली फिल्म है। पूरा बातचीत के जरिए आप ‘जेडी’ फिल्म बनने की प्रक्रिया से लेकर शैलेंद्र पांडेय के जीवन-करियर आदि के बारे में भी जान सकते हैं। देखें वीडियो…

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जंगल से आदिवासियों को बेदखल कर कारपोरेट को बसाने का अभियान मोदी सरकार ‘नक्सल सफाया’ के नाम पर चला रही है : वरवर राव

1940 में आंध्र-प्रदेश के वारंगल में जन्मे वरवर राव ने कोई 40 सालों तक कॉलेजों में तेलुगू साहित्य पढ़ाया है और लगभग इतने ही सालों से वे भारत के सशस्त्र माओवादी आंदोलन से भी जुड़े हुए हैं। वैसे वरवर राव को भारतीय माओवादियों के संघर्ष का प्रवक्ता माना जाता है, सरकारी दावे के अनुसार वे सशस्त्र माओवादियों के नीतिकार भी हैं, परंतु वरवर राव अपने को क्रांतिकारी कवि कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं। सत्ता के खिलाफ लिखने-पढ़ने, संगठन बनाने और पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित करने वाले वरवर राव टाडा समेत देशद्रोह के आरोप में लगभग 10 वर्षों तक जेल में रहे हैं और अभी लगभग 50 मामलों पर विभिन्न कोर्टों में सुनवाई चल रही है तो कुछ मामलों पर जमानत पर हैं।

2001-02 में तेलुगू देशम और 2004 में कांग्रेस पार्टी ने जब माओवादियों से शांति वार्ता की पेशकश की तो वरवर राव को मध्यस्थ बनाया गया था। नक्सलबाड़ी आंदोलन की 50वीं वर्षगांठ पर झारखंड के गिरिडीह में आयोजित समारोह में शिरकत करने आए क्रान्तिकारी कवि, लेखक, पूर्व शिक्षक, क्रान्तिकारी लेखक संघ के संस्थापक एवं आरडीएफ के अध्यक्ष 76 वर्षीय कामरेड वरवर राव का विशद कुमार से एक बातचीत :—

विशद कुमार:— नक्सलबाड़ी आंदोलन के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, आप इसे कैसे देखते हैं?

वरवर राव:— दुनिया के आंदोलनों के इतिहास में नक्सलबाड़ी आंदोलन का इतिहास सबसे लंबा रहा है। भारत में तेलंगाना का आंदोलन भी 1946 से 1951 तक मात्र पांच साल ही टिक पाया था। जिसका कारण यह था कि वह मात्र दो जिलों तक ही सिमट कर रह गया था। जबकि नक्सलबाड़ी आंदोलन आज लगभग पूरे देश में अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है, आपने देखा होगा पूरे देश में विभिन्न संगठनों द्वारा इसका 50वां वर्षगाठ मनाया जा रहा है।

विशद कुमार:— आपको लगता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन का रास्ता सही है?

वरवर राव:— एकदम सही है, जनता का शासन स्थापित करने बस यही एक रास्ता है और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक जनता का शासन पूरे देश पर कायम नहीं हो जाता। हम सरकार बनाने का सपना नहीं देख रहे हैं बल्कि आदिवासी, दलित, शोषित, पीड़ित एवं छोटे मझोले किसानों के हक अधिकार के लिए आंदोलित हैं।

विशद कुमार:— इस आंदोलन की अब तक की सफलता क्या है?

वरवर राव :— ग्राम राज्य की सरकार का हमने सारंडा, जंगल महल, नार्थ तेलंगाना और ओडीसा के नारायण पटना में गठन कर दिया है। दण्डकारण्य में जनताना सरकार पिछले 12 वर्षों से काम कर रही है। जहां एक करोड़ लोग रह रहे हैं। जिनके समर्थन से पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी बना है। जनताना सरकार आदिवासियों, दलितों, छोटे व मझोले किसानों का मोर्चा है और इस सरकार ने वहां बसने वाले सभी परिवारों को बराबर-बराबर जमीन बांट दी है। जिसका नतीजा यह है कि जो आदिवासी पहले केवल प्रकृति पर निर्भर था, कभी खेती के बारे जानता तक नहीं था, वह अब तरह-तरह की सब्जियां व अनाज की उपज कर रहा है। इन किसानों द्वारा मोबाइल स्कूल, मोबाइल हॉस्पिटल चलाया जा रहा है। जनताना सरकार की क्रांतिकारी महिला संगठन में एक लाख से अधिक सदस्य हैं, सांस्कृतिक टीम चेतना नाट्य मंच में 10 हजार सदस्य हैं, जो एक मिसाल है, क्योंकि किसी भी बाहरी महिला संगठन एवं सांस्कृतिक टीम में इतनी बड़ी संख्या में सदस्य नहीं हैं। वहां अंग्रेजों से लड़ने वाले क्रांतिकारी गुण्डादर के नाम पर पीपुल्स मिलिशिया (जन सेना) है। जनताना सरकार माओत्से तुंग के तीन मैजिक वीपन्स — पार्टी, यूनाइटेड फ्रंट और सेना की तर्ज पर चल रही है। अत: माओवादी आंदोलन ही क्रांति ला सकता है।

विशद कुमार:— इस आन्दोलन ​में आपका वाम जनवादी भागीदारी पर भी कोई स्टैड है?

वरवर राव :— माओवादी आंदोलन के साथ वाम जनवादी भागीदारी में वे लोग आ सकते हैं जो सत्ता से दूर हैं, उनके साथ हम फ्रंट बना सकते हैं। जैसे हमने आंध्रा व तेलंगाना में तेलंगाना डेमोक्रेटिक फोरम में सीपीआई, सीपीएम, एमएल के अलग अलग ग्रुप सहित आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक, छात्र आदि के 10 संगठन शामिल किया है।

विशद कुमार:— चीन की कम्युनिस्ट सरकार पर आपका नजरिया?

वरवर राव :— दुनिया में कहीं भी समाजवाद नहीं है। रूस व चीन साम्राज्यवादी देश बन गए हैं, नेपाल से आशा थी वह भी समाप्त हो गया है, वह भी भारत का उपनिवेश बन गया है। भारत का अमेरिका के साथ गठबंधन यहां के आदिवासियों व दलितों के लिए काफी खतरनाक है। अमेरिका की नजर हमारे जंगल, पहाड़ व जमीन पर है, जहां काफी प्राकृतिक संपदाएं हैं। जिसे लूटने की तैयारी में अमेरिका मोदी सरकार को हथियार और जहाज दे रहा है जिससे आसमान से जंगलों को निशाना बनाकर वहां से आदिवासियों को भगाया जा सके और उस पर कब्जा करके मल्टीनेशनल और कारपोरेट कंपनियों को दिया जा सके। जंगल से आदिवासियों को बेदखल करने का अभियान मोदी सरकार नक्सल सफाया के नाम पर चला रही है। मेरा मानना है कि देश को नवजनवाद की जरूरत है, ऐसी स्थिति में नवजनवाद केवल नक्सल आंदोलन से ही आ सकता है, जो सशस्त्र संघर्ष से ही संभव है।

विशद कुमार:— हाल में यूपी में आक्सीजन के अभाव में 72 बच्चे मर गए, आपकी प्रतिक्रिया?

वरवर राव :— आजादी के 71 वर्षों बाद भी जिस देश में बच्चों के लिये आक्सीजन नहीं हो जो प्राकृतिक है। मॉ के पेट में बच्चों का पूर्ण विकास होता है और उनके विकास के लिये सारी मौलिक चीजें मॉ के पेट में मिलती हैं। जबकि बाहर आने पर आक्सीजन के बिना वे मरे जा रहे हैं, यह कितना शर्मनाक है अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। अजीब कॉम्बिनेशन है कि आजादी के 71 साल 72 बच्चों की मौत और झारखण्ड में 70 इंडस्ट्रीज को जमीन आवंटन और आनलाईन उद्घाटन करने की योजना।

विशद कुमार:— देश में उद्योग लगेगा तभी न लोगों को रोजगार मिलेगा, फिर इन कंपनियों से परहेज क्यों?

वरवर राव :— मल्टीनेशनल कम्पनियां या कॉरपोरेट कम्पनियां पूरी तरह हाई टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। एक प्रतिशत श्रम पर काम करवाएंगी यानी कम से कम श्रम और अधिक से अधिक मुनाफे का इनकी थ्योरी है, ऐसे में रोजगार की संभावना कहां है। अत: साफ है कि इनके आने से श्रम बेकार पड़ जायेगा और जो आदिवासी, दलित छोटे किसान अपने श्रम को कृषि में लगाकर अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करते रहे हैं वे बेकार हो जाएंगे, भूखे मरने की नौबत आ जएगी। मतलब कि श्रमिक वर्ग की रोटी का जुगाड़ समाप्त हो जायेगा। यह कौन सा विकास है।

विशद कुमार:— मोदी सरकार को आप कैसे देखते हैं?

वरवर राव :— सब तो साफ दिख रहा है, किस तरह गौ हत्या, बीफ, देशभक्ति का नाटक करके संघ के इशारे पर लोगों को आपस में लड़वाने का काम हो रहा है। देश के टुकड़े करने की योजना पर मोदी के लोग काम कर रहे हैं और यही लोग आरोप लगा रहे हैं दूसरों पर।

विशद कुमार:— इस संसदीय व्यवस्था पर आपकी टिप्पणी?

वरवर राव :— मैं ऐसे लोकतंत्र के संसदीय रास्ते पर कतई भरोसा नहीं कर सकता जिस लोकतंत्र के संसदीय रास्ते के ही कारण 4000 लोगों की हत्या करवाने वाला मोदी आज देश का प्रधानमंत्री बना हुआ है। वहीं इतिहास गवाह है कि इन्दिरा की हत्या के बाद 3 से 4 हजार सिखों की हत्या का ईनाम राजीव गांधी को प्रधानमंत्री रूप में मिला। यह इसी लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली की देन है। फिर हम ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की संसदीय प्रणाली पर कैसे भरोसा करें?

विशद कुमार:— आप माओवाद के समर्थक हैं और माओवाद जनता के शासन की बात करता है, दूसरी तरफ बड़ी बड़ी कंपनियों से लेवी वसुलने का माओवादियों पर आरोप है, अप क्या कहेंगे?

वरवर राव :— लेवी के पैसे से संगठन चलता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। आंदोलन के लिए पैसों की जरूरत होती है जो सारे संगठन करते हैं। सत्ता में बैठे लोग इसे चंदा कहते हैं। हमारे और उनमें मौलिक फर्क यह है कि वे लोग कारपोरेट की दलाली के लिये, उनकी ही सुरक्षा के लिए उनसे पैसा लेते हैं और माओवादी उनसे लेवी लेकर उनके ही खिलाफ जनता की हक की लड़ाई लड़ते हैं। हमें भगत सिंह की विरासत के रास्ते पर चलना होगा, तभी देश में जनता का शासन सम्भव है।

विशद कुमार: – मोदी सरकार कह रही है माओवादी कमजोर हुए है। आप क्या कहना चाहेंगे?

वरवर राव : – अगर ऐसा यह मान रहे हैं तो फिर वे आन्दोलनकारी जनता के बीच पारा मिलिट्री फोर्स क्यों भेज रहे हैं ? यह इस तरह के बयान देकर ऐसे क्रांतिकारी विचारों को भयभीत करके जिनसे अप्रत्यक्ष हमें समर्थन मिलता है उसे समाप्त करना चाह रहे हैं।

विशद कुमार

स्वतंत्र पत्रकार

9234941942

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‘अनारकली आफ आरा’ का क्लाइमेक्स 28 बार री-राइट किया गया : अविनाश दास

(फिल्म ‘अनारकली आफ आरा’ की हीरोइन स्वरा भास्कर के साथ फिल्म लेखक और निर्देशक अविनाश दास. फाइल फोटो)

‘अनारकली आफ आरा’ देश भर में 24 मार्च को रीलीज़ हो रही है। ‘नील बटे सन्नाटा’ के बाद स्वरा भास्कर की यह महत्वाकांक्षी सोलो फिल्म है। प्रोमोडोम कम्युनिकेशन्स के बैनर तले बनी इस फिल्म में उसने एक सड़कछाप गायिका का किरदार निभाया है। फिल्म का निर्देशन किया है अविनाश दास ने। अनारकली की कहानी भी उन्होंने ही लिखी है। इससे पहले अविनाश दास प्रिंट और टीवी के पत्रकार रहे हैं। उन्होंने आमिर ख़ान की ‘सत्यमेव जयते’ के लिए भी रिपोर्टिंग की है। ‘अनारकली’ में स्वरा भास्कर के अलावा संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी और इश्तियाक़ ख़ान महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं। फिल्म का अनोखा संगीत रचा है रोहित शर्मा ने, जिन्होंने ‘शिप आफ थिसियस’ में भी संगीत दिया था।

‘अनारकली आफ आरा’ एक सोशल म्‍यूजिकल ड्रामा है। अनारकली बिहार की राजधानी पटना से चालीस किलोमीटर दूर आरा शहर की एक देसी गायिका है, जो मेलो-ठेलों, शादी-ब्‍याह और स्‍थानीय आयोजनों में गाती है। यह फिल्‍म एक ऐसी घटना से जुड़ी है, जिसके बाद अनारकली का जीवन एक उजाड़, डर और विस्‍थापन के कोलाज में बदल जाता है।

अनारकली के गीत लोगों के मन के दबे हुए तार छेड़ते हैं। उसे सुनने वाले उस पर फिदा हो जाना चाहते हैं और अनारकली अपने प्रति लोगों की दीवानगी को अपनी संगीत यात्रा में भड़काती चलती है। उसके प्रेम का अपना अतीत है और सेक्‍स पर समझदारी के मामले में रूढ़ीवादी भी नहीं है। इतनी खुली शख्‍सीयत के बावजूद उसके पास एक आत्‍मसम्‍मान है, जिसका एहसास वह कई मौकों पर सामने वाले को कराती भी रहती है। वह एक तेवर रखती है, जिसमें जमाने की परवाह नहीं है, लेकिन रिश्‍तों के मामले में संवेदनशील भी है। फिल्‍म में उसके इर्दगिर्द पांच लोग हैं – जो उसके प्रेम के एक ही धागे में बंधे हैं। सब अपनी अपनी तरह से अनारकली को प्रेम करते हैं। लेकिन आखिर में अनारकली को अकेले ही अपने रास्‍ते पर जाना है और वही होता है। पूरी कहानी में कठिन से कठिन मौकों पर उसकी आंखें आंसू नहीं बहाती और बाहर की उदासी को वह अपनी हिम्‍मत से खत्‍म करने की कोशिश करती है। अनारकली एक ऐसा किरदार है, जो हिंदी सिनेमा में अब तक नहीं आया है।

इस फिल्म के निर्देशक और लेखक अविनाश दास की खुद की कहानी भी कम मजेदार नहीं है. अविनाश दास ने प्रभात खबर से पत्रकारीय करियर शुरू किया और दिल्ली पहुंचे जहां एनडीटीवी के हिस्से बने. नौकरियां, पद और ग्लैमर इन्हें बांध नहीं पाया. एनडीटीवी हो या ब्लागिंग हो या अखबार हो या इवेंट, हर कुछ करने के बाद आगे की यात्रा पर कुछ नया खोजने रचने निकल पड़ते अविनाश. उनका ताजा हासिल है यह फिल्म. फिल्म नगरी के साथ साथ संपूर्ण मीडिया इंडस्ट्री भी सांस रोके अविनाश की फिल्म का इंतजार कर रहा है. अविनाश से भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत ने कुछ चुनिंदा सवाल किए जिनका बेबाकी से जवाब अविनाश ने दिया. नीचे है बातचीत :   

