यह कोई मान नहीं सकता कि केजरीवाल ने पैसे खाकर दो गुप्ताओं को राज्यसभा टिकट दिए होंगे…

लेकिन ये टिकट क्यों दिए गए, यह बताने में आम आदमी पार्टी असमर्थ है… केजरीवाल भूल सुधार करें….

डॉ. वेदप्रताप वैदिक
यह तो कोई मान ही नहीं सकता कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पैसे खाकर दो गुप्ताओं को राज्यसभा के टिकिट दे दिए होंगे लेकिन ये टिकिट उन्हें क्यों दिए गए, यह बताने में आम आदमी पार्टी असमर्थ है। उन दोनों में एक चार्टर्ड एकाउंटेट है और दूसरा शिक्षा और चिकित्सा के धंधे में है, जो आज देश में लूट-पाट के सबसे बड़े धंधे हैं। जो चार्टर्ड एकाउंटेंट है, वह अभी कुछ दिन पहले तक कांग्रेस में था और केजरीवाल का घनघोर विरोधी था।

उसने ऐसा क्या चमत्कार कर दिया कि अरविंद ने सम्मोहित होकर उसे राज्यसभा में भेजने का निर्णय कर लिया ? इन दोनों के चयन ने केजरीवाल और ‘आप’ की छवि को चौपट कर दिया है। ऐसा नहीं है कि अयोग्य धनपशुओं को अन्य दलों ने पहले राज्यसभा में नहीं भेजा है लेकिन उन दलों और नेताओं की छवि क्या अरविंद केजरीवाल-जैसी थी ? भ्रष्टाचार-विरोध ही अरविंद और ‘आप’ की पहचान है और उसकी पहचान पर अब सवाल उठने लगे हैं।

इस नामजदगी से ‘आप’ पार्टी में कितनी नाराजगी है, यह कार्यकर्ताओं ने बता दिया है। तीसरा उम्मीदवार संजय सिंह अपना पर्चा भरने  शेर की तरह गया और दो गुप्ता- लोग बिल्कुल गुप्त- से ही हो गए। यदि ‘आप’ पार्टी तुरंत नहीं संभली तो दिल्ली में उसका लौटना भी मुश्किल हो सकता है। उसने इधर इतने अच्छे काम किए हैं कि 2019 में उसकी राष्ट्रीय भूमिका भी बन सकती है बशर्ते कि वह तुरंत भूल सुधार करे।

कैसे करें? इन दोनों गुप्ताओं को पहले जीतने दे और फिर दोनों ही इस्तीफा दे दें। उसके बाद ‘आप’ पार्टी में ही कई तेजस्वी और मुखर नेता हैं, उन्हें नामजद किया जाए और अपनी इज्जत बचाई जाए। राज्यसभा की नामजदगी में सभी दलों के नेता इतनी धांधली करते हैं कि मेरी राय में यह अधिकार नेताओं से छीनकर उनके संसदीय दलों या कार्यसमितियों को दे दिया जाना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा की जानेवाली 10 नामजदगियों का अधिकार भी राज्यसभा के सभी सदस्यों के पास चला जाना चाहिए ताकि राज्यसभा में सचमुच योग्य लोग जा सकें।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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केजरी-लालू के बेमेल मिलन में रोड़ा बनेंगे कुमार विश्वास, देखें वीडियो

राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा के इस बयान पर कि आम आदमी पार्टी और राजद में चुनावी गठबंधन संभव है,  पर आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य डॉ कुमार विश्वास का बयान पढ़िए-देखिए :  मैं आश्वस्त करता हूँ कि किसी भी हालत में हमारी पार्टी का लालू के साथ खड़े होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सिपाही और आम आदमी पार्टी का संस्थापक सदस्य होने के नाते मैं पूरी ज़िम्मेदारी से इस ख़बर का खंडन करता हूँ। We can’t and we won’t even think of political alliance with Lalu Prasad Yadav ever, this I assure you as a founder member of the party and as a foot-soldier of the anti-corruption movement.Rebutting this news with full responsibility.

मालूम हो कि राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने इस बात कि पुष्टि की है कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और राजद सुप्रीमो के पुत्र तेजस्वी यादव के बीच दो बार मुलाक़ात हुई है। इसी के बाद केजरी-लालू बेमेल गठबंधन की बातें होने लगीं जिस पर कुमार विश्वास ने चुप्पी तोड़ी है। कुमार विश्वास का बयान सुनिए :

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2019 में मोदी के लिए असली सिरदर्द केजरीवाल बनेंगे!

Vikram Singh Chauhan : अरविंद केजरीवाल बहुत बहादुर है, शेर हैं। वे मोदी के सामने झुके नहीं। दिल्ली में रहकर मोदी के 56 इंच के सीने पर मूंग दल रहे हैं। मोदी जहाँ गए वहां जाकर चुनाव लड़ने की चुनौती दी और बिना पहले के जनाधार और संगठन के चुनाव लड़कर मोदी का होश उड़ा दिया, हिंदुत्व ने उसे हरा दिया। वे भारत के एक अकेले ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिसके साथ वर्तमान ने अन्याय किया पर इतिहास न्याय करेगा। मीडिया पहले दिन से उनकी सुपारी ली हुई है।

एक आम आदमी को देश का मीडिया और केंद्र सरकार किस हद तक परेशान कर सकता है पूरे देश ने देखा। आज मीडिया पर जो सवाल उठाया जा रहा है इसकी शुरुआत केजरीवाल ने ही की। उनके ऊपर कीचड़, स्याही उछाला गया लोगों ने लात और घूंसे मारे। कोर्ट ने भी उनके खिलाफ मानहानि के सभी मामले स्वीकार किया ,अमूमन कोर्ट सभी नेताओं के मामले स्वीकार नहीं करती। आज केजरीवाल चुपचाप अपना काम कर रहे हैं, वे मीडिया को मसाला भी नहीं देते हैं। केजरीवाल मोदी के सामने बिके नहीं और डरे नहीं, बावजूद आज इज्जत से मुख्यमंत्री के पद पर बैठे हैं। नीतीश जैसे लोग दो कौड़ी के होते हैं। इनकी विचारधारा और सिद्धांत कभी भी ख़रीदा बेचा जा सकता है। 2019 में केजरीवाल फिर मोदी का सिरदर्द बनेंगे। दो साल में गंगा में बहुत पानी बहना बाकी है।

यूएनडीपी से जुड़े और रायपुर के निवासी विक्रम सिंह चौहान की एफबी वॉल से.

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केजरीवाल यानि हर रोज नया बवाल

अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, उससे राजनीतिज्ञों के प्रति अविश्वास और गहरा हुआ है। वे उम्मीदों को तोड़ने वाले राजनेता बनकर रह गए हैं। साफ-सुथरी राजनीति देने का वादा करके बनी आम आदमी पार्टी को सत्ता देने में दिल्ली की जनता ने जितनी तेजी दिखाई, उससे अधिक तेजी केजरीवाल और उनके दोस्तों ने जनता की उम्मीदें तोड़ने में दिखाई है।

भारतीय राजनीति में अन्ना हजारे के चेलों ने जिस तेजी से भरोसा खोया, उस तेजी से तो जयप्रकाश नारायण और महात्मा गांधी के चेले भी नहीं गिरे। दिल्ली की सत्ता में आकर अपनी अहंकारजन्य प्रस्तुति और देहभाषा से पूरी आप मंडली ने अपनी आभा खो दी है। खीजे हुए, नाराज और हमेशा गुस्सा में रहने वाली यह पूरी टीम रचनात्मकता से खाली है। एक महान आंदोलन का सर्वनाश करने का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है किंतु भरोसे को तोड़ने का पाप भी इन सबके नाम जरूर दर्ज किया जाएगा। जिस भारतीय संसदीय राजनीति के दुर्गुणों को कोसते हुए ये उसका विकल्प देने का बातें कर रहे थे, उन सारे दुर्गुणों से जिस तरह स्वयं ग्रस्त हुए वह देखने की बात है। राजनीति के बने-बनाए मानकों को छोड़कर नई राह बनाने कि हिम्मत तो इस समूह से गायब दिखती है। उसके अपनों ने जितनी जल्दी पार्टी से विदाई लेनी शुरू की तो लगा कि पार्टी अब बचेगी नहीं, किंतु सत्ता का मोह और प्रलोभन लोगों को जोड़े रखता है। सत्ता जितनी बची है,पार्टी भी उतनी ही बच तो जाए तो बड़ी बात है।

योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और प्रो. आनंद कुमार जैसे चेहरों से प्रारंभ हुई रुसवाई की कहानियां रोज बन रही हैं। कपिल मिश्र इस पूरी जंग में सबसे नया किंतु सबसे प्रभावी नाम हैं। उन्होंने जिस तरह केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमला किया, वह बताता है कि पार्टी में कुछ भी बेहतर नहीं चल रहा है। एक नई पार्टी जिसने एक नई राजनीति और नई संभावनाओं का अहसास कराया था, उसने बहुत कम समय में खासा निराश किया है। आम आदमी पार्टी का संकट यह है कि वह अपने परिवार में पैदा हो रहे संकटों के लिए भी भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि भाजपा एक प्रतिद्वंदी दल है और उससे किसी राहत की उम्मीद आप को क्यों करनी चाहिए। मुंह खोलते ही आप के नेता प्रधानमंत्री को कोसना शुरू कर देते हैं। भारत जैसे देश में जहां संघीय संरचना है वहां यह बहुत संभव है कि राज्य व केंद्र में अलग-अलग सरकारें हों। उनकी विचारधाराएं अलग-अलग हों। किंतु ये सरकारें समन्वय से काम करती हैं, एक दूसरे के खिलाफ सिर्फ तलवारें ही नहीं भांजतीं। ऐसा लगता है जैसे दिल्ली में पहली बार कोई सरकार बनी हो।

सरकार बनाकर और अभूतपूर्व बहुमत लाकर निश्चित ही अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम ने एक ऐतिहासिक काम किया था। किंतु सरकार भी ठीक से चलाकर भी दिखाते तो उससे वे इतिहासपुरूष बन सकते थे। एक राज्य को संभालने की क्षमता प्रदर्शित किए बिना वे प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न देखते हैं। जबकि जिस नरेंद्र मोदी को सुबह-शाम वे कोसते हैं वे भी गुजरात में तीन बार लगातार बेहतर सरकार चलाने के ट्रैक रिकार्ड के चलते दिल्ली पहुंचे हैं। ऐसे में सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना का काम आम आदमी पार्टी को नित नए विवादों में फंसा रहा है। अब तक वे अन्य दलों के सारे नेताओं को चोर और बेईमान कहने की सुविधा से लैस थे, किंतु अब उनके अपने ही उनकी नीयत पर शक कर रहे हैं। जिन पत्थरों से आम आदमी पार्टी ने दूसरे दलों के नेताओं को घायल किया था, वही पत्थर अब उनकी ओर हैं।

नितिन गडकरी जैसे अनेक नेताओं के खिलाफ आरोप और बाद में माफी मांग लेना का चलन बताता है कि आम आदमी पार्टी को मीडिया का इस्तेमाल आता है। लेकिन यह भी मानना होगा कि समाज बहुत बड़ा और मीडिया उसका बहुत छोटा हिस्सा है। जनमत को साधने के लिए एक बार झूठ काम आ सकता है किंतु बार-बार सफलताओं के लिए आपको विश्वसनीयता कायम करनी पड़ती है। आज की तारीख में आम आदमी पार्टी विश्वसनीयता के सबसे निचले तल पर है। अरविंद केजरीवाल कभी उम्मीदों का चेहरा था। हिंदुस्तान की आकाक्षांओं के प्रतीक थे, भ्रष्टाचार के विरूध्द एक प्रखर हस्तक्षेप थे, आज वे निराश करते नजर आते हैं। यह निराशा भी बहुत गहरी है और उजास कहीं नजर नहीं आती।

अपने आंदोलनकारी तेवरों से वे जनता के दिलों में बहुत जल्दी जगह बना सके। शायद इसका कारण यह था कि वे दिल्ली में आंदोलन कर रहे थे और ऐसे समय में कर रहे थे , जब सोशल मीडिया और टीवी मीडिया की विपुल उपस्थिति के चलते व्यक्ति रातोंरात स्थापित हो सकता है। उनके दिखाए सपनों और वादों के आधार अनेक युवा अपना कैरियर छोड़कर उनके साथ वालंटियर के रूप में मैदान में उतरे। उन सबके साझा प्रयासों ने दिल्ली में उन्हें सत्ता दिलाई। किंतु अपने अहंकार, संवादहीनता और नौकरशाही अकड़ से उन्होंने अपने परिवार को बहुत जल्दी बिखेर दिया। उनके प्रारंभिक अनेक साथी आज अनेक दलों में जा चुके हैं। आंदोलन के मूल नायक अन्ना हजारे उनसे मिलना पसंद नहीं करते। ये उदाहरण बताते हैं कि आंदोलन खड़ा करना और उसे परिणाम तक ले जाना दो अलग-अलग बातें हैं। एक संगठन को खड़ा करना और अपने कार्यकर्ताओं में समन्वय बनाए रखना सरल नहीं होता।

आम आदमी पार्टी जो एक वैकल्पिक राजनीति का माडल बन सकती थी, आज निराश करती नजर आ रही है। यह निराशा उसके चाहने वालों में तो है ही, देश के बौद्धिक वर्गों में भी है। लोकतंत्र इन्हीं विविधताओं और सक्रिय हस्तक्षेपों से सार्थक व जीवंत होता है। आम आदमी पार्टी में वह उर्जा थी कि वह अपनी व्यापक प्रश्नाकुलता से देश की सत्ता के सामने असुविधाजनक सवाल उठा सके। उनकी युवा टीम प्रभावित करती है। उनकी काम करने की शैली, सोशल मीडिया से लेकर परंपरागत माध्यमों के इस्तेमाल में उनकी सिद्धता, भ्रष्टाचार के विरूध्द रहने का आश्वासन लोगों में आप के प्रति मोह जगाता था। वह सपना बहुत कम समय में धराशाही होता दिख रहा है। सिर्फ एक आदमी की महत्वाकांक्षा, उसके अंहकार, टीम को लेकर न चल सकने की समस्या ने आम आदमी पार्टी को चौराहे पर ला खड़ा किया है।

दल का अनुशासन तार-तार है। पहले दूसरे दलों और नेताओं की हर बात को मीडिया के माध्यम से सामने लाने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अब अपनी सामान्य दलगत समस्याओं को भी टीवी पर तय करने लगे हैं। ऐसे में दल के कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जा रहा है। ऐसे में वे कहते रहे हैं कि यह भाजपा करवा रही है। जबकि अपने दल में अनुशासन और संवाद कायम करना आम आदमी पार्टी के नेताओं का काम है। यह काम भाजपा का नहीं है।

आम आदमी पार्टी में मची घमासान राजनीतिक दलों के लिए सबक भी है कि सिर्फ  चुनावी सफलताओं से मुगालते में आ जाना ठीक नहीं है। अंततः आपको लोगों से संवाद बनाए रखना होता है। दल हो या परिवार समन्वय, संवाद और सहकार से ही चलते हैं, अहंकार-संवादहीनता और दुर्व्यवहार से नहीं। आज की राजनीति के शासकों को चाहिए कि राजा की तरह नहीं, समन्वयवादी राजनेता की आचरण करें। अरविंद केजरीवाल के पास अभी भी आयु और समय दोनों है, पर सवाल यह है कि वे क्या चीजों के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं या नहीं। या केजरीवाल को यही लगता है कि उनकी सरकार, संगठन में सब जगह उन्हें नरेंद्र मोदी के लोगों ने घेर रखा है। राजनीति सच को स्वीकारने और सुधार करने  से आगे ही बढ़ती है, पर क्या वे इसके लिए तैयार हैं?

(लेखक संजय द्विवेदी राजनीतिक विश्वेषक हैं.)

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केजरी में हवा मत भरिए, गुब्बारे को फूटने दें : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : केजरीवाल में ज्यादा हवा भरने की गुंजाइश नहीं बची है Madan Tiwary जी. नहीं मानिएगा और भरते रहिएगा तो अप्राकृतिक दुर्घटना हो जाएगी और वो फट जाएगा…जिससे अंग प्रत्यंग छितरा जाएगा… देखिएगा, कार्यकाल पूरा होते वह खुदे राजनीति छोड़ कर भाग जाएगा… कहेगा कि कहां फंस गया था, एनजीओ वाला कमवा ही ठीक था 🙂

संघियों-मुसंघियों से यह नकली क्रांतिकारी तो कतई नहीं लड़ पावेगा जिसकी खुद की कोई विचारधारा नहीं है… इसमें पहले ही कई टन हवा हम लोगों ने भर रखा था / या यूं कहिए कि वह खुदे भरवा रहा था… इस दबाव को रिलीज करने में जुटा हुआ है… सू सू फू फू करके धीरे धीरे अब तक वह काफी हवा निकाल चुका है.

केजरी को अपने असली औकात में आने दीजिए.. देख रहे हैं कि कुछ लोग फिर उसे महान, योद्धा, क्रांतिकारी, जनता का आदमी, मोदी को मात देने की क्षमता रखने वाला, मध्यमवर्ग का हीरो आदि इत्यादि बताकर फिर से फटाफट हवा भरने पर उतारू हैं. पक्का कह रहा हूं, फटाक से फट जाएगा भाई, आपको अंदाजा भी नहीं लगेगा कि इतना जल्दी कैसे फट गया… 🙂

जाने दीजिए, रहम करिए. हवा एक बार पूरा निकल जाने दीजिए ताकि पहले तो वह खुद ही काफी आजाद सहज महसूस कर पाए और फिर हम लोग भी थोड़े विकल्पहीन होने के बाद रीयल विकल्प तलाशने को तत्पर हो सकेंगे.

