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सुख-दुख

‘मी टू’ अभियान किसी को हमेशा कलंकित करने वाला अभियान नहीं बन सकता

“द क्विंट” की स्टोरी पर रोक के बाद न्यूज़डाग में प्रकाशित होने का मामला…. दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि निजता के अधिकार में भुला दिए जाने का अधिकार और अकेला छोड़ दिए जाने का अधिकार अंतर्निहित होता है ।दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने कहा है कि ‘मी टू’ अभियान किसी को हमेशा कलंकित करने वाला अभियान नहीं बन सकता। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों जिनमें शिकायतकर्ताओं के नाम गुमनाम रहे, पर आधारित लेखों को लगातार दोबारा प्रकाशित कर ‘मी टू’ के अभियान को भड़काना, एक पुरुष की निजता का हनन है। हाईकोर्ट ने वादी एक डिजिटल मीडिया हाउस के मैनेजिंग डायरेक्टर जुल्फिकार अहमद खान खिलाफ दोबारा आर्टिकल प्रकाशित करने पर रोक लगाते हुए कहा, ‘मी टू’ अभियान किसी को हमेशा कलंकित करने वाला अभियान नहीं बन सकता। अगर एक ही आर्टिकल को बार-बार प्रकाशित करने की इजाजत दी जाती है, तो याचिकाकर्ता का अधिकार गंभीर रूप से खतरे में पड़ जायेगा।

दरअसल, ‘मी टू’ कैम्पेन के तहत यौन उत्पीड़न को लेकर मिली शिकायत के आधार पर पिछले 12 और 31 अक्टूबर को एक नामचीन डिजिटल प्लैटफॉर्म“द क्विंट” ने दो स्टोरी पब्लिश की थी। जिन तीन महिलाओं ने इस व्यक्ति पर आरोप लगाए थे उनके नाम गुमनाम रहे। हाईकोर्ट की रोक के बाद भी एक दूसरे वेबपोर्टल ने भी यह दोनों स्टोरी उठा कर पुन:प्रकाशित कर दी।

वादी जुल्फिकार अहमद खान ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए कहा कि उनके खिलाफ एक आर्टिकल बार-बार छापे गए और वह मीडिया के जाने-माने चेहरे हैं और आधारहीन आरापों के कारण उन्हें काफी टॉर्चर और दुख झेलना पड़ा।उन्होंने कहा कि द क्विंट को लेखों के प्रकाशन से पहले उन्हें पर्याप्त नोटिस देना चाहिए था और एकतरफा खबर प्रकाशित करने से परहेज करना चाहिए था।

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दिसंबर 2018 में प्रतिवादी द क्विंट ने कोर्ट को बताया था कि बिना किसी पूर्वाग्रह के दोनों लेखों को हटा लिया जाएगा। पिछले साल 14 दिसंबर को हाईकोर्ट ने आर्टिकल पर रोक लगा दिया था और पांच दिन के बाद वेब पोर्टल“द क्विंट” और लेखक ने दोनो आर्टिकल हटा लिए थे।इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए हाईकोर्ट ने अंतिम बहस के के लिए मामले को पोस्ट कर दिया था। इस बीच दोनों लेखों की सामग्री को डब्लू डब्लू डब्लू .न्यूज़डॉगएप्प.काम नामक वेबपोर्टल द्वारा उठाया गया, जिसने सामग्री के स्रोत के रूप में द क्विंट का हवाला दिया। नौ मई19 को वादी जुल्फिकार अहमद खान के वकील ने कोर्ट को बताया कि वेब पोर्टल पर छपे लेख को दूसरे डिजिटल प्लैटफॉर्म ने इस्तेमाल किया है।

इसपर जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने कहा कि वादी को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि ये लेख कई इलेक्ट्रॉनिक / डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित न हों, क्योंकि इससे वादी के प्रति संदेह और दुश्मनी का स्थायी वातावरण बन जाएगा और साथ ही उसके व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।ये आरोप ‘मी टू’ कैम्पेन के तहत लगाए गए थे और तीनों आरोपी गुमनाम रहे। प्रकाशक ने लेखों को हटाने का फैसला किया। उसी लेख को दोबारा पब्लिश करने पर रोक लगनी चाहिए। अगर दोबारा पब्लिश करने की इजाजत दी जाती है तो यह वादी के अधिकार का हनन है।

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जस्टिस प्रतिभा एम सिंह ने इस आदेश की कापी मिलने के 36 घंटे के भीतर वेबपोर्टल से सम्बन्धित लेखों को हटाने का आदेश दिया है और ऐसा न करने पर वादी से न्यायालय को सूचित करने को कहा है।न्यायालय ने यह भी कहा है कि ऐसा न करने पर वादी सूचना प्रौधोगिकी एक्ट के तहत भी उचित प्राधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज़ करा सकता है।मामले कीअगली सुनवाई एक अगस्त 2019को होगी ।

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