कार्पोरेट और करप्ट मीडिया को केजरी ने सबक सिखाना शुरू किया, सचिवालय में प्रवेश पर रोक, सिसोदिया पीसी से उठे

कार्पोरेट और करप्ट मीडिया के निशाने पर रहे केजरीवाल और ‘आप’ पार्टी ने मौका मिलते ही मीडिया को सबक सिखाना शुरू कर दिया है. मीडिया के लोगों के सचिवालय प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है. इसी को लेकर काफी विवाद और बवाल हुआ. दिल्ली की केजरीवाल सरकार में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नई सरकार की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस को बीच में छोड़कर चले गए. दरअसल, उन्हें घेरकर पत्रकारों ने सवाल किया था कि आखिर सचिवालय में मीडिया के प्रवेश पर रोक क्यों लगाई गई है? इस सवाल पर सिसोदिया नाराज हो गए और कॉन्फ्रेंस बीच में छोड़कर चले गए. इससे पहले सुबह पत्रकार दिल्ली सचिवालय पहुंचे थे पर उन्हें अंदर जाने नहीं दिया गया.

सूत्रों के अनुसार पत्रकारों को निश्चित समय और स्थान पर ही सचिवालय आने की अनुमति दी जाएगी जिसकी जानकारी शाम को दी जाने वाली थी. इसी पर पत्रकार भड़क गए. उनका कहना था कि सचिवालय आने का मकसद खबर इकट्ठा करना है और यदि समय की पाबंदी होगी तो काम करना मुश्किल होगा. इसी के बाद पत्रकारों को सचिवालय के अंदर नहीं जाने दिया गया. इसी मुद्दे पर पत्रकारों ने सिसोदिया को घेरा था.

इससे पूर्व मीडिया कर्मी कैबिनेट बैठक की तस्वीरें लेना चाह रहे थे, लेकिन उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी गई. उन्हें दिल्ली सचिवालय की मुख्य बिल्डिंग में प्रवेश नहीं दिया गया, जबकि उन्हें प्रवेश के लिए कार्ड जारी किया गया होता है. कहा गया कि वह प्रेस ब्रीफिंग रूम में ही बैठे रहें जहां उन्हें बैठक की जानकारी दे दी जाएगी. बाद में जब प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई तो मीडियाकर्मियों ने अरविंद केजरीवाल सरकार पर मीडिया के साथ दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और हंगामा किया. हंगामा के बढ़ने के बाद डिप्‍टी सीएम मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस को बीच में ही भंग कर दिया और चले गये.

अरविंद केजरीवाल सरकार ने मीडिया कर्मियों को सेक्रेटेरियट में प्रवेश पर पाबंदी लगा दिया है. इसी बात को लेकर मीडिया कर्मियों ने हंगामा शुरू कर दिया. इससे पहले भी जब आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्‍ली में थी तो मीडिया कर्मियों पर पाबंदी लगाया गया था. सोमवार को दिल्‍ली सरकार की कैबिनेट की पहली बैठक हुई. इसके बाद मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस का आयोजन किया था. मीडिया को लगा कि पिछली बार तो नए लोगों ने सरकार बनाई थी तो उन्हें शायद बहुत कुछ पता नहीं था लेकिन दोबारा उन्हीं लोगों को ऐसा किया जाना कहीं ना कहीं मीडिया पर पाबंदी लगानी उनकी मंशा जाहिर करता है.