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हमारे बड़े भाई Sheetal P Singh जी ‘आप’ के कट्टर समर्थक हैं. उन्होंने एक पैग के बाद इसलिए हम जैसों को गरियाया है कि हम लोग क्यों केजरीवाल के विरोधी हो गए हैं… साथ ही उन्होंने पूछा है कि हम लोगों का कोई जमीर है या नहीं… तो शीतल साहब को अभी ही उनकी पोस्ट के नीचे अदना सा जवाब दे आया हूं, जिसे यहां भी साया कर रहा हूं…

शीतल पी सिंह जी, आखिर किस बात पर इतना प्रशस्ति गान गा रहे हैं. कहीं कोई पार्टी में पद वद का आफर वाफर!! वैसे मेरा सवाल है कि केजरीवाल ने क्या देखकर कपिल मिश्रा को इतना बड़ा मंत्रालय दे दिया था.. उससे बहुत काबिल तो शीतल पी सिंह जी आप थे… जब चूतियों को आगे बढ़ाइएगा तो वही चूतिये गांड़ मार कर निकल जाएंगे… केजरीवाल के मामले में यही हो रहा है.. शीतल पी सिंह जी की आम आदमी पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता और जो निष्ठावान है वह बाकियों को गरियाता है कि तुम लोग क्यों निष्ठावान नहीं हो… पर सवाल वही है साथी कि केजरी ने जो बोया है वह काटेगा कौन… आप जैसे जेनुइन लोग उसको डिफेंड करते-करते अपना बीपी और कोलेस्ट्राल दोनों जरूर बढ़ा लेंगे. 😛

और हां, जमीर वाला नियम इंसानों ने बनाया है. प्रकृति का नियम यह कतई नहीं है. जमीर के चक्कर में बेवकूफ अपनी लाइफ बरबाद करते हैं. नेचर का नियम है अपारचुनिज्म यानि अवसरवाद. जो बदले मौसम के हिसाब से बदलता है, वही नेचर में लंबे समय तक सरवाइव करता है. कुछ भेड़िये कुत्ते बन गए, ऐसे अवसरवादी निकले. देखिए, कुत्तों की जमात अच्छी खासी फल फूल रही है और आदमियों के बेडरूम में बडे़ आराम से प्यार दुलार पाकर सो रही है. और, बेचारे भेड़िए इन दिनों अपनी जान बचाने के लिए जंगल खोजते फिर रहे हैं. अवसरवाद कोई गलत नहीं साथी. वैसे मनुष्यों में जमीर ठाकुर साहब लोग भारी मात्रा में रखते हैं, और इसी कारण काफी कष्ट भी भोगते रहते हैं.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

शीतल पी. सिंह जी और मदन तिवारी की वो ओरीजनल पोस्ट्स नीचे है जिन पर यशवंत ने उपरोक्त कमेंट्स किए हैं…

Madan Tiwary केजरीवाल मध्यवर्ग के युवाओं का सपना है. बदलाव का सपना. आप लाख दोष दो. अन्य किसी भी नेता और दल से विश्वसनीय है केजरीवाल. लोग उसके साथ खड़े हैं. अभी हम वैसे काल से गुजर रहे हैं जहां सबसे बड़ी चुनौती शोषक गुजराती सिंडिकेट है. चरित्रहनन भाजपा और मोदी की पुरानी चाल है. राहुल का करते हैं. वामपंथियो का करते हैं. गांधी, नेहरू, इंदिरा किसी को बख्शा है इन संघियों ने? मैं केजरीवाल के साथ हूँ. चिराग रोशन रहेगा चाहे जितना बड़ा हो तूफ़ान. देखिएगा सर, हम भी यहीं रहेंगे, आप भी यही रहेंगे। कोई आंदोलन मरता नहीं है।

Sheetal P Singh : चियर्स… १: केजरीवाल ने मुकेश अंबानी पर मुक़दमा दर्ज करने का आदेश दिया (सारी एजेंसियाँ दबाव के कारण इसे दर्ज करने से मना कर चुकी थीं )। २ : उसने मोदी जी के एक युवा महिला के स्नूपिंग मामले के टेप को विधानसभा के पटल पर रिकार्ड करवा दिया जिन्हे लेकर एक आई ए एस अफ़सर सारे मीडिया हाउस सारे क़ानूनी सरकारी दफ़्तरों /एजेंसियों और सुप्रीम कोर्ट तक से बरसों दौड़कर ख़ाली हाथ लौट चुका था । ३ : उसने बिशन सिंह बेदी कीर्ति आजाद सुरिंदर खन्ना जैसे मशहूर खिलाड़ियों द्वारा दशकों से डी डी सी ए / अरुण जेटली के भ्रष्टाचार पर उठाई जा रही आवाज़ को अपना स्वर दिया क्योंकि दिल्ली का किसी क़िस्म का मीडिया इस पर एक शब्द छापने की हिम्मत नहीं कर सका था न कोई कोर्ट कुछ सुनने को तैयार होती थी । ४ : उसने दिल्ली में अनिल अंबानी की बिजली कंपनियों से सरकारी बकाये के आठ हज़ार करोड़ की वसूली शुरू करा दी । बिजली के दाम बढ़ाने की कोशिशें फेल कर दीं और आडिट बिठा दिया ।

समझ में आता है कि मुकेश और अनिल अंबानी , मोदी जी और अरुण जेटली जी उसकी खाल खींचना चाहें! अपने कुत्तों (मीडिया ) को उसको नोच डालने के लिये छोड़ दें , उसे मुक़दमों और कचहरियों में उलझा कर बेबस कर दें। उस पर तरह तरह की जाँच बिठा दें। उसके मंत्री विधायक पार्षद ख़रीद कर उसी के कपड़े फड़वा दें! उसकी पार्टी में कामा फ़ुल स्टाप की कमी निकाल कर भंग करा दें।

पर तुम किस बात का बदला उससे ले रहे हो ? तुम जो (हर क़िस्म के मध्यवर्गीय) नौकरीपेशा कारोबारी दलाल प्रापर्टी डीलर पत्रकार छोटे मोटे ब्यापारी या बाप का माल चाँपते ठलुओ… तुम केजरीवाल से क्यूँ ख़फ़ा हो सूतिये? तुम्हारी कौन सी भैंस खोल ली उसने? तुम ग़रीबों की बिजली पानी सब्सिडी से ख़फ़ा हो? तुम अस्पताल में दवा और हर क़िस्म की जाँच मुफ़त हो जाने से ख़फ़ा हो? सरकारी स्कूलों में बुनियादी बदलाव से? शिक्षा का बजट २५% होने से? चार सौ करोड का फ़्लाइओवर साढ़े तीन सौ करोड में बनने से कि आड इवेन से? तुम्हारा क्या बिगाड़ा ग़रीब ने? तुम साले अंबानी के …….चट्ट , तुम इस आदमी को उस गवैय्ये से बदलने के लिये टीवी देखकर जागरण पढ़कर दौड़ पड़े (जिसके मालिक भी अब अंबानी जी ही हैं , )जो कल समाजवादी था आज भगवा है और कल पप्पू आ जाय तो तिरंगा लपेट कंगरेसी हुआ मिलेगा! तुमरा कोई ज़मीर है बे? हमरा तो है.. दूसरे पैग के पानी सोडे के बीच पाँच सौ वर्ड ठोंक दिये.

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केजरीवाल जैसों की नियति है नष्ट हो जाना!

Yashwant Singh : केजरीवाल जैसों की नियति है नष्ट हो जाना. एक अच्छे खासे आंदोलन की माकानाकासाका करने के बाद यह आदमी अब खुद और अपनी पार्टी की वाट लगाने लगा है. भाजपा को क्यों कोस रहे हैं साहिब. सियासत में पार्टियां ऐसे ही दूसरे दलों पर निशाना साधा करती हैं. सवाल ये है कि आज आपके बचाव में कोई खड़ा क्यों नजर नहीं आ रहा. हम जैसे प्रचंड समर्थक तो सरकार बनने के कुछ माह बाद ही बदले रंग ढंग देखकर अलग हो लिए थे.

कुछ दिन बाद आम आदमी पार्टी में संजय सिंह, मनीष सिसोदिया और केजरीवाल ही रह जाएंगे. आशुतोष तो डूबता जहाज देख कितना भी गहरा पानी क्यों न हो, कूद जाएगा और हल्ला मचा कर किनारे पहुंच जाएगा. किसी चैनल का सलाहकार बन जाएगा. लेकिन उन लाखों करोड़ों कार्यकर्ताओं का क्या, जिन्होंने तन मन धन से साथ दिया और एक सपने को जिया. अब भी वक्त है आम आदमी पार्टी के इमानदार समर्थकों, इस कुंठित प्राणी केजरी से नाता तोड़ लो और अपना जीवन जियो. केजरी जैसा मनोरोगी न मिलेगा. ये भी अंत में, पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद फिर से अपने एनजीओ को चलाएगा और हमेशा की तरह सिसोदिया इसके अधीन होकर एनजीओ में विदेशी फंडिंग के लिए जोरशोर से लग जाएगा. इति श्री केजरीवाल कथाक्रम: 🙂

Ajay Prakash : मैं देख रहा हूं मेरे बहुत सारे साथी पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और कुछ वामपंथी केजरीवाल को बचा रहे हैं। उन सबसे मेरा एक छोटा सवाल ये है कि आप किस केजरीवाल को बचा रहे हैं? एक ईमानदार और नई राजनीति के वाहक केजरीवाल को या सत्ता मिलने के बाद के केजरीवाल को जो तानाशाह, तीकड़मी और आप के नेतृत्व पर कुंडलीमार के मार के बैठा है। अगर आप पहले वाले को बचा रहे हैं तो मैं भी आपके साथ हूं पर ध्यान रहे कि वह आंदोलनकारियों, समर्थक बुद्धिजीवियों, संघर्ष में शामिल साझीदारों को खदेड़ने और हाशिए पर डालने ​की प्रक्रिया में मर चुका है।

Chandra Prakash Pandey : केजरीवाल तो धूर्तता की पराकाष्ठा हैं सिसोदिया जी। उल-जुलूल आरोप क्या होता है, इसके एक्सपर्ट केजरीवाल जी से पूछ लेते। आज सबूत मांगने वाले ‘हरिशचंद्रावतार’ के अघोषित प्रवक्ता कथित पत्रकारो…कोई एक उदाहरण तो बता दो अपने भगवान का, जब उसने कीचड़ उछालने से पहले सबूत दिखाया हो। दरअसल कपिल मिश्रा भी उसी यूनिवर्सिटी से ईमानदारी और बे-ईमानी के सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं जिससे आपके भगवान जारी करते रहे हैं। फिर भी आज केजरीवाल से न जाने क्यों सहानुभूति हो रही है। मिश्रा जी, मंत्री पद जाते ही या उसकी सुगबुगाहट मिलते ही आपको केजरीवाल भ्रष्ट लगने लगे। अगर आपको पता था कि केजरीवाल ने रिश्वत ली तो उस समय आवाज़ क्यों नहीं निकली? जहां जाना हो, जिस पार्टी में जाना हो…जाइये न…लेकिन चरित्रहनन के ड्रामा की क्या ज़रूरत थी। कांग्रेस का तो नहीं पता, लेकिन BJP तो आपको हाथो हाथ ले ही लेती। वहां जाकर हर कोई पवित्तर जो हो जाता है। क्यों तिवारी जी, आप तो इन्हें मोटा भाई से भी मिलवा देते न। केजरीवाल के बारे में मेरी धारणा है, धारणा क्या विश्वास है कि यह शख्स कुछ भी कर सकता है लेकिन रिश्वत तो नहीं ही लेगा। मिश्रा जी, अब काम हो गया, उधर जाइये…देखिये न मोटा भाई सब कुछ पवित्तर करने वाला जादुई तरल पदार्थ लेकर आपको अपनी पार्टी का गमछा पहनाने के लिए मरे जा रहे हैं।

Abhishek Srivastava : [आम आदमी पार्टी के संकट पर एक सुविचारित टिप्‍पणी] हमारा समूचा ऐतिहासिक अनुभव एक कहानी की शक्‍ल में होता है। कहानी चलती जाती है, पात्र बदलते जाते हैं। नए पात्रों और घटनाओं को हम कहानी में फिट कर के उसके अर्थ निकालते जाते हैं। हमारी यही सामान्‍य आदत है। छह साल हो गए अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन को खड़ा हुए, लेकिन अब भी उस घटना और उसके बाद उपजे नए आख्‍यान को यह व्‍यवस्‍था अपने भीतर फिट नहीं कर पाई है। एक मामूली-सी और सबसे नई राजनीतिक पार्टी का एक अधबने राज्‍य में प्रतीकात्‍मक शासन है, उसके बावजूद व्‍यवस्‍था उसका सामूहिक आखेट पहले के मुकाबले कहीं ज्‍यादा तेज़ी से कर रही है। पार्टी भीतर से भी टूट रही है। कुछ न होते हुए एक बवासीर जैसा बन गया है जो रह-रह कर रिसता है। ये हो क्‍या रहा है?

यह यथास्थिति और उस ‘नई’ घटना के बीच का टकराव है जो छह साल पुरानी हो चुकी है। वह घटना दरअसल ऐतिहासिक बन गई है। इसीलिए रिजॉल्‍व नहीं हो रही। घटनाएं ऐतिहासिक ऐसे ही बनती हैं। हमारा पक्ष जो भी हो, हमें न्‍यूनतम इतना मानना होगा कि बीते चार दशक में आम आदमी पार्टी का उभार एक असामान्‍य घटना है। तभी हम इतिहास की कहानी में अपने को भी फिट कर पाएंगे। कपिल मिश्रा उस अनरिजॉल्‍व्‍ड यानी असमाधित टकराव में एक मोहरा हैं। ऐसे और मोहरे अभी आएंगे। ऐसे मोहरों का क्‍या किया जाए?

टीएस इलियट ने Notes Towards a Definition of Culture में लिखा था कि ”कभी-कभार ऐसे मौके आते हैं जब आपको विधर्म या अधर्म में से एक को चुनना होता है, जब धर्म को जिंदा रखने के लिए उसकी लाश का पवित्र अंग-भंग करना होता है।” मेरी समझदारी फिलहाल यह बन रही है कि आम आदमी पार्टी का यह अंग-भंग ”पवित्र” मान लिया जाना चाहिए और ऐतिहासिक रूप से खुद को सही रखने के लिए अरविंद केजरीवाल (व्‍यक्ति नहीं, परिघटना) के साथ अंत तक चुपचाप खड़ा रहना चाहिए। मनोविज्ञान में नैतिकता की एक बुनियादी प्रस्‍थापना दी गई है कि ”अपनी वासना से समझौता मत करो”। केजरीवाल करप्‍ट हैं या नहीं, इस पर बहस छोड़ दें। उनकी वासना को देखिए। यह वासना ही यथास्थितिवादी आख्‍यान का काउंटर रचती है। अपने यहां शास्‍त्रों में एक शब्‍द है आपद्धर्म। फिलहाल उसे समझिए।

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह, पत्रकार अजय प्रकाश, चंद्र प्रकाश पांडेय और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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ये वही कपिल मिश्रा है जो केजरी के इशारे पर शांति भूषण और प्रशांत भूषण को भरी सभा में मारने दौड़ा था

देश की जनता को ईमानदारी और नए लोकतंत्र का झुनझुना थमाकर अरविंद केजरीवाल बनने तो सिकंदर चले थे, पर औकात इतनी हो पाई कि वह अपने ही पाले हुए संपोलों को बस में रख सकें। उन्हीं संपोलों में से एक हैं कपिल मिश्रा, जिनको अरविंद ने अपना दूध पिलाकर किंग कोबरा बनाया था। किंग कोबरा अब फुंफकार रहा है और अरविंद हैं कि उनको जादू—मंतर का कोई सम्मोहनी मंत्र सूझ नहीं रहा! दिल्ली से भूपेंदर चौधरी की रिपोर्ट…

सम्मोहनी मंत्र के अभाव में पिछले तीन दिनों से अरविंद केजरीवाल सदमे में हैं। हालांकि उनको सदमे में होना नहीं चाहिए, क्योंकि केजरीवाल और आरोपों—प्रत्यारोपों का रिश्ता कोई नया नहीं है। बल्कि उनकी छवि है कि वह रोज सुबह उठते ही दो—चार आरोप किसी न किसी नेता—पार्टी, व्यवसायी, पुलिस पर लगा दिया करते हैं, फिर फ्रेश होने जाते हैं। उनके नजदीकी लोग कहते हैं, फ्रेश होने में आरोप उनके लिए वही काम करता है जैसे आम जनों के लिए सिगरेट, चाय, बीड़ी, खैनी या पानी।

पर सच यही है कि अरविंद केजरीवाल सदमे में हैं। उन पर तानाशाह, झूठा, मक्कार, कुंडलीमार, राजनीतिक काइयांपन का रणनीतिकार और यूज एंड थ्रो वाली पॉलिटिकल स्टाइल का महारथी जैसे आरोप तो लगे थे, लेकिन अभी तक अरविंद केजरीवाल की ‘एमएसपी’ पर ऐसी चोट किसी ने नहीं की थी कि केजरीवाल कहीं मुंह दिखाने लायक न रह जाएं।

वह पिछले तीन दिनों से सिर्फ जवाब खोज रहे हैं कि वह अपने ही सरकार में मंत्री रहे ‘कपिल भाई’ के आरोपों का मीडिया के सामने जवाब देंगे? कैसे बताएंगे कि मेरा सबसे प्रिय मंत्री कपिल  मुझ पर 2 करोड़ रुपए लेने का आरोप लगा रहा है, वह सच नहीं है। वह भी कपिल के आंखों देखी को कैसे झुठलाएंगे, वह भी दूसरे प्रिय मंत्री सत्येंद्र जैन के सामने की बात कह रहा है और सबसे बड़ी बात रिश्तेदार की जमीन डील के मामले में 2 करोड़ कमीशन लिए जाने का आरोप?

