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दैनिक जागरण ने फिर की घिनौनी हरक़त

-दीपांकर पटेल-

ठीक यही काम दैनिक जागरण ने कठुआ रेप केस में किया था, बलात्कार के आरोपियों के साथ खड़ा हो गया था.

दैनिक जागरण ने उस वक्त कहा था कि रेप हुआ ही नहीं.

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ठीक यही काम हाथरस बलात्कार के आरोपियों के लिए कर रहा है.

युवती ने मरते हुए बलात्कारियों का नाम लिया, और हिंदी बेल्ट का सबसे बड़ा अखबार कह रहा है कि उसकी मां ने ही उसे मार दिया.

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इतनी धूर्तता , इतना घिनौनापन, इतनी जातिवादी मानसिकता लेकर पत्रकारिता हो रही है…
और लोगों को लगता है कि इस देश में दलितों की आवाज़ मीडिया उठाने लगा है.

इतनी धूर्तता कहां से आती है कि “बलात्कारियों” की चिट्ठी की हेडलाइन बना तो “बलात्कारी” के साथ खड़े हो जाओ और उसके बयान को अख़बार का बयान बना दो , हेडलाइन पर कोट दर्शाने वाला कॉमा तक न लगाओ.

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-अमितेश कुमार-

जागरण की धूर्तता और बदमाशी का कोई अंत है? अब इसको भी लोग पत्रकारिता कहेंगे जिसमें आरोपियों के बयान को तथ्य की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। यह अखबार इसी तरह की बदमाशी अपने एक सम्पादकीय में कर चुका है।

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आगरा के एक संस्करण में वेबसाइट पर लगे ई पेपर में देखिए पीड़िता की जगह मृत युवती कर दिया गया है। ऐसे ही चला तो आगे उस लड़की और परिवारवालों को आरोपी बनाएगा ये अखबार।


-हरेंद्र मोरल-

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ये पत्रकारिता का नीच काल है… ये खबर पढ़िए और इसकी हेडिंग पर गौर कीजिए। क्या समझ आता है..। किस तरह लोगों की जनभावना बदलने की घटिया कोशिश हो रही है…। एक आरोपी के दावे को कितना बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है..।

जब सवाल ये होना चाहिए था कि आरोपी की लिखी चिट्ठी लीक क्यों हुई कैसे वो सोशल मीडिया और मीडिया में पहुंची बजाय इसके उसके समर्थन में माहौल बनाने की कोशिश हो रही है। मैं ये नहीं कहता की आरोपी वाकई गुनहगार हैं… लेकिन हैं या नहीं इसका फैसला तो अदालत करेगी तो उसे उसका काम करने दो, तुम पहले ही फैसला देने की कोशिश क्यों कर रहे हो।

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क्या आपने इससे पहले कहीं सुना की रेप के या इस तरह के संगीन मामले में किसी आरोपी के दावे को इतनी मजबूती से पेश किया गया हो।

इससे पहले न्यूज़ चैनेल इस तरह सरकार के भोंपू बने हुए थे अब कुछ अखबार भी खुल कर इस साजिश में शामिल हो गए हैं। इससे पहले मुख्यमंत्री के खिलाफ एक फोटोशॉप की गई पोस्ट को इस तरह बढ़ा चढ़ा कर प्रसारित किया गया था जैसे कितना बड़ा खुलासा हुआ है… जबकि वो एक ऐसी ही सामान्य पोस्ट थी जैसे सोशल मीडिया में दिनभर हजारों की संख्या में होती हैं।

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समझ नहीं आता सरकार की गोद में बैठकर ये मीडिया संस्थान क्यों उस जनता से धोखा करते हैं जिसके कंधे पैसे पर बैठ कर ये यहां तक पहुंचे हैं।

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