नोटबंदी : एक भयावह सच्चाई यह भी!

नोटबंदी से नफा नुकसान का आंकलन किया जा रहा है। लोग इस उम्मीद में खुश है कि दूसरों के घरों में आग लगी है। लेकिन कुछ भयावह सच्चाई और भी हैं जिसे हम स्वीकार करने से कतराएंगे। वह यह है कि बेरोजगारी बढऩे वाली है। इस कारण देश से सुख चैन छिन सकता है। दरअसल नोटबंदी से ढाई लाख करोड़ ब्लैक मनी और नकली नोटों का सरक्यूलेशन बंद हो गया है। इस पैसे के कारण लगभग 3 से 4 करोड़ लोग रोजगारधारी थे।

मोदी सरकार के आने के बाद डेढ़ करोड़ लोग बेरोजगार हुए। इनका बोझ 18 करोड़ लोगों पर पड़ा। अब चार करोड़ लोग फिर बेरोजगार हो जाएंगे जिससे 14 करोड़ लोगों पर सवा अरब जनसंख्या का भार पड़ेगा। अब कुल 6 करोड़ लोग बेरोजगार हुए तो इससे चौतरफा व्यापक असर पड़ सकता है। आवागमन 6 माह बाद शून्य बटा सन्नाटा हो सकता है। परिवहन व्यवस्था पर बुरा असर पडऩे की आशंका है। इससे जुड़ी कई चक्रीकरण अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। चूंकि अर्थव्यवस्था में 50 प्रतिशत भागीदारी ठेलाखुमचा, नाई, धोबी, मोची आदि का योगदान हैं और जो लोग बेरोजगार हुए हैं उनका भार भी यही लोग ढोएंगे तो इनके पास खाने कमाने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। इस तरह कुल रोजगारधारी 4 करोड़ और कम हो गए।

क्या होगा?
भाजपा सरकार आने के बाद दो नंबर की कमाई अधिकांशत: बंद हुई है। अब यदि बेरोजगारों को शीघ्र रोजगार से नहीं जोड़ा गया तो देश 10 साल पीछे चला जाएगा। रोजगार के लिए सरकार उद्योगपतियों का मुंह देखेंगी। उद्योगपति बैंक और क्रय शक्ति का मुंह देखेंगे। तो ना रोजगार मिलेगा ना प्राइवेट कंपनियां आएंगी और ना ही देश का विकास होगा। सरकार रोजगारमुखी काम के नाम पर प्रशिक्षण देती रह जाएगी। हां राजस्व में सरकार को असर इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि ये कानून के नाम पर लोगों का गला दबाकर पैसा उगाह लेते हैं। टारगेट से यदि कम राजस्व वसूला गया तो सरकारी कर्मचारी विशेष वसूली अभियान चला देते हैं। लेकिन भुखमरी के हाल में असर तो पड़ेगा ही। इसके खिलाफ लोगों को एकजुट होना पड़ेगा।

रोजगार नहीं दिया तो?
युवाओं को रोजगार नहीं दिया तो कुछ नहीं होगा! आगामी 10 सालों में युवाओं की आबादी घटकर 30 से 35 प्रतिशत हो जाएगी। जिसमें आधे लोग रोजगार करना नहीं चाहेंगे। अब बचे 15 प्रतिशत लोग। तब तक विश्व में युवाओं की मांग तेज हो जाएगी और 5 से 8 प्रतिशत आबादी विदेश नौकरी करने चली जाएगी। तो 2 से 5 प्रतिशत युवा देश का क्या विकास करेंगे सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। नतीजन सरकार पर स्वास्थ्य सेवाओं, भोजन का दबाब बढ़ेंगा और सरकार कर्ज में डूब जाएगी। और आगे क्या होगा सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।

क्या करना चाहिए?
फिलहाल सरकार के लिए बेहतर होगा कि वह हर बेरोजगार युवा को बेरोजगारी भत्ता दे। वो भी 50-100 रुपए नहीं कम से कम एक हजार रुपए। खाद्य सुरक्षा के तहत हर पात्र हितग्राही को 5 किलो से बढ़ाकर 15 किलो अनाज दे। किसानों की फसल सीधे सरकार खरीदें। तब स्थिति पटरी पर आएगी। नहीं तो अंग्रेजों के कुछ नौकरशाह देश हित में क्या सोचते हैं इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। वे युवाओं के लिए कुछ करना ही नहीं चाहते। जनता को सिस्टम के नाम पर चक्कर लगवाते हैं इससे नुकसान किसका हो रहा है देश का ना? तो जनाब नौकरशाहों और सरकार के अंदर कब देशभक्ति जागेंगी। जब आपके बच्चे आपसे मुंह मोड लेंगे तब या उसके बाद भी नहीं?

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार
maheshwari_mishra@yahoo.com

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