जानकार बता रहे हैं कि केजरीवाल अभी भी कोशिश में हैं कि किसी तरह मामला शांत हो और मीडिया में हीरो बने कपिल मिश्रा को हाशिए पर डाला जा सके। इसीलिए दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया 25 सेकेंड में प्रेस कांफ्रेंस करके कट लेते हैं? कपिल मिश्रा से केजरीवाल नहीं उलझना चाहते क्योंकि वह उनके गहरे राज के साथी हैं? कई गुनाहों में केजरीवाल ने कपिल का इस्तेमाल किया है? बहुत कुछ अनौपचारिक और औपचारिक कपिल केजरीवाल बारे में जानते हैं जो एक पाला हुआ संपोला ही जान सकता है। 

ये वही कपिल मिश्रा हैं जो अरविंद केजरीवाल के इशारे पर आम आदमी पार्टी के सबसे बुजुर्ग संस्थापक शांति भूषण और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को भरी सभा में मारने के लिए दौड़ा लिए थे। समय का चक्र भी कितना बलवान होता है। कब किस तरफ घूम जाए किसी को नहीं पता चलता। शायद कभी कपिल मिश्रा ने भी ये नहीं सोचा होगा कि जो खाई उन्होंने प्रशांत भूषण और शांति भूषण जैसे वरिष्ठों के लिए खोदी थी एक दिन वो खुद उसमें गिरेंगे।

यह बात साल 2015 की है। आम आदमी पार्टी दिल्ली में 67 एमएलए के साथ प्रचंड बहुमत के दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई थी। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव और वकील प्रशांत भूषण की अरविंद केजरीवाल को सलाह थी कि वे संयोजक पद छोड़कर बतौर मुख्यमंत्री दिल्ली पर फोकस करें। मगर अरविंद केजरीवाल को उनकी यह बात खटकने लगी थी। कुछ दिन बाद करनाल बाई पास के पास बने आप के एमएलए के रिसोर्ट में पार्टी की नेशनल कौंसिल की मीटिंग रखी गई। योगेंद्र यादव और प्रशांत को निकालने की साज़िश रची जा चुकी थी। जैसे ही मीटिंग शुरू हुई तो प्रशांत ओर शांति भूषण ने कुछ बोलने की कोशिश की।

तभी केजरीवाल की तय स्क्रीप्ट के अनुसार कपिल मिश्रा भूषण बाप—बेटे को चुप रहने और बाहर निकल जाने को लेकर शोर मचाने लगे। शोर कई लोग मचा रहे थे पर कपिल सबसे आगे थे।  इस पर नेशनल कौंसिल के कुछ मेंबर ने प्रशांत से सहमति जताते हुए उनके समर्थन में बोलने की कोशिश की तो कपिल मिश्रा और एक अन्य एमएलए दोनों बाप और बेटे को मीटिंग हॉल से बाहर करने के लिए उनके पीछे मारने के लिए दौड़ पड़े।

हालांकि लोगों ने उन्हें शांति बनाए रखने की अपील की, जिसमें मनीष सबसे प्रमुख थे। लेकिन एक बात साफ थी कि वो बस दिखावा था। पीछे से कपिल को केजरीवाल का पूरा समर्थन था। 88 साल के बुजुर्ग शांति भूषण बहुत ही लाचार दिख रहे थे। उनकी आंखों में जैसे लाचारी साफ देखी जा सकती थी। नेशनल कौंसिल के कुछ सदस्य इस घटना से इतने आहत थे कि उन्हें खुद अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था। इतने बुजुर्ग आदमी को धक्के मार के बाहर निकला जा रहा था और उसकी अगुआई कपिल मिश्रा कर रहे थे। कपिल मिश्रा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उन्हें भी इस पार्टी से ऐसे ही धक्के मार के मंत्री पद से निकाल दिया जायेगा।

साभार- जनज्वार डॉट कॉम

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एक था केजरीवाल… एक थी आम आदमी पार्टी…

Sheetal P Singh : आम आदमी पार्टी…  वे चौराहे पर हैं और उनकी याददाश्त जा चुकी है। चौराहे पर कोई साइनबोर्ड नहीं है न किसी क़िस्म का मील का पत्थर! भारतीय मध्यम वर्ग के २०११-२०१७ के दौरान जगमगाये और बुझ रहे दियों के मानिंद दिवास्वप्न हैं। उनकी समस्यायें अनंत हैं पर उनमें संभावनायें भी कम नहीं पर निश्चित ही वे एक ऐसी बारात हैं जिनमें कोई बूढ़ा नहीं जो बिना साइनबोर्ड के चौराहे पर फँस जाने पर रास्ता सुझा सके। उन्होंने ऐतिहासिक काम हाथ में लिये पर उनके सारे काम अधूरे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य में उनके आउट आफ बाक्स फ़ैसलों से वामपंथी तक एकबारगी चकरा गये पर उनके पास फालोअप न था और ब्यूरोक्रेसी वे पहले ही मोदी के हाथ LG को हार चुके थे।

वे किसी से भी पंगा ले लेते हैं बड़े दुस्साहसी हैं। बड़े अंबानी पर FIR कर दी और छोटे की बिजली कंपनी के पसीने छुड़ा दिये। हम जैसे सारी दुनिया में फैले उनके हजारों शुभचिंतक किंकरतव्यविमूढ़ हैं क्योंकि उनसे संवाद का कोई रास्ता उपलब्ध नहीं है। उन्होंने ऐसा तंत्र बना लिया है जिसमें जनतंत्र के अलावा सबकुछ पहुँच गया है और अब तो वे ख़ुद कबूल रहे हैं कि “षड्यंत्र” तक हो रहा है। कंपनियों और राजनैतिक दलों में फ़र्क़ होता है, होना चाहिये, शायद यह सबक उन तक नहीं पहुँचा। वे करिश्माई हैं ऐसा सोचने के बहुत से कारण हैं पर इधर काफ़ी दिनों से उनसे कोई करिश्मा न हुआ। हमदर्द हूँ तो बीते कई दिनों से कई लोग मुझसे भी तमाम सवाल कर रहे थे। मैं उनके अन्दरूनी फ़ैसलों का privy नहीं हूँ, जो लिखा वह मेरा नितांत निजी आकलन है! फिर भी फिलवक्त वे जैसे भी हैं बड़े ज़रूरी हैं क्योंकि चारों तरफ़ कहीं कुछ नहीं है!

Asrar Khan : कुछ ही दिनों में ढहती हुई इमारत आम आदमी पार्टी के सरदार केजरीवाल को अभी कुमार विश्वास की जरूरत है… क्योंकि कुमार विश्वास बहुत अच्छा गाते हैं और बहुत ही अच्छी भाषा शैली में भाषण भी देते हैं… अच्छे मास लीडर की तरह राहगीरों को भी अपनी सभा में खींच लेते हैं.. लेकिन जिस दिन केजरीवाल को कोई इनसे भी बड़ा गवैय्या मिल जाएगा उस दिन इनकी भी धुनाई बाउंसरों से कराई जाएगी… और तब ‘फूट डालो राज करो’ फार्मूले के सबसे आधुनिक खलीफा योगेन्द्र भी इनके आगे घास नहीं डालेंगे…

Nitin Thakur : लोग किसी को जितनी जल्दी कंधे पर चढ़ाते हैं उतनी ही जल्दी उतार फेंकते हैं। अरविंद केजरीवाल के साथ ठीक वही हो रहा है। ये बात सब जानते हैं कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, सो एक सामान्य मुख्यमंत्री जितनी ताकत दिल्ली के मुख्यमंत्री को नहीं मिलती। ये भी अधिकांश को पता होगा कि खुद शीला दीक्षित सीएम थीं तो दिल्ली पुलिस की हीलाहवाली से परेशान होकर सोनिया गांधी से शिकायत करने जाती रहती थीं। ये बात बीजेपी के समर्थक मेरे परिचित भी मानते हैं कि केजरीवाल की छवि में डेंट लगाने के लिए AAP के विधायकों को हर चिंदी मामले में जेल की हवा खिलाई जा रही है, जो अभूतपूर्व है। ये सब पता होकर भी दिल्ली के लोगों का केजरीवाल से मोहभंग होने लगा है। वहीं बीजेपी ने अपनी साइबर सेना को केजरीवाल की छवि पहले ‘भगौड़ा’ और फिर’ ‘बहानेबाज़’ की बनाने का नया टास्क असाइन किया है। प्रिंट और वेब मीडिया में एक खास रुझानवाला तबका भी अरविंद के खास एंगल वाले फोटो ही खबर में लगाता दिख जाएगा। इन तस्वीरों में कहीं अरविंद आक्रामक से दिखेंगे तो कहीं खांसते या उबासी लेते।

ये वही मीडिया है जिन्हें पीएमओ से प्रधानमंत्री की छंटी हुई तस्वीर लगाने को मिलती है ताकि वो हमेशा स्मार्ट और चुस्त-दुरुस्त नज़र आएं। नाम छोटा करके ‘कजरी’ या ‘केजरी’ बोलना-लिखना सुविधा का कम, अपमान करने की नीयत का मामला ज़्यादा लगता है। कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ही जानती हैं कि जनता के धैर्य की एक सीमा होती है। 49 दिन की केजरीवाल सरकार गिरने के बाद बीजेपी ने लोगों को दो बातें समझाने की पूरी कोशिश की थी। नंबर एक तो ये कि इनके बस का स्थायी सरकार देना नहीं है। नंबर दो ये कि AAP मौकापरस्त है क्योंकि जिस कांग्रेस के खिलाफ वो चुनाव लड़ी, बाद में उसी के बाहरी समर्थन से सरकार बना ली। बीजेपी ने ये कभी नहीं बताया कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में AAP को कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने की चुनौती उन्होंने ही दी थी। वो तो मोदी लहर में भी दिल्ली ने बीजेपी पर भरोसा जताया नहीं और केजरीवाल टीम के आक्रामक प्रचार ने अपना मैसेज ठीक से पहुंचा दिया। अब फिर से बीजेपी वही खेल खेलने में लगी है। अमित शाह ने परसों कह ही दिया कि एमसीडी के बाद अब उनकी नज़र दिल्ली की सरकार पर है। ऐसे में कोई शक नहीं कि केजरीवाल की परीक्षा और कड़ी होने जा रही है। खुद वो भी पार्टी को जैसे चला रहे हैं उसे काबिले तारीफ नहीं कहा जा सकता पर फिक्र उस जनता की ज़्यादा हो रही है जो कांग्रेस और बीजेपी के थके हुए विकल्पों के बाद नए लोगों पर भरोसा कर रही थी। ऐसा ना हो कि पुराने घाघ अपनी चालों में कामयाब हो जाएं और लोगों को बरगलाकर फिर सत्ता पर काबिज़ हो जाएँ।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, असरार खान और नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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इन 10 कारणों से MCD चुनाव हारेंगे केजरीवाल

एक कहावत है अति भक्ति, चोरस्य लक्षणम्। यानी बहुत विनम्र इंसान, घातक
होता है। अरविंद केजरीवाल इस कहावत के लिए बिल्कुल सटीक उदाहरण बन गए
हैं। कैसे ? जनता को ऐसा लगता है कि उन्होंने जो कहा, वह किया नहीं।
मसलन, बेहद लाचार व शरीफ बन कर बार बार खांसते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार
और नेताओं की मनमानी से अजिज आ चुकी दिल्ली की जनता को कहा कि हम लाल
बत्ती वाली गाड़ी नहीं लेंगे। सरकारी मकानों में नहीं रहेंगे।
सुरक्षाकर्मियों का घेरा नहीं रखेंगे। जनता का पैसा बर्बाद नहीं करेंगे।
लाेकपाल लाएंगे। सरकार के कामकाज में पारदर्शिता लाएंगे। शीला दीक्षित
काे जेल पहुंचवाएंगे। आैर क्या क्या गिनवाएं..आप खुद ही गिन लीजिए।
दिल्लीवाले उनके झांसे में आ गए।

केजरीवाल ने किया क्या? सीएम बनते ही घोड़ा, गाड़ी, बंगला सब ले लिया।
बच्चों को पढ़ने विदेश भेज दिया। न तो लोकपाल लाए और न ही किसी नेता
को जेल भिजवा पाए। जनता दरबार लगाना बंद कर दिया। लोगों से सीधे संवाद
के सभी रास्ते बंद। अपने विधायको का वेतन बढ़ाया व उन्हें मंत्रियों वाली
सुख सुविधाएं देने के लिए संसदीय सचिव के पद सृजित किए ताकि सबको
दूध-मलाई का इंतजाम होता रहे। उनके मंत्रियों ने क्या किया। मारपीट करते
रहे। रिश्वत लेते, ब्लू फिल्म बनाने के चक्कर में पड़ने से लेकर जाली
डिग्री तक होने के चक्कर में जेल गए। लाल बत्ती वाली गडियां ली। बढिया
भवन, मकान आवंटित करवाए। अपने घरों में दर्जनों एसी लगवाए। बिना राज्यपाल
की अनुमति के विदेश यात्राएं की। केंद्र सरकार से टकराव कर दो साल गुजार
दिए और दिल्ली 10 साल पीछे चली गई।

ऐसे में 23 अप्रैल को होने जा रहे निगम चुनाव में क्या केजरीवाल जीत
पाएंगे? जवाब ना है। 10 कारण हैं जो केजरीवाल का एक्सपोज करने के लिए
प्रर्याप्त हैं। 1.एंटी इन्कंबैंसी। दिल्ली में पिछले दो साल का कार्यकाल
ही आप के खिलाफ चला गया। नतीजतन, रजौरी गार्डन में आम आदमी पार्टी का
उम्मीदवार न सिर्फ हारा है, बल्कि उसकी जमानत तक जब्त हो गई। 2.
बिजली, पानी, सड़क, झुग्गी आदि की राजनीति के बाद सत्ता में आते ही
केजरीवाल ने हर बात के लिए उप राज्यपाल से लेकर पीएम मोदी को व्यक्तिगत
रूप से निशाना बनाना लोगों को पसंद नहीं आया। 3. ईवीएम और इलेक्शन
कमीशन पर उंगली उठाना। पंजाब की आधी और गोवा की पूरी हार के बाद आम आदमी
पार्टी की इस बौखलाहट का लोगों के बीच नकारात्मक असर पड़ा। 4. घोटालों
में फंसना। दिल्ली में सत्ता में आने के तुरंत बाद ही आप के मंत्रियों से
लेकर नेताओं तक पर गंभीर आरोप लगे और उनमें से कई जेल भी गए। 5.शुंगलू
कमेटी की रिपोर्ट से किरकिरी। रिपोर्ट में कहा गया है कि आप ने पिछले दो
साल में सिर्फ मनमानी की है। किसी भी मामले में उप राज्यपाल की सह‌मति
नहीं ‌ली और किसी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। 6. दिल्ली से
बाहर अपने प्रचार के विज्ञापन पर 97 करोड़ खर्च कर देना। इसे दिल्ली के
विकास पर खर्च करना चाहिए था। 7. अन्य नेताओं की तरह ही सारी सुख
सुविधाएं ले लेना। 8.साफ सुथरे नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता
दिखाना। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे साफ छवि के
नेताओं को केजरीवाल ने निकाल दिया, जिससे पार्टी की नकारात्मक छ‌वि बनी।
9. जनलोकपाल का मसला पेडिंग में डाल देना। 10. मीडिया पर अघोषित
सेंसरशिप। जिस मीडिया ने केजरीवाल को बनाया उसे ही न सिर्फ लात मार देना
बल्कि डराना घमकाना।

संदीप ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली
sandyy.thakur32@gmail.com

संदीप ठाकुर का लिखा ये भी पढ़ें…

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सुभाष चंद्रा ने केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा ठोंका, कोर्ट ने नोटिस भेजा

Sheetal P Singh : सुभाष चन्द्रा ‘जी’ टेलिविज़न के विभिन्न अवतारों के मालिक हैं। इसके अलावा इनके तरह तरह के बिज़नेस हैं! पता चला कि उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र हरियाणा और कुछ अन्य जगहों पर इनकी कंपनियाँ बड़ी सड़कों के निर्माण का काम भी करती हैं जो आजकल की मंदी के दौर में दुधारू गाय है! वे ख़बरों के जरिये ब्लैकमेल के एक आरोपी भी हैं पर देश के उन समर्थ लोगों में हैं जिन्हे क़ानून पकड़ने से पहले परिभाषा बदल लिया करता है!

कहावत है कि पैसा मेहनत / ईमान / नैतिकता से नहीं कमाया जाता! सुभाष जी के पास बहुत पैसा है! फ़िलहाल केजरीवाल ने इन्हें वह कह दिया था जो मैं इस पोस्ट में नहीं कह रहा हूँ! आज उस अदालत ने जो इनको ब्लैकमेल के मामले में सीखचों के पीछे न ठेल पाई , इनकी मानहानि करने के आरोप में केजरीवाल को नोटिस कर दिया है। केजरीवाल हमारी आपकी तरफ़ से बहुत से ऐसे लोगों की मानहानि करते रहते हैं जिनको हम भी गरियाना चाहते हैं पर बचते हैं, जेल तक जा चुके हैं, फिर जा सकते हैं, डरते नहीं, ज़िद्दी हैं…. वे केजरीवाल जो हैं!

