‘भारत समाचार’ के कैमरामैन की सड़क हादसे में मौत, चैनल और सरकार ने दी आर्थिक मदद

Ashwini Sharma : लखनऊ में भारत समाचार के कैमरामैन प्रदीप की सड़क हादसे में मौत से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.. प्रदीप के असमय निधन की खबर से मैं भी सदमे में हूं.. लेकिन सीएम योगी की ओर से आर्थिक मदद की खबर से राहत महसूस कर रहा हूं.. Continue reading

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युवा पत्रकार हकीकत कादयान नहीं रहे

हमेशा मुस्कुराने वाले, खुशमिजाज़, मिलनसार और ज़िंदादिल दोस्त पत्रकार हकीकत कादयान हमारे बीच नहीं रहे। सोमवार रात बहादुरगढ़ के सेक्टर-2 स्थित घर की सीढ़ियों में पैर फिसला और जानलेवा चोट उन्हें हम सबसे दूर ले गई। हकीकत कादयान महज 35 साल के थे। खुशमिजाज, मिलनसार और निडर होने के चलते इतनी कम उम्र में उन्होंने पत्रकारिता जगत में अपनी एक अलग पहचान बना ली थी। हकीकत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से काफी लंबे समय से जुड़े हुए थे। Continue reading

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बनारस के सांध्य दैनिक ‘गांडीव’ के संपादक राजीव अरोड़ा का निधन

बनारस से लंबे समय से छपने वाले सांध्य दैनिक गांडीव के संपादक राजीव अरोड़ा के बारे में सूचना आ ही है कि उनका निधन हो गया है. वे काफी दिनों से वो बीमार थे. मुख्यमंत्री योगी ने वाराणसी से प्रकाशित गांडीव के संपादक राजीव अरोड़ा के निधन पर ट्वीट कर शोक जताया. Continue reading

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नवभारत मुंबई प्रबंधन की प्रताड़ना के शिकार मजीठिया क्रांतिकारी विमल मिश्र की मौत

मुंबई : चार साल से नवभारत प्रबंधन की प्रताड़ना से जंग लड़ रहे नवभारत के रिपोर्टर विमल मिश्र का निधन हो गया। नवभारत प्रबंधन ने उन्हें न तो ट्रांसफर किया था, ना ही सस्पेंड किया और ना ही टर्मिनेट किया। इसके बावजूद वेतन नहीं दे रहा था। तकरीबन 4 साल पहले श्री मिश्र ने नवभारत के मालिक विनोद माहेश्वरी व प्रबंधन के खिलाफ ठाणे कोर्ट में प्रताड़ना का केस दायर किया जो अभी तक विचाराधीन है। Continue reading

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एनडीटीवी के तेजतर्रार कैमरामैन जितिन भूटानी का निधन

Ravish Kumar : कैमरामैन जितिन भूटानी के साथ रवीश कुमार… शुरुआती दिनों की मेरी अनगिनत रिपोर्ट इसी बाइलाइन से ख़त्म होती थी। स्टोरी सामान्य हो या विशिष्ट कैमरामैन सबमें बराबर काम करता है। इसलिए मैं उसके साथ शूट की हुई हर स्टोरी में उसका नाम ज़रूर जोड़ता था। जितिन के साथ जाने कहाँ कहाँ गया। Continue reading

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नहीं रहे पूर्णिया के वरिष्ठ पत्रकार कमल आनंद

सीमांचल के वरिष्ठ पत्रकार कमल आनंद (71) जी नहीं रहे। सोमवार की शाम करीब 5.20 बजे कोलकाता के निजी अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। 3 अगस्त की शाम उन्हें पैरालाइसिस का अटैक आया था। इसके बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए कोलकाता ले जाया गया। वहां पर हार्ट अटैक आने से निधन हो गया। उनका पार्थिव शरीर मंगलवार को पूर्णिया लाया गया। Continue reading

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प्रखर श्रीवास्तव के पिताजी और अनिल रॉयल की माताजी का निधन

टीवी पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव के पिताजी के निधन की खबर है. प्रखर इंदौर के रहने वाले हैं और इन दिनों न्यूज24 चैनल के नोएडा आफिस में आउटपुट हेड के पद पर कार्यरत हैं. Prakhar Shrivastava ने पिताजी के निधन को लेकर फेसबुक पर जो सबके साथ सूचना साझा की है, वह इस प्रकार है- Continue reading

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जनसत्ता अखबार और आजतक चैनल से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार सुमित मिश्रा का निधन

खबर आ रही है कि जनसत्ता अखबार और आजतक न्यूज चैनल से लंबे समय से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार सुमित मिश्रा का निधन हो गया है. बताया जा रहा है कि वे काफी अरसे से बीमार चल रहे थे. उनके पुत्र प्रथम मिश्रा ने अपने जानने वालों को पिता के निधन के बाद जो संदेश भेजा है, वह इस प्रकार है- Continue reading

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एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय की बेटी की मौत

एक बुरी खबर एनडीटीवी समूह से आ रही है. चैनल के मालिक प्रणय राय की बेटी का निधन हो गया. उनका नाम अश्रिका राय था. वे 45 बरस की थीं. वे अपने पीछे दो बेटियां छोड़ गई हैं. Continue reading

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तेजिंदर गगन का जाना

वरिष्ठ पत्रकार प्रभाकर चौबे के दिवंगत होने की खबर का अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था की खबर आई, तेजिंदर गगन नहीं रहे। मुझे याद है तेजिंदर गगन से मेरी पहली मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई थी। वह एक राज्य संसाधन केंद्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम था। जिसमें वह बतौर साथी वक्ता पहुंचे थे। Continue reading