-अगर आप एनडीटीवी में ही नौकरी कर रहे होते तो क्या होते?
–एनडीटीवी में होता तो ख़बर लिखते, बनाते, काटते, छांटते अब तक सड़ चुका होता। फ्रस्टेड हो चुका होता।

-बड़ा संकट ड्रिस्ट्रीब्यूशन का है. कैसे करा पाएंगे फिल्म को पूरे देश में रिलीज?
–पीवीआर जैसी बड़ी कंपनी रीलीज़ हो रही है। वैसे भी यह प्रोड्यूसर का अधिकार क्षेत्र है। मेरा काम फिल्म बनाना था, मैंने बनायी। अब वह प्रोड्यूसर की संपत्ति है। चाहे वह उसे कूड़े में डाले या लोगों को दिखाये – यह वही तय करेगा। मुझे ख़ुशी है कि मेरे प्रोड्यूसर ने हर चीज़ टाइमलाइन के हिसाब से की है।

-फिल्म निर्माण से जुड़ा सबसे मुश्किल क्षण क्या रहा?
–सबसे मुश्किल क्षण रहा फिल्म का क्लाइमेक्स डिसाइड करना और उसे शूट करना। क्लाइमेक्स को 28 बार री-राइट किया। तीन दिन में उसे शूट करना था, लेकिन नहीं हो पाया। संजय मिश्रा का अगले दिन का डेट नहीं था। वे साजिद नाडियाडवाल की फिल्म बाग़ी के लिए देश से बाहर जा रहे थे। तो साजिद से लेकर संजय जी को मनाना और एक दिन आगे तक उन्हें रोकना – वह सब ज़ेहन में आता है तो रूह कांप जाती है। अगर वे चले गये होते तो फिल्म डब्बाबंद हो जाती।

-मुंबई पूरी तरह सेटल हो गए या दिल्ली से अभी नाता है?
–हम तो मुंबई में बस गये हैं, पर परिवार अभी दिल्ली में है। इसलिए दिल्ली तो जाते हैं, लेकिन घर से बाहर नहीं निकल पाते। वैसे मार्च में परिवार भी बोरिया बिस्तर समेत मुंबई आ रहा है।

-आपका चर्चित ब्लाग ‘मोहल्ला’ रहा है. क्या इसे वक्त दे पाते हैं?
–हमने पूरे मन से मोहल्ला लाइव को वक्त दिया। लेकिन वो एक इनडीविजुअल एफर्ट था। उसका आर्थिक व्याकरण दुरुस्त नहीं हो पाया। मेरी उसमें काबिलियत भी नहीं। जब बड़े बड़े संस्थान वेबसाइट-ब्लाग्स लेकर आने लगे – तो मुझे लगा, मेरा जो काम था – वह हो गया। अब आगे का सफ़र करना चाहिए। वैसे अब कुछ इनवेस्टर्स आ रहे हैं मोहल्ला लाइव के लिए। तो जल्दी ही उसे री-स्ट्रक्चर करना पड़ेगा। लेकिन इस बार मेरी जगह उसे कोई और लीड करेगा।

-अपने पत्रकारीय करियर के बारे में बताएं.
–रांची में मेरी पढ़ाई हुई, तो स्कूल के ज़माने से हरिवंश जी को जानता था। पटना से 1996 में प्रभात ख़बर का संस्करण शुरू हुआ, तो उन्होंने मुझे काम करने और सीखने का मौका दिया। फिर महज़ पच्चीस साल की उम्र में उन्होंने मुझे पटना संस्करण का संपादक बना दिया। देवघर संस्करण लांच करने का मौका भी दिया। इस बीच मैं दूसरी जगहों पर भी गया, लेकिन बार-बार प्रभात ख़बर में लौटता रहा। देवघर में संपादक रहते हुए मैंने दिबांग के एक चिट्ठी लिखी थी। तब एनडीटीवी नया नया स्वतंत्र चैनल के रूप में सामने आया था। उन्होंने मुझे देवघर से बुला कर आउटपुट एडिटर बना दिया। फिर तीन साल के बाद दिबांग जब एडिटर नहीं रहे, तो मेरा कांट्रैक्ट रीन्यू नहीं हुआ। फिर मैं दैनिक भास्कर ज्वाइन किया। मुंबई मिरर और मिड डे की तरह एक टेबलाॅयड निकालने की योजना थी। मुझे उसको लीड करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। पर साल होते होते एक अप्रिय प्रसंग ने पत्रकारिता से मेरा मोहभंग हो गया। मैंने ठान ली कि अब पत्रकारिता नहीं करूंगा। यह 2009 की बात है। फिर रोज़ी रोटी के लिए छोटे-मोटे काम किये, लेकिन उद्देश्य मीडिया से बाहर अपने पंख उगाने, फैलाने का था। आज मुझे ख़ुशी है कि मैंने जो सोचा – वह मुझसे हो पाया।

अविनाश दास से संपर्क avinashdasfilms@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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Priya Singh Paul claims that she is daughter of late sanjay gandhi!

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पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत की अवधारणा पेश करने वाले खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से विशेष बातचीत

खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से मुहम्मद जाकिर हुसैन की खास बातचीत : जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है… आम जनता को खुश करने के लिए नहीं है शास्त्रीय संगीत… 

जाने-माने खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय 6-7 जनवरी 2017 को भिलाई-दुर्ग आए थे। महान गायक पं. कुमार गंधर्व के शिष्य होने के नाते उनकी अलग पहचान है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित पृष्ठभूमि वाली कुछेक हिंदी-मराठी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज दी है। यहां दुर्ग के शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर कॉलेज में शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक संगोष्ठी में हिस्सा लेने आए पं. देशपांडेय से मेरी लंबी बातचीत हुई। पं. देशपांडेय को प्रख्यात पेंटर सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित रजा सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। संयोग से बातचीत के दौरान इसी कॉलेज में प्रोफेसर और रजा अवार्ड प्राप्त प्रख्यात चित्रकार योगेंद्र त्रिपाठी भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान पं. देशपांडेय ने शास्त्रीय संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर रियालिटी शो और फिल्मों तक ढेर सारे सवालों के जवाब बड़े धीरज के साथ दिया। धाराप्रवाह बातचीत के दौरान उन्होंने शास्त्रीय संगीत और उसके व्याकरण पर भी बहुत कुछ कहा। इसलिए इंटरव्यू बनाने के  दौरान मैनें अपने शहर के वरिष्ठ संगीतज्ञ प्रख्यात वायलिन वादक पं. कीर्ति माधव व्यास से भी कुछ जरूरी सलाह ली। जिससे कि तथ्यात्मक गलती न जाए। इसके बाद तैयार हुआ यह पूरा इंटरव्यू-

-शास्त्रीय संगीत की शिक्षण पद्धति कैसी होनी चाहिए, खास कर बच्चों के लिए?

-आज बच्चों को शास्त्रीय संगीत के नाम पर व्याकरण ज्यादा बताया जाता है। ऐसे में हमारे बच्चे शास्त्रीय संगीत को सरलता से कैसे आत्मसात कर पाएंगे? मैं बच्चों को बताऊं कि भूप में मध्यम और निषाद वज्र्य है और तीन ताल की मात्राएं 16 हैं तो बच्चे बोर हो जाएंगे। अगर मैं राग भूप के तराने से ही शुरूआत करूं तो बेहतर होगा। दरअसल आज लोगों के पास आधे-पौन घंटे की बंदिश सुनने का भी धीरज नहीं है। इसलिए मैंने फाइव मिनिट्स क्लासिकल म्यूजिक (एफएमसीएम) का कांसेप्ट दिया है।

-तराना ही क्यों..?

-मेरा मानना है कि आपकी मातृभाषा अलग-अलग हो तो भी आप तराना गा सकते हैं। मैनें पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत (एफएमसीएम) की जो अवधारणा दी उसमें एक-एक राग का एक-एक तराना स्कूली बच्चों को बताया जाता है। महाराष्ट्र के स्कूलों में यह प्रयोग चल रहा है। इसके लिए करीब 20 तराने मैंने गाए हैं और 30 अन्य कलाकारों से गवाए हैं। मैंने स्पिक मैके के प्रोग्राम में एक लोकप्रिय गीत ‘कजरारे-कजरारे’ लिया और उसे 8 मात्रा के एक चक्र के बजाए 8-8 मात्रा के दो चक्र (16 मात्रा) में गा कर बताया। इससे बच्चे भी खुश हो गए और उनकी हमारे संगीत की विविधता भी समझ में आ गई। बात सिर्फ ‘कजरारे-कजरारे’ की नहीं है, आप आज का कोई भी लोकप्रिय गाना लेकर आइए मैं उसे एक ताल या तीन ताल में बनाके बच्चों को बताउंगा तो उसमें बच्चे एन्ज्वाय करेंगे और संगीत को भी समझेंगे।

-बच्चों का शिक्षण तो ठीक है लेकिन आम जनमानस तक शास्त्रीय संगीत को पहुंचाने का कलाकार का दायित्व कितना है?

-देखिए, हमारे शास्त्रीय संगीत में असीमित संभावनाएं हैं और वो किसी भी सच्चे कलाकार को हमेशा प्रेरित करती है। इससे कलाकार तो आनंदित होता ही है लेकिन ज्यादा से ज्यादा श्रोताओं तक पहुंचने का काम प्रतिभाशाली कलाकार कर नहीं पाते हैं। क्योंकि वो तो अपने परफार्मेंस और रियाज में व्यस्त रहते हैं। इसलिए सबसे बड़ी जवाबदारी अकादमिक क्षेत्र के लोगों की है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जो लोग संगीत के शिक्षण से जुड़े हैं और आज की पीढ़ी के सीधे संपर्क में हैं, यह उनका दायित्व है कि हमारे शास्त्रीय संगीत के प्रति युवा पीढ़ी में समझ पैदा करे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को संगीत से जोड़ें।

-आजादी से पहले और बाद के दौर में शास्त्रीय संगीत और कलाकारों को लेकर क्या बदलाव देखते हैं?

-आजादी से पहले संपर्क माध्यम उतने नहीं थे। ऐसे में समाज से शास्त्रीय संगीतकारों की अपेक्षाएं सिर्फ यही थी कि उसकी साधना में कोई बाधा न आए। तब कलाकार को लोकप्रिय होने की जरुरत नहीं थी। तब कलाकारों-पहलवानों को राजा-महाराजा का संरक्षण मिलता था। इसलिए जनता को खुश करने की तब नौबत नहीं आई थी। लेकिन स्वातंंत्र्य के बाद जब राजा-महाराजा का दौर खत्म हुआ तो भरण-पोषण के लिए कलाकारों का पाला जनता जनार्दन से पड़ा। ऐसे में कलाकारों ने नई तरकीबें ढूंढ निकाली। जैसे अतिगद्रुत तराने गाना या झाला बजाना।

-तो क्या शास्त्रीय संगीत आम जनता के लिए नहीं है?

-मेरा मानना है कि हमारे शास्त्रीय संगीत का स्वभाव आपस की गुफ्तगू जैसा है। मसलन एक कमरे में 10-20 लोग बैठे हैं और कलाकार गा या बजा रहा है तो वहां राग की बारीकियां उभर कर आएगी। अब वही कलाकार हजारों लोगों के बीच परफार्म करे तो पता नहीं कितने लोग इन बारीकियों को पकड़ पाएंगे। हमारा संगीत जनता को खुश करने के लिए नहीं है बल्कि यह बहुत हद तक स्वांत: सुखाय जैसा है। मैनें अपने जीवन में अपने गुरु पं. कुमार गंधर्व के अलावा पं. रविशंकर और पं. भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को सुना है तो उनका सर्वोत्तम मुझे घरेलू महफिलों में ही मिला है।

-तो शास्त्रीय संगीत फिर जनता विमुख हुआ ना?

-देखिए, आम जनता को तो द्रुत गति का संगीत ज्यादा आकर्षित करेगा। हमारा शास्त्रीय संगीत एक अलग तबीयत का है वो बहुत ही नाजुक है और मौन की तरफ ले जाता है। आबादी बढ़ी है तो जनता को आकर्षित करने की तरकीबें भी निकाली गई हैं। जरूरी नहीं कि उससे सच्चा कलाकार भी खुश हो। मान लो मेरी महफिल हो रही है तो उसमें मैं एक हजार लोगों को खुश करूं, उससे बेहतर होगा कि मैं समझ रखने वाले 5 लोगों के लिए अपना संगीत पेश करुं। मैं ग्रेट ब्रिटेन कई बार गया हूं। वहां शेक्सपियर को पढऩे वाले लोग वहां की आबादी के हिसाब से 1-2 प्रतिशत ही होंगे। हमारी शास्त्रीय कलाएं हमेशा सीमित लोगों तक रही हैं और इसमें वो लोग खुश थे। जनता अभिमुख कला का होना ये तो आजादी के बाद आया है और ये कोई उत्कृष्टता की कसौटी नहीं है।

-सुगम संगीत का अपना श्रोता वर्ग है और वो शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा कहीं ज्यादा बड़ा है?

-वह तो होगा ही। सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत में फर्क ये है कि सुगम संगीत पूर्व निश्चित है। जैसे ‘आधा है चंद्रमा रात आधी’ गाना किसी सिचुएशन से बना है। अब ये गाना आपको 2017 में भी अच्छा लगता है तो मैं इर्ष्या करुंगा कि क्या खुश आदमी है ये कि इसको उसी गाने से तृप्ति मिल जाती है। लेकिन जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में दो वैश्विक रिदम छह मात्रा का दादरा और 8 मात्रा का कहरवा है। इसके दुगुने मात्रा के ताल हमारे ख्याल संगीत में बनें। ताल का पहला आधा और दूसरा आधा ये कंसेप्ट दुनिया के किसी भी संगीत में नहीं है मैं इस संगीत को श्रेष्ठ बताने का दावा नहीं कर रहा हूं,इसकी खासियत बता रहा हूं।

-शास्त्रीय संगीत में खास कर गायन में किन तत्वों का समावेश होता है और श्रोता वर्ग इनसे किस हद तक प्रभावित होता है?

-शास्त्रीय संगीत में एक कलाकार का स्वभाव, उसके संस्कार, उसकी तालीम और उसकी तत्काल स्वस्फूर्तता जैसे तत्वों से प्रस्तुति का रूप बनता है। इसलिए हमारे संगीत की ये परंपरा रही है कि उसी गायक के उसी राग को ताल में गाए जाने वाले उसी बंदिश को सुनने के लिए वही श्रोता इस उम्मीद पर बार-बार जाते हैं कि अब कुछ नया होगा। यह बात आप दूसरे संगीत में नहीं पा सकते। हमारे संगीत का वैभव और इसकी ऊंचाई है कि हर स्तर पर किसी भी उम्र में लोग बंदिशों का आनंद ले सकते हैं। शास्त्रीय संगीत में नवनिर्माण की खासियत है और जिसको इसका चस्का पड़ जाए तो यही आनंद उसके लिए बहुत है। इसके बाद दस हजार लोगों को संगीत अच्छा लगता है कि नहीं इससे उसे क्या वास्ता…?

-आपके गुरू पं. कुमार गंधर्व इस बारे में क्या सोचते थे? उनकी शिक्षण पद्धति कैसी थी?