एनडीटीवी के रवीश रंजन शुक्ला इस प्रकरण पर अपने ब्लाग पर कुछ यूं लिखते हैं: ”पिछले साल जब अरविंद केजरीवाल शपथ लेकर दिल्ली सचिवालय पहुंचे थे और सैकड़ों कैमरे बदहवासी की हालत में उनके पीछे लगे थे। तब मुझे बहुत बुरा लगा था। गुस्सा आया अपने मीडिया के सहकर्मियों पर कि हम सभ्य तरीके से काम क्यों नहीं कर सकते हैं। सालभर बाद फिर अरविंद केजरीवाल भारी बहुमत से आए। जनता ने सवाल पूछने तक के लिए विपक्ष भी नहीं दिया, लेकिन हम अपने तरीके में बदलाव करेंगे नहीं तो पाबंदी तो झेलनी ही पड़ेगी। शनिवार को मीडिया की एंट्री बैन थी नए मीडिया सलाहकार नागेद्र शर्मा ने कहा कि सोमवार को कुछ रास्ता निकाल लिया जाएगा। हम सड़कों से कवरेज और खबरों के लिए प्रेस नोट का इंतजार करने लगे। सोमवार शाम तक कई राउंड की बात हुई, सरकार को ये भी विकल्प दिया गया कि कैमरे से अगर दिक्कत है तो उसे मीडिया रूम तक ही सीमित कर दिया जाए। केवल मान्यता प्राप्त पत्रकार या जिनके पास मान्यता नहीं है उन्हें पास बनवाकर जाने दिया जाए। लेकिन सरकार में असमंजस की स्थिति बनी रही। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जब मीडिया रूम में आए तो कुछ पत्रकारों ने उनसे चीखकर मीडिया के एंट्री बैन पर सवाल पूछा और वह शालीनता से उठकर चले गए। बाद में नागेंद्र शर्मा ने कहा कि उनके सबसे ताकतवार मंत्री के साथ दुर्व्यवहार हुआ। अब जैसे चल रहा है, वैसे ही चलेगा मीडिया को एंट्री कतई नहीं देंगे। हमें जनता ने पांच साल के लिए जनादेश दिया है, हम उसी के प्रति जवाबदेह रहेंगे, जब वह मुझसे बात कर रहे थे तब मेरे जेहन में ब्रिटेन के एक नेता का बयान घूम रहा था, जब इराक पर हमले का मन अमेरिका और ब्रिटेन ने बनाया तब उसने इसे हूब्रिस सिंड्रोम नाम दिया था, जो बुश-ब्लेयर और शक्ति के नशे का गठजोड़ था। सरकार को जनता के प्रति ही जवाब देह रहना चाहिए। वैसे भी मीडिया किसी भी अच्छे काम के लिए नहीं जानी जाती है दलाली, मक्कारी और पेड न्यूज के लिए शायद ज्यादा बदनाम हो गई है। अरविंद केजरीवाल ने पिछले साल इस बात की तस्दीक करती हुई कई तकरीर भी जनता के बीच दी थी। नागेंद्र शर्मा आप ऐसे ही मीडिया पर पाबंदी रखें। लेकिन शायद पत्रकारिता मंत्रियों के पास बैठकर चाय पीने, मोबाइल नंबर सेव कराने, हाथ मिलाकर धन्य होने या एक्सक्लूसिव टिक-टैक भर का नाम नही है। हां, यह बात अलग है कि हम इन्हीं चश्मों से आज के पत्रकारों को ज्यादा देखते हैं। जैसे राजनीति में सादगी और ईमानदार के संकेत देकर आपने लोकतंत्र को मजबूत किया वैसे ही मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी लगाकर आपने उन लोगों के हाथ में उस्तरा जरूर पकड़ा दिया, जो सच्चाई की गर्दनें काटने के लिए कुख्यात रहे हैं।”