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नवभारत, बिलासपुर के सम्पादक निशान्त शर्मा की हार्ट अटैक से मौत

स्वर्गीय निशांत शर्मा

Pran Chadha : जान की बाजी लगा कर पत्रकारिता! दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर कल्पेश याग्निक की मृत्यु की खबर के दो दिन बाद आज नवभारत बिलासपुर के सम्पादक निशान्त शर्मा की हार्ट अटैक से मौत हो गयी।वो 59साल के थे। उनको नर्मदा नगर में उनके निवास पर आज दोपहर दिल का दौरा पड़ा उनको करीब अस्पताल पहुंचाया गया, परन्तु जीवन व मौत से जूझते कुछ घण्टों में वह जान की बाजी हार गए। Continue reading

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पश्चिम बंगाल के टीवी पत्रकार ओमप्रकाश गुप्ता का हृदयाघात से निधन

बराकर। पश्चिम बंगाल के कुल्टी निवासी स्थानीय टीवी पत्रकार ओमप्रकाश गुप्ता का 11 जुलाई देर संध्या देहांत हो गया। हृदयाघात से उनकी मृत्यु बुधवार को हो गयी। पिछले कई दिनों से पत्रकार ओपी गुप्ता अस्वस्थ चल रहे थे और बुधवार को अचानक तबियत बिगड़ने के बाद दुर्गापुर स्थित निजी अस्पताल ले जाया गया जहां उनका हृदयाघात से निधन हो गया। Continue reading

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सहारनपुर के टीवी पत्रकार धर्मेंद्र चौधरी पंचतत्व मे विलीन

सहारनपुर। समाचार प्लस न्यूज चैनल के सहारनपुर जिला प्रभारी धर्मेंद्र चौधरी जीवन से लंबी लड़ाई लड़ते हुए आखिरकार हार गए। चंडीगढ़ PGI में चले इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गयी। पत्रकार धर्मेंद्र चौधरी के शव को चंडीगढ़ से सहारनपुर उनके पैतृक निवास लाया गया। शवयात्रा हकीकत नगर शमशान घाट पहुंची। कल शाम उनके बड़े पुत्र कार्तिकेय ने मुखाग्नि दी। Continue reading

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ब्रेन ट्यूमर से जूझ रहे पत्रकार संदीप पिंटू का निधन

स्वर्गीय संदीप पिंटू

यकीन नहीं हुआ भाई Sanndeep Pintu अब नहीं रहे. ज्योतिबाफुले नगर में 2012 तक अमर उजाला के सिटी इंचार्ज थे। 2012 में जब उन्हें नई दिल्ली के सफदर गंज हॉस्पिटल में इलाज़ के लिए ले जाया गया तब अमर उजाला आफिस के कुछ लोग उन्हें नौकरी से बाहर कराने में जुट गए. प्रबंधन ने संदीप की एक नहीं सुनी और उन्हें बाहर निकाल दिया। Continue reading

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मुंगेर के वरिष्ठ पत्रकार काशी प्रसाद का निधन

बिहार के मुंगेर जिले के वरिष्ठ पत्रकार, अधिवक्ता और शिक्षक काशी प्रसाद का निधन बीती देर रात लगभग 12 बजे मंगल बाजार स्थित निवास पर हो गया। वे विगत दो माह से हृदय रोग से जूझ रहे थे। वे 94 वर्ष के थे। वे अंतिम सांस तक अंग्रेजी दैनिक द टाइम्स आफ इंडिया से संवाददाता के रूप में जुड़े रहे।


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पायनियर दिल्ली के बिजनेस एडिटर राकेश बिहारी झा का निधन, किडनी के इनफेक्शन से पीड़ित थे

स्वर्गीय राकेश बिहारी झा

Satyendra PS : बीएचयू में मेरे सहपाठी रहे राकेश बिहारी झा नहीं रहे। वह मेरे ऑफिस के बगल में ही आईटीओ दिल्ली में पायोनियर अखबार में बिजनेस एडिटर थे। उनके पत्रकारिता का कैरियर पायोनियर में ही शुरू हुआ जहां उन्होंने सब एडिटर से लेकर बिजनेस हेड तक का सफर तय किया। लंबे समय से फोन पर बातचीत भी नहीं हुई थी। अचानक यह सूचना मिली, जो हतप्रभ कर देने वाली है। राकेश बिहारी झा पिछले 3 साल से वह किडनी के संक्रमण से पीड़ित थे। हँसमुख स्वभाव के राकेश अपने मित्रों, सहकर्मियों के अभिभावक के रूप में ही रहते थे। सहपाठी होने के बावजूद उन्हें मैं राकेश भैया ही कहता था।

बीएचयू में 2000 में पढ़ने आए, तब परिचय हुआ। बैचलर ऑफ जर्नलिज्म के 2000 बैच की प्रवेश परीक्षा में वह टॉपर थे जिसकी वजह से पहले ही चरण में उन्हें बिड़ला हॉस्पिटल अलॉट हुआ। उनके रूम पार्टनर बने Panini Anand. यह भी एक अनोखी जोड़ी। संभवतः राकेश झा उम्र में पाणिनि से एक दशक बड़े थे। उम्र और अनुभव दोनों हिसाब से। राकेश ने जब bhu में एडमिशन लिया था तो 3 बार उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग, 1 बार संघ लोक सेवा आयोग और सम्भवतः 4 बार बिहार लोक सेवा आयोग का इंटरव्यू दे चुके थे। वहीं पाणिनि ग्रेजुएशन कर आए थे और bhu के हिंदी विभाग में चलने वाले जर्नलिज्म में सम्भवतः धोखे से एडमिशन ले लिया था। पाणिनि भी संभवतः टॉपर ही थे जिन्हें पहले राउंड में होस्टल मिल गया था। जनरेशन गैप के बाद भी पाणिनि और राकेश में अच्छी जमती थी। बाद में पाणिनि ने iimc में एडमिशन ले लिया।