वरिष्ठ पत्रकार और ‘आप’ नेता शीतल पी. सिंह की एफबी वॉल से.

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दिल्ली में ‘आप’ सरकार को न कुचला गया तो बीस वर्षों तक भाजपा यहां सत्ता में न आ पाएगी!

Om Thanvi : दिल्ली में आप सरकार के दो वर्षों के कामकाज पर हिंदुस्तान टाइम्स में छपा वृहद सर्वे बताता है कि लोग मानते हैं राजधानी में भ्रष्टाचार घटा है और शिक्षा, चिकित्सा, जल-आपूर्ति और बिजली-प्रबंध के क्षेत्रों में बेहतर काम हुआ है। और, दिल्ली सरकार की यह छवि दो वर्षों तक नजीब जंग की अजीब हरकतों के बावजूद बनी है, जिन्होंने केंद्र सरकार की गोद में बैठकर निर्वाचित शासन के काम में भरसक रोड़े अपनाए।

आप सरकार की सबसे बड़ी सफलता मैं यह मानता हूँ कि उसने यह भरोसा अर्जित किया है कि देश की राजनीति में विकल्प सम्भव हैं। भ्रष्टाचार, वीआइपी ‘संस्कृति’ की ग़लाज़त, वंशवाद, लफ़्फ़ाज़ी आदि को अपेक्षया सादगी, साफ़गोई और काम से पलटा जा सकता है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का शिक्षा के क्षेत्र में काम इसका श्रेष्ठ उदाहरण होगा।

अकारण नहीं है कि पार्टी दिल्ली से बाहर भी पाँव पसार रही है। मुझे एक दफ़ा एक टीवी बहस के बाद अनौपचारिक बातचीत में भाजपा के एक नेता ने कहा था कि दिल्ली में आप पार्टी को हमने (ग़ैर-वाजिब कोशिशों से) न कुचला तो ये लोग हमें आगे बीस वर्ष और यहाँ सत्ता में नहीं आने देंगे।

मेरा ख़याल है भाजपा की इस कुटिल नीति ने आप को सहानुभूति ही दिलवाई है। बाक़ी उनका काम बोलता है। तीन साल अभी उनके हाथ में हैं। अगर पंजाब में आप पार्टी की सरकार बनी तो दिल्ली में केंद्र का दमन कम होगा और, नतीजतन, यहाँ और बेहतर काम की उम्मीद बांधी जा सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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केजरीवाल महोदय को ये एक श्रेय तो जरूर जाता है….

Rajiv Nayan Bahuguna : अरविन्द केजरीवाल को एक श्रेय तो जाता है कि उसने धुर विरोधी कांग्रेस और भाजपा को कम से कम एक मुद्दे पर एकजुट कर दिया। एक दूसरे से फुर्सत पाते ही वे दोनों केजरीवाल पर टूट पड़ते हैं। क्यों? उदाहरण से समझाता हूं।

आज से 20 साल पहले मैं फूलों की घाटी को जाता था। रस्ते में विकट पगडंडी पर धूर्त लोकल ढाबे वाले उस समय भी 20 रूपये में चाय का कल्चवाणी बेचते थे। किसी निरीह यात्री ने विरोध किया, तो आपसी प्रतिद्वंदिता भूल गर्म चिमटे और मुछ्याले लेकर उस पर टूट पड़ते थे। एक अन्य स्थानीय युवक ने विकल्प दिया। ताज़ा चाय 5 रूपये में देना शुरू की।

मैं पँहुचा तो सभी ढाबे वाले समवेत हो मेरे पास आकर बोले- यह छोकरा सस्ते के चक्कर में गन्दे पानी तथा नकली चीनी वाली घटिया चाय बेचता है। कभी दुर्घटना हो जायेगी। आप पत्रकार हो, इसके विरोध में लिखो।

मैंने प्रति प्रश्न किया- जब यहां आस पास सब जगह स्वच्छ जल के निर्झर बह रहे हैं, तो यह गन्दा पानी लेने क्या 18 किलोमीटर दूर हाइवे पर जाता होगा? क्योंकि उससे पहले यहां गन्दा पानी कहीँ उपलब्ध ही नहीं है। और, तुम सब मिल कर उससे नकली चीनी की एक मूठ छीन लाओ, मैं देखना चाहता हूँ।

इस पर सब मुझ पर कुपित हो गए और बोले, तू फ़र्ज़ी पत्रकार है।

बस केजरीवाल से सबको यही समस्या है। उसने स्वच्छ, पारदर्शी, वैकल्पिक राजनीति का मार्ग प्रशस्त कर दिया, तो अब तोड़ नहीं सूझ रहा। जैसे गांधी की राजनीति का तोड़ न सूझा, तो उसके विरोधी उसकी बकरी को लेकर ही बहस छेड़े रहते थे। वैसे ही केजरीवाल के मफलर और उसकी खांसी को लेकर मार मचाए रहते हैं, क्योंकि शेष क्या कहेंगे, उसने जो कहा, वह किया। अब तू सुधर जा, या कोई और धंधा देख ले। दिल्ली पंजाब के पश्चात यह संक्रमण और फैलेगा। सुधरो, या सिधारो।

वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

ये वीडियो भी देख सकते हैं :

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नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल : इन दो नेताओं का घमंड तो देखो…

Sheel Shukla : ये घमंडी! अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि अभी नरेंद्र मोदी इतने शिक्षित नहीं है कि देश के अर्थ शास्त्र को समझ सके। अरविन्द केजरीवाल के ऐसा बोलते समय एक बू आ रही थी कि मैं तो IRS रहा हूँ और मेरी किताबी शिक्षा की कोई तुलना नरेंद्र मोदी की शिक्षा से नहीं है। यह कोई राष्ट्रहित या नोटबंदी के खिलाफ दिया गया बयान नहीं था बल्कि ये अरविन्द केजरीवाल का दम्भ था, घमंड था।

इसी घमंड का शिकार तो बुरी तरह से नरेंद्र मोदी भी है, अभी हाल के बयान सुनिये तो आप को खुद ही पता चल जायेगा की कितना घमंड भरा है नरेंद्र मोदी में, 8 नवम्बर 2016 नोटबंदी की घोषणा वाली तारीख, जिस तरह अपनी हथेलियों को आपस में पीटते हुए बोल रहे थे ऐसा लग रहा था मानो कोई देश का प्रधानमंत्री नहीं बल्कि कोई भगवन बोल रहा हो। नरेंद्र मोदी का कहना कि कांग्रेस की औकात चवन्नी की थी तो उन्होंने चवन्नी बंद की और मैंने अपनी औक़ात के हिसाब से हजार के नोट बंद किये, पहले लोग मनी मनी करते थे अब मोदी मोदी कर रहे है, कितना बेतुका दम्भ था ये।

नरेंद्र मोदी तो अपने घमंड में इस स्तर तक उतर गए कि अपने आप को जमीन से उठा हुआ नेता कहने वाले ने डेल्ही के चुनाव को नसीब वाला और बदनसीब के बीच की लड़ाई बता दिया. जिसमे नसीबवाले नरेंद्र मोदी थे और बदनसीब अरविन्द केजरीवाल। क्या होगा देश का जहा ये घमंडी देश और प्रदेश की बागडोर संभाल रहे है।

पत्रकार और उद्यमी शील शुक्ला की एफबी वॉल से.

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चेहरा चमकाने के लिए लाइक्स पाने का चक्कर : केजरीवाल जनता के लाखों रुपये रोजाना देते हैं गूगल और फेसबुक को!

प्रशांत भूषण ने खोली पोल…. दिल्ली सरकार ने टॉक टू एके नामक जो प्रोग्राम कराया, उसके लिए सोशल मीडिया पर पूरे 1.58 करोड़ रुपये लुटाए. ये पैसे आम आदमी पार्टी के नहीं बल्कि जनता के थे. केजरीवाल सोशल मीडिया पर लाइक्स खरीदने के लिए हर दिन 10-10 लाख रुपये गूगल और फेसबुक आदि को दिए. इसी तरह केजरीवाल ने ताज पैलेस होटल से 12 हजार रुपये प्रति थाली के हिसाब से सैकड़ों थाली खरीद कर अपने नेताओं कार्यकर्ताओं को दिल्ली सरकार के दो साल पूरे होने पर पार्टी दी थी. यहां भी जो पैसा खर्च हुआ वह जनता का था, आम आदमी पार्टी का नहीं.

जानकारी के मुताबिक टॉक टू एके फेसबुक पेज को आठ जुलाई से स्पांसर्ड किया गया. छह लाख रुपये प्रतिदिन की दर से फेसबुक को भुगतान हुआ. यूट्यूब पर 14 जुलाई से 12 लाख रुपये प्रतिदिन का विज्ञापन चला जिसके जरिए 20 लाख लाइक्स खरीदे गए. गूगल डिस्प्ले एड नेटवर्क को 40 लाख लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए 14 जुलाई से 10 लाख प्रतिदिन के हिसाब से पैसा दिया गया. आम आदमी पार्टी के संस्थापक रहे वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट कर जनता के पैसे को इस तरह से उड़ाए जाने को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन बताया है. उन्होंने कहा कि खुद की प्रशंसा करने के लिए दिल्ली सरकार की ओर से टॉक टू एके प्रोग्राम करने में 1.58 करोड़ रुपये खर्च करने का क्या मतलब है?

ये है प्रशांत भूषण का ट्वीट…

Prashant Bhushan ‏@pbhushan1 

1.58Cr of our money was spent by Delhi govt to advertise the self praise social media programme ‘Talk to AK’! Vulgar& Contempt of SC orders! AAP came to power on USP of transparency, accountability, honesty, RTI, Lokpal. All thrown into dustbin in the naked pursuit of power.

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गुजरात में ‘आप’ की लहर, सूरत की सफल रैली से भाजपा नेताओं को आए पसीने

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह सूरत में हैं. वहां से उन्होंने जो हालात बयान किया उससे तो यही लगता है कि आम आदमी पार्टी की अंदरखाने गुजरात में लहर है. भारतीय जनता पार्टी के कुशासन, भ्रष्टाचार और दमन से सिहरे हुए गुजरात के लोग अब केजरीवाल के शरण में जा रहे हैं. सूरत रैली में उमड़ी भीड़ ने काफी कुछ स्पष्ट कर दिया है. शीतल कहते हैं- ”इस भीड़ का असर मौक़े पर मौजूद लोगों से सैकडों गुना ज्यादा उस अवाम पर होगा जो डराया हुआ है और दूर से बैठकर इसकी कामयाबी की दुआएँ पढ़ रहा है”.

इस बीच, खबर है कि सूरत की आम आदमी पार्टी की सफल रैली के बाद भाजपा नेताओं के माथे पर पसीने की बूंदें छलकने लगी हैं. भाजपा के दिग्गज नेताओं ने इस रैली को सफल न होने देने को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था. जगह जगह प्रायोजित विरोध प्रदर्शन कराए गए. ‘आप’ गुजरात के नेताओं को थानों-हवालातों-जेलों में ठूंसा गया, अनाप शनाप मामलों में फंसाकर. यहां तक कि दिल्ली पुलिस ने जाकर आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रदेश के नेता को एक मामले में आज ही गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद भी सूरत की रैली का सफल होना कई बड़े बदलावों की सूचक है. लोग मान रहे हैं कि गुजरात में भाजपा के खिलाफ लहर है जिसका स्वाभाविक फायदा आम आदमी पार्टी को मिलने जा रहा है क्योंकि लोग मानने लगे हैं कि मोदी से मुकाबला सिर्फ केजरीवाल ही कर सकते हैं.

उधर, हार्दिक पटेल ने केजरीवाल को पत्र लिखकर गुजरात में पूरा समर्थन देने का वादा किया है. अरविंद केजरीवाल ने भी हार्दिक पटेल के आरक्षण आंदोलन के प्रति सहमति जताई है. इससे माना जा रहा है कि ताकतवर पटेल समुदाय गुजरात चुनाव में केजरीवाल की पार्टी के पक्ष में खुलकर मतदान करेगा ताकि दमन और हिंसा का बदला भाजपा से लिया जा सके.

पेश है सूरत रैली के बारे में वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह की मौके से टुकड़े टुकड़े में भेजी गई रिपोर्ट के अंश…

डेटलाइन सूरत. शरद गुप्ता ने सुबह उठते ही चाय के कप के साथ टाइम्स आफ इंडिया (सूरत एडीशन) की यह ख़बर सामने कर दी। इसमें एक चित्र और खबर है जो गुजरात में वायरल हो रहा है। इसमें गुजरात के मुख्यमंत्री रूपानी गुजरात के सबसे बड़े अवैध शराब ब्यापारी रमेश माइकल के साथ खुद मुख्यमंत्री निवास पर बुके और गिफ़्ट लेते हुए दिख रहे हैं। यह घटना इसी १३ अक्टूबर की है। रमेश पर गुजरात दमन और महाराष्ट्र में दर्जनों मामले दर्ज हैं। वे इस क्षेत्र के वही हैं जो उत्तर भारत के “डी पी यादव/ मरहूम पोंटी चड्ढा” रहे हैं!

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डेटलाइन सूरत. पुरबिये बड़ी संख्या में हैं सूरत में । मघई पत्ता गुजराती कट सुपारी और इलैची के साथ बताये सरजीकल से डाऊन हुआ है केजरीवाल ! यानि बीजेपी के होर्डिंग्स नब्ज़ पर हैं । कुछ यू पी के माहौल की तरंग भी है सूरत में ! पनवाड़ी के पास मुलायम सिंह मायावती के खिलाफ बहुत कुछ था । करछना (इलाहाबाद) मूल के हैं । शास्त्री परिवार का सम्मान है केजरीवाल की ईमानदारी पर शक! पर पता सबको है “केजरीवाल की रैली है आज”!

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डेटलाइन सूरत. महाराणा प्रताप पार्क, काकोदरा. जयसुखभाई (काठियावाड़) हीरा पालिश करते हैं। रविवार है तो दोस्तों के साथ पार्क में हैं। ९५ टका पाटीदार भाजप के खिलाफ है यहाँ! क्यों? लोगों पे ज़ुल्म किया, मारा जेल भेजा। अबकी फ़रक पड़ेगा। उनकी काठियावाड़ी और हमारी हिंदी के मिक्स में ये निकला! इस इलाक़े में पाटीदार ही पाटीदार हैं चारों तरफ़। इसी के पड़ोस में “योगी चौक” है जहाँ केजरीवाल आज बोलेंगे। कई बरस पहले मोदी जी यहाँ बोले थे। अमित शाह की हिम्मत न पड़ी तो कई किलोमीटर दूर सभा रक्खी पर वहाँ भी बवाल हो ही गया। बवाल की उम्मीद तो आज भी है पर जयसुखभाई कहते हैं कि बवाल भाजप कार्यकर्ता ही करेंगे आम पाटीदार नहीं! पाटीदार माने उततर भारत के जाट, भरतपुर के गूजर, रायबरेली के राजपूत या औरंगाबाद के मराठे के समकक्ष या बढ़कर।

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डेटलाइन सूरत. बवाल होगा! केजरीवाल की रैली में आज बवाल होगा। ब्राह्मणों के एक वर्ग के संगठन “ब्रह्मपडकार”के सदस्य अहमदाबाद से यहाँ पहुँच चुके हैं। वे आप की एक स्थानीय महिला नेत्री (दलित समाज की) के किसी बयान से कुपित हैं जो ब्राह्मण समाज के खिलाफ है! गुजरात पाटीदार हितरक्षक समिति ने सूरत भर में केजरीवाल के खिलाफ बड़ी बड़ी होर्डिंग और पोस्टर लगाकर विरोध का ऐलान कर रक्खा है जिसे बीजेपी स्पानसर्ड माना जा रहा है। बीजेपी गुजरात और ख़ासकर सूरत में सांगठनिक तौर पर बहुत मज़बूत है । यहाँ बारह के बारह विधायक उसके हैं सांसद उसका है सत्तर प्रतिशत पार्षद उसके हैं । मज़बूत युवा महिला छात्र व्यापारी किसान मज़दूर संगठन उसके पास हैं। केजरीवाल के पास सिर्फ एक चीज़ है “दुस्साहस”! देखिये क्या होता है? क्या क्या होता है?

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डेटलाइन सूरत. दिल्ली पुलिस सूरत पहुँची। गुजरात के प्रभारी आप के विधायक गुलाब सिंह यादव को गिरफतार किया। चार बजे से आज केजरीवाल की सूरत रैली शुरू होनी है!

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डेटलाइन सूरत. सूरत की रैली में शिरकत करने आए एक शख्स ने बातचीत में कहा- ”ऐसा लगता है गुजरात ही बनेगा मोदी के लिए आखिरी हार का रणक्षेत्र? आज सूरत में केजरीवाल की जो सफल रैली हुई है, उसने कई मिथ तोड़ दिए. जैसे ये कि आप सत्ता, पुलिस, दमन, उत्पीड़न, भय, आतंक, झूठ आदि के बल पर किसी को रोक लेंगे… केजरीवाल से लाख असहमति हो लेकिन जमीन पर यही शख्स मोदी से दो-दो हाथ करता दिख रहा है.”