-पं. कुमार गंधर्व को करोड़ों लोगों ने सुना पर उन्होंने कभी जनता के लिए समझौता नहीं किया। कोई उनकी कोई नकल करे या उनका कोई घराना बने ये उनकी इच्छा कभी नहीं थी। वो कहते थे कि मेरा सौंदर्य विचार, मेरा सांगीतिक विचार है। जब वो सिखाने बैठते थे तो हम लोगों को कोई विशिष्ट राग के साथ उससे जुड़ी परंपरा और अन्य पहलू भी समझाते थे। उसके बाद कहते थे-मैनें आपको बता दिया, अब आप अपना रास्ता ढंूढो और इसलिए ही मैं उनके श्रेष्ठ गुरू मानता हूं। उनकी जगह कोई और होता तो रटवा लेता। लेकिन उनका भी शिक्षण ऐसा ही हुआ था। हमारे पंडित जी के गुरूजी पं. बीआर देवधर जी ने भी ऐसे ही गायकी का हर रंग बताने के बाद कहा था कि-अब आप अपना गाना बनाओ। गुरूजी पं. कुमार गंधर्व का कहना था कि जब आप गाने बैठते हैं तो अष्टांग का प्रदर्शन नहीं लगना चाहिए। वे मानते थे कि गाना अष्टांग के लिए नहीं बना है कि हमें आलाप, बोल आलाप और बोलतान सब कुछ मालूम है और हम सभी का प्रदर्शन कर दें। ऐसा जरूरी नहीं बल्कि जो बंदिश आप गा रहे हैं उसमें जो अनुकूल व प्रभावशाली है, वही प्रदर्शित करें। उनका मानना था कि गायिकी किसी भी अंग की अति न करो।

-ऐसे में आप पश्चिमी संगीत को किस पैमाने पर रखते हैं?

-पश्चिमी संगीत दरअसल पूर्व निश्चित होता है। महान संगीतकार जुबिन मेहता की सिंफ नी सुनिए,वहां आप हमेशा आउटसाइडर रहेंगे। वहां सवा सौ लोगों की टीम है। जिसमें 15 वायलिन, 10 फ्ल्यूट,16 ड्रम और 20 सैक्सोफोन सहित तमाम वाद्य हंै और इन सबके मिलने से बहुत ही सुंदर सिम्फ नी बनती है लेकिन यह सब तो पूर्व निश्चित है। वो लोग स्कोर बोर्ड में लिखा हुआ पढ़ कर स्कोर बजाते हैं। मैं उनके संगीत को छोटा नहीं बता रहा हूं लेकिन वहां तत्काल में अपना कुछ देने के लिए कलाकार के पास गुंजाइश नहीं होती। इसके विपरीत हमारे यहां तो सामने कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता। यहां तो कलाकार का मूड, उसकी तालीम,उसके संस्कार और उसकी तात्कालिक समझ ये सब मिल कर हमेशा एक नई सर्जना रचते हैं। हमारे संगीत में जो क्षमताएं हैं,वो चिरंतन है। इसलिए इसको ज्यादा लोकप्रिय होने की तमन्ना कभी नहीं रही।

-आपने महज तीन चुनिंदा फिल्मों में पाश्र्वगायन किया। इसकी क्या वजह थी?

-क्योंकि इन तीनों फि ल्मों में शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित ही प्रसंग था। फि र वो लोग मुझे जानते भी थे। इसलिए उन्होंने मुझे चुना तो मुझे हट के कुछ नहीं करना पड़ा। शशि कपूर की ‘विजेता’ फि ल्म में रेखा ”भीनी-भीनी भोर आई” गीत में अपने उस्ताद से संगीत सीख रही है। वहीं फिल्म ‘लेकिन’ में हेमा मालिनी के मुजरे के दौरान ”झूठे नैना बोले सांची बतिया” गीत में उस्ताद जी भी साथ दे रहे हैं। ये ‘झूठे नैना’ वाली बंदिश मेरी ही तैयार की हुई थी। इन दोनों गीतों में मैनें आशा भोंसले के साथ पाश्र्वगायन किया। वहीं 1996-97 में आई मराठी फि ल्म ‘हे गीत जीवनाची’ भी शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर बनी थी। जिसमें मैनें लता मंगेशकर के साथ पाश्र्वगायन किया। इसके बावजूद फिल्मों में गाना मेरे लिए कोई बहुत ”ग्रेट” चीज नहीं है।

-शास्त्रीय संगीत के बहुत से कलाकार फि ल्मों से दूर रहना पसंद करते हैं, इसकी क्या वजह है?

-पहली बात तो अब ऐसी फि ल्में नहीं बनती जिसमें हमारे शास्त्रीय संगीत के लिए ठीक-ठाक भी गुंजाइश हो। फि र जिसे एक मुक्त इंप्रोवाइजेशन का चस्का लग जाए यानि कि आप एक रटा हुआ फार्मूला पेश नहीं कर रहे हैं और अपने संगीत को हर बार अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे हैं तो आपको फिल्मों के ऐसे पूर्व निश्चित 3-4 मिनट के गाने में रूचि नहीं रहेगी। किशोरी अमोणकर को भी तो ऐसे मौके आए थे पर उनका मन नहीं लगा। मुझे भी नहीं लगता कि मैं किसी प्रोड्यूसर के पास जाउं या उनको बुलाऊं या उनसे संबंध रखूं, जिससे वो मुझे भी प्लेबैक दें। प्लेबैक से मुझे कोई फ र्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात नहीं कहता। हर शास्त्रीय संगीत के कलाकार को फिल्मों का आकर्षण होता ही नहीं है।

-लेकिन फिल्मी गायन को लेकर आप जैसे कलाकारों में इतनी तल्खियां क्यों है ?

-हमारे यहां फिल्मों में आज कल जो चेहरे दिखते हैं उन पर तो भले आदमियों की आवाज सूट नहीं होगी। मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन फि ल्मी संगीत में जो आज के दौर में हैं, ऐसे लोगों की जीवन शैली में ही संगीत नहीं है। आज विडम्बनाएं बहुत सी हैं। मेरे मित्र सुरेश वाडेकर कितना सुरीले गाने वाले हैं लेकिन आज उनको कोई काम नहीं है। ये अलग बात है कि सुरेश वाडेकर अपना विद्यालय चलाते हैं और संगीत शिक्षण में व्यस्त हैं। उनका आनंद इसी में है।

-टेलीविजन चैनलों पर संगीत के रियालिटी शो को आप किस नजरिए से देखते हैं?

-मेरी समझ में नहीं आता कि इन रियालिटी शो में बैठे ज्यादातर निर्णायकों को ऐसा क्यों लगता है कि गाना यानि किसी की हू ब हू नकल करना है। होना तो ये चाहिए कि अगर रफी साहब या लता जी का गाना है तो उसे आप प्रतियोगी के तौर पर कैसे गाते हैं। अब जो जज बैठे होते हैं वे भी कहते हैं कि लता जी की तरह उसने अच्छा गाया। ये तो नकल की बात हुई ना, आपकी अपनी बात कहां आई इसमें? ऐसा इसलिए है कि ये जो जज बनाए गए हैं, वे इन प्रतियोगियों से उम्र में ज्यादा और थोड़े बेहतर हैं। इसके अलावा क्या है इनके पास? जरूरी नहीं कि ये उन प्रतियोगी बच्चों से ज्यादा टैलेंटेड हों।

-लेकिन टेलीविजन चैनल भी तो श्रोताओं तक पहुंचने का माध्यम है?

-बिल्कुल है और मैं इन चैनलों की भूमिका से इनकार नहीं कर रहा हूं। मैं दरअसल रियालिटी शो की रियालिटी पर बात कर रहा था। वैसे मैं बताऊं अढ़ाई महीना पहले ठीक दीवाली के दिन जब लोग पटाखों और रोशनाई में वक्त बिताना चाहते हैं, तब ‘जी मराठी’ ने मेरे डेढ़ घंटे के दो सेशन टेलीकास्ट किए। इसके बाद मुझे हजारों लोगों की प्रतिक्रियाएं आई। सोशल मीडिया में बधाई मिली। तो मैं मानता हूं कि सैटेलाइट चैनल भी श्रोताओं तक पहुंचने का बड़ा माध्यम है।

-अपने अब तक के संगीत जीवन को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे? कुल जमा हासिल और आगे की चाहत?

-महान संगीतकार पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने अपना गायन प्रदर्शन छोड़ कर शास्त्रीय संगीत के प्रचार कार्य के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग ऐसा नहीं कर पाए। हम लोगों ने अपने तरीके से शास्त्रीय संगीत को पल्लवित करने में योगदान दिया। मैं संगीत पर कुछ लिख पाया हूं। खुद को अभिव्यक्त करने मैनें संगीत को माध्यम बनाया। मैं कुछ प्रमुख रागों की रचना कर पाया हूं, जिसे मेरे समकालीन और नई पीढ़ी के लोग गाते हैं। ये अच्छी बात है कि वे लोग मेरी नकल नहीं करते हंै। मेरा मानना है कि हमारी बंदिशों में वो गुण होना चाहिए कि आप उसे अपने तरीके से गा सकें। उम्र के इस पड़ाव में भी मैं वही राग फिर से गाऊं और उसमें मुझे कुछ नया दिखता है, तो मैं गाता रहूंगा और जिस दिन मुझे नई बात नहीं दिखेगी तो नहीं तो गाना बंद कर दूंगा।

एनएफआई की फैलोशिप प्राप्त पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन हरिभूमि भिलाई में सेवारत हैं। उनसे 09425558442 पर संपर्क किया जा सकता है.

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अंग्रेजी अख़बार ‘मिल्ली गज़ट’ बंद, पढ़िए एडिटर ज़फरुल इस्लाम खान से विशेष बातचीत

एडिटर ज़फरुल इस्लाम खान ने ‘एशिया टाइम्स’ को दिए इंटरव्यू में कहा- ”भारत के मुसलमानों की प्राथमिकताओं में मीडिया शामिल नहीं”

नई दिल्ली : वर्ष 2016 के दिसंबर के अंतिम दिनों में यह खबर मिली कि सत्रह साल से जारी अंग्रेजी पाक्षिक ‘मिल्ली गजट’ ने अपने पाठकों को अलविदा कह दिया। अंतिम अंक ३१ दिसंबर को प्रकाशित हुआ। वास्तव में यह खबर बेहद दुखदहै। ‘मिल्ली गजट’ के संपादक डॉक्टर ज़फरुल इस्लाम खान ने यह अखबार सन 2000 में इस सोच के साथ शुरू किया था कि वे भारतीय मुसलमानों की आवाज़ देश -विदेश तक पहुंचाएंगे जिसे नेशनल मीडिया में कोई जगह नहीं दी जाती। लेकिन मीडिया की इस घाटी में काफी समय तक खाली हाथ यात्रा कब तक संभव है।

सत्रह वर्ष के बीच कई बार हिंदुस्तानी मुसलमानों को पुकारने के बाद भी जब कोई साथ न आया तो अंततः उन्हें यह दुखद घोषणा करनी ही पड़ी कि अब अधिक यात्रा संभव नहीं है। एशिया टाइम्स ने जरूरी समझा कि इस बारे में मिली गज़ट के संपादक से एक विस्तृत बातचीत की जाये  और यह जानने की कोशिश की जाए कि आखिर उन्हें किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा और समस्याओं के समाधान के लिए उनकी क्या कोशिशें रहीं। पेश है ‘मिल्ली गज़ट’ के संपादक डॉक्टर ज़फरुल इस्लाम खान से अशरफ अली बस्तवी की यह विशेष बातचीत…

-दिसंबर के अंत में हमें यह दुर्भाग्यपूर्ण खबर मिली कि ‘मिल्ली गज़ट’ अब नहीं प्रकाशित होगा, बंद करने की वजह क्या रही?

-मिली गज़ट बंद करने की कोई एक वजह नहीं रही। समय के साथ साथ वित्तीय घाटा और अन्य समस्याएं बढ़ती चली गईं। सन 2000 में जब हमने इसे शुरू किया था उस समय काम करने वाले लोग 3 हजार में मिल जाते थे लेकिन अब तो 15 हजार में भी नहीं मिल पाते और न लोग इसे खरीद कर पढ़ते हैं, न ही विज्ञापन देते हैं। आखिर इस तरह कब तक चलाया जा सकता था। अलबत्ता हमें अख़बार मुफ्त जारी करने के पोस्टकार्ड जरूर आते रहते थे। हमने अपने अखबार के लिए कभी कोई चंदा नहीं किया। अपने तौर पर कुछ लोगों ने जरूर दिया। बड़ी मदद की। लेकिन ऐसा कोई चंदे का अभियान कभी नहीं चलाया। घाटा जो पहले 30 हजार मासिक था अब डेढ़ लाख तक पहुंच गया था। इसे सहन कर पाना हमारे लिए मुश्किल हो गया था। इसलिए हमने बंद कर देने का फैसला लिया। हालांकि हमें शुरुआती दिनों में ही यह एहसास हो गया था लंबा नहीं चला जा सकता लेकिन हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ते रहे। तीन साल पहले हिम्मत हार गए लेकिन कुछ लोगों के आश्वासनों और प्रेरणा की बदौलत जारी रखना उचित समझा। अब मेरी अपनी सेहत भी साथ नहीं देती। इसकी वजह से मेरे कई जरूरी काम भी प्रभावित हो रहे थे। इस दौरान एक समय ऐसा भी आया कि हमने खर्च पर काबू पाने के लिए पेज कम कर दिए लेकिन फिर भी मुश्किल कम नहीं हुई। मैंने हमेशा इस बात की कोशिश की कि मिल्ली गज़ट किसी के अधीन न रहे। एक घटना यह है कि ‘मिल्ली गजट’ शुरू हुए अभी तीन साल ही हुए थे कि कश्मीर से भारतीय सेना द्वारा हमारे पास एक प्रस्ताव आया कि हमारी कुछ अच्छी खबरें अपने यहां प्रकाशित करें जिसका हम 40 हजार रुपया मासिक देंगे, लेकिन हमने तुरंत मना कर दिया। हमने कहा कि हम तो सेना की बर्बरता को भी प्रकाशित करेंगे। कुछ महीने पहले ही हमारे पास एक और ऑफर आया। एक राजनीतिक पार्टी का ऑफर था कि हम मिल्ली गज़ट  में पैसा लगाना चाहते हैं। हमने उसे भी मना कर दिया। मिल्ली गज़ट की 16 से 31 दिसंबर की प्रकाशित कॉपी ही अंतिम कापी है।

-‘मिल्ली गज़ट’ आप ने कब और किन हालात में शुरू किया था, आप के सामने क्या उद्देश्य थे?