मेरे साथ हॉस्टल में रूम पार्टनर Anand Mishra बने। वह भी एक्स्ट्रा मॉड युवा थे और उनकी तुलना में मैं बुजुर्ग। दोनों के रहन सहन में इतना अंतर था किक्लास के ही किसी सहपाठी को 6 महीने बाद पता चला कि हम दोनों रूम पार्टनर हैं तो वह चकित रह गया। BJMC के बाद राकेश, आनन्द और मैने साथ साथ नौकरी के लिए कुछ साल संघर्ष किया। उत्तम नगर में एक कमरे में साथ रहे।

9 जनवरी 2018 के मनहूस रोज मैं अपने इलाज के लिए राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में दिन भर भटकता रहा और राकेश एम्स से लेकर LNJP अस्पताल में एम्बुलेंस में भटकते रहे और आखिरकार दम तोड़ दिया। आज यह सूचना मिली तो उनके आवास गया। भाभी जी ने बताया कि तुम्हारी और आनंद की अक्सर चर्चा करते रहते थे। अफसोस यह है कि 3 साल में उन्होंने कभी नही बताया कि उन्हें किडनी की समस्या है। इस धंधे करीब हर आदमी की यही कहानी है। आदमी सबका दुख सुनता है लेकिन अपना दुख किसी को बताने का मौका भी नहीं आता। भाभी जी से कहा कि कम से कम मुझे ही बता दिया होता, मिल तो लेते, रोते हुए कहने लगीं कि किसी को नहीं बताने दिया। कहते थे कि सबकी अपनी व्यस्तता, अपनी मुसीबत है। सब ठीक हो जाएगा।

संभवतः उनको बिल्कुल सही पता था कि कुछ ठीक होने वाला नही है। इलाज के लिए पैसे भी नही रहे होंगे जिसके चलते फोर्टिस के डॉक्टरों द्वारा किडनी ट्रांसप्लांट की राय देने के बावजूद इधर उधर आयुर्वेदिक इलाज करा रहे थे! पत्नी के ऊपर दबाव बना रहे थे कि जॉब ज्वाइन कर लो! ईश्वर पर उनका जबरदस्त भरोसा था। जब भी मेट्रो में मिलते, ईश्वर को लेकर उनसे जबरदस्त झगड़ा हो जाता। आज फिर उनके ईश्वर पर से भी मेरा भरोसा उठ गया। अब सिर्फ यादें रह गईं। आज अंतिम संस्कार हो गया। ब्राह्मण भोज उनके पैतृक स्थान (सम्भवतः भागलपुर) पर होगा। ढेरों यादें छोड़कर यूं ही चले गए।

Pramod Singh Rathore : I am overcome by emotions as I write on your wall dearest friend Rakesh Bihari Jha. A gentleman, who welcomed all with a smiling face in our daily editorial meetings. Your sharp analysis & understanding of news was extraordinary .We all will miss you. May the noble soul Rest In Peace Rakesh…May God give strength to your family to bear this monumental loss..

पत्रकार सत्येंद्र पीएस और प्रमोद सिंह राठौर की एफबी वॉल से.

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हमारी-आपकी चुप्पियों के बीच एक वरिष्ठ पत्रकार का यूं अचानक चले जाना (देखें वीडियो)

वरिष्ठ पत्रकार पुनीत कुमार पचास की उमर में चल बसे… वो सहारा समय में नेशनल हेड रह चुके हैं. काफी समये से वो फ्री लांस जर्नलिज्म कर रहे थे. आईआईएमसी से पासआउट और कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे पुनीत की मृत्यु कुछ दिन पहले हुई लेकिन चर्चा बस पुनीत की एफबी वॉल तक सीमित है. भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत ने पुनीत को यूं याद कर दी श्रद्धांजलि…  देखें वीडियो…

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राजेश शर्मा के निधन से भड़ास ने एक सच्चा शुभचिंतक खो दिया

राजेश शर्मा चले गए. दिवाली की रात. हार्ट अटैक के कारण. उमर बस 44-45 के आसपास रही होगी. वे इंडिया न्यूज यूपी यूके रीजनल चैनल के सीईओ थे. राजेश भाई से मेरी जान पहचान करीब आठ साल पुरानी है. वो अक्सर फोन पर बातचीत में कहा करते- ”यशवंत भाई, तुम जो काम कर रहे हो न, ये तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता. मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत करीब से देखा है. यहां सब मुखौटे लगाए लोग हैं. भड़ास के जरिए तुमने आजकल की पत्रकारिता को आइना दिखाया है.”

राजेश प्रैक्टिकल आदमी थे. वह मीडिया और बाजार के रिश्तों को अच्छे से समझते थे. वह कहते भी थे- ”यार, हम लोगों को टारगेट पूरा करना होता है, रिजल्ट देना होता है. तब जाकर सेलरी मिलती है.”

मेरी पिछली बातचीत राजेश शर्मा से तब हुई जब इंडिया न्यूज के मालिक कार्तिक शर्मा ने भड़ास पर मुकदमा किया था. बहुत सारी बातें हुई थी फोन पर. राजेश ने कहा था कि यार यशवंत, बहुत दिन हुआ, बैठते हैं अपन एक दिन.