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केजरीवाल जी, नई राजनीति करने की बात करते हुए सत्ता में आए थे इसलिए आप तो मिसाल कायम कीजिए

Amitabh Thakur : क्या दिल्ली के पूर्व परिवहन मंत्री गोपाल राय ‘सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूरी तरह भ्रष्ट करती है” के एक और उदहारण हैं या अभी अंतिम टिप्पणी देना जल्दीबाज़ी होगी? इस मामले में सच्चाई का सामने आना नितांत आवश्यक है, अतः मैं एसीबी दिल्ली से जाँच के बाद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग करता हूँ.

Mukesh Kumar : केजरीवाल जी माना कि कई राज्यों में संसदीय सचिव बनाए गए हैं और वे पार्टियाँ भी ये कर चुकी हैं और कर रही हैं जिन्होंने आप पर बंदूकें तानी हुई हैं। मगर दूसरे के पाप गिनाकर आप अपने पाप नहीं धो सकते। ये सच तो मानना ही होगा कि संसदीय सचिव आपने अपने विधायकों को खुश करने के लिए बनाए थे और अड़ंगा न लगा होता तो उन्हें सुविधाएं भी दी ही जातीं। अगर आप विपक्ष में होते तो निश्चय ही कई आधारों पर इसका विरोध भी करते। अब चूँकि आप फँस गए हैं इसलिए तमाम तरह के कुतर्क दे रहे हैं। केंद्र सरकार की मंशा से तो सब वाकिफ़ हैं। उसका आचरण इतना जगज़ाहिर है कि उस पर कोई टिप्पणी करना ही बेकार है। मगर आप तो नई राजनीति करने की बात करते हुए सत्ता में आए थे, आप तो मिसाल कायम कीजिए। लीजिए इक्कीस विधायकों के इस्तीफ़े और कराइए फिर से चुनाव। इसमें तो आपकी सरकार गिरने का जोखिम भी नहीं है।

Nadim S. Akhter : अन्ना हजारे के तथाकथित आंदोलन के बाद सत्ता पाए अरविंद केजरीवाल ने जितना आम आदमी के साथ धोखा-छल-फरेब किया है और जिस कदर आधुनिक भारत में लोकतंत्र की रूह का गला घोंटा है, उसने तो जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के बाद केंन्द्र की सत्ता पर काबिज तत्कालीन नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है. सच में अरविंद केजरीवाल नाम के इस आदमी ने मक्कारी और बेशर्मी में पुराने घाघ नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है.

“ना बंगला लूंगा और ना गाड़ी लूंगा जी, मुझे चाहिए पूर्ण स्वराज और लोकपाल बिल जी ” जैसी बातें करने वाले अरविंद सत्ता पाने के बाद ऐसे गिरगिट की तरह बदले कि अब अपने विधायकों को -संसदीय सचिव- का पद और लाभ देने के लिए गालथेथरी और लोकलाज की सारी सीमाएं पार कर चुके हैं. भ्रष्टाचार से लड़ाई और राजनीति मे शुचिता की बात करने वाले इन लोगों की दिल्ली सरकार के कई मंत्री भ्रष्टाचार-फर्जीवाड़े में पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं.

अब ताजी बारी अरविंद के खासमखास परिवहन मंत्री गोपाल राय की है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने एक निजी बस कंपनी को नाजायज फायदा पहुंचाया और गोपाल राय ने खराब सेहत का हवाला देते हुए इस्तीफा परिवहन मंत्री पद से तो इस्तीफा दे दिया लेकिन बाकी के सारे मंत्रालय अब भी अपने पास रखे हुए हैं. सच पूछिए तो अरविंद केजरीवाल एंड कम्पनी ने जनता से बड़ी-बड़ी बातें करके उसे मूर्ख बनाया. उन्हें पता है कि आगे उनकी सरकार नहीं रहेगी, सो जितना माल कूटना है, कूट डालो. इसके बाद भी अगले चुनाव में कुछ सीटें मिल गईं तो बल्ले-बल्ले.

और हां, अरविंद का साथ देने आए मीडिया के एक पूर्व सम्पादक यानी गुप्ता जी की जाति का देश को कभी पता नहीं लगा, पत्रकार होने के बावजूद मुझे भी नहीं था और जानने की कोशिश भी किसी ने नहीं की होगी. लेकिन ये महोदय जैसे ही अरविंद केजरीवाल की पार्टी में गए तो दुनिया को पता चल गया कि इनका पूरा नाम -आशुतोष गुप्ता- है यानि जाति से ये बनिए हैं और अरविंद केजरीवाल भी जाति से बनिए हैं.

तो मितरों, पार्टी-पक्ष से दूर रहने की बात करने वाले इन तथाकथित आंदोलनकारी लोगों ने भारतीय राजनीति का स्तर और गिराया है और इनका सबसे बड़ा पाप है कि इन्होंने जनता के विश्वास के साथ धोखा किया है. वैसे इस पूरे अखाड़े में अरविंद के चाणक्य यानी अन्ना हजारे रालेगन सिद्धि में मौज ले रहे हैं. मीडिया भी उनसे कुछ नहीं पूछ रहा है. जेहन में सवाल उठ रहा है कि अपना मुंह बंद रखने के लिए अन्ना हजारे को कितना चढ़ावा मिला होगा?

याद है ना, पार्टी-पक्ष से दूर रहने की बात करने वाले अन्ना का पतन, जब उन्होंने ममता बनर्जी के लिए एक टीवी ऐड किया था—कहा सबने पर किया सिर्फ ममता ने— और फिर रामलीला मैदान में भीड़ ना जुटने पर अन्ना ने ममता को ऐसा धोखा दिया कि दीदी भी एक मिनट के लिए सोच में पड़ गई कि राजनीति वो जानती हैं या फिर ये अन्ना हजारे?

अमिताभ ठाकुर, मुकेश कुमार और नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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सम-विषम के खिलाफ ट्वीट करने वाले दैनिक जागरण के राजकिशोर की नौकरी अरविंद केजरीवाल के चलते गई?

फेसबुक पर सुगबुगाहट है कि अरविंद केजरीवाल की सम विषम योजना के खिलाफ दैनिक जागरण के नेशनल ब्यूरो चीफ राजकिशोर को ट्वीट करना महंगा पड़ा है और अरविंद केजरीवाल की जिद के कारण राजकिशोर को दैनिक जागरण प्रबंधन ने नौकरी से हटा दिया है. फेसबुक पर लोग अरविंद केजरीवाल को कोसने में लगे हैं लेकिन असल अपराधी तो दैनिक जागरण प्रबंधन है जो दिल्ली सरकार के विज्ञापन के लालच में राजकिशोर को बलि का बकरा बनाने को तैयार हो गया. दैनिक जागरण हमेशा ऐसा करता रहा है. पटना हो या लखनऊ हो या दिल्ली, वह सत्ता के आगे घुटने टेक कर अपने पत्रकारों की बलि देते हुए रेवेन्यू का रास्ता साफ करने की परंपरा कायम रखता है. नीचे एफबी के दो वो पोस्ट हैं जिससे पता चलता है कि राजकिशोर, दैनिक जागरण और केजरीवाल के बीच कुछ न कुछ तो हुआ है….

Shweta R Rashmi : अरविंद केजरीवाल, आशुतोष जी आप दोनों से मैं पूछना चाहती हूँ कि सम विषम योजना के खिलाफ एक ट्वीट दैनिक जागरण के एक पत्रकार को आखिर क्यों इतना भारी पड गया कि उनको नौकरी से हाथ धोना पड गया। क्या लोगों की परेशानियों और खुद के अनुभव जो इस तुगलकी योजना के कारण उन्हें उठानी पड़ी? तुगलकी इसलिए क्योंकि इस योजना को लागू करके आपने अपनी पीठ तो थपथपाकर वाहवाही तो खूब लूटी पर पब्लिक यातायात की व्यवस्था इतनी लचर हैं, कि पैसे वालों ने तो दूसरी गाडियां खरीद ली और भुगतान करना पडा आम नागरिक को जिनके हितैषी बनने का दावा आप करते हैं। पानी और बिजली के बिल माफ कर देने से सरकार नहीं चलती।

आप के विधायक कभी अपने क्षेत्रों का दौरा नहीं करते, डेंगू का सीजन शुरू हो चुका है पर साफ सफाई पर आपका कोई लेना देना नहीं है। पूछने पर कहते हैं कि अवैध कॉलोनियों के रखरखाव का जिम्मा उनका नहीं है पर बेशर्मी की पराकाष्ठा तो देखिए फिर भी वोट मांगने पहुंच जाते हैं। दिल्ली के अलग अलग हिस्सों में मेन हाल में गिरकर बच्चों की जाने जा रही है। पर आप लोगों की कान पर जू रेंगने तक को तैयार नहीं। जरनैल के जूते पर इतना प्यार उंडेल कर आपने विधायक बना दिया। वह भी अपना पूपूरा दम लगा कर खालिस्तान की मांग विदेशों में जा कर जोड शोर से करते हैं। उसी संस्थान के दूसरे पत्रकार की नौकरी ही आप के खास मंत्रियों ने खा ली। ये तानाशाही नहीं तो और क्या है। मेरे दुसरे साथियों से अनुरोध है कि इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद कर के एक आवाज बने। जागरण का चरित्र तो हम मजीठिया के मामले में देख ही चूके है। पर सरकार को इस पर जवाब जरूर देना चाहिए क्योंकि आप आम आदमी की बात करते हैं एक बेचारे आम रिपोर्टर के साथ जो भी किया क्या वो जायज है।

Rajeev Kumar : राजधानी दिल्ली में एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार को अति लोकतांत्रिक कहे जाने वाले दिल्ली के अति लोकप्रिय कथित तौर पर अति लोकतांत्रिक नेता के गुस्से का शिकार होना पड़ा। वरिष्ठ पत्रकार की गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने अपने निजी अकाउंट से सिर्फ अपनी तारीफ सुनने वाले उस नेता को लेकर ट्वीटर पर टिप्पणी की थी। बस। कोई गाली नहीं दी थी। लेकिन सत्ता तो सत्ता होती है। इसके आगे सभी नतमस्तक होते हैं। तभी तो मुझे भी पत्रकार का नाम और उस नेता का नाम सार्वजनिक तौर पर लिखने में डर लग रहा है। कहीं मेरी नौकरी भी नहीं चली जाए।

मीडिया से लेकर सत्ता के गलियारे तक के सभी वरिष्ठ नेताओं व पत्रकारों को इस बात की जानकारी है। लेकिन इस मसले को लेकर कभी टीवी शो पर चर्चा नहीं की गई। क्योंकि टीवी शो आयोजकों को भी यह डर है कि इस प्रकार के शो आयोजन के बाद कल से वह टीवी के चकाचौंध से दूर न हो जाएं। रोज लोकतंत्र की दुहाई देने वाली पत्रकार बिरादरी कितना लाचार, कितना बेबस होती है, इसका अंदाजा आम जनता को भले ही नहीं हो, नेताओं को जरूर हो गया है। ज्यादा नहीं लिखूंगा, किसी नेता को ये बातें बुरी लग जाए और क्या पता वह मेरे खिलाफ भी कार्रवाई की जिद कर बैठे।

श्वेता रश्मि और राजीव कुमार के फेसबुक वॉल से.

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राहत का सोमवार : odd-even फॉर्मूले ने तौबा करवा दी

Sarjana Sharama : इस बार सोमवार राहत का सोमवार होगा। ऑटो या टैक्सी खोजने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। दिल्ली को प्रदूषण मुक्त बनाने के श्री अरंविंद केजरीवाल के odd-even फॉर्मूले ने तौबा करवा दी। इतनी भीषण गरमी में लोग तपती धूप में 20-20 मिनट ऑटो का इंतज़ार करते रहे। रेडियो टैक्सी के अपने नखरे हैं। अभी इस रूट पर कोई टैक्सी नहीं मिल सकती। दो घंटे से पहले नहीं आ सकते आदि आदि।

अब कौन समझाए दिल्ली के मुख्यमंत्री को कि आधी दिल्ली को घरों पर नज़रबंद करके या कहें तो बंधक बना कर वो कौनसी समझदारी कर रहे हैं। पूरे परिवार को उन्होनें टुकड़ों में बांट दिया। पति पत्नी के साथ नहीं जा सकता। मां बेटे के साथ नहीं जा सकती। कोई बीमार है या अस्पताल जाना है तो खाओ धक्के। दो हजार रूपए का जुर्माना लगा कर तो उनका फार्मूला सफल होगा ही। और कोई इनसे पूछे कि इनके पास विज्ञापन के लिए इतना पैसा आया कहां से अखबारों में। रेडियो पर, टीवी में देख देख कर और सुन सुन कर कान पक गए। अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते रहे और लोग धूप में जलते रहे।

इस बीच तीन बड़े त्यौहार आए- श्री रामनवमी, श्री महावीर जयंती और श्री हनुमान जयंती। लोग मन मसोस कर अपने घरों में बैठे रहे। मंदिर भजन कीर्तन का आनंद नहीं ले पाए। छुट्टी होने के बावजूद परिवारों को घर पर बंधक बन कर रहना पड़ा। ये कहां का तुक है आप किसी की धार्मिक आजा़दी पर भी पहरे बिठा दो। हो सकता है केजरीवाल जी और उनका मंत्रिमंडल नास्तिक हो लेकिन सनातन धर्म और जैन धर्म को मानने वालों पर वो अपनी तुगलकी जिद कैसे थोप सकते हैं। महिलाओं में वो खासे अलोकप्रिय हो रहे हैं। अपने परिवार को दुखी देख कर सबसे ज्यादा तकलीफ महिलाओं को ही होती है। कईं लोगों ने बताया कि धूप में उनका BP बढ़ गया, लू लग गयी। जब पति और बच्चों को तकलीफ हो तो महिलाएं कतई बरदाशत नहीं कर पाती केजरीवाल जी कोई औऱ तरीका निकालिए दिल्ली वालों को जबरन बंधक ना बनाएं आप।

वरिष्ठ पत्रकार सर्जना शर्मा के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स यूं हैं…

Rashmi Kant Kanji : Sarjanaji I am very sad no word for such a stupidity of our Netas. Instead of working good for their fellow citizen putting ban on liquor in Bihar, Keral after seen Gujarat is failed model. Same no city can afford to have od/even if you don’t provide public transport unless they do both improve the existing roads and improve public transport and automatically thing will improve…

Sarjana Sharama : अजीब जबरदस्ती है दिल्ली सरकार की लोगों को बंधक बना कर घर पर बिठा दिया । मध्यम वर्ग कितना भी परेशान हो उन्हें क्या उनका वोट बैंक तो चांदी काटता है।

Namita Gandhi : I agree Sarjana Ji . Crores spent on ads could have been used for tree plantation to find permanent solution to pollution.

Aditya Sengar : Why don’t we start Odd Even in Politics Ek din Kejriwal CM ek din Kiran bedi wink emoticon

Sabina Kadam : Arvind Kejriwal found the odd even scheme launched by Arvind Kejriwal successful in a survey conducted by Arvind Kejriwal and responded to by Arvind Kejriwal. Arvind Kejriwal has thanked Arvind Kejriwal over the success of the scheme and has requested Arvind Kejriwal to make the scheme permanent. 🙂

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जूते तो केजरीवाल पर फेंके गए लेकिन पिट गए दर्जनभर से भी ज़्यादा न्यूज़ चैनल

Vineet Kumar : जूते तो केजरीवाल पर फेंके गए लेकिन पिट गए दर्जनभर से भी ज़्यादा न्यूज़ चैनल. एक भी चैनल के पास जूते फेंकनेवाले की फ्रंट से तस्वीर नहीं है. साभार, इंडियन एक्सप्रेस लिखकर तस्वीर इस्तेमाल करनी पड़ रही है. आप सोचिये, न्यूज़ चैनलों के पल-पल की खबर, सबसे तेज जैसे दावे कितने खोखले हैं. लाइव में भी प्रिंट से साभार कंटेंट इस्तेमाल करने की ज़रुरत पड़ जाए, न्यूज़ चैनल के लिए इससे ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है? अब लूप की दालमखनी इसी फ्रंट स्टिल के बूते बन रही है..

Mukesh Kumar : पहले उन्हें केजरीवाल के नाम से ही चिढ़ रहती थी। उनका ज़िक्र आते ही मुँह कसैला हो जाता था। उन्हें लगता था कि एक टुटपुंजिया उनके साहब को चुनौती देता रहता है। इसके बाद अब कन्हैया आ गया है। उसके नाम से भी वह उसी तरह चिढते हैं। उसी तरह गरियाते रहते हैं, खोज-खोजकर दोष गिनाते रहते हैं। लेकिन फिर भी दोनों सरपट आगे बढ़े चले जा रहे हैं। अब खिसियाया आदमी जूता नहीं फेंकेगा या फिंकवाएगा तो क्या करेगा? हाँ, कभी-कभी स्याही भी फेंक देता है-फॉर ए चेंज।

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर जब जब कोई जूता, थप्पड़ या स्याही का प्रहार होता है, तो कई ओर से करतल ध्वनि गूँज उठती है, मानो केजरीवाल ही देश की राजनीति के सबसे बड़े विलेन हों. दरअसल यह संकेत है कि देश की राजनीति किस तरह कलुषित हो चुकी है. ताम झाम से यथासंभव दूर रह, अपने वायदों की कसौटी पर खरा उतरने का प्रयास करता हुया एक राजपुरुष, किस तरह चौतरफा असह्य हो जाता है, इसका भी सबूत केजरीवाल हैं. उन्होंने राजनीति के गतानुगतिक प्रवाह के विरुद्ध तैरने का बीड़ा उठाया है, तो ये सारी आपदाएं उन्हें झेलनी ही हैं, लेकिन ध्यान रहे कि केजरीवाल पर उछलने वाला हर जूता लोक उन्मुख राजनीति की पवित्र शुरुआत पर उछल रहा है. केजरीवाल की परम्परा नष्ट हुयी, तो राजनीति में जूता, स्याही, पत्थर और डंडे की भाषा ही प्रमुख होगी.

