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दैनिक जागरण ने सपा के झंडे को तिरंगे के रूप में कुबूल कर लिया :)

दैनिक जागरण में जो हो जाए, समझिए वो कम है. यहां एक से बढ़कर एक विद्वान लोग काम करते हैं. यही वजह है कि वे सपा के झंडे में अचानक राष्ट्र का झंडा तिरंगा देखने लगते हैं.

कम सेलरी पर लोगों को रखकर काम कराएंगे तो ऐसे ही औचक ज्ञान-चमत्कार के दर्शन होंगे.

दैनिक जागरण इटावा में एक खबर छपी है जिसमें सपा के झंडे को तिरंगा बताया गया है.

जनता मौज ले रही है. आप भी लें..

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1 Comment

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  1. Dr Sachin Batra

    January 28, 2020 at 4:24 pm

    हैरत की बात है कि कोई यह समझने को तैयार ही नहीं है कि गलती किसी से भी कहीं भी हो सकती है। आपसे और हमसे भी हो सकती है तो उसे मसाला लगाकर पेश करना और अपनी निजी विचारधारा में पोत देना कहां की समझदारी है। अब अपनी बौद्धिक टिप्पणी करने वाले कृपया इन सवालों का जवाब दें। पहला तो यह कि क्या आज के दौर में कोई समाचार पत्र अपनी मानवीय भूल के लिए खेद प्रकाश प्रकाशित कर रहे हैं। समाचार पत्र उठाकर देख लीजिए श्रीमान् आपको विरले ही कोई माफी मांगता हुआ दिख जाएगा।

    अब सवाल यह कि दैनिक जागरण ने अगर भूल सुधार प्रकाशित नहीं किया होता तो आप कहते….. लीजिए साहब पत्रकारिता करने वाले स्थापित संस्थान जिम्मेदारी ही भुला बैठे हैं इन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता। अब अगर भूल सुधार छाप दिया तो झण्डा फलां का कुबूल है। यानि चित हम जीते पट हम हारे। जनाब किसी को ईमानदारी से अपना दायित्व निभाने देंगे या आप ही न्यायाधीश बनकर, अपनी बातों में सनसनी थोपकर किसी को नैतिक जिम्मेदारी निभाने भी नहीं देंगे।

    माना कि हमारे देश में प्रजातंत्र है और सबको अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार है लेकिन इस तरह से किसी के सकारात्मक रवैये और दायित्व निर्वाह करने पर उसका मजाक बनाना तर्कसंगत नहीं है, अवमानना ही है। अगर श्रीमान की व्यर्थ सनसनी जायज है तो हम भारतीयता भूल चुके हैं। हम अपने गौरव और संस्कृति के अनुगामी नहीं रहे। यानि हम अपनी नैतिकता को ताक पर रख दें और भूल सुधार को स्वीकारने की सजा भी हमें वो लोग दें जो न समालोचना को समझते हैं और न ही विश्लेषण को।

    दरअसल इसके लिए किसी व्यक्ति को भी तो दोषी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हमे तो आदत हो गई है कि बगैर जिम्मेदारी के जो मुहं में आया कह दिया। अब सवाल यह है कि आखिर हमारा चरित्र है क्या? क्योंकि जब हम सही को सही और गलत को गलत ही नहीं कह सकते तो महाशय माफी मांगने को तो हमारे बुजुर्गो ने बडप्पन बताया है। लगता है हम सब भूल गए।

    डॉ सचिन बत्रा— पत्रकार एवं प्रोफेसर, पत्रकारिता एवं जनसंचार

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