काफी पहले की बात है. राजेश तब इंडिया न्यूज में नहीं थे. नौकरी तलाश रहे थे. उनके रिक्वेस्ट पर एक बार मैं तबके अपने मित्र रहे समाचार प्लस वाले उमेश शर्मा के पास ले गया. वहां से मिलकर हम दोनों बाहर निकले. राजेश के कार में ज्यों ही बैठा, त्यों कुछ लोगों ने मेरा नाम पूछा और मुझे बाहर निकाल कर टांग लिया. वे लोग खुद को पुलिस वाले बता रहे थे. राजेश बेहद डर गए, इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से. बाद में उन्होंने बताया था- ”यशवंत, मैं यार इतना डर गया था कि गाड़ी फुल स्पीड में भगाते हुए सीधे अपने घर जाकर ही रुका.” यह राजेश की साफगोई थी, उनकी सहजता थी जो इस बात को भी सीधे-सीधे कह दिया.

बता दें कि नोएडा पुलिस की एसटीएफ द्वारा की गई उस गिरफ्तारी के बाद मुझे दो दिन नोएडा के कई थानों के हवालातों में रखा गया. फिर डासना जेल भेज दिया गया जहां 68 दिन रहने के बाद छूटा. इस जेल जीवन पर ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिखी. यह गिरफ्तारी इंडिया टीवी, दैनिक जागरण समेत कई चैनलों-अखबारों के मालिकों-मैनेजरों-संपादकों की एक बड़ी साजिश के तहत हुई थी. तात्कालिक कारण बना विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी से मेरा पुराना झगड़ा. इन दोनों के कंधें पर बंदूक रहकर ढेर सारे मीडिया हाउसेज ने पूरी योजना बनाई कि अबकी यशवंत और भड़ास को नेस्तनाबूत कर देना है. इस साजिश में मीडिया मालिकों ने यूपी की तत्कालीन नई-नई आई अखिलेश सरकार के बड़े अफसरों और मुलायम घराने के कुछ बड़े नेताओं को भी शामिल कर लिया था, गलत तथ्य और गलत जानकारियां देकर.

खैर, बात हम लोग कर रहे थे राजेश शर्मा की.

भड़ास पर जब जब आर्थिक मदद के लिए अपील की गई, राजेश भाई ने हर बार चुपचाप पांच हजार या दस हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में डालने के बाद फोन पर कहते- ”यशवंत यार इस मदद के बारे में किसी से न जिक्र करना और न कुछ लिखना.”

राजेश प्रबंधन के हिस्से हुआ करते थे, इसलिए जानते थे कि भड़ास से खुलेआम संबंध शो करना करियर के लिए अच्छा नहीं. वो इसका जिक्र फोन पर मजाक में किया करते थे और चुटकी लेते हुए कहते थे- ”भड़ास से दोस्ती और दुश्मनी दोनों करियर के लिए बुरी है…” यह कहते हुए वह ठठा कर हंसते थे…

जिंदादिल राजेश से एक दफे लखनऊ के एक होटल में मुलाकात हो गई, अचानक. राजेश अपने आफिसियल टूर पर लखनऊ गए थे और होटल में रुके हुए थे. मैं एक प्रोग्राम में शिरकत करने होटल में गया हुआ था. हम दोनों होटल के रेस्टोरेंट में अचानक टकरा गए. निगाह मिलते ही राजेश भाई एकदम से खड़े हुए और दोनों हाथ फैलाकर मुस्कराते हुए आगे बढ़े, मैं भी उनकी ओर मुखातिब हुआ. उन्होंने गले लगाया और पीठ थपथपाते हुए कई बार कहा- ”मेरे भाई, मेरे भाई… जमाने बाद मिले हम लोग.” फिर देर तक बात हुई, हंसी-मजाक चला.


मूल खबर :


राजेश को लेकर बहुत सारी बातें हैं, यादें हैं. क्या-क्या कहा जाए. एक इतने जीवंत, सहज, सरल, जिंदादिल और भावुक आदमी का इतना जल्द चले जाना किसी को भी हजम नहीं हो रहा. पर मौत एक कड़वी सच्चाई है जिसे मन मसोस कर कुबूल करना पड़ता है, हजम करना पड़ता है. राजेश का शरीर भले ही आग के हवाले होकर राख में तब्दील हो चुका है लेकिन उनकी यादें हम जैसों के दिलों में हमेशा बनी रहेंगी, जीवंत रहेंगी…

राजेश मेरे अच्छे शुभचिंतकों में से थे लेकिन हम दोनों फेसबुक पर फ्रेंड नहीं थे. राजेश रिश्तों की शो-बाजी पसंद नहीं करते थे. और, शायद भड़ास वाला यशवंत होने के कारण मेरे साथ रिलेशन को पब्लिक डोमेन में चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि यह उनके करियर की भी मजबूरी थी. राजेश के मन-दिल को मैं समझता था इसलिए उनकी भावनाओं, उनकी मजबूरियों को भी महसूस करता था. सो, हम लोग फेसबुक पर भले फ्रेंड न रहे हों, लेकिन दिल के स्तर पर बेहद करीबी नाता था…

दोस्त, जिस भी दुनिया में गए हो, ऐसे ही हंसते मुस्कराते इठलाते जीना.. तुम्हारे जाने से मीडिया की दुनिया एक शानदार शख्सियत से महरूम हो गई है… खासकर मैंने अपना एक सच्चा शुभचिंतक / साथी खो दिया है जो हमेशा पूछा करता था- ”यशवंत, कोई दिक्कत हो तो बताना…” ये पूछना ही मेरे लिए काफी था क्योंकि आजकल की मायावी दुनिया में कौन किसकी चिंता करता है…

राजेश भाई, आप कहा करते थे, साथ क्या जाएगा, सब यहीं रह जाएगा, इसलिए किसके खातिर बेइमानी करना. आपके भीतर एक उदात्त किस्म का इंसान था जो सब कुछ, हर ओर-छोर महसूस करता था और सबकी सीमाओं-दायरों को समझा करता था. राजेश अपनी व्यस्त लाइफ, आफिसियल टूर आदि को लेकर कई बार चिंतित होते थे. कहते- यार सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती. एक जगह से टूर निपटा कर लौटे तो दूसरा टूर तैयार रहता है.