-मैंने सन 2000 में मिल्ली गज़ट निकाला। तब मेरी अच्छी नौकरी थी। सऊदी अखबार ‘अल रियाज़’ में नुमाइंदे के रूप में काम कर रहा था। बहुत अच्छा वेतन था। ‘अल रियाज़’ में नौकरी का यह सिलसिला चार पांच साल तक चला। इस बीच हमने जब गुजरात के मुसलमानों के साथ सरकारी स्तर से की जाने वाली ज्यादतियों सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों को जोरदार ढंग अल रियाज़ में उठाया तो यहीं से मतभेद शुरू हो गए। फिर एक दिन भारत में तैनात सऊदी राजदूत ने मुझे बुलाकर कहा कि हम भारत से अच्छे संबंध बनाना चाहते हैं और आप रिश्ते खराब करने की कोशिश करते हैं। राजदूत ने कहा कि कोई ऐसी चीज़ न भेजें जो सरकार के खिलाफ हो। यह प्रतिबंध मुझे रास नहीं आया और फिर आगे चलकर यह सिलसिला टूट गया। ‘मिल्ली गज़ट’ निकालने की बुनियादी वजह यह थी कि हमारे समाचार सिर्फ उर्दू में ही रह जाते हैं, अंग्रेजी में नहीं आते। मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि जब भी आप अंग्रेजी अखबार उठाएं तो ऐसा महसूस होता है कि देश की मुस्लिम आबादी सो रही है। क्या उन्होंने कल कुछ नहीं किया? ऐसा तो नहीं हो सकता। किसी ने कोई महत्वपूर्ण कारनामा किया होगा। किसी ने किताब लिखी होगी। किसी को उसकी सेवाओं के लिए पुरस्कार भी मिला होगा। किसी ने कोई शैक्षिक संस्थान स्थापित किया होगा। कुछ गलतियाँ भी की होंगी। लेकिन नेशनल मीडिया को मुस्लिम समस्या से कोई दिलचस्पी नहीं। हाँ, यदि किसी ने तीन तलाक दे दिया तो फिर मुस्लिम नेशनल मीडिया के लिए खबर है। हमने अपने यहां इस तरह की बातें पब्लिश की और अंतिम अंक तक यह काम जारी रहा। कई बार अपने लोगों को भेजकर हम ग्राउंड रिपोर्टिंग भी कराते। कुशीनगर में एक डेलिगेशन लेकर गए तथ्यों का पता लगाया। इंदौर में अपने आदमी को भेजकर रिपोर्टिंग कराई। इम्फाल में अंग्रेजी अखबार द पायनियर ने एक खबर प्रकाशित की कि यहाँ इस्लामी राज्य बनाने की कोशिश हो रही है तो हमने ग्राउंड रिपोर्टिंग की और खुद मणिपुर के पुलिस महानिदेशक ने इस खबर को खारिज किया। हम नेशनल मीडिया की गलत रिपोर्टिंग का पीछा करते हुए तथ्य सामने लाने की कोशिश करते रहे। हमने उर्दू प्रेस से मिली खबरों का अंग्रेजी में अनुवाद करने का काम किया। यही ‘मिल्ली गज़ट’ का उद्देश्य था।

-आप को ‘मिल्ली गज़ट’ चलाने में क्या कठिनाइयां आईं और आप गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए कैसे काम करते थे?

-हमने कभी महज पेज भरने का काम नहीं किया। हमें अंतिम दिन तक देर रात तक पर्चा फाइनल करना पड़ता था। अक्सर हम अपनी लीड स्टोरी अंतिम चरण में भी बदल देते थे। हमने मुस्लिम मुद्दों को पेश करने की हर संभव कोशिश की। लेकिन हमने पिछले सत्रह वर्षों में देखा कि मुस्लिम समुदाय को इसकी जरूरत नहीं है। आप देखते हैं कि हर हफ्ते अखबार में कोई न कोई तहरीर ज़रूर नज़र आ जाएगी कि मुसलमानों के पास उर्दू मीडिया के अलावा अपना अंग्रेजी या हिंदी अखबार या चैनल हो, लेकिन अगर मुसलमान अखबार खरीद कर नहीं पढ़ेंगे तो कोई अखबार कैसे चलेगा? अगर आज ‘मिल्ली गज़ट’ तीस चालीस हजार कॉपी निकलता तो बंद करने की नौबत न आती। मिल्लत को सोचना चाहिए कि आखिर ‘मुस्लिम इंडिया’, कालीकट से पब्लिश होने वाला ‘मीन टाइम’ क्यों बंद हो गया। सैयद हामिद साहब का ‘नेशन एंड द वर्ल्ड’ की यह स्थिति क्यों हो गई? हां, दूसरे लोग हमारा अखबार सिर्फ यह जानने के लिए खरीदते हैं कि हमने क्या लिखा है। आरएसएस बड़ी पाबन्दी से हमारा अखबार खरीदता रहा।

-सत्रह वर्ष की यात्रा में कोई ऐसी घटना घटी हो जिसका आप को अफसोस हुआ?

-जी हाँ! दो बार ऐसा मौका आया, जब हमें बेहद तकलीफ हुई। गलतफहमी की वजह से हमारी रिपोर्ट दूसरों की परेशानी को सबब बन गई। हमसे गलतियाँ भी हुईं जिनके लिए हमने लिखित माफी भी माँग़ ली। एक बार ऐसा हुआ कि एक साहब अपना लेख लेकर आए जिसे हमने प्रकाशित कर दिया। बाद में पता चला कि यह उनका निजी मामला था। उनका उद्देश्य किसी पर कीचड़ उछालना था। हमारे लेख की वजह से कुछ लोगों को तकलीफ हुई। हालांकि हमारा किसी को नुकसान पहुँचाने का कोई इरादा नहीं था, जिसके लिए हमने लिखित माफ़ी मांग ली थी। इससे पहले हमने अखबार को तीन बार बंद कर देने का फैसला किया। हमारा मानना ​​था कि दो साल में इसे आत्मनिर्भर हो जाना चाहिए। विचार था कि एक बार अखबार खड़ा होने के बाद उसे लोगों के हवाले कर देंगे।

-बंद करने से पहले देश की प्रमुख मिल्ली संगठनों को पेश आने वाली समस्याओं से अवगत कराने की कोई कोशिश की?

-एक साल पहले हमने देश के सभी बड़े मुस्लिम संगठनों के प्रमुखों को पत्र लिखा उन्हें स्थिति से अवगत कराया और यह अनुरोध किया कि जारी रखने के लिए उपाय बताएं,   इसके बारे में कुछ सोचें, कैसे मदद कर सकते हैं, इस पर भी विचार करें। लेकिन अक्सर संगठनों से कोई जवाब नहीं आया। हालांकि पत्र दस्ती भिजवाया था। सिर्फ एक दो की ओर से जवाब मिला लेकिन उनमें भी केवल एक साहब ने कहा कि हम पहले से जारी अपने विज्ञापन की राशि बढ़ा रहे हैं और यह सहयोग स्थायी जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह तो मिल्लत पूंजी है, इसे कभी बंद नहीं होना चाहिए। लेकिन इस एक साल के दौरान वह भी पहले से जारी सहायता को धीरे-धीरे कटौती करते गए और फिर बंद कर दिया। यह हमारी स्थिति है। अब इस पर क्या कहा जाए। दरअसल हमारे धार्मिक रहनुमाओं ने जनता को सही मायने में अन्य मिल्ली जरूरतों पर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं किया। हमारे धार्मिक नेतृत्व के पास कोई बड़ी सोच नहीं है। उनको बस इतनी सी चिंता है कि हमारे अपने संगठन बने रहने चाहिए और इसका विस्तार होता रहे। उनके नजदीक इसके अलावा जो भी काम हो रहा है, कोई विशेष महत्व नहीं रखता। उन्होंने मिल्लत को यही समझया है। समस्या यह है कि हमारा धार्मिक नेतृत्व अपने दायरे के बाहर के लोगों को जो अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हैं उन्हें किसी की सलाह की कोई जरूरत महसूस नहीं करता। बस अपने लोगों तक ही बात होकर रह जाती है। जाहिर है मिल्लत में हर तरह की प्रतिभा मौजूद है। कोई वैज्ञानिक है, कोई अर्थशास्त्र का ज्ञान रखने वाला है, कोई मीडिया के मैदान से आता है। सभी की पहचान करके उन्हें करीब लाएं और उनसे उस मैदान में सलाह लें। उनकी बात को सुनने की तवज्जो किसी मिल्ली संगठन में नहीं है। सोचने की बात है कि 200 मिलियन होते हुए भी यह मिल्लत इतना कमजोर क्यों है?

-पिछले दिनों आपने सऊदी अरब में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत के मिल्ली नेतृत्व की कड़ी आलोचना की थी और परिवर्तन को आवश्यक करार दिया था। मामला क्या था ?

-हां, मैंने यह बात कही है कि बुज़ुर्ग नेतृत्व परिवर्तन किए बिना भारतीय मुसलमानों की समस्या का समाधान संभव नहीं है। पश्चिमी देशों में युवा नेतृत्व से हमें सबक लेना चाहिए, अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब तक के सबसे अधिक उम्र के राष्ट्रपति हुए हैं। वहाँ 43 साल की उम्र के भी राष्ट्रपति रहे हैं। आज से कोई पांच महीने पहले ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मैं 53 साल का हो गया हूँ, मेरी पार्टी के लोग समझते हैं कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ। पश्चिम में जवान नेतृत्व का कल्चर है, जबकि भारत में इसके विपरीत बड़ी उम्र के लोगों को ही आगे रखा जाता है। पश्चिम में अगर कोई बड़ी उम्र का होता है तो खबर बन जाती है जैसा कि इस बार ट्रम्प की खबर बन गई। यह हमारी मिल्लत की ही नहीं बल्कि यह हमारे देश की संस्कृति है। इसका नुकसान यह होता है कि निर्णय लेने में झिझक होती है। कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।

-मिल्ली गज़ट के बाद अब आप की मसरूफियत क्या होगी ?

-दरअसल ‘मिल्ली गज़ट’ की वजह से समय न मिल पाने के कारण मेरे कई अन्य कार्य भी प्रभावित हो रहे थे। कुछ काम करना चाहता था। जैसे आतंकवाद पर श्वेत पत्र लाना जिसकी घोषणा हमने कई साल पहले किया था लेकिन बीच में मुशावरत के  गोल्डन जुबली समारोह के कारण काम रुक गया था। अब मैं पूरी तरह से श्वेत पत्र पर लग गया हूँ, इंशा अल्लाह अगले चार पांच महीने में आ जाएगा। यह ऐसा उपयोगी साक्ष्य होगा जो मिल्लत को आरोपों से मुक्ति का सबब बनेगा। उसमें पुलिस के अधिकारों का दुरुपयोग,  फर्जी एनकाउंटर्स, हिरासत में होने वाली मौतों, सरकार द्वारा बनाए गए काले कानून पोटा, टाडा, मीसा, एनएसए आदि के विश्लेषण पर आधारित दस्तावेज होगा। इसमें रणवीर सेना, सिल्वा जुडम, कश्मीर में विलेज डिफेन्स समिति के नाम से जो गैर कानूनी काम कराए हैं उनका विश्लेषण होगा जो कम से कम एक हजार पेज का होगा। इस श्वेत पत्र के माध्यम से देश की अंतरात्मा को झकझोरने का काम किया जाएगा। 

मेरे मन में 2005 में ही यह काम आ गया था। अब हमारी पहली प्राथमिकता श्वेत पत्र है और दूसरी वरीयता क़ुरआन के अब्दुल्ला यूसुफ अली के अंग्रेजी अनुवाद के सुधार का है। यह पिछले 30 साल से मन में खटक रहा है। उस पर काम करना है। मेरा एहसास है कि मिल्ली गज़ट भारत के 200 मिलियन मुसलमानों के लिए वह काम नहीं कर पा रहा था जिसकी जरूरत थी। मुसलमानों को हर बड़े शहर से अंग्रेजी और हिंदी के अख़बार, एफ़एम रेडियो, टीवी चैनल खोलने चाहिए। यह कोई मुश्किल नहीं है। मुसलमान कर सकते हैं। लेकिन कम से कम पहले ऐसी सोच तो बनाएं। मीडिया को भी अपनी जरूरत बनाओ। केरल आदि में अच्छा काम हो रहा है। मिल्ली गज़ट का इंटरनेट संस्करण जारी रहेगा। ऑनलाइन पत्रकारिता की पहुंच काफी तेज है। पत्रकारिता के जो बड़े नाम ऑनलाइन पत्रकारिता में आए हैं, वे जहां थे वहां पर उन्हें घुटन होती थी। ये लोग भी उसे स्पॉन्सरशिप से ही चला रहे हैं। बड़ी कंपनियाँ अपनी आय का कुछ हिस्सा सामाजिक रेसपानसबलेटी के नाम पर खर्च करती हैं। मैंने व्यक्तिगत रूप से स्पांसरशिप लेने की कोई कोशिश नहीं की। इसके लिए खुद को तैयार न कर सका कि किसी के सामने हाथ फैलाया जाये लेकिन मैंने सभी को पत्र लिखा था। जो लोग हमारे लिए लिखते थे, अभी भी लिखते रहें।

यह इंटरव्यू ‘एशिया टाइम्स’ के लिए अशरफ अली बस्तवी ने किया. उनसे संपर्क ashrafbastavi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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इंटरव्यू : टी. जार्ज जोसेफ (वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, रिटायर्ड)

यूपी कैडर के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी टी. जार्ज जोसेफ भले ही कई बरस पहले रिटायर हो गए हों लेकिन उनको जानने चाहने वालों की कमी लखनऊ में नहीं है. ईमानदारी और सादगी के मामले में चर्चित जार्ज जोसेफ साहब पिछले दिनों वो दृष्टांत मैग्जीन की तरफ से आयोजित एक कार्यक्रम में लखनऊ आए तो उनसे नौकरशाही, राजनीति, जीवन समेत कई आयामों / मुद्दों पर विस्तार से बातचीत की भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने.

केरल के मूल निवासी जार्ज साहब अब मुंबई में रहते हैं. वे एक किताब लिख रहे हैं. अपने जीवन और करियर के अनुभवों को समेटते हुए एक फिक्शन कंप्लीट करने की तैयारी में हैं. अपने करियर में मुख्यमंत्रियों तक के दबावों को न मानने वाले टी. जार्ज जोसेफ का कहना है कि उनसे जूनियर को मुख्य सचिव बना दिया गया लेकिन उन्हें इसका मलाल नहीं हुआ क्योंकि उनके वरिष्ठता और ईमानदारी का इस्तेमाल न किया जाना सिस्टम / शासन का नुकसान है, मेरा कोई निजी नुकसान नहीं. पूरी बातचीत को सुनने देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

interview : T. George Joseph (Senior IAS)

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इंटरव्यू : ब्रजेश मिश्रा (एडिटर इन चीफ और चेयरमैन, यूपी टीवी)

लखनऊ में हजरतगंज स्थित यूपी टीवी के मुख्यालय जाकर भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह ने इस नए लांच हो रहे चैनल के एडिटर इन चीफ और चेयरमैन ब्रजेश मिश्रा से नए-पुराने दोनों चैनलों को लेकर विस्तार से बातचीत की. ईटीवी छोड़ने और यूपी टीवी शुरू करने के पीछ की कहानी ब्रजेश ने विस्तार से बताई. साथ ही इस बारे में भी जानकारी दी कि आखिर कैसे उनका यह नया चैनल यूपी का नंबर वन चैनल बन जाएगा. ब्रजेश मिश्र को ठीक से जानने वाले कहते हैं कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस शख्स के पास अदभुत विजन और अथक मेहनत करने की क्षमता के साथ-साथ पूरी टीम को उर्जा से भरकर लगातार चलते रहने के लिए प्रेरित करते जाने की पाजिटिव एनर्जी है.

इंटरव्यू के बाद ब्रजेश मिश्र ने यशवंत को वरिष्ठ पदाधिकारी श्रेय शुक्ला के साथ पूरे चैनल, न्यूज रूम, पीसीआर, एमसीआर, स्टूडियो आदि को दिखाया. ब्रजेश ने आफिस का एक-एक हिस्सा बारीकी से दिखाकर बताया कि दुनिया की नवीनतम तकनीक से लैस उनके इस चैनल के स्टूडियो की डिजाइनिंग फ्रांस के एक बड़े टीवी चैनल के इंटीरियर डेकोरेटर ने की है.

