जब दुनिया चुनाव आयोग पर पक्षपात और भाजपा प्रवक्ता की तरह व्यवहार करने का आरोप लगा रही है तब एक पद्म विजेता पत्रकार ने ‘शेषन की उपलब्धि और ज्ञानेश के कर्तव्य’ के तहत आयोग के प्रति राजनीतिक दलों के रुख की चर्चा की है और बताया है कि शेषण का भी विरोध हुआ था।

यह एक फेसबुक पोस्ट है और आज के लिए महत्केपूर्ण खबर। अगर अखबारों में नहीं दिखी तो पढ़िये और समझिये।
संजय कुमार सिंह
चुनाव आयोग के खिलाफ महाभियोग के विचार की खबर आज सभी अखबारों में प्रमुखता से है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे इंडिया गठबंधन की जीत पर कार्रवाई की राहुल गांधी की घोषणा के साथ छापा है जबकि अमर उजाला ने इसे ‘दांव’ कहा हैं। प्रेस कांफ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त के यह कहने के बाद कि समाजवादी पार्टी की शिकायत शपथ पत्र के साथ नहीं थी पार्टी ने दावा किया है कि उसने 2022 में 18,000 शपथ पत्रों के साथ शिकायत की थी। यह एक गंभीर तथ्य है जो मुख्य चुनाव आयुक्त के झूठ को बेनकाब करता है लेकिन अखबारों में इसे प्रमुखता नहीं मिली है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रेस कांफ्रेंस में जो सब कहा उससे जाहिर हो गया था कि वे ‘सरकार के मन की बात’ कर रहे थे। आज महाभियोग लाने के विपक्ष के विचार की खबर जिस ढंग से छपी है उससे लगता है कि प्रेस कांफ्रेंस में चुनाव आयोग का मन की बात करना महंगा पड़ा। यह आज कई अखबारों में लीड या सेकेंड लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में कल राहुल गांधी को मुख्य चुनाव आयुक्त की धमकी जहां छापी थी आज वहीं खबर छपी है, एसआईआर का विवाद गहराया : विपक्ष ने कहा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग ला सकता है। कल के शीर्षक, मुख्य चुनाव आयुक्त ने राहुल गांधी से कहा, सात दिनों में शपथपत्र दें या माफी मांगे से लग रहा था कि राहुल गांधी का फंसना तय है। हालांकि, कल ही इस खबर के साथ राहुल गांधी का तथाकथित पलटवार भी था, कानून बदला गया है, वोटों की चोरी में चुनाव आयोग की भाजपा से मिलीभगत है।
इसके बाद आज अखबारों को उस कानून के बारे में भी बताना चाहिये था जिसे बदलने की बात राहुल गांधी ने बिहार में की थी और कल अखबारों में छपा था। कुल मिलाकर, चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस से यह साबित हुआ है कि शपथपत्र के साथ की गई शिकायत पर कार्रवाई नहीं की गई है, उसके बारे में मुख्य चुनाव आयुक्त ने खुद झूठ कहा और शिकायत के साथ शपथपत्र लेने का नियम आम आदमी का नाम हटाने, जोड़ने या नहीं होने की शिकायत के लिए के लिये है। चुनाव आयोग के पास ऐसी शिकायतों का कोई उदाहरण नहीं है जैसी राहुल गांधी कर रहे हैं या समाजवादी पार्टी ने की थी। ऐसी ही शिकायत बीजू जनता दल की भी थी और चुनाव आयुक्त ने उसके बारे में भी यही कहा था कि शपथपत्र नहीं दिये गये थे। खबरों से मैं यह तय नहीं कर पाया कि शपथ पत्र दिये गये थे या नहीं लेकिन राहुल गांधी के आरोप लगाने के बाद बीजू जनता दल ने कहा है कि उसकी शिकायत पर भी कार्रवाई नहीं हुई और अब वह अदालत जायेगा। इन्हीं सब कारणों से विपक्ष चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की सोच रहा है जिसे अमर उजाला ने आज ‘दांव’ लिखा है। शीर्षक है, एसआईआर पर बढ़ेगा विवाद, विपक्ष का सीईसी के खिलाफ महाभियोग का दांव। उपशीर्षक है, विपक्षी नेताओं का आरोप – पक्षपाती अधिकारियों के हाथ में है आयोग।