राजेश भाई, आपने देख लिया न करियर की आपाधापी का नतीजा. इस तनाव और भागदौड़ से निजात पाने के लिए एल्कोहल का सहारा लेते हैं. योगा कसरत के लिए समय निकाल नहीं पाते. नतीजा, शरीर और नसें दिन प्रतिदिन शिथिल होती जातीं. कई किस्म के लेयर्स नसों के भीतर चढ़ते भरते चले जाते हैं… एक दिन नतीजा आता है हार्ट अटैक के रूप में… उम्मीद करते हैं आपके असमय चले जाने से मीडिया के कुछ ऐसे साथी सबक लेंगे जो आपकी ही तरह की व्यस्ततम लाइफस्टाइल जीते हैं. मुझे याद आता है राजेश भाई आपके घर पर घंटों बैठकर बतियाना. तब मैं दिल्ली के बाबा नीम करोली आश्रम गया था और बगल में ही छतरपुर में आपका घर था. मैंने फोन लगाया और आपने फौरन घर पर बुला लिया. वह केयर, प्यार और सम्मान सब याद आ रहा.

लव यू राजेश भाई, सैल्यूट यू राजेश भाई…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक हैं. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

भड़ास पर राजेश शर्मा को लेकर छपी पिछली खबर ये है…

इस खबर में राजेश शर्मा की तस्वीर है, दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ…

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इंडिया न्यूज यूपी-यूके रीजनल चैनल के सीईओ राजेश शर्मा का हार्ट अटैक से निधन

दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ सबसे बाएं राजेश शर्मा

एक दुखद खबर आ रही है दिल्ली से. इंडिया न्यूज समूह के रीजनल न्यूज चैनल इंडिया न्यूज यूपी यूके के सीईओ राजेश शर्मा का ऐन दिवाली की रात हार्ट अटैक से निधन हो गया. उनकी उम्र 45 वर्ष के आसपास रही होगी. जिंदादिल स्वभाव वाले राजेश बेहद मेहनती और निष्ठावान शख्सियत थे. यही कारण है कि इंडिया न्यूज में एंट्री के बाद उन्होंने लगातार तरक्की की.

इंडिया न्यूज से पहले राजेश कई बड़े चैनलों में काम किए थे. आज दोपहर उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में कर दिया गया. दिल्ली के मूल निवासी राजेश के परिवार में अब उनकी पत्नी और इकलौती पुत्री हैं. राजेश शर्मा के निधन पर इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक तस्वीर शेयर करके ये लिखा है :

Rana Yashwant : बहुत याद आओगे : कोई मौक़ा चूकते हुए नहीं देखा तुमको. ज़िंदगी के हर पल में कुछ ना कुछ ज़िंदगी-सा होते रहना चाहिए – तुम्हारा सलूक ज़िंदगी के साथ ऐसा ही रहा. अचानक आ जाना, अपनापन जताना और फिर अचानक निकल जाना.

कल दिन में साथ थे तुम और कल ही अचानक हमेशा के लिए निकल भी गए. ऐसे कई मौक़े उम्र भर याद रहेंगे जब तुम्हारे साथ होने से ही मन/माहौल बदल गए. पिछले महीने मेरे जन्मदिन पर पास आकर जिस गर्मजोशी से तुम मिले, वही तुम हो और हमेशा रहोगे. ज़िंदगी को तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत रहेगी और मौत हमेशा शर्मिंदा रहेगी.

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निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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न्यूज24 के एसोसिएट प्रोड्यूसर कामता सिंह को जहर देकर और गला घोंटकर मारा गया था!

इसी साल मार्च महीने में न्यूज24 के एसोसिएट प्रोड्यूसर कामता सिंह की रहस्यमय हालात में मौत हो गई थी. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई है उसमें बताया गया है कि उन्हें जहर देकर और गला घोंटकर मारा गया. कामता चैनल से ड्यूटी करके रात 12 बजे सोने चले गए थे. साथ में पत्नी भी सो रही थीं. सुबह छह बजे वे नहीं उठे और न हलचल कर रहे थे. तब पत्नी उन्हें अस्पताल ले गईं. वहां डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. फिलहाल बिसरा रिपोर्ट का आना अभी बाकी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट की खबर हिंदुस्तान अखबार में छपी है, जो इस प्रकार है…

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वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिताजी लालता प्रसाद सिंह का निधन

स्वर्गीय लालता प्रसाद सिंह

अमर उजाला, इंडिया टुडे, चौथी दुनिया समेत कई अखबारों मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिता जी लालता प्रसाद सिंह का मास्को में निधन हो गया. वे 92 वर्ष के थे. उनका काफी समय से इलाज चल रहा था और हर बार वह स्वस्थ होकर घर लौट आते थे. इस बार वह अस्वस्थ हुए तो अस्पताल से वापस नहीं लौट पाए. वह अपने पीछे दो पुत्र और एक पुत्री समेत नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. इन दिनों वह मास्को में अपने छोटे बेटे के यहां रह रहे थे.