मीडिया एक्टिविस्ट विनीत कुमार, मुकेश कुमार और राजीव नयन बहुगुणा के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल जी, आपभी मोदी की तरह जुमलेबाजी की सियासत कर रहे हो?

Vishwanath Chaturvedi : जुमले बाजों ने बिगाड़ा देश मिज़ाज़. बड़े मिया तो बड़े मिया छोटे मियां सुभानल्लाह. जुमलेबाज़ो ने बदरंग किया सियासी चेहरा. केजरीवाल की दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हरियाणा सरकार को समर्थन करते हुए दिल्ली की जनता का कर्ज उतार दिया. अब बारी थी पंजाब चुनाओं में लड़ रही पार्टी के लिए फर्ज पूरा करने की. सो केजरीवाल ने शाम होते-होते वकील को बलि का बकरा बनाते हुए यू टर्न लिया और कहा ये वकील तो कांग्रेसी था, इसे मैंने हटा दिया.

लेकिन कोर्ट में दिए गए बयान की वापसी आपके हाथ में नहीं है, वो तो कोर्ट की अनुमति बगैर वापिस हो नहीं सकता. सो, पंजाब की जनता को ठगने के लिए कोई नया जुमला तलाश लीजिये केजरीवाल जी. केजरीवाल जी, दिल्ली की जनता प्यासी है, आप को दिल्ली की जनता ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी है, आप पर दिल्ली की जनता के हितों की रक्षा का भार है. आप भी मोदी की तरह जुमलेबाजी की सियासत कर रहे हो? अब नए तरीके की राजनीति को जनता झेल रही है. इस तरह की यू टर्न सियासत तो जमे जमाये सूरमा भी नहीं कर पाते. आपने तो कमाल ही कर दिया. जुमलों में तो मोदी जी को भी आपने किलोमीटरों पीछे छोड़ दिया.

जाने-माने और बेबाक वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से.

विश्वनाथ चतुर्वेदी की बेबाक लेखनी को जानने समझने के लिए इसे भी पढ़ सकते हैं…

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दिल्ली विधानसभा के केबल टीवी और यूट्यूब चैनल के लिए कर्मचारियों की भर्ती शुरू

दिल्ली विधानसभा अब निजी केबल टीवी और यूट्यूब के जरिए अपनी कार्यवाही और दूसरे कार्यक्रमों के प्रसारण की योजना बना रही है. केजरीवाल सरकार ने केंद्र सरकार से अपने लिए अलग टीवी चैनल स्थापित करने से जुड़े प्रस्ताव पर केंद्र से जवाब ना मिलने के बाद यह फैसला किया है. दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष रामनिवास गोयल ने कहा कि सदन ने इसे लेकर सलाहकार रखने शुरू कर दिए हैं और दूसरे कर्मचारियों की भर्ती की जा रही है. गोयल ने कहा, ‘पिछले साल नवंबर में मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली को पत्र लिखकर लोक सभा टीवी और राज्य सभा टीवी की तर्ज पर दिल्ली विधानसभा का खुद का टीवी चैनल स्थापित करने के लिए उनके मंत्रालय की मंजूरी मांगी थी.’

गोयल ने कहा, ‘मैंने मंत्रालय को दोबारा याद भी दिलाया. चार महीने बाद भी मुझे अब तक अपने प्रस्ताव पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से मंजूरी नहीं मिली है. मैं पीछे नहीं हट सकता और हम विधानसभा की कार्यवाही, कार्यक्रमों के यूट्यूब चैनल और केबल टीवी के जरिए टेलीकास्ट करने की योजना बना रहे हैं.’ गोयल के मुताबिक केबल टीवी पर विधानसभा की कार्यवाही और कार्यक्रमों के टेलीकास्ट के लिए केबल ऑपरेटरों से संपर्क किया जाएगा. उन्होंने कहा, ‘हम दिल्ली के हर घर में इसे पहुंचाने में सक्षम होंगे.’ उन्होंने हालांकि कहा कि आगामी बजट सत्र की कार्यवाही का टेलीकास्ट नहीं किया जाएगा, लेकिन अगले सत्र में कार्यवाही का प्रसारण किया जाएगा.

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‘आप’ तो ऐसे न थे : केजरी वही सब टोटके कर रहे जो भ्रष्ट नेता करते रहे हैं

-मनोज कुमार-

एक साथ, एक रात में पूरी दुनिया बदल डालूंगा कि तर्ज पर दिल्ली में सरकार बनाने वाली आम आदमी पार्टी के हुक्मरान जनाब अरविंद केजरीवाल ने मुझे तीन दिनों से परेशान कर रखा है। आगे और कितना परेशान करेंगे, मुझे नहीं मालूम लेकिन हाल-फिलहाल मेरी बड़ी शिकायत है। सुबह अखबार के पन्ने पलटते ही दो और चार पन्नों का विज्ञापन नुमाया होता है। इन विज्ञापनों में केजरीवाल अपनी पीठ थपथपाते नजर आते हैं। केजरीवाल सरकार इन विज्ञापनों के जरिये ये साबित करने पर तुले हैं कि उनसे बेहतर कौन? ऐसा करते हुए केजरीवाल भूल जाते हैं कि दिल्ली के विकास को जानकर मध्यप्रदेश का कोई भला नहीं होने वाला है और न ही उनके इस ‘पीठ खुजाऊ अभियान’ से मध्यप्रदेश में कोई सुधार होगा। बार बार भोपाल और मध्यप्रदेश की बात इसलिए कर रहा हूं कि इससे मुझे इस बात की परेशानी हो रही है कि मेरे पढ़ने की सामग्री गायब कर दी जा रही है। केजरीवाल के इस ‘पीठ खुजाऊ अभियान’ में मेरी कोई रूचि नहीं है।

जहां तक मैं जानता हूं कि बड़े बड़े वायदों के साथ केजरीवाल की पार्टी ने सत्ता सम्हाली थी। वे परम्परागत राजनीति से अलग एक नई परम्परा डालने की बात कर रहे थे। उनके लिए आम आदमी (आम आदमी पार्टी नहीं) प्राथमिकता में है, जैसा कि वे अपने इस ‘पीठ खुजाऊ अभियान’ में बार बार बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने दिल्ली का कल्याण कर दिया। उनके इस कल्याण की गूंज टेलीविजन के पर्दे पर भी है और अखबार के पन्नों पर भी। ऐसे में मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब यह बताने की कृपा करेंगे कि अपने वायदे से हटकर उन राजनीतिक दलों की पांत में कैसे आकर खड़़े हो गए हैं? क्यों उन्हें वही टोटका करना पड़ रहा है जो घुटे राजनेता करते रहे हैं। यह सवाल और भी वाजिब इसलिए हो जाता है क्योंकि मुख्यमंत्री बनने से पहले मुख्यमंत्री केजरीवाल ‘साहब’ हुआ करते थे और एक ‘साहब’ के नाते उन्हें विधान का ज्ञान भी था। टेलीविजन पर ऑड-इवन को लेकर मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब ने विज्ञापन में पीठ दिखाकर बोलते हुए अदालत की खींची लक्ष्मणरेखा को पार नहीं किया था बल्कि इसका विकल्प ढूंढ़ लिया था। लेकिन अखबारी विज्ञापनों में अदालती लक्ष्मणरेखा कहीं टूटती नहीं है?

इन विज्ञापनों के बाद अब यह मान लेना चाहिए कि मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब अब वैसे नहीं रहे, जैसा होने का दावा करते थे। वे वैसे ही हैं जैसा कि वे आज दिख रहे हैं। परम्परागत भारतीय राजनीति का एक ऐसा चेहरा है जो अपनी कामयाबी का ढिंढ़ोरा पीटते हुए देशव्यापी पहुंच बनाना चाहता है। उन्हें पता है कि पिछली लोकसभा में उनके पत्ते नहीं चले थे इसलिए वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जमीन तैयार कर रहे हैं। आम आदमी इस बात को लेकर अपने अपने राज्य की सरकार की तुलना कर सकता है कि देखो, दिल्ली में कितना विकास हो गया और हम आज भी मुसीबत में हैं। यह तुलना करना बेमानी नहीं है क्योंकि आम आदमी को इस बात का पता नहीं होता है कि केजरीवाल का यह पीठ खुजाऊ अभियान पैसा देकर चालू किया गया अभियान है ना कि मीडिया ने इसे जांच-परख कर अखबार में छापा है।

बहरहाल, मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब से मीडिया प्रबंधन तो खुश हो रहा होगा। दिल्ली वालों के अच्छे दिन आए या ना आये लेकिन मीडिया प्रबंधन के दिन अच्छे आ गए हैं। मुख्यमंत्री केजरीवाल साहब के इस ‘पीठ खुजाऊ अभियान’ से मीडिया प्रबंधन को लाखों का फायदा जो हो गया है। एक सवाल मीडिया से भी है जो पेड न्यूज के खिलाफ तो आग उगलता है लेकिन ऐसे ‘पीठ खुजाऊ अभियान’ से उन्हें कोई परहेज नहीं। क्योंकि माल है तो ताल है वरना सब बेकार है। मेरा मानना है कि ‘पेडन्यूज’ और ‘इम्पेक्ट फीचर’ के मध्य एक बारीक सी रेखा होती है। ‘इम्पेक्ट फीचर’ में बिलिंग की सुविधा होती है होती है लेकिन पेडन्यूज में तो यह सुविधा भी नहीं है। विज्ञापनप्रदाता अपने हक में विज्ञापन का कटेंट तैयार कराता है। सच्चे-झूठे आंकड़े और तर्क देकर विज्ञापन को प्रभावशाली बनाता है। विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित करने वाला इन तथ्यों, तर्कों और आंकड़ों की जांच नहीं करता है क्योंकि इम्पेक्ट फीचर और पेडन्यूज नगद का मामला होता है।

मीडिया तो विज्ञापन हासिल करेगा क्योंकि अखबार छापने और टेलीविजन चलाने के लिए उसे धन चाहिए और धन देने वाले से उसे परहेज नहीं होगा। सवाल तो केजरीवाल साहब से है जो निष्पक्षता और गुड गवरनेंस की बात करते थे तो आज उन्हें क्या हुआ कि आज चार चार पन्नों में कामयाबी की कहानी देशभर को सुनाने के लिए बेताब है। हम तो यह भी मानने को तैयार हैं कि केजरीवाल साहब ने दिल्ली को चमन कर दिया है तो उनसे अनुरोध होगा कि ये लाखों और शायद इससे ज्यादा बांटने की जगह पर इस बजट का उपयोग दिल्ली के हक में करते तो और भी अच्छा संदेश जाता लेकिन पहले हम कहते थे कि ‘आप तो ऐसे ना थे’ लेकिन इस भारी भरकम विज्ञापन के बाद कहना पड़ेगा ‘आप तो ऐसे ही थे।’ 

लेखक मनोज कुमार भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Like a ponzi scheme, Kejriwal bubble will burst sooner or later

The Aam Admi Party (AAP) won a landslide victory in Delhi in 2015 because people were disgusted with the other parties and wanted a radical change. Its leader Arvind Kejriwal projected himself as an epitome of honesty, a modern Moses, a Superman who will lead Delhi into a land of milk and honey. But his popularity started to rapidly decline as people started seeing the reality. He has no solutions to the problems facing the people — massive poverty, unemployment, lack of healthcare and good education, etc.

Also people are disillusioned by his dictatorial mentality when he sacked the co-founders of AAP and surrounded himself with chamchas, allocated Rs 536 crore for his self-promoting ads and increased salaries for his MLAs. Seeing his popularity decline he has now resorted to headline-grabbing gimmicks like car-free day, going on a bicycle, lokpal (which many people called jokepal), and now the odd-even scheme.

Unfortunately most people of Delhi, as elsewhere, are gullible and emotional and dutifully follow any Sapnon ka Saudagar, the way at one time they followed Anna Hazare.

But this will not last long. Public opinion is fickle, like the Roman mob at Caesar’s funeral, which was earlier against Caesar, but changed its attitude after one short speech of Mark Antony. The Kejriwal bubble will sooner or later burst, like a Ponzi scheme. In the first few days of the odd-even scheme Delhiites were enthusiastically supporting it, but now they are following it out of fear of being challaned.

But how long can this last? The Delhi High Court has already voiced its concern about the enormous difficulties being faced by Delhiites due to the scheme. People have to go for work every day. For instance, a lawyer has to go to court every day as do doctors, other professionals, shopkeepers etc. And as regards the public transportation system, in London one has to walk for only five to ten minutes from any place to reach the nearest metro station, but in several places in Delhi one has to take a taxi to reach a metro station. And the metros are overcrowded.

As regards pollution in Delhi, it has not gone down, as several media reports indicate. In fact an IIT Kanpur report says that only 1% of the total air pollution is due to cars, the rest is due to two wheelers, dust, industrial pollution, burning of fodder by farmers in Haryana, etc.

So the scheme will be abandoned after two weeks (though no doubt after declaring it a grand success), as it will become dangerous to continue it any further due to public hostility and anger. Thereafter, Kejriwal will look for some other stunt or caper.

लेखक जस्टिस Markandey Katju जाने माने न्यायाधीश रहे हैं और अपनी बेबाक लेखनी के लिए चर्चित हैं.

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Kejriwal’s Modus Operandi

As I have said many times earlier, Arvind Kejriwal has no solution to the real problems facing the people—massive poverty, unemployment, malnourishment, price rise, lack of healthcare, etc. And yet he must be seen to be doing something to grab the headlines and restore his popularity ( which was rapidly sinking after the initial euphoria).

So the method he has adopted is this : he starts a scheme, which is really a stunt, and people of Delhi ( who are mostly a bunch of gullible, emotional fools ), will initially clap loudly and follow him, like the children following the Pied Piper of Hamelin. Examples are car free day, going on bicycle, lokpal ( which some call Jokepal ), etc. Later, when the shine and glimmer start wearing off, and people see through the realities and start facing the difficulties caused by the scheme, and opposition to it begins, he abandons it and starts a new scheme ( i.e. a new stunt ) and the same rigmarole and drama begins again.

To give the latest example, the Delhiites, who had initially supported the harebrained odd even scheme, thinking it to be the panacea for their problem of air pollution, are now realizing the immense hardships it is causing, with no significant drop in the air pollution. So opposition to the scheme was growing day by day.

Realizing this, our Sapnon ka Saudagar has abandoned the scheme and started a new headline grabbing stunt. He has announced the end of the management quota in admissions to private nursery schools. The people of Delhi will again clap, praise their hero and shout ‘ Sieg Heil ‘ for their Superman, just as Germans did in the 1930s. All this will of course be widely projected by our TRP driven media. But after some time the truth will dawn on them.  Private institutions run for profits, not for charity. So the private nurseries may follow the new rules for a short while, but obviously not for long.

Also, if a Minister, Judge, bureaucrat, police officer, income tax official, municipal official, etc asks for an admission, can the school manager decline ? If he does,he is likely to face a lot of harassment. So in no time the management will find out a way of subverting the scheme, and it will remain on paper only. Then Mr. Kejriwal will forget it and begin some other gimmick or caper. He will keep hopping from stunt to stunt, thinking that in this way the people can be deceived for ever.

जाने माने न्यायाधीश रहे जस्टिस Markandey Katju के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल और उनके सम-विषम की असलियत बता रहे हैं जस्टिस काटजू

The Truth about the Odd Even Scheme

By Justice Katju

AAP had won a landslide victory in the Delhi elections in Februaary, 2015, because people were disgusted with the other parties, and wanted a radical change. Kejriwal had projected himself as an epitome of honesty, a modern Moses, a Superman (as Modi had done earlier) who will lead Delhi into a land of milk and honey. Later, his popularity started to rapidly decline as people started seeing the reality. There is really nothing in the man, he has no solutions to the real problems facing the people— massive poverty, unemployment, malnourishment, lack of healthcare and good education, farmers suicides, etc.

Also people were disillusioned by his dictatorial mentality when he sacked unceremoniously the co-founders of AAP and surrounded himself with chamchas and yes men ( his Sancho Panzas), allocated Rs. 536 crores (21 times last years budget allocation) for his self promoting ads, increased salaries of MLAs manifold, etc. I received many fb messages from his erstwhile ardent supporters who said they were now totally disillusioned by AAP.

Seeing his popularity decline steeply he has now resorted to headline grabbing stunts and gimmicks ( projected by our TRP driven media ) like car free day, going on a bicycle, lokpal (which many people called jokepal), and now the odd even scheme. Unfortunately most people of Delhi, as elsewhere, are gullible, emotional people, and like children following the Pied Piper of Hamelin dutifully follow any Sapnon ka Saudagar, the way at one time they followed that buffoon Anna Hazare who used to shout ” Bharat Mata ki Jai, Inquilab Zindabad and Vande Mataram “: from Ram Lila ground, and people danced like monkeys at the tune of the madaari.

But this will not last long. Public opinion is fickle, like the Roman mob at Caesar’s funeral, which was earlier against Caesar, but changed its attitude after one short speech of Mark Antony (see Shakespeare’s ‘Julius Caesar’). The Kejriwal bubble will sooner or later burst, like a Ponzi scheme. In a few days time the same people who are cheering Kejriwal will start cursing him. In the first few days of the odd even scheme Delhiites were enthusiastically supporting it, but now they are following it out of fear of being challaaned.