ब्रजेश का दावा है कि वे जिन तकनीकी का इस्तेमाल चैनल में कर रहे हैं, वह तकनीक किसी दूसरे रीजनल न्यूज चैनल के पास होना तो छोड़िए, ढेर सारे नेशनल न्यूज चैनलों के पास तक नहीं है. ब्रजेश का दावा है कि उनका चैनल टेस्ट रन के दौरान ही दूसरे रीजनल न्यूज चैनलों से ब्रेकिंग न्यूज के मामले में आगे निकल चुका है. उन्होंने उम्मीद जताई की अत्याधुनिक तकनीक, सबसे पहले ब्रेकिंग न्यूज और शानदार शोज के जरिए उनका चैनल लांच होने के मात्र कुछ हफ्तों में ही यूपी का नंबर वन न्यूज चैनल बन जाएगा. ब्रजेश मिश्र से हुई बातचीत का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

interview : Brajesh Misra (Editor-in-Chief and Chairman, UPTV

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साक्षात्कार- के.जी. सुरेश (महानिदेशक, आईआईएमसी)

भारत के प्रमुख मीडिया प्रशिक्षण संस्थान आईआईएमसी के महानिदेशक के.जी. सुरेश से पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप व चुनौतियों पर खास बातचीत…

पत्रकारिता के वर्तमान स्वरूप को आप कैसे देखते है?
–भारत में पत्रकारिता मिशन के रूप में शुरू हुई थी। जिसका उद्देश्य देश की आजादी था। आजादी के बाद इसने आपना रूख कामर्शियलाइजेशन की ओर किया। अब इसमें कॉर्पोरेट जगत है, कामर्शियल भी है। विश्व की तमाम बड़ी कंपनियां आज इसमें निवेश कर रही है। मेरा मानना है कि आज के दौर में भारत की पत्रकारिता ऐसे चौराहे पर खड़ी है। जहां से इसे अपना रास्ता चुनना पड़ेगा। उसी रास्ते से इसका भविष्य तय होगा। 

उदंत मार्तण्ड से शुरू हुई पत्रकारिता में आज किस प्रकार के बदलाव देखने को मिलते है?
— समय के साथ समाचार पत्रों के लेखन शैली, ले-आउट आदि में बदलाव आना स्वाभाविक है। आज समाचार पत्रों के सामने टीवी और सोशल मीड़िया, इंटरनेट की चुनौती है। इसलिए बदलाव तो जरूरी है। हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि इन सभी बदलाव के साथ पत्रकारिता की नैतिकता में बदलाव नहीं आए।

पत्रकारिता के लिए कहा जाता है कि “तथ्य पवित्र होते है, भाव स्वतंत्र” पर आज भाव किसी न किसी के गुलाम होते नजर आ रहे है?
— हम जब पत्रकारिता सीख रहे थे, तब हमें बताया गया था कि खबरों के कॉलम में खबर और विचारों के पेज पर विचार होने चाहिए। इन्हें एक दूसरे में मिलाना नहीं है पर आज ऐसा नहीं है। समाचार पत्रों में समाचार और विचारों का मेल प्रस्तुत किया जा रहा है। पत्रकार जिस विचारधारा का विरोद्ध करता है, उसकी खबरों में भी वह विरोद्ध नजर आने लगा है। यह पत्रकारिता के लिए घातक है। इससे पत्रकारिता की विश्वसनियता पर सवाह खड़े होते है। पत्रकार इस बात को जितनी जल्दी मान लें और समझ जाए उनके लिए उतना आच्छा होगा।

टीवी पर बहसों ने समाचार पत्रों में खबरों को किस प्रकार प्रभावित करती है?
—- आज #tag पत्रकारिता का चलन चल रहा है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में इंद्राणी मुखर्जी ने किसे मारा, यह पूरे देश का मुद्दा नहीं हो सकता। मुंबई के कुछ अपार्टमेंट में रहने वालों को दिक्कत हो, यह टीवी के बहस का मुद्दा है पर समाचार पत्रों के लिए नहीं। इन पत्रकारों को समझना चाहिए कि जनता बेवकुफ नहीं है, देश में क्या हो यह पत्रकार तय नहीं करेंगे। जनता सब कुछ जानती है और समय आने पर आपना फैसला भी सुना देगी।

पत्रकारिता में आ रहे युवाओं से काम की तो उम्मीद की जाती है पर उन्हें वेतन उस स्तर का नहीं दिया जाता है? 
— पत्रकार हमेशा से शोषित वर्ग रहा है। सरकार ने वेज बोर्ड का गठन तो किया पर उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई। कुछ समाचार पत्रों को छोड़ सभी ने इसका पालन नहीं किया। पत्रकार का स्वतंत्र होना बहुत आवश्यक है। नौकरी खोने के डर से वह काम नहीं कर सकता। तलवार की धार पर उससे काम नहीं कराया जा सकता।

पत्रकार तो हमेशा से समाज में हो रहे शोषण के विरूद्ध आवाज उठाता है पर अपने खिलाफ शोषण का विरोद्ध नहीं कर पाता है?
—- कोई नई बात नहीं है, पहले भी पत्रकार दूसरों के लिए लड़ता रहा। खुद दुर्गत की जिंदगी जीता रहा है। यह बहुत शर्मनाक बात है, इसा होना नहीं चाहिए। अब समय आ गया है कि सरकार पत्रकारों के लिए मूलभूत सूविधाएं मुहैया कराए। पत्रकार आर्थिक रूप से स्वतंत्र हुए बिना समाजिक सरोकार का काम नहीं कर सकता है।

पत्रकारिता के तेजी से नए-नए प्लेटफॉर्म सामने आ रहे है। ऐसे में किस प्लेटफॉर्म का भविष्य सुरक्षित है?
—- विश्व भर में इंटरनेट का तेजी से विकास हो रहा है। ऐसे कई समाचार पत्र है जिनके ऑनलाइन एडिसन शुरू हो गए है। लेकिन भारत में समाचार पत्र का एक अलग ही महत्व है। यहां समाचार पत्र लोगों की दिनचर्या से जुड़ा हुआ है। यहीं वजह है कि आज समाचार पत्रों के क्षेत्रिय संस्करण निकल रहें है। मैं एक हफ्ते विदेश रह कर आया हूं और सबसें ज्यादा जिस चीज की कमी मुझे नजर आई वह थी समाचार पत्र की।

हिन्दी समाचार पत्रों के नाम तो राष्ट्रीय संस्करण है पर महानगरों की खबरों को ही इसमें जगह मिलती है?
—- मैं, राष्ट्रीय मीड़िया को मानता ही नहीं। देश में दिल्ली का समाचार पत्र दिल्ली का मीड़िया है। उसकी सार्थकता भी वहीं है। समाचार पत्रों में खबरे पाठ्क की रूचि के अनुसार होती है। पाठ्क अपने आस-पास के इलाके की ही खबरों पर ज्यादा ध्यान देता है। वास्त में आदर्श स्थिति तो यह है कि खबरें पूरे देश की हो पर ऐसा होता नहीं। इसलिए यह दिल्ली, चेन्नई, मुंबई का मीड़िया है।

आपने देश-विदेश के कई सेमीनार में भाग लिया है। भारत और विदेश की मीडिया में किस प्रकार से भिन्नता है?
—- मुझे नहीं लगता कि भारत को किसी देश की नकल करनें की आवश्यकता है। हमारी समस्याएं, चुनौतियां और प्राथमिकता अलग है। पति आपनी पत्नी का पार्थिव शरीर लेकर 10 किमी पैदल चलता है। यह हमारे लिए खबर है पर उनके लिए नहीं। कई मायनों में वह हम से बेहतर है। हमारे यहां खबरों के बैकग्राउंड पर काम नहीं किया ज्यादा। जबकि उनकी प्राथमिकता यही है।

जब कोई पत्रकार खुलकर काम करना चाहता है तो उसे कई प्रकार के मुश्किलों का सामना करना पड़ता है?
—- जीवन में आदर्श और नैतिकता होनी चाहिए। वह आदर्श आपको मुश्किलों में शक्ति प्रदान करते है। व्यक्ति को जीवन भर उन आदर्शों को जीवित रखना पड़ता है। आज आप किसी कनिष्ठ पद पर हैं, कल जब किसी वरिष्ठ पद पर कार्यरत होंगे, तब आप आपने अनुसार कार्य कर सकेंगे। लेकिन तब तक आपको आदर्श जीवित रखने पड़ेंगे। ऐसा ना हो कि जब आपके पास मौका आए तब आप आदर्श बेच चुके हो। कुछ काम मजबूरी में करने होने है, इसलिए हम आपने आदर्श बेच दे यह गलत है।

इंटव्यूकर्ता अभिषेक मिश्रा माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि के छात्र हैं. उन्होंने यह इंटरव्यू अपने कॉलेज प्रोजेक्ट के तौर पर लिया था. अभिषेके से संपर्क abhi.saurabh1994@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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‘समकालीन तीसरी दुनिया’ मैग्जीन के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा का इंटरव्यू

हिंदी के दिग्गज और पुरोधा पत्रकार हैं आनंद स्वरूप वर्मा. ग्लैमर, पैसा और बाजार के आकर्षण से बिलकुल दूर अलग वे अपने पत्रकारीय मिशन में डूबे / लीन रहते हैं. आनंद स्वरूप वर्मा को अगर हिंदी पत्रकारिता का लौह पुरुष कहा जाए तो अनुचित न होगा. न जाने कितने झंझावात और उतार चढ़ाव आए, लेकिन उनका विजन, सरोकार और लक्ष्य नहीं बदला. वे ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ मैग्जीन के जरिए आम जन के लिए पत्रकारिता को जीते रहे और सिस्टम को चुनौती देते रहे. आनंद स्वरूप वर्मा ने इस मैग्जीन की मदद से कई पीढियों को देश-दुनिया की हलचलों के पीछे की सरोकारी समझ से शिक्षित-प्रशिक्षित किया और बाजार के प्रभाव से दिमाग में निर्मित हो रहे वैचारिक झाड़-झंखाड़ और झालों को साफ कर जनता के प्रति प्रतिबद्धता को प्रतिष्ठित करने का काम अनवरत किया.

आनंद दा दुनिया के ढेर सारे देशों में घूमे. वहां से जनसत्ता अखबार समेत कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए रिपोर्टिंग की. वे अंतरराष्ट्रीय मामलों खासकर नेपाल और अफ्रीका के विशेषज्ञ पत्रकार के रूप में विख्यात हैं. इंजीनियरिंग के छात्र रहे आनंद स्वरूप वर्मा के पत्रकारिता में आने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. एक बलिष्ठ नौजवान जो अपने आसपास गलत काम कर रहे लोगों से लड़ने भिड़ने मारने पीटने को तत्पर रहता था, अचानक उसे एक रोज समझ आया कि असल दिक्कत सिस्टम में है, व्यक्ति तो इसकी उपज मात्र हैं. बलिया के रहने वाले आनंद जी के साथ उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के लिए नोएडा सेक्टर 11 स्थित उनके आफिस पर एक लंबी बैठकी की गई. इसमें भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के साथ-साथ एक्टिविस्ट पत्रकार और जनपथ डॉट कॉम के संपादक अभिषेक श्रीवास्तव और वरिष्ठ पत्रकार विनय श्रीकर ने हिस्सा लिया. इस दौरान पूरी बातचीत बतकही को मोबाइल से रिकार्ड किया गया.

(तस्वीरें अभिषेक श्रीवास्तव के सौजन्य से)

सारी बातचीत बिना संपादित नीचे पेश किया जा रहा है, वीडियो फार्मेट में. वर्मा जी से उनका पसंदीदा गीत गवाया गया, साथ ही उनके जीवन से जुड़े ढेर सारे निजी सवालों को भी पेश किया गया. बिना चिढ़े, बिना हिचके, बिना रुके वर्मा जी ने हर सवाल का मुकाबला मुस्कराते हुए किया और दिल खोलकर बिंदास ढंग से बातचीत की. उनके साथ बैठना, बतियाना, सुनना अपने आप में किसी प्रशिक्षण से कम नहीं जिसके जरिए दिल दिमाग को उदात्त बनाकर बहुत कुछ सीखा महसूसा जा सकता है.

वर्मा जी के पास आगे के तीस वर्षों के लिए किए जाने वाले कामों की प्लानिंग है. वे 78 पार के हो चुके हैं, लेकिन उमर का असर उन पर दूर दूर तक नहीं. इसका राज / रहस्य भी उन्होंने बातचीत में खोला. उन्हें क्या पसंद है, किस चीज से चिढ़ है, मुश्किलें कौन सी आईं, अध्यात्म के प्रति क्या नजरिया है, चीन को लेकर क्या सोचते हैं, कम्युनिज्म का हालचाल कैसा है, प्रभाष जोशी को किस रूप में याद करते हैं, आधुनिक पत्रकारिता की हकीकत क्या है.. ढेरों … दर्जनों सवालों का तफसील से जवाब दिया आनंद दा ने. 

इंटरव्यू तीन पार्ट में है और तीनों पार्ट को तसल्ली से सुना देखा जाना चाहिए. खासकर पत्रकारिता के छात्रों के लिए यह इंटरव्यू किसी प्रशिक्षण से कम नहीं जिससे वह अपने तईं जनसरोकारी पत्रकारिता को लेकर एक सोच-समझ बना सकते हैं. पत्रकारिता में सक्रिय नौजवानों के लिए यह इंटरव्यू एक रिफ्रेशर कोर्स की तरह है जिससे वह थोड़ा पॉज लेकर सोच सकते हैं कि आखिर वे किस स्तर की और कितनी पत्रकारिता कर पा रहे हैं. इंटरव्यू देखने से पहले आनंद स्वरूप वर्मा जी की मैग्जीन ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के आफिस का एक जायजा लेते हैं.

यहां उल्लेख करना जरूरी है कि आर्थिक संकट के कारण इस मैग्जीन का प्रकाशन फिलहाल स्थगित कर दिया गया है. इस मैग्जीन का प्रकाशन लंबे समय से सिर्फ और सिर्फ पाठकों के चंदे / सहयोग से किया जा रहा है. इस मैग्जीन का प्रकाशन स्थगित किए जाने की सूचना से ढेर सारे वरिष्ठ-कनिष्ठ पत्रकार और शुभचिंतक दुखी हैं. इस मैग्जीन को लेकर भी ढेर सारे सवाल आनंद जी से किए गए और उन्होंने विस्तार से इस पत्रिका की पैदाइश, इसके दुख-सुख और इसको लेकर भविष्य की रणनीति पर चर्चा की.