शीतल पी. सिंह पिता जी की मृत्यु की खबर सुनते ही मास्को के लिए रवाना हो गए. कल पार्थिव शरीर के साथ वह लोग भारत आएंगे और संभव: परसों अपने गृह जिले सुल्तानपुर पहुंचेंगे. पिता लालता प्रसाद सिंह बेहद उदात्त चेतना के शख्स थे. वे हल्थ सर्विसेज में कार्यरत रहे. रिटायरमेंट के बाद वह सुल्तानपुर जिले के कादीपुर तहसील स्थित अपने गांव सराय कल्यान के निवास करते रहे. साथ ही साथ दिल्ली से लेकर मास्को तक अपने पुत्रों के यहां आते-जाते रहे. उनके निधन पर उनके पुत्र शीतल पी. सिंह और उनको जानने-चाहने वाले पत्रकार असरार खान ने फेसबुक पर जो लिखा वह इस प्रकार है–

Sheetal P Singh : पिता बहुत अस्वस्थ थे। कल शाम (22 सितंबर) उनकी आख़िरी शाम थी! बहुत जुझारू रहे। चार दशक मधुमेह के साथ निकाल गये। कई अस्पतालों को छकाया। छोटे भाई के यहाँ मास्को में थे बीते तीन महीने से। वापसी के दिन ब्रेन स्ट्रोक हुआ। मैं भी पता लगते ही आया। पिछले महीने मिलकर गया ही था।

Asrar Khan : प्रिय साथी शीतल सिंह और अभिन्न मित्र बीपी सिंह के पिता परम आदरणीय श्री लालता प्रसाद सिंह जी अब इस दुनिया में नहीं रहे… इस दुःखद समाचार को सहने की ताकत तो मुझमें नहीं है क्योंकि मेरे भी पिता की तरह थे और विचारों से इतना प्रगतिशील और आधुनिक थे कि सहज ही हम उन्हें मित्र और कामरेड भी समझते थे…. सच तो यह है कि एक साधारण व्यक्ति के रूप में वे एक महात्मा थे जो किसी भी महत्वाकांक्षा से परे विशाल ह्रदय वाले मानवता नैतिकता और उच्च आदर्शों एवं व्यवहार के प्रेरणाश्रोत थे… उनकी कमी कभी पूरी नहीं होगी… इन्हीं शब्दों के साथ मैं अतुलनीय व्यक्तित्व के धनी प्रिय पिता जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं…

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लखनऊ के फोटो जर्नलिस्ट संजय त्रिपाठी का निधन

लखनऊ के वरिष्ठ छायाकार संजय त्रिपाठी का आज भोर में दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार आज दिन में दो बजे बैकुंठ धाम में किया गया. संजय के पुत्र शुभम 4PM अखबार में छायाकार हैं. 4पीएम के संपादक संजय शर्मा ने वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट संजय त्रिपाठी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया. उन्होंने बताया कि संजय जी बहुत अच्छे छायाकार थे. परमपिता परमेश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवार को दुख सहने की क्षमता दे.

संजय त्रिपाठी के साथ काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि संजय ज़िन्दादिल इंसान थे और अपने काम में माहिर, मस्त-मौला। उनके पिताजी विधायक थे पर खुद राजनीति से दूर रहे और राजनीति करने वालों से बेहद चिढ़ते थे। मनमर्जी के मालिक थे। कहते थे ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो गईं, अब जिंदगी का आनंद लेना है। पर वो बैठने वाले इंसान नहीं थे। काम हो या न हो, कैमरा लेकर निकल पड़ते थे। अच्छी फोटो हाथ लगते ही क्लिक कर देते और फेसबुक पर अपलोड करते। गाँव जाकर कुछ काम धंधा करना चाहते थे। राष्ट्रीय सहारा छोड़ने के बाद कुछ मायूस से रहने लगे थे। जनवरी में वो जनसत्तान्यूज़.कॉम से जुड़े और इसे नयी बुलंदी प्रदान की।

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Legendary journalist, author and novelist Arun Sadhu passes away

We are very sad to inform you that a legendary journalist, author and novelist Arun Sadhu passed away on Monday morning due to illness at a city hospital. He was 76. Known for his expansive work in journalism, commentary on current affairs and politics, Sadhu has authored award winning political novel like Simhasan which was later made into a film that is still relevant and treated as a cult classic. His social novel Mukhavata, and his first novel Mumbai Dinank are considered top class.

He won several accolades such as Sahitya Akademy Award for his literary works. He was elected president of All India Marathi Sahitya Sammelan in 2007. A guiding star to several journalists and students of journalism, Sadhu also worked as head of the mass communications department of Pune University for six years. Earlier, he worked with several national dailies including Indian Express. He wrote in Marathi, Hindi and English.

He studied and essayed the rise of Shiv Sena, wrote on the Vietnam war and the Chinese revolution. Sadhu practiced what he preached.  He had wished his body be donated for medical research. So there will be no funeral. The Mumbai Press Club is deeply saddened, and pays late Sadhu rich tributes. We condole his death and share grief with his family, friends and well-wishers. A condolence meeting will be held very soon at the Club. We will keep you informed.