But how long can this last? The Delhi High Court has already voiced its concern about the enormous difficulties being faced by Delhiites due to the scheme. People have to go for work every day. For instance, a lawyer has to go to Court every day, not just on odd or even days. Similarly, doctors, other professionals, office goers, shopkeepers, etc have to go to work daily. And as regards the public transportation system, let me tell you that in London one has to walk for only 5-10 minutes from any place to reach a metro station, but in Delhi in several places one has to take a taxi to reach a metro station. And the metros are over crowded.

As regards pollution in Delhi, it has not gone down, as reports from BBC, The Hindu newspaper, IIT, Kanpur, etc indicate. In fact the IIT report says that only 1% of the total air pollution is due to cars, the rest is due to two wheelers, dust, industrial pollution, burning of fodder by farmers in Haryana etc. So the scheme will be abandoned after 2 weeks (though no doubt after declaring it a grand success!), as it will become dangerous to continue it any further due to public hostility and anger. Thereafter Mr. Kejriwal will look for some other stunt or caper.

लेखक जस्टिस मार्कंडेय काटजू देश के जाने माने न्यायाधीश रहे हैं और अपनी बेबाक बयानी व बेबाक लेखनी के लिए जाने जाते हैं.

जस्टिस काटजू का लिखा इसे भी पढ़ें>

भाजपा और कांग्रेस दोनों अपराधी पार्टियां : जस्टिस काटजू

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उतर गया चोला… अमीरों का आदमी साबित हुआ केजरीवाल, समझा रहे हैं यशवंत सिंह

Yashwant Singh  : कई लोग कहते मिले कि दिल्ली सुधर गई, केजरीवाल का फार्मूला पास हो गया, दिल्ली वाले बिना चूं चपड़ किए हंसते खेलते नया नियम मान लिए, प्रदूषण घट गया, ट्रैफिक स्मूथ हो गया… ब्ला ब्ला ब्ला…

भइये, दिल्ली वाले बहुते चलाक होते हैं. उनके पास टैम नहीं है कि जा के जिंदाबाद मुर्दाबाद करें और माथा फोड़ें… उतने में उ दस बीस हजार रुपया कमा लेंगे.. अउर, जो दिल्ली में रहता है वह बहुते जुगाड़बाज भी होता है, दिमाग का तेज होता है, काम निकालने में मास्टर होता है.. सो सबने अपना अपना जोड़तोड़ निकाल कर एडजस्ट कर लिया होगा… खासकर उ वाला गरीब क्लास जो एक्के छोटकी या बड़की कार रखा है और ओही पर जिंदगी न्योछावर किए हुए था.. उ बेचारा त मन मार के जइसे तइसे काम पर गइबे किया होगा.. जइसे कि हम दिल्ली में इहां उहां मेट्रो से कूद रहे हैं, बस से चल रहे हैं… और इ सब करते हुए अच्छा भी फील हो रहा है.. लेकिन सब हमरी तरह सड़क छाप थोड़े न हैं… अधिकतर लोग अपने क्लास कैरेक्टर को सीने से लगाए दबाए बैठे रहते हैं… ऐसे में उनके चूतड़ के नीचे से कार का निकल जाना बहुत टीस दे रहा होगा… पर मरता क्या न करता.. पग्गल लोगों से कौन बहस लड़ाए… कौन खुद पर फाइन लगवाए…

केजरी का आदेश न मानकर दो हजार रुपया फाइन देने की औकात इस इकलौती कार वाले क्लास में नहीं होती.. सो, सबने चुपचाप मान लिया… पर याद रखिए… केजरी ने जो काम किया है अंतत: वह पूंजीपतियों के हित में गया है… गरीब तो वइसे ही मर रहा है.. महंगाई से मर रहा है, कम तनख्वाह के कारण मर रहा है, स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए पैसा न होने के कारण मर रहा है… प्रदूषण की मार उसे क्या मारेगी.. असल में प्रदूषण और ट्रैफिक जाम की मार उस क्लास को ज्यादा तकलीफ दे रही है जो कई कई बड़ी कार रक्खे है और महीने में लाखों रुपये कमाता है… उसे अपने और अपने बच्चों की ज्यादा फिकिर हो रही थी… अपनी बड़ी गाड़ी को दिल्ली के जाम में फंसा पाकर वह गरीबों की भीड़ को कोस रहा था… सो वह जोर शोर से प्रदूषण को लेकर हाय हाय कर रहा था और केजरी के चिरकुट किस्म के फार्मूल के सामने आते ही इसके पक्ष में फटाक से खडा हो गया है…

यही वह एलीट, अमीर, पूंजीपति क्लास है जो चाहता रहा है कि दिल्ली में रिक्शा वाले बाइक वाले आटो वाले न चलें, गरीब भिखारी न दिखें, ज्यादा भीड़ दूसरे प्रदेश से न आए, रैली धरना प्रदर्शन दिल्ली में न हुआ करे.. यह क्लास तो चाहेगा ही कि गाड़ियों पर किसी तरह बैन लगे ताकि ट्रैफिक सुधरी और धूल धुआं कम हो.. सो, गरीबों की गांड़ पर केजरिया ने चाबुक मार दिया… गरीब बेचारा अपनी कार रख जैसे तैसे पदयात्रा बस यात्रा मेट्रो यात्रा कर रहा है… लेकिन वो जो नफासत वाले अमीर साहब लोग हैं, वो अपने भारी भरकम गैराज से सम के दिन सम नंबर वाली कार और विषम के दिन विषम नंबर वाली कार निकाल लेंगे…उन्हें निकालने की भी क्या जरूरत है.. उनका ड्राइवर साला किस काम के लिए बना है… वह कैलेंडर के हिसाब से गाड़ी नंबर देख कार निकालेगा और धो पोंछ रेडी कर साब के बैठने का इंतजार करेगा…

दिल्ली में शांति से क्रांति हो जाया करती है… आपियों तिलचट्टों चोट्टो को लग रहा होगा कि सब बहुते बढिया से हो गया है लेकिन ध्यान रखना बेट्टुओं… अगर साल भर में पार्टी बनाकर सत्ता में हम जैसों के सपोर्ट से आ सकते हो तो चार साल बाद चुनाव में चड्ढी भी सटाक से खींच कर हम लोग उतार सकते हैं… ध्यान रखना केजरी बाबू, ये अमीर एलीट पूंजीपति सदा से कांग्रेस भाजपा का रहा है… वह तुम्हारा न होगा.. हां, तुम्हारे इस खेल के चक्कर में तुम अपनों को जरूर खो दोगे… वह भी चूतियापे के प्रदूषण नियंत्रण फार्मूले से… इतने बड़े देश की राजधानी है दिल्ली… वह अभी फैलेगी, बहुत ज्यादा फैलेगी… प्रदूषण रोकना हो तो विदेशी इंपोर्टेड बड़ी गाड़ियों पर पाबंदी लगाने की हिम्मत दिखाते तो तुमको जरूर सलाम करते लेकिन तुम ऐसा काहे करोगे… राजनीतिज्ञों की मंजिल अंतत: अमीरों के गोद में बैठना ही होता है, वह तुम्हें नसीब हो चुकी है, इसलिए तुम्हें अब आम आदमी से क्या मतलब… आम आदमी अब बस तुम्हारे पार्टी के नाम में ही पाया जाएगा.. तुम्हारे दिल दिमाग में कतई नहीं… 

खंजड़िया पगलेट बुजरो के…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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टीवी टुडे ग्रुप के वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा ने सम-विषम पर अरविंद केजरीवाल को दिखाया आइना, आप भी पढ़ें..

Sanjay Sinha : आदरणीय अरविंद केजरीवाल जी, नया साल मंगलमय हो। मैं संजय सिन्हा, दिल्ली का एक आम नागरिक, आज खुद को बहुत लाचार और त्रस्त महसूस कर रहा हूं। मैं पत्रकार हूं और रोज सुबह फेसबुक पर एक पोस्ट लिखना मेरा शौक है। मैं आम तौर पर रिश्तों की कहानियां लिखता हूं। मैं स्वभाव से खुश और अपनी ज़िंदगी से संतुष्ट व्यक्ति हूं। मैं दफ्तर में राजनीति की ख़बरें लिखता हूं, लेकिन कभी निज़ी ज़िंदगी में राजनीति की बातें नहीं करता।

मुझे राजनीति पसंद ही नहीं है। मैं आपको बताना चाहता हूं कि बहुत दिनों के बाद कल ऐसा हुआ है जब मैं सारी रात बिस्तर पर लेटा रहा और एक पल के लिए भी सो नहीं पाया। मैं सारी रात बहुत परेशान रहा। मेरी परेशानी की वज़ह आपका तुगलकी फरमान है। आपने पता नहीं कौन सी रिपोर्ट देख कर यह फैसला कर लिया कि अब दिल्ली में अलग-अलग दिन सम-विषम नंबर की गाड़ियां चलेंगी। आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं, आप जो चाहेंगे, कर लेंगे। पर मुझे लगता है कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था।

***

आज बहुत से लोगों की छुट्टी होगी, लेकिन मेरी नही है। आज मुझे दफ्तर जाना है, मेरी पत्नी को भी जाना है। हम दोनों प्राइवेट नौकरी में हैं। हम दोनों के दफ्तर अलग-अलग जगहों पर हैं। आम तौर पर मैं अपनी पत्नी को सुबह दफ्तर छोड़ता हुआ अपने ऑफिस चला जाता हूं। लेकिन आज हम ऐसा नहीं कर पाएंगे। आज हमें दो टैक्सियों में चलना पड़ेगा, क्योंकि मेरे पास सम नंबर की गाड़ी है। आज का दिन विषम है। मैं सारी रात सोचता रहा कि आज हम दफ्तर कैसे जाएंगे, घर वापस कैसे आएंगे?

***

मैं दिल्ली में जहां रहता हूं, वहां से मेट्रो स्टेशन कम से कम पांच किलोमीटर दूर है। जहां मैं काम करता हूं, वहां से भी मेट्रो तीन किलोमीटर की दूरी पर है। मेरी पत्नी का जहां दफ्तर है, वहां तो मेट्रो पहुंचाने की बात अभी काग़जों तक ही है। मैं जहां रहता हूं, वहां से बसों के चलने का कोई समय नहीं। सच कहूं तो मैं पिछले 25 साल से दिल्ली में हूं, लेकिन बस में नहीं चल पाया। बहुत साल पहले जिन दिनों रेड लाइन बस हुआ करती थी, मेरा एक दोस्त उन बसों की होड़ में कुचल कर मर गया था। हादसा मेरी आंखों के सामने हुआ था, तब से मैं बसों से बहुत डरता हूं। तब मैं जनसत्ता में काम करता था और मेरा दोस्त इंडियन एक्सप्रेस में था। मेरे दोस्त का नाम शेखर झा था और वो बिहार में लालू यादव के मुख्यमंत्री काल में तंग होकर दिल्ली चला आया था। पर यहां एक दिन लाल बसों की होड़ ने उसकी जान आईटीओ के पास ले ली थी।

उसके बाद एक दिन मैं अपनी पत्नी के साथ डीटीसी की बस में चढ़ने की कोशिश कर रहा था कि बस अचानक चल पड़ी और मैं गिर पड़ा। मेरे घुटने में बहुत चोट आई थी। उस दिन मैंने तय किया कि मैं अब कभी बस में नहीं चलूंगा। और हम पति-पत्नी ने बहुत मेहनत करके एक सेकेंड हैंड कार खरीदी। हमारे पास बहुत पैसे नहीं थे, लेकिन हमने अपने तमाम शौक खत्म कर दफ्तर जाने के लिए ये साधन चुना।

***

बाद में मेरा और मेरी पत्नी का दफ्तर बदल गया। पर हम एक कार से अपना काम चला रहे थे। फिर मेट्रो रेल शुरू हुई। मेरा दफ्तर उन दिनों करोलबाग के पास वीडियोकोन टावर में शिफ्ट हो गया। इत्तेफाक से वहां तक मेट्रो की सेवा शुरू हो गई थी। मेरा यकीन कीजिए मैंने बहुत बार कोशिश की कि मैं मेट्रो से दफ्तर जाऊं। ऐसे में मेरी पत्नी हमारे घर के पास वाले मेट्रो स्टेशन, जो पांच किलोमीटर दूर है, मुझे छोड़ देती और मैं मेट्रो से दफ्तर चला जाता। रात में जब मैं लौटता, तो वो मेट्रो स्टेशन पर मेरा इंतज़ार करती। पर एक दिन राजीव चौक पर किसी ने मेरा पर्स ही उड़ा दिया। मेरा लाइसेंस, मेरे सारे क्रेडिट कार्ड और ढेर सारी चीजें गायब हो गईं। मैंने पुलिस के बहुत चक्कर काटे। पर कुछ नहीं हुआ। फिर मैंने मेट्रो से दफ्तर जाना छोड़ दिया। हालांकि जब कभी मौका मिलता है, मैं मेट्रो में चल लेता हूं, पर आज मेरे दफ्तर जाने का स्कोप नज़र नहीं आ रहा।

***

मैंने कई बार ऑटो में चलने की भी कोशिश की है। लेकिन दिल्ली में ऑटो पर चलना जंग जीतने से कम बड़ा काम नहीं है। परसों ही मेरी पत्नी ने ऑटो वाले से पूछा कि भैया, अक्षर धाम मेट्रो स्टेशन चलोगे, तो उसने कहा कि हां, डेढ़ सौ रूपए लगेंगे। अब बताइए कि पांच किलोमीटर के लिए डेढ़ सौ रूपए कौन देगा? उसने उसे धमकाने की कोशिश की कि पुलिस में शिकायत कर दूंगी, तो ऑटो वाला अपना फोन निकाल कर उसे देने लगा कि लीजिए कर लीजिए। उसने उल्टा धमकाया कि दिल्ली में केजरीवाल की सरकार उनकी बदौलत बनी है। कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

***

आदरणीय केजरीवाल जी, आप हमारी मुश्किल को समझें। मैं मानता हूं कि दिल्ली में प्रदूषण बहुत बढ़ गया है। सुना है आप खुद आईआईटी में पढ़े हैं। सोचिए कि क्या सचमुच दिल्ली की सबसे बड़ी समस्या यही है? वैसे आप जानते हैं कि-

1. दिल्ली में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह राजस्थान से आने वाली हवाएं हैं। उसे आप रोक नहीं सकते।
2. दिल्ली के आसपास के राज्यों में किसान जो भूसा जलाते हैं, उससे भी प्रदूषण होता है। उसे रोकने पर किसानों का वोट कटने का ख़तरा है।
3. दिल्ली में जो पावर प्लांट है, उससे भी प्रदूषण होता है। इसे बंद करना फिलहाल नामुमकिन है।
4. यहां ट्रकों और ऑटो से प्रदूषण फैलता है। आप इन्हें रोकना चाहेंगे, तो आपको वोट का नुकसान होगा।
5. यहां पेट्रोल पंप पर बिकने वाले डीजल में मिट्टी तेल की मिलावट होती है। पर आप उन्हें कैसे रोकेंगे? प्रदूषण की बहुत बड़ी वजह ये मिलावट भी है।
6. आप हर गाड़ी से फिटनेस प्रमाण प्रत्र लेते हैं। इसका मतलब कि जिनके पास ये प्रमाण पत्र होता है, उनकी गाड़ियों से प्रदूषण नहीं होता, फिर आप क्यों उन गाड़ियों को सड़क पर चलने से रोक रहे हैं?

***

खैर, आज मैं ज़्यादा लंबी कहानी नहीं सुनाना चाहता। सारी रात नहीं सो पाया हूं, इसलिए सिर में दर्द हो रहा है। पर आपसे कहना चाहता हूं कि मैंने जो कुछ लिखा है, उसका एक-एक अक्षर सत्य है। आप चाहें तो अपने साथी Manish Sisodia जी से मेरे बारे में पूछ लें। वो मेरे साथ ज़ी न्यूज़ में काम करते थे। जिन दिनों मैं रिपोर्टिंग करता था, वो डेस्क पर थे और बिजली की बदहाली के खिलाफ आंदोलन उन्होंने मेरे सामने ही शुरू किया था। वो सरकार से परेशान थे। सरकारी फैसलों और भ्रष्टाचार से परेशान थे। मैंने उनसे पूछा था कि आप कभी राजनीति में तो नहीं आएंगे न! उन्होंने कहा थी कि नहीं, राजनीति नहीं करनी। पर जब बात नहीं बनी, सरकार नहीं सुधरी, तो उन्होंने राजनीति में कदम रख दिया। आप भी ऐसा कुछ मत कीजिए कि किसी शांत, खुश मिजाज आदमी को राजनीति में घुसने का मन बनाना पड़ जाए। आप लोगों से कहते थे कि तुम बिजली का बिल मत दो। तुम कटे मीटर के कनेक्शन को खुद जोड़ लो। सरकार से मत डरो। मान लीजिए हम आपसे डरना छोड़ दें, अपनी कार लेकर आज दफ्तर के लिए निकल पड़ें, तो आपको कैसा लगेगा?