सब को पता है कि प्रधानमंत्री ने नियम विरुद्ध तरीके से अमित शाह के करीबी रहे ज्ञानेश कुमार को लगभग जबरन मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया है, इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है फिर भी भाजपा ने कहा है कि यह घुसपैठियों की मुहिम है और अमर उजाला ने निष्पक्षता दिखाने के लिए इसे महाभियोग के दांव की खबर के साथ छापा है। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ ने आज आधे पन्ने पर उन मामलों की सूची छापी है जिनपर सुप्रीम कोर्ट में विवाद लंबित हैं। इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ ऐसा होता, जब कुत्तों की मौज थी और कुत्तों के लिए समय निकल आया। यह सब इस तथ्य के बाद है कि कल आगरा में मुख्य चुनाव आयुक्त के घर के बाहर भीड़ इकट्ठा हो गई और लोगों के हाथों में जो तख्तियां थीं उनपर ज्ञानेश कुमार, वोट चोर आगरा छोड़ भी लिखा हुआ था और यह खबर अमर उजाला में भी पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि, पहले पन्ने पर छपी एक खबर के अनुसार, महाराष्ट्र चुनाव में अनियमितता के दावे को सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया है। खबर के अनुसार, बांबे हाईकोर्ट का आदेश बरकार रहेगा और विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई है। खबर इस प्रकार है, वोट चोरी का आरोप लगाकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर निशाना साध रही विपक्षी पार्टियों को सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा।
यहां मुझे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहा याद आता है। लोकतंत्र में संसदीय मर्यादा विषय पर प्रभाष जोशी स्मारक व्याख्यान 2024, में रक्षा मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के स्थापित नेताओं में एक, राजनाथ सिंह का कहा (यह लिखित भाषण है जिसे उनकी अनुपस्थिति में पढ़ा गया) था, …. प्रभाष जी निडर और बेबाक पत्रकारिता के आदर्श हैं। पत्रकारिता लोकतंत्र की पहरेदार है। पहरेदार (मतलब चौकीदार अंग्रेजी में वाचडॉग) जितना निडर और जागरूक होगा लोकतंत्र उतना ही स्वस्थ और मजबूत होगा। पर पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता भी सवालों से घिर गयी है। उसके भी बुनियादी मूल्यों का अब पालन नहीं हो रहा है। समाचारों पर विचार हावी हैं। समाचारों को दृष्टिकोण में ढाल कर पाठक तक पहुँचाया जा रहा है। उनका सवाल था, क्या यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ प्रवृत्ति है? कहने की जरूरत नहीं है कि पत्रकारिता में यह बदलाव या प्रवृत्ति भाजपा के पक्ष में है और भाजपा शासन में ही मुखर हुआ है। अब नाम के साथ यह साबित किया जा सकता है कि इसके लिये पत्रकारिता में लोगों को प्लांट करने का काम लंबे समय से बाकायदा किया जाता रहा है। बाद में लोगों को अपने पक्ष में करने के लिए भिन्न उपाय किये गये जो पक्ष में हैं उन्हें प्रश्रय, लालच और ईनाम दिये गये। इसीलिए प्रधानमंत्री शुद्ध मतदाता सूची की बात कर रहे हैं और उनमें घुसपैठियों के शामिल होने की बात कर रहे हैं।
तथ्य यह है कि 11 साल से वे प्रधानमंत्री, भाजपा की सरकार है, कई राज्यों में डबल इंजन भी है तो घुसपैठिये उन्हीं की मदद या लापरवाही से हैं। जब और जहां वे सत्ता में नहीं थे, विपक्ष पर घुसपैठियों को मतदाता बनाने का आरोप लगाते थे। अब मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए घुसपैठियों की पहचान (और उन्हें मतदाता सूची से बाहर करने) का काम चुनाव आयोग से करवा रहे हैं जो उसका काम नहीं है। हालांकि, इसके नाम पर चुनाव आयोग जो कर रहा है वह मतदाताओं को बाहर करने का काम है। ऐसे में बैंगलोर सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा में फर्जी वोटर का मामला और इससे बैंगलोर सेंट्रल में भाजपा की जीत का आरोप दमदार है। इन तथ्यों के मद्देनजर राजग के बहुमत और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के लिए आवश्यक देश के 25 और लोकसभा क्षेत्रों में वोट चोरी से चुनाव जीतने का राहुल गांधी का आरोप गंभीर और विश्वसनीय है। इसपर कार्रवाई से सरकार गिर सकती है और लोकतंत्र में सरकार अगर चुनाव के नतीजों से बनती है तो यह सब होना चाहिये। पर यह अलग मुद्दा है।
