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युवा टीवी पत्रकार रात में सोया तो सुबह उठ न सका… परिचित, दोस्त-मित्र और सहकर्मी स्तब्ध!

कुंवर सीपी सिंह

युवा टीवी पत्रकार कुंवर सीपी सिंह के बारे में सूचना मिल रही है कि उनका निधन हो गया. बताया जाता है कि वे रात में सोए तो सुबह उठे ही नहीं. माना जा रहा है कि उनका निधन हार्ट फेल की वजह से हुआ. कुंवर सीपी को जानने वाले उनके पत्रकार मित्र उनके निधन की सूचना से स्तब्ध हैं. सबको विश्वास न हो रहा कि कोई नौजवान पत्रकार यूं चला जाएगा. पत्रकार आशीष माहेश्वरी और कुमार अंबुजेश ने कुंवर सीपी के निधन पर फेसबुक पर जो लिखा है, उसे नीचे दिया जा रहा है….

Ashish Maheshwari : क्या लिखूं. युवा मीडियाकर्मियों की यूं असमय मौतें बहुत चोट दे रही हैं. बीते दो सालों में कुंवर अभिषेक भगत, प्रदीप व्यास और बीते दो महीनों में रोहित परमार, दीपांशु दुबे और कुंवर सीपी सिंह की अकाल मौतों ने अंदर तक हिला कर रख दिया…अपने अपने घरों से सपने लेकर आये इन युवाओं को यूं जाता देख मन अंदर तक से रो पड़ा है…

मीडिया की तनावपूर्ण जीवनशैली और खुद को साबित करने की जद्दोजहद के बीच कब युवा हार्ट, लीवर और ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों के शिकार बन रहे हैं, ये वो बीमारी से पीड़ित होने के भी बहुत देरी से जान पाते हैं… जीवन सिर्फ मशीन और आपकी उपयोगिता सिर्फ आपके द्वारा दिये गए आउटपुट तक सीमित होती दिख रही है…ग्लैमर की तलाश और सच्चाई के धरातल की वास्तविकता कही बहुत दिखती है एक दूसरे से ….परिवार और जड़ ज़मीन से मीलों दूर इन कच्ची नौकरियों में नौकरी करने से ज्यादा उसे बचाने की जुगत जवानी में ही युवाओं को बूढा रही है….घंटे घण्टों शिफ्ट और अनिश्चित भविष्य लगातार युवाओं को ग्रास बना रहा है… ऐसे में संस्थानों और मैनेजर्स की ज़िम्मेदारी सिर्फ काम लेने से ज्यादा अपने एम्प्लोयी के लिए एक बेहतर माहौल देने की कई गुना बढ़ जाती है ताकि नम्बर वन की ये अंधी रेस कहीं ज़िन्दगियों की कीमत पर न खेली जाय……

कुमार अम्बुजेश : एक महीने के भीतर ये दूसरा आघात है मेरे लिए….कुंवर भाई अभी 28 को ही तो हम मिले थे, आपकी नई नौकरी लगी थी, आप पार्टी देने वाले थे…फिर इतनी जल्दबाजी क्यों कर दी मेरे भाई…मेरा इंतज़ार भी नहीं कर सकते थे क्या….12 को तो मैं आ ही रहा था…आप वसुंधरा शिफ्ट हो रहे थे…कहा था नया आशियाना दिखाऊंगा….और बगैर दिखाए ही चले गए…..मेरे भाई आप जैसे भी थे…जो भी थे….मगर मेरे सबसे करीब थे…अगर कोई दर्द था तो साझा कर लिए होते…..आखिरी वक्त मे आपने अपने भाई को भी याद नहीं किया…..अकेले अलविदा कर गए…वो भी तब जब मैं आपसे बहुत दूर था….मेरे भाई आपको आखिरी बार भी देख नहीं पाया…..कुंवर भाई मैं आपसे बहुत नाराज हूं….ऐसे भी कोई जाता है क्या भला……….अलविदा मेरे भाई….आपके साथ बीता हुआ एक एक पल मुझे टीस दे रहा है…..अलविदा मेरे भाई……आप बहुत याद आओगे………… कुंवर भाई ये आपकी आखिरी कविता थी जो आपने वाट्सएप पर मेरे पास भेजी थी…..आप अच्छे कवि भी थे मेरे दोस्त….. श्रद्धांजलि कुंवर भाई

माफी : एक कविता के बहाने…!

मैं कविताएं नहीं लिखता इसलिए कवि भी नहीं हूं. लेकिन तब क्या किया जाए जब कोई कविता आसपास घुमडती रहे. लगातार. जिद करती हुई कि मुझे लिखो. यह अक्सर होता है. दिमाग पर सवार ऐसी कविताएं लगातार दूसरे कामों को टालने की जिद करती हैं और दिलचस्प है कि कई बार तो वे वक्त भी बतातीं हैं उन्हें लिखने का. जिसे हम सुविधानुसार खाली समय या फिर रचनात्मक समय का नाम दे सकते हैं. मुझे तो यह लगता है कि कोई कवि भी कविता लिखना नहीं चाहता. वह गप्पें मारना चाहता है, लोगों की तकलीफें देखकर बेहद उदास नजरों से अपने वक्त को ताकना चाहता होगा या फिर बेहद छोटी छोटी खुशियों के साथ थोडा वक्त गुजारकर अपनी हंसी को उंडेल देता होगा, कवि. कविता लिखना तो उसकी जरूरत भी नहीं है, जो कवि है. कविता तो हर वक्त ढूंढती है कि कोई उसे लिख दे तो चैन मिले भटकन से.

मेरी बात से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन अभी अभी बहुत दूर चक्कर काट रही है वह कविता कभी आपके सामने आ गई तो क्या करेंगे? उसे लिखे बिना काम नहीं चलेगा जैसे बीते तीन हफ्तों ने इस कविता ने मेरी नाक में दम किया हुआ था. इसे लिखकर कुछ सुकून मिला है. तब तक के लिए जब तक कि कोई और कविता सिर पर सवार नहीं होती…!!

हमें माफी मांगनी थी
अपने दोस्तों से
जिन्होंने जिंदगी के सपाट रास्तों पर
बिछकर गुजारीं
खुशियों की जगमग दोपहरें
जिन्होंने जतन से टांके लगाये
दुखों के फटे चिथडों पर

हम सचमुच माफी चाहते थे
गहरी नींद में
भविष्य की बुनावट के रेशे तलाशते दोस्तों से
हम जिन्होंने
उम्र की पगडंडी पर कभी तेज दौड लगाई
कभी बेकार सुस्ती में अलमस्त जमाई ली
और कभी खुशियों का गट्ठर उछाल दिया
तारों की ओर

हम माफी के हकदार नहीं थे
और हमें माफी चाहिए थी
दोस्तों से
बिना झिझक और शर्मिंदगी के
आंखों में आंखें डालकर माफी चाहते थे हम
जीवन की नयी लय तलाशने की सजा मुकर्रर होने के ठीक पहले…!!

कुंवर सी.पी. सिंह
टी.वी. पत्रकार

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