सबसे पहले समकालीन तीसरी दुनिया के आफिस चलते हैं, क्लिक करिए इस यूट्यूब लिंक पर :

Office of ‘Samkaleen Teesri Duniya’

ये है इंटरव्यू के तीन पार्ट, एक-एक को बारी-बारी से क्लिक करते जाइए :

(Part One) Senior Journalist Anand Swaroop Verma Interview

(Part Two) Senior Journalist Anand Swaroop Verma Interview

(Part Three) Senior Journalist Anand Swaroop Verma Interview

इस इंटरव्यू पर आप अपनी प्रतिक्रिया आनंद स्वरूप वर्मा तक उनके मोबाइल नंबर 9810720174 या फिर उनकी मेल आईडी vermada@hotmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

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मीडिया इम्पलॉयर का राज दमन वाला राज है : एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस

जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले पर जानिये क्या कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस का नाम हमेशा सुर्खियों में रहा है। जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले पर मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकान्त सिंह ने उनसे बातचीत की। बातचीत का सिलसिला चला तो कॉलिन गोंसाल्विस ने दिल की हर बात जुबां पर ला दी। पेश है बातचीत के मुख्य अंश…

-8 नवंबर को माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले की जो सुनवाई हुई, उसे आप किस रूप में लेते हैं?
-ये सुनवाई प्रीलिमिनरी स्टेज पर है और जज साहब अगली डेट पर लीगल इश्यू पर कुछ ऑर्डर पास करने वाले हैं जिसमे क्लॉज 20 जे का भी मामला है। 20 जे में कर्मचारी कह सकता है मुझे बेनिफिट नहीं चाहिए और हमारा कहना है ये क्लॉज उनके लिए लागू है जिनकी सैलरी काफी ज्यादा है और हकीकत ये है कि सारे इम्प्लाई कम वेतन पर काम करते हैं और मैनेजमेंट ने जबर्दस्ती किया, फोर्स करके इनसे साइन कराया। इसी सुनवाई में जज साहब अन्य इश्यू को भी सुनेंगे और ऑर्डर पास करेंगे।

-इस सुनवाई में एसआईटी जैसी टीम बनाने पर भी चर्चा हुई थी लेकिन ऑर्डर में नहीं आया?
-नहीं नहीं.. जज साहब ने ऐसे सुझाव के बारे में कुछ सोचा था लेकिन इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ। अगली बार इस पर कुछ होगा। ये एसआईटी नहीं बल्कि जाँच कमेटी होगी। जैसे अभी लेबर कमिश्नर जांच करता है वैसे लेबर कमिश्नर की जगह पर दो या तीन सदस्यों की शायद एक कमिटी बनाई जाए लेकिन इस पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है। अगली बार इस पर कुछ होगा।

-इस मामले की लेबर कोर्ट में चल रही सुनवाई को टाइमबांड कराने की भी बातचीत चल रही थी?
-हाँ कोई भी इन्वेस्टिगेशन या इंक्वायरी अगर लेबर कोर्ट में चलती है तो उस पर टाइमबॉन्ड होना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को है और हम सबकी इस पर एक राय भी है कि टाइमबॉन्ड होना चाहिए।

-अखबार मालिकों के खिलाफ अदालत की अवमानना के मामले का क्या हुआ?
-अदालत की अवमानना का मामला जारी है। वास्तविकता ये है कि 8 या 9 स्टेट के लेबर कमिश्नरों की रिपोर्ट काफी स्ट्रांग आयी है जबकि 9 स्टेट की रिपोर्ट काफी वीक आई है। इन 9 स्टेट की रिपोर्ट को देखने से ही पता चल जाता है कि ये रिपोर्ट लेबर विभाग ने मैनेजमेंट के साथ मिलकर बनाया है। मैनेजमेंट ने जो कहा उसी को आधार मानकर लेबर कमिश्नर ने रिपोर्ट तैयार कर दिया। कर्मचारियों से बात तक नहीं किया गया। उनसे बहस भी नहीं की गयी और ऐसे ही रिपोर्ट बना दी गयी।

-लेकिन जिस स्टेट के लेबर कमिश्नर की क्लियर रिपोर्ट थी उस स्टेट के अखबार मालिकों के खिलाफ तो अदालत की अवमानना का मामला बन सकता था?
-हां, ये जज साहब को सोचना है। हमारा तो सुझाव होगा कि वे ऐसा करें।

-जितने भी मीडियाकर्मी हैं, वे अगर क्लेम लगाते हैं तो उस पर मैनेजमेंट उनका ट्रांसफर टर्मिनेशन कर देता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट में आवाज क्यों नहीं उठाई जाती?
-ये मामला अभी पेंडिंग है।

-आपने पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में एक मामला उठाया था कि सारे मामले हाईकोर्ट में ले जाने चाहिए? क्या आप इसे सही मानते हैं?
-नहीं नहीं, सारे नहीं। मेन प्वाइंट ये है कि कई राज्यों में हमारे पास एक भी कर्मचारी नहीं हैं। एक भी अवमानना के मामले दाखिल नहीं हैं। सुप्रीमकोर्ट में इनका केस चलाना मुश्किल है। तमिलनाडु और केरला सहित कई राज्यों में ना तो एक भी कंप्लेन है और ना ही एक भी कर्मचारी सामने आ रहे हैं। वहां के केस अगर वहां के हाईकोर्ट में भेज दिए जाए तो नजदीक होने के कारण यूनियन के लोग वहां आएंगे।

-जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के पूरे केस के बारे में आपकी निजी राय क्या है?
-इस केस की हकीकत ये है कि पत्रकार औए गैर पत्रकार इतना डरा हुआ है कि कोई सामने आने को तैयार नहीं है। लेबर कमिश्नर के सामने शिकायत करने को तैयार नहीं है। बहुत खतरनाक स्थिति है। मीडिया एम्प्लॉयर का राज दमन वाला राज है।

-राजस्थान सहित कई स्टेट की सुनवाई अभी भी बाकी है?
-हां, कई राज्यों की सुनवाई अभी बाकी है जिन पर जज साहब को फैसला करना है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट
मुंबई
9322411335

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अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड लागू करें अन्यथा जेल जाएंगे : एडवोकेट परमानन्द पांडे

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मीडिया कर्मियों की तरफ अखबार मालिकों के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट परमानंद पांडे को मीडिया का भी काफी तजुर्बा है। वे इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट के सेक्रेटरी जनरल भी हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके परमानंद पांडे पर मीडियाकर्मियों को पूरा भरोसा है। वजह भी साफ़ है। परमानंद पांडे मीडियाकर्मियों का दर्द जानते हैं। यही वजह है कि वे माननीय सुप्रीमकोर्ट में सटीक मुद्दा रखते हैं। जो बात कहना रहता है पूरे दम से कहते हैं। मजीठिया वेज बोर्ड मामले पर एडवोकेट परमानंद पांडे से बात किया मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकान्त सिंह ने। पेश है बातचीत के मुख्य अंश…

-दिनांक 8.11.2016 को आये सुप्रीमकोर्ट के आर्डर को आप किस रूप में लेते हैं?
– सकारात्मक निर्णय है।

-लीगल इश्यू के बारे में आपका क्या कहना है?
-लीगल इश्यू फ्रेम होना चाहिए। दो-तीन मुद्दे हैं, जिसको लेकर मैनेजमेंट के लोग हीलाहवाली कर रहे हैं। हालांकि मजीठिया वेज बोर्ड इस मामले में बिल्कुल साफ है। मैंने पिछली बार भी कहा था कि 20-जे उन्हीं लोगों पर प्रभावी होगा जिनको वेजबोर्ड से ज्यादा वेतन मिल रहा है। जिनको वेज बोर्ड से कम मिल रहा है उनके लिए इस ढंग का समझौता नहीं कर सकते हैं। और तो और, ये जो कांट्रेक्ट एक्ट है आप हमसे एक बार लिखवा ले रहे हैं तो हमारी पूरी तरह से सहमति होनी चाहिए। हम आए और आपने कर्मचारियों से तुरंत हस्ताक्षर करा लिए हैं। इस बात को कोई नहीं मानेगा कि उसे जितना वेतन मिलना चाहिए वह उससे कम वेतन लेकर काम करने में खुश है। इस तरह हम देखें तो सूरज की रोशनी की तरह यह साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि पत्रकारों से जोरजबरदस्ती करके 20जे पर हस्ताक्षर कराये गए हैं। इस मुद्दे को हम उठाएंगे। दूसरा लीगल मुद्दा यह है कि भास्कर, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे अधिकांश अखबारों ने पत्रकारों की नियुक्ति तो की अपने मुख्य संस्थान के लिए और उसे दिखा रहे हैं अन्य विभाग या किसी अन्य कंपनी में और मजीठिया मांगने पर ट्रांसफर कर दे रहे हैं।

दूसरा लीगल मुद्दा है कांट्रैक्ट सिस्टम। अधिकांश समाचार पत्र कह रहे हैं कि हम कांट्रैक्ट पर रखे हैं। ये जो कांट्रैक्ट सिस्टम है वह पूरी तरह से अमान्य (इनवैलिड) है। उसका  कारण यह है कि कांट्रैक्ट एक्ट के अनुसार आप हमसे कोई ऐसा कार्य नहीं करा सकते हैं, जिसके लिए हमारी सहमति नहीं हैं। और अगर है भी तो हमारा कांट्रैक्ट लेबर की तरह नहीं है। आपको हमें वहीं वेतन देना पड़ेगा जैसा कि वेज बोर्ड में बताया गया है क्योंकि पत्रकारों और संस्थानों के बीच सीधा कांट्रैक्ट है। इसमें आउटसोर्सिंग जैसी बात न तो है और न ही हो सकती है, जैसा कि अधिकांश कंपनियों ने अपने चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के लिये किया है। पत्रकार सीधे कंपनी के कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं न कि किसी ठेकेदार के कर्मचारी के रूप में। यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। तीसरा मुद्दा है क्लीसीफिकेशन का। किसी भी संस्थान के किसी संस्करण में काम करने वाला पत्रकार यदि कोई खबर करता है तो उसे उस संस्थान के अन्य संस्करण भी उपयोग करते हैं या कर सकते हैं, ऐसे में उनका क्लासीफिकेशन अलग-अलग कैसे कर सकते हैं।

-अधिकाँश अखबारों में स्टैंडिंग आर्डर सर्टिफाइड नहीं कराया गया है और  बिना वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को आधार बनाए कर्मचारियों का ट्रांसफर सस्पेंशन टर्मिनेशन हो रहा है। उसमें आपका क्या कहना है?
-ऐसी स्थिति में मॉडल स्टेंडिंग आर्डर अपने आप लागू हो जाता है जिसमें यह बिल्कुल साफ है कि कर्मचारी की सहमति और सुविधा का ध्यान रखे बिना उसका ट्रांसफर नहीं किया जा सकता और न ही उसे परेशान या प्रताड़ित करने के लिए ट्रांसफर किया जा सकता है। कर्मचारियों की परिवारिक जिम्मेदारियों को भी ध्यान देना पड़ता है। वहीं यह भी बताया गया है कि किन कर्मचारियों का ट्रांसफर हो सकता है और किनका नहीं। सर्टिफाइड स्टैंडिग आर्डर है तो भी मामला कोर्ट में जाता है तो वहां मॉडल स्टैंडिग आर्डर ही मान्य होगा।

-लेबर कमिश्नरों द्वारा जो रिपोर्ट सुप्रीमकोर्ट को भेजी गई उससे आप कितने सहमत हैं?
-कुछ कमिश्नरों की रिपोर्ट से तो सहमत हूँ। दिल्ली की रिपोर्ट ठीक है, जबकि पहले की रिपोर्ट में काफी गलतियां थी अथवा पक्षपाती थी। बाद में दिल्ली में गोपाल राय एवं लेबर कमिश्नर मीणा से हम लोग मिले। उसके बाद जो रिपोर्ट आई है वह रिपोर्ट काफी हद तक सही है। अब यदि यूपी की बात करें तो वे कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान टाइम्स ने लागू कर दिया है, जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स ने सभी लोगों को मैनेजर बना दिया है। सबके पोस्ट बदल दिये। काम उपसंपादक का ले रहे हैं और बना मैनेजर दिए हैं। टाइम्स आॅफ इंडिया ने कहा है कि हमारे यहां कोई असंतोष है ही नहीं। इस प्रकार की रिपोर्ट आई है, जबकि पीड़ित कर्मचारी है। ऐसे में श्रम विभाग को कर्मचारियों से पूछना चाहिए, न कि कंपनी से।

-जैसा कि हमने सुना है 17(1) के मामले 17(2) में नहीं जा सकते। इस बारे में आपका क्या कहना है?
-क्लेम सही है कि गलत है इसका फैसला करने का पावर लेबर कमिश्नर के पास नहीं है। ऐसे में निश्चित है कि कर्मचारियों एवं प्रबंधन में निश्चित राशि पर सहमति नहीं बन पाएगी। यदि लेबर कमिश्नर ऐसा कर भी देता है, तो उसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। ऐसे में हमारा प्रयास है कि कोर्ट लेबर कमिश्नर को ही यह पावर दे दे कि वह इस पर उचित फैसला लेकर रिकवरी आदेश जारी कर सके।

-जिन समाचार पत्रों का रिपोर्ट साफ हो गया है कि उन्होंने नहीं दिया है, जो लेबर कमिश्नर के रिपोर्ट में भी आ गया है और आरसी भी कट गई है, उन पर अवमानना का केस क्यों नहीं चलता है?
-उन पर अवमानना का केस दर्ज होना चाहिए। आप उनके नाम बताएं, उन पर अवमानना का केस चलाया जाएगा।

-लीगल इश्यू की नाव चलेगी तो डूब जाएगी, ऐसा कहा जा रहा है, इस बारे में क्या कहेंगे?
-कंटेम्प साबित करना हमारा काम है। मेरी सेलरी और वेज बोर्ड की सेलरी देख लीजिए। बाकि 20जे जैसे मुद्दे मैनेजमेंट अपने ढाल के रूप में उठा रहा है। इससे उसका कोई लेना देना नहीं है। मेरा कहना है सेलरी स्लीप और वेजबोर्ड की सेलरी देखिए, उसी पर निर्णय कीजिए, हम इसीलिए आए हैं।

-जो कंपनियां लेबर कमिश्नर के बार-बार मांगने के बावजूद भी 2007-2010 का बैलेंस शीट नहीं दे रही हैं, उनके बारे में आपका क्या कहना है?
-उनको देना ही पड़ेगा। बचने का कोई रास्ता उनके सामने नहीं है।

-आप, कॉलिन जी और उमेश जी सबकी मंजिल एक है, मीडियाकर्मियों को न्याय मिले, फिर एक साथ बैठकर आप लोग मुद्दे तय क्यों नहीं करते?
-हम लोग जल्द ही मिलने वाले है। कॉलिन जी और उमेश जी से भी मेरी बात चल रही है। हम चाहते हैं हम सब मिलकर मुद्दे तय कर लें। हम कोशिश करेंगे एक मुद्दे को एक आदमी उठाये और बाकी लोग उनका समर्थन करें तो ज्यादा अच्छा रहेगा। जज भी कंफ्यूज नहीं होंगे।

-सभी मीडियाकर्मियों की इच्छा है कि अखबार मालिक जेल जाएँ। उनका ये सपना कब पूरा होगा?
-देखिये कंटेम्प्ट का केस तीन चार तारीख पर हल हो जाता है। लेकिन ये दो साल से ऊपर होने जा रहा है। आपने देखा होगा पिछले ऑर्डर से अगला ऑर्डर कुछ भिन्न हो जाता है। अब जैसे पांच पांच राज्यों के लेबर कमिश्नर को बुलाने की बात थी। लेकिन इस बार ऑर्डर में ये नहीं आया। इस मुद्दे को हमें उठाना है। देखिये कई वकील इसमें ऐसे आये हैं जो बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, जिन्हें लेबर लॉ की कोई जानकारी नहीं है। दो ऑप्शन होगा या तो लागू कीजिये या जेल जाइये। अगर लागू किया तो प्रूफ दिखाइये। लेकिन मालिक लोग अभी तक बचते आ रहे हैं।