25 से ज्यादा लोकसभा क्षेत्रों में वोट चोरी साबित करने के लिए वे मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची की मांग करते रहे और चुनाव आयोग समय काटता रहा है। बहाने बनाता रहा। यह तथ्य है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा के तमाम लोगों ने ईवीएम के बचाव में तकनीक के उपयोग और विपक्ष के तकनीक विरोधी होने का प्रचार किया। यह दावा किया गया कि पहले बूथ लूटे जाते थे, अगर मतपत्रों से चुनाव होगा तो फिर बूथ लूटे जाएंगे। विपक्ष यही चाहता है। दूसरी ओर, ईवीएम से बूथ लूटना इतना आसान और खुलेआम है कि पांच बजे के बाद हर बार खेल होता रहा। वीडियो नहीं देने का नियम बना, दलील दी गई, कुतर्क किये गये। अब साफ हो चला है कि मतदाता सूची में फर्जी नाम इसीलिए हैं। महाराष्ट्र के नतीजे गवाह हैं। इसलिये, चुनाव मतपत्रों से ही कराये जाने चाहिये। बूथ लूटे जायेंगे तो सीसीटीवी से पकड़े जा सकेंगे और वो अपराधी होंगे इसलिए उनका वीडियो जारी करने में दिक्कत नहीं आयेगी। पहले जब सीसीटीवी नहीं होते थे तो बात अलग थी। अब ईवीएम के खिलाफ शिकायतों के मद्देनजर बैलट पेपर से चुनाव कराये जाने चाहिये और सीसीटीवी से बूथ लूटने वालों को पकड़ने या उनकी पार्टी को पहचानने में आसानी होगी और ऐसे चुनाव रद्द कर दिये जायें तो बूथ लूटने की समस्या खत्म हो सकती है।
जहां तक मतदाता सूची में फर्जी वोटर की मौजूदगी, उन्हें हटाने के लिए तैयार नहीं होने और वीडियो न देने के लिए कानून बनाने की बात है मामला शीशे की तरह साफ हो चुका है। फर्जी वोटर और घुसपैठिये अलग हैं लेकिन घुसपैठियों को हटाने की जरूरत तो बताई जा रही है लेकिन फर्जी वोटर को बचाना भी जारी है और वे बिहार में एसआईआर के बावजूद हैं। चुनाव आयोग इसका कारण यह बता रहा है कि प्रारूप मतदाता सूची की जांच के लिए जिम्मेदार लोग काम नहीं करते हैं जबकि इनकी भूमिका पुराने तरीके से मतदाता बनाने में थी। नये तरीके से, एसआईआर में जब दस्तावेज देखकर, आवेदन लेकर नाम दर्ज हुए हैं तो जांच की क्या जरूरत है और मशीन से जांच कर उन्हें हटाया जा सकता है तो हटाया क्यों नहीं गया और गलतियां कैसे रह गईं बताने की बजाय चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है और मतदाता सूची बनाने का काम तकनीक के उपयोग से जिम्मेदारी के साथ नहीं करने का न तो कारण बता रहा है और न सफाई दे रहा है। इस बीच लंबे समय से सरकार के लिए बैटिंग कर रहे, पद्म विजेता, वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर ने आज ही फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी है, शेषन की उपलब्धि और ज्ञानेश के कर्तव्य, चुनाव आयोग के प्रति राजनीतिक दलों का रुख – तब और अब। इसमें उन्होंने लिखा है, अगर आज टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त होते तो इन (भ्रष्टाचार के तीन) स्तम्भों में चौथा ‘घुसपैठियों का वोट बैंक’ वाला भी जोड़ देते। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाता सूची में फर्जी नामों की समस्या एक है और घुसपैठियों की मौजूदगी अगर है तो दूसरी। घुसपैठियों का मुद्दा सरकार और प्रधानमंत्री का है, फर्जी नामों का मामला राहुल गांधी ने अब उठाया है लेकिन समाजवादी पार्टी और बीजू जनता दल ने पहले ही उठाया था। अभी तक जो खबरें हैं उससे लग रहा है कि शाम पांच बजे के बाद फर्जी वोटर के वोट डाले जाते हैं और भाजपा को इससे मदद मिलती है। यह चुनाव अधिकारियों की मिली भगत से होता है और वीडियो से साफ हो जायेगा। इसलिए वीडियो नहीं दिया जा रहा है। 45 दिन में ही मांगने और मुकदमा नहीं होने पर डिलीट करने का नियम है।