***

दूसरों के साथ वैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जो खुद के लिए पंसद न हो। और आखिरी बात, बहुत साल पहले किसी पत्रिका में पढ़ा था कि कानून उतने ही बनाने चाहिए जिनका पालन हो सके। ज्यादा कानून बनते हैं, तो उनके टूटने का खतरा बढ़ता है। बाकी तो आप समझदार हैं। आप वैकल्पिक व्यवस्था पहले पूरी कीजिए, फिर इस तरह की मुहिम चलाएं। आप साइकिल ट्रैक बनवा दीजिए, मैं दिल्ली में कार से चलना छोड़ दूंगा।

आपका
संजय सिन्हा
(दिल्ली का एक आम आदमी)

टीवी टुडे ग्रुप में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार संजय सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

इसी मसले पर अन्य पत्रकारों द्वारा लिखे गए पोस्टों को भी पढ़ें.. नीचे क्लिक करें>

पत्रकार यशवंत की पीड़ा और गुस्सा

जा जा रे केजरिया… तू तो एहसासे करा दिए हम गरीबों को कि हम सब ब्लडी गरीब टाइप लोग भेरी भेरी गरीब हैं

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पत्रकार नदीम एस. अख्तर का गुस्सा

odd-even : केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा नहीं देखा…

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पत्रकार ओम थानवी का विश्लेषण

सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए

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odd-even : केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा नहीं देखा…

Nadim S. Akhter :  अरविन्द केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा ने नहीं देखा, जिसन वाहवाही बटोरने के चक्कर में बिना सोचे-समझे पूरी जनता को odd-even की खाई में धकेल दिया। पहले से ही मरणासन्न दिल्ली का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम इतनी बड़ी आबादी के सफ़र को कैसे झेलेगी, इस पर एक पल भी नहीं सोचा। ऊपर से ये महामूर्ख मुख्यमंत्री स्कूल में बच्चों के बीच जाकर कह रहे हैं कि बेटे, अपने मम्मी-पाप को इस नियम का पालन करने की सीख देना, उनसे जिद करना। लेकिन ये नहीं बता रहे कि जब टाइम से ऑफिस न पहुचने पे पापा की सैलरी कटेगी और ऑटो लेकर जाने में उनकी जेब से दोगुने नोट ढीले होंगे, घर का बजट बिगड़ेगा, तो पापा घर कैसे चलाएंगे?

केजरीवाल नमक इस मूर्खाधिराज को तो ये भी नहीं मालूम कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण सड़को पे उड़ रही धूल से है, गाड़ियों से नहीं। गाड़ियां बैन करने से पहले अगर उन्होंनेे दिल्ली की टूटी-फूटी सड़कें ही बनवा दी होती तो प्रदूषण का लेवल काफी कम हो गया होता। ऊपर से ये अदूरदर्शी आदमी ये कहता है कि मैं तो अपने मंत्रियों के साथ कार पूलिंग कर लूंगा जी, आप भी कर लो। लेकिन ये नहीं बताता कि आम आदमी कार पूल करने के लिए ममुहल्ले में कहां कहाँ भटकेगा, जब एक पडोसी नौकरी-दुकान के लिए नोएडा जाता हो और दूसरा गुड़गांव, और उसे खुद कहीं और जाना हो।

भारत के चीफ जस्टिस तो सुप्रीम कोर्ट तक अपने साथी जजों के साथ कार पूलिंग कर लेंगे, अकर्मण्य मुख्यमंत्री केजरीवाल तो साथी मंत्रियों के साथ एक ही ऑफिस तक चले जायेंगे, आम जनता कहाँ जायेगी!!! आम आदमी के नाम पे सत्ता पाने वाले इस नौटंकीबाज मुख्यमंत्री ने अपने इस फैसले से उस mango people को भी भारी मुसीबत में डाल दिया है, जिसके पास न तो कार है और न स्विमिंग पूल और न ही उसे कार पूलिंग का मतलब ही समझ आता है। वो तो रोज डीटीसी बसों और मेट्रो से कमाने निकलता है। सो जब मेट्रो और बसों में लोग ठसाठस ठूंसे जायेंगे, तो बेचारे उस गरीब का कचूमर निकलना तय है।

शर्त लगा लीजिये कि अगर आज दिल्ली में चुनाव हों तो इस केजरीवाल एंड कंपनी वाली आम आदमी पार्टी को आम जनता जड़ से उखाड़ कर फेंक देगी, जनता में इतना गुस्सा है। ‘ना बंगला लूंगा और न गाड़ी लूंगा जी’ की बात कहने वाला ये मुख्यमंत्री आज सब सुख भोग रहा है। हाँ, जनता की गाड़ी छीनने में इसने कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदूषण तो बहाना है, असल मकसद केजरीवाल को अपनी राजनीति चमकाना है।

केजरीवाल की पोल तो उसी दिन खुल गई, जब उन्होंने odd-even की आग में आम आदमी को तो झोंक दिया लेकिन vip culture ख़त्म करने की बात कहने वाले इस पूर्व तथाकथित आंदोलनकारी ने दिल्ली के सारे वीआईपीज को इससे छूट दे दी। यानि आम आदमी सड़क पे धक्के खाये और नेता-मंत्री-जज-राज्यपाल मिलकर मौज काटें। मानो उनकी कार से प्रदूषण का धुआं नहीं, ऑक्सीजन गैस निकलती है।

कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल पर निशाना साध प्रशांत भूषण ने काटजू के तर्क को गलत बताया तो जवाब में काटजू ने लिखा लंबा चौड़ा मेल…

Markandey Katju : Mr. Shanti Bhushan’s response to my article in scroll.in in which I said that the Delhi Govt. is a state, and is empowered to constitute a Commission of Inquiry. I have taken his permission to post his email to me…

Justice Katju is totally wrong

Delhi being the capital of India, having the embassies of the entire world located therein, the President of India, the Parliament of India, the Prime Minister, the entire cabinet, etc. it could not belong to the people of Delhi only. It belongs to the people of the whole country.It is the govt elected by the people of the entire country who have to administer Delhi.

This is the reason for enacting Art 239 AA (7) empowering Parliament to enact a law for supplementing the provisions of Part VIII which could even go to the extent of amending that Part .In Fact this power was exercised by the Parliament by enacting the Administration of the National Territory Act.

A look at the provisions of this Act would show that neither the Delhi govt nor even the Delhi Legislative Assembly have been given any real powers.Their function even on subjects not excluded from their jurisdiction is only to assist the Central Govt through its representative the Lt Governor. All powers are rightly with the Central Govt alone.Any exercise of legislative power or executive power requires the approval of the Lt Governor.

It may hurt the ego of Arvind Kejriwal but the constitutional position is that he is only a Chief Minister in name but is effectively only a subordinate officer of the Lt Governor. His role as CM is only ceremonial.

xxx

Markandey Katju : My reply to Mr. Shanti Bhushan..

Dear Shanti Bhushanji,

I have read your email. So according to you Delhi voters wasted their time and money voting for a ceremonial body, and you made a substantial financial contribution also to this ceremonial body.

By your logic Delhiites were cheated and deceived into thinking that they were electing a legislative ( not a merely administrative ) body, and the only authority in Delhi is the unelected chamcha of the central govt, Najeeb Jung, while elected functionaries are only flowerpots.

I find your logic totally unacceptable in a democratic country.

Except for land, police and public order, the Delhi legislature can legislate, and the Delhi Govt. can deal with, all matters in the State and Concurrent List. But how can they legislate and deal with them if they cannot even inquire into them ? Sports is a matter within entry 33 of the state list, and inquiries are a matter covered by entry 45 of the concurrent list.

Hence a purposive, and not literal interpretation has to be given to the word ‘state’ in section 3 of the Commissions of Inquiry Act, 1952. Several decisions of the Indian Supreme Court, as well as English Courts, have adopted the purposive approach.

You write :

” A look at the provisions of this Act would show that neither the Delhi govt nor even the Delhi Legislative Assembly have been given any real powers.Their function even on subjects not excluded from their jurisdiction is only to assist the Central Govt through its representative the Lt Governor. All powers are rightly with the central govt alone “

So according to you, the Delhi C.M. other Delhi Ministers, and MLAs are only civil servants who are subordinate to the Central Govt. and their job is only to assist the Central Govt. With respect, I find this a strange logic.. If your statement is accepted, Article 239AA becomes redundant, and Delhi reverts to becoming a purely administrative unit.

Your reference to Article 239AA(7) is totally misplaced. That provision reads :
” (a) Parliament may, by law, make provisions for giving effect to, or supplementing provisions contained in the foregoing clauses and for all matter incidental or consequential thereto .

(b) Any such law as is referred to in sub-clause (a) shall not be deemed to be an amendment of this constitution for the purposes of article 368 not withstanding that it contains any provision which amends or has the effect of amending this constitution. “

A perusal of the above shows that it only empowers Parliament to make supplementary, incidental or consequential laws. It does not derogate from the legislative powers of the Delhi Legislature on matters on which it is competent to legislate.

I may mention that by virtue of Articles 249 and 250 of the Constitution in some situations Parliament can legislate on matters covered by the state list.
Regards

Markandey Katju

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CBI रेड अब सारे आरोपों और असफलताओं से निकाल देगा केजरीवाल को! (पढ़ें सोशल मीडिया पर पक्ष-प्रतिपक्ष में टिप्पणियां)

Amitaabh Srivastava : अरविंद केजरीवाल और उनकी मंडली मन ही मन बहुत प्रसन्न होंगे। शकूरबस्ती झुग्गी कांड के बाद बैकफुट पर आई केंद्र सरकार ने सीबीआई छापे के बहाने इस सर्दी में उन्हें victim politics का एक गरमागरम मुद्दा और मौका दे दिया है। सर्दियों में आम आदमी पार्टी की पालिटिक्स गरमाती भी है। इसी बहाने पंजाब के लिए warm up भी हो लेंगे। अलबत्ता उन्हें राहुल बच्चे हैं और मोदी psychopath – इस तरह की भाषा और जुमलों से हर हाल में बचना चाहिए।

Mohan Guruswamy :  It’s a shame that the Prime Minister has stooped to a new low by having the CBI raid and seal the Delhi CM’s office ostensibly to investigate his Secretary on a 2002 matter during the tenure of Sheila Dikshit and also concerning present LG Najib Jung. The CBI reports directly to the PM this action would not have taken place without his consent. This is utterly revolting and this lends credence to Rahul Gandhi’s charge that the PMO is targeting him.

Shamshad Elahee Shams : देश में आपातकाल लग चुका है, क्योंकि आखिरी सिरे तक कायर हैं, इसलिए घोषणा नहीं करेगा। विरोधी पक्ष पर हमले और तेज होंगे। शुरुआत कागजी शेर, लाला जी से की है।

 

Sanjay Sharma :  केजरीवाल के दफ़्तर पर छापा आपातकाल की पहली शुरुआत है. जो लोग कांग्रेस पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगाते थे, अब खुद वही काम कर रहे हैं.

ऋषि अजीत पाण्डेय : ज्यादा हल्ला न मचाइये. आखिर पैसा तो पकड़ा गया है न. (केजरीवाल के सीएम दफ्तर पर सीबीआइ का छापा)

Sushant Sareen : If rajender wasnt your secretary, would you have made such a song & dance about the raid?

Sn Vinod : केजरीवाल के दफ्तर पर छापे की कार्रवाई ने मोदी और भाजपा को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया है।

Ritesh Mishra : गजब भाई.. जिसने भी ये सोचा कि केजरीवाल के यहाँ CBI रेड पड़वाई जाय, वो केजरीवाल समर्थक ही होगा. ये सारे आरोपों और असफलताओं से निकाल देगा केजरीवाल को. ये चला केजरीवाल झाड़ू लिए पंजाब और अन्य प्रांतों में अब. वाह रे मूर्खों. रहबो भक्त ही –ई प्रधानी नै न साहेब, ई देश है!

Mayank Saxena : हालांकि ये निर्विवाद है कि दिल्ली के सीएम के दफ्तर पर सीबीआई रेड केंद्र द्वारा सोची समझी हरकत है…लेकिन यह भी निर्विवाद है कि राजेंद्र कुमार विवादित अधिकारी हैं….तो श्रीमान केजरीवाल जी, पीएम, केंद्र सबके खिलाफ ट्वीट करते रहें…लेकिन साथ ही राजेंद्र कुमार को फिलहाल लम्बी छुट्टी पर भेंज कर, या निलम्बित कर या फिर किसी और विभाग में भेज कर…उनके खिलाफ जांच की घोषणा तो कर दें… आप इसी का वादा कर के तो सत्ता में आए थे न?

प्रकाश कुकरेती :  सीबीआई छापे की हकीकत… इस कहानी के असली किरदार आशीष जोशी हैं, जिनको आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (डीयूएसआईबी) का फायनेंस सचिव बनाया था. पर अप्रैल 2015 में इनको किसी कारणवश केजरीवाल सरकार ने पद से हटा दिया था. उसके बाद इन साहब ने एंटी करप्शन ब्यूरो जिसके चीफ मीणा हैं, के पास एक शिकायत दर्ज कराई कि केजरीवाल के सचिव राजेन्द्र कुमार ने 2002 से लेकर 2010 तक कोई भ्रष्टाचार किया है. इस शिकायत पर पर ही सीबीआई ने छापेमारी की है. अब जरा राजेन्द्र कुमार के बारे में भी जान लीजिए. सेल टैक्स विभाग किसी भी राज्य का सबसे भ्रष्ट विभाग होता है. पर जब राजेन्द्र कुमार दिल्ली सेल टैक्स जिसे हम वैट विभाग कहते हैं, के कमिश्नर बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम सेल टैक्स को भ्रष्टाचार मुक्त करने का किया. आन लाइन सेल टैक्स रिटर्न फ़ाइल करना, 2A और 2B (यह कम लोग ही समझ पायेंगें) इन्होंने ही लागू किया था. आन लाइन रिफंड इनके वक़्त ही शुरू हुवा था. राजेन्द्र कुमार की वजह से ही सेल टैक्स विभाग में 80% रिश्वतखोरी रुक गई थी, क्योंकि व्यापारी हर काम आनलाइन कर सकता था. आज भी सेल टैक्स के भ्रष्ट कर्मचारी इनको गाली देते हैं कि राजेन्द्र कुमार की वजह से उनकी दो नंबर की कमाई मारी गई.  अब भाई इन पर मामला 2002 से 2010 के बीच का है, तो सवाल तो बनता ही है न कि आशीष जी इतने साल से क्या सो रहे थे, और 2002 के मामले की शिकायत अगर मई 2015 में हो तो सबसे पहला शक शिकायत करने वाले पर जाएगा कि भाई इतने सालों तक आप सो रहे थे क्या? राजेन्द्र कुमार पर भ्रष्टाचार के जो भी मामले हैं वह 2002 से 2010 के बीच के हैं, अब मामला एंटी करप्शन ब्रांच से सीबीआई के पास कैसे गया?

Asad Jafar : CBI Raid on Delhi CM’s Office.. The CBI raid on the office of the Chief Minister of Delhi is highly condemnable and smacks of a politically motivated act. It is unprecedented that in the name of investigating the accusations against a bureaucrat, the office of the Chief Minister should be sealed and files searched, as alleged by the Chief Minister. In any case, if indeed the CBI was targeting a bureaucrat whose office was on the same floor as the CM’s, as claimed by the CBI, why was the Chief Minister not consulted? This raid is a new low in the Modi Government’s encroachment on the rights and dignity of non BJP elected Governments.

Aditi Gupta : दिल्ली के मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के दफ्तर और घर पर आज सी बी आई ने छापेमारी करके लाखों रुपये नकद और बेनामी जायदादों के दस्तावेज बरामद किये है. केजरीवाल ने तुरंत इस छापेमारी का विरोध करते हुये देश के प्रधानमंत्री पर अभद्र भाषा मे गाली गलौज़ की बौछार शुरु कर दी है और उन्हे “कायर और मानसिक रोगी” तक कह डाला है. सवाल यह है कि क्या सीबीआई को उन सभी भ्रष्ट अफ़सरों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट दे देनी चाहिये, जिनके ऊपर केजरीवाल का वरदहस्त है ? अगर ऐसा नही है तो क्या केजरीवाल जी अपनी चिर परिचित बौखलाहट छोड़कर यह बताने की तकलीफ करेंगे कि सीबीआई ने आखिर गलत क्या किया है? भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन करने की नौटंकी करते हुये और “जनलोकपाल” का झुनझुना बजाते हुये आदरणीय अरविन्द केजरीवाल जी दिल्ली की सत्ता हथियाने मे तो कामयाब हो गये हैं लेकिन उन्हे अपने ही दुष्कर्मों के चलते, आगे की राह काफी कठिन लग रही है. इसी के चलते जबसे उनकी सरकार बनी है, शायद ऐसा कोई भी दिन नही गया जब इन्होंने, इनके साथियों ने या फिर इनकी तथाकथित सरकार ने कोई विवादास्पद काम ना किया हो और उस सबका ठीकरा पीएम मोदी के सिर ना फोड़ा हो. या तो केजरीवाल जी यही समझते हैं कि “भ्रष्टाचार” की परिभाषा वही होगी, जैसी वह चाहते हैं या फिर वह यह स्वीकार करते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका आन्दोलन एक नौटंकी मात्र थी और देश की जनता को बेबकूफ बनाकर सत्ता के सिहासन तक पहुंचने का जरिया मात्र था. सीबीआई के छापों पर केजरीवाल की जिस तरह से बौखलाहट भरी और बेचैनी से मिश्रित प्रतिक्रिया आई है, उसके दूरगामी परिणाम होंगे. मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव का सीबीआई छापों मे सुबूतों के साथ रंगे हाथों पकड़े जाना और मुख्यमंत्री महोदय का देश के पीएम को गाली गलौज करते हुये अपने प्रधान सचिव का बचाव करना देश की जनता को उन्ही दिनो की याद दिला रहा है जब पिछले 60 सालों के कुशासन मे दैनिक रूप से अरबों खरबों के घोटालों से देश मे लूटमार का माहौल बना हुआ था. अभी तो गनीमत है कि दिल्ली पुलिस केजरीवाल जी के अधीन नही है. अगर दिल्ली पुलिस भी केजरीवाल जी के अधीन कर दी जाये तो फिर क्या क्या हो सकता है, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.

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