-आप खुद पत्रकारिता से आये हैं। आप इन्डियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के सेक्रेटरी जनरल हैं। आपको मीडियाकर्मियों का दर्द अच्छी तरह पता है। मीडियाकर्मियों को जिन वकीलों पर सबसे ज्यादा भरोसा है उनमें एक आप भी हैं।
-धन्यवाद शशिकान्त जी। मैं मीडियाकर्मियों का दर्द अच्छी तरह जानता हूँ और जब भी मुझे मौक़ा मिलता है मैं उनके दर्द को उठाता भी हूँ। मैंने आज तक कोई ऐसा मुद्दा नहीं उठाया जो आपके सरोकार से जुड़ा ना हो या उसका कोई रिश्ता ना हो। मैंने चार पांच बार प्रभात खबर, दैनिक भास्कर और ईनाडु के मामले को उठाया। ईनाडु ने अपने 400 कर्मचारियों से पहले जबरी त्यागपत्र लिया फिर उन्हें कांट्रैक्ट पर ले लिया, कुछ दिन बाद, इस मामले को भी उठाया।

-आज लेबर कमिश्नर मालिकों के प्रति वफादार क्यों लग रहे है?
-ये आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूँ। हिंदुस्तान भर में लेबर कमिश्नर लेबर की जगह मालिकों के लिए काम कर रहे हैं। हैं तो ये लेबर की भलाई के लिए लेकिन काम ये मालिकों की भलाई के लिए कर रहे हैं।

-एक दिक्कत ये भी आ रही है कि महाराष्ट्र में तो आप ट्रांसफर पर स्टे ले सकते हैं जबकि बाकी 28 राज्यों में कर्मचारियों को राहत का कोई नियम नहीं है?
-हां, हम ये भी डिमॉन्ड जल्द उठाएंगे। अभी तो हालात ये है कि पत्रकारों में एकता भी नहीं है। जितने बड़े पत्रकार हैं वे छोटों से बात करना भी पसंद नहीं करते हैं। छोटों को वे बड़ी हिकारत की नजर से देखते हैं। आज आप संपादकों से बात कीजिये तो वे गुरुर में रहेंगे और आपसे ठीक से बात भी नहीं करेंगे लेकिन जैसे ही मालिक उनको निकालता है वे आपसे बात करके रास्ता पूछेंगे।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
9322411335

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मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई में जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी : एडवोकेट उमेश शर्मा

सुप्रीमकोर्ट के जाने माने एडवोकेट उमेश शर्मा जब अपने चिर-परिचित अंदाज में सुप्रीम कोर्ट में बहस करते हैं तो अखबार मालिकों की घिग्घी बंध जाती है। मीडियाकर्मियों के पक्ष में पालेकर वेज बोर्ड, बछावत वेज बोर्ड, मणिसाना वेज बोर्ड और अब जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे उमेश शर्मा को लेबर लॉ का काफी अनुभव है। साफगोई से हर बात कहने वाले मृदुभाषी उमेश शर्मा ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर देश भर में मीडियाकर्मियों के लिये एक आंदोलन खड़ा किया। हमेशा बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले उमेश शर्मा से आठ नवंबर को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई और उसके बाद आये आर्डर पर बात किया मुंबई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह ने। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश…

– 8 नवंबर को मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई के बाद आये आर्डर को आप किस रूप में लेते हैं?
-ये आर्डर उस तरह से नहीं है जो बहस हुयी थी. सुनवाई के दौरान जिस तरह से जज साहब लोगों ने कहा कि हम एक मानीटरिंग कमेटी बनायेंगे, वो इस आर्डर में तो नहीं है। यह बात स्पष्ट है कि लेबर कमिश्नर की रिपोर्ट मंगा कर मजीठिया लागू कराने का विचार अब त्याग दिया गया है। कमेटी के बारे में उन्होंने बोला था और आर्डर में हल्का सा इंडिकेट भी किया है लेकिन अगली डेट पर जब लीगल इश्यू की डफली बजने लगेगी तो कमेटी की बात पीछे रह जायेगी।

-लीगल इश्यू वाले मुद्दे को आप कितना सही मानते हैं क्योकि कई बार आप बोल चुके हैं कि लीगल इश्यू की नाव चलेगी तो डूबने का खतरा है?
-मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं। दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंंटेंप्ट के तहत हमारे अधिकार क्षेत्र में कमेटी बनाना नहीं है, अगर सुप्रीम कोर्ट यह भी बोल दे कि यह स्पष्ठ नहीं हो रहा कि मालिको ने जान बूझ कर अवमानना की है तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती।

-जो रिपोर्ट भेजी गयी है राज्यों के लेबर कमिश्नरों द्वारा आप उससे कितने संतुष्ट हैं?
-ये रिपोर्ट पूरी तरह फेक है। सुप्रीमकोर्ट को इसे तोड़ना चाहिये। इस रिपोर्ट की एक कमेटी बनाकर इसकी जांच करानी चाहिये। झूठ बोलने वाले कमिश्नरों को जेल भेजना चाहिये सीधा। ये हमेशा कोर्ट को गुमराह करते हैं।

-ये लेबर कमिश्नर का सुनवाई के दौरान प्रयास यही रहता है १७ (१) के पूरे मामले को १७ (२) में भेज दिया जाये। आप भी हमेशा विरोध करते हैं कि १७ (१) का मामला १७(२) में नहीं जा सकता है. 
-बिल्कुल सही बात है कि १७ (१) का मामला १७ (२) में भेजना पूरी तरह गलत है। ऐसा एक्ट में कहीं नहीं है। एक तो १७ (१) के मामले का ये लोग सही तरीके से कंडक्ट नहीं कर रहे हैं और इसे मिस यूज कर रहे हैं। अगर यूज करते तो मध्यप्रदेश की तरह सभी राज्यों के लेबर कमिश्नर अखबार प्रबंधन के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करते। मिस यूज ये कर रहे हैं कि १७ (१) के अप्लीकेशन को ये लोग १७(२) में भेजकर पीछा छुड़ा लेते हैं जबकि उन्हें १७(१) के एप्लीकेशन को १७(२) में भेजने का प्रावधान ही नहीं है। अब इन्होंने पीछा छुड़ा लिया और अब आप लड़ते रहिये।

-अवमानना के मामले में जिन अखबारों के बारे में सुप्रीमकोर्ट में रिपोर्ट भी चली गयी है कि इन अखबारों के प्रबंधन ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया और कुछ अखबारों के मालिकों के खिलाफ आरसी भी कट गयी है फिर उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला क्यों नहीं बनता है?
-इस मामले को मैने ८ नवंबर की सुनवाई में रखा था लेकिन जज साहब इस पर कुछ अटक गये। मैने यही कहा कि जिनकी रिपोर्ट में आ गया है कि इन्होंने वेज बोर्ड नहीं लागू किया उनके खिलाफ तो सीधे सीधे मामला बनता है तो जज साहब ने पूछा कि क्या बनता है, तब मैंने कहा कि सर अवमानना का मामला बनता है।

-जिन मीडियाकर्मियों ने भी जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगा उनका ट्रांसफर टर्मिनेशन कर दिया जाता है। इसका क्या उपाय है क्योंकि ये काफी गंभीर मामला है?
-ये कमेटी में तय हो जायेगा। कमेटी जब बनेगी तब इस मामले को कमेटी गंभीरता से देख लेगी। एक तो दिक्कत ये है जितने भी लेबर कमिश्नर होते हैं वे बहुत ज्यादा मजीठिया वेज बोर्ड या वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के बारे में नहीं जानते हैं। तुर्रा यह है कि एक तो वे करना नहीं चाहते दूसरा उनको आता नहीं और वे सक्षम भी नहीं हैं। उनको सौ पेज की बैलेंसशीट दे दीजिये, बेचारे घबड़ा जाते हैं। सर्कुलेशन फीगर तक इनको नहीं पता रहता है।

-कई जगह के अखबार मालिक अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट नहीं दे रहे हैं। इस पर आप क्या कहेंगे?
-ये चीजें कमेटी तय करेगी। एसआईटी तो हमने नाम दे दिया। अब सोचिये जांच कमेटी अगर कहेगी कि आप २००७ से १० तक की बैलेंससीट लेकर आईये, अगर वे नहीं लेकर आयेंगे तो कमेटी सीधे सुप्रीमकोर्ट को रिपोर्ट भेज देगी। सुप्रीमकोर्ट कहेगी कि तुम कमेटी की बात भी नहीं मान रहा है तो आ जाओ कंटेम्प्ट में। वो तभी सीधा होंगे। अभी क्या है लेबर कमिश्नरों के उपर अखबार मालिक दबाव डलवाते हैं। कमेटी एक रिटायर जज के नेतृत्व में होगी जो कि इन बातों को अच्छी तरह से समझ सकती है। आखिर मजीठिया वेज बोर्ड भी तो ऐसे ही रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में काम कर रहा था और सारी बातों को सुन परख कर ही तो अवार्ड दिया है. समिति भी इसी तर्ज पर काम कर सकती है.

-लीगल इश्यू की सुनवाई के दौरान और कौन कौन से मुद्दों पर चर्चा होनी चाहिये?
-नहीं, लीगल इश्यू पर अभी बहस कराना खतरनाक है। एक उदाहरण देता हूं।  २० जे पर अगर सुप्रीमकोर्ट बोल दे कि कर्मचारियों ने साईन किया है तो हम क्या कर सकते हैं तो हो गया ना सबका नुकसान। इसलिये मैं कह रहा हूं कमेटी बनवा लीजिये। कमेटी से चर्चा कर लीजिये और फिर सुप्रीम कोर्ट में बहस करा लीजिये, लीगल इश्यू पर तो अपना पक्ष मजबूत होगा। अभी तो कई फैक्ट आये नहीं है। गोल गोल घुमाया जा रहा है। अगर खिलाफ गया तो क्या करेंगे आप।

-आप मीडियाकर्मियों के पक्ष में पहले भी कई वेज बोर्ड के लिये भी लड़े हैं। आपकी लेबर लॉ पर अच्छी पकड़ है। दूसरे वेज बोर्ड से जस्टिस मजिठिया वेज बोर्ड को आप कैसे अलग मानते हैं?
-जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड इन सबों में सबसे बेहतर पोजिशन में हैं। इसको सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है और अपने आदेश दिनांक ७/२/२०१४ में स्पष्ट रूप से निर्देश दे कर लागू करने को कहा है और पहली बार अवमानना में इतना समय देकर हर तरह से इसे लागू करने में लगा है। इसके पहले के वेज बोर्ड बहुत सारे संस्थानों ने लागू किया था और कहीं कहीं ग्रेड और फिटमेंट को लेकर ज्यादा विवाद था। कोई कंपोजर था तो उसको दूसरा कोई काम दिया जाता था। वो विवाद था बाकी इसे लोगों ने लगभग लागू कर दिया था। बछावत के बाद तो सही तरीके से लागू ही नहीं हुआ कोई वेज बोर्ड।

-अखबार मालिक आखिर जेल कब जायेंगे?
-अभी टाईम लगेगा लेकिन अगर लीगल इश्यू का कोई पेंच फंस गया तो सारे के सारे बच जायेंगे। अगर कमेटी बनाकर मामला चला तो कोई ना कोई जरूर फंसेगा, जैसे पिछली सुनवाई में इनाडु के मालिक फंस रहे थे। इनाडु के बारे में लिखा है कि इन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया है मगर लीगल इश्यू को लेकर इतना दायें बायें हो गया कि इस ओर से जज का ध्यान हट गया। 

-इस मामले में सभी मीडियाकर्मियों की मंजिल एक है फिर आप और कोलिन सर और परमानंद पांडे जी एक साथ बैठकर मुद्दे क्यों नहीं तय कर लेते हैं कि किस मुद्दे पर बहस सुप्रीम कोर्ट में करना है?
-मुझे कोई प्राब्लम नहीं है। कई बार लोगोें ने काफी प्रयास भी किया। मैं तो हमेशा तैयार रहता हूं ताकि आमने-सामने बैठकर बात किया जाये।

शशिकांत सिंह 
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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कैंसर की नई दवा के परीक्षण में जुटे गाजीपुर के डाक्टर एमडी सिंह का कवि रूप (देखें वीडियो इंटरव्यू)

Yashwant Singh : गाज़ीपुर जिले के मशहूर चिकित्सक डॉक्टर मुनि देवेंद्र सिंह उर्फ एमडी सिंह के कवि रूप को उनके ही जिले के बहुत कम लोग जानते होंगे। इस बार गाज़ीपुर प्रवास की उपलब्धि रहे DR. MD SINGH जी. आधे घंटे तक उनसे विस्तार से बातचीत हुई और पूरी बातचीत को मोबाइल में रिकार्ड किया. इस इंटरव्यू में एक डॉक्टर को कैसा होना चाहिए और संवेदनशीलता किस तरह शब्दों में ढलकर व्यक्ति को कवि बना देती है, इसके बारे में बताया डाक्टर एमडी सिंह ने. Continue reading

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एक मैग्जीन ऐसी भी… इंटरव्यू विशाल जैन (एडिटर इन चीफ)

Vishal Jain

Yashwant Singh : एक मेरे पुराने मित्र हैं. विशाल जैन. आजकल वे एजुकेशन और स्कूलिंग के फील्ड में कई नए प्रयोग कर रहे हैं. एक रोज उनसे मुलाकात हुई तो सामने टेबल पर रखी उनकी मैग्जीन पर भी नजर चली गई. इसके पन्ने पलटने लगा. लगा कि इसके बारे में सबको बताना चाहिए. क्या खूब हो कि आपका बच्चा स्कूल पढ़ने गया हो और एक दिन वह कमिश्नर का इंटरव्यू कर लाए और उसे एक मैग्जीन में छाप भी दिया जाए. विशाल अपने स्कूल के बच्चों से ऐसे कई क्रिएटिव काम कराते हैं.