घुसपैठियों का मामला सरकार को ही रोकना है। उसने समय पर रोका नहीं और इस आधार पर लाखों नाम हटाने को उचित ठहराया जा रहा है और उचित हो भी तो तमाम ऐसे लोगों के नाम हटा दिये गये हैं जो पिछले तीन चार चुनावों में वोट कर चुके हैं। अगर वे घुसपैठिये हैं भी तो किसी चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहने की सामान्य शर्त पूरी करते हैं और इसलिए वोटर होना चाहिये। अगर वे विदेशी साबित हो जायें तो उनका नाम जरूर हटाया जा सकता है या उन्हें वोट देने से भी रोका सकता है लेकिन चुनाव आयोग उल्टे ढंग से काम कर रहा है। सुरेन्द्र किशोर ने लिखा है, टीएन शेषण ने कहा था, “जब तक मतदाता पहचान पत्र नहीं बनेगा,तब तक मैं अगला कोई चुनाव नहीं कराऊंगा। बिहार विधान सभा का 1995 का चुनाव सिर पर था। … दरअसल जब शेषन ने कहा कि मतदाता पहचान पत्र बने बिना मैं लोक सभा या विधान सभा के चुनाव नहीं होने दूंगा, उस पर प्रधान मंत्री से लेकर लगभग सारे दल शेषन पर खासे नाराज हो गये। किंतु पूर्व विधायक अश्विनी शर्मा ने कहा कि ‘‘फर्जी वोटिंग कराने वाले ही पहचान पत्र का विरोध कर रहे हैं। क्योंकि चुनावों में 95 प्रतिशत मतदान केंद्रों पर बोगस मतदान होता है। सिर्फ 20-25 प्रतिशत मतदाता ही मतदान केंद्रों पर जाते हैं।’’ इन तथ्यों से यह बताने की कोशिश की गई है कि शेषन का भी विरोध हुआ था। पर मेरी समझ से अभी मामला अलग है और मुद्दा फर्जी वोटर का है। चुनाव आयोग इन्हें बचाने का काम कर रहा है। उसे मुद्दा ही नहीं मान नहीं रहा है। मतदाता पहचान पत्र से मतदाताओं को पहचान मिली थी अब के चुनाव आयुक्त उनके साथ चट्टान की तरह खड़े होने की बात तो करते हैं पर लाखों लोग मतदाता सूची से अकारण बाहर कर दिये गये हैं। दूसरी ओर, हालत यह है कि मीडिया, अदालतों के कई मीलार्ड (भले लोया होने के डर से) और अब चुनाव आयोग के रुख से यह साबित होता लग रहा है कि यह सब जान बूझकर लंबे समय से योजनाबद्ध तरीके से किया जाता रहा है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। मैं रोज यहां यह सब इसी प्रभाव को देखने-समझने और दिखाने के लिए लिखता हूं। ऐसे में मुझे यह देखकर अच्छा लग रहा है कि आज मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने के विचार को ज्यादातर अखबारों ने पर्याप्त महत्व दिया है। आइये अब मैं बाकी रह गये अपने अखबारों में इस खबर के बारे में बता दूं। सबसे पहले देशबंधु। इसकी लीड है, इंडिया गठबंधन ने नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस की और इसमें कहा गया कि चुनाव आयोग अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा है। सेकेंड लीड राहुल गांधी की अधिकार यात्रा और उसमें उनका यह आरोप है कि एसआईआर वोट चोरी का नया हथियार है। इंडियन एक्सप्रेस में विपक्ष का आरोप टॉप पर है, मुख्य चुनाव आयुक्त भाजपा के प्रवक्ता की तरह बात कर रहे हैं। विपक्ष की प्रेस कांफ्रेंस की फोटो के साथ खबर सेकेंड लीड है। दि एशियन एज में भी यह खबर प्रमुखता से है। शीर्षक है, विपक्ष ने सीईसी पर पलटवार किया, उन्हें भाजपा का प्रवक्ता कहा। द हिन्दू में यह खबर लीड है। शीर्षक है, इंडिया ब्लॉक सीईसी को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