Dharmendra Jore
Secretary, Mumbai Press Club

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लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह का निधन

Sad news. journalist Arvind Narayan Singh, who had been associated with Nav Bharat Times, Rashtriya Sahara and Hindustan, died at his Indira Nagar, Lucknow residence on Sept. 7, Thursday. RIP

Devesh Singh : वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह हमारे बीच नहीं रहे। आज हम सब के बीच वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह नहीं रहे। प्रातः तकरीबन सवा चार बजे उन्होंने अन्तिम सांस ली। लंबे समय से वह हिपेटाइटिस से जूझ रहे थे। अन्तोगत्वा आज मौत के आगे जिंदगी ने घुटने टेक दिये। यूं तो मीडिया जगत में उनकी लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। हिन्दुस्तान अखबार से अलग होने के बाद वह कुछ बुझे-बुझे से रहने लगे थे। कभी उन्होंने अपने दर्द को बयां नहीं किया।

मीडिया में चंद लोग ही होंगे जिन्हें उनकी बीमारी के बारे में मालूम होगा। इधर काफी समय से उन्होंने गुमनामी की चादर ओढ़ दीनदुनिया से अपने को अलग कर लिया था। आज भी मेरी शादी में नाचते हुए उनका मुस्कराता चेहरा मुझे याद आ रहा है। हिन्दी भाषा पर उनकी गजब की पकड़ थी। पान खाने के वह बेहद शौकीन थे। अरविंद जी कम बोलेते थे। काफी नपी-तुली भाषा का इस्तेमाल करना उनकी आदत में शुमार था।

उन्होंने अपने को हमेशा तड़क भड़क जीवन शैली से अलहदा रखा। सादा जीवन के वह अनुयायी थे। आज जब वह हम सब के बीच नहीं है उनकी हर बात याद आती है। मेरा दुर्भाग्य रहा जो मुझे उनके साथ काम करने का मौका नहीं मिला। फिर भी मैं उनके काफी करीब था। अरविंद जी की एक बेटी है जिसकी मेडिकल की पढ़ाई पूरी हो चुकी है। दुख की इस घड़ी में ईश्वर उनके परिवार को सहन शाक्ति दे। अंतिम या़त्रा आज शाम चार बजे उनके निवास स्थान 15-सी नील बिहार कालोनी सेक्टर-14, इन्दिरानगर से भैंसाकुंड के लिए निकली। इस दौरान काफी संख्या में उनके जानने वाले मौजूद रहे।

लखनऊ के युवा पत्रकार देवेश सिंह की एफबी वॉल से.

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मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं.

इस वीडियो को बनाने के बाद वे दिल्ली जाकर एक होटल में रुकते हैं. वहां से गाजियाबाद की तरफ निकलते हैं और एक ट्रेन से कटकर जान दे देते हैं. नीचे दिए गए वीडियो को गौर से देखिए और सुनिए. ये अफसर यूनिवर्स की बात कर रहा है. जीवन के मकसद की बात कर रहा है. शांति और अध्यात्म की बात कर रहा है. अपने स्वभाव और परिजनों के व्यवहार की बात कर रहा है.

यह आईएएस अफसर धरती और यूनिवर्स में मनुष्य के होने की किसी सार्थकता को खारिज करता है. इस दुनिया को खुद के लिए रहने लायक नहीं पाता है. वह खुद को यहां मिसफिट बताता है. भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच का यह अधिकारी अंत में इस नतीजे पर पहुंच जाता है कि आत्महत्या का उसका चुनाव बेहद सही रास्ता है, सबसे उचित तरीका है, सभी समस्याओं-दुखों से निजात पाने का.

मौत को गले लगाना ही एक जीवन के लिए मंजिल नजर आने लगे, वह भी इस नतीजे पर कोई युवा आईएएस अफसर पहुंच जाए, ऐसा उदाहरण शायद ही कहीं मिले.

श्रद्धांजलि मुकेश पांडेय.

आप जिस भी दुनिया में चले गए हों, वहां आप को अपने स्वभाव के अनुरूप शांति और प्रेम मिले.

आत्महत्या करने से पहले बक्सर के सर्किट हाउस में रिकार्ड किए गए मौत के दर्शन वाला वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट.

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मनोज भी दरवीश ही की तरह कैंसर में गिरफ़्तार होकर चल बसे!

Asad Zaidi : मनोज पटेल का अचानक चले जाना अच्छा नहीं लग रहा है। हिन्दी में दुनिया भर की समकालीन कविता के अनुवाद की जो रिवायत अभी बन रही है, वह उसके बनाने वालों में एक थे। वह कविता के अत्यंत ज़हीन पाठक थे, नफ़ीस समझ रखते थे, और उनकी पसन्द का दायरा व्यापक था।

कल से कई बार ख़याल अाया कि उनके ब्लॉग ‘पढ़ते-पढ़ते‘ (http://padhte-padhte.blogspot.in/) का, जिसने अपनी तरह से लोगों को प्रभावित और शिक्षित किया, अब क्या होगा। उनके दोस्तों से अपील है कि ब्लॉग की सारी सामग्री को व्यवस्थित रूप से डाउनलोड करके सुरक्षित कर लें। 30 मार्च 2012 को उन्होंने महमूद दरवीश की एक कविता का अनुवाद अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया था, जिसमें ये पंक्तियाँ थीं :

मौत को भी अचानक होता है प्यार, मेरी तरह
और मेरी तरह मौत को भी पसंद नहीं इंतज़ार

मनोज भी दरवीश ही की तरह कैंसर में गिरफ़्तार होकर चल बसे। अलविदा!