एबीपी न्यूज की पत्रकार संगीता तिवारी अपने ब्लाग पर इस मामले में अपनी राय कुछ यूं प्रकट करती हैं : ”सत्ता संभालने के दिन से ही मीडिया से दूरी दिखाने लगी है अरविंद केजरीवाल सरकार. सरकार बनते ही पहला काम उन्होंने मीडिया के सचिवालय में आने जाने पर पाबंदी लगा दी. मीडिया को दिल्ली सचिवालय के बाहरी हिस्से में बने मीडिया ब्रीफिंग रूम तक सीमित कर दिया. पत्रकारों को इसका अंदेशा शनिवार को ही हो गया था जब उन्हें अंदर जाने से रोका गया औऱ ये कहा गया कि सोमवार तक कुछ व्यवस्था बनायी जाएगी. लेकिन सोमवार को भी यही हुआ, दिल्ली सरकार के मान्यता प्राप्त पत्रकारों को भी सचिवालय के अंदर जाने से रोका गया. जाहिर है विरोध तो होना ही था औऱ हुआ भी. तो क्या आम आदमी पार्टी की सरकार पत्रकारों की पहुंच को कम करना चाहती है. क्या वह चाहती है कि वही खबरें सामने आएं जो सरकार आधिकारिक तौर पर दे. मीडिया को स्वतंत्र रूप में आने जाने की इजाजत इसीलिए दी जाती है ताकि वो बिना किसी रोक टोक के अपने सूत्रों तक पहुंच सके जहां से उसे हर तरह की खबर मिल सके. जिन सवालों के जवाब मंत्री या सरकार नहीं देना चाहती उसे भी वो उनसे पूछ सके. इसपर पाबंदी लगाकर आम आदमी पार्टी की सरकार खुद को ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर रही है. क्योंकि शपथ लेने के बाद दिल्ली की जनता को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री केजरीवाल ने कहा था कि मीडिया वाले जब देखो तब माईक लगाकर पूछ रहे हैं कि कितने घंटे में वादे पूरे करेंगे. औऱ उन्होंने मीडिया से टाईम मांगा था वादे पूरे करने के लिए क्यों जनता ने उन्हें पांच साल का समय दिया है. ये बात सही है कि अरविंद केजरीवाल सरकार को बहुमत पांच सालों के लिए मिला है. वादे पूरे करने के लिए उनके पास पांच साल हैं. लेकिन मीडिया की जिम्मेदारी है कि केजरीवाल सरकार को उन वादों की याद हमेशा दिलाए. तो क्या सत्ता में आने के बाद इन सवालों को बार बार पूछा जाना आम आदमी पार्टी को नागवार गुजर रहा है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी को 70 में 67 विधानसभा पर जीत मिली है. यानि दिल्ली की विधानसभा में विपक्ष की उपस्थति नाममात्र की है. ऐसे में दिल्ली की मीडिया की सवाल पूछने की जिम्मेदारी औऱ ज्यादा बढ़ जाती है. उसे सरकार से वो हर सवाल पूछने होंगे जो दिल्ली की जनता के मन में हो. दिल्ली के हर इलाके की उन समस्याओं से रूबरू कराना होगा जो जीतने के बाद विधायकों के नज़र आना बंद हो जाय. उस हर वादे को याद दिलाना होगा जो दिल्ली की जनता से किए गए हैं औऱ जिनके लिए दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल को इतना प्रचंड बहुमत दिया है.”

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Comments on “कार्पोरेट और करप्ट मीडिया को केजरी ने सबक सिखाना शुरू किया, सचिवालय में प्रवेश पर रोक, सिसोदिया पीसी से उठे

  • े सब कम्युनिस्ट विचारधारा के लोग हैं और इसकी झलक पिछली बार के इनके 49 के शासन में ही मिल गई थी। पता नहीं लोग कैसे इन्हें समझ नहीं पा रहे हैं। कम्युनिस्ट ही मीडिया को निश्चित दायरे में रखने का प्रयास करते हैं। बंगाल का उदाहरण सामने है। बंगाल में भी हर विभाग में कम्युनिस्ट के कार्यकर्ता नजर रखते थे और वही बातें सामने आती थीं जो वे चाहते थे। यही वजह थी कि वे वहां 30 वर्षों तक टिके रही। ये भी ऐसा ही करेंगे। देख लेना यह सब अगले कुछ ही महीनों में सब सामने आ जायेगा।

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