आपको ये मैग्जीन आनलाइन फ्री में मिल सकती है, वीडियो के अंत में बताए दिखाए गए मेल आईडी पर मेल करने पर. या फिर चाहें तो Vishal Jain को एफबी पर पकड़ कर उनके इनबाक्स में अपनी मेल आईडी मैसेज कर मैग्जीन की मांग कर सकते हैं. मैग्जीन के बारे में विशाल से बातचीत का वीडियो नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं…

एक मैग्जीन ऐसी भी… इंटरव्यू विशाल जैन (एडिटर इन चीफ) 

https://www.youtube.com/watch?v=4wjrNM25pNQ

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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देश के 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं, संपादक भी दृष्टिहीन : विमल कुमार

कविताओं के जरिए मोदी को लगातार एक्सपोज करने में जुटे हैं कवि और पत्रकार विमल कुमार : हिन्दी के वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार विमल कुमार पिछले दो सालों से लगातार सोशल मीडिया पर मोदी शासन के खिलाफ कवितायें लिखते रहे हैं. उनकी यह रचनाशीलता भवानी प्रसाद मिश्र की याद दिलाती है जब वे रोज तीन कवितायें आपातकाल के विरुद्ध लिखते रहे और बाद में उनकी पुस्तक ‘त्रिकाल संध्या’ भी आयी. 56 वर्षीय विमल कुमार की गत दो सालों में लिखी गयी कविताओं की पुस्तक ‘हत्या से आत्महत्या’ छपकर आयी है. उनकी इन कविताओं ने फेसबुक पर सबका ध्यान खींचा है. आखिर विमल कुमार को किन परिस्थितियों ने इन कविताओं को लिखने के लिए मजबूर किया, इस भेंटवार्ता में जानिए यह खुलासा –

-साहित्य की दुनिया में कहा जा रहा है कि आपने मोदी जी के खिलाफ इतनी कवितायें लिखी कि वह अब एक किताब के रूप में आ गयी है?
-सवाल मोदी का नहीं है. देखिये जब कोई लेखक कोई रचना करता है तो वह व्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि प्रवृतियों पर लिखता है. मोदी जी भी एक प्रवृति के प्रतीक हैं. उनकी कुछ प्रवृतियां इंदिरा गांधी में भी दिखाई दी थी और आज केजरीवाल में भी यह प्रवृति है. यह प्रवृति शक्ति संचयन की है, अधिनायक वाद की है. हम लोगों ने इन्दिरा जी का भी विरोध किया था, जेपी के छात्र आन्दोलन में. मेरी एक कविता कादम्बिनी में आपातकाल में सेंसर हो गयी थी. जब आपातकाल समाप्त हुआ तो वह कविता ‘सेंसर से रुकी कविता’ के रूप में छपी थी. हिन्दी में निराला ने नेहरूजी पर आलोचनात्मक कविता लिखी. बाबा नागार्जुन ने भी इंदिरा जी के खिलाफ कविता लिखी. बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर हिन्दी के अनेक लेखकों ने कवितायें लिखी. सिख दंगे पर लोगों ने कहानियां लिखी. हिन्दी की एक कहानीकार प्रत्यक्षा सिन्हा तो आज भी ८४ के दंगे पर कहानी लिख रही हैं. इस तरह गुजरात दंगे पर भी हिन्दी के कई लेखकों ने कवितायें लिखीं. देवी प्रसाद मिश्र मंगलेश डबराल राजेश जोशी आदि ने शानदार कवितायें लिखीं. मैंने भी एक कविता लिखी जो मेरे पिछले संग्रह में है. इसलिए मोदी जी के खिलाफ ये कवितायें दरअसल उन प्रवृतियों के खिलाफ कवितायें हैं. इन प्रवृतियों का विरोध करना उन्हें उजागर करना बेहद जरुरी है और इसलिए एक लेखाकिये धर्म निभाते हुए ये कवितायें लिखी हैं.

-लेकिन कुछ लोग तो मोदी जी को नायक बता रहे हैं?
-इंदिरा जी को तो लोग देवी और चंडी भी बताते थे. देवकांत बरुआ ने तो ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ का नारा दिया था. उनकी भी खूब जयकार होती थी. जब वह आती थीं तो मैदान में भीड़ जमा हो जाती थी और वह भाड़े की भीड़ नहीं होती थी. मैंने खुद 72-73 में पटना के गांधी मैदान में देखा था, उनका भाषण सुना था. लेकिन तब लेखक गण विरोध कर रहे थे. आज भी कर रहे हैं. मैं कोई अकेला व्यक्ति या लेखक नहीं हूँ जो विरोध कर रहा हूं. फेसबुक पर बहुत सारे कवि लिख रहे हैं. विष्णु नगर, मंगलेश डबराल, देवीप्रसाद मिश्र, प्रियदर्शन, रंजित वर्मा, दिनकर कुमार, स्वप्निल श्रीवास्तव जैसे अनेक लोग मोदी जी की नीतियों के खिलाफ कवितायें लिख रहे हैं.

-आखिर आप लोग क्यों लिख रहे हैं?
-देखिये लेखक का काम सच बताना है. वह अपना काम कर रहा है. वह बता रहा है कि मोदी जी ने लोगों को झूठे सपने दिखाए. उन्होंने जनता के साथ छल किया है. लोगों को बेवकूफ बनाया है. उनकी सरकार लगातार झूठ बोल रही है. सातवें वेतन आयोग को अरुण जेटली ने एतिहासिक बताया. क्या यह सरासर झूठ नहीं है. भ्रष्टाचार दूर करने की बात करते हैं और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित   संजीव चतुर्वेदी जैसे इमानदार अधिकारी को लगातार दो साल से परेशान कर रहे हैं. अडानी का दो सौ करोड़ माफ़ कर दिया. अमीरों को टैक्स छूट के नाम पर सब्सिडी और रेल यात्रा करनेवाले बूढों से रियायत को छोड़ने की बात कर रहे. पहले खुद अपनी पार्टी के सांसदों से यात्रा रियायत, टेलीफ़ोन सब्सिडी छोड़ने की बात कहते. पहले कहा गया कि अभी नयी सरकार है, अभी मोहलत दो. अब उनको समय दिया जाय. जनता ने दो साल का समय दिया लेकिन कोई नतीजा नहीं. महंगाई बेरोजगारी के मोर्चे पर विफल. केवल प्रचार से लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे.

-लेकिन क्या आपने कांग्रेस की नीतियों के विरोध में कवितायें लिखीं?
-लिखीं. बिलकुल लिखी. आपातकाल में और उसके बाद भी. मनमोहन सिंह ने जब विदेशी पूंजी निवेश शुरू किया तो मैंने एक कविता लिखी– ”मैं इस देश को बेच कर चला जाऊंगा”. दूसरी कविता लिखी ”Miss FDI मेरी जान”. इसलिए यह कहना गलत है कि लेखक कांग्रेस का विरोध नहीं करते थे. सच्चा लेखक हमेशा विपक्ष में, शाश्वत विपक्ष में रहता है. यह सच है कि कुछ लेखक कांग्रेस के साथ थे वहीं निर्मल वर्मा जैसे लोगों ने भजपा का समर्थन किया था. विद्यानिवास मिश्र भी भाजपा के साथ थे. आज भी कमल किशोरे गोयनका, नरेंद्र कोहली सरकार के साथ हैं लेकिन हिन्दी के लेखकों का बड़ा तबका सत्ता के साथ कभी नहीं रहा. जब श्रीकांत वर्मा कांग्रेस के साथ थे तब रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर अलग थे. रघुवीर सहाय तो दिनमान के संपादक के रूप में हटाये गए क्योंकि इंदिरा जी नहीं चाहती थीं उन्हें. उनकी जगह नंदन जी को संपादक बनाया गया जिन्होंने आते ही इंदिरा जी पर कवर स्टोरी निकाली लेकिन सहाय जी ने यह काम नहीं किया. धर्मवीर भारती ने भी जयप्रकाश नारायण का साथ दिया था. इसलिए भाजपा का यह तर्क गलत है कि लेखकों ने हमेशा कांग्रेस का साथ दिया. सच तो यह है हिन्दी का कोई बड़ा लेखक संघ परिवार भाजपा का समर्थक नहीं रहा. प्रेमचंद, निराला पन्त, महादेवी, जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्ता, नवीन जी, आचार्य शिवपूजन सहाय, राहुल जी, बेनीपुरी, दिनकर भी समर्थक नहीं थे. 

-अपने संग्रह के बारे में बताएं? कविताओं के विषय क्या हैं?
-मैंने करीब सौ कवितायेँ फेसबुक पर सीधे लिखीं. मुझे इतनी घुटन हो रही देश की हालत से कि मैं खुद को लिखने से रोक नहीं पाया. दो साल पहले 16 मई के बाद देश वह नहीं रहा जो उसके पहले था. देश की हालत पहले भी ख़राब थी लेकिन आज तो सरेआम झूठ बोला जा रहा है कि अच्छे दिन आ गए, महंगाई ख़त्म हो गयी, लोगों को रोजगार मिल रहा है, देश में बिजली की कमी नहीं है आदि आदि. इसलिए मैंने इस झूठ को बेनकाब किया है कविताओं में. प्रधानमंत्री सेल्समैन और इवेंट मैनेजर सेल्फी युग के नायक हैं. वह नेहरु की तरह राजनेता नहीं, लोहिया की तरह नायक नहीं. हमारे प्रधानमंत्री का कद, उनका ज्ञान, व्यक्तित्व, उनकी भाषा शैली में भी कोई गरिमा नहीं है. वे उन लोगों के नायक हैं जो धीर गंभीर लोग नहीं. जो छिछले लोग हैं. उनमे उर्जा और दमखम तो है पर उसकी दिशा और नीयत क्या है. चुनाव जीतने से लेकर बाँसुरी और ड्रम बजने पर भी कवितायें हैं. लव जिहाद पर भी. ‘स्मार्ट सिटी में हत्या’, ‘गुजरात के शिलालेख’ जैसी कवितायें है. रोहित वेमुला पर भी. यह संग्रह पंसारे कलबुर्गी धभोलकर और वेमुला को समर्पित है. ‘हत्या से आत्महत्या’ तक इन चारों की शहादत का प्रतीक है.

-आप एक पत्रकार हैं. सालों से संसद कवर करते हैं. एक तरफ आप इस तरह की कवितायें लिखते हैं. दूसरी तरफ मोदी जी की खबरें भी लिखते हैं. आप संतुलन कैसे कायम करते हैं?
-देखिये मैं मोदी जी की नहीं बल्कि एक प्रधानमंत्री की खबर लिखता हूं. ख़बरों में हमें तटस्थ होना चाहिए. लेकिन जैसी भक्ति विशेषकर न्यूज चैनलों में दिखाई दे रही है, वह स्तब्धकारी है. मीडिया मनमोहन सिंह की खबरें उस तरह नहीं दिखाता था जिस तरह आज के पीएम मोदी की दिखा रहा है. किसी भी मुल्क में मीडिया ने इतना पक्षपात नहीं किया जितना भारतीय मीडिया कर रहा है. दरअसल 80 प्रतिशत पत्रकारों के पास दृष्टि नहीं है. संपादक भी दृष्टिहीन हैं. इसलिए मैं पत्रकारिता को शब्दों की क्लर्की कहता हूँ. मैंने खुद को कभी पत्रकार होने का दावा नहीं किया. लेकिन हमें निष्पक्षता बरक़रार रखनी चाहिए. मैं हर दल की ख़बरें लिखता हूँ. विरोध अपनी जगह पर है. प्रोफेशन अलग. लेकिन हमें जनता के साथ रहना चाहिए. सत्ता के साथ नहीं. चाहे वह लालू नीतीश या येचुरी की सत्ता क्यों न हो.

कवि और पत्रकार विमल कुमार से संपर्क vimalchorpuran@gmail.com या +91 9968400416 के जरिए कर सकते हैं.

विमल के कविता संग्रह ‘हत्या से आत्महत्या’ तक की कुछ कविताएं पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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मोदी के इंटरव्यू में अर्णब गोस्वामी खुद एक्सपोज हो गए, सोशल मीडिया पर हो रही थू थू

Mukesh Kumar : बहुत बेरहम मीडियम है टीवी। आप कभी किसी को एक्सपोज़ कर रहे होते हैं तो कभी खुद भी एक्सपोज़ हो रहे होते हैं। राहुल गाँधी को आपने एक्सपोज़ किया मगर मोदी को इंटरव्यू करते हुए खुद देश के सामने। प्रधानमंत्री का पहला इंटरव्यू लेते समय न्यूज़ ऑवर के आक्रामक, दूसरों की बोलती बंद कर देने वाले या दूसरों को बोलने ही न देने वाले, बड़बोले, तर्कों और रिसर्च से लैस अर्नब गोस्वामी को क्या हो गया था? वे इतने नरम क्यों थे, बार-बार नवनीत लेपन क्यों कर रहे थे? क्या उन्होंने ये इंटरव्यू कुछ शर्तों के साथ किया? क्या प्रश्न पहले से तय थे? क्या ये पीआर एक्सरसाइज थी? और हाँ, इतना बड़ा चैनल प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करे और तकनीकी स्तर पर इतनी बड़ी चूक करे अच्छा नहीं लगता। ऑडियो बहुत खराब था भाई।

Priyabhanshu Ranjan : एक इंटरव्यू अर्णब ने किया, जिसे पूरी भगवा ब्रिगेड सोशल मीडिया पर शेयर करते नहीं थक रही। एक इंटरव्यू करण थापर ने किया था, जिसमें मोदी को पहले पीना पड़ा था और फिर बीच में ही भागना पड़ा था। इसी इंटरव्यू के बाद मोदी दमखम वाले पत्रकारों के सामने आने से कतराते हैं। बहरहाल, असल इंटरव्यू तो करण थापर वाला ही माना जाएगा। अर्णब तो अपने स्वामी की सेवा कर रहे थे!

Mithilesh Priyadarshy : इंटरव्यू के दौरान अर्णब गोस्वामी सर्कस के ठीक उस शेर की तरह नज़र आया, जो यूं तो पिंजड़े से दहाड़कर, पंजे मारकर, गुर्राकर दर्शकों को लगातार डराता रहता है, पर जैसे ही रिंग मास्टर की इंट्री होती है, वह किसी पालतू कुत्ते की तरह चुप मारकर देह और दुम हिलाकर प्यार जताने लगता है.

Vimal Kumar : टीवी पर शेर की तरह दहड़नेवाले पत्रकार आज खामोश थे। महंगाई के मुद्दे पर साहब का काउंटर ही नहीं किया। आज वे गोले की तरह दाग नहीं रहे थे सवाल। जबाव भी चतुराई से दिए जा रहे थे यह थी निष्पक्ष पत्रकारिता।

Shikha : मोदी से कोई कहे कि औकात है तो राणा अयूब जैसी पत्रकार को इंटरव्यू देकर दिखाएl चमचों के साथ “कौन बनेगा करोड़पति” खेलकर काहे भौकाल काट रहा है? नेशन वांट्स टू नो

Panini Anand : Nation wants to know: why did Arnab lose his voice in front of Modi? The question is, what was Arnab Goswami doing? The same anchor, who can even grill tables, chairs and walls if he is alone in the studio, failed to pose any tough questions to the prime minister. The entire interview seemed to be a PR exercise, a promotional video of Modi Sarkar.

Neeti Vashisht : मोदी जी का इंटरव्यू ‘अर्णब गोस्वामी’ की जगह ‘रवीश कुमार’ या ‘करण थापर’ ले तो मोदी जी की हालत बिहार टॉपर “रुबी रॉय” जैसी ही होगी

Nadim S. Akhter : अभी-अभी मेरी एक सहेली बता रही थी कि टाइम्स नाऊ पर अर्नब गोस्वामी और नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू देखते वक्त उन्हें ये गाना याद आ रहा था—सुहाग रात है, घूंघट उठा रहा हूं मैं.. 🙂

Mayank Saxena : वीर अर्णब सवाल करते हैं… आप पहले पीएम हैं, जिनकी विदेश नीति में इतनी रुचि है…आप ने बड़ा संतुलन साधा है…आप ये कैसे कर लेते हैं… आपको ये चारण का गान लगता है या सवाल लगता है?

Ajay Setia : पता है न, सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कई बार अर्णब गोस्वामी को डांट दिया था। फिर स्वामी ने टाइम्स नाऊ पर आने से इंकार कर दिया। तब से अर्णब गोस्वामी ने स्वामी के खिलाफ अभियान शुरू किया हुया है। स्वामी का अरुण जेटली से 36 का आंकड़ा तो सब को पता ही है। रिजर्व बेंक के गवर्नर रघुराम राजन के खिलाफ स्वामी का अभियान असल में जेटली के खिलाफ ही था। स्वामी के बयानों का निशाना अक्सर जेटली ही होते हैं। इसका फायदा अर्णब ने उठाया। पहले जेटली से स्वामी के खिलाफ बयानबाजी शुरू करवाई। और, आज रिजर्व बेंक के गवर्नर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी से भी स्वामी के बारे में पूछा। मोदी का स्वामी के खिलाफ दिया गया बयान स्पष्ट करता है की मोदी का जेटली पर पूरा विश्वास बना हुया है।

सौजन्य : फेसबुक

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