साहित्यकार और पत्रकार असद जैदी की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

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बेहतरीन अनुवादक और ब्लागर मनोज पटेल नहीं रहे

Amitaabh Srivastava : बेहतरीन अनुवादक, ब्लॉगर, फेसबुक मित्र मनोज पटेल का यूँ अचानक चले जाना! क्या कहें सिवाय इसके कि जीवन बहुत अनिश्चित है, समय बहुत क्रूर. पुस्तक मेले की मुलाकात याद आयी और मन भर आया. हम जैसों के लिए तो उनके अनुवाद एक नयी दुनिया की खिड़कियों का काम करते थे. उनका ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते पढ़कर ही कई नामों से परिचय हुआ था. बहुत अफ़सोस है मन में, बड़ा मनहूस दिन रहा आज. विनम्र श्रद्धांजलि

Gopal Rathi : दुखभरी खबर… हमारे फेसबुक मित्र द्वय शायर अमर नदीम साहब और दुनिया भर की कविताओं को हिंदी में अनुवादित करने वाले युवा कवि मनोज पटेल के दुखद निधन की खबर अभी अभी फेसबुक के माध्यम से मिली l अपने अपने क्षेत्र की इन सिद्धहस्त हस्तियों का फेसबुक पर हमारा मित्र होना हमारा सौभाग्य रहा l उनसे कभी नही मिला लेकिन उनके जाने पर दुख और वियोग की अनुभूति हो रही है l दोनों मित्रों को लाल सलाम l

Anil Janvijay : दुनिया भर के कवियों की कविताओं को हिन्दी में लाने वाले युवा कवि मनोज पटेल नहीं रहे। बेहद दुख हो रहा है। दिल रो रहा है।

Mridula Shukla : असमय चले जाना एक विलक्षण मनुष्य का, आत्मीय मित्र का शुभकामना लेने की हालत में नहीं हूँ मित्रों। विदा मनोज पटेल।

Arun Dev : मनोज पटेल ने वेब पर साहित्य को अपने परिश्रम और सुरुचि से समृद्ध किया है. वह इस तरह कैसे जा सकते हैं. उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था. समालोचन की तरफ से विनम्र श्रद्धासुमन.

Hemant Krishna : अपने अनुज मनोज पटेल नहीं रहे। ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ थम गया हो। आंखें अश्रुपूरित हो गई हैं। अपूरणीय क्षति। भगवान उनकी आत्मा को शांति और परिवार को सहन शक्ति प्रदान करे।

Pallavi Trivedi : जिस ब्लॉग को पढ़कर विश्व कविता से पहचान कायम हुई और साथ ही Manoj Patel से भी। यूं उनका अचानक चले जाना स्तब्ध कर गया। अब तक यकीन न हो रहा कि मनोज पटेल अब नहीं हैं। उनके ब्लॉग के रूप में वे हमेशा रहेंगे। हम जब भी ब्लॉग पर जाएंगे,वे वहीं मिलेंगे। विदा दोस्त … बहुत याद आओगे।

Ghanshyam Bharti : साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र और जिले की माटी के लाल मनोज पटेल का चुपके से जाना वास्तव में आत्मिक रूप से झकझोर देने वाली एक बड़ी घटना है। ऐसे में उस्ताद शायर मरहूम इरफान जलालपुरी की यह पंक्तियां बरबस ही याद आ रही हैं — “ओढ़कर मिट्टी की चादर बेनिशां हो जाएंगे, एक दिन आएगा हम भी दास्तां हो जाएंगे”

Hafeez kidwai : कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ…न मिलते है, न साथ चाय पीते हैं, न लड़ते हैं, न बहस होती है यहाँ तक बात भी तो नही होती है।फिर जब वह चले जाते हैं तो ज़िन्दगी में खालीपन सा क्यों आ जाता है। ऐसा कैसे लगता है की दिल के अंदर कोई फाँस सी लग गई हो। फेसबुक पर ऊपर नीचे ऊँगली चलाते कितने दोस्त पन्नों की तरह पलटते जाते हैं। कितनों के नाम तो कितनों की तस्वीर तो कितनों के अल्फ़ाज़ ज़बरदस्ती दिमाग में पालथी मारकर बैठ जाते हैं। जब यह उठकर जाने लगते हैं तो इनकी होशियारी तो देखिये, पूरा दिल ओ दिमाग साथ ले जाने लगते हैं। जाते जाते सूखी आँखों को लबालब भरे तालाब में बदल यह पलट कर भी नही देखते। मनोज पटेल चुपके से चले गए। सच कहें जो उनके अल्फाज़ो की चादर ओढ़ रात में सोया था, लगा कोई एक झटके में छीन ले गया। यह भी कितना अजीब है की बिला ज़रूरत वह चादर खुद बखुद उढ़ गई और खुद बखुद उड़ भी गई। मगर जब यह चादर हटी तो लगा की बचा ही क्या है अब हमारे पास। अजब दर्द के मारे हम, पता नही कहाँ से मनोज पटेल के अल्फ़ाज़ टकरा गए और हमारे इर्द गिर्द फैल गए, क्या पता की रात की एक करवट से यह लफ़्ज़ टूट जाएँगे और इनके टूटने की आवाज़ भी न सुनाई देगी। आज मनोज ने दिल को ऐसा झटका दिया है कि मेरे पास आने वाले अल्फ़ाज़ मुँह बाए खड़े हैं और कह रहें हैं कि अगर तुम ज़िंदा रहो तो चौखट पर आएं वरना कहो तो यहीं से अलविदा। पता नहीं, मैं कुछ कह नहीं सकता, जब तक मैं मनोज को अलविदा बोलकर आता हूँ तब तक मेरा इंतज़ार करना.

सौजन्य : फेसबुक

मनोज पटेल के नीचे दिए गए ब्लाग पर जाकर आप उनकी अनूदित रचनाओं को पढ़-जान सकते हैं :

‘पढ़ते-पढ़ते’ ब्लाग : मनोज पटेल

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